दर्द, दमन, दहशत के बीच सोसाकुटी

संजय कृष्ण :उ (नक्सली) दिने पिटेला इ (नक्सली) राइते पिटेला। यह दर्द अकेले लुडू देवी का नहीं है। उन जैसी सैकड़ों औरतें इसी दर्द, दमन और दहशत के बीच दिन और रात गुजारने को विवश हैं। लुडू देवी रांची जिले के इटकी प्रखंड के सोसाकुटी गांव की रहने वाली है। इस गांव का कसूर यह है कि इसी गांव का गुरुवा लोहार नक्सली है। अब पुलिस पूरे गांव के साथ नक्सलियों के साथ जैसा व्यवहार करती है। किसी का किवाड़ तोड़ देना, अनाज छींट देना, पके भात को चूल्हे में ही पलट देना..आदि-आदि। और, गांव में किसी लड़की ने सूट-सलवार पहन रखा हो तो, पुलिस की नजर में उसका नक्सली होना काफी है। ललिता कुमारी की उम्र 12-13 साल है। मां बचपन में ही गुजर गई। पिता हैं। सो, पढ़ाई बीच में ही छूट गई। पिछले आठ जुलाई, गुरुवार को जब सौ से ऊपर की संख्या में पुलिस बल पहुंचा तो गांव वालों के साथ उसने यही सलूक किया। ललिता ने स्कर्ट पहन रखा था। पुलिस ने सवाल दागा.क्या गुरुवा ने दिया तेरे को। जिस उम्र की दहलीज पर ललिता है, उसे क्या पता यह गुरुवा कौन है? गांव में दहशत का आलम यह है कि कोई गाड़ी यदि बिना हार्न बजाए घुस रही हो तो गांव के लोग भागकर छिपने लगते हैं। फ्रेंडली पुलिस का यह दहशत है। गांव की ही ऐतवारी, शशिकला की कहानी भी यही है। लुडू को बेटा विपुल लोहरा, जो नवयुवक छऊ नृत्य पार्टी में काम करता है, 19 जून को छऊ मुहानी से उठा ले गई। पिता सुखराम लोहरा कहते हैं कि मामला जब अखबार में आया तब जाकर उसे जेल भेजा गया। सोसाकुटी गांव का टोला है सोसोहातु। सड़क से सिंदरी गांव और उसके पीछे सोसोहातु। गांव तक जाने के लिए कोई सड़क नहीं। न बिजली न सिंचाई का कोई साधन। पूरी तरह बारिश पर निर्भर। इस गांव में उस बासंती से उसका दर्द पूछिए, जिसे पुलिस शादी की रात ही उसके पति सत्यनारायण मुंडा को उठा ले गई। शादी करने अपनी ब्याहता को ले आया था। घर का एकलौता चिराग। सो, पिता ने जश्न में कोई कोताही नहीं बरती। देर रात तक चला पार्टी..। क्या पता था कि कुछ घंटों में पार्टी का रंग फीका हो जाएगा..। पुलिस पहले भी उसे गिरफ्तार कर जेल भेज चुकी थी। आरोप यही था कि वह दस्ते को लेवी की रकम वसूल कर और अन्य सामान पहुंचाता है। इधर, वह हालांकि वह खेती-बारी कर रहा था। लेकिन पुलिस..। उसके पिता धान सिंह मुंडा कहते हैं कि हम लोगों की स्थिति इधर कुआं, उधर खाई जैसी हो गई है। क्या करें, कहां जाए?

