गुरुवार, 27 जनवरी 2011

क्या हमें डोंबारी बुरू का नरसंहार याद है

संजय कृष्ण, रांची : जालियांवाला बाग की घटना देश-दुनिया को याद है, स्कूलों के पाठ्यक्रम में भी शामिल है। पर, क्या हमें डोंबारी बुरू की याद है? जवाब आएगा नहीं? क्योंकि न इतिहास में दर्ज है, न पाठ्यक्रमों में। पर लोगों के दिलोदिमाग में यह घटना आज भी दर्ज है। जालियांवाला बाग की घटना के बीस साल पहले झारखंड के खूंटी जिले में अंग्रेजों ने नौ जनवरी 1899 को हजारों मुंडाओं का बेरहमी से नरसंहार कर दिया था। इसमें महिलाएं और बच्चे काफी संख्या में कत्ल किए गए थे। इस पहाड़ी पर बिरसा मुंडा अपने प्रमुख 12 शिष्यों सहित हजारों मुंडाओं को जल, जंगल, जमीन बचाने को लेकर संबोधित कर रहे थे। आस-पास के दर्जनों गांवों से लोग एकत्रित होकर भगवान बिरसा को सुनने गए थे। बात अभी शुरू ही हुई थी कि अंग्रेजों ने डोंबारी बुरू हो घेर लिया। हथियार डालने के लिए अंग्रेज मुंडाओं को ललकारने लगे। लेकिन मुंडाओं ने हथियार डालने की बजाय शहीद होने का रास्ता चुना। फिर क्या था, अंग्रेजों की सैनिक टुकड़ी टूट पड़ी और हजारों को मौत के घाट उतार दिया। बिरसा मुंडा गिरफ्तार कर लिए गए और उन्हें आज के बिरसा मुंडा कारावास में बंद कर दिया गया। आदिवासी मूलवासी अस्तित्व रक्षा मंच की रेजेन गुडिय़ा बताती हैं, इस नरसंहार में एक बच्चा बच गया था, जिसे एक अंग्रेज ने गोद ले लिया। यह बच्चा आगे चलकर जयपाल सिंह मुंडा बना। जंगल बचाओ आंदोलन से जुड़ी आलोका कहती हैं, डोंबारी बुरू का नरसंहार इतिहास में भी दर्ज नहीं है। बहुत से मुंडा आदिवासी भी इसे नहीं जानते। दयामनी बरला कहती हैं कि इस ऐतिहासिक उलगुलान को इतिहास में जगह नहीं दी गई। मुख्यधारा का इतिहास आज भी झारखंड से परहेज करता है जबकि अंग्रेजों के खिलाफ सबसे पहले लड़ाई झारखंड में ही शुरू हुई। बेशक, झारखंड के बने दस साल हो गए, लेकिन डोंबारी बुरू में एक विशाल स्तंभ निर्माण के अलावा वहां कुछ भी नहीं है। यह अपने इतिहास के प्रति निरपेक्ष दृष्टि है। हम अपने ही इतिहास से बेखबर हैं। जिसका नतीजा है कि वह वही इतिहास पढ़ते हैं, जो सत्ता हमें पढ़ाना चाहती है।