सोमवार, 23 अगस्त 2010

मेरे इलाके की धूप-छांव की कथायात्रा

अरुण कुमार : आदिवासी जीवन और समस्याओं पर लिखे इधर के हिंदी उपन्यासों में सर्वेक्षण की दृष्टि प्रधान रही है। कुछ उपन्यास अपवाद हैं, जिनमें सर्वेक्षण बिल्कुल कच्चे माल के रूप में नहीं आया है। मनमोहन पाठक का उपन्यास 'गगन घटा घहरानी', हरिराम मीणा का 'धूणी तपे तीर', मंगल सिंह मुंडा का उपन्यास 'छैला संदु'। अस्सी के दशक में श्रवणकुमार गोस्वामी के उपन्यास 'जंगल तंत्रम' का विषय जंगल के जीव-जंतुओं का संवाद है, जिसे पंचतंत्र की कथा शैली कह सकते हैं। यह समय कथा साहित्य का नहीं है। फिर भी, कथा साहित्य की दुनिया में जितने प्रयोग हो रहे हैं, उतने शायद पहले नहीं हुए होंगे। जब उपन्यास केंद्रीय विधा थी, तब के दौर में आदिवासी जीवन पर लिखे योगेंद्र सिन्हा के उपन्यास 'वन लक्ष्मी', 'वन के मन में' आदि सर्वेक्षण की नहीं थी। एक पूरा गठा कथानक उनके उपन्यास 'वन के मन में' का है। वरिष्ठ कवि विद्याभूषण (वनस्थली के कथापुरुष) ने लिखा है कि यह उपन्यास 'हो' समाज के अंतरंग से आत्मीय परिचय कराता है। इस उपन्यास में 'हो' समाज के संगठन और उनकी परंपराओं का बिल्कुल आंखों देखा चित्र आया है। ये चित्र इतने गठे और सिलसिलेवार हैं कि एक बार 'हो' के बहाने पूरे आदिवासी समाज से अंतरंग होने की इच्छा महसूस होती है। ऐसा लगता है कि एक अधिकारी किसी इलाके में नियुक्त होने के बाद अपनी लिखी डायरी को उपन्यास नहीं बनाता है। ध्यातव्य है कि योगेंद्रजी 1928 में बिहार उड़ीसा वन सेवा में आए थे और बिहार से वन संरक्षक के पद से सेवानिवृत्त हुए थे। एक अधिकारी होने की नीयत से अपने इलाके का सर्वेक्षण उनके कामकाज का हिस्सा होता था। वही ठसक उपन्यास में आ जाए तो वह इतिहास या किसी साहित्येतर विषय की शक्ल ले लेगा।
आज की पीढ़ी का लेखक आत्म विज्ञापन में जीने को अभ्यस्त और कहीं मजबूर भी है। ऐसे में विरासत में मिली पूंजी भी उसकी दिनचर्या से गायब हो सकती है।
मुझसे एक बार उपन्यासकार हरिराम मीणा बोले कि अमुक पत्रिका के संपादक को मेरी अफसरी का अहसास है, लेखक होने का नहीं। मीणा उन थोड़े कथाकारों में हैं जो राजस्थान की भील जनजाति पर उपन्यास लिखने के क्रम में वहां के प्रसिद्ध इतिहासकार गौरीशंकर हीरानंद ओझा जी को भी नहीं बख्शते हैं। बड़ी साफगोई से राजस्थान की जनजातियों में सामाजिक सुधार आंदोलन करने वाले गोविंद गुरु (धूणी तपे तीर) को एक सुगठित कथानक में ढालते हैं। राजस्थान का इतिहास कर्नल टाड ने भी लिखा है और मीणा भी उपन्यास के बहाने लिख रहे हैं। फर्क देखिए, बारीकी का, कल्पना का। कहावत है, सुनसान रातों में महुआ चुपचाप रोता है। तथ्य है कि गर्मी में भी महुआ के पत्तों से पानी की बूंदें गिरती हैं। और उपन्यासकार की नजर कितनी दूर तक है कि जंगल के सियार भी रो रहे हैं। धूणी तपे तीर के नायक गोविंद गुरु की मानसिक संरचना में त्वरित विद्रोह के लिए कोई स्थान नहीं है। भगवान ने ओले बरसा दिए, फसलें नष्ट हो गई। गोविंद गुरु का किसानों को संदेश है। करम प्रधान जगत रचि राखा। गोविंद गुरु राजपूताने के राजा और ब्रिटिश राज की मैत्री पर हमला करता है। वह आदिवासियों को संगठित करता है। 