गुरुवार, 27 जनवरी 2011

सिर्फ इक बार मुलाकात का मौका दे दे

संजय कृष्ण :   ...तो गजल के बेताज बादशाह गुलाम अली की सुरमई शाम थी। सरहद पार से आती सुर की आवाज रांची को भिंगो गई। बुधवार की शाम कुछ ऐसी थी, जो सालोंसाल याद रहेगी। वाकई, थी खबर गर्म उनके आने की। जैसे ही वह रांची के जिमखाना क्लब के मंच पर नमूदार हुए, तालियों से जोरदार इस्तकबाल हुआ। अब तो बहार आने की बारी थी। वे गजलों का ऐसा गुलदस्ता लेकर आए थे, जिसमें हर रंग के फूल खिले थे। कुंजे-लब से जब लहरों की तरह कशिश भरी आवाज बाहर आ रही थी तो वह मिस्ले-अश्क (आंसू की तरह) की तरह भी बन जाती।
आगाज इन दुआओं के साथ कि...मैं आपका दुआ करने वाला हूं, खुश रहें, सुर में रहें, तभी हम भी सुर में रह सकते हैं। ...अब मैं समझा तेरे रुखसार पे तिल का मतलब, दौलते हुस्न पे दरवान बिठा रखा है से अपनी गजलों का आगाज किया। अनवर की इस गजल के बाद अपनी मशहूर गजल सुनाई। इस गजल से उन्हें पहचान भी मिली और प्रसिद्धि भी। यह गजल थी हसरत मोहानी की। तीस पंक्तियों की इस गजल के कुछ शेर ही सुनाए। कंपकपाते ओठ से जब पहला शब्द चुपके निकला तो तालियां से पूरी बज्म गूंज उठी। करीब पांच मिनट तक इस शब्द पर ही अटके रहे। श्रोता लहालोट होते रहे। सात सुरों में पिरोया था इस शब्द को। ..चुपके चुपके रात दिन आंसू बहाना याद है...हमको अब तक आशिकी का वह जमाना याद है। यह काफी राग में थी। इसे ठाट का राग कहते हैं। इस गजल को गुलाम अली ने खुद कंपोज किया था। एक-एक शब्द पर ठहरते फिर आगे बढ़ते। अगली बारी नासिर काजमी के गजल की थी...रागिनी पहाड़ी में। पहले शेर पढ़ी। दिल गया था तो ये आंखें भी कोई ले जाता...मैं फकत एक ही तस्वीर कहां तक देखूं। अब गजल की बारी थी, दिल में एक लहर-सी उठी है अभी, कोई ताजा हवा चली है अभी। लहरों में जैसे अलोडऩ पैदा होती है, ओठों से भी गुलाम साहब कुछ ऐसा ही एहसास पैदा कर रहे थे। शांत लहर, तेज लहर, मद्धिम लहर...। न जाने कितनी लहरें लबों से उठ रही थीं। अब चौथी गजल की बारी थी। गजल से पहले यह शेर भी सुनाया- कैसी चली है अब के हवा तेरे शहर में, बंदे भी हो गए हैं खुदा तेरे शहर में..। इसके बाद गजल पेश की- हम तेरे शहर में आए हैं मुसाफिर की तरह, सिर्फ इक बार मुलाकात का मौका दे दे..। मेरी मंजिल है कहां, मेरा ठिकाना है कहां सुबह तक तुझसे बिछड़कर मुझे जाना है कहां..। आज इजहारे खयालात का मौका दे दे..।
हालांकि मना करने के बावजूद कुछ लोग मोबाइल व इलेक्ट्रानिक कैमरे में इस शाम को कैद रहे थे। बार-बार वह कैमरा बंद करने की गुजारिश कर रहे थे। कहा, मैं गजलें आपको सुनाने आया हूं, कैमरों को नहीं। 
व्यवधान के बाद अगली गजल पेश की...तुम्हारे खत में वो इक सवाल किसका था, वफा रकीब तो आखिर वो नाम किसका था...। महफिल जवां होकर धीरे-धीरे अंजाम की ओर बढ़ रही थी। थोड़ा मूड बदला। गजल से ठुमरी पर आए। बरसन लागे सावन....तोरे बिना लागे न जिया मोरा। ठुमरी सुन सबके हाथ खुल गए। एक बार फिर तालियां की गडग़ड़ाट से अपने इस कलाकार का इस्तकबाल किया। अब तो बारी हंगामा बरपाने की थी। 'हंगामा है क्यों बरपाÓ कार्यक्रम के जरिए गजल सम्राट गुलाम अली ने क्लब परिसर में सुरमई जाजम बिछा दी। सुरों में झलकती बुजुर्गियत के बावजूद उन्होंने श्रोताओं को गजल अदायगी से बांधे रखा। स्वर पर ऐसी पकड़ की कि संगतसाज जुगलबंदी करने में अपने को असहज पा रहे थे। सुर व स्वर पर ऐसा नियंत्रण कि तबले की थाप भी असहज हो जाती। ऐसी थी 70 साल के इस युवा गायक की दिलकश आवाज।    

