शुक्रवार, 27 सितंबर 2019

हाशिए पर टाना भगत


   टाना भगत आदिवासियों का वह समूह है, जिसने अपना एक अलग धर्म चलाया, जिसे टाना धर्म कहा गया। तब के रांची जिले में ही 1914 में उरांव जनजाति के बीच यह धर्म अस्तित्व में आया। टाना धर्म पूर्णतः अहिंसा पर आधारित है। रामचंद्र चौधरी ने लिखा है, ‘बिशुनपुर थाना के पास चिंगरी गांव में जतरा उरांव नामक एक 20 साल के नवयुवक ने इस पंथ को चलाया। कहते हैं, एक दिन वह पोखर में स्नान करने गया था। वहां पानी के भीतर उसे धर्मेश ईश्वर का दर्शन हुआ। धर्मेश ने उसे मंत्रा दिया। पानी के भीतर से ‘टाना बाबा, टाना बाबा’ स्वर उच्चरित करते हुए जतरा निकला। उसने धर्मेश के दर्शन की बातंे लोगों को बताईं-हमें भूत प्रेत और विविध बोंगाओं की पूजा छोड़ देनी चाहिए। हम सात्विकता में रहें और एक ईश्वर की उपासना करें। बलि की प्रथा बंद करें। हड़िया की तपावन की जगह शुद्ध जल और दूध का तपावन दें। परंपरागत शिकार प्रथा बंद करें। जने धारण करें। गो सेवा में लगें। जीव हत्या न करें। भगवान का भजन करें।’
   जतरा का जन्म गुमला जिले के चिंगरी नावाटोली गांव में 1888 को हुआ था। पिता का नाम कोहरा भगत व माता का नाम लिवरी भगत था। बुधनी भगत इनकी पत्नी का नाम था। जतरा के जन्म की तिथि ज्ञात नहीं पर, टाना भगत गांधी जयंती के दिन ही जतरा की जयंती भी मनाते हैं। तुरिया भगत से तंत्रा-मंत्रा की विद्या सीखने के क्रम में इन्हें 1914 में अचानक आत्मबोध हुआ। अंगरेजी राज के अत्याचार, जमींदारों की बेगारी, समाज में फैले अंधविश्वास एवं नाना प्रकार की कुरीतियांे से पीड़ित आदिवासी समुदाय को सन्मार्ग दिखाने का संकल्प लेकर युवा जतरा उरांव जतरा भगत बन गया। जतरा ने अपना मंत्रा लोगांे को दिया। वह रोग निदान भी करने लगा। बहुत से लोग उसके पंथ में चले आए और अनुयायी बन गए। जतरा टाना बाबा बन गए। हालांकि विरोध भी हुआ, लेकिन टाना पंथ आगे बढ़ता चला गया। जतरा के प्रचार से जमींदार, महाजन और अंगरेजी सरकार चौकन्ना हो गई। जतरा को उसके सात साथियों के साथ गिरतार कर लिया गया और डेढ़ साल की सजा हो गई। तब बटकुरी गांव की देवमनिया ने टाना नेतृत्व संभाला और प्रचार करने लगी। रांची, पलामू, हजारीबाग तथा अन्य क्षेत्रों में कोई ढाई लाख लोग टानापंथी बन गए। प्रारंभ में उरांव वर्ग में सादगी, स्वच्छता जैसी सुधारवादी नीयत से काम होने लगा। बाद में महाजन, कुछेक जमींदार और सरकार के विरुद्ध आंदोलन शुरू हो गया। अपने अनुयायियों को मजदूरी करने से रोकने के अपराध में 1916 में जतरा भगत को एक साल की सजा हुई और बाद में उसे इसे शर्त पर छोड़ा गया कि वह अपने नए सिद्धांत का प्रचार नहीं करेगा और शांति बनाए रखेगा। पर, जेल में मिली घोर प्रताड़ना के कारण जेल से बाहर आने के दो महीने के भीतर ही जतरा की मृत्यु हो गई। इस तरह जतरा भगत नेपथ्य में चला गया पर आंदोलन की धार तेज होने लगी। पलामू से लेकर सरगुजा तक यह फैल गया।
   टाना भगतों ने खुद के लिए नियम बनाए। वृहस्पतिवार को हल नहीं जोतने का निश्चय हुआ और इस दिन विश्राम और आपसी मंत्राणा का दिन रखा गया। इसके बाद टाना आंदोलन ने दूसरा ही रूप ले लिया। उन्हांेने खेती करना छोड़ दिया। बारदोली आंदोलन से प्रभावित टाना भगतों ने जमीन टैक्स, चौकीदारी टैक्स आदि देना बंद कर दिया। इसके बाद जमींदारों ने इनकी जमीन नीलाम करवाई।
   हरबंस भगत ने ‘टाना-आंदोलन’ नामक अपने एक लेख में इसके जन्म के कारणांे और आंदोलन की कहानी लिखी है। वे लिखते हैं कि टाना विविध देवताओं की पूजा नहीं करते। टाना अपने व्यक्तित्व तथा समाज में अहिंसक परिवर्तन पर विश्वास करते हैं। वह मानते हैं कि अहिंसक संघर्ष से बाधाएं दूर होती हैं।
                  ‘टाना भगतर सोना भगतर नीसा ओनन मना ननर।
                  टाना भगतर सोना भगतर अहड़ा मोखनन मना ननर।
                  टाना भगतर सोना भगतर अखड़ा बेचनन ननर।’