1898-1900 की अवधि में दक्षिणी राजपूताने (मेवाड़, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़) में भारी अकाल पड़ा और अपराधकर्म में काफी वृद्धि हुई। अंग्रेज सरकार ने अपराधिक जनजाति अधिनियम के तहत आदिवासियों को सूचीबद्ध कर दिया। इस पूरे प्रसंग को मीणा एक कारीगर की तरह बुनते हैं। आदिवासियों को गोविंद गुरु का एक मंत्र है फिरंगियों, महाराजा और ब्राह्मणों की तिकड़ी के खिलाफ एकजुट होना है। गोविंद गुरु का त्वरित क्रांति में विश्वास नहीं है। मानगढ़ पहाड़ की तलहटी में जमा हुए गोविंद गुरु और उनके शिष्यों की टोली से किसी आदिवासी किसान ने कहा, 'ओ गुरु महाराज, यह तो अच्छा सगुन है। मोर ने चार बार बोल दिए हैं। इसका मतलब आषाढ़ से कुआर तक चार महीने अच्छी बारिश होगी।'
धूणी तपे तीर में ऐसे प्रसंग कथानक के प्रवाह के क्रम में इस कुशलता के साथ विन्यस्त हुए हैं कि कोई इसे इतिहास की धरोहर भी न समझे, आंकड़ों का खेल भी न समझे और आदिवासी समाज को गुड्डों-गुडि़यों का खजाना भी नहीं मान लें।
मीणा का यह उपन्यास आदिवासियों के आंदोलन के लिए वैचारिक धरातल बनाता है, जिस ओर झारखंड के किसी उपन्यासकार का ध्यान नहीं गया है। विस्थापन की कथा सभी कहते हैं। परंतु उसकी जड़ तक पहुंचने और संगठन बनाने के विचार में वे पीछे रह जाते हैं। झारखंड के उपन्यासकार मंगल सिंह मुंडा के उपन्यास 'छैला संदु' में लोककथा के बहाने पूरी बस्ती के उजाड़ दिए जाने का विवरण ठोस सूत्रों में है। जैसे, सूबेदार हकीम सिंह के संभावित हादसे से आतंकित बस्ती के मवेशियों का रातोंरात कूच कर जाना इत्यादि। और फिर इसके बाद बस्ती किसानों और मवेशियों की कूच यात्रा का वर्णन और उसके साथ बदल रही प्रकृति इतने सिलसिलेवार तरीके से आई है कि जैसे पुराने समय के बायस्कोप की रील घूम रही हो। इसके बावजूद मुंडा बिरादरी में प्रचलित लोककथा की तासीर को बचाए रखने में अपनी पूरी मेहनत झोंक देते हैं। इसलिए इस उपन्यास में आदिवासियों की सामाजिक और राजनीतिक पृष्ठभूमि उतनी पसार नहीं छेकती है। फिर भी, उपन्यास में मुंडा बिरादरी में प्रचलित लोककथा को तीन खंडों (बाल लीला, प्रेमलीला और मृत्युलीला) में जिस तकनीक से सजाया गया है, उससे मुंडा जाति में शुरुआती दौर के परिवार की दृष्टि मिलती है।
मंगल सिंह मुंडा उस दौर की कथा कहते हैं जब मुंडा क्या किसी भी गांव-कस्बे में बाहर के किसी आदमी के आने को शक की निगाह से देखा जाता था। घटना यह है कि उपन्यास का नायक छैला अपने इलाके के सूबेदार हकीम सिंह की बेटी से प्रेम करता है। छैला पर बुंदी को भगाने का आरोप है। सूबेदार उसकी तलाश में आदिवासियों की बस्ती उजाड़ देता है।
रांची जमशेदपुर मार्ग का तमाड़ इलाका और उसके दक्षिण में कांची नदी पर मनोहर जलप्रपात (दशम) और उस पर टिका है मंगल सिंह मुंडा का उपन्यास छैला संदु। छैला संदु की कथा प्रेमकथा है। मुझे लगता है कि समय गुजरने के साथ इस प्रेमकथा पर अनेक पैबंद लगे होंगे। मंगल उस समय कथा कहते हैं, जब खेती के उत्पाद और साधन बहुत विकसित नहीं थे। छैला संदु में छैला की अनेक प्रेमिकाएं हैं, कहें गोपियां। मुंडारी साहित्य में कृष्ण काव्य की परंपरा समृद्ध रही है। इस लोक कथा पर उसकी छाप है। इसलिए बाल लीला और प्रेम लीला वाले खंड में बाहरी तत्वों (दिकुओं) के उस इलाके में प्रवेश को लेकर भारी रोष फैल जाता है। बाल लीला की जो प्रेमकथा है, उसमें बाहरी तत्वों की चर्चा नहीं है। प्रेम लीला में इस चर्चा के यह संकेत हैं कि छैला की प्रेमकथा में वक्त दर वक्त अनेक पैबंद जुड़े होंगे।
