शनिवार, 25 दिसंबर 2010

बारूद की जमीन पर फूलों की गंध

संजय कृष्ण : जैसे कांची नदी की किस्मत, वैसी कांची गांव की। दामोदर पुंडीदीरी नदियों की कहानी भी जुदा नहीं। झारखंड की अधिकतर नदियों का दर्द ऐसा ही है। पानी-पानी को प्यासी...। पंचायत चुनाव का अंतिम चरण। 24 दिसंबर। शुक्रवार का दिन। बुंडू, तमाड़, राहे और सोनाहातू...। हम कांची नदी के समानांतर गांव तक जाती सड़क के किनारे-किनारे होते हुए कांची गांव पहुंचते हैं। नदी प्रखंडों का बंटवारा करती है। इस तरफ बुंडू, नदी के पार तमाड़। कांची बुंडू का अंतिम गांव। मिट्टी और पक्के मकान। गांव के बीच में राजकीय मध्य विद्यालय पर जवान मुस्तैद हैं। मतदाता अपनी-अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं। यहां तीन बूथ हैं। तीनों पर कुल नौ सौ वोटर। मुंडा बहुल गांव में साहू, मछुआ, प्रमाणिक भी हैं। गांव के लिए बहुत संकीर्ण रास्ता है। गांव के बाहर खेत। इस साल पानी के अभाव में धान की बोआई नहीं हो पाई है। 65 वर्षीय गोपाल मुंडा कहते हैं, तैमारा घाटी से एक कांची पाइन यानी छोटी नहर आई है। पर, बरसात नहीं होने से खुद ही प्यासी है। नहर कच्ची है। सो, पानी बहुत दिन तक टिक नहीं पाता। इसकी प्यास बुझे तो खेत अवश्य लहललाने लगेंगे। इस नहर से कांची, हेट कांची और भोजडीह गांवों के खेतों को पानी मिल सकता है। पर, कोई सुनता नहीं। गांव के अरुण कुमार गुप्ता कहते हैं, पंचायत चुनाव के बाद नहर के पक्कीकरण पर जोर दिया जाएगा। वैसे, इस गांव की कई समस्याएं हैं। राजधानी रांची से महज साठ-सत्तर किमी दूर। जमशेदपुर तक जाती हाइवे की चमचमाती सड़क से एक डेढ़ किमी दूर गांव बसा है। हाइवे की सड़क गांव की सड़क को मुंह चिढ़ाती है। इसके बाद तमाड़ की ओर रुख करते हैं। रायडीह मोड़ से बुरूडीह पहुंचते हैं। बेहद खराब सड़क। राजकीय मध्य विद्यालय पर तीन बूथ हैं। तीनों पर लाइनें लगी हुई हैं। अमलेशा की महालेन भेंगरा अपना वोट डाल चुकी हैं। बस उनकी थोड़ी सी चाहत है। गांव में बिजली पहुंच जाए और खेत को पानी। बुरूडीह की शकुंतला देवी चाहती हैं कि बरसात में कादो-कीचड़ में पैर न सने। राजा पीटर का इलाका है। अब वे राज्य सरकार में मंत्री भी हो गए। पिछले चुनाव में झामुमो प्रमुख शिबू सोरेन को हराया था। तब शिबू राज्य के सीएम थे। उनके चुनाव हारते ही सरकार भी गिर गई थी। दुबारा चुनाव हुआ। जीते। पर, चुनाव के बाद उनका दर्शन नहीं हुआ। अब पंचायत से आस है। आजादी के 63 साल बाद भी इन गांवों में छोटी-छोटी खुशियां नहीं पहुंच पाई हैं। ये गांव मुख्य सड़क से बहुत दूर नहीं हैं। रायडीह से पुन: हम सारजोमडीह होते हुए बघाई तक पहुंचते हैं। सारजोमडीह से घना जंगल और भय हमारा साथ पकड़ लेते हैं। पुंडीदीरी नदी के पास पहुंचते ही पैर कांपने लगते हैं। नदी से गांव सटा हुआ है। चारों तरफ जंगल। सड़क बन रही है। याद होगा, डीएसपी प्रमोद कुमार को यहीं पर उड़ा दिया गया था। पर, तमाड़ का थाना प्रभारी 'चमत्कारिकÓ ढंग से बच गया था। हम आगे बढ़ते हैं। पेड़, पौधे, पहाड़ जैसे हमें ही घूर रहे हों...। एक अजीब दहशत। आस-पास खेतों में फैले सरसों के पीले-पीले फूल भी मानो हमें चेतावनी दे रहे हों, आगे मत बढऩा...। पूरी जमीन बारूदी। पर, कहीं-कहीं गेंदे के पीले फूलों की गंध हमारा ध्यान बारूदी जमीन से हटा देती है। हार्न बजाते हुए गाड़ी आगे बढ़ती है। सड़क में गड्ढे देख शरीर कांप जाता है। कहीं माइंस तो नहीं बिछा है। हम पातसायडीह होते हुए बघाई पहुंचते हैं। रायडीह मोड़ से 17 किमी दूरी तय कर घने जंगल में प्रवेश करते हैं। बघाई में खुले में मतदान हो रहा है। एक स्कूल है, जिस पर सीआरपीएफ के जवानों ने कब्जा कर रखा है। यानी स्कूल पुलिस कैंप में तब्दील। कैंप के सामने पहाड़ की तलहटी में खंखर पूस-पुआल की झोपड़ी। बांस के सहारे खड़ी। न कोई दीवाल न बेंच। पिछले चार साल से बच्चे इसी खुली झोपड़ी में पढ़ रहे हैं। चुनाव के आस-पास चार-पांच बच्चे दिखाई देते हैं। पूछता हूं, झोपड़ी में पढ़ाई कैसे होती है, कहते हैं, किसी तरह हो जाती हैं। कहीं दूसरा रास्ता भी नहीं। स्कूल में चार-पांच किमी की दूरी के बच्चे यहां पढऩे आते हैं। अब वे क्या करें। शिक्षा का कैसा मजाक झारखंड सरकार में चल रहा है...स्कूल की दशा देखकर समझ में आता है। इस रास्ते से सकुशल वापसी के बाद हम बुंडू से चुरगी का रास्ता पकड़ लेते हैं। लोआहतू, बारूहातू होते हुए। पहाड़ की तलहटी में बसा है बारूहातू गांव। चारों तरफ जंगल। सड़क की एक तरफ गांव और दूसरी तरफ पुलिस कैंप। पर, 18 नवंबर की रात माओवादी गांव में घुस गए और चार लोगों की हत्या कर दी। इनमें एक बच्ची भी शामिल थी। तीनों पूर्व माओवादी थे और अब एसपीओज थे। अब वे पुलिस के लिए काम रहे थे। रात्रि आठ बजे माओवादियों ने इनके घर पर धावा बोल दिया। गोलियां तड़तड़ाई और जंगल में समा गए। सौ गज की दूरी पर कैंप की पुलिस ताकती रही। गांव वाले पूछते हैं, जब कैंप की पुलिस हमारी रक्षा नहीं कर सकती, तो स्कूलों पर कब्जा क्यों? बच्चों की जिंदगी से खिलवाड़ क्यों? इसका जवाब तो राज्य सरकार की दे सकती है। खैर, पुलिस अब दूसरे ढंग से लड़ाई लड़ रही है। हम आगे बढ़ते हैं। चुरगी पहुंचते हैं। चुरगी के समानांतर कांची बहती है। यहां कांची दो जिलों का बंटवारा करती है। इस तरफ रांची और उस तरफ खूंटी। यहीं पर पांच करोड़ लूट की गाड़ी जलाई गई थी। नदी के उस पार अड़की प्रखंड, जो खूंटी जिले का हिस्सा बन गया है। माओवादी कुंदन पाहन का पैतृक घर। तीन बज रहे थे। मतदान संपन्न हो चुका था। सूरज पश्चिम की ओर ढरक रहा था। हम वापसी के लिए चल पड़ते हैं।

बहती नदी, प्यासे खेत और उदास आंखें

