गुरुवार, 28 फ़रवरी 2013

उठीं भक्ति की अगम तरंगे

संजय कृष्ण
माघी पूर्णिमा पर किले से झांकता चौदहवीं का चांद अपने गंतव्य की ओर बढ़ रहा है और इधर, सूर्य की लालिमा से संगम तट सिंदूरी हो रहा है। सात घोड़ों पर सवार भुवन भास्कर को प्रणाम करते हुए लााों हाथ ऊपर उठे हुए हैं...बासंती बयार में गूंज रहा है ऊं आदित्य नम: ऊं सूर्याय नम: ऊं ाास्कराय नम:...मंत्र के साथ हे सूरुजदेव, हे गंगा मैया का तार सप्तक स्वर...। कहीं गायत्री मंत्र की गूंज तो कहीं पं जगन्नाथ की गंगा लहरी के पुण्य श्लोक...। भक्ति के गाढ़े होते रस में मेरा सिर भी श्रद्धा से झुक जाता है। संगम की ओर निहारता हूं। पूरा तट श्रद्धालुओं से भरा हुआ। तील रखने की जगह नहीं। जिधर देखिए, उधर केवल सिर...। संगम पर भक्ति की अगम तरंगे उठ रही हैं।
गंगा के मटमैले जल में लोग उतरते हैं, आस-पास जल में तैर रहे पुष्पों, नारियल, दीपों को अपने दोनों हाथों से चारों ओर ठेलते हैं और इसके बाद डुबकी लगा लेते हैं। उन्हें इसकी कतई परवाह नहीं कि गंगा मैली है कि गंगा के किनारे कचरों का अंबार है...श्रद्धा की अविरल धारा उनके भीतर बह रही है। गूंज रही है सनातन परंपरा की आदिम लय। इस लय में में समाया है सृष्टि चक्र... 
 इस बीच लाउडस्पीकर की वाचालता और मुखर होने लगती है... बिछड़े लोगों की सूचनाएं प्रसारित हो रही हैं...कोई सीधे माइक पर पुकारता है, हम इहां हैं, चली आव....कोई ओडि़सा का रहने वाला अपने बिछड़े साथी को पुकार रहा है....। तट पर पुलिस वाले भी सुरक्षा में मुस्तैद हैं। घोड़े पर सवार पुलिस भी अपार जनसमूह के बीच से रास्ता बनाते हुए आती-जाती है। इस बेफ्रिकी के साथ कि उसके आने-जाने से स्नानार्थियों की लय में विघ्न पड़ता है।
  रेती पर भीड़ एकदम शांत। अनुशासित। इन्हें देखकर मार्क ट्वेन की पंक्तियां याद आने लगती हैं। मार्क 1895 के कुंभ में प्रयाग आए थे। उस समय यहां की अनुशासित भीड़ को देखकर आश्चर्य में पड़ गए थे। वैसे ही जैसे स्वीटजरलैंड से आए फोटोग्राफर एंड्रीप ब्लो इस महाकुंभ को देख हतप्रभ रह जाते हैं। पिछले तीन दिनों से वे कुंभ की तस्वीरें उतार रहे हैंं। भारत उन्हें इतना रास आया है कि वे चौथी बार यहां आए हैं। कुंभ की जानकारी मिली तो भागे-भागे आए। कुंभ में आई भीड़ को देख कहते हैं कि यहां इतने लोग धर्म पर विश्वास करते हैं। तंबुओं के इस शहर को देख कहते हैं कि 'मेरे लिए यह आश्चर्य है कि यहां एक शहर सिर्फ दो महीने के लिए बसता है।Ó
