1917 में पहली बार टाना भगत से मिले गांधी


'गांधी बाबास बड़ा लीला धारेस/ चरेखा ले ले मेरे ओजदस/ अंग्रेज सरकार बड़ा पापी रहचा/ गांधी बाबासीन कैदी नंजा/ कैदी नंजा बरा लाबागे लागिया/ मं गांधीस अंग्रेजन खेचस चिचस...।
यानी, महात्मा गांधी बहुत लीला वाले महापुरुष थे। वे चरखा द्वारा सूत काते थे। अंगरेज बहुत आततायी थे। गांधी बाबा को कैद कर लिया था और मारना चाहा था, परंतु अंत में अंगरेज को भागना पड़ा।
गांधी दुनिया के लिए महान पुरुष होंगे पर झारखंड के लिए वे भगवान हैं। टाना भगत उन्हें भगवान मानते हैं और तिरंगे को भी। 
1917 की घटना है, जब टाना भगत  गांधीजी से मिले। गांधीजी से ये इतने प्रभावित हुए कि पूरा ताना-बाना ही इनका बदल गया।  1922 के गया कांग्रेस में करीब तीन सौ टाना भगतों ने भाग लिया। ये रांची से पैदल चलकर गया पहुंचे थे।
 चार साल बाद, पांच अक्टूबर, 1926 को रांची में राजेंद्र बाबू के नेतृत्व में आर्य समाज मंदिर में खादी की प्रदर्शनी लगी थी तो टाना भगतों ने इसमें भी भाग लिया। 1934 में महात्मा गांधी
मोहनदास करमचंद गांधी रांची में पहली बार 920 में आए थे। असहयोग आंदोलन के सवाल पर वे देश का दौरा कर रहे थे, उसी क्रम में रांची भी आए। इसी साल रांची में जिला कांग्रेस कमेटी का गठन किया गया। गांधीजी जब रांची आए तो यहां उनकी मुलाकात टाना भगतों से हुई। आदिवासियों की स्थिति को देखकर ही उन्होंने कई योजनाएं भी चलाईं। अपने गृह प्रदेश गुजरात में भी उन्होंने 1920 में आदिवासियों की स्थिति देखी थी। वहां पर भील सेवा मंडल की स्थापना की गई। यह देश की पहली संस्था थी, जो सिर्फ आदिवासियों के कल्याण, विकास और बेहतर जीवन निर्माण की दिशा में काम करने के लिए बनी थी। इसके बाद संयुक्त बिहार में 'आदिम जाति सेवा मंडलÓ का गठन रांची में किया गया। इसके बाद दर्जनों संस्थाएं विभिन्न प्रांतों में गठित की गईं। उन्होंने ठक्कर बापा को उत्साहित किया और उनके इशारे पर ठक्कर बापा के साथ सैकड़ों कार्यकर्ता गुजरात, बिहार, मध्यप्रदेश, उड़ीसा आदि स्थानों में, आदिवासियों की सेवा कार्य में जुट गए।
ठक्कर बापा का असली नाम अमृतलाल ठक्कर था। उन्होंने इंजीनियरिंग की शिक्षा प्राप्त की थी और कुछ समय तक रेल विभाग में सहायक अभियंता रहने के बाद पांच साल तक वे पोरबंदर राज्य में मुख्य अभियंता रहे। वर्ष 1913 के अंत में उन्होंने नौकरी से त्यागपत्र दे दिया। बाद में गांधी जी ने उन्हें वंचितों की सेवा में लगा दिया। उस समय उनकी आयु 44 साल थी। इसके बाद वे वंचितों, हरिजनों और आदिवासियों के लिए काम करते रहे।  

वैद्यनाथ की यात्रा

 यह यात्रा विवरण हरिश्चंद्र चन्द्रिका और मोहन चन्द्रिका खं 7, संख्या 4, आषाढ़ शुक्ल एक सम्वत 1937 यानी सन् 1880 में प्रकाशित था। मंदिर के बारे में संस्‍क़त के श्‍लोकों को यहां नहीं दिया गया है। सावन के महीने में इसका महत्‍व कुछ बढ गया है। भारतेंदु ने यह यात्रा काशी नरेश के साथ की थी। उनकी मजेदार भाषा का यहां दर्शन तो होता ही है, मौका मिलने पर अंगरेजी राज को भी कोसना नहीं भूलते। रेल की यह यात्रा काफी रोमांचक भी है।

