कैनवस पर झांकते बुद़ध

पायल सोनी संकोची हैं। अपने बारे में कुछ नहीं बतातीं। पर उनका काम बोलता है। कोमल उंगलियां जब ब्रश पकड़ती हैं तब कोई जीवंत आकृति कैनवस पर उभर जाती है। पेंटिंग बचपन की आदत है। घर का माहौल भी कुछ कला-कला जैसा था। सो, स्कूल में मौका मिला। जब अवार्ड मिला तो हौसला भी बढ़ा। तब, प्रशिक्षण की चिंता हुई। रांची के ही मनोज सिन्हा से कला का प्रशिक्षण लिया। रंग और रेखाओं के महत्व को समझा। हर रंग अपना दर्शन है, उसकी पहचान है, इसे बखूबी जाना। इसी के साथ बीए भी पूरा किया। पिता के आकस्मिक निधन से मन को और मजबूत किया। परिस्थितियों से लडऩा सीखा। हिम्मत नहीं हारी। पिता ऊंचाइयों पर देखना चाहते थे। लेकिन मां ने साथ दिया। आर्थिक तंगी तो थी ही फिर भी पुणे से एनिमेशन का कोर्स किया। कोर्स करने के बाद वहीं जॉब भी मिल गया। बतौर कैरेक्टर डिजाइन काम करना शुरू कर दिया। काम आगे बढ़ा तो खुद प्रोडक्शन हाउस खोल दिया। कई उतार-चढ़ाव भी आए। संघर्ष जारी रहा। बहन ने भी साथ दिया। इसके बाद कई प्रोजेक्ट मिले। काम किया। महाभारत, रामायण, हनुमान आदि के एनिमेशन बने। पर परिस्थितियां एक जैसी नहीं रहती। समय भी परीक्षा लेता है। सो, एक बार फिर रांची आना पड़ा। पेंटिंग का सफर फिर शुरू हुआ। कई प्रदर्शनियों और कार्यशालाओं में भाग लिया। रांची, जमशेदपुर, एसपीटीएन, कला-संस्कृति विभाग, पलाश आदि की कार्यशालाओं में भाग लिया। बुद्ध की एक चर्चित पेंटिंग बनाई, जिसे मुख्यमंत्री रघुवर दास ने भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को भेंट किया। रांची के ही मशहूर कलाकार प्रवीण कर्मकार से भी सीखा। सीखने का क्रम जारी है। 
पर, पायल की पेंटिंग देखने से लगता है हम किसी परिपक्व कलाकार के काम को देख रहे हैं। आयल, वाटर और एक्रेलिक। तीनों में काम करती हैं। हालांकि अभी एक्रेलिक पर काम कर रही हैं। पायल अमूर्त में विश्वास नहीं करती। इसलिए, वह मूर्त काम करती हैं। बुद्ध प्रिय हैं। इसलिए, बुद्ध कहीं न कहीं उनके कैनवस से झांकते हैं। उनकी ध्यानस्थ मुद्राएं ध्यान खिंचती हैं। इसी तरह, इसे संयोग ही माने, बुद्ध के बाद देश में मूर्ति निर्माण शुरू हुआ, सो, पायल मूर्तियों को भी कैनवस पर साकार करती हैं। हजार-डेढ़ हजार साल पुरानी प्रतिमाएं कैनवस पर आकार ग्रहण करने के बाद सजीव लगने लगती हैं। काम में भी सजीवता दिखाई पड़ती है। एक-एक बारीकी देख सकते हैं। यदि प्रतिमाओं में कोई खरोंच है, दरार पड़ गई है, तो भी बहुत खूबी के साथ दर्शाती हैं। इधर, मध्यप्रदेश में होने वाली कला प्रदर्शनी की तैयारी कर रही हैं। वहां राष्ट्रीय स्तर पर प्रदर्शनी होनी है। निमंत्रण आ चुका है। सो, पेंटिंग बनाने में लगी हैं। पायल को प्राचीन प्रतिमाओं के साथ आदिवासी जीवन भी प्रिय है। सो, आदिवासी जीवन भी कागजों पर उतरता है।

ग्लोबल गांव की अंतर्कथाएं


 -संजय कृण :
 
  सन् 1840 में, संताल हूल और 1857 की कथित आजादी की पहली लड़ाई से डेढ़ दशक पहले एक ब्रिटिश अधिकारी ने नगाओं पर टिप्पणी करते हुए लिखा था, ‘ये आदिवासी पूरी ताकत से महज अपनी हिफाजत ही नहीं करते बल्कि ये अपने दुश्मनों पर बहुत हिम्मत से वार भी करते हैं...किसी तरह का खतरा और भय उन्हें नहीं सताता।’