 अंजलि के जल में सूर्य की रश्मियां दिख रही हैं। दिख रहा है जन प्रवाह...पटना, बेगूसराय, पलामू, लातेहार, गोरखपुर, रींवा, सतना...हैदराबाद, ओड़ीसा, धार...न जाने कहां-कहां से, किस-किस कोने से यहां माघी पूर्णिमा पर गंगा मैया का आशीष लेने आए हैं। संगम की ओर बढ़ते लोगों के बीच एक लोकगीत उठने लगता है। उसकी भाषा समझ में नहीं आती है। धीरे-धीरे शब्दों को पकडऩे की कोशिश करता हूं, लेकिन नाकाम....ये यात्री धोती-कुर्ता पहने थे। माथे पर प्लास्टिक का छोटा सा बोरा...पहनावे से अनुमान लगाया कि ये अपने ही आस-पास के होंगे। पर लोकगीत ने रास्ता बदल दिया...पूछने पर बताया, सतना जिले से आए हैं। भाषा अलग, बोली अलग, पहनावा अलग....थोड़ा ठहरकर सोचता हूं...आखिर वह कौन सी कड़ी है, जो पूरे देश से यहां लोगों को खींच लाई है...तर्क मत करिए...हजार-हजार किमी की कठिन यात्राएं, खुले आकाश में रैन बिताने के पीछे क्या कोरी श्रद्धा है या कुछ और...। संगम पर पूरा भारत दिखाई देता है। चिरंतन भारत, अप्रतिम भारत, शाश्वत भारत...। यहां से ध्यान हटता है कि 'महाकुभ्ंाÓ से अमृत की बूंदें छलकने लगती हैं। तैरती आस्थाओं में विश्वास डूबकी लगाने लगता है। प्रश्न-प्रतिप्रश्न सब कुछ लहरों में तिरोहित होने लगता है। अमृत मुहूर्त में मैं तीन डुबकी लगा लेता हूं। आस्था, विश्वास, करुणा और श्रद्धा के अनगिनत दिए गंगा में तैरने लगते हैं। धीरे-धीरे भीड़ को चीरते हुए मैं अपने गंतव्य की ओर बढ़ता हूं, उधर, भक्तों का रेला खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा...लाखों कदम संगम की ओर बढ़ते जा रहे हैं...सूर्य धीरे-धीरे तीाा होता जा रहा है...।   

शुक्रवार, 8 फ़रवरी 2013

सौ साल पहले रांची की आबादी थी पांच हजार

संजय कृष्ण : दोमिनिक बाड़ा ऐसी शख्सियत हैं, जो मुंह से कम और कलम से ज्यादा बोलते हैं। कलम भी लीक पर नहीं चलती, लीक से हटकर चलती है। लीक पर चलने वाले बहुत हैं। झारखंड के स्वयंभू जानकार भी बहुत हैं, लेकिन उनका काम कुछ अलहदा किस्म का है। सो, इन दिनों उनकी छोटी सी अंगरेजी पुस्तक  'ग्लिपंस आफ लाइफ एंड मिलेयू इन नाइंटींथ सेंचुरी झारखंडÓ चर्चा में है, जिसमें है सौ साल पहले का आंखों देखा हाल। यह ऐसी पुस्तक है, जिसे एक बैठकी में पढ़ा जा सकता है, पर ज्ञान का जो खजाना यह पुस्तक मुहैया कराती है, वह दुर्लभ और खासी महत्वपूर्ण है। 
मूल जर्मन से अनुदित इस पुस्तक में जर्मन लोगों की आंखों से देखा 19 वीं शताब्दी का चुटिया या कहें झारखंड कैद है। सौ साल के इतिहास से गुजरना अपने आप में काफी दिलचस्प है। हालांकि 1895 में मिशन इंस्पेक्टर काउश व मिशनरी एफ हान ने एक मोनोग्राफ लिखा था। उन्होंने जर्मन के गोथिक लिपि में लिखा था। इस पुस्तक पर किसी झारखंडी का ध्यान नहीं गया। जाता भी कैसे, जर्मन में लिखी पुस्तक को वही पढ़-समझ सकता है, जिसे जर्मन भाषा आती हो, जिसे जर्मन का ज्ञान हो, उसके लिए जरूरी नहीं कि उसे झारखंड में रुचि हो। आखिर, क्यों कोई अपनी मेहनत बेमतलब के कामों में जाया करेगा, पर आधी दुनिया घूम चुके, इंग्लैंड और कनाडा के विश्वविद्यालयों में शिक्षा ग्रहण कर चुके दोमिनिक झारखंडी भी हैं और आदिवासियों की संस्कृति में गहरी रुचि भी रखते हैं। उसी परिवेश और गांव-घर में उनकी पैदाइश हुई है।