   यानी, टाना भगत सोने के समान उत्तम भगत है। वे मदिरा नहीं पीते। मांस नहीं खाते। वे नृत्य आदि का त्याग करते हैं। धुमकुरिया और शिकार से खुद को मुक्त किया। रंगीन कपड़ों से परहेज किया। किसी प्रकार का आभूषण भी नहीं पहनते। टाना ईमानदारी के साथ अपना जीवन बिताता है। वह पवित्रा जीवन व्यतीत करता है। गांधी टोपी व सफेद वस्त्रा ही पहनावा है। शंख, घंट, तिरंगा इनकी पहचान है। खाने को लेकर भी ये शुद्धता के आग्रही हैं। ये जहां जाते हैं, खुद बनाते हैं और खाते हैं। पानी तक दूसरों का नहीं पीते। इस परंपरा का पालन ये आज भी कड़ाई से करते हैं।
                     
   टाना भगतों का योगदान देश की आजादी में भी अभूतपूर्व रहा। पर, इन्हें वह सम्मान आज तक नहीं मिला। कुछ ताम्रपत्रा जरूर मिले, लेकिन उनकी जमीन नहीं मिली। इसके लिए ये आज भी अपनी लड़ाई अहिंसात्मक ढंग से जारी रखे हुए हैं। नेहरू से लेकर राहुल गांधी तक ने इसकी कहानी सुनी, वादा किया, लेकिन वादे आज तक पूरे नहीं हो सके। अपने अधिकार और हक की लड़ाई ये आज भी लड़ रहे हैं। शांतिपूर्ण धरना-प्रदर्शन के जरिए सरकार को अपनी बात भी सुनाते हैं, लेकिन सरकार इतनी संवेदनशील होती तो ये 66 सालों से लड़ते ही क्यों? खैर, समाज सुधार के साथ शुरू हुआ टाना भगत का आंदोलन जमींदारों और अंगरेजों के खिलाफ शुरू हो गया। गांधीजी से इनकी 1920 में मुलाकात ऐसी रही कि ये फिर गांधी के ही हो गए और पूर्ण अहिंसक भी। महात्मा गांधी 1920 में असहयोग आंदोलन को लेकर देश का दौरा कर रहे थे। उस दौरान वे रांची भी आए। गांधीजी के आने के बाद ही रांची में जिला कांग्रेस कमेटी का गठन किया गया। डॉ राजेंद्र प्रसाद ने ही टाना भगतों को गांधीजी से मिलवाया। गांधीजी से ये खासे प्रभावित हुए और अहिंसा की बात इनकी जंच गई। ये अपना वस्त्रा खुद चरखे पर बुनने लगे। सफेद कुर्ता और गांधी टोपी इनका डेस कोड हो गया। चरखा छाप तिरंगा इनका भगवान। चंवर व घड़ी घंट इनका संकेत चि बन गया। 1922 के गया कांग्रेस में करीब तीन सौ टाना भगतों ने भाग लिया। ये रांची से पैदल चलकर गया पहुंचे थे। 1940 में रामगढ़ कांग्रेस में इनकी संख्या तो पूछनी ही नहीं थी।
    पांच अक्टूबर, 1926 को रांची में राजेंद्र बाबू के नेतृत्व में आर्य समाज मंदिर में खादी की प्रदर्शनी लगी थी तो टाना भगतों ने इसमें भी भाग लिया। 1934 में महात्मा गांधी हरिजन-उत्थान-आंदोलन के सिलसिले में चार दिनों तक रांची में थे। इस समय भी टाना भगत उनके पास रहते थे। 1927 में साइमन कमीशन के बॉयकाट में टाना भगत भी शामिल थे। सन् 1942 के आंदोलन में तो टाना भगतों ने रांची पहाड़ी पर तिरंगा ही फहरा दिया था। टाना भगतों की जमीन तो अंगरेजी सरकार ने पहले ही नीलाम कर दी थी, फिर भी वे आजादी के आंदोलन से पीछे नहीं हटे, मार खाई, सड़कों पर घसीटे गए, जेल की यातनाएं सही, फिर भी गांधीजी की जय बोलते रहे, अंतिम दम तक। देश जब आजाद हुआ तो टाना भगतांे ने अपनी तुलसी चौरा के पास तिरंगा लहराया, खुशियां मनाईं, भजन गाए। आज भी टाना भगतों के लिए 26 जनवरी, 15 अगस्त व दो अक्टूबर पर्व के समान है। हरवंश भगत ने ‘पंद्रह अगस्त और टाना भगत’ लेख मंे बताया है कि ‘15 अगस्त को टाना भगत पवित्रा त्यौहार के रूप में मनाते हैं। इस दिन टाना भगत किसी प्रकार खेती वारी आदि का काम नहीं करते। प्रातः उठकर ग्राम की साफ-सफाई करते हैं। महिलाएं घर-आंगन की पूरी सफाई करती हैं। स्नानादि के बाद समूह रूप में वे राष्टीय गीत गाकर राष्ट-ध्वज फहराते हैं। अभिवादन करते हैं। स्वतंत्रा भारत की जय, महात्मा गांधी की जय, राजेंद्र बाबू की जय, जवाहर लाल नेहरू की जय तथा सभी टाना भगतों की जय का नारा लगाते हैं। गांव में जुलूस निकालते हैं। प्रसाद वितरण भी करते हैं। अपराह्न आम सभा होती है। सूत काता जाता है और आपस में प्रेम और संगठन को दृढ़ करने की चर्चा होती है।’
