गुरुवार, 19 सितंबर 2019

भवानी दयाल संन्‍यासी और उनकी किताब महात्‍मा गांधी

आज यहां हम ऐसी ही किताब की चर्चा करने जा रहे हैं, जिसके बारे में बहुत कम लोगों को पता है। यह किताब, जो आपके हाथों में सौ साल बाद दुबारा प्रकाशित हो रही है। पुस्तक का नाम है-'सत्याग्रही महात्मा गान्धी अर्थात् मोहनदास कर्मचन्द गांधीÓ। लेखक हैं भवानी दयाल। लेखक तब दक्षिण अफ्रिका के डरबन, नेटाल में रहते थे। जन्म भी वहीं हुआ था, लेकिन मूल भारत था। भवानी दयाल ने यह पुस्तक 1916 में लिखी थी, क्योंकि प्रकाशन की तिथि 1917 है। जो
पुस्तक के लेखक, भवानी दयाल को भी जानना चाहिए, जो बाद में आर्य समाज से दीक्षा लेकर संन्यास धारण कर भवानी दयाल संन्यासी कहलाए और जिनके बारे में हमारी पीढ़ी बहुत कुछ नहीं जानती और वह प्रदेश भी, जहां से उनका वास्ता रहा।
भवानी दयाल संन्यासी का पैतृक गांव बहुआरा है। यह बिहार के सासाराम जिले में है। कुदरा से 10-12 किलोमीटर की दूरी पर। पहले यह आरा जिले में था। 'प्रवासी की कहानीÓ में भवानी दयाल संन्यासी अपने माता-पिता के बारे में जानकारी देते हैं- 'मेरी माता का नाम मोहिनी देवी था। उनका जन्म अवध में हुआ था। एक अच्छे जमींदार की बेटी थीं।...मेरे पिता का नाम जयराम सिंह था। वे बिहार के रहने वाले थे। बचपन में ही उनके मां-बाप मर गए थे।Ó मां-पिता के मिलने की कहानी किसी नाटक से कम नहीं। एब बार सरयू स्नान के मेले में संन्यासी की मां घर और गांव वालों के साथ स्नान करने अयोध्या गईं। वहां अचानक साथियों से विलग हो जाने के कारण वह भटक गईं। परिजनों को तलाशने की कोशिश की, लेकिन विफल रहीं। लाचार, मेले में एक किनारे बैठ रोने लगीं। इसी बीच एक ब्राह्मण वेशधारी आरकाटी उसके पास पहुंचा और अपने लोभ में फंसा दिया कि वह उनके परिजन से मिला देगा, लेकिन वह उसे कलकत्ते के डीपो पहुंचा दिया, जहां से जहाज लोगों को बेहतर जिंदगी का लालच देकर गोरे दक्षिण अफ्रिका ले जाते थे। इधर, जयराम सिंह भी गांव में बनियारी करते हुए काफी डांट-फटकार पाते थे। जमींदार से डांट सुनकर एक बार वे भी अपना गांव छोड़ नौकरी की आस में काशी पहुंचे और फिर यहां से वे भी आरकाटी के फंदे में फंस गए। पर, यहां का जीवन देख वह यहां से भागना चाहते थे। आरकाटी ने कहा, पांच रुपये तुम पर खर्च हुए हैं, वह दे दो, तो चले जाओ। न पांच रुपया हुआ न वे भाग सके और अंतत: वे भी उसी जहाज पर सवार कर दिए गए। इसी जहाज पर दोनों साथ आए और शादी हो गई। नेटाल में दोनों ने पांच साल किसी तरह गुजारे और किसी तरह कुछ पैसा भी बचा लिए। पता चला कि नेटाल के पास ट्रांसवाल सुंदर शहर है। यहां सोने की खान है। इसलिए नेटाल से ट्रांसवाल चले आए। यहां आकर जोहान्सबर्ग में डेरा डाला और व्यापार करने लगे। इससे आर्थिक स्थिति काफी सुधर गई। वे यहां हिंदुस्थानियों के बीच बाबूजी के नाम से ख्यात हो गए। जब यहां ट्रांसवाल इंडियन एसोसिएशन की स्थापना हुई तो जयराम सिंह प्रधान चुने गए। यहीं ट्रांसवाल के जोहान्सबर्ग में दस सितंबर, 1892 को भवानी दयाल का जन्म हुआ। हालांकि दुखद यह रहा कि सात साल बाद उनकी माता का 1899 में निधन हो गया। इसी समय यहां अंग्रेज और बोअरों के बीच युद्ध छिड़ गया था। गांधीजी ने अंग्रेेजों की इस युद्ध में बहुत मदद की। 