गुरुवार, 10 अक्तूबर 2019

बाबा कार्तिक उरांव ने आदिवासी पहचान की लड़ी थी लड़ाई


कार्तिक उरांव को याद करते समय हमें उनके कामों को भी याद करना चाहिए। व्यक्ति अपने काम से ही याद किया जाता है और वह सदा स्मृतियों में बना रहता है। आज की गलाकाट राजनीति के दौर में उन्हें इस लिहाज से भी याद करना जरूरी हो जाता है कि ऐशो आराम की जिंदगी छोड़ राजनीति में आए तो अपने लिए एक मकान भी नहीं बनवा सके। पं जवाहर लाल नेहरू उन्हें लंदन से लेकर भारत आए, जहां वे पढऩे गए थे। फिर सत्तर के दशक में चुनावी राजनीति में आए और पहली बार असफलता के बाद दूसरी बार कामयाब हुए। पर राजनीति उनके लिए अपने विकास की सीढ़ी नहीं थी। उन्होंने आदिवासियों के विकास को हमेशा ध्यान में रखा। इसलिए, 1967 में अखिल भारतीय आदिवासी विकास परिषद की स्थापना की और उसके पहले संस्थापक अध्यक्ष बने। इसके बैनर तले रांची में सरहुल की भव्य शोभायात्रा की शुरुआत की, जो आज इतना भव्य हो गया है, लाखों लोग मांदर के साथ झूमते हुए सड़क पर निकलते हैं। पड़हा व्यवस्था को दुरुस्त किया। सरना कोड की मांग तब उठाई थी। आदिवासी पहचान को लेकर वे बेहद सजग थे। सांस्कृतिक चेतना जगाने के बाद उन्होंने अंबेडकर की तरह आदिवासियों को भी शिक्षित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए। उन्होंने करीब 57 स्कूल खोले, जिसमें अब मात्र नौ ही चल रहे हैं। पूर्व आइजी और बाबा कार्तिक उरांव के दामाद डॉ अरुण उरांव जरूरत कहते हैं कि इन स्कूलों को फिर से चलाने का उपक्रम किया जा रहा है।
गांव से लंदन की यात्रा


गांव से प्राथमिक शिक्षा ग्रहण करने के बाद बिहार में बीएससी पढ़ाई की। इसके बाद यहां से सीधे लंदन। एमएससी इंजी लंदन से किया। इसके बाद एआरसीएसटी ग्लास्गो। कार्तिक किसी बड़े शहर में नहीं जन्में थे। गुमला जिले के करौंदा गांव की लीलाटोली में 29 अक्टूबर, 1924 को उनका जन्म हुआ था। आठ दिसंबर, 1981 को निधन। इंजीनियङ्क्षरग के साथ ही बैरिस्ट्री की शिक्षा लिंकन्स इन लंदन से ग्रहण की। यहां आए तो 1950 से 52 तक बिहार सरकार में सिंचाई विभाग में सहायक अभियंता की नौकरी की। इसके बाद फिर देश को छोड़ विदेश चले गए और 1954 से 1955 डिजाइन डिटेलर ट्विस्ट्रील रिफन्फोर्समेंट लि तथा ईबी बालगेर एंड संस लंदन में काम किया। सितंबर, 1955 से मई 1958 तक तकनीकी सहायक ब्रिटिश रेलवे तथा वरीय तकनीकी सहायक ब्रिटिश ट्रांसपोर्ट कमीशन लंदन में रहे। अगस्त 1958 से फरवरी 1961 तक असैनिक अभियंता डिजाइन, आटोमेटिक पॉवर डिपार्टमेंट, टेलर उड्रा कंस्ट्रक्शन लि मिट्रलेसेक्स यूके में काम किया। इसके बाद दिसंबर, 1961 तक एचइसी में। अगस्त 1962 से 1967 तक डिप्टी चीफ इंजीनियर। हालांकि इसकी कहानी भी दिलचस्प है। इसी दौरान लंदन में नेहरू गए थे। वहां इनकी प्रतिभा देखी तो भारत आने का न्यौता दिया। इसके बाद जब एचइसी की स्थापना होने लगी तो कार्तिक उरांव को बड़ी जिम्मेदारी सौंपी। यही कारण रहा कि इनका कांग्रेस के प्रति झुकाव हो गया। इसके बाद तो 1967 से 1970 तक, 1971 से 1977 तक लोकसभा सदस्य रहे। बिहार विधानसभा सदस्य, 28 जून 1977 से 16 जनवरी 1980 तक रहे। 1980 से आठ दिसंबर, 1981 तक मृत्युपर्यंत संचार राज्यमंत्री भारत सरकार रहे। राष्ट्रीय भाषा परिषद, बिहार के 1968 से 1975 तक सदस्य। हालांकि दर्जन भर से ऊपर राष्ट्रीय और प्रादेशिक संस्थाओं में सक्रिय रहे। मानद सदस्य रहे। उनके पैतृक गांव में जरूर एक बड़ा आयोजन होता है। लेकिन उनके काम को लिखित दस्तावेज के रूप में प्रकाशित करने की व्यवस्था होनी चाहिए।

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