   महात्मा गांधी के अहिंसा का प्रभाव टाना भगतों पर कितना था, इसे सिर्फ एक घटना से समझा जा सकता है। सोंधी बरवा टोली, रांची के निवासी थे विश्वामित्रा टाना भगत। वे गांधी के प्रति अटूट श्रद्धा रखते थे। उनकी धारणा थी कि गांधीजीकी अहिंसा का प्रताप जब है, तो सांप हिंसा पर उतारू नहीं हो सकते। और, अपने इसी विश्वास के बल पर उन्हांेने अपने घर में डेढ़ सौ विषधर सांपों को पाल रखा था। वे सांपों को अपने मकान में टोकरी के अंदर रखते थे। इन्होंने आजादी की लड़ाई में भाग लिया और जेल की सजा भी काटी थी। डॉ राजेंद्र प्रसाद के साथ भी जेल में थे। 1961 में काफी वृद्धावस्था में इनका निधन हो गया।
  श्री नारायणजी ने अपने एक लेख ‘महात्मा गांधी और आदिवासी’ में भी इस बात की पुष्टि की है। लिखा है, ‘टाना भगत महात्मा गांधी के अनन्य भक्त बन गए। गांधीजी के आह्वान पर देश की आजादी के वे प्रथम श्रेणी के सिपाही बने। आजादी की लड़ाई में टाना भगतांे ने अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। कितने जेल गए, हजारों की जमीन नीलाम हुई, कितने जेल में खेत आए। स्वराज्य की लड़ाई में अहिंसा का व्रत लेकर जिस प्रकार टाना भगतों के समूह ने आहुति दी, उस प्रकार का उदाहरण भारत में कहीं और नहीं मिलता है। दस हजार परिवार करीब टाना भगतों का है। परिवार के सब के सब व्रतधारी बन गए और स्वराज्य का संवाद सुनने के लिए कांग्रेस अधिवेशन में सम्मिलित होने के लिए सैकड़ों पांव पैदल गया, कानपुर, बेलगांव और कोकोनाडा गए। महात्मा गांधी इनकी अटूट आस्था से मुग्ध थे। वे दिल खोलकर मिलते। जब भेंट होती थी, इनसे गले मिलते थे। गांधीजी इनकी दयनीय दशा देखकर परेशान होते थे।’ उन्होंने आगे लिखा है, ‘महात्मा गांधी की आदत थी कि जब वे देश की किसी समस्या को व्यापक मानते थे, तो उसके हल के लिए पग उठाते थे। आंदोलन खड़ाकर अथवा सरकार का ध्यान आकृष्ट कर ही वे संतुुष्ट नहीं होते थे। अपनी शक्ति भर वे उस समस्या का हल करने के लिए रास्ता निकालते थे। स्वभावतः आदिवासी समस्या को जब देखा तो इसके हल के लिए उन्होंने विशेषकर ठक्कर बापा को उत्साहित किया और उनके इशारे पर ठक्कर बापा के साथ सैकड़ों कार्यकर्ता गुजरात, बिहार, मध्यप्रदेश, उड़ीसा आदि स्थानों मंे, आदिवासियों की सेवा कार्य में जुट गए। इस कार्य के लिए पहली संस्था गुजरात में भील सेवा मंडल बनी। फिर बिहार में आदिम जाति सेवा मंडल की स्थापना हुई। बापू इतने से ही संतुष्ट नहीं हुए। रचनात्मक कार्यकर्ताओं के लिए 14 सूत्राीय कार्यक्रम बना। उसमें भी आदिवासी सेवा को स्थान दिया गया। इस प्रकार यह महात्मा गांधी के प्रयत्न का ही परिणाम है कि आदिवासी समस्या की गणना भारत की समस्याओं में होने लगी। भारत के संविधान में उनको प्रमुख स्थान मिला।’
  श्री छोटानागपुरी ने अपने लेख ‘महात्मा गांधी और टाना भगत’ में बताया कि गांधीजी टाना भगतों के लिए क्या महत्व रखते थे, गांधी के बारे में उनके क्या विचार और आस्था थी, गीतों के माध्यम से इसे रखा है। जैसे तिरंगा, टाना भगतों के लिए महज तीन रंगों का झंडा नहीं था, तिरंगा उनके लिए सत्य, अहिंसा और दया का मंत्रा था। तिरंगा उनके लिए गांधी जी था। हरिवंश टाना भगत ने कुड़ुख में यह गीत लिखा है। यह गीत अब मंत्रा बन गया है...
                ‘तिरंगा झंडा भैरो नम्है राजी गही झंडा,
                तिरंगा झंडा नू, सत, दया अहिंसा, धरमदीस रादस
                तिरंगा झंडा नू, मा गांधीस दीम रादस।