1904 में भवानी दयाल परिवार संग पहली बार अपनी जन्मभूमि से मातृभूमि भारत आए। यहां रहने के बाद 1907 में भवानी दयाल का विवाह हुआ। पिता ने भी यहां अपनी दूसरी शादी कर ली थी। पिताजी का जब 1911 में देहांत हुआ तो घर में कलह भी शुरू हो गया। विमाता का व्यवहार भी अनुकूल नहीं था। इसलिए 1912 मेंं साढ़े आठ साल व्यतीत कर अपनी जन्मभूमि लौट गए। अपने पत्नी, छह महीने के पुत्र, छोटे भाई देवीदयाल और उनकी पत्नी के साथ। जिस दिन वहां पहुंचे तो वहां उन्हें जहाज से उतरने ही नहीं दिया गया। कानूनी अड़चन सामने आ गया। इसके बाद गांधीजी ने हस्तक्षेप किया और उनके वकील मित्र पोलक मामले को कोर्ट ले गए। किसी तरह जहाज से उतरे तो वे सीधे गांधी के आश्रम पहुंचे। पिताजी के रहते ही गांधीजी से परिचय हो गया था। पिताजी भी गांधी के आंदोलन में साथ रहे। हर स्तर पर मदद की। यहां संन्यासी ने धोबी का भी काम किया। वे गांधीजी को मजदूरों की तरह काम करते हुए देख चुके थे। इसलिए इस काम को करने में उन्हें कोई हिचक नहीं हुई। वे बाबू लालबहादुर सिंह के धोबीखाने यानी लांड्री में काम करते थे। बाबू साहब ट्रांसवाल के प्रसिद्ध सत्याग्रही थे। कई बार उन्होंने जेल की यात्रा की। संन्यासी यहां कुछ दिनों में ही पक्का धोबी बन गए, लेकिन यह काम टिकाऊ न हो सका, क्योंकि 1913 के सितंबर में महात्मा गांधी ने सत्याग्रह का शंख फूंक दिया। सत्याग्रह में केवल भवानी दयाल ही शामिल नहीं हुए, पत्नी जगरानी देवी ने भी साथ दिया। संग्राम तेज हो गया। जेल भी जाना पड़ा। जेल से छूटे तो गांधीजी ने पत्र लिखकर कहा, फिनिक्स जाकर इंडियन ओपिनियन के हिंदी अंश का संपादन करें। यहां आकर संपादन किया। फिर सोने की खान में मजदूरी की। काम करते हुए हिंदी प्रचारिणी सभा, हिंदी रात्रि पाठशाला और हिंदी फुटबाल क्लब की स्थापना भी की। इसी समय 1914 में उन्होंने 'दक्षिण अफ्रिका के सत्याग्रह का इतिहासÓ लिखा। दो साल बाद 1916 में यह प्रकाशित हुआ। हिंदी प्रचार का काम भी चलता रहा। 1915 में जब नेटाल आए तो यहां दो साल तक हिंदी की सेवा करते रहे। इसके बाद दक्षिण अफ्रिका हिंदी साहित्य सम्मेलन का प्रथम अधिवेशन भी संन्यासी ने कराया। डरबन से धर्मवीर का सम्पादन किया। इसी बीच संन्यासी ने हमारी कारावास की कहानी, महात्मा गांधी का जीवन-चरित्र, वैदिक धर्म और आर्य सभ्यता, शिक्षित और किसान और नेटाली हिंदू नामक पुस्तकें लिख डालीं। संन्यासी ने अपने परिवार के भविष्य के लिए यहां 1919 में गन्ने की खेती शुरू कर दी थी। उस समय उनके दो पुत्र थे। यह सब काम करते हुए भवानी दयाल संन्यासी उन चंद भारतीयों में शामिल थे, जिन्होंने महात्मा गांधी द्वारा दक्षिण अफ्रीका में चलाए गए सत्याग्रह आंदोलन में प्रमुख भूमिका निभायी थी। उन्होंने भारत ही नहीं दक्षिण अफ्रीका के इतिहास पर अपनी अमिट छाप छोड़ी। दक्षिण अफ्रीका में गांधीजी से पहले सत्याग्रह का इतिहास लिखा। वहीं अपनी पत्नी के साथ मिल कर 'जगरानी प्रेसÓ स्थापित किया और 'हिंदीÓ नाम से पत्रिका निकाल कर हिंदी का प्रसार-प्रचार किया। 