सो, उनके हाथ में जब जर्मन में लिखी पुस्तक लगी तो उनके अध्यायों को देख उनकी आंखें चमक उठीं। अपने संगठन के कामों से अक्सर जर्मनी की यात्रा करने वाले बाड़ा ने जर्मन भी सीखी और गोथिक के बारे में काफी जानकारी भी एकत्र की।  फिर क्या था, लग गए उसे अनुवाद करने में। पहले उसे हिंदी में किया और बाद में अंगरेजी में। हिंदी में नाम है: उन्नीसवीं सदी का आंखों देखा चुटियानागपुर (1845 से 1895 तक)। अंगरेजी में इसका नाम 'ग्लिपंस आफ लाइफ एंड मिलेयू इन नाइंटींथ सेंचुरी झारखंडÓ। 
पुस्तक में उल्लेख है कि चुटिया नागपुर राजनीतिक दृष्टि से पांच जिलों, आठ सब डिवीजन और नौ कचहरियों में बंटा था। लोहरदगा को उस समय खास चुटियानगर कहा जाता था। इसके अलावा अन्य जिले थे हजारीबाग, पलामू, मानभूम, सिंहभूम। हालांकि अंगरेजी सरकार की देखरेख में वर्तमान झारखंड के सरायकेला खरसांवा के अलावा छत्तीसगढ़ के सरगुजा, गांगपुर, जशपुर, कोरया, बोनाई, उदयपुर, चांगभुकार भी शामिल था। 
रांची की उस समय आबादी लगभग 15 हजार थी, जबकि लोहरदगा, चतरा, झालदा आदि की आबादी महज चार हजार। चुटियानागपुर की पूरी आबादी 55,12,151 बताई गई है। इनमें से 8,83,359 लोग इसके सहायक राज्यों से आते हैं। ( 55 लाख की आबादी संशय पैदा करती है। संभव है जानकारी देने वालों ने उन्हें गलत जानकारी दे दी हो।) पुस्तक में सहायक राज्यों का उल्लेख नहीं है। अलबत्ता आदिवासी संख्या के बारे में जानकारी दी गई है, जिसमें चुटियानागपुर में वास्तविक आदिवासियों की संख्या 15,89,825 बताई गई है। उस समय उरांव 4,56,978, संताली 3,74,449, मुंडारी 3,12,291 हो अथवा लरका 1,49,660 बताई गई है। चुटियानागपुर में गोंड जनजाति का भी उल्लेख किया गया है, जिसकी आबादी 1,30,000 बताई गई और खडिय़ा 47,000, कोरवा 9,700। लेकिन यह आज का चुटियानागपुर नहीं लगता है। उस समय इसकी चौहद्दी में मध्यप्रदेश, उड़ीसा, पं बंगाल, उत्तरप्रदेश के कुछ हिस्से भी इसमें शामिल थे। इसे अंगरेजों ने प्रशासनिक ढंग से बांटा था। इसलिए पूरी आबादी इसमें शामिल कर ली गई है। हिंदू-मुस्लिम आबादी के बारे में बस इतना की कहा गया है ये सब जगह फैले हुए हैं। पुस्तक ईसाई दृष्टि से ही लिखी गई है। कितने लोग मिशन के प्रति उत्सुक हैं, कितनों ने बपतिस्मा लिया। लेखक लिखता है, समस्त चुटियानागपुर में 1893 के अंत तक गोस्सनर मिशन में 35,778 व्यक्तियों ने बपतिस्मा लिया और 3,696 ने धर्म जानने की उत्सुकता दिखाई। पुस्तक में आदिवासी संस्कृति, उनके पहनावे, हुंडरू