देश की सामाजिक बुराइयों पर भी टाना भगतों ने गीत लिखे। अपने समाज में जागरूकता पैदा की...
              
                भारत छुआछूत नू कलंक मंजकी रहचा
                जाति-रीति गही भेद फैलार ही रहचा...
               प्रिस्थिति गही कारण महात्मा गांधी में ध्यान बरचा
               गीता रामायण नीति याद बरचा
               भारत उद्धार गीता रामायण बरचा
               महात्मा गांधीस कही कर्णधार बनचा
               सत, प्रेम, अहिंसा, राजनीतिक शास्त्रा बनचा
               असहयोग, सत्याग्रह स्वतंत्राता युद्ध गही अस्त्रा बनचा...

भावार्थ है, भारत छुआछूत के भेद से कलंकित हो गया था। जाति-पांति और रीति-नीति का भेदभाव फैला था...। परस्थिति के कारण महात्मा गांधी को ज्ञात हुआ, गीत और रामायण की नीति याद आई। भारत के उद्धारक गीता-रामायण ही हुआ और महात्मा गांधी देश के कर्णधार बने। सत्य, प्रेम, अहिंसा, राजनीतिक शास्त्रा बना और असहयोग सत्याग्रह स्वतंत्राता की लड़ाई अस्त्रा...।
एक गीत और है। इसमें गांधीकी लीला का वर्णन किया..
               गांधी बाबास बड़ा लीला धारेस
               चरेखा ले ले मेरे ओजदस
               अंग्रेज सरकार बड़ा पापी रहचा
               गांधी बाबासीन कैदी नंजा
               कैदी नंजा बरा लाबागे लागिया
               मं गांधीस अंग्रेजन खेचस चिचस...

अर्थ है, महात्मा गांधी बहुत लीला वाले महापुरुष थे। वे चरखा द्वारा सूत काते थे। अंगरेज बहुत आततायी थे। गांधी बाबा को कैद कर लिया था और मारना चाहा था, परंतु अंत में अंगरेज को भागना पड़ा।
             