क्या हमें डोंबारी बुरू का नरसंहार याद है

संजय कृष्ण, रांची : जालियांवाला बाग की घटना देश-दुनिया को याद है, स्कूलों के पाठ्यक्रम में भी शामिल है। पर, क्या हमें डोंबारी बुरू की याद है? जवाब आएगा नहीं? क्योंकि न इतिहास में दर्ज है, न पाठ्यक्रमों में। पर लोगों के दिलोदिमाग में यह घटना आज भी दर्ज है। जालियांवाला बाग की घटना के बीस साल पहले झारखंड के खूंटी जिले में अंग्रेजों ने नौ जनवरी 1899 को हजारों मुंडाओं का बेरहमी से नरसंहार कर दिया था। इसमें महिलाएं और बच्चे काफी संख्या में कत्ल किए गए थे। इस पहाड़ी पर बिरसा मुंडा अपने प्रमुख 12 शिष्यों सहित हजारों मुंडाओं को जल, जंगल, जमीन बचाने को लेकर संबोधित कर रहे थे। आस-पास के दर्जनों गांवों से लोग एकत्रित होकर भगवान बिरसा को सुनने गए थे। बात अभी शुरू ही हुई थी कि अंग्रेजों ने डोंबारी बुरू हो घेर लिया। हथियार डालने के लिए अंग्रेज मुंडाओं को ललकारने लगे। लेकिन मुंडाओं ने हथियार डालने की बजाय शहीद होने का रास्ता चुना। फिर क्या था, अंग्रेजों की सैनिक टुकड़ी टूट पड़ी और हजारों को मौत के घाट उतार दिया। बिरसा मुंडा गिरफ्तार कर लिए गए और उन्हें आज के बिरसा मुंडा कारावास में बंद कर दिया गया। आदिवासी मूलवासी अस्तित्व रक्षा मंच की रेजेन गुडिय़ा बताती हैं, इस नरसंहार में एक बच्चा बच गया था, जिसे एक अंग्रेज ने गोद ले लिया। यह बच्चा आगे चलकर जयपाल सिंह मुंडा बना। जंगल बचाओ आंदोलन से जुड़ी आलोका कहती हैं, डोंबारी बुरू का नरसंहार इतिहास में भी दर्ज नहीं है। बहुत से मुंडा आदिवासी भी इसे नहीं जानते। दयामनी बरला कहती हैं कि इस ऐतिहासिक उलगुलान को इतिहास में जगह नहीं दी गई। मुख्यधारा का इतिहास आज भी झारखंड से परहेज करता है जबकि अंग्रेजों के खिलाफ सबसे पहले लड़ाई झारखंड में ही शुरू हुई। बेशक, झारखंड के बने दस साल हो गए, लेकिन डोंबारी बुरू में एक विशाल स्तंभ निर्माण के अलावा वहां कुछ भी नहीं है। यह अपने इतिहास के प्रति निरपेक्ष दृष्टि है। हम अपने ही इतिहास से बेखबर हैं। जिसका नतीजा है कि वह वही इतिहास पढ़ते हैं, जो सत्ता हमें पढ़ाना चाहती है।  