प्रतिरोध की सांस्कृतिक अभिव्यक्ति हैं आदिवासी भाषाएं

अश'्रिवनी कुमार पंकज :
'देश में अगर किन्हीं लोगों के साथ सबसे अधिक बुरा व्यवहार हुआ है तो वे मेरे लोग हैं। पिछले 6000 वषरें के दौरान उनके साथ असम्मानजनक व्यवहार हुआ है और उनकी उपेक्षा हुई है।''
- जयपाल सिंह मुण्डा (19 दिसम्बर 1946 को संविधान सभा में)
स्वतंत्रता, न्याय, समानता और भागीदारी, लोकतंत्र के इन चारों आयामों के संदर्भ में भारत के आदिवासी जनों का अनुभव नीम से भी ज्यादा कड़वा है। लगभग जहर जैसा। वे न सिर्फ औपनिवेशिक काल में छले, लूटे व मारे गये, बल्कि स्वतंत्र भारत में भी आंतरिक उपनिवेश बने हुए हैं। वे अपने तमाम संसाधनों से बेदखल किये गए, भाषा-संस्कृति से विस्थापित हुए और बड़े पैमाने पर धार्मिक रूपांतरण का शिकार बने। आधुनिकीकरण और विकास के पहले चरण में जहां उन्हें अदृश्य युद्धों (विस्थापन) में सब कुछ खो देना होता है, वहीं संस्कृतिकरण से पीढ़ी दर पीढ़ी धीमे-धीमे मरते रहना पड़ता है। पिछले 350 वषरें से इस आदिवासी दोहन, लूट, नरसंहार और संस्कृतिकरण की प्रक्त्रिया में कोई शिथिलता नहीं आई है। यदि कुछ शिथिल हुआ भी है, तो वह है संविधान और लोकतंत्र।
भारत ही नहीं, पूरी दुनिया में आदिवासी समुदायों के साथ शासक वगरें का यही विश्वासघाती रवैया रहा है। आधुनिक नगरीय जीवन की चमक-दमक और विकास का मायाजाल (शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार) लेकर वे आदिवासी दुनिया में प्रवेश करते हैं और उनसे उनका सबकुछ (स्वतंत्रता, आत्मनिर्णय का अधिकार, सांस्कृतिक अस्मिता) छीनकर उन्हें अपना शासित बना लेते हैं। इसके बाद उनके ऊपर एक ऐसी सांस्कृतिक व्यवस्था आरोपित कर दी जाती है, जिससे उनकी इतिहास चेतना हमेशा-हमेशा के लिए कुंद हो जाए और वे कभी भी प्रतिरोध की हिम्मत नहीं जुटा पाएं। न्यूगी वा थ्योंगो कहते हैं, 'औपनिवेशिक ताकतें अपने आर्थिक और राजनीतिक नियंत्रण को ज्यादा से ज्यादा मुकम्मल रूप देने के लिए सांस्कृतिक परिवेश पर अपना नियंत्रण बनाने की कोशिश करती हैं। शिक्षा, धर्म, भाषा, साहित्य, गीत, नृत्य के विविध रूप, अभिव्यक्ति के प्रत्येक रूप आदि पर नियंत्रण करके वे जनता के समग्र मूल्यों पर नियंत्रण हासिल कर लेती हैं और अंतत: जनता के विश्वदृष्टिकोण पर भी उनका नियंत्रण हो जाता है और इसी के अधीन लोग खुद को परिभाषित करने लगते हैं।' (न्गुगी वा थ्योंगो: भाषा, संस्कृति और राष्ट्रीय अस्मिता, पृष्ठ 54)
भाषा-संस्कृति का सवाल सीधे-सीधे सांस्कृतिक अस्मिता और आर्थिक-राजनीतिकी स्वायत्तता से जुड़ा है। अगर आज समूची दुनिया के प्रथम नागरिकों का अस्तित्व खतरे में है, तो इसके कारण उस 'ऐतिहासिक अन्याय' में निहित हैं, जिसके लिए विकसित देशों (आस्ट्रेलिया आदि) को आज अपने मूल निवासियों एवं आदिवासियों से माफी मांगनी पड़ रही है। इस ऐतिहासिक अन्याय के कारण ही भारत के 699 आदिवासी समुदायों में से 52 का पूरी तरह से खात्मा हो चुका है। यही नहीं वे आज भी भारतीय राजसत्ता और कॉरपोरेट घरानों के हिटलिस्ट में सबसे पहले नंबर पर हैं। वे आधुनिक दुनिया की शुरुआत के समय से ही 'विकास' का सबसे पसंदीदा शिकार रहे हैं। उन्होंने राष्ट्र निर्माण की प्रक्त्रिया में सबसे ज्यादा कीमत चुकायी है और देश के किसी भी नागरिक समुदाय की तुलना में सबसे कम पाया है। जहां तक भारत के आम गरीब-वंचित जनता की बात है तो तथ्य यह भी है कि 'सत्ता हस्तांतरण' के 62 सालों बाद भी जनता का 80 प्रतिशत हिस्सा 20 रुपये प्रतिदिन या उससे कम पर गुजर बसर कर रहा है। वहीं सबसे धनी 100 परिवारों की कुल आय देश के जीडीपी का 25 प्रतिशत है। ये तथ्य हमें भारतीय शासकवर्ग की जनता के जीवन और स्वतंत्रता के प्रति प्रतिबद्धता के बारे में संदेह करने के लिए बाध्य करते हैं।
आदिवासियों के इस संदेह को स्वाधीनता प्राप्ति (सत्ता हस्तांतरण) के समय ही जयपाल सिंह मुण्डा ने तीखी अभिव्यक्ति प्रदान की थी। जब उन्होंने 19 दिसम्बर 1946 को संविधान सभा में ऑब्जेक्टिव्स रिजॉल्युशन पर बोलते हुए यह कहा था, 'मैं भी सिंधु घाटी की सभ्यता की ही एक संतान हूं और उसका इतिहास बताता है कि आप में से अधिकांश बाहर से आए हुए घुसपैठिए हैं। जहां तक हमारी बात है, बाहर से आए हुए लोगों ने हमारे लोगों को सिंधु घाटी से जंगल की ओर खदेड़ा। हम लोगों का समूचा इतिहास बाहर से यहां आए लोगों के हाथों निरंतर शोषण और बेदखल किए जाने का इतिहास है। .. इसके बावजूद मैं पंडित जवाहर लाल नेहरू की बात पर यकीन करता हूं, मैं आप सबकी इस बात पर यकीन करता हूं कि हम एक नए अध्याय की शुरुआत करने जा रहे हैं। स्वतंत्र भारत का एक नया इतिहास जहां अवसरों की समानता होगी, जहां किसी की उपेक्षा नहीं की जाएगी।' पर हम देखते हैं कि स्वाधीन भारत में आदिवासियों की इस उम्मीद और विश्वास को कोई तरजीह नहीं दी गई। सिर्फ भाषा का उदाहरण ही लें तो 1961 की जनगणना के अनुसार भारत में 1652 भाषाएं थीं। 2001 में यह संख्या घटकर मात्रा 234 रह गई। अर्थात् पिछले चार दशक में भारत 1418 भाषाएं खो चुका है। हो सकता है कि यह आंकड़ा कुछ कम हो, क्योंकि इसमें उन भाषाओं की गिनती से बाहर रखा गया है, जिन्हें बोलनेवालों की संख्या दस हजार से कम है। फिर भी यह आंकड़ा तेजी से सिकुड़ रहे भाषाई गणतंत्र और विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र 'भारत' की अत्यंत भयावह तस्वीर पेश करता है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि पिछले 40 वषरें में विलोपित हुए भाषाई समुदायों को सामाजिक, राजनीति, आर्थिक, सांस्कृतिक सहित जीवन के सभी स्तरों पर जबरदस्त आघातों से गुजरना पड़ा है, जिनकी सुरक्षा-संरक्षण का उल्लेख भारतीय संविधान में किया गया है। साथ ही जब हम यूनेस्को द्वारा फरवरी 2008 में जारी 'खतरे में पड़ी भाषाओं का विश्व-मानचित्र' देखते हैं, जिसके अनुसार भारत की 196 भाषाओं का अस्तित्व खतरे में है तो पाते हैं कि भाषाई, जातीय व सांस्कृतिक घृणा, उपेक्षा और भेदभाव की यह प्रक्त्रिया निर्बाध रूप से जारी है। यूनेस्को की एक रिपोर्ट के अनुसार दुनिया में सबसे तेज़ी से भाषाओं के ग़ायब होने की दर भारत में ही है। इसके बाद नंबर आता है अमेरिका का, जहां 192 ऐसी भाषाएं हैं और फिर तीसरे नंबर पर है इंडोनेशिया, जहां 147 भाषाएं दम तोड़ रही हैं। यूनेस्को के अध्ययन के मुताबिक हिमालयी राज्यों जैसे हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और उत्तराखंड में करीब 44 भाषाएं-बोलियां ऐसी हैं, जो जन-जीवन से गायब हो रही हैं, जबकि उड़ीसा, झारखंड, बिहार और पश्चिम बंगाल में ऐसी करीब 42 भाषाएं विलुप्त हो रही हैं। भाषाओं का इस भयानक तेजी के साथ अदृश्य होते जाना सामाजिक विविधता के लिए भी चिंता की बात है। विशेषकर, ग्लोबलाइजेशन के बाद समाज के सभी आयामों में उन समुदायों के प्रति हिंसा-दमन का दौर पहले से और बर्बर, और अधिक तीव्र हुआ है, जो मुख्यधारा से बाहर की भाषाएं बोलते हैं। ये वे लोग हैं, जो भारत की कुल जनसंख्या के मात्र 8.4 प्रतिशत हैं (लगभग साढ़े आठ करोड़), लेकिन संसाधनों की दृष्टि से देश के सबसे समृद्ध समुदाय हैं।
इन समृद्धशाली समुदायों के साथ भेदभाव का इतिहास बहुत पुराना है। वैदिक काल से लेकर अब तक के लिखित साहित्य में उनके अमानवीय शोषण, दोहन, और दमन की अंतहीन कहानियां बिखरी पड़ी हैं। 'माओवाद से देश की आंतरिक सुरक्षा को खतरा' के नाम पर पिछले वर्ष से आदिवासी इलाकों में शुरू हुआ 'ऑपरेशन ग्रीन हंट' रक्तरंजित इतिहास और सत्ता के दमनकारी कारवाइयों की सबसे ताजा बर्बर कड़ी है। गौर करने लायक बात यह है कि माओवाद (नक्सलवाद) उन इलाकों में संगठित है, जो इलाके देश में सबसे ज्यादा खनिज सम्पदा से भरे पूरे हैं, लेकिन साथ ही साथ वहां रहने वाले आदिवासी समुदायों की गरीबी और बेरोजगारी चरम पर है। ये वे इलाके हैं, जिनका निजी और सरकारी कंपनियों ने पूरा दोहन किया है, परंतु छोड़ा सिर्फ विस्थापन, भुखमरी, गरीबी व संस्कृतिकरण है। ऑपरेशन ग्रीन हंट इसलिए चलाया जा रहा है, क्योंकि इन क्षेत्रों में खनिज और खनिज आधारित उद्योगों के लिए किये गये सैकड़ों करारों (एमओयू) के क्त्रियान्वयन में आदिवासी एवं अन्य स्थानीय समुदाय जबरदस्त प्रतिरोध पैदा कर रहे हैं। इस प्रतिरोध को कमजोर किये बिना भारत सरकार की खनिज और साथ ही उसकी एफडीआई नीति कार्यान्वित नहीं हो सकती है। छत्तीसगढ़, झारखंड, उड़ीसा और पश्चिम बंगाल की सरकारों ने कॉरपोरेट घरानों के साथ कई खरब डॉलर के सैंकड़ों समझौतों पर दस्तखत किये हैं। स्टील प्लांट, स्पंज आयरन फैक्टरी, पावर प्लांट, एल्युमिनियम रिफाइनरी, बांधों और खदानों के लिए किये गये ये सारे समझौते गोपनीय हैं। लिहाजा यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि कांग्रेस, बीजेपी, और सीपीएम में 'निवेश और त्वरित आर्थिक विकास के लिए' अनुकूल वातावरण बनाने के प्रश्न पर आम सहमति है। स्पष्ट है कि ऑपरेशन ग्रीन हंट भारत के उन प्रथम नागरिकों के अस्तित्व को बर्बरतापूर्वक कुचल देने की कार्रवाई है, जो अन्यायपूर्ण विकास का विरोध करते हैं, राज्य प्रायोजित हिंसा के खिलाफ खड़े हैं तथा अपने पूर्वजों की धरोहर को बचाकर रखना चाहते हैं।

