गुरुवार, 10 अक्तूबर 2019

पुस्‍तक छपते ही लग गया था प्रतिबंध

पंडित सुंदर लाल की 'भारत में अंग्रेजी राज' पुस्तक को अंग्रेजों ने खतरनाक पुस्तक माना। छपते ही पांच दिनों के अंदर इस पर अंग्रेजी सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया। नौ साल बाद इस पर से प्रतिबंध हटा।  यह पुस्तक अब फिर से छपकर आई है। पुस्तक मोरहाबादी, मंडा मैदान के वीरेंद्र प्रसाद के सौजन्य से अभी-अभी इसे प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली ने प्रकाशित किया है।
प्रो वीरेंद्र प्रसाद को यह पुस्तक उनके पिता पुलिस अधिकारी हरिहर सिंह से प्राप्त हुई थी। हरिहर सिंह की दो साल पहले, 2016 में 98 साल की उम्र में रांची में ही निधन हुआ। हरिहर सिंह ब्रिटिश काल में बिहार में सीआइडी इंस्पेक्टर रहे। गांधी की हत्या को लेकर छह सदस्यों की जो जांच टीम बनी थीं, उस टीम में  इन्हें भी शामिल किया गया था और उन्होंने जेल जाकर नाथूराम गोडसे से न केवल पूछताछ की थी, बल्कि एक लंबा इंटरव्यू भी लिया था, जिसे अब पुस्तक के रूप में प्रकाशित करने की योजना वीरेंद्रजी बना रहे हैं। वीरेंद्र जी कहते हैं कि यह पुस्तक भी पिताजी ने भागलपुर के अमरपुर थाने से नीलामी में दो रुपये में खरीदी था, तब से मेरे पास थी। हरिहर सिंह एएसपी पद से 1977 में अवकाश ग्रहण किया।

अलग-अलग शहरों से छपी : जैसा कि हम जानते हैं, इस पुस्तक को पंडित सुंदरलाल ने लिखा है। ये बीएचयू के कुलपति भी रहे। ये ऐसे लेखक थे, जिनकी पुस्तक 'भारत में अंग्रेजी राजÓ ने सत्याग्रह या बम-गोली द्वारा अंग्रेजों से लडऩे वालों को सदा प्रेरणा दी। सुंदरलालजी जानते थे कि प्रकाशित होते ही शासन इसे जब्त कर लेगा। अत: उन्होंने इसे कई खंडों में बांटकर अलग-अलग शहरों में छपवाया। तैयार खंडों को प्रयाग में जोड़ा गया और अंतत: 18 मार्च, 1929 को यह पुस्तक प्रकाशित हुई। ओंकार प्रेस, इलाहाबाद से यह छपी थी।
पांच दिन के अंदर जब्त : इसका पहला संस्करण दो हजार प्रतियों का था। जब्ती की आशंका को देखते हुए 1,700 प्रतियां तीन दिन के अंदर ही ग्राहकों तक पहुंचा दी गईं। शेष 300 प्रतियां डाक या रेल द्वारा भेजी जा रही थीं कि इसी बीच अंग्रेजों ने 22 मार्च को इस पर प्रतिबंध लगा दिया और जब्त कर लिया। जो 1,700 पुस्तक जा ग्राहकों तक पहुंच चुकी थीं, अंग्रेजी शासन उसे ढूंढने लगी। इस प्रतिबंध के विरुद्ध देश भर के नेताओं और समाचार पत्रों ने आवाज उठाई। गांधीजी ने यंग इंडिया में इस जब्ती को 'दिन दहाड़े डाका बताया। दूसरी ओर सुंदरलाल प्रतिबंध के विरुद्ध न्यायालय में गए। उनके वकील तेजबहादुर सप्रू ने तर्क दिया कि इसमें एक भी तथ्य असत्य नहीं है। सरकारी वकील ने कहा, 'यह इसीलिए अधिक खतरनाक है।
नौ साल बाद हटा प्रतिबंध : इस पर सुंदरलाल ने संयुक्त प्रांत की सरकार को लिखा। गर्वनर शुरू में तो राजी नहीं हुए, पर 15 नवंबर 1937 को उन्होंने प्र्रतिबंध हटा लिया। इसके बाद अन्य प्रांतों में भी प्रतिबंध हट गया। अब नए संस्करण की तैयारी की गई। चर्चित पुस्तक होने के कारण अब कई लोग इसे छापना चाहते थे, पर सुंदरलाल ने कहा कि वे इसे वहीं छपवाएंगे, जहां से यह कम दाम में छप सके। ओंकार प्रेस, प्रयाग ने इसे केवल सात रुपए मूल्य में छापा।
पहले संस्करण का मूल्य 16 रुपये था। पुस्तक छपकर तैयार होने से पहले ही दस हजार के स्थान पर 14 हजार से ऊपर ग्राहकों के आर्डर आ चुके थे। इसलिए दूसरे संस्करण के निकलते ही तीसरे संस्करण का प्रबंध किया जाने लगा। दूसरे संस्करण की भूमिका में सुंदरलाल ने तारीख नौ सितंबर 1938 लिखा है। देश की आजादी के बाद 1960 में भारत सकार ने इसे प्रकाशित किया। हालांकि कुछ अंश हट गए थे, लेकिन अभी जो प्रकाशित हुई है, वह दूसरे संस्करण से है। इसमें किसी प्रकार का फेरबदल नहीं किया गया है न संपादित। प्रो वीरेंद्र प्रसाद कहते हैं, लंबे समय से यह किताब पड़ी थी, इसका पन्ना-पन्ना अलग हो गया था। अब छपकर आई है तो बड़ा सुकून मिल रहा है। अब दुबारा पाठकों को यह ऐतिहासिक पुस्तक सुलभ होगा।
दैनिक जागरण से साभार

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