                                         भारतेंदु हरिश्‍चंद्र                       
श्री मन्महाराज काशीनरेश के साथ वैद्यनाथ की यात्रा को चले। दो बजे दिन के पैसेंजर ट्रेन में सवार  हुए। चारांे ओर हरी हरी घास का फर्श, ऊपर रंग रंग के बादल, गड़हों में पानी भरा हुआ, सक कुछ  सुंदर। मार्ग में श्री महाराज के मुख से अनेक प्रकार के अमृतमय उपदेश सुनते हुए चले जाते थे। सांझ को बक्सर के आगे बड़ा भारी मैदान, पर सब्ज काशानी मखमल से मढ़ा हुआ। सांझ होने से बादल  छोटे छोटे पीले नीले बड़े ही सुहाने मालमू पड़ते थे। बनारस कालिज की रंगीन शीशे की खिड़कियों का सा सामान था। क्रम से अंधकार होने लगा, ठंढी ठंढी हवा से निद्रा देवी अलग नेत्रों से लिपटी जाती थी। मैं महाराज के पास से उठकर सोने के वास्ते दूसरी गाड़ी में चला गया। झपकी का आना था कि     बौछारों ने छेड़छाड़ करनी शुरू कक, पटने पहुंचते-पहुंचते तो घेर घार कर चारों ओर से पानी बरसने ही लगा। बस पृथ्वी आकाश सब नीरब्रह्ममय हो गया। इस धूमधाम में भी रेल, कृष्णाभिसारिका सी   अपनी धुन में चली ही जाती थी। सच है सावन की नदी और दृढ़प्रतिज्ञ उद्योगी और जिनके मन पीतम के पास हैं वे कहीं रुकते हैं? राह में बाज पेड़ों में इतने जुगनू लिपटे हुए थे कि पेड़ सचमुच ‘सर्वे  चिरागां’ बन रहे थे। जहां रेल ठहरती थी, स्टेशन मास्टर और सिपाही बिचारे टुटरू टूं छाता, लालटेन  लिए रोजी जगाते भीगते हुए इधर उधर फिरते दिखाई पड़ते थे। गार्ड अलग ‘मैकिंटाश कवच पहिने’ अप्रतिहत गति से घूमते थे। आगे चलकर एक बड़ा भारी विघ्न हुआ, खास जिस गाड़ी पर श्री महाराज सवार थे, उसके धुरे घिसने से गर्म होकर शिथिल हो गए। वह गाड़ी छोड़ देनी पड़ी। जैसे धूमधाम से अंधेरी, वैसी ही जोर शोर का पानी। इधर तो यह आफत, उधर फरऊन क्या फरऊन के भी बाबाजान  रेलवालों को जल्दी, गाड़ी कभी आगे हटै, कभी पीछे। खैर, किसी तरह सब ठीक हुआ। इस पर भी बहुतसा असबाब और कुछ लोग पीछे छूट गए। अब आगे आगे बढ़ते तो सबेरा ही होने लगा। निद्रा वधू का संयोग भाग्य में न लिखा था, न हुआ। एक तो सेकंेड क्लास की एक ही गाड़ी, उसमें भी लेडीज कंपार्टमेंट निकल गया, बाकी जो कुछ बचा उसमें बारह आदमी। गाड़ी भी ऐसी टूटी फूटी, जैसी हिदंुओं की किस्मत और हिम्मत। इस कम्बख्त गाड़ी से और तीसरे दर्जे की गाड़ी से कोई फर्क नहीं, सिर्फ एक ही धोके की टट्टी का शीशा खिड़कियों में लगा था। न चैड़े बेंच न गद्दा न बाथरूम। जो लोग मामूली से तिगुना रुपया देें उनको ऐसी मनहूस गाड़ी पर बिठलाना, जिसमें कोई बात भी आराम की न हो, रेलवे कंपनी की सिर्फ बेइंसाफी ही नहीं, वरन धोखा देना है। क्यों नहीं ऐसी गाडि़यों को आग लगाकर जला देती। कलकत्ते में नीलाम कर देती। अगर मारे मोह के न छोड़ी जाए तो उसमें तीसरे दर्जे का काम ले। नाहक अपने गाहकों को बेवकूफ बनाने से क्या हासिल। लेडीज कंपार्टमेंट खाली था, मैंने गार्ड से कितना कहा कि इसमें सोने दो, न माना। और दानापुर से दोचार नीम अंगरेज (लेडी नहीं सि। लैड) मिले। उनको बेतकल्लुफ उसमें बैठा दिया। फस्र्ट क्लास की सिर्फ दो गाड़ी-एक में महाराज, दूसरी में आधी लेडीज, आधी में अंगरेज। अब कहां सोवैं कि नींद आवै। सचमुच अब तो तपस्या करके गोरी गोरी कोख से जन्म लें तब संसार में सुख मिलै। मैं तो ज्यों ही फस्र्ट क्लास में अंगरेज कम हुए कि सोने की लालच से उसमें घुसा। हाथ फैलाना था कि गाड़ी टूटने वाला विघ्न हुआ। महाराज के इस गाड़ी में आने से फिर मैं वहीं का वहीं। खैर इसी सात पांच में रात कट गई। बादल के परदों को फाड़ फाड़कर ऊषा देवी ने ताकझांक आरंभ कर दी। परलोकगत सज्जनों की कीर्ति की भांति सूय नारायण काप्रकाश पिशुन मेघों के वागाडंबर से घिरा हुआ दिखलाई पड़ने लगा। प्रकृति का नाम काली से सरस्वती हुआ, ठंढी ठंढी हवा मन की कली खिलाती हुई बहने लगी। दूर से धनी और काही रंग के पर्वतों पर सुनहरापन आ चला। कहीं आधे पर्वत बादलों से घिरे हुए, कहीं एक साथ वाष्प निकलने से चोटियां छिपी हुईं और कहीं चारों ओर से उनपर जलधारा पात से बुक्के की होली खेलते हुए बड़े ही सुहाने मालूम पड़ते थे। पास से देखने से भी पहाड़ बहुत ही भले दिखलाई पड़ते थे। काले पत्थरों पर हरी हरी घास और जहां तहां छोटे बड़े पेड़, बीच बीच में मोटे पतले झरने, नदियों की लकीरें, कहीं चारों ओर सघन हरियाली, कहीं चट्टानांे पर ऊंचे नीचे अनगढ़ ढोंके और कहीं जलपूर्ण हरित तराई विचित्रा शोभा देती थी। अच्छी तरह प्रकाश होते होते तो वैद्यनाथ के स्टेशन पर पहंुच गए। स्टेशन से वैद्यनाथ जी कोई तीन कोस हैं।  बीच में एक नदी उतरनी पड़ती है जो आजकल बरसात में कभी घटती और कभी बढ़ती है। रास्ता पहाड़ के ऊपर ही ऊपर बरसात से बहुत सुहावना हो रहा है। पालकी पर हिलते हिलते चले। श्रीमहाराज के सोचने के अनुसार कहारों की गतिध्वनि में भी परदेश की ही चर्चा है। पहले ‘कोह कोह’ की ध्वनि सुनाई पड़ती है फिर ‘सोह सोह’ की एकाकार पुकार मार्ग में भी उसमें तन्मय किए देती थी। मुसाफिरों को अनुभव होगा कि रेल पर सोने से नाक थर्राती है और वही दशा कभी कभी सवारियों पर होती है। इससे मुझे पालकी पर भी नींद नहीं आई और जैसे तैसे बैजनाथ जी पहुंच ही गए।