खैर, हाल ही में राकेश कुमार सिंह की एक कहानी आई है, अंधेरे से अंधेरे तक। कहानी पलामू के जनजातीय समाज की पीड़ा बयान करती है। पीड़ा है, प्लास्टिक के आम हो जाने पर तुरी का पारंपरिक रोजगार छिन जाता है। बांस का सामान बनाना मंदा पड़ने लगा। अब प्लास्टिक के टोकरे आ गए। लोहसारी का काम मंदा पड़ा। अब वहां के लोग बंदूक बनाने का काम करते हैं। ये है बाजार की तानाशाही।
लोकतांत्रिक व्यवस्था के आने के बाद प्रत्येक बिरादरी को अपने समाज की रीत-कुरीति की जांच परख करनी चाहिए। कोई जरूरी नहीं कि पिछड़े या प्रगतिशील बिरादरी की हर रीति को आदिवासी समझ गले लगा लेना चाहिए। योगेंद्र सिन्हा के उपन्यास 'वन के मन' में हो समाज में हो रहे आर्थिक और सामाजिक परिवर्तनों के साथ उस समाज के अच्छे बुरे रस्म-रिवाजों का बहुत सुंदर विवरण आया है। इसका आभास हाल के कथा-साहित्य में भी मिलता है। राजनीति की अपेक्षा साहित्यकारों की परिकल्पना में आदिवासी समाज बिखरी सामाजिक आर्थिक इकाई नहीं है। उसे अपने संसाधनों का विकास करना होगा। आदिवासियों के जीवन पर लिखे साहित्य में एक बड़ा भाग इस आशय का जरूर है।
ध्यातव्य है कि आदिवासी समाज में एक तरह का विकास और सामाजिक तंत्र नहीं मिलता है। कहीं खेती बहुत पहले आई (झारखंड) और संपन्न है तो कहीं वह बहुत बाद में आई। इसलिए वहां का सामाजिक तंत्र अपने भीतर सिमटा हुआ है। इस या शायद पिछले वर्ष प्रकाशित प्रकाश मिश्र के उपन्यास 'रूपतिल्ली की कथा' में पूर्वोत्तर प्रांत की पहाड़ी रूपतिल्ली के निकट बसने वाली जनजाति समाज की पीड़ा है। यह उपन्यास मिजोरम की पृष्ठभूमि पर है। इस इलाके के कबीले में हर काम-काज, हर निर्णय सामूहिक तौर पर होते हैं। नेतृत्व भी उनके बीच से ही उभरता है। यहां बहुपति प्रथा भी है। यौन संबंध बनाने की छूट है। इस समाज की पीड़ा है, इसका आत्मस्वावलंबन। अपने में ही यह समाज बिल्कुल सिमटा हुआ है। इसकी जरूरतें अपने ही समाज से पूरी हो जाती हैं। वह दूसरे समाज की ओर क्यों देखे? ऐसे समाज में खेती का पर्याप्त विकास नहीं हुआ है। इसलिए इनके यहां अब भी गाय का बछड़ा, सूअर आदि काटने और उसे सामूहिक रूप से खाने और नृत्य करने का रिवाज है। प्रकाश मिश्र के इस उपन्यास में मिजोरम की खासी जनजाति में संपन्न कृषि के अभाव का ब्यौरा आया है। मजा ये इनके द्वारा भूमि पर मालिकाना हक हर साल बदलता है। हर साल उस कबीले के राजा और पुजारी की सलाह से उस जमीन का आवंटन होता है। इस आलोक में देखें तो आदिवासी समाज के विकास के लिए एक स्वतंत्र नीति बनाने की आवश्यकता है। परंतु नई धारा के साथ उसका जुड़ाव भी उतना ही आवश्यक है।
लेखक हिंदी के जाने-माने समीक्षक हैं। वसुधा के 1857 अंक का संपादन। सिनेमा पर भी लगातार लेखन।