ेदेश के पहले आदिवासी उपन्यासकार थे मेनस ओड़ेया


संजय कृष्ण : देश के पहले आदिवासी उपन्यासकार थे मेनस ओड़ेया (1884-1968)और पहला उपन्यास है 'मतुराअ: कहनि'। उपन्यास प्राचीन मुंडारी में 1920 के आस-पास लिखा गया। हालांकि यह बीसवीं शताब्दी के पिछले दशक में यानी 1984 में प्रकाशित हुआ, लेकिन लिखा गया बीसवीं शताब्दी के आरंभिक दशकों में। एक लंबा अंतराल लिखने और छपने के बीच। कारण, 1700 पृष्ठों का होना और भाषा मुंडारी। कोई प्रकाशक तैयार नहीं। कैसे छपे उपन्यास। कौन थे मेनस और कहां से मिली उपन्यास लिखने की प्रेरणा? कहानी बड़ी दिलचस्प है।
मेनस ओड़ेया 'इनसाइक्लोपीडिया आफ मुंडारिका' के संकलनकर्ता फादर हाफमैन के स्टेनो थे। करीब पांच हजार पेजों की सामग्री उन्होंने टंकित की थी। टंकण के समय ही यह विचार आया, क्यों न इन सामग्रियों से एक उपन्यास की रचना कर दूं, उनकी भाषा में उनके लिए। इसी बीच विश्वयुद्ध छिड़ गया। फादर जर्मन थे। सो, अंग्रेजों ने उन्हें अपने वतन लौटने का हुक्म सुना दिया। फादर जर्मनी अपने गांव लौट गए और वहीं से सामग्री रांची भेजते फिर पटना जाता छपने के लिए। कहते हैं, फादर अंतिम दिनों में गठिया से ग्रसित हो गए थे और उन्हें टाइप करने में काफी दिक्कत होती थी। एक छोटी सी हथौड़ी के सहारे वे टाइप करते। एक अक्षर टाइप करने में कई मिनट लग जाता। फिर भी, उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। यह संयोग देखिए कि इनसाइक्लोपीडिया का अंतिम भाग डिस्पैच जिस दिन भेजा, उसके दूसरे दिन उनकी मृत्यु हो गई। उन्होंने अंतिम डिस्पैच करते समय लिखा, 'ईश्वर को धन्यवाद कि अब मुझको टाइप नहीं करना पड़ेगा।' रांची छोड़ने से पहले फादर सर्वदा मिशन खूंटी में रहते थे और यहीं पर मेनस भी उनके साथ रहते थे। एक बार भगवान बिरसा ने इस मिशन पर हमला कर दिया था। सौभाग्य से दोनों बच गए। उस समय भगवान बिरसा का आंदोलन चरम पर था। मेनास ने भगवान के आंदोलन को भी नजदीक से देखा था। वे खुद भी मुंडा थे। सो, अपने समाज के बारे में जानते थे। रही-सही कसर फादर के शोध अध्ययन से पूरा कर लिया। यहीं से उपन्यास का बीज पड़ा- 'मतुराअ: कहनि'। इस उपन्यास के केंद्र में नायक मतुरा है। मतुरा खूंटी के पास एक नई बस्ती बसाता है। उस बस्ती में एक ही गोत्र के लोग रहते हैं। धीरे-धीरे दूसरे गोत्र के लोग भी पहुंचते हैं और बस्ती बड़ी होने लगती है। अब नई बस्ती की जरूरत पड़ती है। पाहन पहाड़ों से पत्थरों को लुढ़काता है। गांव का सीमांकन किया जाता है। मुंडा गांवों को ससनदिरि (श्मशान का पत्थर) ही विभाजित करता है। यहीं से कहानी शुरू होती है। हिंदी-मुंडारी भाषा के विद्वान और इस उपन्यास को प्रकाशित कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले प्रो दिनेश्वर प्रसाद ने इस कृति के बारे में लिखा है, 'मथुरा की कहानी मुंडा जीवन का महाभारत है। महाभारत के विषय में कहा जाता है, यन्न भारते तन्न भारते। यानी जो महाभारत में नहीं, वह भारत में भी नहीं। यह उपन्यास भी कुछ ऐसा ही महत्व रखता है। यह उपन्यास की शक्ल में मुंडा जीवन का विश्वकोश है। इसमें मुंडा समाज, संस्कृति एवं इतिहास की प्रत्येक जानकारी उपलब्ध है।' मेनस का अंतिम दिन कष्ट में बीता। वे लोगों के स्नायु और हड्डी जोड़ आदि बीमारियों का इलाज कर अपना जीवन यापन करते थे। लंबा कद और गठा शरीर था। खैर, उनके जीते जी पुस्तक प्रकाशित नहीं हो सकी। 1934 में फादर पोनेट रांची आए। इन्होंने भी मुंडारी भाषा पर काफी काम किया। बहुत प्रयास किया इसके प्रकाशन के लिए, पर वे अपने जीवन के अंतिम काल में ही इसे प्रकाशित करवा सके कैथोलिक प्रेस से। फिलहाल, इसके हिंदी अनुवाद को लेकर प्रो दिनेश्वर प्रसाद और अश्विनी कुमार पंकज सक्रिय हैं।