       बैजनाथ जी एक गांव है, जो अच्छी तरह आबाद है। मजिस्ट्रेट, मुनसिफ वगैरह हाकिम और जरूरी सब आफिस हैं। नीचा और तर होने से देश बातुल गंदा और ‘गंधद्वारा’ है। लोग काले काले और हतोत्साह मूर्ख और गरीब हैं। यहां सौंथाल एक जंगली जाति होती है। ये लोग अब तक निरे वहशी हैं। खाने पीने की जरूरी चीजें यहां मिल जाती हैं। सर्प विशेष हैं। राम जी की घोड़ी जिनको कुछ लोग ग्वालिन कहते भी कहते हैं एक बालिश्त लंबी और दो दो उंगल मोटी देखने में आईं।
      मंदिर वैद्यनाथ जी का टोप की तरह बहुंत ऊंचा शिखरदार है। चारांे ओर देवताओं के मंदिर और बीच में फर्श है। मंदिर भीतर से अंधेरा है क्योंकि सिर्फ एक दरवाजा है। बैजनाथ जी की पिंडी जलधरी से तीन चार अंगल ऊंची बीच में से चिपटी है। कहते हैं कि रावण ने मूका मारा है इससे यह गड़हा पड़ गया है। वैद्यनाथ बैजनाथ और रावणेश्वर यह तीन नाम महादेवजी के हैं। यह सिद्धपीठ और ज्योतिर्लिंग स्थान है। हरिद्रापीठ इसका नाम है और सती का हृदयदेश यहां गिरा है। जो पार्वती अरोगा और दुर्गा नाम की सामने एक देवी हैं वही यहां की मुख्य शक्ति हैं। इनके मंदिर एवं महादेव जी के मंदिर से गांठ जोड़ी रहती है रात को महादेव जी के ऊपर बेलपत्रा का बहुत लंबा चैड़ा एक ढेर करके ऊपर से कम खाब या ताश का खोल चढ़ाकर शृंगार करते हैं या बेलपत्रा के ऊपर से बहुत सी माला पहना देते हैं सिर के गड़हे में भी रात को चंदन भर देते हैं।
   वैद्यनाथ की कथा यह है कि एक बेर पार्वतीजी ने मान किया था और रावण के शोर करने से वह मान छूट गया। इस महादेव जी ने प्रसन्न होकर वर दिया कि हम लंका चलंेगे और लिंग रूप से उसके साथ चले। राहमें जब बैजनाथ जी पहुंचे तब ब्राह्मण रूपी विष्णु के हाथ में वह लिंग देकर पेशाब करने लगा। कई घड़ी तक माया मोहित होकर वह मूतता ही रह गया और घबड़ाकर विष्णु ने उस लिंग को वहीं रख दिया। रावण का महादेव जी से यह करार था कि जहां रख दोगे वहां से आगे न चलेंगे। इससे महादेव जी वहां रह गए वरंच इसी पर खफा होकर रावणने उनको मूका भी मार दिया।
   वैद्यनाथ जी मंदिर राजा पूरणमल्ल का बनाया हुआ है। लोग कहते हैं कि रघुनाथ ओझा नामक एक तपस्वी इसी वन में रहते थे। उनको स्वप्न हुआ कि हमारी एक छोटी सी मढ़ी झाडि़यों में छिपी है तुम उसका एक बड़ा मंदिर बनाओ। उसी स्वप्न के अनुसार किसी वृक्ष के नीचे उनको तीन लाख रुपया मिला। उन्हांेने राजा पूरणमल को वह रुपया दिया कि वे अपने प्रबंध में मंदिर बनवा दें। वे बादशाह के काम से कहीं चले गए और कई बरस तक न लौटें, तब रघुनाथ ओझा ने दुखित होकर अपने व्यय से मंदिर बनवाया। जब पूरणमल लौटकर आए और मंदिर बना देखा तो सभा मंडप बनवाकर मंदिर के द्वार पर अपनी प्रशस्ति लिखकर चले गए। यह देखकर रघुनाथ ओझा ने दुखित होकर कि रुपया भी गया कीर्ति भी गई, एक नई प्रशस्ति बनाई और बाहर के दरवाजे खुदवाकर लगा दी। वैद्यनाथ महात्म्य से मालूम होता है कि इन्हीं महात्मा का बनाया हुआ है क्योंकि उसमें छिपाकर रघुनाथ ओझा को श्रीरामचंद्र जी का अवतार लिखा है। प्रशस्ति का काव्य भी उत्तम नहीं है जिससे बोध होता है कि ओझा जी श्रद्धालु थे किंतु उद्वत पंडित नहीं थे। गिद्धौर के महाराज सर जयमंगलसिं के सीएसआइ कहते हैं कि पूरणमल उनके पुरखा थे। एक विचित्रा बात यहां और भी लिखने योग है। गोवर्धन पर श्रीनाथ जी का मंदिर सं 1556 में एक राजा पूरणमल्ल ने बनाया और यहां संवत् 1652 सन् 1595 ई मेंएक पूरणमल्ल ने वैद्यनाथ जी का मंदिर बनाया। क्या यह मंदिरों का काम पूरणमल्ल ही हो परमेश्वर को सौंपा है?
               निज मंदिर का लेख
अचल शशिशायके लसित भूमि शकाब्दके।
         वलति रघुनाथके वहल पूजक श्रद्धया।।
विमल गुण चेतसा नृपति पूणेनाचितं।
          त्रिपुरहरमंदिरं व्यरचि सर्वकामप्रदम्।।
                     नृपतिकृत पद्यमिदम्।।