   इस टिप्पणी से जाहिर है, उस ब्रिटिश अधिकारी ने आदिवासियों के रहन-सहन और उनके संघर्ा को काफी नजदीक से देखा
  गायब होता देश इसी साल आया और आते ही देश की साहित्यिक पत्रिकाओं में इस पर समीक्षाआंे की बाढ़ सी आ गई। अंतरजाल पर भी यह खूब प्रचारित हुआ। ‘बाबा रामदयाल मुंडा की स्मृति एवं दीदी दयामनी बारला और इरोम शर्मिला चानू के संघर्ा के जज्बे को समर्पित’ इस उपन्यास में डाॅ. रामदयाल मुंडा भी हैं और दयामनी बरला भी। इसके साथ ही इसकी कुछ और बातें हैं, वह है हिंदी के महान लेखकांे की टिप्पणियां। पुस्तक की पीठ पर मैत्रौयी पुपा और प्रसन्न कुमार चैधरी की टिप्पणी है और अंदर संजीव की। इन्हें देखना भी दिलचस्प होगा, इससे उपन्यास को समझने में आसानी होगी। मैत्रोयीजी ने लिखा है, आधुनिक विकास की तमीज के हिसाब से रातों रात गुम हो जाती बस्तियों के बाशिंदों की दर्दनाक दास्तान...जिनपर कागजी खजाना तो बरसाया गया लेकिन पांव तले की धरती छीन ली...यह उपन्यास साहित्य में अपनी मुकम्मल जगह बनाएगा, ऐसी मुझे उम्मीद है।’ उम्मीद उनकी बेमानी नहीं है। अब प्रसन्न की टिप्पणी देखें, यह एक प्रेम कथा भी है और थ्रिलर भी...लगभग कोई पात्रा एक आयामी नहीं है, सभी पात्रों के अपने-अपने ग्रे शेड्स हैं।’ संजीव ने तो कलम ही तोड़ दी है, जादुई यथार्थवाद को खोजने के लिए लैटिन अमेरिका और स्पेनिश भाााओं में भटकने की जरूरत नहीं। अपना देश और अपने लोग ही पर्याप्त हैं। इस लिहाज से भी यह उपन्यास हिंदी को समृद्ध करता है।’ हालांकि रमेश उपाध्याय का माथा ठनग गया संजीव के विशेाण से.. संजीव के शब्दों में यह पढ़कर कि यह जादुई यथार्थवाद का उपन्यास है, माथा ठनक गयाः यह क्या? अपने पहले उपन्यास‘ ग्लोबल गांव का देवता’ में रणेंद्र ने भूमंडलीय यथार्थवाद को जो नया रास्ता पकड़ा था, उसे छोड़कर वे जादुई यथार्थवाद के उस पुराने रास्ते पर क्यांे चले गए, जिस पर मार्केज के असंख्य नकलनवीस पहले ही चल चुके हैं?’ खैर, रमेशजी ने इसे भूमंडलीय यथार्थवाद का उत्कृट उदाहरण माना है। अब साहित्य के इतने धुरंधर, मूर्धन्य और लब्ध प्रतिठ लेखकांे की टिप्पणी के बाद भी भला कुछ रह जाता है! 
  लेकिन बात सिर्फ इतनी भर होती तो हम भी राम-राम कहकर आगे बढ़ जाते। पर, ऐसा है नहीं। लेखक ने अपने पूर्व कथन में इस उपन्यास की कैफियत दी है। सोना लेकन दिसुम यानी सोने जैसा देश। यह देश था मुंडाओं का, जो अब गायब हो रहा है। थोड़ा इतिहास भी है कि मुंडा झारखंड में कब आए? लेकिन सवाल है, क्या यह वास्तव में मुंडाओं पर लिखा गया उपन्यास है? जिसके लिए यह खूब प्रचारित किया गया है और किया जा रहा है? 318 पेज के इस उपन्यास को पढ़ने पर ऐसा लगता है कि यह मुंडा के गायब होते देश की नहीं, उस मैथिल पत्राकार किशन विद्रोही के जीवन की कहानी है, जो यहां पत्राकारिता करने आया था, कुछ क्रांतिकारी टाइप लोगांे की सोहबत में क्रांतिकारी हो गया और अंततः कारपोरेट होती पत्राकारिता में उलझकर दम तोड़ दिया। उसकी हत्या हुई या उसने आत्महत्या की, इसकी खोज है या उपन्यास। एक युवा पत्राकार ही इस गुत्थी या रहस्य को सुलझाने के लिए निकलता है और फिर कहानी आगे बढ़ती है। कई पात्रा आते हैं, पत्राकारिता की सड़ांध भी आती है। डाॅ रामदयाल मुंडा डाॅ सोमेश्वर सिंह मंुडा के रूप में मौजूद हैं और सोनामनी के रूप में दयामनी बारला और उनका आंदोलन। आंदोलन के बिकने की कहानी भी यहां हैं। अनुजा के रूप में एक आदिवासी महिला पत्राकार है और उस पर एकतरफा मोहित किशन विद्रोही। है तो यह विद्रोही पर रसिक भी कम नहीं। अनुजा पाहन के बैंजनी रंग पर वह इस कदर मोहित होता है तो उसके सौंदर्य का बखान करने में वह कालिदास, विद्यापति और बिहारी को भी पीछे छोड़ देता है। सारी उपमाएं जूठी लगती हैं उर्दू शायरों की भी। पांच पेजों तक उसके सौंदर्य का बखान करता उपन्यास का चैतीसवां अध्याय का शीर्ाक है नैनां अंतरि आव तू। एकाध टुकड़ा देखें तो हमें लेखक के सौंदर्य बोध का पता चल जाता है-‘...दूधिया-बैंजनी दूध में नहा कर जब तुम निकलने लगी तो मेरी आंखें...मेरा वजूद...आंखों की पुतलियां बनकर रह गया।...तुम्हारी सफेद चुनर ढलक कर वक्षस्थल पर आ टिकी। जहां दो चांद हाफ रहे थे या उड़ने को बेताब पंख फड़फड़ाते दो कबूतर।...मैंने सोचा, मैं कालिदास बन जां...या विद्यापति...या बिहारी।...क्या मैं पुरुरवा नहीं बन सकता...या कनु...अंधकार में...। यहां तक आते-आते धर्मवीर भारती भी याद आने लगते हैं। लेखक उसके सौंदर्य का चित्राण करते समय हकलाने लगता है। सो, डाॅट डाॅट डाॅट से काम चलाता है। संस्कृत के पद से भी उसका पेट नहीं भरता तो उर्दू का आंचल थाम लेता है। परीचश्म-परीजमाल, नूरे मुजस्सम, नूरानी वजूद जैसे भारी भरकम शब्द पाठकांे की परीक्षा लेने लगते हैं। हालांकि उपन्यास में ऐसे ढेरों शब्द बिखरे पड़े हैं, जिसे डिक्शनरी में ही उसके अर्थ की तलाश की जा सकती है। हालांकि लेखक ने एकदम टटका बिंब या उपमा दी है...हाफते चांद या फड़फड़ाते दो कबूतर। एक अलग सौंदर्यशास्त्रा, जिसके लिए हिंदी समाज को लेखक का ऋणी होना पड़ेगा।
   उपन्यास के पन्ने दर पन्ने पढ़ते हुए जब आगे बढ़ते हैं तो यह भी एहसास होता है कि लेखक ने काफी अध्ययन किया है। हर पन्ना और अध्यायों के शीर्ाक इसकी चुगली करते हैं। लेखक की यह विशेाता है कि वह अब तक जो पढ़ा है, इतिहास, पुराण, शेरों-शायरी, मानव विज्ञान...। वह सब कुछ अपने इस महान उपन्यास में विन्यस्त कर देना चाहता है। मेगालिथ की पूरी कहानी यहां हैं। लेमुरिया तो है ही। यह सब ज्ञान उसे सोमेश्वर सर से प्राप्त होता है। लेखक बताता है कि ‘लेमुरिया भी आठ लाख वर्ा ईसा पूर्व से 9654 वर्ा ईसा पूर्व की अवधि में धीरे-धीरे डूब गया। मेडागास्कर, मारीशस, मालदीव, लक्षद्वीप उसी लेमुरिया महाद्वीप के अवशेा हैं।’ यह भूमि 12 नस्लों की मूल भूमि थी। यह सवाल तो आप नहीं उठा सकते हैं कि क्या उस समय तक जातियांे का निर्धारण हो चुका था या इतने लाख साल पहले वे आदिम रूप में ही मौजूद थीं? लाखों साल से यह जाति इस घटना को कैसे अपने लोक गीतों के माध्यम से याद करती आ रही है? सचमुच, इस परिघटना के जरिए लेखक मुंडा जनजाति का अतीत बताता है। फिर वर्तमान में उसकी त्रासदी। सोमेश्वर मुंडा के जरिए मुंडा के जरिए ही वह अतीत की यात्रा पर निकलता है और वहां से जब फारिग होता है कि सोनामनी के जरिए अपने वर्तमान को पकड़ने की कोशिश करता है, जहां देश या दिसुम गायब हो रहा है।
  जहां तक जमीन का सवाल है, वह झारखंड में हर आदिवासी के हाथ से छीनी जा रही है। कहीं विकास के नाम पर, कहीं खनिज के नाम पर। यह सिर्फ मुंडा जनजाति के साथ ही नहीं हो रहा है। आजादी से पहले अंग्रेजों से आदिवासियों ने जमीन के लिए ही सालों साल संघर्ा किया और आज अपनी चुनी हुई सरकार से। कारपोरेट की दुनिया कैसे तंत्रा पर हावी है और विकास के नाम पर कैसे यहां के लोगों को विस्थापित करती है, यह कोई नहीं बात नहीं। बड़ी-बड़ी कंपनियां यही कर रही हैं। कुछ आंदोलनों ने कंपनियों के काम को भी रोक रखा है। यहां कुछ आंदोलन ऐसे है, जिन्हें कारपोरेट ही मदद करता है। प्रतिद्वंद्विता उसके साथ भी है। वह नहीं चाहता कि दूसरी कोई कंपनी यहां आए। ऐसे में यहां चल रहे आंदोलन उसके काम के होते हैं। आंदोलनों के अपने फायदे तो हैं हीं। देश-दुनिया में पहचान और पुरस्कार तो मिलेगा ही, जो इस उपन्यास में सिरे से नदारद है। जहां तक पूंजीवादी व्यवस्था की बात है, उससे तो हर समाज त्रास्त है। केवल मुंडा ही नहीं। यहां रहने वाली सभी आदिवासी-मूलवासी इसके शिकार हो रहे हैं। नौकरशाही की मिलीभगत से रांची में अचानक अपार्टमेंटों की बाढ़ से लेखक तो परिचित होगा ही। शहर से लेकर गांव तक आदिवासी अपनी जमीन से बेदखल हो रहा है। राज्य बनने के बाद भी। सौ साल पहले बना कानून भी कोई मदद नहीं कर पा रहा। लेखक इन अंतरविरोधों को भी सामने लाता है। इतना सब कुछ होने के बाद भी, यह उपन्यास हमारे भीतर कोई संवेदना नहीं जगाता। हम किसी पात्रा को याद नहीं कर पाते। डायरी की शक्ल में लिखे इस पूरे उपन्यास में कोई मुंडा पात्रा उभरकर नहीं आता। न उनकी लोककथाएं, न उनका जीवंत जीवन। कुछ जमीनी सच्चाइयां जरूर हैं। नक्सली संगठनों का अपराधी गिरोहों में बदलना। विवरण बहुत है। विवरण उपन्यास नहीं होता। कहीं-कहीं अरण्यरोदन भी है। एक पत्राकार की डायरी में जितना समाया, वह आया। बाकी तो दूर से बैठकर देखने का सुख और खुशफहमी है। हां, एक सवाल यह जरूर उठाता है, यदि लुटियन की दिल्ली के नीेचे खनिज संपदा निकल जाए तो क्या सरकार उन अमीरों को वहां से बेदखल करेगी? 
  लेकिन ऐसा महुआ माजी के साथ नहीं होता। महुआ का उपन्यास ‘हो’ आदिवासी जीवन पर है: ‘मरंग गोड़ा नीलकंठ हुआ’। यह उपन्यास भी छपने से पहले ही पुरस्कृत हो गया था। बहुत हद तक लेखिका अपने कहन में सफल होती है। यह कहानी भी कोल्हान के उस क्षेत्रा की है, जहां के आदिवासी पिछले कई दशकों से यूरेनियम के कचरे का शिकार होकर जवानी में ही दम तोड़ रहे हैं। यह एक भयावह समस्या है। कई तरह की बीमारियां, गर्भपात की समस्या और चर्म रोग से यहां के बाशिंदे परेशानहाल हैं। लेकिन यहां भी वही समस्या और देखने का वही नजरिया। 402 पेज के इस भारी भरकम उपन्यास में लेखिका 167 पेज तक तो अपनी आंखों से मरंग गोड़ा को देखने की कोशिश करती है, लेकिन आगे वह कैमरे से देखती हैं। कैमरामैन हैं आदित्यश्री। इन्हें आप श्रीप्रकाश भी पढ़ सकते हैं और मरंगगोड़ा को जादूगोड़ा। इत्तेफाक से ये भी किशन विद्रोही ही तरह पत्राकार हैं पर अलग ढंग के। यहां सगेन जैसा जीवंत पात्रा है। शुरुआत के 167 पेज तक एक दम काव्यात्मक भााा से साक्षात्कार होता है। इसके बाद हो आदिवासी जीवन पसरने लगता है। महाश्वेता देवी तरह ही लेखिका जैसे अपने पात्रों में उतर गई हो। हो जीवन की छोटी-छोटी कहानियां, उनका अतीत और त्रासद वर्तमान सब कुछ को नोट करती है। उनके पर्व, त्योहार, परंपरा, अखड़ा, लोकगीत सब मुखर होता है। इसके बाद कहानी अपने मूल पर आती हैः ‘विकिरण, प्रदूाण व विस्थापन से जूझते आदिवासियों की गाथा।’ सगेन उपन्यास का नायक है। सगेन के ततंग यानी उसके दादा पत्थरों का डाक्टर बनाना चाहते थे, लेकिन जैसे-जैसे वह बड़ा होता है, उसे जादूगोड़ा का सच दिखाई देने लगता है। फिर लोगांे को जागरूक करने और एकजुट करने के लिए कमर कस लेता है। सगेन की भेंट आदित्यश्री से होती है और आदित्यश्री अपने वृत्तचित्रा के माध्यम से यूरेनियम से हो रही जानलेवा परेशानियों से दुनिया को रूबरू कराता है। आदित्यश्री एनजीओ के माध्यम से यह काम करता है। जापान में भी वह जाते हैं और यहां के हालात को दिखाता है। फिर वहां से एक टीम यहां आती है। यहां अध्ययन करती है और अपनी रिपोर्ट देती है। इतना कुछ होने के बाद यूरेनियम कंपनी वाले थोड़ा नरम रुख अपनाते हैं। यह सब कुछ बहुत प्रामाणिक ढंग से कही गई है। इसे पर इंटरनेट पर भी खोज-देख-पढ़ सकते हैं।