संजय कृष्ण:  सर्द हवाओं के थपेड़े से जंगल भी सहमे थे। सूरज की किरणों में गर्मी तो थी, लेकिन सर्द हवाओं के आगे वह भी बेबस...। यह हाल नामकुम के जंगली इलाकों से लेकर अनगड़ा, सिल्ली, मुरी तक था। 20 दिसंबर, सोमवार को पंचायत चुनाव का चौथा चरण था। रांची-मुरी मार्ग पर इक्का-दुक्का वाहन खामोशी से गुजर रहे थे। यह चुनाव का असर था कि लोग पैदल भी जाते दिखे। सुबह की बेला। खिलती धूप। अनगड़ा ब्लाक के साल्हन गांव पहुंचते हैं। मतदान केंद्र पर भीड़ है। भीड़ के पास कई तरह की समस्याएं हैं। विकास की बातें हैं। सुदेश महतो का इलाका। विकास के नाम प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना के बोर्ड ज्यादा दिखाई पड़ते हैं बनिस्पत सड़कों के। रासबिहारी साहु मैट्रिक पास हैं। ठेकेदारी करते हैं। उम्मीद जताते हैं कि पंचायत चुनाव से कुछ काम होगा। ब्लाक पर बार-बार दौड़ लगाने से छुटकारा मिलेगा। गांव से थोड़ी दूर पर स्वर्णरेखा बहती है। यहां से ही नदी की धारा दिखाई पड़ती है, पर गांव और खेत दोनों प्यासे हंै। आंखें उदास हैं। यहां से वापस लौटते हैं और कोचो पंचायत के लगाम पर पहुंचते हैं। घड़ी की सुइयां 11 बजा रही थीं। प्राथमिक विद्यालय लगाम दक्षिणी पर तीन मतदान केंद्र बने हैं। बूथ संख्या 164 पर 365 मतों से 164 वोट पड़ चुके हैं। दूसरे 165 पर 342 में से 116 और तीसरे बूथ पर 166 पर 327 में से 185। सिल्ली से मुरी का रास्ता पकड़ते हैं। सिल्ली-रामगढ़ के रास्ते पर आगे बढ़ते हुए हाकेदाग का रास्ता। हाकेदाग के गाझा गांव में अंतूराम माझी अवकाश प्राप्त शिक्षक हैं। वोट डाल चुके हैं। उम्मीद जताते हैं कि गांव में सिंचाई की व्यवस्था होगी। गांव में 65 घर हैं, जिनमें बेदिया, करमाली, मुंडा और 20-25 घर मुसलमान। यहां भी बुनियादी समस्याएं मुंह बाए खड़ी हैं। हालमाद गांव में कुछ दुकानें चट्टी का आभास पैदा करती हैं। हाकेदाग हालमाद से टाटी सिंगरी होते हुए डुमरा गांव। बीच में घने जंगल। तीखे मोड़। सर्पीली सड़कें और सीढ़ीदार खेत। बीच-बीच में कहीं प्यासे खेत तो कहीं सरसों के फूलों की चादर। जंगल इतना गझिन कि आगे का रास्ता भी दिखाई न दे। घाटियों से गुजरते हुए बार-बार जीवन की दुहाई। जंगल की खूबसूरती आनंदित भी कर रही थी और भयभीत भी। इस मार्ग से जाते हुए कुछ बच्चियां माथे पर सूखी लकडिय़ों का ग_र लिए चल रही हैं। उम्र यही कोई छह सात से लेकर बारह-तेरह वर्ष। कपड़े के नाम पर कुछ स्कूली डे्रस। नाम पूछने पर नहीं बताती। आज छुट्टी का दिन है उनके लिए। जोन्हा जल प्रपात पर भी दो बच्चियां अमरूद और बेर बेच रही थीं। एक शोभा कुमारी और दूसरी जसवंती कुमारी। दोनों कक्षा तीन की छात्रा। जोन्हा से चलते हुए गौतमधारा प्राथमिक स्कूल पर पहुंचते हैं। तीन बज रहे हैं। चुनाव खत्म। पीठासीन अधिकारी बक्से को सील कर रहे हैं। झारखंड जगुआर के जवान मुस्तैद। चेहरे पर इत्मीनान के भाव। स्कूल से बाहर सड़क पर युवाओं की भीड़। कुछ अधेड़ भी हैं। वे हमें घेर लेते हैं और अपनी समस्याएं गिनाने लगते हैं। पानी नहीं, बिजली नहीं। सड़क नहीं। यह जो सड़क है, वह जोन्हा तक चमचमाती जाती है, क्योंकि इस पर पर्यटक जाते हैं, पर हमारे गांव में पगडंडी भी नहीं...। हम वापसी की ओर रुख करते हैं। गांव के बाहर यानी प्रवेश द्वार पर एक पांच फीट का पत्थल गड़ा है। उस पर लिखा है, 'गुड़ीडीह सबसे अच्छा ग्रामसभाÓ। हम उम्मीद करते हैं, चुनाव के बाद पत्थलगड़ी की बात सच निकले।