    मंदिर के चारों ओर देवताओं के मंदिर हैं। कहीं प्राचीन जैन मूर्तियां हिंदू मूर्ति बनकर पूजती हैं एक पद्मावती देवी की मूर्ति बड़ी सुंदर है जो सूर्य नारायण के नाम से पुजती है। यह मूर्ति पद्म पर बैठी है और वे बड़ी सुंदर कमल की लता दोनों ओर बनी है। इस पर अत्यंत प्राचीन पाली अक्षर में कुछ लिखा है जो मैंने श्री बाबू राजेंद्रलाल के पास पढ़ने को भेजा है। दो भैरव की मूर्ति, जिससे एक तो किसी जैन सिद्ध की और एक जैन क्षेत्रापाल की है, बड़ी ही सुंदर है लोग कहते हैं कि भागलपुर जिले में किसी तालाब में से निकली थी।
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नजरबंदी में भी रांची में जोश भरा था मौलाना ने

संजय कृष्ण, रांची
आजादी के एक प्रमुख सिपाही हिंदू-मुसलिम एकता के संबल मौलाना अबुल कलाम आजाद (11 नवंबर, 1888-22 फरवरी 1958) जब रांची से प्रकाशित साप्ताहिक पत्रिका 'आदिवासीÓ (वर्ष 18, अंक 28, 15 अगस्त, 1964) के एक अंक में समरुल हक ने 'आवाज गूंजती हैÓ नामक लेख में लिखा है कि 'रांची के बुजुर्ग जब मौलाना को देखते थे तो उन्हें विश्वास ही नहीं होता था कि इतनी कम उम्र का नौजवान इतना बड़ा साहित्यकार, ओजस्वी वक्ता और ब्रिटिश सरकार के लिए इतना भयानक हो सकता है। रांची में नजरबंद रहते हुए भी मौलाना आजाद की राजनीतिक और सामाजिक सरगर्मियां ठंडी नहीं पड़ी थी।Óमौलाना केवल तकरीर ही नहीं करते थे। लोगों में आजादी का जोश ही नहीं भरते थे। शिक्षा को लेकर अपनी चिंता को भी यहां परवाना चढ़ाया और कई संस्थाओं की नींव डाली। अगस्त, 1917 में उन्होंने अंजुमन इस्लामिया, रांची तथा मदरसा इस्लामिया की नींव डाली। ये दोनों आज भी हैं और उनकी स्मृतियों की गवाही देती हैं।
समरुल हक ने लिखा है कि जुमे की नमाज के बाद मसजिद में हिंदू भी मौलाना का भाषण सुनने के लिए आते थे। रांची के कुछ मुसलमानों ने विरोध प्रकट किया कि ये लोग मस्जिद में क्यों आ जाते हैं? उन लोगों की आपत्ति सुनकर मौलाना ने 'जामिल सवाहिदÓ नाम की किताब लिखी। यह हिंदू मुस्लिम एकता की बेजोड़ पुस्तक मानी जाती है।
रांची के गजनफर मिर्जा, मोहम्मद अली, डा. पूर्णचंद्र मित्र, देवकीनंदन प्रसाद, गुलाब नारायण तिवारी, नागरमल मोदी, रंगलाल जालान, रामचंद्र सहाय आदि उनसे अक्सर मिलते-जुलते रहते थे और आजादी पर चर्चा करते थे।
कहा जाता है कि 1919 में रांची के गौरक्षणी में हिंदू मुसलमानों की इतनी बेजोड़ सभा हुई कि इतनी भीड़ रांची  ने इसके पहले नहीं देखी थी। उस समय खिलाफत और असहयोग आंदोलन के बारे में ओज और तेज से भरी वक्तृताएं हुईं। मौलाना उस समय नजरबंद थे और सभा में जा नहीं सकते थे, फिर भी सारी प्रेरणा उनकी ही थी। सन 1919 में मौलाना की नजरबंदी से मुक्त हुए। उसके बाद वे रांची में गोशाला के गोपाष्टमी मेला के दिन अपना अंतिम भाषण देकर रांची से चले गए। उस दिन रांची गोशाला में हिंदू-मुसलमानों की इतनी सम्मिलित भीड़ थी, जैसा रांची के इतिहास में पहले कभी भीड़ नहीं जुटी थी। उनके जाने के बाद 1920 में यहां कांग्रेस का गठन हुआ। इसी साल गांधी भी रांची आए और लोगों से आंदोलन में भाग लेने की अपील की। इसके बाद तो कई बार गांधी आए और फिर रांची भी आजादी के दीवानों का एक प्रमुख केंद्र बन गया। 
रांची में नजरबंद थे तब भी आजादी का तकरीर करने से नहीं चूकते थे। कम से कम जुमे की नमाज के बाद तो उनकी तकरीर होती ही थी। वे आजादी का जोश भरते। उनकी तकरीर सुनने के लिए हिंदू भी मस्जिदों जाते थे। वे रांची में अप्रैल 1916 से 27 दिसंबर, 1919 तक रहे और आजादी के आंदोलन को परिपक्वता प्रदान की।