   गांधी आज भी इनके दिल में बसे हैं

और अहिंसक तरीके से आज भी अपनी जमीन वापसी के लिए लड़ रहे हैं। यह लड़ाई वैसे तो आजादी के तुरंत बाद ही शुरू हो गई थी। सरकार ने इनकी जमीन वापसी की प्रक्रिया भी शुरू कर दी थी, लेकिन बहुतों को जमीन का आज भी इंतजार है। आजादी के तत्काल बाद, 1947 में ही इनकी जमीन वापसी का कानून बना। बिहार राज्य सरकार ने रांची जिला टाना भगत रैयत कृषि  प्रत्यावर्तन अधिनियम पारित किया, जिसके अनुसार सन् 1913 से 1942 तक स्वतंत्राता संग्राम के दौरान लगान नहीं देने पर नीलाम कर दी गई उनकी जमीन वापसी का प्रावधान है। इस अधिनियम के अनुसार प्रारंभ से अब तक का कुल 358 टाना भगतों को कुल 3722.26 एकड़ जमीन वापस की जा चुकी है एवं जमीन पर दखलकार विपक्षियों को कुल 13,05,669 रुपये क्षतिपूर्ति के रूप में भुगतान किया गया है। ‘स्वतंत्राता दिवस विशेषांक, 12 अगस्त, 1976, अंक 28 । उक्त कानून में इनमें कुछ कमियां थीं। यह रांची तक ही सीमित था, जबकि कई अन्य जिलों के टाना भगतों को इससे लाभ नहीं मिलता था। फिर इस कानून को 1961-62 में संशोधित किया गया। 1970 के आदिवासी अंक ‘गणतंत्रा विशेषांक, अंक 50, 22 जनवरी, 1970 में जमीन वापसी के बारे में जानकारी दी गई थी। यह 1968-69 में जो जमीन वापसी की गई थी, उस बारे में जानकारी थी। उस समय कुल 1,200 मुकदमे दायर हुए। 232 परिवारों को लाभ मिला। 7,38,98 रुपये खर्च हुआ। 88 मामले लंबित दिखाया गया और 2,808 एकड़ 80 डिसमिल जमीन वापस की गई।  इसी अंक मंे यह सूचना भी थी कि 1966 में टाना भगत बोर्ड का गठन किया गया, जिसमें 14 टाना भगत इसके सदस्य थे। यह बोर्ड कल्याण विभाग के अधीन था। प्रत्येक महीने इसकी बैठक होने की बात कही गई थी, लेकिन चार-पांच महीने बाद ही बंद कर दी गई।
    ‘12 अगस्त, 1976, अंक 28 के स्वतंत्राता दिवस विशेषांक’ में ही एक टाना भगत पदाधिकारी ने लिखा है कि ‘टाना भगतों को सिर्फ जमीन वापस करा देना ही पर्याप्त नहीं था। इसलिए इनकी जमीन में कृषि की सुविधा प्रदान करने के लिए कल्याण विभाग से मिलने वाली सुविधाओं में भी कृषि अनुदान आदि में बैल एवं बीज आदि के वितरण में इन्हें प्राथमिकता दी जाती है। जमीन वापसी कानून से लाभान्वित टाना भगतों के अतिरिक्त कुछ वैसे टाना भगतों को वर्ष 1972 में सरकारी जमीन दी गई है। कुल 389 टाना भगतों को कुल 827.06 एकड़ जमीन सरकार से बंदोबस्त की गई है। इस प्रकार बंदोबस्त की गई जमीन में अच्छी किस्म की जमीन नहीं रहने पर भूमि कर्षण विभाग से कृषि योग्य बनाने के लिए संपर्क किया जा रहा है।’ इस पदाधिकारी ने यह भी बताया है कि ‘समय-समय पर किए गए सर्वेक्षण के आधार पर ये रांची के सदर अनुमंडल के रमांडर, बुड़मू, बेड़ो, लापुंग, लोहरदगा के कुड़ु, किस्को, लोहरदगा, सेन्हा व गुमला के घाघरा, बिशुनपुर, सिसई, पालकोट, चैनपुर, डुमरी, बसिया आदि क्षेत्रों में बसते हैं। टाना भगत परिवारों की संख्या कुल 2,356 है तथा इनकी जनसंख्या लगभग 13,000 है।’