1919 में वे दूसरी बार भारत आए और अपने बच्चों को वृंदावन के गुरुकुल में प्रवेश करा दिया। यह सब हो गया तो उनकी भेंट पं बनारसी दास चतुर्वेदी से हुई। यहां रहते हुए अमृतसर में कांग्रेस का अधिवेशन दिसंबर में हुआ तो वे अफ्रिका के हिंदुस्तानियों के प्रतिनिधि के रूप में शामिल हुए। इसके बाद राजेंद्र प्रसाद से परिचय हुआ। 1920 के अगस्त में संन्यासी जी दक्षिण अफ्रिका चले गए। जिस दिन वे दक्षिण अफ्रिका पहुंचे, उसी दिन उन्हें तिलक के देहावसान व गांधीजी के असहयोग आंदोलन के श्रीगणेश का समाचार मिला। दक्षिण अफ्रिका में गांधीजी ने 1894 में नेटाल इंडियन कांग्रेस की स्थापना की थी। यह 1913 तक हिंदुस्तानियों की सेवा करती रही। जब 1914 में दक्षिण अफ्रिका से गांधीजी सदा के लिए विदा हो गए कांग्रेस के कुछ सदस्यों ने सुप्रीम कौंसिल में दरख्वास्त देकर उसकी सारी जायदाद जब्त करा दी। इसके बाद लंबी लड़ाई के बाद 1921 को उसे पुनर्जीवित किया गया। तब भवानी दयाल को उसका प्रधान चुना गया। इस पद पर वे 18 साल तक रहे।
भवानी दयाल ने 1922 में छापाखाना खोला। इसमें उनकी पत्नी जगरानी देवी की बड़ी भूमिका रही। यहां से हिंदी समाचार पत्र का प्रकाशन हुआ। दुर्भाग्य यह रहा कि जगरानी देवी का अप्रैल के दूसरे सप्ताह में निधन हो गया। अखबार का पहला अंक मई में आना था। अंक तो निश्चित समय पर आया, लेकिन जगरानी देवी जग से विदा ले चुकी थीं। भवानी दयाली ने उनकी स्मृति में छापेखाने का नाम 'जगरानी प्रेसÓ रखा। अभी पत्नी के देहांत से उबरे नहीं थे कि मातृभूमि से भी खबर आई कि विमाता और उनका इकलौता पुत्र भी अब दुनिया में नहीं रहे। फिर वे भारत आए। यहां फिर 1922 के दिसंबर में होने वाले गया कांग्रेस में भाग लिया। 1926 में अपने गांव बहुअरा में प्रवासी भवन बनवाया। 1927 के चैत्र की रामनवमी पर इस भवन का वार्षिकोत्सव हुआ और इसी अवसर पर भवानी दयाल आर्य समाज से दीक्षित होकर संन्यासी बन गए। आर्य समाज का प्रचार के साथ-साथ देश की आजादी के आंदोलन का काम भी साथ-साथ चलता रहा। मातृभूमि से जन्मभूमि की यात्रा भी होती रही। आजादी का आंदोलन भी। इसी क्रम में 1929 नमक कानून तोडऩे और जनता को भड़काने के एवज में गिरफ्तार कर लिए गए और आरा से इन्हें में 11 अप्रैल की शाम को उन्हें हजारीबाग जेल के लिए रवाना कर दिया गया। 