मंगलवार, 25 मार्च 2014

साठ साल की सक्रियता ने रचा शोध का नया आयाम


संजय कृष्ण, रांची
डॉ.बीपी केशरी। बहुमुखी प्रतिभा का स्थापित मानदंड। बिरल व्यक्तित्व। उम्र के पड़ाव का आठवां दशक। चिंतन और विचार से तेजस्क्रिय। यह जमाना उन्हें किस रूप में याद करना चाहेगा- एक संस्कृतिकर्मी के रूप में, झारखंड आंदोलन के बौद्धिक अगुवा के रूप में या एक गहन साहित्य के शोधार्थी के रूप में। इन तीनों रूपों में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण है। किसी में कमतर नहीं। इतिहास में एक मुकम्मल जगह उन्होंने बना ली है। लेकिन, एक काम ऐसा है, जिसे करने के बाद उन्हें असीम संतुष्टि मिली। वह है- नागपुरी कवियों पर काम। यह काम पिछले पचास वर्षों से चल रहा था।  हौले-हौले। कई तरह की बाधाएं भी आईं। झारखंड आंदोलन में व्यस्तता रही। फिर भी पूरा हुआ। निस्संदेह यह एक शलाका पुरुष की सारस्वत साधना का सद्परिणाम है। रांची विवि में जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग की स्थापना...बीच-बीच में ऐसे काम आए, जो वह भी कम महत्वपूर्ण नहीं थे। फिर यह काम बंद नहीं हुआ। एक हसरत जरूर थी कि यह ऐतिहासिक काम उनके जीते जी हो जाए और हो भी गया। पांच मार्च को जब वे अशोक पागल के यहां बैठे थे और बार-बार उनका फोन आ रहा था कि मैं इंतजार कर रहा हूं तो भागा-भागा बीमारी में भी उनसे मिलने गया। उनके चेहरे पर एक असीम खुशी तैर रही है। काम की पूर्णता का एहसास उनकी बातों से लग रहा था। उन्होंने एक प्रति दी। छाप-छपाई और कवर देखकर बहुत आनंद हुआ।

इस महती योजना का प्रारंभ कैसे किया। यह काम कितने दिनों में हुआ और कैसे मन में विचार आया?
केशरी : 1951 का साल। आइए की परीक्षा देकर घर आया था। एक चचेरी बहन की शादी थी। गर्मी का मौसम था। चांदनी रात में घर और पास-पड़ोस की मां-बहनें शादी पर झूमर खेल रही थीं। आंगन नागपुरी गीतों से नहा रहा था। अचानक कुछ पंक्तियों पर मेरा कान लग गया-
अम्बा मंजरे मधु मातलयं रे,
तइसने पिया मातल जाय।
नाग-नागिन कांचुर छोड़लयं रे,
तइसने पिया छोड़ल जाय।

इस झुमटा गीत की लय, शब्द रचना और अर्थ-व्यंजना ने मुग्ध कर दिया। दिल-दिमाग एकमेक हो गए और सोचने लगा, इतनी सुंदर पंक्तियों का रचयिता कौन है? छिटक रही चांदनी की उस रात ने ऐसा बेचैन किया कि फिर इस तरह के गीतों की तलाश में जुट गया। आस-पास के गांव, घर, खेत-खलिहान और संगी-साथियों से अनायास ही कुछ गीत मिल गए। इस काम में आदिवासी पत्रिका से भी सहायता मिली। काम आगे बढ़ा। फिर जीएल कालेज डालटनगंज में नियुक्ति हो गई। इसके बाद छुट्टियों में ही कुछ काम कर पाता।
कवियों की खोज कैसे की और कहां-कहां गए?
डॉ.केशरी बताते हैं कि 1957 में आकाशवाणी की स्थापना हुई। इसके तीन साल बाद 1960 में रांची विवि की। इससे नागपुरी जगत में हलचल हुई। 1960 में ही नागपुरी भाषा परिषद का गठन भी हुआ। नागपुरी पत्रिका का प्रकाशन शुरू हुआ। इससे काम आसान हुआ। कई लेख इसमें छपे। गीतों के संग्रह में भी आसानी हुई। 1964-65 में नागपुरी क्षेत्र का व्यापक दौरा किया। नागपुरी जानने वालों से संपर्क किया, साक्षात्कार लिया। पांच सौ नए-पुराने कवियों के लगभग 15000 गीत मिले। काम को आगे बढ़ाने के लिए 1967 में एक पुस्तिका छपाई-नगपुरिया कविमनक सूची। धीरे-धीरे काम बढ़ रहा था।