  मरंगगोड़ा के साथ ही सारंडा की कहानी भी कही गई है। साल बनाम सागवान की लड़ाई को भी उठाया गया है, लेकिन उस समय के एक बहुत बड़े आंदोलन कोल्हान विद्रोह को छोड़ दिया गया है। 1977 में केसी हेम्ब्रम और उस समय के मानकी मंुडा के प्रमुख नारायण जोंको ने कोल्हान रक्षा संघ का गठन किया था। आंदोलन की लपटें बहुत दिनों तक उठती रहीं। 1981 में अलग कोल्हान की मांग उठी थी। यहां तक कि काॅमनवेल्थ सचिव के सामने इसकी मांग रख दी गई। यही नहीं, यूएनओ में भी इस मामले को उठा दिया गया। इसके बाद तो केसी पर राटद्रोह का मुकदमा चला। आरंभ में इस संगठन के लोगों ने ही जादूगोड़ा में विकिरण के प्रभावों को सामने लाया था। आंदोलन को वैचारिक धार देने के लिए ही संघ का गठन किया गया था। लेकिन इसका कहीं जिक्र नहीं है। लेखिका ने आदित्यश्री के माध्यम से ही जितना जाना, समझा, उसे हिंदी पाठकांे के बीच परोस दिया। हिंदी पाठकों के लिए यह नया विाय हो सकता है। यह उपन्यास भी आधा मरंगगोड़ा की कथा कहता है और आधा आदित्य श्री की। लगता है, हम उसकी जीवनी पढ़ रहे हों। किसी ने कहा है कि जिस परिवेश में आपने जन्म नहीं लिया हो, उसकी कथा नहीं कहनी चाहिए। इसके लिए प्रतिभा की भी दरकार होती है। राधाकृण की इंसान का जन्म पढ़ने के बाद लगता है कि वह बंगलादेश की हर गली से वाकिफ है। बंगलादेश में युद्ध की पृठभूमि पर लिखी इस कहानी को पढ़कर आप कथाकार के साथ बहते जाते हैं। पर, यहां ऐसा कुछ नहीं होता। कम से कम ये दोनों उपन्यास न्याय तो नहीं करते। आदिवासी जीवन की विसंगतियां को राधाकृण ने अपनी कई कहानियों में उठाया है। कानूनी-गैरकानूनी से लेकर मूल्य तक। राधाकृण को गुजरे चालीस साल हो गए लेकिन यहां के कथाकार, अभी तीसरे-चैथे दशक में ही ठिठके हैं रचना के स्तर पर। फिर भी, मरंगगोड़ा हमें यूरेनियम के खतरे से आगाह करता है।
   एक तीसरा उपन्यास है, राकेश कुमार सिंह का ‘हुल पहाडि़या’। राकेश पलामू के हैं और आरा, बिहार में रह रहे हैं। शरीर वहां और मन यहां के जंगलों में भटकता रहता है। इसलिए, उन्होंने झारखंड पर कई उपन्यास रचे हैं। जहां खिले हैं रक्तपलाश, पठार पर कोहरा, जो इतिहास में नहीं है, यह सब झारखंड केंद्रित उपन्यास हैं। जो इतिहास में नहीं है, संताल हूल पर केंद्रित है। हुल पहाडि़या 2012 में आया। यह उपन्यास आदि विद्रोही तिलका मांझी की समरगाथा है। हमें जानना चाहिए कि अंग्रेजों के खिलाफ सबसे पहले तीर-धनुा उठाने वाले पहाडि़या थे और उसका नायक तिलका मांझी। यह उपन्यास आदिवासियों के आंदोलनों को नजरअंदाज करने वाले मुख्यधारा के इतिहास की कई भूलों को ठीक करता है सप्रमाण।
  हम अभी तक यह तय नहीं कर पाए हैं कि देश का पहला आजादी का आंदोलन 1857 को माने, या झारखंड में हुए 1855 में हूल को या फिर 1785 को, जब राजमहल की पहाडि़यों से निकलकर तिलका मांझी ने भागलपुर के पहले कलक्टर क्लीवलैंड को मौत के घाट उतार दिया था। यद्यपि 1857 को हमने प्रचारित-प्रसारित किया है। हमें यही पढ़ाया जाता रहा है, जा रहा है। लेकिन इस पाठ में आदिवासियों के आंदोलनों को हाशिए पर ही रखा गया है। यह उपन्यास दरअसल, इतिहास को ठीक करने की कोशिश भी है। राकेश कुमार सिंह ने काफी खोजबीन और शोध के बाद इसकी रचना की है, लेकिन खेमेबाज आलोचकांे ने इस पर बहुत कुछ नहीं बोला। जनसंपर्क भी एक कारण हो सकता है। हर लेखक अपनी मार्केटिंग करना नहीं जानता। बाजार के इस युग में यह एक महान कला के रूप में स्थापित हो रही है। आखिर, मनमोहन पाठक के उपन्यास ‘गगन घटा घहरानी’ पर किसी को बोलते-लिखते सुना है। यह उपन्यास भी 1991 में आया था और पलामू पर केंद्रित है। इसमें उरांव आदिवासियों को केंद्र मंे रखा गया है। लेखक अपने गांव-जवार, आदिवासियों और पलामू से किस तरह तल्लीन है, उपन्यास का एक-एक शब्द बताता है। पर इसकी चर्चा नहीं होती।
  बहरहाल। राकेश कुमार सिंह का यह उपन्यास एक बहुत बड़े अभाव की पूर्ति करता है। हमारे इतिहास को दुरुस्त करता है। हम सब जानते हैं कि अंग्रेजांे ने पहाडि़या जनजाति के इस महान विद्रोह को कुचलने का हर संभव प्रयास किया। इसके साथ ही अभिलेखों में भी एक सोची-समझी साजिश के तहत दर्ज भी होने नहीं दिया। पर स्थलीय साक्ष्यों ने कुछ इतिहासकारों को तिलका मांझी के जीवन और आंदोलन में झांकने को जरूर विवश किया। दूसरे, यह भी सवाल परेशान करता रहा कि तिलका संताली है या पहाडि़या। महाश्वेता देवी ने अपने उपन्यास ‘शाल गिरह की पुकार’ में तथ्यों के साथ खिलवाड़ करने की काफी छूट लेकर कई भ्रांतियों को जन्म दे दिया। बंगाली बौद्धिकों के साथ यह परेशानी है कि वह हर आदिवासी को संताली ही कहते हैं। रवींद्रनाथ टैगोर भी संताली कहते हैं और कविता रचते हैं। सत्यजीत राॅय भी पलामू के आदिवासियों को संताली ही समझते हैं। राकेश इसे भी दुरुस्त करते हैं। वह प्रमाण सहित बताते हैं कि तिलका संताली नहीं, पहाडि़या था और उसका एक नाम जवरा पहाडि़या भी था। इसे अंग्रेजों ने अपने अभिलेख में डाकू के तौर पर दर्ज किया है और हिल रेंजर्स का कमांडर के तौर पर भी। इन दोनांे नामों में एक की तलाश में काफी मेहनत करनी पड़ी। साक्ष्य तो चाहिए ही। राकेश सिंह इससे गुरेज भी नहीं करते। सबसे पहले तो हमें यह भी जानना चाहिए कि जब पहाडि़या विद्रोह राजमहल की जंगलतराई में फैला था, तब वहां संतालों का कोई अस्तित्व नहीं था। संतालों को अंग्रेजों ने पहाडि़यों पर अंकुश लगाने के लिए 1790 से 1810 के बीच बसाया। दामिन-इ-कोह में तब 429 गांव इनके बस चुके थे। 1851 आते-आते गांवों की संख्या 1473 तक पहुंच गई। जबकि पहाडि़यां यहां महाभारत काल से बसे हुए हैं। उन्हांेने न राजा कर्ण की अधीनता स्वीकार की न आने वाले बाद के राजाओं की। पहाडि़या खुद भी राजा थे। पर कालक्रम में इनका राजपाट खत्म हो गया और ये रंक बन गए। जंगलों पर निर्भरता इनकी बढ़ गई। अंग्रेजों ने जब इस क्षेत्रा में अपना कदम रखा तो उनके खिलाफ तीर-धनुा लेकर खड़े हो गए। 1772 में पहाडि़यों ने सशस्त्रा विद्रोह किया। इसके बाद 1778 में और 1783 में एक बड़ी चीख के रूप में उभरा। 320 पेज का यह उपन्यास इतिहास के गर्द-गुबार के भी झाड़ता है। उपन्यास बताता है कि तिलका पहाडि़या थे। पहाडि़या युवाओं ने 1942 के आंदोलन में भी बढ़-चढ़कर भाग लिया था। तिलका मांझी ने भागलपुर में जाकर क्लीवलैंड की हत्या कर दी थी। अंग्रेजों ने उसे वहीं से पकड़ लिया और 11 फरवरी, 1785 को उसे फांसी दे दी। राकेश सिंह ने जबरा से तिलका के रूपांतरण की कथा कह अटकलों पर विराम लगा दिया। इतिहास भी बताता है और यह उपन्यास भी कि पहाडि़या विद्रोह को शांत रखने के लिए क्लीवलैंड ने हिल रेंजर्स का गठन किया था। यह पहाडि़या युवकों की तीर-धनुा वाली बटालियन थी। इसका सही नाम हिल आर्चरर्स कोर था। इसमें 1300 पहाडि़या शामिल थे, जिसका कमांडर जवरा या जौराहा पहाडि़या था। जब वह रामगढ़ में हुए विद्रोह को कुचलने के लिए आया हुआ था, तभी उसे खबर मिली कि अंग्रेजोंने रानी सर्वेश्वरी को उनके किले में ही नजरबंद कर दिया है। जौराहा या जवरा को नागवार लगा। क्लीवलैंड ने उसके साथ धोखा किया। जवरा ने अपला चोला उतार फेंका और बन गया तिलका मांझी। रानी की नजरबंदी के बाद तिलका ने पूरे जंगलतराई में अंग्रेजों, साहूकारों, दलालों के साथ मारकाट शुरू कर दिया। नजरबंदी के छह महीने के बाद वह भागलपुर गया और 29 साल के भागलपुर के पहले कलेक्टर क्लीवलैंड को जहर बूझे तीर से मौत के घाट उतार दिया। गजेटियर इस पर मौन है। वह यह नहीं बताता कि 29 साल का कलेक्टर अपनी मौत कैसे मर गया? यह भी अचरज है कि जवरा उर्फ तिलका के मारे जाने के सौ साल बाद 1894 में ब्रिटिश सरकार ने उसके नाम पर काॅपर का सिक्का निकाला, क्यों?
  पहाडि़या विद्रोह के बहाने इस उपन्यास में पहाडि़या को भी जान पाते हैं। उनकी प्रथाएं, संघर्ा, गगन दमामा बाजे की स्वर भी। उपन्यास में और भी बहुत कुछ है, एक अरब साठ करोड़ वर्ा पुरानी राजमहल की पहाडि़यां और इस पर वास करते पहाडि़या। इसके साथ ही संतालों और पहाडि़या के बीच युद्ध और आपसी समझौते की कहानियां भी हैं। अंग्रेजों की कुटिलता और आदिवासियों की सादगी भी है। उस दौर का पूरा आंदोलन यहां फैला हुआ है। हमारे सामने वह पूरा काल-खंड घूमने लगता है। तिलका मांझी से तिलका बाबा और राजमहल की पहाडि़यों में बजता हूल का दमामा। राकेश का यह उपन्यास बोझिल नहीं हैं। उबाने वाली भााा नहीं है न परेशान करने वाले संवाद। रचना की पहली शर्त पठनीयता होती है। यह उपन्यास इस कसौटी पर भी खरा उतरता है। एक सवाल यह जरूर है कि कुछ संवाद भोजपुरी में हैं। शायद, वृहत्तर हिंदी समाज को देखते हुए ऐसा किया हो। पर, यहां आदिवासी भाााएं और गीत भी हैं। हूल के गीत, जो उत्प्रेरित करते हैं। एक शोधार्थी और एक प्रोफेसर भी है, जो इतिहास को सही करने और देखने के लिए वार्तालाप करते हैं। उनका वार्तालाप हमें इतिहास की ओर ले जाता है। इन तीनों उपन्यासों में एक कोई जरूर है, जो हमें अतीत की ओर ले जाता है। यह जरूरी इसलिए है कि हम बहुत कुछ आदिवासियों के बारे में नहीं जानते। खैर, ये तीनांे उपन्यास झारखंड के तीन जातियों का दिग्दर्शन कराते हैं। 
 