रेड अलर्ट : रियल कम, अनरियल ज्यादा

नक्सल आंदोलन पर बनी अनंत महादेवन निर्देशित फिल्म 'रेड अलर्ट: द वार विद इनÓ जिस नाटकीयता के साथ शुरू होती है, उसी नाटकीयता और आश्चर्य के साथ समाप्त हो जाती है। चालीस साल से चल रहा आंदोलन बिना किसी निष्कर्ष के समाप्त हो जाता है। पुलिस कहती है कि हम उनसे लडऩे में सक्षम नहीं हैं, वही पुलिस नक्सलियों का खात्मा कर देती है। निर्देशक का यह दावा कि यह रियल स्टोरी पर आधारित है, पर कहीं-कहीं यह वास्तविकता से दूर भागने लगती है।
फिल्म में नक्सली स्कूल पर दिन में धावा बोलते हैं। वहां पुलिस ने कैंप किया है और बच्चे पढ़ रहे होते हैं। पुलिस-नक्सली की क्रास फायरिंग में एक स्कूली बच्चा मारा जाता है। आगे चलकर इसका प्रभाव नरसिम्हा (सुनील शेट्टी) पर पड़ता है, जिसे दस्ते में जबरदस्ती शामिल कर लिया गया था। नरसिम्हा गांव का एक सीधा-सादा युवक है, जो किसी के कहने पर जंगल में नक्सलियों को खाना पहुंचाने जाता है। उसके वहां पहुंचते ही पुलिस भी पहुंच जाती है और क्रास फायरिंग शुरू हो जाती है। इसमें तीन लोग मारे जाते हैं। नरसिम्हा किसी तरह बच जाता है। पर, दलम के लीडर वेलू अन्ना (आशीष विद्यार्थी) उसे जाने नहीं देते और खाना बनाने के साथ-साथ बंदूक चलाने की ट्रेनिंग शुरू कर देते हैं। नरसिम्हा गिड़गिड़ता है, अपनी पत्नी (भाग्यश्री) और दो बच्चों का हवाला देता है। पर, लीडर नहीं पिघलता। फिल्म के अंत तक नरसिम्हा नहीं बदलता। बार-बार इस तरह की 'अनावश्यकÓ हिंसा उसे विचलित करती है। पूछता है, दोनों ओर तो अपने लोगां हैं। जब नरसिम्हा अपने लीडर की हत्या कर भागता है तो उसे पत्रकार की याद आती है।
खैर, एक पत्रकार (मकरंद देशपांडे) के सवाल पर अन्ना कहता है हम सिस्टम के खिलाफ हैं और आतंकवादी देश के। फिल्म में चेग्वारा की शक्ल का एक बौद्धिक पात्र भी है। नरसिम्हा से एक बार कहता है, हथियारों से ज्यादा ताकत होती है शब्दों में। फिल्म में तेंदु पत्ता तोडऩे की मजदूरी के सवाल भी हैं। भ्रष्टाचार, शोषण, गरीबी की समस्या को उठाया गया है। सेज की समस्या को भी सतही ढंग से दिखाया गया है। नसीरुद्दीन शाह की इंट्री भी नाटकीय ढंग से होती है। फिल्म में दो-चार मिनट की भूमिका है, लेकिन प्रभावशाली। लक्ष्मी (समीरा रेड्डी )की इंट्री भी कुछ इसी अंदाज में होती है। थाने में जब नक्सली धावा बोलते हैं, एक कमरे में सिसकती हुई मिलती है। नक्सली उसे अपने साथ उठा ले जाते हैं। वह भी दलम में शामिल हो जाती है। लेकिन मुठभेड़ में मारे जाने के बाद कुछ नक्सली बच निकलते हैं, जिनमें लक्ष्मी भी है, जो थाने में ही आत्महत्या कर लेती है। उसकी भूमिका ग्लैमरस नहीं है, लेकिन वह अपना प्रभाव छोडऩे में कामयाब होती है। विनोद खन्ना, सीमा विश्वास, आयशा धारकर ने भी अपने-अपने हिस्से की भूमिका धारदार ढंग से निभाई है। सुनील शेट्टी और समीरा की भूमिका बेहद कमजोर है, लेकिन अपने अभिनय से दोनों दर्शकों को बांधे रहते हैं। स्क्रिप्ट मजबूत है, संवाद की डिलीवरी भी कमजोर नहीं है। लोकेशन फिल्म को वास्तविकता प्रदान करता है। कसी हुई फिल्म के बावजूद उसका अंत अत्यंत सतही ढंग से होता है। अंत में आतंकवादी ओसामा बिन लादेन के पुत्र के एक कोटेशन, फाइंउ एनॉदर वे के साथ फिल्म समाप्त हो जाती है। बेशक, महादेवन ने मेहनत की है, लेकिन नक्सल आंदोलन पर और गहराई से सोचने और शोध की जरूरत थी। नक्सलवाद और आतंकवाद का घालमेल विचार विभ्रम की स्थिति पैदा करता है। जंगलों में माओवादियों के रहन-सहन, खान-पान, देह की भूख आदि चीजों को भी समेटा गया है। ऐसी फिल्मों में गीत की गुजांइश नहीं होती है। है भी नहीं। गीत का एक मुखड़ा जरूर पाश्र्व संगीत के साथ सुनाई देता है। 1980 के दशक में स्मिता पाटिल की 'द नक्सलाइट्सÓ फिल्म 2002 में आई 'लाल सलामÓ की ही कतार में यह खड़ा होती है।
प्रस्तुति: संजय कृष्ण

सौंदर्य की विरूपता


डालटनगंज से मनातू जाने के दो रास्ते हैं। एक लेस्लीगंज होते हुए। दूसरा पाटन होते हुए। दोनों रास्ते पलामू की हकीकत बयां करने के लिए काफी! पचास साठ किमी का सफर तीन घंटे में, वह भी अपनी सवारी से। इस बीच आप बार-बार इस अनुभव से गुजरेंगे कि गड्ढïेे में सड़क है या सड़क में गड्ढïा...। हालांकि इन रास्तों से गुजरते हुए बीच-बीच में टपक पड़तीं छोटी-बड़ी पहाडिय़ा, नदी-नाले आंखों को थोड़ा सुकून देते हैं। वन तुलसी की गंध भी मदहोश कर देती है। पलामू की ऐसी प्रकृति बरबस अपनी ओर खींच लेती है। प्रकृति के इस नैसर्गिक सौंदर्य के साथ-साथ यात्रा करते हुए जब हम मनातू पहुंचते हैं तो एक दूसरे सत्य से साक्षात्कार होता है। एक ओर प्रकृति की नियामत और दूसरी ओर सुविधा वंचित समुदाय। आजादी के बासठ साल में मनातू कहीं नहीं पहुंचा है। प्रगति के नाम पर मोबाइल टावर जरूर खड़े हो गए हैं, गली-गली शराब की दुकानें जरूर खुल गए हैं, लेकिन उन्हें स्वच्छ पेयजल की सुविधा नहीं मिल पाई है। मनातू प्रखंड से एक किमी की दूरी पर है बिहरा गांव। गांव में जब प्रवेश करते हैं तो सबसे पहले फुलवा कुंवर से सामना होता है। फुलवा की उम्र करीब सत्तर साल है। मैंने पूछा, क्या किसी नेता ने आपके गांव में कदम रखा है? वह कहती है, 'हमर जेतना उमर हो, हमर होश में कौनो नेता-विधायक नखो अइले।Ó साठ घरों की आबादी वाले इस गांव में वैसे तो उरांवों (आदिवासी) की बहुलता (२५-३० घर) है, लेकिन आठ घर यादव, दस घर कहार, चार घर चौधरी और शेष भुइयां जातियों का निवास है। गांव के भीतर जाने पर छोटे-छोटे टोले दिखाई पड़ते हैं। इन टोलों में बुनियादी सुविधाएं ढूंढे नहीं मिलतीं। न पेयजल की व्यवस्था है, न सिंचाई का कोई साधन नजर आता है। जगेश्वर उरांव, सत्तू उरांव, चंदारिक उरांव, रामदीप उरांव जैसे लोग थोड़ी-बहुत खेती करते हैं, सिंचाई का कोई पर्याप्त साधन नहीं होने के कारण इंद्र पर पूरी तरह इनकी निर्भरता है। इंद्र की कृपा हुई तो खेती हुई अन्यथा सिवान में सन्नाटा। बड़ी मायूसी से वे कहते हैं थोड़ी-बहुत जो फसल लगी थी, वह भी पानी के अभाव में मर गई। गांव में दो चापाकल है, लेकिन ये अक्सर खराब रहते हैं। तीन कुआं तो हंै, लेकिन जेठ में सभी सूख जाते हैं। तब, पानी के लिए दूर-दूर भटकना पड़ता है।