मंगलवार, 25 जनवरी 2011

गणतंत्र के गांव में भूख का नृत्य

संजय कृष्ण, रांची :  रांची से बेड़ो, सिसई, गुमला होते हुए रायडीह प्रखंड के एक गांव कुलमुंडा पहुंचते हैं तो सूरज सीधे सिर पर आ गया था। ठंड के मौसम में तीखी धूप थोड़ा राहत दे रही थी। पहाड़ उदास खड़े थे। जंगल खामोश थे। खेतों में दूब भी दुबके हुए थे। पिछले कई सालों से बारिश के दगा देने से लोगों के चेहरे पर मायूसी साफ-साफ झलक रही थी।  गुमला से इस गांव की दूरी करीब दस किमी है और रायडीह की दूरी इससे थोड़ी कम है। राजधानी रांची से करीब एक  सौ दस किमी। कुलमुंडा राजस्व गांव है और इसमें कुल 16 टोले हैं। पीबो पहाड़ी की तलहटी में बसे इस गांव के खासी टोले में पहुंचते हैं। चमचमाते हाइवे से गांव जाने के लिए कच्ची सड़क है। हम कच्ची सड़क पकड़ गांव की ओर रुख कर लेते हैं।
गांव की पगडंडियों पर अधनंगे बच्चे बेफिक्र खेल रहे हैं। न उन्हें अतीत का बोध न भविष्य की चिंता। शहरी बच्चों का बचपन तो किताबों में गुम हो गया है। पर यहां तो अभावों में भी उनके चेहरे पर संतोष और मुस्कान पसरी है। गांव पहुंचते हैं तो खुले आंगन के घर में प्रवेश करते हैं। 
लेदरू राम की उम्र पचास को छू रही है। शरीर ऐसा कि एक-एक हड्डी गिन सकते हैं। सात भाइयों में सात एकड़ जमीन। पर, पानी के अभाव में खेत भी प्यासा और शरीर भी। वह बताता है, मात्र तीन महीने की उपज होती है। नौ महीने के लिए हाड़तोड़ परिश्रम करनी पड़ती है। मांदर बनाकर पूरे साल कमाई नहीं की जा सकती। लेदरू बताता है कि लोग अपनी संस्कृति से भी दूर हट रहे हैं। सो, मांदर की बिक्री भी कम हो रही है। इसलिए, मांदर पर निर्भर नहीं रहा जा सकता। सरकार की ओर से कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है।
इस गांव में घासी जाति के नौ घर हैं। राजपूत के दो घर। गांव में राजपूतों के घर पक्का हैं। बेशक, उनके घर को देखने से उनकी खुशिहाली झलकती है। गांव में एकमात्र घर बढ़ई का है। माडू राम लोहार। पर वह गांव में नहीं है। उसकी बूढ़ी मां घर पर है। गांव में घूम-घूमकर उसका पेट भरता है। गांव में सब उसे सेशो मां कहते हैं। मांडू को कोई रोजगार नहीं मिला, इसलिए बच्चे, पत्नि समेत बाहर कमाने चला गया।
जंगल से लकड़ी काटने पर अब मनाही है। वन विभाग की ओर से नहीं, लाल सलाम की ओर से। वन विभाग सजग होता तो राज्य के जंगल नंगे नहीं होते। जंगल पर निर्भर रहने वालों के लिए पलायन के सिवा कोई दूसरा विकल्प नहीं है। गांव वाले शिकायत करते हैं, मनरेगा से काम तो मिल जाता है, पर समय से मजदूरी नहीं मिल पाती। इस क्षेत्र के विधायक हैं कमलेश उरांव। गांव वालों ने उनका दर्शन नहीं किया। फोटो में देखे हैं। समस्याएं और भी हैं...। गांव के इस गणतंत्र में क्या गण अपनी किस्मत खुद लिख सकेंगे?
यह रिपोर्ट विस्फोट डाट काम पर प्रकाशित।

मैं अल्बर्ट एक्का बोल रहा हूं...