गाजीपुर में विवेकानंद


 संजय कृष्ण -   योद्धा संन्यासी स्वामी विवेकानंद पूर्वी उत्तरप्रदेश के गाजीपुर में चार महीने तक प्रवास किया। गाजीपुर में उनके बचपन के एक मित्रा रहते थे सतीश चंद्र मुखर्जी। वे गाजीपुर के गोराबाजार में रहते थे। विवेकानंद यहीं ठहरे थे। एक दूसरे मित्रा, रायबहादुर गगनचंद्र, जो अफीम कंपनी में अधिकारी थे, के द्वारा ही उन्हें यहां के संत पवहारी बाबा के बारे में जानकारी मिली थी। उनसे मिलने ही वे आए थे। उन दिनों विवेकानंद इधर ही भ्रमण कर रहे थे। प्रयाग, बनारस होते हुए गाजीपुर पहुंचे थे। बनारस में मलेरिया ने पकड़ा। कमर दर्द से वे पहले से ही परेशान थे। गाजीपुर आए तो लंबी प्रतीक्षा के बाद उन्हें पवहारी बाबा के दर्शन हुए, बीच-बीच में उनसे वार्तालाप भी हुई और शंका का समाधान भी। आए तो थे दो चार दिन के लिए ही लेकिन यहां की स्वास्थ्यप्रद जलवायु और पवहारी बाबा के आग्रह ने उन्हें रोक लिया। पवहारी बाबा से मिलने के लंबे समय बाद उन्होंने एक छोटी सी पुस्तिक ‘पवहारी बाबा’ लिखी। तब तक पवहारी बाबा दुनिया से विदा ले चुके थे क्योंकि पुस्तक में उनके समाधिस्थ होने का भी समाचार है। विवेकानंद 27 की उम्र में उनसे मिले और वे 13 साल और जीवित रहे। 40 की अवस्था में 1903 में विवेकानंद भी देश-दुनिया में अपने गुरु का विचार पहंुचा और मठों की स्थापना कर इस लोक से विदा हुए। विवेकानंद ने यह पुस्तिक 1903 से पहले ही लिखी होगी। तब तक पवहारी बाबा भी संसार छोड़ चुके थे। स्पष्ट है कि वे पवहारी बाबा की खोज खबर लेते रहे।
    विवेकानंद ने पुस्तिका अंग्रेजी में लिखी थी। हिंदी में यह पहली बार 1950 में आई। पुस्तक के कारण देश-दुनिया में लोग पवहारी बाबा को जानने लगे। वैसे, पवहारी बाबा का न नया धर्म चलाने में विश्वास था न मठ बनाने में और न शिष्य बना ने में। इसलिए वे कुर्था से बाहर कहीं गए नहीं। जो लोग इस संत के बारे में सुनते वे यहां आते। बाबा गुफा से बाहर होते तो दर्शन हो जाता, नहीं तो गुफा द्वार को ही प्रणाम कर चले जाते। बाबा योगी भी थे और भक्त भी। उनके बारे में कई तरह की किंवदंतियां उनके जीते जी प्रचलित हो गई थीं। आश्रम में ही उन्होंने एक गुफा बनवा रखी थी और उसी में वे साधनारत रहते थे। उनके बाहर निकलने की तिथि कोई निश्चित नहीं रहती, लेकिन पूर्णिमा से लेकर संक्रांति तक हवन होता था। इस बीच वे गुुफा में नहीं जाते थे। कुछ दिनों तक विवेकानंद आश्रम में ही रहे। आश्रम के भीतर एक बगीचा था, तरह-तरह के पेड़-पौधे लगे थे। नींबू के पेड़ों की भी बहुतायत उस समय थी, जिसका सेवन विवेकानंद खूब करते थे। विवेकानंद यदि पवहारी बाबा से न मिले होते और उनपर पुस्तिका न लिखी होती तो वे एक स्थानीय संत ही बनकर रह जाते। हालांकि पवहारी बाबा चाहते भी नहीं थे  कि वे जगप्रसिद्ध हों। ऐसी लोकेषणा उनमें नहीं थीं।  
    विवेकानंद जनवरी 1890 से लेकर अप्रैल तक गाजीपुर में रहे। उनके पहले रवींद्रनाथ टैगोर गाजीपुर में प्रवास कर चुके थे। गुरुदेव भी यहां करीब छह मास रहे। सन् 1888 के मार्च से लेकर जुलाई तक। विवेकानंद यहां उनके जाने के 2 साल बाद आए। वैसे दोनों के जन्म में दो साल का ही अंतर भी है। रवींद्रनाथ टैगोर का जन्म 7 मई, 1861 को हुआ था और विवेकानंद का 12 जनवरी 1863 को। दोनों समकालीन थे। दोनों कलकत्ते के ही दो नजदीकी मुहल्लों शिमला और जोड़ासांकों में पले-बढ़े थे। पर दोनों में कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं था न कोई वार्तालाप। रवींद्रनाथ टेगोर ने गाजीपुर में जब प्रवास किया तो उस समय उनकी उम्र 27 साल थी और कैसा संयोग कि जब विवेकानंद गाजीपुर में आए तो उस समय उनकी भी उम्र 27 साल ही थी। पर, विवेकानंद ने इसका कोई जिक्र नहीं किया। जाहिर है, गाजीपुर के भद्र बंगालियों से रवींद्रनाथ के प्रवास की चर्चा तो विवेकानंद ने सुनी ही होगी। पर, किसी पत्रा में इसका जिक्र नहीं है।
    विवेकानंद अपने गाजीपुर प्रवास के दौरान मित्रों, गुरु भाइयों एवं अग्रजों को करीब 15 पत्रा लिखे और संत और गाजीपुर की आबोहवा के बारे में जानकारी दी। पत्रों में कहीं विवेकानंद लिखा तो कहीं नरेंद्र तो कहीं नरेंद्रनाथ। पहला पत्रा उन्होंने शुक्रवार, 24 जनवरी, 1890 को प्रमदादास को लिखा। पता था, बाबू सतीशचंद्र मुखर्जी, गोरा बाजार, गाजीपुर। वे यहां तीन दिन पहले पहुंचे थे यानी 21 जनवरी को। पत्रा देखिए, ‘मैं तीन दिन हुए सकुशल गाजीपुर पहुंच गया। यहां मैं अपने एक बालसखा बाबू सतीशचंद्र मुखर्जी के यहां ठहरा हूं। गंगाजी पास में ही बहती हैं, परंतु उसमें स्नान करना कष्टसाध्य है, क्योंकि कोई सीधा रास्ता वहां तक नहीं जाता है रेत में चलना बहुत कठिन है।’....आगे लिखा है, ‘मेरी बड़ी इच्छा थी कि मैं वाराणसी आता, परंतु अभी तक बाबाजी पवहारी बाबा के दर्शन नहीं हुए। यही मेरे आने का अभिप्राय है। इसलिए कुछ दिनों का विलंब होना अनिवार्य है।’ 
    दूसरा पत्रा 30 जनवरी, 1890 को बलराम बोस को लिखा और गाजीपुर के स्वास्थ्यप्रद जलवायु का उल्लेख किया। लिखा कि, ‘...वैद्यनाथ का जल अत्यंत खराब है, हजम नहीं होता। इलाहाबाद अत्यंत घनी बस्ती है-वाराणसी में जब तक रहा, हर समय ज्वर बना रहा, वहां इतना ‘मलेरिया’ है। गाजीपुर में, खासकर जहां मैं रहता हूं, वहां की जलवायु स्वास्थ्य के लिए अत्यंत लाभदायक है।’ आगे सूचना दी कि ‘ पवहारी बाबा का निवासस्थान देख आया हूं। चारों तरफ ंची दीवारें हैं, देखने मंे साहबों का बंगला जैसा है, अंदर बगीचा है।’ पुनश्च के अंतर्गत विवेकानंद वहां की आर्थिक स्थिति का जिक्र करते हैं। बताते हैं कि यहां मकान का किराया 15 से 20 रुपये है, चावल महंगा है, दूध रुपये में 16 से 20 सेर है, अन्यान्य वस्तुएं सस्ती हैं। और हां, यह भी कि ‘वाराणसी अत्यंत मलेरियाप्रधान शहर है।’ दरअसल, यह पत्रा बलराम बोस को लिखा गया और उन्हें गाजीपुर में रहने के लिए सारी बातें बताई गईं कि गाजीपुर कैसा है, कितना महंगा है या सस्ता है। दरअसल, बलराम बोस भी गाजीपुर आना चाहते थे, इसलिए विवेकानंद ने पत्रा के माध्यम से ये सब जानकारी मुहैया कराई। विवेकानंद ने भी लिखा कि आप यदि कुछ दिन गाजीपुर में रहें तो अच्छा है। आपने रहने के निए बंगले की व्यवस्था सतीश कर सकेगा और गगनचंद्र राय नामक एक और व्यक्ति, जो आबकारी कार्यालय में बड़े बाबू हैं, अत्यंत ही सज्जन, परोपकारी तथा मिलनसार हैं। ये लोग सबकुछ व्यवस्था कर देंगे। दरअसल, बलराम भी किसी बीमारी से ग्रस्त थे। स्वास्थ्य लाभ के लिए ही उन्हें गाजीपुर आमंत्रित कर रहे थे, पर ऐसा हो न सका। जुलाई के एक पत्रा में विवेकांनद बलराम के असामयिक निधन पर गहरा शोक जताते हैं। जब बलराम के निधन की खबर मिली तो विवेकानंद भागे-भागे कलकत्ता गए।
   अगले दिन, 31 जनवरी को वे प्रमदादास मित्रा को फिर पत्रा लिखते हैं,  ‘बाबाजी से भेंट होना अत्यंत कठिन है, वे मकान से बाहर नहीं निकलते, अपनी इच्छानुसार दरवाजेे पर आकर भीतर से ही बातें करते हैं। ...लोगों का कहना है कि भीतर गुुफा यानी तहखाना जैसी एक कोठरी है, जिसमें वे रहते हैं, वे क्या करते हैं, यह वे ही जानते हैं क्योंकि कभी किसी ने देखा नहीं है। एक दिन मैं वहां जाकर बैठाबैठा कड़ी सर्दी की मार खाकर लौटा था।...रविवार को वाराणसी धाम के लिए प्रस्थान करूंगा- यहां के लोग मुझे नहीं छोड़ रहे हैं, नहीं तो बाबाजी के दर्शन की अभिलाषा मेरी समाप्त हो चुकी है।....फिर लिखते हैं, यह स्थान अत्यंत स्वास्थ्यप्रद है, बस इतनी ही इसकी विशेषता है।-नरेंद्र।
    स्वामी विवेकानंद बाबा का दर्शन न होने से उकता गए थे। गाजीपुर से कुर्था का आश्रम थोड़ी दूर है। आने-जाने में परेशानी संभव है। कुछ दिन बाद ही बाबा का दर्शन होता है। उनसे खासे प्रभावित भी होते हैं। 7 फरवरी के पत्रा में लिखते हैं, बाबाजी देखने में वैष्णव प्रतीत होते हैं। उन्हेें, योग, भक्ति, विनय की प्रतिमा कहनी चाहिए।...किसी को मालूम नहीं कि वे क्या खाते-पीते हैं। इसीलिए लोग उन्हें पवहारी बाबा कहते हैं। एक बार जब वे पांच साल तक गुफा से बाहर नहीं निकले तो लोगांे ने समझ लिया कि उन्होंने शरीर त्याग दिया है। किंतु वे फिर उठ आए। पर इस बार वे लोगों के सामने निकलते नहीं और बातचीत भी द्वार के भीतर से ही करते हैं। इतनी मीठी वाणी मैंने कहीं नहीं सुनी, वे प्रश्नों का सीधा उत्तर नहीं देते, बल्कि कहते हैं, ‘दास क्या जाने।’ अगले दिन, 8 फरवरी के पत्रा में बाबा जी से मिलने का जिक्र काफी उल्लास के साथ विवेकानंद करते हैं। ‘...बड़े भाग्य से बाबाजी से साक्षात्कार हुआ। वास्तव में वे एक महापुरुष हैं। बड़े आश्चर्य की बात है कि इस नास्तिकता के युग में भक्ति एवं योग की अद्भुत क्षमता के वे अलौकिक प्रतीक हैं। मैं उनकी शरण में गया और उन्हांेने मुझे आश्वासन दिया है, जो हरएक के भाग्य में नहीं। बाबाजी की इच्छा है कि मैं कुछ दिन यहां ठहरूं, वे मेरा कल्याण करेंगे।’
   पवहारी बाबा विवेकानंद से 23 साल बड़े थे। यानी जब वे मिले तो उनकी उम्र 40 की रही होगी। इस उम्र तक बाबा काफी लोकप्रिय हो गए थे। एक बार स्वामी विवेकानंद ने पवहारी बाबा से पूछा कि संसार की सहायता करने के लिए अपनी गुफा से बाहर क्यों नहीं आते। बाबा ने एक नकटे साधु की एक कहानी सुनाई और कहा कि तुम्हारी क्या ऐसी इच्छा है कि मैं भी इसी प्रकार के एक और संप्रदाय की स्थापना करूं? विवेकानंद तार्किक थे और पवहारी बाबा ज्ञानी। एक बार फिर इसी प्रश्न को घुमाकर जब विवेकानंद ने पूछा तो कहा कि तुम्हारी क्या ऐसी धारणा है कि केवल स्थूल शरीर द्वारा ही दूसरों की सहायता की जा सकती है? क्या शरीर के क्रियाशील हुए बिना केवल मन ही दूसरों के मन की सहायता नहीं कर सकता?
    एक दूसरे अवसर पर जब विवेकानंद ने पूछा कि ऐसे श्रेष्ठ योगी होते हुए भी होमाद्रि क्रिया तथा रघुनाथजी की पूजा आदि कर्म जो साधना की केवल प्रारंभिक अवस्था के लिए समझे जाते हैं-क्यों करते हैं? बाबा ने बहुत ही सहज ढंग से विवेकानंद की इस शंका का समाधान किया, तुम यही क्यों समझ लेते हो कि प्रत्येक व्यक्ति अपने निज के कल्याण के लिए ही कर्म करता है? क्या एक मनुष्य दूसरों के लिए कर्म नहीं कर सकता? विवेकानंद ने बाबा के कई चमत्कारों का भी जिक्र किया है।
   विवेकानंद यहां कुछ दिनों के लिए आए थे और दर्शन की अभिलाषा के कारण वे यहां चार महीने तक टिके रहे। मार्च 1890 को उन्होंने स्वामी अखंडानंद को पत्रा लिखा। पत्रा से जाहिर होता है वे गाजीपुर शहर छोड़ बाबा के यहां ही ठहरे थे। लिखा है, मैं इस समय यहां के अद्भुत योगी और भक्त पवहारीजी के पास ठहरा हूं। वे अपने कमरे से कभी बाहर नहीं आते। दरवाजे के भीतर से ही बातचीत करते हैं। कमरे के अंदर एक गुफा में वे रहते हैं। कहा जाता है कि वे महीनों समाधिस्थ रहते हैं।...अपना बंग देश भक्ति और ज्ञान प्रधान है, वहां योग की चर्चा तक नहीं होती। जो कुछ है वह केवल विचित्रा श्वास साधन इत्यादि का हठयोग, वह तो केवल एक प्रकार का व्यायाम है। इसीलिए मैं इस अद्भुत राजयोगी के पास ठहरा हूं।’ दूसरे पैराग्राफ में अपने कुछ गुरु भाइयों की शंका का समाधान किया है। उन्हें लगा कि ये अब रामकृष्ण परमहंस को छोड़ कोई और गुरु कर रहे हैं। स्वामीजी ने शंका निवारण करते हुए लिखा है, ‘मेरा मूलमंत्रा है कि जहां जो कुछ अच्छा मिले, सीखना चाहिए। इसके कारण मेरे बहुत से गुरुभाई सोचते हैं कि मेरी गुरुभक्ति कम हो जाएगी। इन्हें मैं पागलों तथा कट्टरपंथियों के विचार समझता हंू, क्योंकि जितने गुरु हैं वे सब एक उसी जगद्गुरु के अंश तथा आभासस्वरूप हैं। यदि तुम गाजीपुर आओ तो गोराबाजार में सतीश बाबू या गगनबाबू से मेरा ठिकाना पूछ लो। अथवा पवहारी बाबा को तो यहां का बच्चा-बच्चा जानता है। उनके आश्रम में जाकर पूछ लेना कि परमहंस कहां रहते हैं। लोग तुम्हें मेरा स्थान बता देंगे। मुगलसराय के पास दिलदारनगर नामक एक स्टेशन है जहां से तुम्हें ब्रांच रेलवे द्वारा तारीघाट तक जाना होगा। तारीघाट से गंगा पार करके तुम गाजीपुर पहंुचोगे। अभी तो मैं कुछ दिन गाजीपुर ठहरूंगा।’
    विवेकानंद बाबा से दीक्षा भी लेना चाहते थे लेकिन स्थितियां ऐसी आ जातीं कि संकल्प को स्थगित करना पड़ता। वे बाबा से हठयोग सीखना चाहते थे ताकि उनकी कमर का दर्द दूर हो सके। यह अभिलाषा भी उनकी पूरी नहीं हुई। दूसरी इच्छा थी कि बाबा से कुछ आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करें। यह भी पूरी नहीं हुई। इससे विवेकानंद काफी निराश हो गए। निराशा इस स्तर तक पहुंच गई कि उन्होंने संकल्प ही ले लिया कि अब किसी बाबा से नहीं मिलना है। विवेकानंद का मोटो दूसरा था और पवहारी बाबा का दूसरा। विवेकानंद ने खुद अपनी ही पुस्तिका में उनके बारे में लिखा है, ‘भारत के अन्य अनेक संतों के सदृश पवहारी बाबा के जीवन में भी कोई विशेष बाह्य क्रियाशीलता नहीं दीख पड़ती थी। ‘शब्द द्वारा नहीं बल्कि जीवन द्वारा ही शिक्षा देनी चाहिए, और जो व्यक्ति सत्य धारण करने के योग्य हैं, उन्हीं के जीवन में वह प्रतिफलित होता है।’-उनकी जीवन इसी भारतीय आदर्श का एक और उदाहरण है। इस श्रेणी के संत, जो कुछ वे जानते हैं, उसका प्रचार करने में पूर्णतया उदासीन रहते हैं, क्योंकि उनकी यह दृढ़ धारणा होती है कि शब्द द्वारा नहीं, वरन केवल भीतर की साधना द्वारा ही सत्य की प्राप्ति हो सकती है। उनके निकट धर्म सामाजिक कर्तव्यों की प्रेरकशक्ति नहीं है, वरन इसी जीवन में सत्य का प्रखर अनुसंधान एवं सत्य की उपलब्धि है। वे काल के किसी एक क्षण मंे अन्यान्य क्षणों की अपेक्षा अधिक क्षमता स्वीकार नहीं करते। अतएव अनंत काल के प्रत्येक क्षण के एक समान होने के कारण वे इस बात पर जोर देते हैं कि मृत्यु की बाट न जोहकर इसी लोक में तथा प्रस्तुत क्षण में ही आध्यात्मिक सत्यों का साक्षात्कार कर लेना चाहिए।’....‘उनकी एक विशेषता यह थी कि वे जिस समय जो काम हाथ में लेते थे, वह चाहे कितना ही तुच्छ क्यों न हो, उसमें पूर्णतया तल्लीन हो जाते थे। वे जिस प्रकार पूर्ण अंतःकरण से श्रीरघुनाथजी की पूजा करते थे, उसी एकाग्रता तथा लगन के साथ एक तांबे का लोटा भी मांजते थे। उन्हांेने हमें कर्म रहस्य के संबंध में यह दीक्षा दी थी कि जौन साधन तौन सिद्धि, अर्थात् ध्येयप्राप्ति के साधनों से वैसा ही प्रेम रखना चाहिए, मानो वे स्वयं में ध्येय हों, और वे स्वयं इस महान सत्य के उत्कृष्ट उदाहरण थे।’ ...‘ वे प्रत्यक्ष रूप से कभी उपदेश नहीं देते थे, क्योंकि ऐसा करना तो मानो आचार्यपद ग्रहण करने तथा स्वयं को मानो दूसरों की अपेक्षा उच्चतर आसन पर आरूढ़ कर लेने के सदृश हो जाता।  परंतु एक बार जब उनके हृदय का स्रोत खुल जाता था तब उसमें से अनंत ज्ञान की धारा निकल पड़ती थी। पर फिर भी उनके उत्तर सीधे न होकर संकेतात्मक ही हुआ करते थे।...उनके एक ही आंख थीं और अपनी वास्तविक उम्र से वे बहुत कम प्रतीत होते थे। उनकी आवाज इतनी मधुर थी कि हमने वैसी आवाज अभी तक नहीं सुनी।’
   विवेकानंद ने उनकी एक और विशेषता का उल्लेख नहीं किया है। पवहारी बाबा की लिखावट बहुत सुंदर थी। उनके हस्तलिखित ग्रंथ उनके आश्रम में पड़े हैं। इस तुच्छ लेखक को वह ग्रंथ देखने का मौका मिला। ग्रंथ में खूबसूरत डिजाइनदार किनारे और प्रसंगानुसार चित्रा सजे हुए हैं। चित्रा भी बाबा ने खुद ही बनाए थे। उन्हें देखकर उनके कलाबोध को समझ सकते हैं और एक संत के भीतर कितना उम्दा कलाकार भी था, चित्र इसकी चुगली करते हैं।


