मंगलवार, 19 अप्रैल 2016

पहली शोभायात्रा 17 अप्रैल 1929 को निकली थी

सुधीर लाल, लेखक
रांची में पहली रामनवमी की शोभायात्रा 17 अप्रैल, 1929 को निकली थी। यहां रामनवमी की शुरुआत हजारीबाग के रामनवमी जुलूस को देखकर किया गया था। हजारीबाग में रामनवमी जुलूस गुरु सहाय ठाकुर ने 1925 में वहां के कुम्हार टोली से प्रारंभ की थी। रांची के श्रीकृष्ण लाल साहू की शादी हजारीबाग में हुई थी। 1927 में रामनवमी के समय वे अपने ससुराल में थे और वहां की रामनवमी जुलूस को देखा। रांची आकर अपने मित्र जगन्नाथ साहू सहित अन्य मित्रों को वहां की रामनवमी के बारे में बताया। इसके बाद मित्रों में उत्सुकता जगी और 1928 में वहां की रामनवमी को देखने लोग हजारीबाग गए और इसके बाद 1929 में रांची में इसकी शुरुआत कर दी।
पहली शोभायात्रा 17 अप्रैल, 1929, दिन बुधवार को निकली। इसके लिए खादी का झंडा बनवाया गया। इसका रंग कत्थई था, जो आज भी सुरक्षित है। इस काम में श्रीकृष्ण लाल साहू के दोनों बड़े भाई लोकनाथ साहू व रामकृष्ण साहू का भी सहयोग रहा। श्रीकृष्ण साहू के पिता ठेसा साहू और जगन्नाथ साहू के पिता नेमन साहू ने दोनों को प्रोत्साहित किया और अलग से पैसे भी दिए। भुतहा तालाब निवासी अनिरुद्ध राम उन दिनों जगन्नाथ साहू के यहां कार्यरत थे। उन्होंने झंडे के लिए बांस काटा। रामनवमी के दिन ननकू की मां ने नेमन साहू की दुकान के समाने गोबर लीपकर पूजन स्थल और प्रसाद के लिए सेट तैयार किया। जगन्नाथ साहू की पत्नी कुम्हारिन देवी ने पूजा की तैयारी की। 17 अप्रैल की सुबह पंडित गुमान मिश्र ने पूजा करवाई। इसके बाद बजरंगबली की जय का घोष करते हुए श्रीकृष्ण लाल साहू, टेसा साव, कोल्हा साव, लोकनाथ साहू, रामकृष्ण लाल, गुमान मिश्र, जगदीश साव, भगवत दयाल साहू आदि थोड़े से मुहल्लेवासी झंडे को लेकर अमला टोली, वर्तमान श्रद्धानंद रोड होते हुए मेन रोड तक आए। आज जहां अल्बर्ट एक्का की प्रतिमा है, वहां एक बंगाली की दुकान हुआ करती थी। वहां का चक्कर लगाकर शोभायात्रा अमला टोली होते हुए वापस महावीर चौक लौट गई। शोभायात्रा के आगे अनिरुद्ध राम झंडे को और जागो मोची डंका बजाते हुए चल रहे थे। शोभायात्रा में शामिल सभी उपवास पर थे। इस पहली शोभायात्रा की चर्चा महीनों होती रही। उन दिनों रांची एक कस्बाई नगर था। उस समय अपर बाजार में ङ्क्षहदू-मुस्लिम की मिली-जुली आबादी थी। लगभग सभी के मकान कच्चे और खपरैल के थे। महावीर चौक के आस-पास ही आबादी थी। उसके आगे खेत और पेड़ों से भरा था। आज जहां दुर्गा मंदिर है, वहां पेड़ों का एक बगीचा था। इस तरह रामनवमी की शोभायात्रा यहां प्रारंभ हुई। आगे चलकर कुछ तनाव हुआ तो 1936 में श्री महावीर मंडल का गठन किया गया, जिसके पहले अध्यक्ष नागा बाबा ज्ञान प्रकाश बनाए गए। इसके बाद महावीर मंडल के नेतृत्व में ही शोभायात्रा निकलने लगी। मंडल का गठन होते ही रांची में उत्साह का वातावरण बन गया। इसके बाद यह शोभायात्रा तपोवन मंदिर तक जाने लगे। मुहल्लों में अखाड़ों का गठन किया जाने लगा। महावीर चौक पर गणेश मंदिर का भी निर्माण किया गया। आज शोभायात्रा और भव्य रूप में निकल रही है। हर दिन भीड़ बढ़ती जा रही है। 

अब याद नहीं आते भोजपुरी के तुलसीदस कहे जाने वाले कवि बावला

-एम. अफसर खां सागर हम फकीरों से जो चाहे दुआ ले जाए, फिर खुदा जाने किधर हमको हवा ले जाए, हम सरे राह लिये बैठे हैं चिंगारी, जो भी चाहे चरागो...