जी हां, मैं अल्बर्ट एक्का बोल रहा हूं। सोचा, आज गणतंत्र दिवस है। कुछ अपनी कुछ जग की कहानी सुनाऊं। तो, आपने भी मेरी आदमकद मूर्ति देखी होगी। रांची का हृदय कहा जाने वाला फिरायालाल चौक पर। तब यह फिरायालाल चौक कहा जाता था। जब से मेरी आदमकद मूर्ति लगी, आधिकारिक रूप से इसका नाम मेरे नाम पर यानी अलबर्ट एक्का चौक हो गया। हालांकि बहुत से लोग उसके पुराने नाम से ही जानते हैं। मेरी यहां पर मूर्ति क्यों लगी, शायद आप जानते होंगे। फिर भी, कुछ बातें आपसे से साझा करना चाहता हूं। चूंकि गणतंत्र दिवस का जश्न पूरे देश में मनाया जा रहा है। इसलिए आज मौजू भी है।
शुरुआत अपने जन्म से कर रहा हूं। मेरा जन्म एक ईसाई आदिवासी परिवार में आज से 69 साल पहले 27 दिसंबर, 1942 को गुमला के जारी गांव में हुआ था। तब गुमला रांची में था। ब्रिटिश काल के दौरान गुमला लोहरदगा जिले के अधीन था। रांची भी लोहरदगा में ही था। 1843 में बिशुनपुर रियासत के अधीन हुआ, जो बाद में रांची कहलाया। 1899 में रांची जिला अस्तित्व में आया। इसके तीन साल बाद 1902 में गुमला रांची का सब डिविजन बना। लेकिन रांची से अलग जिला बनने में गुमला को 81 साल लग गए। 18 मई 1983 को गुमला आखिरकार जिला बन गया। कभी-कभी सोचता हूं कि मैं रांची का हूं या गुमला का। मेरा जन्म भी रांची जिले में हुआ और जब 1971 को शहीद हुआ तब भी मैं रांची जिले का ही था। यह अलग बात है कि मेरे शहीद होने के 12 साल बाद गुमला जिले का अस्तित्व आया।  
आप सोच रहे होंगे कि अपनी कथा के बजाय अपने जिले की कथा सुनाने क्यों लग गया। यह जानना भी जरूरी था। क्योंकि आज की पीढ़ी शायद इन जिलों की कहानी से अनजान हो।
जब मेरी उम्र 20 साल की थी, इंडियन आर्मी में शामिल हो गया। यह भी दिसंबर का माह था और तारीख थी वही 27 दिसंबर। सेना में भर्ती होने के बाद उत्साह के साथ दुश्मनों से लड़ता। 1971 में जब भारत और पाकिस्तान से युद्ध हुआ। दिसंबर का माह था। चौदह सुरक्षाकर्मियों का मैं लांस नायक था। त्रिपुरा और बंगलादेश की सीमा पर गंगासागर के निकट तैनाती थी। हम लोग पोजीशन लिए हुए थे। दुश्मनों की संख्या भी अच्छी खासी थी। 4 दिसंबर, 1971 को अपने सैनिकों के साथ बाएं की ओर बढ़ रहे थे। बाएं की ओर से दुश्मन सैनिकों की गोलियां आ रही थीं। हम आगे बढ़ते रहे। पाकिस्तानी बंकर से मशीन गन से फायर झोंक दिया। इसमें कई सैनिक हताहत हुए। फिर भी हम, उसी दिशा में आगे बढ़ते रहे। अंतत: उस बंकर को ध्वस्त कर दिया। इसमें खुद मैं भी घायल हो गया, लेकिन हिम्मत नहीं हारी। आगे बढ़ता रहा और पाकिस्तानी सैनिकों को डेढ़ किमी पीछे धकेल दिया। हालांकि इसी बीच फिर फायरिंग हुई दूसरे बंकर से। इसमें बुरी तरह घायल हो गया। खून बहता जा रहा था। अफसोस नहीं था, क्योंकि यह खून देश के लिए बह रहा था। अंतत: मेरी आंखें धीरे-धीरे बंद होने लगीं। मुझे खुशी थी कि पाकिस्तानी कब्जे से गंगासागर अखौरा को दुश्मनों से मुक्त करा दिया था। और, इस तरह शहीदों में एक नाम और जुड़ गया। मेरे बलिदान को देखते हुए भारत की सरकार ने 50 वें गणतंत्र दिवस पर सर्वोच्च सम्मान परमवीर चक्र से सम्मानित किया। इस सम्मान और मेरे बलिदान को देखते हुए ही फिरायालाल चौक पर मेरी आदमकद मूर्ति लगी है। मेरी संगीन पश्चिम की ओर है। पश्चिम में ही, जिसे मेन रोड कहा जाता है, हालांकि इसका नाम भी गांधी मार्ग है, इस मार्ग पर मंदिर है, गिरजा है, गुरुद्वारा है और मस्जिद भी है। चारों धर्म को मानने वालों के पूजा स्थल गांधी मार्ग पर है। मेरी संगीन इस दिशा में इसलिए है कि सांप्रदायिक शक्तियों को नियंत्रित कर सकूं। बातें और भी हैं। घर-परिवार बहुत खुशहाल नहीं है। हारी-बीमारी में मेरे परिवार पर लोगों का ध्यान तभी जाता है जब मीडिया वाले सरकार को जगाते हैं। मेरी पत्नी बलमदीना को शहादत दिवस पर अपने गांव में लगने वाले मेले में बुलाया जाता है। उन्हें शाल देकर सम्मानित भी किया जाता है। फिर भूला दिया जाता है। एक बेटा है विंसेट एक्का। हमारे देश में शहीदों की यही स्थिति है।
पता नहीं, दिसंबर का माह मेरे साथ कैसे चिपक गया। जन्म में इसी माह में और शहादत भी इसी माह है। खैर, ईसाई धर्म में दिसंबर माह पवित्र होता है। सो, यह मेरे लिए गर्व का विषय है। जाते-जाते एक और बात कहते जाता हूं। मेरी आदमकद मूर्ति पर लोग अपनी-अपनी पार्टी के झंडे-बैनर लगा देते हैं। अभी मेरी साफ-सफाई हो रही है। फिर किसी को मेरी सुधि नहीं होगी।
                                                                                                                                            -संजय कृष्ण

सोमवार, 24 जनवरी 2011

चमचमाते आइने में नहीं उनके नसीब का अक्स

संजय कृष्ण :  रांची-मुरी मार्ग से एक रास्ता जोन्हा फॉल की ओर जाता है। चमचमाती सड़क। आइने की मानिंद। यात्रा के दौरान कहीं जर्क नहीं। यह रास्ता गांव की तरक्की के लिए नहीं बना है। इसलिए बना है कि जोन्हा फॉल देखनेवाले पर्यटकों को  असुविधा न हो...। इसी सड़क के आस-पास कई गांव बसे हैं। इन गांवों के नसीब का अक्स चमचमाते आइने अर्थात बगल की बेहतरीन सड़क में नहीं मिल सकता। उन्हीं में है गुड़ीडीह गांव।
जोन्हा गांव से प्रपात के रास्ते आगे बढ़ते हैं, तो स्वागत की मुद्रा में एक बड़ा पत्थर मिलता है। उस पर लिखा है, पत्थरगड़ी ग्रामसभा गुड़ीडीह। नीचे की पंक्ति है- सबसे अच्छी ग्रामसभा। पत्थर पर तिथि भी अंकित है- 10.10.2001। यानी इस पत्थर को गड़े भी एक दशक हो गया, लेकिन गांव की स्थिति यथावत।

पानी के लिए मारामारी
जब इस गांव के प्राथमिक विद्यालय पर पहुंचते हैं, तो कई युवा और अधेड़ घेर लेते हैं। उन्हें लगता है, हम उनकी समस्या का समाधान करने आए हैं। चमन भोक्ता  कहते हैं, गांव में कोई सुविधा नहीं। सड़क नहीं। बिजली नहीं। पानी के लिए मारामारी होती है। चापाकल भी नहीं है। कुएं सूखने लगे हैं।