आजादी की मुनादी और वो रात

संजय कृष्ण, रांची
अगस्त का महीना था। 1947 का साल। राजनीतिक वातावरण काफी विषाक्त हो गया था। तरह-तरह की अफवाहें हवा में तैर रही थीं। मेरी उम्र उस समय 18 साल थी। एक रात घर में हम लोग आराम से सोए थे कि पटाखे छूटने लगे। गलियों-सड़कों से होती हुई खबर घर में भी दाखिल हुई, 'पाकिस्तान बन गया।Ó
मुल्तान के पास बहावलपुर स्टेट था। उस स्टेट में एक गांव था कायमपुर। उस गांव के हम वाशिंदे थे। गांव में 85 प्रतिशत आबादी मुसलमानों की थी और 15 प्रतिशत हम लोगों की।
रातू रोड, कृष्णापुरी गुरुद्वारे में प्लास्टिक की कुर्सी पर अपनी छड़ी के साथ बैठे आपबीती सुनाते ऋषिकेश गिरधर की आंखें रह-रहकर सजल हो उठती हैं। कहते हैं, पाकिस्तान बनने की खबर जैसे ही आई, दंगे शुरू हो गए। इन दंगों में अफवाहों ने बड़ी भूमिका निभाई। 14 अगस्त की रात तो इतनी स्याह थी कि कभी वैसी रात देखी ही नहीं। दंगों की खबरें आती तो पूरा शरीर कांप जाता। लगता, मौत अब सामने खड़ी है। 
किसी तरह गांव के सभी लोग गुरुद्वारे में जमा हो गए। बच्चे, बूढ़े, महिलाएं सभी। गुरुद्वारे की खिड़कियां और दरवाजों को मजबूती से बंद कर दिया गया। मेरे बहनोई बालकृष्ण दो बजे रात को लालटेन लेकर ऊपर चढ़े देखने के लिए। तभी एक गोली की आवाज सुनाई दी। दंगाइयों ने उन्हें गोली मार दी। वे छत पर ही ढेर हो गए। हम लोग कुल पंद्रह सौ के करीब थे। घरों को लूटने की खबर आई। खेतों को आग के हवाले कर दिया गया। अब सवाल बहू-बेटियों का था। बुजुर्गों ने बड़ा कठोर फैसला लिया...गुरुद्वारे में ही उन्हें आग के हवाले कर दिया जाए ताकि अपने सामने इन्हें बेआबरू होते न देख सकें। इस प्रस्ताव की खबर गुरुद्वारे से बाहर जा पहुंची। भीड़ में मुसलमानों के एक पीर थे अब्दुल्ला शाह। उन्हें इसका पता चला तो खबर भिजवाई, ऐसा मत करिए।
गिरधर की आंखों में आंसू आ गए। आंसू पोछने के बाद फिर बताते हैं, पीर ने खबर भिजवाई अपने डेरे चलने के लिए। अब माहौल ऐसा था कि उनकी बात पर विश्वास किया जाए या नहीं? खैर, अंतत: चांस लिया गया। जितने लोग थे, अपने गहने मुसलमानों को हवाले करते जाते और फिर उनके साथ चल दिए। दस दिन उनके डेरे पर रहा गया। फिर एक दिन पांच सौ के करीब मुसलमान गांवों से पहुंच गए और कहने लगे कि ये मुसलमान बन जाएंगे तो इन्हें छोड़ देंगे। कुछ तैयार भी हो गए, पर ऐसी नौबत ही नहीं आई। वाहे गुरु ने सुन ली। उसी रास्ते से एक अंग्रेज आफिसर जा रहे थे फोर्स के साथ। आगे एक गांव में भारी तबाही मची थी। जब हम लोगों को पता चला तो रास्ते में हम लोगों ने उन्हें रोक लिया। कहानी सुन उनका दिल पसीजा। उन्होंने ऊपर के अधिकारियों से बात की। हमारी गिनती हुई और हमें मिलिट्री वालों को सुपुर्द कर दिया गया। इसके बाद दोनों देश के बीच बातचीत हुई। तय हुआ कि एक ट्रेन पाकिस्तान से जाएगी और एक हिंदुस्तान से। इस तरह 26 सितंबर को वहां से हम लोग ट्रेन से चले और 28 को राजस्थान के बार्डर पर जो अंतिम स्टेशन था, हिंदू मलकोट वहां उतरे। हिंदू मलकोट से पांच मील पहले ही एक दरिया के पुल पर हमें फिर दंगाइयों ने घेर लिया। पर, मिलिट्री के कारण हम सुरक्षित भारत की सीमा में दाखिल हो गए। स्टेशन पर रांची से आए फिरायालाल, जीव लाल, गोपालदास मुंजाल, शिवदयाल छाबड़ा आदि स्वागत के लिए खड़े थे। ये लोग भी हमारे गांव के ही थे, पर व्यापार के सिलसिले में सत्तर-अस्सी साल पहले इनका परिवार यहीं का हो गया था। हिंदू मलकोट से लोग बिखर गए। सौ-डेढ़ सौ लोग रांची आए। मैं, माता-पिता और भाई सभी यहीं आए। चार लोग आए थे और आज चौवन लोग हैं। केंद्र और बिहार की सरकार ने इनलोगों की खूब मदद की। गिरधर बताते हैं कि पीर का पत्र आते रहा कि आप अपना सामान ले जाइए। उनके पास आते समय काफी सोना रख आए थे। पर, फिर वहां जा नहीं सके। कहते हैं, आजादी की वह काली रात आज भी सिहरन पैदा कर जाती है।       

आजादी की लड़ाई में गंवा दी अपनी जमीन

मोहनदास करमचंद गांधी पहले नेता थे, जिन्होंने आजादी के आंदोलन की शुरुआत करने से पहले पूरा देश का भ्रमण किया। इसके बाद उन्होंने अपनी रणनीति बनाई। मैदानी इलाकों से एकदम अलग-थलग रहने वाले रांची की पठार पर भी उनके कदम पड़े। यह वाकया 1920 का है। असहयोग आंदोलन शुरू हो गया था। वे देश का दौरा कर रहे थे। इसी क्रम में वे रांची भी आए। गांधीजी जब रांची आए तो यहां उनकी मुलाकात टाना भगतों से हुई। इसका श्रेय डा. राजेंद्र प्रसाद को जाता है। टाना भगत भी छह साल पहले ही अस्तित्व में आए थे। वे गांधी के व्यक्तित्व से इस कदर प्रभावित हुए कि फिर गांधी के ही होकर ही रह गए।
श्री नारायणजी ने 'आदिवासीÓ के  गांधी अंक, 2 अक्टूबर, 1969 में लिखा है, 'टाना भगत महात्मा गांधी के अनन्य भक्त बन गए। आजादी की लड़ाई में टाना भगतों ने अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। कितने जेल गए, हजारों की जमीन नीलाम हुई, कितने जेल में खेत आए। स्वराज्य का संवाद सुनने के लिए कांग्रेस अधिवेशन में सम्मिलित होने के लिए सैकड़ों पांव पैदल गया, कानपुर, बेलगांव और कोकोनाडा गए।
1922 के गया कांग्रेस में करीब तीन सौ टाना भगतों ने भाग लिया। ये रांची से पैदल चलकर गया पहुंचे थे। 1940 में रामगढ़ कांग्रेस में इनकी संख्या तो पूछनी ही नहीं थी।
  पांच अक्टूबर, 1926 को रांची में राजेंद्र बाबू के नेतृत्व में आर्य समाज मंदिर में खादी की प्रदर्शनी लगी थी तो टाना भगतों ने इसमें भी भाग लिया। 1934 में महात्मा गांधी हरिजन-उत्थान-आंदोलन के सिलसिले में चार दिनों तक रांची में थे। इस समय भी टाना भगत उनके पास रहते थे। साइमन कमीशन के बॉयकाट में टाना भगत भी शामिल थे। टाना भगतों की जमीन तो अंगरेजी सरकार ने पहले ही नीलाम कर दी थी, फिर भी वे आजादी के आंदोलन से पीछे नहीं हटे, मार खाई, सड़कों पर घसीटे गए, जेल की यातनाएं सही, फिर भी गांधीजी की जय बोलते रहे, अंतिम दम तक। देश जब आजाद हुआ तो टाना भगतों ने अपनी तुलसी चैरा के पास तिरंगा लहराया, खुशियां मनाईं, भजन गाए। आज भी टाना भगतों के लिए 26 जनवरी, 15 अगस्त व दो अक्टूबर पर्व के समान है। हरवंश भगत ने 'पंद्रह अगस्त और टाना भगतÓ लेख में बताया है कि '15 अगस्त को टाना भगत पवित्र त्यौहार के रूप में मनाते हैं। इस दिन टाना भगत किसी प्रकार खेतीबाड़ी आदि का काम नहीं करते। प्रात: उठकर ग्राम की साफ-सफाई करते हैं। महिलाएं घर-आंगन की पूरी सफाई करती हैं। स्नानादि के बाद समूह रूप में वे राष्ट्रीय गीत गाकर राष्ट्र-ध्वज फहराते हैं। अभिवादन करते हैं। स्वतंत्र भारत की जय, महात्मा गांधी की जय, राजेंद्र बाबू की जय, जवाहर लाल नेहरू की जय तथा सभी टाना भगतों की जय का नारा लगाते हैं। गांव में जुलूस निकालते हैं। प्रसाद वितरण भी करते हैं। अपराह्न आम सभा होती है। सूत काता जाता है और आपस में प्रेम और संगठन को दृढ़ करने की चर्चा होती है।Ó पर, आजादी के ये अहिंसक सिपाही आज भी अपनी जमीन वापसी के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