हालांकि इस गांव के उरांवों, भुइयां आदि जातियों का मुख्य पेशा जलावन की लकड़ी बेचना है या दूसरों के खेत में मजदूरी। मजदूरी नहीं मिली तो दूसरे राज्यों में पलायन। अब राहुल गांधी भले ही मनरेगा की सफलता पर इतराते हों, लेकिन जब वे गांव की हकीकत से रूबरू होंगे तो शायद उन्हें अफसरों की फाइलों का सच पता चलेगा कि आखिर, सौ दिन रोजगार कितनों को मिला? मनातू के इस गांव में तो किसी को नहीं मिला। इन ग्रामीणों के पास जाब कार्ड पिछले चार साल से बना है। लेकिन इन्हें काम एक दिन का भी नहीं मिला। काम की मांग करते हैं तो बीडीओ पंचायत सेवक के पास भेज देता है और पंचायत सेवक इन्हें टरकाने लगता है। वन विभाग ने कुछ लोगों को काम दिया था बहुत पहले, लेकिन उसने मजदूरी आज तक नहीं दी। गांव की हकीकत यहीं नहीं रुकती। पूरे गांव में महज सात लोगों को वृद्धापेंशन मिलता है, जबकि वृद्धों की संख्या कहीं अधिक है। भोला उरांव के चेहरे पर उग आई झुर्रियां उनकी उम्र बयां करती हैं। चिंता में माथे की लकीरों की संख्या बढ़ती जा रही है। पर, इन्हें एक बार ही कई बार का बकाया ६४ सौ रुपए वृद्धा पेंशन मिला, लेकिन इसके बाद चार महीने हो गए, अभी तक एक पाई भी नहीं मिला।

प्रखंड का पद्मा गांव विधायक विदेश सिंह का गांव है। अब यहां दो-चार दुकानें उग आई हैं और चट्टïी होने का भ्रम पैदा करती हैं। अब यह कालाबाजारियों का मक्का बन चुका है। बिहरा गांव के ग्रामीण कहते हैं कि डीलर उन्हें कभी भी पूरा अनाज नहीं देता। केरोसिन भी कभी एक लीटर देता है कभी दो। राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण के तहत कुछ टोले में विद्युतीकरण तो किया गया है, लेकिन कुछ में तीन साल से पोल गिराकर छोड़ दिया गया है। जीवनंदन उरांव, प्रमोद भुइया, नंदलाल चौधरी कहते हैं कि बिजली पोल गाडऩे के लिए कृष्णा गिरी का लड़का बबूल गिरी पैसे मांगता है। सो, गांव वालों ने न पैसा दिया और न पोल लगा। शिक्षा और चिकित्सा की स्थिति तो और भी बुरी है। सरकारी डाक्टर दवाएं नहीं, पर्ची देते हैं। यह उस गांव की कहानी है जो प्रखंड से सटा है। उन गांवों की कल्पना कर सकते हैं, जो पहाड़ों और जंगलों की गोंद में बसते हैं, जहां पैदल के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं है। कभी आतंक का पर्याय रहे मनातू मउवार (जगदीश्वरजीत सिंह) कहते हैं, 'यह गांव यदि चाइना बार्डर पर रहता तो चाइना का हो जाता और सरकार को पता भी नहीं चलता।Ó

संजय कृष्ण

'हमरा ना मालूम गुरु जी कौन हैंÓ

रामधनी परहिया को मालूम नहीं है कि शिबू सोरेन कौन हैं। जब उससे पूछा, आपकाविधायक कौन है? उसने सिर्फ इतना ही बताया, कौनो चंद्रवंशी हैं। उनका पूरा नाम क्या है? नाम नइखी जानत। जब पूछा, गुरुजी को जानते हैं। तो उसने पास में बन रहे निर्माणाधीन एनपीएस के मास्टर को समझ लिया। जब कहा, गुरु जी माने शिबू सोरेन। तो उसने अनभिज्ञता प्रकट की और कहा, हमरा ओतना मालूम ना है। फिर, किसी और नेता के बारे में पूछना वाजिब नहीं समझा।

रामधनी परहिया उग्रवाद प्रभावित पांडू प्रखंड के एक गांव घाटतर का रहने वाला है। यह घासीदाग पंचायत के अंतर्गत पड़ता है। इस गांव तक पहुंंचने के लिए जो सड़क गई है वह दो-तीन किमी पहले ही आपका साथ छोड़ देती है। तब दोपहिया वाहन कुछ मदद कर सकता है, लेकिन बस्ती में जाने के लिए तो आपको सड़क से नहीं, पैदल चलकर जाना पड़ेगा। क्योंकि उनके घर तक सड़क गई ही नहीं है। ऊबड़-खाबड़ खेतों से गुजरते हुए इनके घरों तक पहुंचना होता है। लेकिन बरसात में रास्ता खोजना इनके लिए मुश्किल हो जाता है। यह गांव जंगल और पहाड़ की तलहटी में बसा है, जहां कोई साधन नहीं। आजीविका के लिए पूरी आबादी जंगल की लकडिय़ों पर निर्भर है। देवनारायण परहिया की उम्र 30 के आस-पास है। वह निरक्षर है। वह अपने घर से सटे छोटा सा रकबा वाले खेत में हल जोत रहा था। मंगनी के बैल से। उसके पास इतना रुपया नहीं कि अपना बैल रख सके। खेत भी मामूली। नाममात्र के। सो, वह भी जंगल की लकड़ी बेचकर अपना गुजारा करता है। कहता है, एक ग_ïर लकड़ी चालीस से साठ रुपए में बिकती है। पांच लोगों का परिवार। हारी-बीमारी सो अलग। लेकिन इस ग_ïर के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ती है। फिर, गांव से आठ किमी दूर कजरू बाजार में उसे बेचना पड़ता है, जिसमें पूरा दिन लग जाता है। यह रोज का काम है। रोजगार के नाम पर कुछ नहीं। नरेगा के तहत कोई काम नहीं मिला। गांव के 21 लोगों के पास कार्ड, लेकिन अगस्त के बाद आज तक एक छटांक अनाज नहीं मिला। वही हाल केरोसिन का। घासीदाग का डीलर उन्हें आसानी से बेवकूफ बना देता है। गांव में पोल और तार झूल गए हैं, लेकिन पिछले चार महीनों से बिजली के दर्शन नहीं हुए। शासन-प्रशासन के लोग भूल से भी उधर नहीं गुजरते। सो, इनके सुख-दुख की जानकारी उनके पास नहीं है। पांच साल पहले 11 बिरसा आवास इस बस्ती को मिले, लेकिन छप्पर आज तक नहीं पड़ा। हारी-बीमारी इनके लिए जानलेवा ही साबित होती है। क्योंकि सरकारी अस्पताल पांडू में है, लेकिन वहां कोई रहता नहीं। थक-हारकर इन्हें विश्रामपुर प्रखंड में शरण लेनी पड़ती है। इनके पास कोई साधन भी नहीं। करीब बीस किमी पैदल चलकर ये विश्रामपुर पहुंचते हैं। ऐसे में रोगी और उसके परिजनों के पास भगवान पर भरोसे के सिवाय और कोई विकल्प नहीं बचता है। यही हाल लोटो टोला की है। यह टोला घाटतर से आगे है। और छतरपुर प्रखंड में पड़ता है, लेकिन पांडू से जुड़े हैं। यहां पर बैगा जनजाति के बीस-बाइस घर हैं। इनकी आजीविका भी जंगल पर निर्भर है। ललिता देवी कहती है कि गांव में काम नइखे। शिक्षा, चिकित्सा, रोजगार का कोई साधन नहीं। अलबत्ता, देसी शराब की दुकानें जरूर खुल गई हैं। पर, उनके लिए स्वच्छ पानी की व्यवस्था सरकार नहीं कर पाई है। यह कहानी झाटीनाथ, लालीमाटी आदि आधा दर्जन गांवों की है, जो पहाड़ की तलहटी में बसे हैं जहां 'सरकारÓ अभी नहीं पहुंच पाई है। सो, लाल दस्ते ने अपनी पकड़ मजबूत बना ली है। यहां उसी की सरकार चलती है।