उपमुख्यमंत्री सुदेश महतो का इलाका
अनगड़ा प्रखंड के इस गुड़ीडीह गांव में कई टोले हैं- जिलिंग सेरंग, रायपुर, गौतमधारा, जादवबुधु, माथनदेरा, चतरा दरता, टुगरी टोला, ढीपा टोला...। सभी गांवों की कहानी एक जैसी। महावीर भोक्ता खेती करते हैं। वे इन टोलों की आबादी पांच हजार के करीब बताते हैं। राज्य के उपमुख्यमंत्री सुदेश महतो का इलाका है। गांव की सुधि नहीं।

इंदिरा आवास के लिए पांच हजार की मांग
 गांववाले कहते हैं, इंदिरा आवास के लिए ब्लाक पर पांच हजार मांगते हैं। एक दूसरा युवक कहता है- यहां नौकरीवाले को इंदिरा आवास मिला है। वह न अपना नाम बताता है, न उस आदमी का, जिसे इंदिरा आवास मिला है। कहता है, गांव में रहना है। दुश्मनी कैसे ले सकते हैं। लेकिन, बीडीओ जांच तो करा ही सकते हैं। ब्लॉक में गरीबों की कोई नहीं सुनता।

बीपीएल सूची में खाते-पीते लोग लोगों का कहना है- गांव में खाते-पीते लोग बीपीएल सूची में हैं। बस्ती तक जाने के लिए रोड नहीं। कहते-कहते हम लोग थक गए। लेकिन, कुछ नहीं हुआ। रामदेसी मुंडा का नाम बीपीएल सूची में दर्ज है। पर, उसे कोई सुविधा नहीं मिली। लौटते वक्त उस पत्थलगड़ी के पास पहुंचता हूं। उम्मीद करता हूं- पंचायत चुनाव हो गया है, कुछ तो बदलाव दिखेगा। 
   

मंगलवार, 4 जनवरी 2011

मन कांच माटी क घरिला ए बाबा....