काशी नरेश संग की थी भारतेंदु ने बाबा धाम की यात्रा


आज से सावन चढ़ गया। बाबा धाम की यात्रा भी प्रारंभ हो चुकी है। एक यात्रा हिंदी के युग निर्माता भारतेंदु हरिश्चंद्र ने भी काशी नरेश के संग की थी, जिसका पूरा विवरण 1880 में हरिश्चंद्र चंद्रिका और मोहन चंद्रिका में छपा था।
भारतेंदु की यात्रा दिन के दो बजे बनारस से ट्रेन द्वारा शुरू हुई। सांझ हुई तो बक्सर पहुंचे। आगे बढ़ तो एक बड़ा विघ्न हुआ। जिस गाड़ी पर महाराज सवार थे, उसके धुरे घिसने से गर्म होकर शिथिल हो गए। भारतेंदु लिखते हैं, 'वह गाड़ी छोड़ देनी पड़ी। इधर तो यह आफत, उधर फरऊन क्या फरऊन के भी बाबाजान रेलवालों को जल्दी, गाड़ी कभी आगे हटै, कभी पीछे। खैर, किसी तरह सब ठीक हुआ।Ó...'अब आगे बढ़ते-बढ़ते सबेरा ही होने लगा। निद्र वधू का संयोग भाग्य में न लिखा था, न हुआ। एक तो सेंकेड क्लास की एक ही गाड़ी, उसमें भी लेडिज कंपार्टमेंट निकल गया, बाकी जो कुछ बचा उसमें बारह आदमी। गाड़ी भी ऐसी टूटी फूटी, जैसी हिंदुओं की किस्मत और हिम्मत।Ó
कैसी रेल थी, क्या व्यवस्था था, इस पर भी भारतेंदु तंज कसते हुए लिखते हैं, 'इस कम्बख्त गाड़ी से और तीसरे दर्जे की गाड़ी से कोई फर्क नहीं, सिर्फ एक धोके की टट्टी का शीशा खिड़कियों में लगा था। न चौड़े बेंच न गद्दा, न बाथरूम। जो लोग मामूली से तिगुना रुपया दें, उनको ऐसी मनहूस गाड़ी पर बिठलाना, जिसमें कोई बात भी आराम की न हो, रेलवे कंपनी की सिर्फ बेइंसाफी ही नहीं वरन धोखा देना है। क्यों नहीं ऐसी गाडिय़ों को आग लगाकर जला देती।Ó
अंगरेज किस तरह अपने लोगों के साथ पक्षपात करते थे। इसकी भी बानगी देखिए...'लेडीज कंपार्टमेंट खाली था, मैंने गार्ड से कितना कहा कि इसमें सोने दें, न माना। और दानापुर से दो चार नीम अंगरेज (लेडी नहीं सिफै लैड)मिले। उनको बेतकल्लुफ उसमें बैठा दिया। फस्र्ट क्लास की सिर्फ दो गाड़ी-एक में महाराज, दूसरी में आधी लेडीज, आधी में अंगरेज। अब कहां सौवें कि नींद आवै।Ó खैर, किसी तरह भारतेंदु और काशी नरेश बैजनाथ धाम पहुंचे।
यहां पहुंचकर भारतेंदु ने बैजनाथ गांव का खाका खींचा है, 'बैजनाथ जी एक गांव है, जो अच्छी तरह आबाद है। ...लोग काले-काले और हतोत्साह व गरीब हैं। यहां सौंथाल (संताल) एक जंगली जाति होती है। खाने-पीने की जरूरी चीजें यहां मिल जाती हैं।Ó इसके बाद बैजनाथ की कहानी का वर्णन है। रावण प्रसंग, किसने मंदिर को बनवाया, निज मंदिर के लेख, सभा मंडप के लेख को दिया गया है। अंत में लिखा है, 'कहीं जैन मूर्तियां हिंदू मूर्ति बनकर पूजती हैं। दो भैरव की मूर्ति, जिससे एक तो किसी जैन सिद्ध की और एक जैन क्षेत्रपाल की है, बड़ी ही सुंदर है। लोग कहते हैं कि भागलपुर के किसी तालाब से निकली थी।Ó

किसे याद है काजी का गांव


संजय कृष्ण
क्रांतिधर्मी और विद्रोही कवि काजी नजरूल इस्लाम का गांव चुरुलिया आज भी वही हैं, जहां वह एक शताब्दी पहले था। पं. बंगाल के आसनसोल सब डिविजन में पडऩे वाले इस ऐतिहासिक गांव में जो भी आया, घोषणाएं की, लेकिन पूरा किसी ने नहीं किया। सीएम से लेकर पीएम तक ने। काजी के परिवार वाले अपने स्तर से ही संग्रहालय, नजरूल अकादमी और हर साल उनके जन्मदिन पर सात दिवसीय मेले सहित अन्य कार्यक्रम आयोजित करते आ रहे हैं। ताज्जुब तो तब होता है, जब जनता की दुहाई देने प. बंगाल पर लंबे समय तक शासन करने वाली वाम मोर्चा की सरकार ने भी कोई सुधि नहीं ली। नजरूल के नाम पर एक ईंट भी उसने नहीं रखी। जबकि नजरूल वह पहले कवि हैं, जिन्होंने कलकत्ता में साम्यवाद की नींव रखी थी। स्वतंत्रता-समानता की पूरजोर वकालत की थी। अपने समय के महान कहलाने वाले कवियों की तरह वे अंग्रेजों का गुणगान नहीं किए, उसके राज की खिलाफत की और जेल भी गए। ऐसा कवि वाममोर्चा सरकार के लिए भी अछूत ही रहा।
जब ममता बनर्जी सत्ता में आईं तो पांच मई, 2011 को उनके नाम पर विश्वविद्यालय खोलने की घोषणा कर गईं। कहा कि नजरूल के गांव चुरुलिया में ही उनके नाम पर विश्वविद्यालय बनेगा। पता नहीं, क्या हुआ और किसने उन्हें समझा दिया कि पिछले साल उन्होंने घोषणा कर दी कि यह उनके गांव नहीं, आसनसोल में बनेगा। उन्होंने बिना सोचे-समझे यह घोषणा भी कर दी कि चुरुलिया में जमीन नहीं है। अब सवाल है, जब गांव में जमीन नहीं है तो शहर में कैसे जमीन उपलब्ध होगी? पर इसके पीछे हकीकत कुछ और ही है।
काजी नजरूल के भतीजे और नजरूल अकादमी के महासचिव काजी मोजाहर हुसैन बताते हैं कि चुरुलिया में जमीन की कोई कमी नहीं थी। यहां पर हम लोगों ने एक सौ पचास बीघे जमीन की व्यवस्था की थी। उसका पूरा नक्शा भी बना लिया था। जरूरत पड़ती तो और भी जमीन दी जाती। लेकिन सरकार ने चुरुलिया के ग्रामीणों की एक न सुनी और तीन जुलाई, 2012 को बिल भी पास हो गया। मोजाहर कहते हैं कि आसनसोल में जहां विश्वविद्यालय बन रहा है, वहां नाला बहता है, कुष्ठ रोगियों का अस्पताल है। कई अन्य चीजें भी हैं, जो शिक्षा के अनुकूल नहीं है। पर, किसके बहकावे में उन्होंने ऐसा किया है, यह तो वही जानें।
खैर, ममता बनर्जी ने काजी पर इतना ही एहसान नहीं किया। पिछले साल से उन्होंने मेले में सरकारी फंड को भी बंद कर दिया है। हर साल नजरूल की जयंती पर चुरुलिया में एक सप्ताह का सांस्कृतिक मेला लगता है। इस बार भी 26 मई से एक जून तक लगने वाला है। पहले प. बंगाल की सरकार पंद्रह हजार देती थी, कुछ सालों से यह रकम बढ़ाकर साठ हजार कर दी गई थी। पर, ममता की मेहरबानी से यह छोटी सी रकम भी बंद हो गई। हालांकि इस छोटी रकम से कुछ होता नहीं है, लेकिन सरकार की मंशा का पता चलता है।
नजरूल अकादमी के सहायक सचिव सुप्रियो काजी कहते हैं कि इस सप्ताहव्यापी कार्यक्रम में बंगलादेश से लेकर असम, राजस्थान, उड़ीसा आदि से कलाकार आते हैं। इनके आने-जाने में ही सात-आठ लाख खर्च हो जाते हैं। फिर उनके रहने, खाने और पारिश्रमिक को जोड़ दें तो खर्च का अंदाजा लगा सकते हैं। इस बार बंगलादेश से काजी नजरूल इस्लाम की नतिनी खिलखिल काजी भी अपने गांव आ रही हैं।
 काजी मोजाहर हुसैन बताते हैं कि मेले का आयोजन 35 सालों से किया जा रहा है। यह सब यहां की जनता के सहयोग से। इन आयोजनों के अलावा कई सामाजिक काम भी अकादमी करती है। 19 जनवरी को स्वास्थ्य कैंप लगाया गया, जिसमें 30 डाक्टरों की टीम ने 2900 लोगों के स्वास्थ्य की जांच की और एक लाख तिहत्तर हजार की दवाएं दी गईं। फिर भी प. बंगाल सरकार ने इस गांव पर कोई मेहरबानी नहीं की।
पिछले साल काजी की जयंती पर चुरुलिया तक रेल चलाने की घोषणा की गई, लेकिन एक ईंट भी नहीं बिछी। घोषणाएं तो और भी हैं। जब देश के पीएम अटल बिहारी वाजपेयी थे, तो कवि के गांव 1999 में आए थे। उन्होंने नजरूल अकादमी को एक करोड़ 25 लाख रुपये देने की घोषणा की। आज तक एक पाई भी नहीं मिली। 1958 से यह अकादमी कार्यरत है। अपने बूते ही वह एक संग्रहालय बनाए हुए हैं, जिसमें कवि की कुछ पांडुलिपियां, दुर्लभ तस्वीरें, उनका बेड, तानपुरा, ग्रामोफोन आदि रखे हुए हैं। परिवार की बनिस्पत ही चीजें बची हुई हैं। परिवार ने ही उनकी समाधि बनाई। कीर्ति स्तंभ बनाया। काजी की पत्नी प्रमिला काजी की इच्छानुसार उन्हें गांव में ही दफनाया गया। उनकी दूसरी इच्छा थी कि उनकी बगल में ही काजी को भी दफनाया जाए। लेकिन केंद्र सरकार और बंगाल सरकार के रवैये के कारण काजी के शव को बांग्लादेश से नहीं लाया जा सका। बाद में उनकी मिट्टी ले आकर उनकी बगल में दफनाया गया।
केंद्र हो या राज्य की सरकार, उनके शताब्दी वर्ष पर भी कोई काम नहीं किया न कोई आयोजन। हिंदी वाले भी चुप ही रहे। पर मजा देखिए, रवींद्रनाथ टैगोर के लिए मरे जा रहे हैं। हिंदी वाले भी खूब बकवास कर रहे हैं और केंद्र की सरकार को स्पेशल टे्रन ही चला दी थी। लेकिन इन्हें काजी की याद कतई नहीं आई। क्या एक ईमानदार कवि से सत्ता इतनी डरती है? ममता भी तो विद्रोही नेता हैं, फिर...।