कहां गए बाघ

संजय कृष्ण : वन्य जीव कोष ने इस साल को बाघ वर्ष घोषित किया है और इसी साल के पहले दिन टाइगर मैन बिली अर्जुन सिंह इस दुनिया से रुखसत हो गए। यह अजीब संयोग ही है। इस घोषित बाघ वर्ष में जाहिर है, सरकार की देश भर में बाघों को बचाने की कवायद शायद इस साल परवान चढ़े। जिस तेजी से बाघ इस धरती से विदा हो रहे हैैं, इसकी चिंता न केंद्र सरकार को है और उन राज्यों की सरकारों को, जहां बाघों के अभ्यारण्य हैं। कम से कम पलामू व्याघ्र आरक्ष (पलामू टाइगर रिजर्व, बेतला नेशनल पार्क)

में यही स्थिति है। यहां का वन्य प्राणी विभाग झूठे आंकड़ों जरिए अपनी पीठ थपथपाता है। राज्य की सरकार और विभागीय अधिकारी भी वन्य प्राणियों को बचाने की कवायद को लेकर तनिक भी गंभीर नजर नहीं आते। इसी का नतीजा है कि चालीस बाघों की संख्या से घटकर मात्र एक बाघिन ही बची रह गई है। वैसे, विभाग के अधिकारी सत्रह बाघों के होने का दावा करते हैं, लेकिन उनके इस दावे पर देहरादून स्थित संस्था ने सवाल उठा दिया है।

पलामू व्याघ्र आरक्ष तीन जिलों लातेहार, गढ़वा, गुमला जिलों के 1026 वर्ग किमी वनक्षेत्र में फैला हुआ है। छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले से भी यह सटा हुआ है। इसका सृजन 1974 में हुआ था। यहां बाघ सहित कई अन्य जानवर भी हैं। पर यहां के अधिकारी इसको लेकर संजीदा नहीं है। वनों की अंधाधुंध कटाई से वन्य प्राणी अपने अस्तित्व से जूझ रहे हैं। बेतला नेशनल पार्क के भीतर वनों की कटाई रेंजरों के माथे पर शिकन पैदा नहीं करती। भीतर के कीमती पेड़ भी वन माफियों की भेंट चढ़ गए हैं। यह सिलसिला जारी है। सरकार और वन विभाग भी इस मामले में शुतुरमुर्गी रवैया अपनाए हुए है। सो, वन्य प्राणी दोहरी मार झेल रहे हैं। कहने वाले कहते हैं कि यह सब सरकारी अधिकारियों की मिलीभगत से होता है। पिछली गर्मी में बेतला के भीतर जानवरों के पीने के लिए पानी की कोई समुचित व्यवस्था नहीं थी। चढ़ती गर्मी ने जानवरों का जीना मुहाल हर दिया था। सो, जानवर जंगल से निकल गांवों में पानी के लिए भटकते रहे। इस क्रम में कई जानवर ग्रामीणों के हाथों मारे गए तो कई वाहनों की चपेट में आकर अपनी जान गंवाए। पर, संवेदनहीन अधिकारी जानवरों की मौतों पर लीपापोती करने में जुटे रहे। लाख टके का सवाल है, क्या इसी तरह हम लुप्त हो रहे बाघों बचाएंगे?

ऐसे कैसे खत्म होगा नक्सलवाद


संजय कृष्ण

झारखंड को बने नौ साल हो गए। इस बीच झारखंड के जिलों की संख्या भी 24 हो गई। इस दृष्टिï से कुछ जिलों में नए प्रखंड और अनुमंडल भी बने। इन जिलों का निर्माण के पीछे क्षेत्रों के पिछड़ेपन को दूर करना उद्देश्य था। विकास का तर्क देने वालों ने प्रशासकीय सुविधा के लिए भी इन नए जिलों-अनुमंडलों-प्रखंडों का होना जरूरी बताया था। अब ये नए जिले, अनुमंडल-प्रखंड क्या रह रहे हैं, यह देखने के लिए उधर का रुख करना पड़ेगा कि ये अपने उद्देश्य में कितने सफल रहे। लेकिन इस बीच जो नक्सली गठन से पहले कुछ जिलों में सिमटे थे, उन्होंने अपना विस्तार पूरे सूबे में कर लिया। 24 में से 22 जिले उनकी पूरी तरह गिरफ्त में हैं। शेष बचे दो जिले भी उनकी जद से बाहर नहीं माने जा सकते। देश की बात करें 29 राज्यों में से 20 राज्यों के 223 जिलों के 2,000 से ज्यादा थाना क्षेत्रों को अपनी लपेट में ले लिया है। जिसमें सात राज्य तो बुरी तरह प्रभावित हैं। इन सात राज्यों में इनकी पकड़ इतनी मजबूत है कि उनकी समानांतर सरकार चलती है। माओवादी-नक्सली अपने आधार वाले क्षेत्र को वे रक्त वीथिका (रेड कारीडोर) के नाम से पुकारते हैं, जो काठमांडू से लेकर पं बंगाल, झारखंड, ओड़ीसा, आंध्रप्रदेश होते हुए महाराष्टï्र तक फैला है।

इनके फैलाव, रणनीतियों, हिंसक गतिविधियों और लगातार भारतीय राज-व्यवस्था के समक्ष नित नई पेश करते चुनौतियों के मद्देनजर हमारे सबसे बड़े लोकतंत्र के अगुवा मनमोहन सिंह आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा मानते हैं। अर्थशास्त्री पी चिदंबरम जब से गृहमंत्री की कमान संभाले हैं, उनके लिए भी यह किसी बड़े खतरे से कम नहीं है। इतना कि आतंकवाद भी इसके आगे बौना है। इसलिए, इससे मुकाबला करने के लिए उन्होंने 70 हजार अर्धसैनिक बलों को उतारने का फैसला लिया है। वायु सेना के कमांडर भी हवाई हमले का लालायित हैं। हालांकि सरकार अपनी छिछालेदर से बचने के लिए ही सेना को उतारने मेें संकोच कर रही है। सवाल है कि यह समस्या इतनी विकराल क्यों हुई कि राज-सत्ता को अपने ही घरवालों से चुनौती मिलने लगी? इसके पीछे, जैसा कि विशेषज्ञ मानते हैं असमान विकास-आर्थिक-सामाजिक पिछड़ापन। योजना आयोग ने भी अस्सी-नब्बे पेजों की रिपोर्ट में इसके लिए कई कारणों के साथ विकास को भी जिम्मेदार ठहराया है। पर, इसका जवाब तो सरकार ही दे सकती है। आखिर, आजादी के बासठ सालों में केंद्र और राज्य की सरकारें क्या करती रहीं? देश की नौकरशाही क्या करती रही कि देश असमान विकास का शिकार हो गया और देश के कई हिस्सों में लोग बंदूक थामने को मजबूर हो गए? उदारीकरण के बाद तो और भी फासला बढ़ा है। अमीर और अमीर होते गए और गरीब और गरीब। देश में अस्सी करोड़ लोग 20 रुपए रोजाना पर गुजारा करते हैं। उदारीकरण के हिमायती और तब के वित्तमंत्री और अब के प्रधानमंत्री ने अपने इस फलसफे पर पुनर्विचार करने की जहमत नहीं उठाई।