जमानियां की एक याद : माला पहने पाठक जी
संजय कृष्ण : श्री हरिवंश पाठक गुमनाम पिछले छह दशकों से काव्य जगत में सक्रिय हैं-रह-रह कर। आरंभिक दिनों को छोड़ दें तो बाद के दिनों में उनका लेखन साहित्य की दुनिया में अनुपस्थित ही रहा-यानी गुमनामी के अंधेरे में। पारिवारिक जिम्मेदारियों ने एक तरह से उन्हें साहित्य की दुनिया से काट दिया था। इस बीच मंच पर काव्य वाचन का सिलसिला शिथिल नहीं हुआ। पिछले दिनों अंधेरे को चीरते हुए साहित्य की रौशन दुनिया में आए। एक गजल संग्रह आया-दर्दों के छंद। पोर-पोर पीड़ा को महसूस करने वाले गजलगो का यह पहला संग्रह था। करीब अड़तीस गजलों के इस संग्रह में जुनूनेइश्क, परस्तारे हुस्न, लज्जते दर्द के साथ इश्केहकीकी को भी साथ-साथ पढ़ा जा सकता है। संवेदनाओं के धनी हैं तो इसे महसूस भी कर सकते हैं। तब यहां प्रेम का सूर्ख रंग ही दिखाई नहीं देगा, एक उदासी, एक पीड़ा, एकाकार होने की चाहत-न जाने कितने अनुभवों के रंग यहां दिखाई देंगे।
पाठकजी सुकंठ हैं। उनका कद ही लंबा नहीं हैं बल्कि वे ग्र्रीवी भी हैं। इसलिए पढऩे से ज्यादा उनको सुनना एक अलग अनुभव है। वे कविता लिखते हैं गजल पढ़ते हैं और गीत गुनगुनाते हैं। उर्दू, हिंदी और भोजपुरी में समान गति और समान अधिकार के साथ लिखते हैं। शब्द को भाव जगत में ले आने में उन्हें कोई खास दिक्कत नहीं होती। भावों की गहराई का बोध उन्हें है। गजल के छंद हों या गीतों के-दोनों परंपराओं के अनुज्ञाता है। इसलिए उनकी गजलों में इसकी कमी नहीं खटकती है। अपनी गजलों में तख्लुस का जैसा सार्थक प्रयोग किया है, उसका अन्यत्र मिलना दुर्लभ है।
आज जब उनकी भोजपुरी की कविताओं पर लिखने बैठा हूं तो तय नहीं कर पा रहा हूं कि बात कहां से शुरू की जाए। वे वटवृक्ष हैं। उनकी छांव में ही हम लोग बड़े हुए हैं। हाथ पकड़कर लिखना सिखाया है। भोजपुरी हमलोगों की मातृभाषा है। सुनने में जितनी यह सहज और मीठी लगती है, लिखने में मुझे असहज लगती है। कहने की जरूरत नहीं कि देश की बोलियों में सर्वाधिक बोली जाने वाली यह लोकभाषा है। विदेशों में भी यह बेहद लोकप्रिय है। खासकर, उन देशों में जहां भोजपुरी भाषी बतौर गिरमिटिया बनकर गए। वे इस भाषा को अब भी संजो रहे हैं। उनकी भोजपुरी आज की भोजपुरी नहीं, बल्कि डेढ़-दो सौ साल पहले की भोजपुरी है। लेकिन अपने देश में भोजपुरी बदलती रही है। आज भोजपुरी पर हिंदी का प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। इसके साथ ही स्थानीय टोन के कारण भी इसमें बदलाव होते रहे हैं। उप्र, बिहार और झारखंड भोजपुरी के गढ़ हैं, पर जहां-जहां भोजपुरिया गए हैं, इस भाषा को भी साथ लेते गए हैं। इस भाषा को ट्रिनीदाद और सूरीनाम आदि देशों में लाखों की संख्या में लोग मातृभाषा के रूप में इसका व्यवहार करते हैं।
इस भाषा के पास अपना व्याकरण भले न हो, गीतो, मुहावरों, लेखकों, गायकों से यह बहुत ही समृद्ध है। भिखारी ठाकुर से लेकर मनोज भावुक तक, नजीर हुसैन से लेकर रविकिशन तक। शारदा सिन्हा से लेकर भरत शर्मा व्यास और गोपाल राय तक। हजारी प्रसाद द्विवेदी, विवेकी राय, रामजियावन बाबला से लेकर शुकदेव सिंह और मिथिलेश्वर तक। अब तो कबीर को भी भोजपुरी का कवि माना जाने लगा है। राजनीति भी अछूता नहीं है। बाबू राजेंद्र प्रसाद तो खाटी भोजपुरिया थे। इसी कड़ी में पाठकजी को भी शामिल किया जा सकता है।
पाठकजी ने भोजपुरी में बहुत नहीं लिखा है, लेकिन जो लिखा है वह ठोस लिखा है। प्रस्तुत पुस्तक में उनकी कुल दस कविताएं शामिल की गईं हैं, संख्या में छोटी होने के बावजूद अपने विजन में विलक्षण हैं। हमें इन कविताओं को पढ़ते हुए इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि ये कविताएं साठ-सत्तर के दशक में लिखी गई हैं। इसलिए प्रतीक और प्रतिमान उसी समय के हैं। कुछ कविताओं में संस्कृत के प्रतिमानों की छाया देख सकते हैं, कुछ में माटी की गंध को महसूस कर सकते हैं। एक खास तरह के देशज स्वर को भी लक्षित किया जा सकता है। यहां गीत भी है, गजल भी और कविता भी-वह भी अपनी बोली-बानी में। यहां गोर्की की पंक्तियां कौंध रही हैं। गोर्की ने लिखा है, जन सामान्य के बीच प्रचलित भाषा और साहित्य की भाषा में कोई अंतर नहीं है। भाषा जनता द्वारा निर्मित वस्तु है। जनभाषा कच्चे माल की तरह है। समर्थ साहित्यकार और रचनाकार उसका परिष्कार कर साहित्य में उपयोग करते हैं। कबीर ने ऐसा ही किया, तुलसी ने भी अवधी का संस्कार किया और सूरदास ने ब्रज को साहित्य के संस्कारों से सजाया। पाठकजी ने भी भोजपुरी में रचकर इस भाषा का सम्मान किया है। अपनी बोली बानी में जो भाव संप्रेषण हो सकता है, वह दूसरी भाषा में संभव नहीं है। इसे अफ्रीकी लेखक थ्योंगी ने भी महसूस किया है। यही कारण है कि वे अंग्रेजी भाषा में लेखन छोड़कर अपनी मातृभाषा की ओर लौटे। 