12 को जेल में दाखिल हुए। यहां पर रहते हुए उन्होंने हस्तलिखित पत्रिका निकाली। प्रारंभ में रामवृक्ष बेनीपुरी ने 'कैदीÓ निकाला। बाद में 'कारागारÓ नाम की पत्रिका निकाली। उसके संपादन का भार उन्हें सौंपा गया। बिहार के सभी नेता कारागार के लिए लेख लिखकर देते थे। कारागार का प्रथमांक 'कृष्णांकÓ था, जो जन्माष्टमी के समय प्रकाशित हुआ थाा। दूसरा अंक दीपावली अंक था और तीसरा सत्याग्रह अंक। प्रवासी की यह अधूरी कहानी है। 'प्रवासी की कहानीÓ की भूमिका में डॉ राजेंद्र प्रसाद ने लिखा है- ''स्वामी भवानी दयाल संन्यासी से मेरी मुलाकात कई बरसों से है। मुलाकात के पहले ही जब मुझे दक्षिण अफ्रिका के भारतियों इतिहास से कुछ परिचय हुआ, स्वामीजी के नाम और काम से परिचय हो चुका था। साक्षात् से वह परिचय और भी गहरा हो गया, और जैसे-जैसे परिचय बढ़ता गया उनके गुणों और कार्रवाइयों से अभिज्ञता होती गई; आदर और स्नेह बढ़ते गए। जब स्वामीजी 1930 में हिंदुस्तान आये और यहां के सत्याग्रह में आरा जिला में काम करने लगे, तो उनकी कार्यशक्ति, और अस्वस्थ शरीर से भी कितना परिश्रम वह कर सकते थे, इसका भी पता चला। यों तो स्वामीजी प्रवासियों की ओर से भेजे हुए डेपुटेशन में भारत आते-जाते रहते हैं और वहां दक्षिण अफ्रिका में भी बराबर उनकी सेवा में ही लगे रहते हैं। पर हमको, जब-जब वह देश में आते हैं, अपने प्रेम और सहृदयता से बाधित करते हैं। वहां पर राजनीतिक और सामाजिक सेवा के अलावे स्वामीजी ने हिंदी प्रचार में भी बहुत बड़ा काम किया है। हम बिहारियों को इसका गौरव है कि वह हमारे ही प्रदेश के हैं और वह भारतीय होते हुए भी प्रान्त को नहीं भूले हैं। मैं समझता हूं कि ऐसे सज्जन की जीवनी से नवयुवकों को अपने जीवन बनाने में सहायता मिलेगी और स्वामीजी का त्याग, उनकी कार्यदक्षता और देश प्रेम उनके लिये एक आदर्श उपस्थित करके उनके लिए पथ-प्रदर्शक बनेगी। -राजेंद्र प्रसाद।ÓÓ
प्रसाद ने अपनी आत्मकथा में भी जिक्र किया है, 'जेल में कुछ बातों में आपस में सुखद प्रतिद्वंद्विता हुई। कुछ लोगों ने 'बन्दीÓ या 'कैदीÓ नाम का एक हस्तलिखित मासिक पत्र निकाला। दूसरों ने 'कारागारÓ नाम का दूसरा मासिक निकाला, जिसमें यह लिखा कि कैदी या बन्दी तो आते-जाते रहते हैं, बदलते रहते हैं़, पर कारागार तो स्थायी रूप से चलता रहता है! इन पत्रों में राष्ट्रीय आन्दोलन-सम्बंधी लेख लिखे जाते थे। एक विशेषांक में सभी जिलों के प्रमुख कार्यकर्ताओं से, अपने-अपने जिले में आन्दोलन की प्रगति पर, लेख लिखवाये जाते थे। मेरा ख्याल है कि उससे बहुत कुछ मसाला मिलता, जिससे आन्दोलन का इतिहास लिखा जा सकता। याद नहीं, वह विशेषांक कहां है। इन पत्रिकाओं के मुख्य प्रबन्धक और लेखकों में सर्वश्री भवानीदयाल, गया के बाबू मथुराप्रसाद सिंह, रामवृक्ष बेनीपुरी और उत्साही युवक महामायाप्रसाद थे।Ó