चुरुलिया गांव का तालाब




चुरुलिया गांव का तालाब वैसे ही था, जैसे काजी नजरूल इस्लाम के समय में था। सौ सालों में कोई तब्दीली नहीं। जैसे तालाब में समय ठहर गया हो। 
यह अप्रैल की आखिरी तारीख थी। 42 डिग्री तापमान। आसनसोल से चुरुलिया के लिए बस पकड़ा तो उसने डेढ़ घंटे में उनके गांव के बाहर उतार दिया। गांव में जाने वाली सड़क के दाहिने ओर एक तालाब है। दिन के डेढ़ बजे थे। सड़कों पर सन्नाटा पसरा था। एक-एक कदम चलना भारी पड़ रहा था। चलते हुए लगता, किसी कोयले की भट्टी से गुजर रहे हों।
यह गांव भी अन्य गांव जैसा ही था। पर, यहां पुआल की झोपडिय़ां अलग किस्म की थीं। सड़कें अलबत्ता पक्की थीं। कुछ पक्के मकान भी थे जो विकास का दावा कर रहे थे। स्कूल, जिसमें काजी ने आरंभिक शिक्षा पाई, वह भी पक्का हो चुका था। वह मस्जिद, जिसमें कुछ दिनों तक पिता के इंतकाल के बाद सेवा की थी, जिसके बदले काजी को 'मुल्लाÓ की उपाधि मिली थी, बहुत की उदास खड़ी थी। उसकी दीवारें, मुख्य द्वार अपनी दुर्दशा की कहानी खुद बयां कर रही थी। मस्जिद की बाईं ओर दो पत्थर, जिस पर बैठकर काजी कविताएं गुनगुनाते थे, नई धुन बनाते थे, वह भी वैसे ही पड़ा था। अफसोस उसे भी था, काजी एक बार गए तो फिर कहां वापस आए? शायद, अब भी उसे इंतजार हो कवि के आने का। 
वह तालाब, जिसका ऊपर जिक्र किया है, इसे लोग पीरपुकुर के नाम से पुकारते हैं। इस तालाब के पक्कीकरण की सोच अभी तक पं बंगाल की सरकार के दिमाग में नहीं आई है। इस तालाब के बाईं ओर पीरपुकुर की मजार भी है। मजार क्या है, पत्थर के कई टुकड़े रख दिए गए हैं और उन्हें चूने से रंग दिया गया है। कहते हैं काजी के बचपन की दुनिया मस्जिद से लेकर इस मजार तक ही सिमटी थी।
थोड़ी देर तक अकेले इन गलियों का चक्कर लगाता हूं। इसके बाद नजरूल अकादमी का दरवाजा खुल जाता है। यह अकादमी, उसी स्थान पर बना है, जहां काजी नजरूल तपते जेठ के महीने में पैदा हुए थे। पहले मिट्टी का मकान था। 1958 में इसे अकादमी का रूप दे दिया गया। अकादमी के अंदर दाखिल होता हूं। राहुल नाम का एक युवक मिलता है। अपने आने का प्रयोजन बताने के बाद वह हमें संग्रहालय दिखाता है। फोटो की मनाही थी। 1982 में बने संग्रहालय में उनकी कुछ दुर्लभ तस्वीरें थीं। छोटा और एक बड़ा ग्रामोफोन रखा हुआ था। एक लकड़ी की कुर्सी व एक बेड भी, जिसका इस्तेमाल नजरूल करते थे, रखा हुआ था। शीशों से ढंकी काजी की कुछ हस्तलिखित कापियां और पांडुलिपियां भी रखी हुई हैं। तानपुरा और कुछ स्मृतिचिह्न भी हैं। यह संग्रहालय निजी प्रयास से चल रहा है। काजी के भतीजे काजी मोजाहर हुसैन ही अकादमी और इसकी देखभाल करते हैं। संग्रहालय देखने के बाद राहुल ही हमें वह स्कूल भी दिखाता है, जिसमें काजी ने आरंभिक शिक्षा पाई थी। स्कूल के प्रांगण में ही एक विशाल मंच बना हुआ है। नाम है प्रमिला मंच। यहीं पर हर साल काजी की जयंती पर एक सप्ताह तक सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं। इस कार्यक्रम में भाग लेने के लिए कोलकाता, बंगलादेश, उड़ीसा, राजस्थान आदि से लोक कलाकार आते हैं। सातों रात बाउल, नजरूल गीति, रवींद्र गीति की गूंज से चुरुलिया का कोना-कोना प्राणवान हो उठता है। नृत्य, संगीत, गीत की त्रिवेणी गांव में बहने लगती है। स्कूल प्रांगण से सटे ही एक उद्यान दिखता है। उद्यान में काजी नजरूल इस्लाम की सोने की तरह चमक बिखेरती आदमकद प्रतिमा है, जिसे उनकी स्वर्ण जयंती के मौके पर स्थापित की गई थी। बीच में एक कीर्ति स्तंभ भी काले पत्थरों का बना हुआ है। कीर्ति स्तंभ के दाहिनी ओर काजी की समाधि है और उससे सटे प्रमिला नजरूल की। प्रमिला की अंतिम इच्छा थी कि मुझे ससुराल में दफन किया जाए। 30 जून, 1962 को कोलकाता में निधन हो गया तो उन्हें कोलकाता से ले आकर यहां एक जुलाई को मिट्टी दी गई। अस्सी की उम्र की छू रहे काजी के भतीजे मोजाहर जी एक और बात कहते हैं। उन्होंने बताया कि प्रमिला नजरूल की एक और इच्छा थी कि उनके बगल में ही कवि की समाधि बनाई जाए। इसलिए, उनके बगल में उस समय जमीन छोड़ दी गई थी। बाद में जब ढाका में कवि का देहांत हुआ तो वहां से मिट्टी ले आकर उनके बगल में उनकी समाधि बना दी गई।
 मोजाहर जी बात बताते हैं कि बीमार काजी को बंगलादेश की सरकार ने आमंत्रित किया और वे वहां चले गए। वहीं पर उनका निधन हो गया। काजी के दो बेटे तो बचपन में ही चल बसे थे। 22 फरवरी, 1974 को उनके छोटे बेटे अनिरुद्ध की भी मृत्यु हो गई। दो साल बाद कवि भी नहीं रहे तो कोलकाता से उनके बड़े बेटे सव्यसाची इस्लाम अपने पिता के शव को लेने ढाका पहुंचे। पर इसमें न पं बंगाल की सरकार ने कोई रुचि ली न केंद्र सरकार ने। राज्य सरकार ने कहा, यह केंद्र का मामला है। नेता अपनी जिम्मेदारी से भागते हुए एक दूसरे पर ठीकरा फोड़ते रहे। तब तक बहुत देर हो चुकी थी। फिर तो वहां से उनकी मिट्टी ले आकर प्रमिला के बगल में समाधि दी गई। इस तरह उनकी दूसरी इच्छा पूरी की गई।
कवि ने एक लंबी अवधि वाक्हत बिताई। नौ जुलाई, 1942 से लेकर 29 अगस्त 1976 तक कवि ने कुछ नहीं बोला। देशी-विदेशी डाक्टरों ने उनकी चिकित्सा की। कोई सुधार नहीं हुआ। इसके बाद लुंबिनी के अस्पताल भेजा गया। यहां भी कोई सुधार नहीं। फिर रांची के मानसिक अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। यहां भी कोई सुधार नहीं हो सका। इसके बाद उन्हें लंदन ले जाया गया। रांची मानसिक अस्पताल के सुपरिटेंडेंट मेजर डेविस ने लंदन सेनीटोरियम थामस अस्पताल के मानसिक चिकित्सक डा. विलियम सर्जेंट को एक परिचय पत्र कवि के बारे में उनके साथ के व्यक्तियों के हाथों भेज दिया। लंदन में भी कोई लाभ नहीं हुआ। अंत में वियना ले जाए गए पर अंतत: 14 दिसंबर, 1953 को कोलकाता वापस आ गए। कोलकाता से फिर 24 मई, 1972 को नवगठित बंगलादेश के पीएम मुजीबर रहमान के आमंत्रण पर ढाका लाए गए और यहीं पर उन्होंने दम तोड़ा। ढाका विश्वविद्यालय परिसर में ही उनकी समाधि बना दी गई। बचपन में दुक्खु मियां जो नाम पड़ा तो जीवन भर दुख ने उनका साथ नहीं छोड़ा।
रांची से जुड़े कवि प्रसंग की चर्चा मोजाहर साहब से करता हूं तो वे अनभिज्ञता प्रकट करते हैं। गर्मियों की छुट्टियों में वे अक्सर रांची आते रहते थे। हिनू के पास तारिणी कुटीर में रहते थे। उनकी पत्नी प्रमिला के मामा प्रफुल्ल चंद्र दासगुप्ता यहां एजी थे। प्रमिला-नजरूल ने 12 नवंबर, 1937 को एक पोस्टकार्ड हिनू के पते पर भेजा था।
पत्र के एक तरफ प्रमिला ने लिखा और पते वाले साइड पर कवि ने। मजमून इस प्रकार है-
चरण स्पर्श, मामा बाबू
आपका पत्र मिला। इसके अलावा आपने नूर को जो दो पत्र दिया, वो भी काफी दिन बाद पढऩे को मिला। दोनों चि_ी का नूर को पता नहीं था। घर में हम लोगों की तबीयत खराब चल रही है। लेकिन इसके चलते जो हम चि_ी नहीं लिख सके, ऐसा नहीं है। सच बोलूं तो मामा चि_ी लिखने में आलस लगता है, यही मेरी अभद्रता है। आप लोगों के ऊपर हमलोग गुस्सा करेंगे, यह बात आपके मन में आएगा, मैंने कभी नहीं सोचा। खैर, आप और दीदी, चि_ी नहीं लिखने की गलती के लिए क्षमा करेंगे।                           इति निवेदिका।
दूसरी तरफ नजरूल ने लिखा है-
श्री चरणेषु
मेरा दुर्गा पूजा का प्रणाम स्वीकार कीजिए। मामी को भी प्रणाम बोलिएगा। छोटों को आशीर्वाद। आपका पत्र आफिस में पड़ा था, इसलिए उत्तर देने में देरी हुई। आशा है, भूलचूक माफ करेंगे। आप कैसे हैं? मेरी तबीयत अच्छी नहीं है। इति।
नजरूल।
यह पत्र भी भास्कर गुप्ता ने उपलब्ध कराया। प्रफुल्लचंद्र दासगुप्ता भास्कर के पिता परमेशचंद्र गुप्ता के फूफा लगते थे। मोजाहर साहब की आंखें रांची प्रसंग को सुनकर चमक उठती हैं। वह पत्र के लिए लालायित हो उठते हैं। कहते हैं, वह पत्र दिलवा दीजिए, यहां संग्रहालय में उसे रख देंगे, ताकि दूर-दराज से आने वाले लोग इसका लाभ ले सकें। बातचीत करते-करते सांझ हो उठती है। वहां से चल देता हूं। गलियों में चहल-पहल बढ़ गई है। कुछ युवा सड़क किनारे ताश खेल रहे थे। 14 हजार की आबादी वाले गांव के किसान खेती के लिए भगवान पर भरोसा रखते हैं। गांव से सटे कोलियरी का लाभ गांव वालों को नहीं मिलता। विकास के इस विद्रूप सच के साथ बस पकड़ लेता हूं। मन में कवि की पंक्तियां गूंजने लगती हैं-मैं आता हंू हर युग में, आया हूं फिर महाविप्लव हेतु..हूं स्रष्टा का शनि महाकाल धूमकेतु। 