अब उनकी रचनाओं पर लौटते हैं। बात गजल से शुरू करते हैं। गजल उर्दू की विधा है। हिंदी में भी यह विधा बेहद लोकप्रिय है। भोजपुरी में गजल कहने का संस्कार आकार ले रहा है। पाठक जी की इन पंक्तियों पर गौर करें-
आम कऽफांकि कऽ बदल हउवे।
आंखि मछरी ह रूप जल हउवे।
रूप कऽ ताल में खिलत हउवे।
नैन राउर ह कि कंवल हउवे।
इस गजल में तत्सम और देशज दोनों स्वरों को पढ़ा जा सकता है, लेकिन कहीं भी यह शब्द प्रयोग खटकता नहीं है। आंखि हो या नैन या कंवल। इसकी गेयता खंडित नहीं होती। यह अलग बात है यह ये बिंब पुराने हैं। संस्कृत काव्यों में आंख की तुलना कंवल और मछली दोनों से की गई है। महाप्राण निराला ने भी अपनी राम की शक्ति पूजा में कंवल की जगह आंख को देवी के चरणों में समर्पित करने की बात कही है। इसलिए प्रतीक भले पुराने हों, स्वाद नया है। यह गजल जब आगे बढ़ती है तब कवि की पीड़ा का एहसास होता है। प्रेम में इस कदर मजरूह है कि वह निर्णय नहीं कर पाता है कि मन को तज दें या सांस को-
कब न रखलीं परान कऽ पाछे।
मन के बाकिर ई बेकहल हउवे।
एके तजदीं कि सांसि के तज दीं।
ई दरद जान से बेसहल हउवे।
कवि पेशोपेश में भी है। आखिर किसे बताए और क्या बताए कि क्या हुआ है-
का बताईं कि का भयल हउवे। 
कुछ ऐसी ही अनुभूति और संवेदना को आगे बढ़ाती है-'आंखि लागत न बाÓ। कविता में विरह की व्याकुलता है। इस व्याकुलता के कारण ही चांद की शीतलता भी विष जैसी लगती है। नेह से मातल हृदय की प्यास तो तभी बुझेगी जब आंखों की प्रतीक्षा खत्म होगी। इस लंबे गीत में परंपरा के स्वर को पहचाना जा सकता है। भोजपुरी इलाके में 'विरहÓ घर के हर हिस्से में आता है। ऐसा कोई घर नहीं जिसके घर का कोई व्यक्ति परदेस में न हो। और, यह परदेस 'कलकत्ताÓ जैसा कोई भी शहर हो सकता है। डा. राही मासूम रजा ने लिखा है कि 'कलकत्ता किसी शहर का नाम नहीं है। गाजीपुर के बेटे-बेटियों के लिए यह भी विरह का एक नाम है।Ó भिखारी ठाकुर के अनेक नाटक इसी विरह वेदना की व्याकुलता से उपजे हैं। पाठक जी ने इसे अपनी कविता में व्यंजित किया है।  कविता की पंक्तियों पर गौर करें-
आंखि लागति न बा, आंखि में आंखि बा।
तोर छोड़ल न जिनिगी जियल जाति बा।
ई दरद जाई तोसे कही बात कुल्हि।
बाति बस तोरा परतीति के बाति बा।
चान सिथिआ चुवावे कि बिखि बोवेला।
पात पीपर करेजा भइल डोलेला।
इस गीत में विरही का दर्द छलक-छलक आता है। पीपर के पात की तरह करेजा डोल रहा है। सांझ कब भोर में बदल जाती है, उसे पता ही नहीं चलता। कवि कहता है कि विरह की आगे सबसे बड़ी आग है-
ए बिरह आगि से आगि कुल्हि हेठ बा।
और, इस आग में हियरा पपिहरा के प्यास का कोई ओर-छोर नहीं है।
इस कविता को पढ़ते समय इसके पूर्व 'जिनगी क गीतÓ जरूर पढऩी चाहिए। 33 पंक्तियों की इस कविता में जिनगी का पूरमपूर दर्द समाया हुआ है। इस गीत की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि , विरह, शृंगार से होते हुए यह कविता अंत में संसार की निस्सारता को दर्ज करती है। स्वप्न से शुरू होकर स्वप्र के पार की यात्रा करती है। टह-टह लाल कचनार के  फूल जस जिनगी क गीत में नेह के बिरवा से लंबी-लंबी पाती सिंची गई है। पाती के माध्यम से अंकवार में भरने की चेष्टा की गई है। पाती में सब कुछ है। हर कल्पना और स्वप्र को स्थान दिया गया है। दर्द ऐसा कि कभी-कभी नायिका कह उठती है कि हियरा को कहां पठाऊं। जिनगी क रात में मोह की नींद ने ममता के सपना को जवान कर दिया है। इस जवान होते सपने में जब वह कहती है कि मटिया क गगरी पिरितया क उझकुन, जोगवत जिनगी ओराय। इन्हीं  पंक्तियों में कविता अपना प्राप्य और अर्थ ग्रहण करती है। सारी उम्र जब दर्द का बखरा बन जाती है तब जिंदगी धुआं-धुआं हो जाती है-