पीएन विद्यार्थी की याद में

डा. प्रभु नारायण विद्यार्थी से पहली बार परिचय डा. गिरिधारी राम गौंझू ने कराया। इसके बाद तो यह परिचय धीरे-धीरे प्रगाढ़ होता गया। इसी क्रम में पहली बार गौंझूजी के साथ उनके हरमू स्थिति घर गया। घर के ग्राउंड फ्लोर पर ही उनका कार्यालय और पुस्तकालय है। इसी में दसों आलमीरा पुस्तकें भरी पड़ी हैं। घर में कुछ कुर्सियों को छोड़कर किताबों का अखंड साम्राज्य स्थापित है। उनका यह समृद्ध पुस्तकालय और राहुल की समग्र पुस्तकों को देखकर चकित ही हुआ जा सकता है। राहुल के प्रति उनमें विशेष अनुराग था। यही कारण था कि वे राहुल की किताबों तक ही सीमित नहीं रहे, बल्कि उनकी पत्नी और पुत्रों के साथ भी उनका आत्मीय रिश्ता कायम हो गया था। संभव है, उनको घूमने की प्रेरणा राहुल सांकृत्यायन से ही मिली हो! 'अथातो घुम्मकड़ जिज्ञासाÓ को चरितार्थ करता उनका चरित्र और बौद्ध धर्म के प्रति विशेष लगाव के कारण ही तो नहीं श्रीलंका में उनका निधन हुआ। श्रीलंका में सम्राट अशोक के पुत्र ने बौद्ध धर्म का बिरवा रोपा था, जो आज वट वृक्ष बनकर लहलहा रहा है। श्रीलंका में उनके निधन के कुछ तो निहितार्थ होंगे ही।
प्रशासनिक सेवा से मुक्त होने के बाद तो उनका एकमात्र काम घूमना रह गया था। कभी बोधगया, कभी श्रीलंका, कभी कनाडा, कभी अमेरिका। हमेशा यात्रा पर ही रहे। फोन मिलाइए तो उधर जवाब आता, अभी तो शिमला में हैं। पेंशन का पैसा घूमने और किताबों में ही खर्च होता। जहां जाते, किताबों का ग_ïर ले आते। अंगरेजी, बांग्ला, अरबी, मगही जैसी आधा दर्जन भाषाओं के जानकार विद्यार्थीजी ने कोई पचास किताबें लिखी हैं। इनमें क्षेत्रीय इतिहास से लेेकर कविता, कहानी, संस्मरण, लेख आदि शामिल हैं। अभी-अभी दिल्ली से छपकर उनकी नई किताब आई है 'सत्ता की साजिश और पाखंड का मकडज़ाल।Ó तीन सौ पृष्ठï की इस पुस्तक में बौद्ध धर्म से लेकर दलित विमर्श और जातियों के जंगल से गुजरते हुए अगड़ी-पिछड़ी राजनीति तक को समेटा है। यह पुस्तक उनकी वैचारिक प्रतिबद्धता और पक्षधरता को रेखांकित करती है।
विद्यार्थीजी की सरलता व्यक्तिगत रूप से मुझे आकर्षित करती रही है। संयुक्त सचिव से अवकाश प्राप्त करने वाले इस अधिकारी में अकड़ या दंभ नाम की कोई चीज नहीं थी। इतनी सरलता और सहजता विरले लोगों में होती है। हो सकता है, यह बुद्ध के दर्शन का प्रभाव हो!  यह भी हो सकता है कि झारखंड के आदिवासियों के बीच रहने के कारण यह गुण उनमें सहज आ गया हो। जब अधिकारी थे, जंगलों की खाक छानते और उनके दुख-दर्द को देखते और जितना संभव होता, उनकी मदद करते। आज के अधिकारियों की ओर नजर दौड़ाइए तो पता चलेगा कि भारत को भुखमरी को ओर ले जाने वाले ये ही नौकरशाह हैं। नितांत असंवेदनशील और बेईमान। झारखंड में जो भी योजनाएं गरीबों-आदिवासियों के लिए चलाई जा रही हैं, उन पर ये अधिकारी कुंडली मारकर बैठे हैं।
ऐसे समय में इनकी याद स्वाभाविक है। अवकाश प्राप्ति के बाद तो उनके पास दो ही शगल थे, लिखना और घूमना। इसके अलावा उन्हें एक और शौक था। इसे प्राय: कम लोग ही जानते हैं। पुराने-नए सिक्कों, नोटों और डाक टिकटों का संग्रह। उनके पास दुनिया भर के सिक्के, नोट और डाक टिकटों के कई एलबम भरे हुए हैं। जहां जाते, जिस देश जाते वहां के नोट, सिक्के और डाक टिकट ले आते और अपने एलबम को समृद्ध करते।
उनने एक महत्वपूर्ण काम यह किया है कि जहां-जहां वे अधिकारी रहे, उस क्षेत्र के अज्ञात इतिहास से पर्दा उठाया। रोमिला थापर ने अपने एक लेख में क्षेत्रीय इतिहास पर बल दिया था। क्षेत्रीय इतिहास की कडिय़ों को जोड़कर ही भारत का समग्र इतिहास लिखा जा सकता है। यह काम बड़ी ईमानदारी से विद्यार्थीजी ने किया। जब वे देवघर में पदस्थापित थे, वहां के एक मराठी ब्राह्मïण के बारे में लिखा। इस ब्राह्मïण सखाराम देउस्कर ने 'देेशेरकथाÓ लिखी थी। इस पुस्तक का उन्होंने पुनरुद्धार ही नहीं किया, बल्कि स्थानीय लोगों के सहयोग से उनकी मूर्ति भी स्थापित की। यह पुस्तक आजादी के आंदोलन की चश्मदीद कहानी है। लेखक ने महाराष्ट्र से अपने परिवार के आने की कहानी के साथ आजादी को लेकर चले संघर्ष की कहानी को भी लिखा है। अभी हाल में हिंदी के ख्यात आलोचक डा. मैनेजर पांडेय ने इस पुस्तक का संपादन किया है और यह नेशनल बुक ट्रस्ट से प्रकाशित हुई है। इस पुस्तक की भूमिका डा. पांडेय ने विद्यार्थी की महत्ता को रेखांकित किया है।
विद्यार्थीजी के काम का मूल्यांकन होना बाकी है। लोगों ने उनके कामों को रेखांकित करने से परहेज किया है। कारण, वे किसी गुट के आदमी नहीं थे। इधर, रांची में जो ट्रेंड चला है, तू मुझे सराहो, मैं तुझे सराहूं, इससे वे मुक्त ही रहे। इसलिए, लोग उन पर कम ही ध्यान देते हैैं। वैसे, राधाकृष्ण जैसे सिद्धहस्त कथाकार को जब रांची के कथाकार याद नहीं करते, तो विद्यार्थीजी को कैसे याद कर सकते हैं। अपने-अपने वैचारिक खूंटे में बंधे लोगों से बहुत अपेक्षा भी नहीं की जा सकती। जब वह नहीं हैं, उनकी यादें, मुस्कुराता हुआ चेहरा बार-बार याद आता है। 

बस यारा, बंद करो यह लंगर

हुसैन कच्छी 
पाकिस्तान जिसको एक दुनिया गेटवे टू इस्लामिक वल्र्ड यानी इसलामी मुल्कों तक जाने का सदर दरवाजा कहलाती है, वहां बेकसूर लोगों के कत्ल का बाजार लगे हुए कई साल हो गए हैं। पेशावर उसका सदर मुकाम बना हुआ है। वही पेशावर जो एक वक्त में दमिश्क से चीन तक कारोबार के लिए आने-जाने के रास्ते में मुसाफिरों के लिए राहते जान का दर्जा रखता था। यात्रा वृत्तांत लिखने वालों ने इस शहर को तकिया कहा है। सारे जहां के लोग यहां एक दूसरे से मिलते थे। सब अनजाने लोग यहां जाने-पहचाने बन जाते थे। अपने-अपने इलाकों की बातें बताते थे। सफर की दास्तानें सुनाते थे। किस्से-कहानियों का सिलसिला सदियों तक जारी रहा। इस शहर की इसी खसूसियत की वजह से यहां के मशहूर बाजार किस्सा ख्वानी का नाम पड़ा। वही किस्सा ख्वानी बाजार जिसके अंदर मुहल्ला खुदा आबाद में दिलीप कुमार का जन्म हुआ था। नजदीक ही पृथ्वी राजकपूर और राज, शम्मी और शशि कपूर का पैतृक घर भी है, जहां राजकपूर की आदमकद तस्वीर सामने से गुजरने वालों का इस्तकबाल करती है और बताती है कि यह शहर तहजीबों, रिवायतों का गहवारा रहा है। इस शहर ने हिंदुस्तान के अजीम अदाकार दिलीप कुमार, नहीं, यूसुफ खां, नहीं, दिलीप कुमार को पाकिस्तान का सबसे बाइज्जत शहरी सम्मान सितारा-ए-पाकिस्तान के लकब से नवाजा गया। इसी शहर में पैदा हुए शायर अहमद फराज ने कहा, 'अबके हम बिछड़े तो शायद कभी ख्वाबों में मिलें, जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलेंÓ तो माडर्न लिटरेचर के जानकार उर्दू शायरी के इस ताजा फूल को और नजदीक से देखने की कोशिश कर रहे थे। उसी गजल में जब वह कहते हैं, 'तू खुदा है न मेरा इश्क फरिश्तों जैसा, दोनों इंसां हैं तो क्यों इतने हिजाबों में मिलेंÓ तो जमाने ने महसूस किया कि दरअसल फराज पेशावर की सबसे बाइज्जत और बाबरकत शख्सीयत अजीम सूफी शायर रहमान बाबा की रिवायत को ही आगे बढ़ा रहे हैं। रहमान बाबा पश्तो भाषा में रुह की गहराई तक उतर जाने वाली शायरी करते थे। उनकी शायरी का तर्जुमा दुनिया भर की भाषाओं में किया गया है। पेशावर में उनके मुरीदों ने उनका आलीशान मजार तामीर किया जहां अकीदतमंदों का हुजूम लगा रहता है। नापाक उग्रवादियों को रहमान बाबा की तालीम से डर लगता है क्योंकि वो कहते थे सब इंसान बराबर हैं। यह दुनिया सबके लिए है और अमन भाईचारा अमृत है। अमन का धर्म अजीम धर्म है। बाकी सब धोखा। रहमान बाबा जब लोगों के बीच थे तो उनके आस-पास मजमा लगा रहता था। प्यार मुहब्बत के तलबगारों का मजमा। सच्ची और ईमानदार तालीम के तलबगारों का मजमा। ऐसे तलबगारों को ही तालिबान कहते हैं। ढोंगियों को नहीं। रहमान बाबा ने आंखें मूंद लीं तो और भी ताकतवर हो गए। उनका मजार दुनिया में उनके चाहने वालों के लिए राहत की जगह है और पनाहगाह बन गया है। दुनिया करवट लेती रही, ढोंगियों का गिरोह शक्लें बदल-बदल कर जमीन पर फैल गया। उन्हीं ढोंगियों में ये झूठे तालिबान शामिल हो गए। यह तालिबान नहीं बल्कि बबूल रोपने वाले बागबान हैं और जो इंसानी खून से कांटों की खेती को सींचते हैं। रहमान बाबा ने अपनी शायरी में बहुत पहले कहा था, 'तुम दूसरों पर तीर चलाओगे तो वही तीर पलटकर आएंगे और तुम्हें छेदेंगे।Ó इसके साथ उन्होंने यह भी कहा था कि 'तुम दूसरों के लिए कांटे बोओगे तो वह तुम्हारे पैरों में आकर तुम्हें ही लहूलुहान कर देंगे।Ó बदकिस्मती से जब इन नापाक तालिबानों की बुआई शुरू हुई तो पाकिस्तान अफगानिस्तान में कुछ लोग इसको दीन की खिदमत समझने की गलती कर बैठे। इसका नतीजा सामने है। पेशावर, जो दिलचस्प किस्सागोई, माहौल में फलों-फूलों की खुशबू, हस्तशिल्प, लाजवाब फनकारों, खुबसूरत लोगों, शुजाअत और बहादुरी की मिसाल, आजादी की लड़ाई में अंग्रेजों के सामने सीना तानकर खड़े होने का हौसला रखने के लिए मशहूर था, आज एक सहमा हुआ, रोता-बिलखता शहर है। सौ से ज्यादा स्कूली बच्चों का कत्लेआम पाकिस्तान की पेशानी का ही नहीं, दुनिया के तमाम अमनपसंद शहरियों के सीने का दाग बन चुका है। ये सिलसिला बंद होना ही चाहिए। जाहिर में खबरें कुछ भी बताएं लेकिन टेलीविजन पर एक आदमी जो यह कह रहा था कि यार बस करो, तुम्हें खुदा का वास्ता, रसूल का वास्ता...। , उसी दरम्यान उसने यह भी कहा, यार अफगानिस्तान में अमरीका का एक भी कुत्ता नहीं मरता, यहां कितने बच्चों की लाशें पड़ी हुई हैं।
पता नहीं क्यूं, कुछ चैनल वाले अमरीकी कुत्ता वाली बात को एडिट कर रहे थे, अखबारों का भी यही हाल रहा। पेशावर में मौत का लंगर बांटा गया, डेढ़ सौ के करीब जिंदगियां बुझ गईं। इसकी पहली खबर के बाद दिल की बेचैनी का आलम लिए दिल ही दिल में रहमान बाबा के मजार में हाजिरी हुई और यह शिकायत पेश की, यह गुजारिश भी कि बस यारा, अब बंद करो यह लंगर। अब और सहा नहीं जाता। यहां मुझे विभाजन के वक्त अमृता प्रीतम की कही हुई दो पंक्तियां याद आ रही हैं, जिसके मायने हैं, आज वारिस शाह से पूछूंगी, कभी कब्र से बाहर आकर बोल और ये कत्लोगारतगरी रोक। यही पंक्तियां रहमान बाबा के आस्ताने में याद आ रही हैं।
                                                                 हुसैन कच्‍छी रांची के जिंदादिल इंसान और संस्‍क़तिकर्मी हैं।

नजरबंदी में भी रांची में मौलाना ने जलाई शिक्षा और आजादी की अलख

मौलाना अबुल कलाम आजाद हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रबल हिमायती था। रांची का सौभाग्य रहा कि नजरबंदी में उन्होंने रांची में अपना समय व्यतीत किया और रांची को तो दिया ही, यहां रहकर उन्होंने अपनी नजरबंदी का बेहतर इस्तेमाल भी किया। यहीं पर उन्होंने कुरआन की तरजुमा भी किया। कंधार से एक व्यक्ति उन्हें पैदल ही रांची मिलने आया। रांची में गोवंश को बचाने के लिए हिंदू और मुसलमानों को एक साथ खड़ा किया। कई संस्थाओं को जन्म दिया, जो आज भी हैं। मुसलमानों के शैक्षणिक पिछड़ेपन को दूर करने के लिए मदरसा की नींव रखी।