    जमीन वापसी का संघर्ष आज भी चल रहा है। रह-रहकर टाना भगत राजभवन के समक्ष धरना देते आए हैं। फिर भी इनकी मांग और बात अनसुनी रह जाती है। कई संगठन और कई लोगों ने भी टाना भगतों की मदद की है। संघर्ष का उनका लंबा इतिहास है। इंदिरा गांधी से लेकर राजीव गांधी और राहुल गांधी तक अपनी बात रख चुके हैं। फिर भी इनकी मांग पूरी नहीं हो सकी। टाना भगतों को न्याय दिलाने के लिए परमेशचंद्र सिंह ने अखिल भारतीय टाना विकास परिषद् नामक संस्था का गठन किया था। उन्होंने टाना भगतों को इंदिरा गांधी व राजीव गांधी से मिलवाया। ‘आदिवासी’ के गणतंत्रा दिवस विशेषांक, 1988 अंक, 51-52 में परमेशचंद्र सिंह ने एक लेख लिखा, ‘स्वदेश प्रेमी जन जातीय टाना भगत इतिहास के परिवेश में।’ उन्होंने अपने नेतृत्व में 28 दिसंबर, 1983 को तत्कालीन प्रधानमंत्राी इंदिरा गांधी से कलकत्ता में हो रहे अखिल भारतीय कांग्रेस अधिवेशन में मिलवाया और अपनी बात सुनाई। प्रधानमंत्राी ने इन्हें पूर्ण आश्वासन दिया। यही नहीं, उन्हांेने इनके एक प्रतिनिधि को राज्यसभा में तथा प्रांतीय स्तर पर एक प्रतिनिधि को कौंसिल में भी मनोनीत करने का आश्वासन दिया। इसके बाद 3 जनवरी, 1984 को रांची के मेसरा में अखिल भारतीय विज्ञान कांग्रेस के अधिवेशन के मौके पर भी परमेशचंद्र सिंह ने टाना भगतों को फिर प्रधानमंत्राी इंदिरा गांधी से मिलवाया। पर, इसी साल अक्टूबर में उनकी हत्या कर दी गई और आश्वासन भी उन्हीें के साथ दफन हो गया। पर, टाना भगतों ने हिम्मत नहीं हारी। परमेशचंद्र सिंह ने फिर इन्हें प्रधानमंत्राी राजीव गांधी से मिलवाया। यह दिसंबर 1985 की बात है। टाना भगतों ने राजीव गांधी को सम्मानित कर रस्म पगड़ी और मान पत्रा भेंट किया। प्रधानमंत्राी ने मार्च 1986 में इनकी नीलाम जमीन की वापसी के लिए बिहार के मुख्यमंत्राी बिंदेश्वरी दुबे को आदेश दिया। आदेश के बाद काफी लोगों को जमीनें मिलीं लेकिन फिर भी बहुतेरे टाना भगत आज भी नीलाम जमीन की वापसी के लिए धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं।
                                                  -----
                                                                 

राधाकृष्ण और उनकी ‘मूल्य’

-संजय कृष्ण   हिंदी कथा साहित्य को बहुविध ढंग से समृद्ध करने वाले रांची के राधाकृृष्ण साहित्य की दुनिया में अब अपरिचित नाम हो गए हैं। पुरान...