मटिया क  गगरी पिरितिया का उझकुन
जोगवत जिनगी ओराय।
सगरी उमिरिया दरदिया क बखरा
छतिया क अगिया धुंआय।
एक और गीत जो 'जिनगी क पातीÓ शीर्षक से संग्रहित है। यह गीत पाठकजी की प्रिय रचना है। पाठकजी जब इस गीत को सस्वर पढ़ते हैं तो इसके कई-कई अर्थ खुलते हैं। एक तरफ यह प्रेम और विरह से जुड़ता है, जहां प्रेमी है और प्रेमिका। वहीं दूसरी तरफ जड़ और जीव के पंरपरागत द्वंद्व को भी व्यंजित करता है। उपनिषदों की पंरपरा से लेकर संत परंपरा तक में जड़, जीव, चेतन-अचेतन को लेकर जो द्वंद्व मुखर हुए हैं, वह यहां भी दिखाई पड़ता है। कहने में संकोच नहीं कि कविता की एकहरी व्याख्या नहीं की जा सकती है। लौकिकता से पारलौकिता की यात्रा भारतीय मनीषा की विशेषता रही है। द्वंद्व से पार जाने की छटपटाहट ही इसे दूसरी संस्कृतियों से अलग करता है। शंकराचार्य ने द्वैत की बात नहीं की, अद्वैत की बात की है। वह इस तथ्य से भली-भांति परिचित थे कि जहां द्वैत होगा, वहां द्वंद्व होगा ही, इसलिए वे अद्वैत की बात करते हैं। जहां दोनों न हों। कबीर ने भी लिखा है प्रेम गली अति सांकरी, तामे दो न समाय। पाठकजी भी अपनी परंपरा से कटे व्यक्ति नहीं हैं। इसलिए वे पाती के माध्यम से इस कहानी को आगे बढ़ाते हंै। प्रेमिका कहती है तनवां सउंपि दीं कि मनवां सउंपि दीं।
मतिया, पिरितिया, परनवां सउंपि दीं।
और यह समर्पण भी देखिए कि
पियवा के कुल्हि अरमनवां सउंपि दीं।
लेकिन जब गीत आगे बढ़ता है और इसका संदेश स्पष्ट हो जाता है। इन पंक्तियों में इस गीत का पूरा अर्थ समाया हुआ है-
दिया जरेला राति ताख झरे करिखा।
काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद अउरि इरिखा।।
आधि-व्याधि घोर घनघेरि करे बरिखा।
सउंसेे गियान के जियान करे तिरिखा॥
इसकी व्याख्या करने की जरूरत नहीं है।
पाठक जी का एक गीत, जिसमें बाप के मर्म और बेटी के दर्द को उड़ेला गया है, ऐसा गीत है जिसे कोई भी सुन ले तो उसकी आंखें भींग आएंगी। 'बाप के भेंटति बेटीÓ में जिन बिंबों-प्रतीकों का प्रयोग किया गया है, उसमें जो नवीनता है, जो दर्द है-वह हृदय को बेचैन कर देता है। बेटी कहती है कि मन तो कांच माटी का घड़ा है। इसमें जो पानी है वह ससुराल का रीत है। वह अपने घर को याद करती है। कहती है पिजड़े का दुख सहते नहीं सहाता है। किससे कहें अपना दुख। तुलसीदास ने लिखा है कि पराधीन सपनेहुं सुख नाहीं। लड़की जब विदा होकर जाती है और उसके कुछ दिनों बाद पिता जब लड़की के ससुराल जाता है तो लड़की अपनी पीड़ा का बयान करती है। कहती है कि सास बेसहलि चेरी समझती है तो ननद उससे भी हीन। पिया यानी पति द्वंद्व में है। वह नाता निभाता है। एक ओर पत्नी है तो दूसरी और मां और बहन। किसका पक्ष ले, किसको बोले। लड़की का दर्द छलक उठता है जब वह कहती है कि- तोहरे दुलार बाबा चित से न उतरे,
माई क सहज सनेह।
नइहर-सासुर दुई टूक जिनगी
बिधिना का अजब उरेह।
अब लड़कियां नहीं रोतीं। समाज बदल गया। लेकिन लड़की की पीड़ा अब भी वही है। सास, ननद के रिश्ते अब भी सामान्य नहीं हुए हैं। सास भी कभी बहू थी जैसे सीरीयल सालों साल चलते हैं। भले ही उसमें सास-बहू की विद्रूपता चित्रित हुई हो, लेकिन कहीं न कहीं वह टीस मौजूद है।
पाठकजी के दूसरे गीतों को भी पढ़ा जा सकता है। ऊपर जिन गीतों की चर्चा की गई है, वह उनके काव्य-व्यक्तित्व की ऊंचाई को भली-भांति रेखांकित करता है। पाठक जी शब्दों का चयन भी सोच-समझकर करते हैं। वे हड़बड़ी में किसी शब्द का प्रयोग नहीं करते। शब्दों को रखते समय जब तक वह उस शब्द से खुद संतुष्ट नहीं हो जाते, जब तक प्रयोग करते रहते, भले महीनों लग जाएं। उचित शब्द, उचित जगह पर होना चाहिए, तभी अर्थ संप्रेषित हो सकता है-ऐसा वह मानते हैं। ट्राट्स्की ने लिखा है कि कवि या कलाकार किसी भी विषय पर लिखने के लिए स्वतंत्र है, पर उसकी रचना समय की प्रगति और जीवंत विचारों की वाहक होनी चाहिए। पाठकजी को पढ़ते हुए ऐसा महसूस होना स्वाभाविक है। वह लिखते हैं, और डूबकर लिखते हैं।
पाठक जी अब हम लोगों के बीच नहीं रहे। मुंबई में 31 दिसंबर को संध्या साढ़े तीन बजे हम लोगों का साथ छोड़ गए। उनका निधन हम लोगों के लिए पहाड़ गिरने जैसा है। उनकी एक किताब पर लिखा लेख श्रद्धांजलि स्वरूप प्रस्तुत किया जा रहा है।