पांच अप्रैल, 1916 को रांची में रखा कदम 
28 मार्च, 1916 को बंगाल की सरकार ने उन्हें बंगाल छोडऩे का हुक्म दिया और चार दिन का समय। बाद में समय बढ़ाया और इसे चार अप्रैल तक बढ़ा दिया। आदेश के बाद मौलाना पांच अप्रैल को रांची आ गए और डाक बंगला में ठहरे। यहां की पुलिस को कोई खबर नहीं। बड़ी मुश्किल से वह आठ अप्रैल को पता लगा पाई कि मौलाना रांची में हैं। इसके बाद 13 अप्रैल को उनकी बहनें और बहनोई मोइनुद्दीन भोपाल से आए और उनके साथ ठहर गए। 15 अप्रैल को बंबई की राज्य सरकार ने भी अपनी सीमा में उनके प्रवेश पर पाबंदी लगा दी। उडि़सा-बिहार की सरकार की पुलिस ने भी उनके रांची प्रवास पर आपत्ति जताई। 21 अप्रैल को रिटायर्ड इंस्पेक्टर आफ स्कूल्स, बंगाल सरकार के मौलवी अब्दुल करीम के मोरहाबादी स्थित आवास में स्थानांतरित हो गए। बाद में काफी मशक्कत के बाद उन्हें रांची में रहने की इजाजत मिली मगर कई शर्तों के साथ। 15 अगस्त, 1917 को अंजुमन इस्लामिया की स्थापना हुई। एक सितंबर को हुई बैठक में यहां एक मदरसा स्थापित करने पर सहमति बनी। 27 जनवरी, 1918 को मदरसा इस्लामियां रांची भवन का शिलान्यास किया गया।
मौलाना रांची में चुप नहीं बैठे थे। राजनीतिक गतिविधियों पर रोक लगी थी। इसलिए वे खुले तौर पर कुछ नहीं करते थे। लेकिन उन्होंने मस्जिद में ही तकरीर करनी शुरू कर दी। मुसलमान तो सुनते ही थे, हिंदू भी सुनने के लिए मस्जिद में जाने लगे। जब कुछ लोगों ने हिंदुओं के प्रवेश पर आपत्ति जताई तो एक किताब लिखकर जवाब दिया।
मदरसा का पहला वार्षिक सम्मेलन :
मदरसा इस्लामिया का पहला वार्षिक सम्मेलन तीन से पांच नवंबर, 1918 को हुआ तो उसके उद्घाटन के मौके पर रांची के कई गणमान्य हिंदू भी शामिल हुए। इसमें कलकत्ता, सासाराम, पटना से भी लोग आए थे। उनके नाम देखकर इसका अंदाजा लगा सकते हैं-हाजी गनी लतीफ, इस्माइल मोहम्मद, नूर मोहम्मद जकारिया, दाउद अहमद, फजलुद्दीन अहमद। सभी कलकत्ता से आए थे। साथ ही यहीं से अखबार मोहम्मदी के संपादक मौलवी एकराम भी तशरीफ लाए थे। शाह सुलेमान फुलवारवी पटना से, अब्दुल अजीज, बांकीपुर, मौलाना कादिर बख्श, सहसराम, मौलवी चौधरी नजीर आलम जो उस समय रांची के डीसी थे, मौलवी अब्दुल करीम, राय बहादुर राधा गोविंद चौधरी, कालीपद घोष, राय साहब अमरेंद्र नाथ बनर्जी, राय साहब ठाकुर दास, बाबू गोरखनाथ वकील सभी रांची के। आनरेबल मिस्टर एसके सहाय के अलावा कलकत्ता से बाबू विपिन चंद्र पाल भी आए थे। कई सत्रों में यह सम्मेलन हुआ। ज्योतिंद्रनाथ टैगोर सहित यहां के कई भद्र बंगालियों ने भी हिस्सा लिया और सहयोग किया। उस दौर में रांची घूमने आए सुल्तानपुर, अवध के राजा साहब भी आए थे और उन्हें भी आमंत्रित किया गया।

मौलाना से मिलने कंधार से आया पैदल : 
इस घटना का दिलचस्प विवरण उनकी किताबों में है। घटना 1918 की है। दिसंबर की ठिठुरती ठंड में एक दिन मौलाना आजाद नमाज पढ़कर मस्जिद से बाहर निकले तो उनकी निगाह एक ऐसे व्यक्ति पर पड़ी जो एक कंबल ओढ़े उनकी प्रतीक्षा में खड़ा था। मौलाना उसके पास गए और उससे पूछताछ की। पता चला कि वह सीमा प्रांत कंधार की ओर से केवल उनसे मिलने के लिए ही रांची आया है। मौलाना आजाद की उत्सुकता बढ़ी और उनके पूछने पर उसने बतलाया कि वह एक निहायत गरीब और साधारण आदमी है। वह पैदल चलकर कंधार से क्वेटा तक आया। वहां उसे अपनी तरफ के कुछ व्यापारी मिल गए। जिन्होंने किसी तरह उसे आगरा भिजवा दिया। आगरा से वह फिर पैदल चलकर रांची पहुंचा। उसकी इन बातों को सुनकर मौलाना काफी द्रवित हो उठे। उन्होंने जब उससे इतना कष्ट उठाकर रांची आने का कारण पूछा, तब उसने कहा कि पवित्र कुरआन की कुछ व्याख्या सुनने के लिए उनके पास आया है। वह व्यक्ति कई दिनों तक रांची में मौलाना आजाद के साथ रहा। लेकिन एक दिन अचानक वह बिना किसी पूर्व सूचना के वापस चला गया। मौलाना को इसका काफी दुख हुआ। मौलाना ने तरजुमानुल कुरआन उसी को समर्पित कर दिया।




गोशाला में दिया अंतिम भाषण
रांची में नजरबंद रहते हुए भी मौलाना आजाद की राजनीतिक और सामाजिक सरगर्मियां ठंडी नहीं पड़ी थी। मौलाना केवल तकरीर ही नहीं करते थे। लोगों में आजादी का जोश तो भरते ही थे, शिक्षा को लेकर अपनी चिंता को भी यहां परवाना चढ़ाया। वे हर जुमे को तकरीर करते थे। नमाज के बाद मस्जिद में हिंदू भी मौलाना का भाषण सुनने के लिए आते थे। रांची के कुछ मुसलमानों ने विरोध प्रकट किया कि ये लोग मस्जिद में क्यों आ जाते हैं? उन लोगों की आपत्ति सुनकर मौलाना ने 'जामिल सवाहिदÓ नाम की किताब लिखी। यह हिंदू मुस्लिम एकता की बेजोड़ पुस्तक मानी जाती है। रांची के गजनफर मिर्जा, मोहम्मद अली, डा. पूर्णचंद्र मित्र, देवकीनंदन प्रसाद, गुलाब नारायण तिवारी, नागरमल मोदी, रंगलाल जालान, रामचंद्र सहाय आदि उनसे अक्सर मिलते-जुलते रहते थे और आजादी पर चर्चा करते थे। 1919 में रांची गोशाला में गोपाष्टमी मेला लगा था। अंतिम दिन अपना अंतिम भाषण देकर वे रांची से चले गए। उस दिन रांची गोशाला, पिंजरापोल में हिंदू-मुसलमानों की इतनी सम्मिलित भीड़ थी, जैसा रांची के इतिहास में पहले कभी भीड़ नहीं जुटी थी। रांची से जाने के बाद दुबारा मौलाना रांची नहीं आ सके। लेकिन रांची उनके दिल में बस गई। कई महत्वपूर्ण और कालजयी काम उन्होंने रांची में ही किया। रांची को बहुत कुछ दिया भी।

जगदीश त्रिगुणायत और मुंडारी रामायण


भारतीय भाषा में ही नहीं, दुनिया की कई भाषाओं में रामकथा का साहित्य मौजूद है। दूसरी भाषाओं में राम से जुड़े प्रेरक प्रसंग, उनकी कथा, जीवन चरित आदि से उनकी लोकप्रियता का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। अपने देश में ही कई भाषाओं में राम का चरित उजागर हुआ है। संस्कृत से लेकर कई अन्य लोक भाषाओं में हम राम को पढ़ते-गुनते आ रहे हैं। कुछ दूसरी गोत्र की भाषाओं में भी राम के आख्यान मौजूद हैं, जिन्हें हिंदी के लेखकों या फिर राम पर गंभीर काम करने वाले अध्येताओं ने भी छोड़ दिया। यह भाषा है मुंडारी... मुंडा आदिवासी द्वारा बोली जाने वाली भाषा है।

इस भाषा के बाबत, जैसा कि जगदीश त्रिगुणायत जी ने लिखा है, छोटानागपुर पहाडिय़ों की संथाल, हो तथा अन्य जातियों द्वारा बोली जाने वाली भाषाओं के साथ भाषाओं के उस परिवार से संबंध रखती हैं जिसे आस्ट्रो-एशियाटिक कहते हैं और जिसमें मान-ख्मेर, वापालंग, निकोवारी, खासी, मलक्का की आदिवासी भाषाएं सम्मिलित हैं। इस भाषा में फैले मुंडारी लोक गीतों का संकलन जगदीश जी ने किया है, जिसका नाम है 'बांसरी बज रहीÓ। इस संकलन में करीब 351 गीत हैं। जिनमें कुछ गीत राम के प्रसंग से भी जुड़े हैं। हम यहां उन्हीं में से कुछ गीतों को रखेंगे ताकि यह पता चल सके कि एक नितांत दूसरी कुल गोत्र की भाषा में रामकथा किस रूप में मौजूद है।

इससे पहले इस बात की भी छूट चाहेंगे कि हम थोड़ा जगदीश त्रिगुणायतजी के बारे में भी जान लें, जिन्होंने यह भगीरथ प्रयास किया। योंकि वे अभी जीवित हैं और नबे को छू रहे हैं। इन्हें हिंदी का हमारा समाज पूरी तरह भूल ही चुका है। 
   जगदीश जी का जन्म देवरिया (उार प्रदेश)में एक मार्च 1923 को हुआ था। पढ़ाई-लिखाई के बाद वे 1941 में महात्मा गांधी और डा. राजेंद्र प्रसाद की प्रेरणा से खादी ग्रामोद्योग के प्रचार-प्र्रसार के सिलसिले में रांची (झारखंड) चले आए। वे यहां अकेले नहीं आए थे, बल्कि उनकी मंडली में पांच आदमी थे-मोती बीए, सदानंद ब्रह्मïचारी, कवि शंभुनाथ सिंह, जगदीश त्रिगुणायत और एक कोई उपाध्यायजी। इस ग्रामोद्योग का उद्देश्य आदिवासियों में आजादी के प्रति जागृति, उनका उत्थान, चरखा का प्रचार आदि शामिल था। ये लोग एक साल तक छोटानागपुर के गांवों को घूमते रहे। गांवों की संस्कृति-संस्कार, रहन-सहन, नृत्य-गीत, रीति-रिवाज को देखते-परखते, सोचते-समझते रहे। कुछ लोगों को झारखंड की आबोहवा भा गई। वे यहीं रह गए। शंभुनाथ सिंह एक साल बाद एमए करने के लिए इलाहाबाद चले गए। इसी तरह और लोग भी यहां से चले गए सिवाय सदानंद ब्रह्मïचारी और जगदीश त्रिगुणायतजी के। जब खूंटी हाई स्कूल बना, त्रिगुणायतजी उसमें प्राध्यापक हो गए और वहीं छात्रावास में छात्रों के साथ रहने लगे। इसके बाद जब एचईसी की स्थापना हुई, त्रिगुणायतजी वहां जनसपंर्क अधिकारी के रूप में पदस्थापित हो गए। सन 1981 में यहां से अवकाश लिया और 91 तक रांची में रहे। इसके बाद वे अपने गांव देवरिया लौट गए। अभी वे जीवित हैं। हालांकि कुछ लेखों में उन्हें स्वर्गवासी बता दिया गया है। 
   आदिवासी जीवन के प्रति उनके रुझान को ले उनके परम शिष्य डा. रामदयाल मुंडा कहते हैं कि उनका रुझान शुरू से ही आदिवासी जीवन के प्रति रहा। यहां के लोक गीत, लोक नृत्य और लोक कथाओं के बारे में अधिकाधिक जानने का उत्सुक रहते। त्रिगुणायतजी का भी मानना है कि 'उनकी (आदिवासियों) सेवा करने का मौका नहीं मिलता तो उनकी संस्कृति को नहीं जान पाते।Ó
इस 'जाननेÓ के कारण ही उनकी दो पुस्तकें 'बांसरी बज रहीÓ और 'मुंडा लोक कथाएंÓ आईं। 'बांसरी बज रहीÓ 1957 में बिहार राष्ट्रभाषा परिषद से प्रकाशित हुई और 'मुंडा लोक कथाएंÓ 1968 में बिहार कल्याण विभाग से। 
   मुंडा जाति का सबसे बड़ा गीत या कथागीत 'सोसोबोंगाÓ जो उनके पूरे संघर्ष के इतिहास को दर्शाता है, इस गीत को प्रकाश में लाने का श्रेय त्रिगुणायतजी को ही है। वैसे, हाफमैन ने भी इस गीत को अपने विश्वकोष में जगह दी है, लेकिन वह पूरा नहीं है। संकलन के बाद त्रिगुणायतजी ने इस कथागीत को स्वतंत्र पुस्तिका के रूप में प्रकाशित कराया था। बाद में मुंडारी लोक कथा में इसे शामिल कर दिया।
   त्रिगुणायतजी के 'बांसरी बज रहीÓ संकलन में रामकथा प्रसंग से जुड़े करीब बीस गीत शामिल हैं। गीत के मूल रचयिता बुधू बाबू हैं। बुधू बाबू मुंडा साहित्य को समृद्ध करने वाले सबसे बड़े गीतकार थे। इनका पूरा नाम बुधनाथ शिखर था और इनका जन्म 1830 के लगभग और मृत्यु 1900 और 1910 के बीच हुई थी। वे लगभग अस्सी वर्ष जीवित रहे। बुधू बाबू के बारे में कहा जाता है कि जो बोल गए वह गीत बन गया। यह भी अजीब है बुधू बाबू मुंडा नहीं थे, लेकिन वे मुंडा भाषा के सबसे बड़े कवि हैं। कहते हैं कि हरी बाबू नामक एक पंचपरगनिया भाषा का गीतकार बुधू बाबू का साथी था। वह मुंडा भाषा भी अच्छी तरह जानता था। बुधू बाबू ने अंतिम समय में उससे अपनी 'रामायणÓ पूरी करने का अनुरोध किया था, किंतु उनकी इच्छा पूरी न हो सकी। इसी अधूरी रामायण के कुछ अंश को जगदीश जी ने अपने संकलन में जगह दी है।        
संकलन का पहला गीत शूर्पनखा से होती है, जो लंकापति के दरबार में कहती है कि-हाय, हे भाई! मै तुमकों या बताऊं, दो युवकों के साथ
एक बहुत सुंदर स्त्री है।
.......   
हाय, हे भाई!
उन्होंने मेरी नाक काट ली।
और, गीत का अंत-अंगद की लंका से वापसी पर होता है, जहां राम के शिविर में पहुंचकर अंगद राम को प्रणाम करता है। इसी के बीच की कथा दी गई है। गीतों में वीर हनुमान व अंगद की भूरि-भूरि प्रशंसा की गई है। कुछ गीत देखें-
 रामायन रे ओलकन/बुदु बाबू दुरङ्तन/
राम राम मेन्ते/ सेटेर जनको लङकते/ राम राम मेन्ते। (रामायण में जो कुछ लिखा हुआ है, उसी को बुदु बाबू गा रहे हैं। राम राम कहते हुए, वे लंका को पहुंच गए, राम राम कहते हुए)
डरी मंदोदरी जब रावण से बंदरों की वीरता का बखान करती है तो रावण कहता है-
होड़ो गडि़ सदोम् मिडि/ इन जिलुलो:ञ् जोम्तन् मडि/ दिनकि हो अम्गेम् उतुतन्/ अञ्दोञ् छन्द जन्/ ओको बीर लङाक्ते: हिअकन्। (आदमी, बंदर, घोड़े और भेड़/इन्हीं के मांस से तो हम भात खाते हैं। प्रतिदिन तुम्ही तो(उन्हें) पकाती हो। मुझे आश्चर्य होता है/ (कि) कौन वीर लंका आया हुआ है?)
अंगद लंकापति के दरबार में पैर जमाकर बैठ गया। रावण मेघनाथ से कहता है कि यह नहीं जानता कि मैं कौन हूं। वह कहता है, हे मेघनाथ, उठो, इसे पकड़ लो और उठाकर फेंक दो। बंदर वीर बनने चला है! (रावन राजाए: कजितन/ अञ् ओकोए कए: ठोओरन/ इनते अनए: कजितन्/ बिरिद् मे ग मेघनाथ/ सबि:मे ग मेघनाथ/ हुरङ् गिडि़ तइमे/ गडि़ बीरे: बइअकन्)
रावण को इस बंदर की शक्ति का अहसास नहीं था। वीर अंगद ने ताल ठोका और राजा रावण मुंह के बल गिर पड़ा। उसका मुकुट जमीन पर बिखर गया। वीर अंगद उठा-उठाकर रावण को फेंक रहा है। राम दल के वीर इस तमाशे को देख रहे हैं। (अङ्गïद बीरे: तलिकेन/ रावन राजाए: तुबिद्जन/ बो:रे मुकुट तलरे गिडिज़न्/ अङ्गïद वीर हलङ्  हलङ् हुरङ्गिडि़तन्/ रामदल बीर को लेल्तन्)
रावण को परास्त करने के बाद अंगद राम के शिविर में चला जाता है। सभी वीर अंगद को देख रहे हैं और अंगद राम को प्रणाम कर रहा है। बुदु बाबू की यह कहानी यहीं समाप्त हो जाती है। जगदीश जी ने इन गीतों को बड़े परिश्रमपूर्वक संकलित किया है। हिंदी में इसे माइलस्टोन माना जाता है। उनके बाद फिर किसी हिंदी भाषी ने मुंडा या अन्य झारखंड की भाषाओं में बिखरे गीतों को संकलित करने का प्रयास नहीं किया। अलबाा, धीरे-धीरे आदिवासी समाज खुद अपने टोटमों, गीतों, कथाओं को संकलित करने के प्रति जागरूक हुआ है। 