जलप्रपात, नदी-नाले, खान-पान, खेत-खलिहान आदि का भी जिक्र किया गया है। तब नदियों को पार करने के लिए कोई पुल नहीं थी। घने दुर्गम जंगल थे। जंगलों में खूंखार जानवर थे। इन सबका हवाला है। सौ साल पहले के अपने समय का अक्स इसमें दिखाई पड़ता है। हालांकि पुस्तक में सौ साल पूर्व के पहनावे को देखा जा सकता है। हां, अंगरेजी पुस्तक में शिशिर लाल ने अपने रेखांकन से पुस्तक को सजाया है। दोमिनिक झारखंड की जमीन को लेकर अगली पुस्तक लिख रहे हैं। 

रविवार, 3 फ़रवरी 2013

ग्लोबलाइजेशन की आंधी में बहे तो मिट जाएगी हमारी पहचान


संजय कृष्ण :
खिलता हुआ गेहुंआ रंग, लंबी काया पर चमकता कुर्ता और सफेद घुंघराले-बंकिम बाल, उंगलियों में कीमती रत्न, मनोहर व्यक्तित्व...ऐसी ही आभा के साथ महान संतूर वादक पं शिव कुमार शर्मा से रांची के रैडिशन ब्लू होटल में मुखातिब होने का मौका मिला। बातों का सिलसिला शुरू हुआ तो बात झारखंड के तार वाद्य टुहिला पर भी हुई, जिसे बजाने वाले मात्र एक दो लोग ही बचे हैं। बताया कि झारखंड का यह एक तार वाद्य अंतिम सांसे गिन रहा है। ऐसे लोक वाद्यों के बचाने का क्या प्रयास होना चाहिए? छूटते ही बोले, यह सिर्फ झारखंड की बात नहीं है। ऐसे तमाम लोक वाद्यों, लोकगीतों और लोक रागों, लोक साहित्य को बचाने की कवायद होनी चाहिए और इसमें सरकार को, मीडिया को और कारपोरेट हाउस को आगे आना चाहिए। बिना इसके इनका संरक्षण नहीं हो सकता। अभी स्पीक मैके यह काम पिछले 37 सालों से कर रहा है। हर साल वह छह हजार कार्यक्रम आयोजित करता है।
बात संतूर पर चली तो इसके पूरे इतिहास से परिचित कराया कि यह कितना प्राचीन है और देश-विदेशों में पुराने समय में अलग-अलग नामों से यह पुकारा जाता था। हालांकि यह भारत से ही पश्चिम गया। पं शर्मा ने यह भ्रम भी दूर किया कि यह एक कश्मीरी लोक वाद्य नहीं, बल्कि सूफियाना मौशिकी में बजाया जाने वाला वाद्य है। कश्मीर इसका जन्म स्थान है, लेकिन इसे लोग जम्मू में भी साठ साल पहले नहीं जानते थे। पर, ईश्वर ने मुझे निमित्त बनाया और इसे एक शास्त्रीय वाद्य के रूप में पहचान दिलाई।
 तबले और गायन से शुरुआत करने वाले पद्म विभूषण पं शिव कुमार ने कई फिल्मों में संगीत भी दिया पं हरि प्रसाद चौरसिया के साथ मिलकर। रूपहले पर्दे पर प्रेम का महाकाव्य रचने वाले स्व यश चोपड़ा ने 'सिलसिलाÓ में शिव-हरि की जोड़ी को पहला मौका दिया। इसके बाद चांदनी, 'लम्हेंÓ और 'डरÓ आदि फिल्में कीं। बाद में 'हम आपके हैं कौनÓ को भी अपने मधुर संगीत से संवारने वाले थे लेकिन समयाभाव के कारण वे इस फिल्म को नहीं कर सके।