संस्करण है, उस पर लिखा है, द्वितीयबार। यानी दूसरा संस्करण। संभव है, एक साल में इसका दूसरा संस्करण निकला हो। यह भी संभव है कि गांधी पर हिंदी में यह पहली पुस्तक हो। क्योंकि गांधी भारत 1915 में आते हैं। एक साल तक देश का भ्रमण करते हैं। किसी भारतवासी ने इतनी तत्परता दिखाते हुए उस समय कोई किताब लिख दी हो, मुश्किल लगता है। एक तीसरी उल्लेखनीय बात यह है कि भवानी दयाल ने 1916 में ही उन्हें महात्मा का नाम दे दिया था। चूंकि भवानी दयाल दक्षिण अफ्रिका में उनके साथ रहे। काम किया। उनके पिता जयराम सिंह का गांधी के प्रति अपूर्व प्रेम था। इसलिए गांधी के कर्म और चिंतन से भवानी दयाल काफी प्रभावित हुए। इतने प्रभावित कि अपनी इस पुस्तक में उद्गार व्यक्त करते हुए लिखा है-''महात्मा गान्धी का चरित्र लिखकर वास्तव में मैंने अनधिकार चेष्टा की है। उस महान पुरुष के जीवन का सच्चा चित्र खींचना मेरे लिये कठिन ही नहीं किन्तु असम्भव है। तो भी जो कुछ अपनी तुच्छातितुच्छ बुद्धि के अनुसार लिखा है, वह हिन्दी प्रेमियों की सेवा में सादर समर्पित है।...थोड़े दिनों तक महात्मा गान्धी के साथ रहकर उनके राजनैतिक सिद्धान्तों के जानने में जो कुछ सफलता प्राप्त की है, उसे मैंने 'दक्षिण अफ्रिका के सत्याग्रह का इतिहासÓ, 'हमारी कारावास की कहानीÓ और इस पुस्तक में दर्शाने का प्रयास किया है।ÓÓ
संन्यासी ने देश सेवा के साथ समाज की भी सेवा की। 1937 में लारेंस मारक्बिस में वेद मंदिर की आधारशिला रखी। 1944 में उन्हें काशी नागरी प्रचारिणी सभा की स्वर्णजयंती का अध्यक्ष चुना गया। उसी समय अजमेर से प्रकाशित 'प्रवासीÓ पत्रिका का संचालन और सम्पादन किया। इसके पहले 1931 में बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन के दसवें देवघर अधिवेशन में अपना अध्यक्षीय भाषण देते हुए, बिहार की चिंत्य स्थिति पर बड़ा मार्मिक प्रकाश डाला था। उन्होंने कहा था, 'बिहार में न लेखकों की कमी है न पाठकों की, न सम्पादकों की, न सुकवियों की और साहित्यसेवियों की। अन्य क्षेत्रों की पत्र-पत्रिकाएं और पुस्तकें बिहार में ही अधिक खपती हैं। फिर भी हमारी यह दीन दशा क्यों? कारण यह है कि हममें कल्पना और कार्यशक्ति का अभाव हो गया है। हमारी दिमागी उड़ान एवं बुद्धि गुलाम हो गई है तथा हम अपनी राष्ट्रभाषा के उज्ज्वल भविष्य में अविश्वास करने लगे हैं।Ó
प्रवासीजी का देहान्त 9 मई 1950 को प्रवासी भवन अजमेर, में हुआ। गांधीजी की जब यह जीवनी लिखी, तब उनकी उम्र मात्रा 24 साल की थी। आप उनकी प्रतिभा, सोच और संस्कार का अनुमान लगा सकते हैं। प्रवासी की यह कहानी हम इसलिए अधूरी छोड़ रहे हैं कि आप उनके बारे में जानने के लिए कुछ और देखें और पढ़ें। आजादी के आंदोलन में इनकी महती भूमिका रही। विदेश में हिंदी के प्रचार में इनका सबसे बड़ा योगदान रहा है। हिंदी के इस सेवक के नाम पर अपने देश में न कोई पुरस्कार है न किसी मार्ग का नाम। देश तो भूला ही चुका है, बिहार ने भी कहां उन्हें मान-सम्मान और याद किया। बिहार शताब्दी के सौ नायकों में भी नहीं। कम से कम गांधी की 150वीं जयंती के मौके पर तो हम उन्हें याद कर ही सकते हैं।

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