कबरा कला : बदल सकता है झारखंड का इतिहास

 डालटनगंज के हुसैनाबाद प्रखंड के कबरा कला गांव में उत्खनन से झारखंड ही नहीं, भारत के इतिहास पर भी नई रोशनी पड़ सकती हैं। यह एक ऐसा गांव है, जहां पाषाण काल से लेकर मुगल काल तक के अवशेष पाए जाते हैं। पुरातात्विक दृष्टिï से देश का संभवत: अकेला ऐसा स्थल है, जो कभी बेचिरागी नहीं हुआ। यानी यहां सभ्यता की निरंतरता की निशानी के कुछ न कुछ चिह्नï अवश्य मिल जाते हैं। हालांकि आज भी यहां एक-डेढ़ हजार की आबादी निवास करती है। भारतीय पुरातत्व विभाग(दिल्ली)की पत्रिका ने भी माना कि यहां से मिले सामान नियोलीथिक से लेकर मध्यकाल के स्पष्टï संकेत करते हैं। वहीं, पिछले एक दशक से कबरा कला पर काम करने वाले हुसैनाबाद निवासी तापस डे मानते हैं कि यहां मध्य पुरापाषाण काल, नव पाषाण काल, ताम्र पाषाण, लौह युग, मौर्य काल के अवशेष मिले हैं। वह मानते हैं कि यहां चालीस से अस्सी हजार के बीच के कालखंड के पत्थरों के औजार मिले हैं। कला संस्कृति एवं खेलकूद विभाग के पूर्व उपनिदेशक (पुरातत्व) डा. हरेंद्र प्रसाद सिन्हा का कहना है कि पाषाण काल के अवशेष उसकी प्राचीनता की कहानी कहते हैं। लेकिन स्पष्टï तौर पर जब तब खुदाई नहीं होती है, कुछ भी प्रामाणिक ढंग से कहना समीचीन प्रतीत नहीं होता।
पुरातात्विक संस्थान, नई दिल्ली के निदेशक डा. अमरेंद्रनाथ 2003 में अपने छह सदस्यीय टीम के साथ कबरा कला आए थे। उन्होंने यहां का सूक्ष्म निरीक्षण किया और कहा कि कबरा कला की सभ्यता झारखंड की एक विस्मयकारी पुरातात्विक इतिहास की परिघटना है। उसी समय इस गांव को राष्टï्रीय महत्व का ऐतिहासिक स्थल चिह्निïत कर दिया गया। पर, इतने महत्व के गांव की खुदाई आज तक नहीं हुई। इस बाबत तापस डे कहते हैं कि बार-बार पुरातत्व विभाग को लिखा और दिल्ली तक दौड़ लगाई पर केवल कागजी आश्वासन ही मिले। जबकि इस मामले को सन 2000 में संसद में भी उठाया गया था। तब से केवल स्थल निरीक्षण का काम ही हुआ, उत्खनन नहीं। चूंकि यह गांव सोन नदी के किनारे स्थित है, इसलिए इसे सोन नदी घाटी सभ्यता का नाम दिया गया है। इस गांव के चारो ओर कुछ न कुछ महत्वपूर्ण सामग्री मिलती ही रहती है। अभी कुड़वा कला गांव में, जो जपला-डेहरीआनसोन रोड से दस किमी भीतर स्थित है, वहां भी उत्तरकालीन मृदभांड मिले हैं। इसके साथ ही लाल, काले पालिशदार मिट्टïी के बर्तन मिले हैं। लाल पालिश की हुई सुराही और अंगूठे के आकार का एक सर्प का सिर मिला है। इस सर्प के दो कान बने हुए हैं। इसका एक कान खंडित हो गया है। जाहिर है, या तो यहां शैवों की उपस्थिति रही होगी या नागवंशियों की। हालांकि झारखंड में दोनों की उपस्थिति रही है। कबरा कला में भी मनके, स्त्री की छोटी मूर्ति, जिस एक लिपि में कुछ अंकित है, पत्थरों के औजार आदि मिले हैं। यहां नव पाषाण काल के विभिन्न रंग एवं आकार की चार कुल्हाडिय़ा मिली हैं। पाल, मुगल और ब्रिटिश काल की मूर्तियां, तांबे एवं पीतल के बर्तन, सिक्के आदि भी पर्याप्त संख्या में मिले हैं। यहां लौह काल की लहसीलन (पिछला हुआ लौह) तथा मिट्टïी भी है। ये सभी चीजें सतह पर ही मिलती रही हैं या कभी किसी कारणवश ग्रामीण खुदाई में इन्हें प्राप्त करते रहे हैं। पर, इतने महत्वपूर्ण स्थल की खुदाई आज तक नहीं हुई जबकि तापस डे मानते हैं कि खोदाई से केवल नागर सभ्यता ही नहीं मिलेगी बल्कि मोहनजोदड़ो और सिंधु घाटी की सभ्यता से भी पहले की सभ्यता से साक्षात्कार हो सकता है। हालांकि अब इसकी खोदाई होनी है। पुरातत्व विभाग ने स्वीकृति दे दी है। अब देखिए, क्या-क्या खोदाई में निकलता है। जो भी हो, एक नई सभ्यता से रूबरू होने का मौका तो मिलेगा ही। हो सकता है, फिर से इतिहास लिखा जाए।  

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