इत्तफाक है कि आदिवासियों के इलाके में ही नक्सलवाद पसरा है और आदिवासियों की ही जमीन के नीचे खनिज संपदा बिखरी है। इसे सरकार अपने कब्जे में लेकर औने-पौने दामों में बहुराष्टï्रीय कंपनियों को दे रही है। इसका विरोध आदिवासी कर रहे हैं। देखा जाए तो पिछले 62 साल से केंद्र की सरकार और पिछले नौ सालों से झारखंड की आया राम-गया राम सरकारें आदिवासी हितों को अपने पैरों तले रौंदती रही हैं। उन्हें हाशिए पर ही छोड़ दिया और विकास की तथाकथित मुख्यधारा में उन्हें लाने का ईमानदार जतन नहीं किया गया। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कहते हैं कि आदिवासियों को आर्थिक व्यवस्था में स्थान देने में व्यवस्थागत असफलता रही, जिसके नतीजे अब खतरनाक मोड़ ले रहे हैं। पर, वह यह हुंकार भी करते हैं कि अब और आदिवासियों का शोषण बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। और, हाशिए पर मौजूद समुदायों के वैध अधिकारों को सुनिश्चित किए बिना समान विकास संभव नहीं है। वे यह भाषण हाल में संपन्न वन और जनजातीय विकास मंत्रियों के दो दिवसीय उद्घाटन में बोल रहे थे। वह अपने भाषण में यह जोडऩा भी नहीं भूलते कि जनजातीय समुदायों का शोषण और सामाजिक, आर्थिक भेदभाव लंबे समय तक सहन नहीं किया जा सकता। परंतु यह भी सच है कि बंदूक के सहारे नक्सली समस्या का कोई हल संभव नहीं है, न ही जनजातियों के हितों के लिए बोलने का दावा करने वालों ने कोई रास्ता सुझाया, जो व्यवहार्य हो। प्रधानमंत्री की दुविधा यह है कि एक ओर वह नक्सलियों के खिलाफ अर्धसैनिक बल उतार रहे हैं तो दूसरी ओर यह भी कह रहे हैं कि बंदूक से सहारे नक्सली समस्या का हल संभव नहीं है। पर नेहरू से लेकर मनमोहन ने क्या वाकई आदिवासियों की चिंता की? 2006 में बना वन अधिकार नियम को लागू नहीं किया गया। सरकार की गलत नीतियों के कारण ही 8 लाख एकड़ भूमि से आदिवासियों का अधिकार छीन गया। उसने कभी ईमानदारी से नियमों को लागू कराने में दिलचस्पी नहीं दिखाई। योजना आयोग ने आदिवासियों की भूमि व्यवस्था पर एक अध्ययन समूह का गठन किया, जिसकी अध्यक्षता प्रो बीके राय बर्तन ने की थी। डा. बर्मन ने उड़ीसा के कुछ स्थानों के भूमि सर्वेक्षण व सेटलमेंट कार्य का ब्यौरा देते हुए बताया कि जिस भूमि का आदिवासी उपयोग कर रहे थे, उसमें मात्र एक प्रतिशत पर ही उनके अधिकार को रिकार्ड किया गया है। यही हाल झारखंड में भी है। यहां कई पीढिय़ों से अपनी जंगल में अपनी जमीन जोत-बो रहे हैं, पर उनके पास इसका कोई रिकार्ड नहीं हैं। जहां रहा भी तो वह छप्परपोश मकान में कहां गायब हो गया या फिर नष्टï हो गया, पता नहीं। पर झारखंड की नौकरशाही वन अधिकार कानून बन जाने के बाद भी उनके अधिकार से खिलवाड़ कर रही है। यह सिर्फ आदिवासियों तक ही सीमित नहीं है। गरीबों के लिए बनी योजनाएं भी नौकरशाही की लूट के कारण उन तक नहीं पहुंच पा रही हैं। यहीं पर जिलों-अनुमंडलों-प्रखंडों की निरर्थकता भी उजागर हो जाती है।

चूंकि इस देश में किसी की जवाबदेही नहीं है, इसलिए वे अपने बचने का आसान रास्ता खोज ही लेते हैं। यह तो गरीब-आदिवासियों के घावों पर नमक छिड़कने जैसा है कि विकास की राशि गरीबों तक महज दस फीसदी पहुंच पाती है। इस तरह के बयान यह साबित करने के लिए काफी है कि सरकार का नौकरशाही पर नियंत्रण नहीं है। दूसरे नौकरशाही एसी ड्राइंग रूम में गरीबों के लिए योजनाएं बनाती हैं, जिसे जमीनी हकीकत से कोई वास्ता ही नहीं होता। मनमोहन सिंह या मोंटेेक सिंह या पी चिदंबरम...। इन्हें भारतीय समाज, इतिहास और संस्कृति का उतना ही पता है, जितना इनके पश्चिमी आकाओं ने बताया है। गांधी की तरह इन्होंने देश का भ्रमण तो रेल के तीसरे दर्जे में किया नहीं। आकाश में उड़कर ऊपर से नीचे देखते रहे। इस समझ से वे नक्सलवाद को खत्म करना चाहते हैं। कुछ लोग उन्हें सुझाव भी दे रहे हैं कि इस बार इन्हें नेस्तनाबूद कर देना है। पर, वे अपने ही अतीत को झुठलाना चाहते हैं। नक्सलबाड़ी से उठे बसंत के वज्रनाद को भी तत्कालीन बंगाल सरकार ने दमन से मिटा दिया था, लेकिन वे फिर जीवित हो उठे। और, बंगाल ही नहीं, कई प्रदेशों में और शक्तिशाली होकर उठ खड़े हुए। इसलिए, हो सकता है कि चिदंबरम की 70 हजार अर्धसैनिक बल उन्हें मिटा दें, लेकिन इसकी क्या गारंटी है कि वे फिर फिनिक्स की तरह जिंदा नहीं हो उठेंगे? तो समाधान क्या है? समाधान तो सरकार के पास ही है? इस लोकतंत्र में सबकी जवाबदेही तय हो। चाहे वह न्यायाधीश हों, नौकरशाह हों या नेता। मुकदमों का समय निर्धारित हो, कौन मुकदमा कितने दिनों तक चल सकता है? विकास की योजनाएं असफल होती हों या गरीबों तक नहीं पहुंच पाती हैं या भ्रष्टïाचार में फंस गई हों तो इसकी जवाबदेही अधिकारियों की है। भ्रष्टï अधिकारियों पर अंकुश लगे। पुलिस की कार्यप्रणाली में सुधाई हो। सरकार गांवों तक जाए। पलामू ही नहीं झारखंड के कई ऐसे गांव हैं, जो जंगलों और पहाड़ की तलहटियों में बसे हैं, जहां आजादी के बाद कोई अधिकारी या नेता नहीं पहुंचा। वे अपने हाल पर हैं। न उन्हें स्वच्छ पानी नसीब है, न चिकित्सा न शिक्षा। इसलिए सरकार को पहले लोगों को बुनियादी समस्याओं से मुक्ति दिलाने के प्रयास करने चाहिए। कुछ लोग कहते हैं कि विकास को नक्सलियों ने रोक दिया है। पर, जब नक्सली नहीं थे, तब कौन सा विकास किया गया? झारखंड में बांध-बराज की योजनाएं चालीस साल से चल रही हैं। राशि बढ़ती गई, पर आज तक काम नहीं पूरा हो सका। 40 करोड़ की योजनाएं हजार करोड़ में पहुंच गई हैं तो इसकी जवाबदेही किसकी है? सचमुच में यदि मनमोहन आदिवासियों के प्रति संवेदनशील हैं तो उन्हें या उनकी सरकार को कई स्तरों पर सुधार की प्रक्रिया अपनानी होगी। दोनों ओर से चलने वाली गोली में निर्दोष लोग ही मरेंगे।