नागपुरी गीतों में ही पीएचडी करने का विचार कैसे आया?
नागपुरी में काम कर रहा था। इसलिए इसी में पीएच डी करने का मन बनाया। 1971 में रांची विवि से नागपुरी गीतों में शृंगार रस पर पीएच डी की डिग्री मिली। इसके पहले जर्मनी के बौन विवि से मोनिका जॉर्डन और रांची विवि से डॉ.श्रवणकुमार गोस्वामी को नागपुरी में यह डिग्री मिली थी। इस बीच झारखंड आंदोलन भी तेज हो रहा था। शोषण का क्रम जारी था। एक तरह से यह आंतरिक उपनिवेश बन गया था। इस बीच झारखंड का इतिहास लेखन, झारखंड पार्टी की सदस्यता लेना, पार्टी का मैनिफेस्टो लिखना, नागपुरी में जय झारखंड पत्रिका निकालना, यहां की भाषाओं की समस्याओं एवं संभावनाओं पर आलेख तैयार करना आदि काम करने पड़े।
आंदोलन के साथ रचनात्मक काम कैसे करते रहे?
 1972 में झारखंड मुक्ति मोर्चा के गठन से लेकर छोटानागपुर सांस्कृतिक संघ, नागपुरिया संघ, शालपत्र के प्रकाशन की कहानी बताई। रांची विवि के जनजातीय भाषा विभाग में आने और स्नातकोत्तर विभाग की स्थापना भी रोचक कहानी है। विभाग की स्थापना में कुमार सुरेश सिंह का विशेष योगदान रहा। फिर डॉ. रामदयाल मुंडा ने इस बिरवे को वृक्ष बनाया। विभाग ने सांस्कृतिक नवजागरण की भूमिका निभाई।
फिर नागपुरी संस्थान की स्थापना की बात दिमाग में कैसे आई?
1993 में अवकाश प्राप्ति के बाद भी शोध का काम आगे चलता रहा। उम्र बढ़ रही थी और शैक्षिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक व्यस्तताएं पीछा नहीं छोड़ रही थीं। काम आगे बढ़ाने के लिए किसी तरह अपने गांव में ही नागपुरी संस्थान की स्थापना की। इसके बाद लोगों के सहयोग से काम को तेज किया। अथक परिश्रम के बाद 650 कवियों की सूची बनी। लेकिन पुस्तक में 248 कवियों एवं उनकी रचनाओं को ही शामिल कर सका।
इस उपलब्धि पर क्या कहना चाहेंगे?
केशरी जी कहते हैं कि शोधयात्रा के दौरान लगभग 35 हजार नागपुरी गीत-कविता, 61 कवियों-संपादकों की 119 पुस्तक-पुस्तिकाएं मिलीं, जो नागपुरी संस्थान में उपलब्ध हैं। संग्रह में 1600 ईस्वी से लेकर 2000 ईस्वी के रचनाकारों को शामिल किया गया है। अभी मुझे बस फ्रैंकलिन डी रूजवेल्ट की पंक्तियां याद आ रही हैं। इसे मेरा भावोच्छवास भी कह सकते हैं। कविता की पंक्तियों का आशय है-'आनंद मात्र धन संग्रह में नहीं। यह रचनात्मक प्रयासों के रोमांच में, उपलब्धियों के उल्लास में है।Ó यह उपलब्धि मेरे लिए कुछ ऐसा ही अर्थ रखती है।