पातालपुरी में आदिम रात्रि की महक


संजय कृष्ण, कुंानगर से : 
बांध से बड़े हनुमान मंदिर तक ठेलमठेल है। जिधर नजर जाती है, उधर जनप्रवाह ही दिखाई देता। भीड़ में चलना मुश्किल हो रहा था। कांची काम कोटि शंकराचार्य पीठम मंदिर के सामने खड़ा हो जाता हूं। उत्तर में दक्षिण शैली के मंदिर की ओर निहारने लगता हूं। कुछ उडिय़ावासी दर्शन कर निकल रह थे। गंजाम, उड़ीसा से आए थे। कुल छह लोग। आर आर पंडा आर्मी से रिटायर्ड। लंबा सफर तय कर यहां पहुंचे हैं। महाकुंा की जानकारी के बाबत कहने लगे, 'पंजिका के माध्यम से इसकी जानकारी मिली।  पंजिका यानी पतरा। पतरा ने उन्हें कुंभ का पता बताया और चले आए इस पुण्यनगरी में। माघी पूर्णिमा का स्नान कर यहां से रवाना होंगे। पहली बार मेले में इस छोटी सी अनुशासित भीड़ को देखकर स्तब्ध हैं। कहते हैं, इसके बारे केवल सुना था। देखा तो जीवन धन्य-धन्य हो गया।Ó बातचीत कर किले की ओर रुख कर लेता हूं। बीच में रामजानकी मंदिर में दर्शनार्थियों का तांता लगा हुआ था। मंदिर का पट बंद होने की घोषणा हो रही थी। मन को समझाया, बाद में दर्शन कर लेंगे। अभी तो आदिम रात्रि की उस महक को महसूस करना है, जहां राम ने तीन रात्रि बिताई थी। अक्षय वट के दर्शन को लंबी कतारें लगी थीं। हम भी कतार में खड़े हो जाते हैं और धीरे-धीरे कदम दर कदम बढऩे लगता है। तन-मन रोमांचित है। कतार में खड़े श्रद्धालु जय-जय गंगे, हर-हर गंगे का उद्घोष कर रहे हैं। किले के उस मुहाने पर पहुंच जाता हूं। वहां से पंडित दान की महिमा बता रहे थे और भंडारे के लिए दान की अपील कर रहे थे। भक्त दान करते और पातालपुरी की ओर बढ़ चलते। पाताल में मंदिरों का समुच्चय। एक जगह वट का जड़ दिखा। लोग श्रद्धा से शीश झुकाते और फिर दूसरे रास्ते से ऊपर आ जाते। इसके बाद बाहर। अक्षय वट की महिमा तो सबने बखानी है। लेकिन मेरे ज्ञान में एक ठेले वाला वृद्धि करता है। मुख्य द्वार के दूसरी छोर पर वह चने भूंज रहा था। चने का स्वाद लेते हुए मैंने इस वट के बारे में उससे पूछने लगा। कहने लगा, 'इ ओरीजिनल बट थोड़े है। उ तो दूसरी ओर है। उसे नहीं दिखाते। उ बट को तो अंगरेज जाते-जाते उसकी जड़ में आग डालकर गए, लेकिन उसका कुछ नहीं बिगड़ा। उसकी रक्षा तो राम-लक्ष्मण सीता करते हैं।Ó
 खैर, दर्शन करने के बाद संगम की ओर बढ़ लेता हूं। स्नान की लंबी कतारें। पंडे संकल्प करा रहे हैं...हरिओ-हरिओम...अपने गोत्र का नाम लीजिए, अपना नाम....इसके बाद कुछ सुनाई नहीं देता। आधा मिनट में कर्मकांड पूरा। दान-दक्षिणा ले उन्हें तृप्ति का अहसास होता है और भक्त को पुण्य का। दान-पुण्य की इस नगरी में कोई आंध्रप्रदेश से आया तो कोई गुजरात से। पूरा देश ही संगम तट पर सिमट गया है। चाहे वह गरीब हो या अमीर। हर आदमी एक डुबकी लगाता। वापसी पर गुजरात के संत से भेंट हो जाती है। वे लंदन से संत गुणवंती देवी को लेकर यहां स्नान कराने आए थे। वे बीमार थी। पुलिस से गुजारिश की, वीआइपी गेट के पास स्नान करा दीजिए, पर पुलिस असहाय थी। वे चार पहिए से तीन दिनों में यहां पहुंचे थे। चौथे दिन वे संगम पहुंचे थे। काफी परेशान थे। लेकिन कोई चारा भी नहीं दिख रहा था। पुलिस उन्हें सरस्वती घाट का रास्ता बता देती है...। भीड़ को चीरते हुए वे आगे बढ़ लेते हैं और मैं भी अपना रास्ता पकड़ लेता हूं।

बछिया एक दाता हजार

जानकर ताज्जुब होगा कि तीर्थनगरी प्रयाग में एक ही बछिया को एक नहीं, हजारों लोग दान देते हैं। तंबुओं की इस तीर्थ नगरी में 
पुल 10-11 के बीचे गंगा के रेतीले विशाल तट पर दर्जनों पंडे ाक्तों को कथा बांच रहे हैं। दान-पुण्य की महिमा बता रहे हैं तो दूर-दराज से आए ाक्त वैतरणी पार करने की अािलाषा लिए बछिया ाी दान कर रहे हैं। मजा यह कि बछिया एक है और दान करने वाले हजार। आदित्य पंडा चौकी लगाए गंगा घाट पर अपने एक ाक्त को बछिया दान की महिमा बताते हैं। इसके बाद उससे पूंछ पक
ड़वाते हैं। मंत्र बुदबुदाते हैं। हाथ मे दक्षिणा लेते हैं और, दान का कर्मकांड पूरा। माघ पूर्णिमा की पूर्व संध्या। सामने गंगा का अविरल प्रवाह यमुना से मिलने क लिए बड़ी तेजी से बढ़ रहा था। संध्या के चार बज रहे थे। रेत पर कुछ बच्चे ोल रहे हैं तो कुछ गंगा मैया में डुबकी लगा रहे।
 प्रयाग की इन मनोरम छटा को निहारने के बाद आदित्य पंडा की चौकी पर बैठता हूं तो वे बछिया दान की महिमा बताते कहते हैं कि जैसा यजमान वैसी सेवा। बछिया दान के लिए कम से कम 11 रुपये तो दक्षिणा देनी पड़ेगी। पूछता हूं, 11 रुपये में बछिया मिल जाती है? कहते हैं, 11 रुपये में आज क्या मिलेगा? लेकिन गरीब यजमान है और उसके पास पैसा है नहीं, पर पुण्यनगरी में वह चाहता है कि वैतरणी पार के लिए एक बछिया दान करे तो वह कहां से करेगा? उसकी मन की शांति के लिए कुछ तो करना पड़ेगा। आदित्य बहुत उत्साह से बताते हैं कि इस एक बछिया से अब तक दस हजार लोगों का गोदान करा चुका हूं। अमावस पर तो कई हजार। आदित्य का यह पुश्तैनी पेशा है। 
 एक दूसरे पंडा विमल मिश्र बताते हैं अमावस्या के दिन पांच हजार लोगों को गोदान करवाया। विमल ने पास ही एक मरियल से बछिया बांध राी थी। उस ओर इशारा करते हुए कहते हैं कि इस एक बछिया को एक महीने में दस हजार लोगों से अधिक ने अपनी मुक्ति के लिए दान कर चुके हैं। वैतरणी का डर और आस्था की चाह के कारण लोग गोदान करते हैं। विमल बताते कि 11, 21, 51, 100 से लेकर हजार और उससे ऊपर तक। जैसा ाक्त वैसी पूजा। वह बताते हैं कि दान का बड़ा महत्व है। वह ाी माघ के महीने और प्रयाग की धरती पर तो पुण्य कई गुना बढ़ जाता है। जो ाी आता है, चाहता है कि पुण्य का लाा लेकर जाए। इस बार महाकुंा के कारण ाी श्रद्धालु काफी आ रहे हैं। उनका कहना है कि गो दान, गंगा पूजन, बेड़ी दान, पिंड दान और अस्थि पूजन करवाया जाता है। वह प्रयाग की महिमा बताते हैं कि यह तो महातीर्थ है। को कही सकई प्रयाग प्रााऊ...। विमल आगे बताते हैं कि 'सूर्य और चंद्रमा जब प्रतिवर्ष मकर राशि में संचरण करते हैं तब माघ में माघ मेले का आयोजन होता है। वृहस्पति जब मेष राशि चक्र की वृषा राशि में 12 साल में आते हैं तब प्रयाग में कुंा लगता है और इस बार तो महाकुंा लगा है। इसे पूर्णकुंा ाी कहा जा रहा है, क्योंकि ऐसे नक्षत्र का योग अब 360 साल बाद आएगा।Ó इंटर पास विमल और ाी बहुत कुछ बताते हैं। पर, पीढिय़ों से चले आ रहे इस पेशे में अपने बेटों को नहीं डालना चाहते। कहते हैं  'यह काम अच्छा नहीं है। आपस में लड़ाई-झगड़ा ाी ाूब होता है। प्रशासन ाी कोई मदद नहीं करता।Ó ौर, विमल अकेले नहीं है न आदित्य। जैसी जिसकी धारणा...पर धर्म की इस नगरी में आस्था का प्रबल प्रवाह कम होता दिााई नहीं देता।