'मेरे बेटे को मार डालाÓ

पलामू में बढ़ती उग्रवादी घटनाओं से परेशान पुलिस अब निर्दोष लोगों पर अपना गुस्सा उतारने लगी है। छतरपुर थाना के अंतर्गत पडऩे वाला गांव तेलाड़ी इन दिनों इसलिए सुर्खियों में है कि यहां के राजेंद्र यादव नामक युवक को पुलिस ने पूछताछ के बहाने पकड़ा और उसे मार डाला। उसके पिता दशरथ यादव बताते हैं कि 30 दिसंबर को सुबह पुलिस वाले घर पहुंचे और राजेंद्र यादव को अपने साथ लेते गए। पूछने पर पुलिस ने कहा, पूछताछ के बाद शाम को छोड़ दिया जाएगा। लेकिन उसे नहीं छोड़ा। दूसरे दिन गुरुवार की सुबह 10-11 बजे थाना पहुंचा तो प्रभारी नेेे कहा कि उसे डालटनगंज भेज रहे हैं। इसी बीच थाने में फोन आता है कि एक और व्यक्ति को पकड़ लिया गया, दोनों को साथ भेज दें। बताते-बताते दशरथ की आंखें भर आती हैं। अपने को काबू कर बताते हैं, अपराह्नï तीन बजे सदर थाना आया। यहां कुछ नहीं पता चला। फिर, एसपी आवास गया। वहां भी किसी ने मदद नहीं की। शाम हो गई हो तो वापस घर आ गया। एक जनवरी शुक्रवार को पुन: शहर थाना पहुंचा। यहां कुछ भी पता नहीं चला। लेकिन कई पुलिसकर्मियों ने मदद की। उसने बताया कि दो लोग छतरपुर से आए हैं। कौन हैं, नहीं पता। इसके बाद वह हाजत तक गए। जब अपने पुत्र को देखा तो वह बेहोश था। दूसरे कैदी रमेश यादव से पूछा तो उसने बताया कि इसे पुलिस वालों ने सौ लाठी मारा है। हमें भी बीस-पच्चीस लाठी मारी। रमेश ने भी कांपते-कांपते कहा, देखो तुम्हारे पिताजी आए हैं। किसी तरह उसकी आंख खुली। पिता ने कहा, कुछ खाने को ले आऊं। उसने अटकते-अटकते सेऽऽऽब कहा। इसके बाद पिता उसे सेब लाकर दिए। इतना बताते-बताते दशरथ यादव की आंखें भीग जाती हैं। सिसकते हुए कहते हैं, मैं भी घर चला आया। लेकिन एक जनवरी को साढ़े सात बजे के आस-पास खबर आई.....कि वह मर गया। पुलिस की इस कार्रवाई से पिता के भरोसे की लाठी तो टूट ही गई, राजेंद्र के दो अबोध बच्चे भी अपने बाप के साये से वंचित हो गए। सवाल उठता है कि क्या ऐसे निर्दोष लोगों की जान लेने से नक्सलवाद खत्म हो जाएगा?
संजय कृष्ण

हमार पापा को बचा लिहूं सरकार

संजय कृष्ण
शनिवार (26 दिसंबर) की रात एक बेटे की अपने पिता को माओवादियों से बचानेे की पुलिस से लगाई गुहार आखिरकार दम तोड़ गई। पुलिस ने उसके पिता को बचाने की कोई कवायद नहीं की। अलबत्ता बेटे को, जैसा कि पुलिस का अधिकार है, उसे गालियां देकर वहां से भगा दिया। इसके बाद माओवादियों ने जो किया, वह उनकी क्रूरता की सारी सीमाएं तोड़ देता है।
झारखंड का एक जिला है पलामू। पलामू का एक प्रखंड है छतरपुर। छतरपुर के एक गांव सरइडीह में शनिवार को करीब नौ बजे माओवादियों का एक जत्था पहुंचा और दिनेश सिंह के घर का दरवाजा खुलवाने लगा। दरवाजा नहीं खुलने पर जोर-जर्बदस्ती के बाद उसेेेे तोड़़़़ दिया और घर के भीतर प्रवेश कर गया। जब दिनेश सिंह ने इसका विरोध किया तो उसे गोली मार दी। घर के भीतर मौजूद उसकी पत्नी देवरती देवी ने अपने सामने सुहाग को दम तोड़ता देख उसने माओवादियों पर हमला कर दिया और उसे भी माओवादियों ने वहीं ढेर कर दिया। इसके बाद उनकी क्रूरता यहीं नहीं रुकी। दोनों को खाट से बांधा और आग लगा दी। फिर उनके घर को डायनामाइट से उड़ा दिया। करीब दो घंटे तक उनका तांडव चला और चलते-चलते वे उनके मंझले बेटे अजीत (17 साल) को भी साथ लेते गए, जिसका मंगलवार को दोपहर तक कुछ भी सुराग नहीं लग पाया था।
माओवादियों ने जब गांव में प्रवेश किया तो दिनेश सिंह के बड़े बेटे रंजीत ने, जो मुहर्रम की तैयारी देख रहा था, उन्हें देख लिया। वह अनहोनी को भांप गया और सीधे घर से पचास गज की दूरी पर बने पुलिस पिकेट पर चला गया और पुलिस से अपने पिता को बचाने की गुहार लगाई। पर, पुलिस ने कोई कार्रवाई करने की अपेक्षा अपने बैरक में दुबके रहना ही उचित समझा। इस गांव में यह पिकेट इसीलिए बना था ताकि वे माओवादियों के आतंक से गांव-क्षेत्र को मुक्त रख सकेंगे। लेकिन पुलिस तो नपुंसक निकली। उसकी मर्दानगी तो निर्दाेष आदिवासियों-ग्रामीणों को फर्जी मुठभेड़ के दौरान मार गिराने में दिखाई देती है। इस घटना के बाद भी पुलिस सुबह आठ बजे घटनास्थल पर पहुंची।
यही नहीं, 13 दिसंबर की रात भी इसी गांव में महज सौ मीटर की दूरी पर अवस्थित उदय साव के घर को नक्सलियों ने उड़ा दिया और घर के सभी सामान दो टै्रक्टर पर लाद चलते बने। इस घटना के बाद भी पुलिस नींद से नहीं जागी। इसके पंद्रह दिन बाद ही नक्सलियों ने दूसरी बड़ी लोमहर्षक घटना को अंजाम दे दिया। ऐसे पुलिस को वहां के ग्रामीण हिजड़ा कहें, निकम्मा कहें तो भला किसे आपत्ति हो सकती है...।
खैर, दंपति को जिंदा जलाने के पीछे जमीन संबंधी विवाद बताया जाता है। लेकिन इस विवाद को सुलझाने का तरीका माओवादियों के पास अब यही रह गया है! क्या आपसी दुश्मनी को माओवादी अब इसी तरह की क्रूरतम घटना को अंजाम दे समाप्त करेंगे? क्या अब इनके पास कोई विचारधारा भी बची है या फिर लेवी लेना और आतंक पैदा करना ही अब इनका मकसद रह गया है? झारखंड में तो यही लगता है। पलामू में आधा दर्जन नक्सली गुटों का होना भी यही साबित करता है। इस टिप्पणी को लिखते समय तक माओवादियों ने अभी तक इसकी जिम्मेवारी नहीं ली है और न कोई घटनास्थल पर पर्चा ही छोड़ा है। जबकि माओवादी कोई भी वारदात करते हैं तो पर्चा जरूर छोड़ते हैं या फिर घटना की जिम्मेवारी लेते हैं। चूंकि यह घटना को निजी हित में अंजाम दिया गया है, सो, माओवादी इसकी जिम्मेदारी लेेने से बच रहे हैं। क्या पता, ये माओवादी अपने ऊपर के आका से डरते हों। लेकिन इस घटना ने उनके चेहरे पर कालिख पोतने का काम जरूर किया है।