पंडिती ने फिल्मी दुनिया का एक वाकया भी सुनाया। बताने लगे कि एक बार एक फिल्म की रिकार्डिंग हो रही थी। उसमें मैं भी मौजूद था। ख्वाजा अहमद अब्बास मेरे पास आए और एक कोने में ले जाकर कहने लगे, मैं एक फिल्म बना रहा हूं, 'सात हिंदुस्तानीÓ। उसमें आप काम करें। उस रोल में आप एकदम फिट हैं। पं शर्मा ने बड़ी शाइस्तगी से काम करने से इनकार कर दिया। खैर, वे अभिनेता बन जाते तो दुनिया संतूर के सात स्वर से अपरिचित नहीं रह जाती! वह भी मानते हैं कि भगवान तो मुझसे कुछ और ही कराना चाहता था।
सौ तारों वाले इस वाद्य को सात सुरों में पिरोना आसान काम तो नहीं था। जब इसे वे सात सुरों में पिरो रहे थे कई ने आलोचना भी की। इसके बाद इसमें कुछ फेरबदल कर इसे शास्त्रीय मंच तक ले गए। इसके पीछे उनकी लंबी साधना और पिता की इच्छा भी शामिल थी।
जब 1952 में इस वाद्य को कश्मीर रेडियो स्टेशन से बजाया तो थोड़ा आत्मविश्वास जगा। इसके बाद 1955 में गुरु भाई डा. कर्ण सिंह ने इन्हें तब  बांबे भिजवाया। शुरू में फिल्मों में भी बजाया। 1956 में कोलकाता में भी अपनी प्रस्तुति दी। इसके बाद पीछे मुड़कर नहीं देखा। 
आज की युवा पीढ़ी और संगीत को हमसफर बनाने वालों से यह जरूर कहते हैं कि शास्त्रीय वादन समर्पण, साधना और प्रतिबद्धता की मांग करता है। ऐसे कलाकारों में तारीफ को जज्ब करने की क्षमता भी होनी चाहिए। यह अपेक्षा रखना बेमानी है कि ऐसी विधाओं में हजारों कलाकार पैदा हो सकते हैं। यह ईश्वर की कृपा और पूर्व जन्म का संस्कार होता है। जैसे क्रिकेट में सब धौनी नहीं बन सकते।  जबकि यह गांव से लेकर शहर में खेला जा रहा है। फिर यह तो शास्त्रीय वादन का क्षेत्र है। स्कूलों में कलाकार पैदा नहीं हो सकते। यह ध्यान रखनी चाहिए। इसके लिए तो गुरु-शिष्य परंपरा की एकमात्र गुरुकुल है। 
हां, वे इस बात पर संतोष जताते हैं कि उनके पुत्र राहुल शर्मा उनकी परंपरा को आगे बढ़ा रहे और उसमें काफी प्रयोग भी कर रहे हैं। साथ ही जापान से आए ताका हीरो आराइ भी 2007 से उनके साथ हैं और संतूर की की बारीकी सीख रहे हैं। बातें और भी हैं। फ्यूजन से लेकर फिल्मी संगीत तक। इस पर भी अपनी बेबाक और ईमानदार राय रखी। बताया कि फ्यूजन वही है, जहां दो अलग-अलग विधाएं मिलें तो एक तीसरा खूबसूरत रंग पैदा हो। हिंदी सिनेमा में अनिल विश्वास, एसडी बर्मन, पंकज मल्लिक आदि ने इसका प्रयोग किया है। 
जाते-जाते मीडिया के लिए यह नसीहत भी दिए कि मीडिया को भी इस क्षेत्र में आगे आना चाहिए। संस्कार और रुचि निर्माण मीडिया ही कर सकता है। सो, यदि देश को लीडर बनना देखना चाहते हैं तो अपनी कलम का इस्तेमाल सकारात्मक काम के लिए करिए। उपभोक्तावादी और वैश्वीकरण की आंधी हमारे मूल्यों, संस्कृति और संस्कार को ध्वस्त कर रही है। इसे बचाने के लिए आगे आना चाहिए। देश की पहचान यहां के शास्त्रीय व लोक गीतों से हैं। ग्लोबलाइजेशन की आंधी में बह गए तो हमारी पहचान भी मिट जाएगी।