मंगलवार, 2 नवंबर 2010

बचपन की दिवाली

संजय कृष्ण : दिवाली आते ही बचपन की यादें ताजा हो जाती हैं। सोचता हूं यादों में खोना आदमी की फितरत तो नहीं। क्या यह मजबूरी है? आदमी क्या अपने बस में है? फिर यादें कैसे बस में हो सकती हैं? लेकिन यादें हैं कि बरबस याद आने लगती हैं। अब दिवाली को ही देखिए? बचपन में दिवाली की आहट आने से ही मन तरंगित होने लगता था। तरह-तरह के सपने तैरने लगते थे। इच्छाएं आकाश चूमने लगती थीं। तब, स्कूल जाना काफी बोरिंग लगता था। एक-एक पल जैसे पहाड़ लगता। कब दीवाली आए और घरों, मुंडेरों पर दीप जलाएं। जगमग करे सारा जहां। आखिर, प्रकाश किसको प्रिय नहीं होता! कहा भी तो गया है, तमसो मां ज्योतिर्गमय:। रात के अंधेरे में दीपों का उत्सव...। एक खूबसूरत समां। तो, बचपन की दीवाली सिर्फ इसलिए नहीं याद आ रही है कि हम मंदिरों, अपने घरों, पास-पड़ोस में दीप जलाते थे। याद इसलिए आ रहा है, दीवाली के बाद सुबह की घनघोर प्रतीक्षा करते। कब रात जाए और सुबह आए और दीपों को मुंडेरो, घरों से लूट लें...। इसके लिए कभी-कभी आपस में हम बच्चे झगड़ा भी कर लेते...। अब आप सोच रहे होंगे कि इन दीयों को लूट कर करते क्या होंगे। तो बता दें कि हम लोग दीयों को लूट का तराजू बनाते। दीयों को लेते और उसमें एक-एक दीये में तीन-तीन छेद करते और उसमें सूतली डालकर डंडी से बांध देते। डंडी का भी जुगाड़ हम लोग पहले कर लेते थे। लकड़ी के रोल में जो कपड़े लपेट कर आते, उस रोल का इस्तेमाल डंडी में करते। और, इस तरह हमारा तराजू बनकर तैयार हो जाता। अब बचपन बीते एक जमाना हो गया है। लेकिन यादों की हूंक उठती है तो मन बचपन में लौट जाता है। पता नहीं, आज के कान्वेंटी स्कूल में पढऩे वाले बच्चे अपने बचपन को आने वाले समय में किस तरह याद करेंगे?