मूक बराकर को जैसे भाषा मिल गई

सुकांत भट्टïाचार्य का पत्र

12 अनंतपुर, हिनू, रांची
अरुण। आंधी, तूफान और अविश्वास को अनदेखा करते हुए अंतत: सचमुच रांची आ गया। आने के क्रम में उल्लेखनीय कुछ नहीं देखा। सिर्फ पूर्णिमा के अस्पष्ट प्रकाश में गहरे बराकर नदी को देखा। रात गहरी थी, लग रहा था कि रात्रि जा रही है। उसी अंधेरी रात में मूक बराकर नदी में गंभीरता प्रतिबिंबित हो रही थी। लग रहा था कि सबको भाषा मिल गई है। बराकर का पानी और दूर के पहाड़ मेरे सामने एक सपना रच रहे थे। बराकर नदी के एक ओर बंगाल है और दूसरी ओर बिहार। इसी के बीच में झरझर बहती बराकर नदी। क्या अद्भुत एवं गंभीर दृश्य। दूसरी कोई नदी, शायद गंगा भी मेरी नजरों में इतनी मोहनी नहीं है।
और अच्छा लगा रहा था गोमो स्टेशन। वहां ट्रेन बदलने के लिए आखिरी रात इंतजार करना पड़ा। पूर्णिमा की पूर्णिता को उपलब्ध किया। उस स्टेशन की शांति मेरे जीवन में हमेशा चिरस्थायी रहेगी। इसके बाद अपरिचित सुबह हुई। अब छोटे-छोटे पहाड़, छोटी-छोटी सूखी नदियां, लाल पंगडंडी अगल-बगल में अनजान भागते पेड़, देखते- देखते ट्रेन का रास्ता खत्म हो गया।
रांची रोड से बस से आगे बढऩा शुरू किया। बस की क्या भयंकर आवाज थी। बहुत तेजी से पहाड़ी सड़क से गुजर रहा था। हजारों फीट की ऊंचाई में बस चल रही थी। यह देखकर हम बहुत आवेश में आ गए। जिंदगी में बहुत से प्राकृतिक दृश्य देखें लेकिन ऐसा अभिभूत करने वाला नहीं। रांची आ गया। हमलोग जहां रहते हैं, वह रांची नहीं है। वह रांची से दूर, डोरंडा में रहते हैं। हम लोगों के घर के सामने से स्वर्णरेखा नदी बहती है। उसी के बगल के एक क्रबिस्तान है। इसको देख कर हम खो जाते हैं। उस क्रबिस्तान में बहुत बड़ा वटवृक्ष है जो सिर्फ मेरा ही नहीं, सबका प्रिय है। उस वटवृक्ष के ऊपर एवं नीचे मेरी कई दोपहर बीती है। पिछला शुक्रवार से सोमवार दोपहर तक प्रति पल मेरा बहुत आनंद में बीता। रविवार को 18 मील दूर जोन्हा जल प्रपात देखने गए। ट्रेन चलने के साथ ही भयंकर बारिश शुरू हो गई। इस तरह की बारिश का आनंद पहली बार लिया। दोनों पहाड़ और वन धुंधला नजर आने लगे। यह रोमांच पैदा कर रहा था। लेकिन आनंद अभी बाकी था, जो जोन्हा पहाड़ के अंदर इंतजार कर रहा था। पानी में भींगते हुए काफी दूर पैदल चलने के बाद पहाड़ के नीचे एक बौद्ध मंदिर के सामने खड़े हुए। मंदिर के रक्षक ने आकर दरवाजा खोल दिया। शांत मंदिर में प्रवेश किए। मंदिर में लोहे के दरवाजा एवं खिड़कियां थीं, उसको हमलोंगों ने घूमघूम देखा। मंदिर का घंटा बजाया। यह ध्वनि पहाड़ तक ही सीमित रही। बाहरी दुनिया में नहीं पहुंची। संध्या हो रही थी। इस भयंकर जंगल में बाघ का डर भय पैदा कर रहा था। इसलिए हमलोग मंदिर में ही आश्रय लिए। इसके बाद हमलोग निकटवर्ती जलप्रपात देखने गए। हम लोगों ने जो देखा, उसने स्नायु तंत्र को अभिभूत किया। अब तक का अभ्यस्त परंपरागत वृष्टि का प्रलय था। यह सब देख कविता लिखे बगैर नहीं रह सका। यह कविता मेरे पास है। लौटकर दिखाएंगे। जोन्हा में आकर हम जो कुछ देखे वह छोटानागरपुर आकर सार्थक हो गया। यद्यपि हुंडरू बहुत ही विख्यात जलप्रपात है, लेकिन उसके उपभोग का सौभाग्य नहीं मिल सका। यह हम जोर से बोल सकते हैं। जो आदमी जोन्हा देखा है, वह मेरी बात का विश्वास नहीं करेगा। जोन्हा जितना सुंदर उपभोग्य नहीं है। ऐसी बात नहीं है। अगर एक दिन पहले भी पहुंचते तो भी इस तरह के रोमांचित दृश्य से वंचित रहते। प्रपात देखने के बाद संध्या हमलोगों ने बुद्ध देव की वंदना की। गपशप किया। रात्रि भोजन किया। इसके बाद स्तब्ध गहन अरण्य में पानी के धुन को सुनते-सुनते सो गए। जोन्हा पूरी रात तीव्र वेग से गहरी जलधारा पहाड़ पर पटकता रहा। अपनी सांस को सुन रहे थे।
प्रहरी जैसा जगा रहा ध्यानमग्न पहाड़। दूसरे दिन हमलोगों ने रहस्यमय जोन्हा को देखा। उसके उच्छल रूप के प्रति हमलोग गहरा प्यार जताए। उसके बाद अनिच्छा के साथ वापस लौटे। आने के समय जो वेदना हुई, वह और भी बढ़ गई जब हम लोगों ने आधे लोगों को विदाई दी।
जोन्हा से लौटते हुए मन में प्रार्थना कर रहे थे कि यह यात्रा अनंत हो, लेकिन रास्ता खत्म हुआ, हमलोग जोन्हा और आश्रयदाता बुद्ध मंदिर को छोड़कर वापस आ गए।
जिंदगी में बहुत कम चीज आती है, लेकिन लगभग सबकुछ चला जाता है। जोन्हा ही इसका बड़ा प्रमाण है।
रांची आने बाद आधा लोग विदा हुए तो आनंद जाता रहा। लेकिन इसी के बीच दो दिन रांची पहाड़ी गए और उल्लसित हुए। इस पहाड़ी के ऊपर से रांची शहर बहुत सुंदर नजर आता है, लगता है कि लिलिपुट साम्राज्य का गठन कर रहा है। शहर के बीचोबीच एक लेक है, सृजन के साथ उसका दृश्य भी लगातार बदलते रहता है। यही लेकर शहर के सौंदर्य को बढ़ाता है। रांची पहाड़ के ऊपर एक छोटा सा शिव मंदिर है। उस मंदिर में खड़ा होकर लगता है कि रांची चारों ओर पहाड़ से घिरा है। पहाड़ पर एक गुफा है, जिसका आनंद लिया जा सकता है। रांची की अखंड सत्ता सिर्फ रांची पहाड़ से ही नजर आती है।
डोरंडा में डोरंडा बांध एक चीज है, जिसमें एक दिन हम नहाएं। एक शाम उसका हृदय से अनुभव किया। इसको एक तालाब कह सकते हैं। इसको सब लेक बोलता है फिर भी जलाशय के रूप में मुझे बहुत अच्छा लगा। इसके सिवा डोरंडा का रास्ता, मैदान और जंगल बहुत अच्छे लगे। एक तरह से यहां का सबकुछ अच्छा है। सिर्फ एक चीज खराब है। यहां का पड़ोसी, बाजार की दूरी और सैनिकों का आधिपत्य। अभी भी बारिश हो रही है। लेकिन यही हल्का पानी असाध्य को साधा है। दुबली पतली स्वर्ण रेखा नदी को युवती बना दिया। इसके जलस्रोत और लहर से रोमांचित हो रहे थे। क्योंकि कल तक स्वर्णरेखा के बीचोबीच खड़ा होने से भी पैर नहीं भींगता थे।
फिर भी रांची का बहुत कुछ नहीं देखे हैं। पर जो कुछ देखा है, उससे परितृप्त हो गए-यानी कि रांची मुझे अच्छा लगा। फिर भी रांची का वैचित्र्य कम होता जा रहा है। आजकल सभी का चेहरा एक ही नजर आ रहा है। अत: विदाय
सुकांत भट्टाचार्य
पुनश्च
मुझे लौटने में देर होगी। उतने दिन कृपा करके भाई की देखभाल करना। क्योंकि यहां का प्राकृतिक आकर्षण से अधिक पारिवारिक आकर्षण है। कब लौटेंगे, यह निश्चय नहीं है। बन्ना का काम कितना दूर। पत्र का उत्तर देना। 
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आए थे इलाज कराने, मोहित हो गए रांची पर

21 साल की उम्र दुनिया से विदा लेने की नहीं, दुनिया को देखने-समझने की होती है। पर, सुकांत इतने खुशनसीब नहीं थे। सुकांत यानी सुकांत भट्टाचार्य। सरदार भगत सिंह भी मात्र 23 साल ही जिए, लेकिन दुनिया को एक संदेश दे गए। उ
उस समय डोरंडा अलग था। ओवरब्रिज नहीं बना था। सो, डोरंडा रांची से अलग-थलग था। घने जंगल हुआ करते थे। पुराने लोग आज भी कहते हैं, रांची जाना है।
सुकांत रांची ही नहीं, जोन्हा फाल भी जाते हैं ट्रेन से...18 मील दूर जोन्हा जल प्रपात देखने गए। ट्रेन चलने के साथ ही भयंकर बारिश शुरू हो गई। इस तरह की बारिश का आनंद पहली बार लिया। दोनों ओर पहाड़ और वन धुंधले नजर आने लगे। यह रोमांच पैदा कर रहा था। लेकिन आनंद अभी बाकी था, जो जोन्हा पहाड़ के अंदर इंतजार कर रहा था। ..इस भयंकर जंगल में बाघ का डर भी था। इसलिए हमलोग बौद्ध मंदिर में ही आश्रय लिए। इसके बाद हमलोग निकटवर्ती जलप्रपात देखने गए। यह सब देख  कविता लिखे बगैर नहीं रह सका। ...जिंदगी में बहुत कम चीज आती है, लेकिन लगभग सबकुछ चला जाता है। जोन्हा इसका बड़ा प्रमाण है।Ó
सुकांत रांची पहाड़ी और बड़ा तालाब का जिक्र करते हैं। कहते हैं कि इस पहाड़ के ऊपर से रांची शहर बहुत सुंदर नजर आता है, लगता है कि लिलिपुट साम्राज्य का गठन कर रहा है। शहर के बीचोबीच एक लेक है, सृजन के साथ उसका दृश्य भी लगातार बदलते रहता है। रांची पहाड़ के ऊपर एक छोटा सा शिव मंदिर है। उस मंदिर में खड़ा होकर लगता है कि रांची चारों ओर पहाड़ से घिरी है। रांची की अखंड सत्ता सिर्फ रांची पहाड़ से ही नजर आती है।Ó
सुकांत डोरंडा में एक तालाब का जिक्र करते हैं...डोरंडा में डोरंडा बांध है, जिसमें एक दिन हम नहाएं। एक शाम उसका हृदय से अनुभव किया। इसको एक तालाब कह सकते हैं। इसके सिवा डोरंडा का रास्ता, मैदान और जंगल बहुत अच्छा लगा। एक तरह से यहां का सबकुछ अच्छा है।Ó पर सुकांत एक खराब चीज का भी वर्णन करते हैं, सिर्फ एक चीज खराब है। यहां के पड़ोसी, बाजार की दूरी और मिलिट्री का आधिपत्य। फिर भी रांची का बहुत कुछ नहीं देखे हैं। पर जो कुछ देखा है, उससे परितृप्त हो गए-यानी कि रांची मुझे अच्छा लगा।Ó
पत्र बहुत लंबा है। अपने इस पत्र में सुकांत बहुत कुछ कहते हैं। रांची की एक झलक उनके पत्रों में मिलती है। यह पत्र, किसी दुर्लभ दस्तावेज से कम नहीं। 
नकी लेखनी में जिस तरह विचारों की प्रौढ़ता झलकती है, वैसा ही सुकंात की कविताओं या लेखों-पत्रों में दिखाई पड़ती है। सुकांत असमय काल कवलित हो गए। उन्हें तब राजरोग था यानी टीबी। उस दौर में यह लाइलाज बीमारी थी। कैंसर की तरह। इलाज के क्रम में ही सुकांत रांची आए थे और निवारणपुर के अनंतपुर में वे रहते थे। गुलामी के दौर में 15 अगस्त, 1926 को वे पैदा हुए, लेकिन आजादी से ठीक पहले 13 मई, 1947 को वे चल बसे। सुकांत ने अपनी छोटी से उम्र में खूब लिखा। वे काजी और गुरुदेव से खासे प्रभावित रहे, लेकिन उनकी कविता का स्वर काजी के साथ संगत करता है। विद्रोह की लालिमा उनकी कविताओं में मिलती है। इसलिए इस युवा कवि को 'युवा नजरूलÓ भी कहा गया। निधन से तीन साल पहले कम्युनिस्ट पार्टी आफ इंडिया से जुड़ गए थे। पं बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेब भट्टाचार्य सुकांत के भतीजे थे।    खैर, उनके साहित्य-रचना की चर्चा फिर कभी करेंगे। आज उनके पत्र में समाए रांची या कहें, छोटानागपुर के सौंदर्य को देखते हैं। उन्होंने रांची के अपने ठिकाने,  2 अनंतपुर, हिनू, रांची से एक पत्र अरुण को लिखा था। पं बंगाल से आने का हवाला दिया है और बराकर नदी के अप्रतिम सौंदर्य का। गोमो में ट्रेन बदलने का इंतजार और उस पूर्णिमा की स्तब्ध रात का सौंदर्य उनकों आंखों में उतर गया। वहां दूसरी टे्रन पकड़ रांची रोड उतरे और बस पकड़ रांची आए। पहले रांची आने का यही मार्ग था। सीधे ट्रेन नहीं थी। सो, उन्होंने वैसा ही किया और बस से रांची आए। रांची रोड से रांची के बीच में पहाड़ों की बेपनाह मुहब्बत उन्हें आकर्षित कर रही थी। उनके शब्दों में ही देखें 'रांची रोड से बस से आगे बढऩे लगी। बस की क्या भयंकर आवाज थी। बहुत तेजी से पहाड़ी सड़क से गुजर रही थी। हजारों फीट की ऊंचाई पर बस चल रही थी। जिंदगी में बहुत से प्राकृतिक दृश्य देखे, लेकिन ऐसा अभिभूत करने वाला नहीं। तब तक रांची आ गया। हमलोग जहां रहते हैं, वह रांची नहीं है। रांची से दूर, डोरंडा में रहते हैं। हम लोगों के घर के सामने से स्वर्णरेखा नदी बहती है। उसी के बगल में एक क्रबिस्तान है। इसको देख कर हम खो जाते हैं। उस क्रबिस्तान में बहुत बड़ा वटवृक्ष है जो सिर्फ मेरा ही नहीं, सबका प्रिय है। उस वटवृक्ष के ऊपर एवं नीचे मेरी कई दोपहर बीती है।Ó 

हम तो कवि हैं, इतिहास बदलने वाले हैं

हिंदी में गोपाल सिंह नेपाली अकेले ऐसे कवि हैं, जिन्हें कई विशेषणों से नवाजा गया है। प्रकृति से लेकर राष्ट्रीय चेतना को झकझोरने वाली उनकी कविताओं का रेंज इतना व्यापक है कि उन्हें किसी एक खांचे में डालना थोड़ा मुश्किल लगता है। लोगों ने अपने-अपने सौंदर्यबोध, राष्ट्रबोध, प्रकृति प्रेम के कारण कई संबोधनों से संबोधित किया। उन्हें 'प्रकृति का कविÓ कहा गया, 'राग और आग का कविÓ कहा गया, 'गीतों का राजकुमारÓ कहा गया तो 'राष्ट्रवादी कविÓ से भी संबोधित किया गया। पर, उनकी कविताओं की विविधवर्णी छवियों को देखकर ये सारे संबोधन, उपाधियां, विशेषण उनकी विद्युत प्रतिभा की चमक के आगे बौने ही सिद्ध होते हैं। बेशक, देश की सरहद के आर-पार देखने वाले नेपाली का मूल्यांकन अभी बाकी है। इसका एक कारण यह भी है किआलोचक अभी अपने कुनबे से बाहर देख पाने पर असमर्थ हैं। वे ठोंक-बजाकर अपने चहेते कवि को महान और कालजयी कवि सिद्ध करने के 'सारस्वतÓ कर्म में संलग्न हैं। फिर, नेपाली का अपना कोई कुनबा भी नहीं था। वैचारिक खूंटा भी नहीं कि आलोचक उन्हें याद करें?

पिछले पचास साल की उपेक्षा के बाद भी नेपाली यदि लोगों के जनमानस में अपनी जगह बनाए हुए हैं तो आलोचकों की बदौलत नहीं, अपनी कविता, भाव बोध और राष्ट्रीय चेतना की बदौलत। हालावाद के सर्जक हरिवंश राय बच्चन ने उनकी मृत्यु पर लिखा था, 'हिंदी कविता को जनमानस तक पहुंचाने में उनका योगदान अद्वितीय है।Ó अभी हाल में दिवंगत हुए जानकी वल्लभ शास्त्री ने लिखा है- 'मिल्टन, कीट्स और शेली जैसे त्रय कवियों की प्रतिभा नेपाली में त्रिवेणी संगम की तरह उपस्थित है।Ó प्रकृति के सुकुमार कवि पंत ने नेपाली की कविताओं का पर कहा था- 'आपकी सरस्वती, स्नेह, सहृदयता और सौंदर्य की सजीव प्रतिमा है।Ó निराला ने तो उन्हें 'काव्याकाश का दैदीप्यमानÓ सितारा ही कह डाला। ये बातें आज की लिखी हुई नहीं हैं। बहुत पहले की हैं। फिर भी हमने नेपाली को उपेक्षित छोड़ दिया।

गोपाल सिंह नेपाली का जन्म एक गोरखा परिवार में जन्माष्टमी (11 अगस्त, 1911 )के दिन हुआ था। उनका मूल नाम गोपाल बहादुर सिंह था। पिता सेना में थे। सो, कभी यहां कभी वहां। परिवार का कोई स्थायी ठिकाना नहीं बन पाया। नेपाली लिखते हैं, 'मां और कहीं, पिता जी जर्मनी की लड़ाई में, और मेरा छोटा भाई पेशावर में। छुटपन के इसी विरह ने कविता की तुकबंदी सिखाई होगी।Ó इस अस्थिरता और भागमभाग ने उनकी पढ़ाई भी बाधित की। पर, उनकी प्रतिभा बाधित नहीं हो पाई। सोलह की उम्र से ही तुकबंदी ने कविता का शक्ल लेना शुरू कर दिया और 22 की उम्र में उनका पहला संग्रह 'उमंगÓ आ गया था। संग्रह आने से पहले ही वे मंच के मजे हुए कवि सिद्ध हो चुके थे। बनारस, इलाहाबाद, कलकत्ता के तीन बड़े कवि सम्मेलनों ने न केवल उनके आत्मविश्वास को बढ़ाया, बल्कि वे देश के चुनिंदा कवियों में शुमार भी होने लगे। मंच ने ही उन्हें मायानगरी पहुंचाया। 1943-44 में बंबई में हुए महाकवि कालिदास शताब्दी समारोह से वे फिल्मी दुनिया में प्रवेश किए। उनकी पहली फिल्म थी मजदूर थी। इसके निर्माता थे एस मुखर्जी, निर्देशक थे पीएल संतोषी, कथा लेखक थे प्रेमचंद और संवाद लिखे थे उपेंद्र नाथ अश्क ने। इसके बाद तो सफर, लीला, गजरें, शिवरात्रि, शिवभक्त, तुलसीदास, नाग पंचमी, नरसी भगत आदि 40-45 फिल्मों में करीब तीन सौ गीत लिखे। उसी दौरान इन्होंने 'हिमालय फिल्म्सÓ और 'नेपाली पिक्चर्सÓ की स्थापना की। निर्माता-निर्देशक के तौर पर तीन फीचर फिल्में-नजराना, सनसनी और खुशबू भी बनाई। इतना कुछ होने के बाद भी यह दुनिया उन्हें रास नहीं आई। एक पत्र में उन्होंने लिखा है, 'यह सिनेमा वल्र्ड साहित्य, कला या दर्शन की जगह नहीं, बिजनेस का अखाड़ा है। यहां रुपया और रमणियां हैं।Ó करीब एक दशक तक सक्रिय रहने के बाद 1955-56 में फिल्मी दुनिया को अलविदा कह दिया और मंच पर एक बार फिर अपनी सत्ता कायम कर ली। इसके बाद तो उनके 'पंछीÓ 'रागिनीÓ 'पंचमीÓ 'नवीनÓ और 'हिमालय ने पुकाराÓ इनके काव्य और गीत संग्रह आए। 'पंछीÓ संग्रह पर निराला ने अपनी टिप्पणी लिखी है, 'मुझे उनके काव्य में शक्ति, प्रवाह, सौंदर्य-बोध तथा चारू चित्रण एक विशेषता लिए हुए दिख पड़े।Ó

उमंग संकलन में ही मोहन शीर्षक कविता संकलित है। यह 1931 में तब लिखी गई थी, जब गांधी दिसंबर महीने में गोलमेज सम्मेलन में भाग ले रहे थे। बीस की उम्र में नेपाली ने लिखा, पर इससे क्या होता जाता/है हम दुखियों का मोहन/ यहां हमारे घर में जारी/ वैसा ही निष्ठुर दोहन/...आओ मोहन शंख बजाओ/ पहनो केशरिया बाना।

 नेपाली का अहिंसा में कतई विश्वास नहीं था। इसलिए गांधी को भी केशरिया बाना पहनने का आह्वान किया। यह विश्वास आजादी के बाद भी खंडित नहीं हुआ। 1956 में ही शासन चलता तलवार से कविता लिखकर एक बार फिर देश की चेतना को झकझोर दिया। पाकिस्तान के दुस्साहस और नेहरू द्वारा महज कागजी कार्रवाई के बाद कवि आहत मन से लिखा,
 ओ राही दिल्ली जाना तो कहना अपनी सरकार से
 चरखा चलता है हाथों से शासन चलता तलवार से।  
सन् 1962 के चीनी आक्रमण के समय उन्होने कई देशभक्तिपूर्ण गीत एवं कविताएं लिखीं जिनमें सावन, कल्पना, नीलिमा, नवीन कल्पना करो आदि बहुत प्रसिद्ध हैं। चीनी आक्रमण पर नागार्जुन ने भी कविताएं लिखीं और चीन, नेहरू और वामपंथ की खबर ली।
नेपाली का आह््वान था-
भारत के जवानो, भारत के जवानो
भारत से तुम्हें प्यार तो बंदूक उठा लो
इन चीनी लुटेरों को हिमालय से निकालो। 

......
नेपाली अपने कलम को तलवार की तरह इस्तेमाल करते थे। कविता पर गौर करें-
'बहन तू बन जा क्रांतिकराली, मैं भाई विकराल बनूं
तू बन जा हहराती गंगा, मैं झेलम बेहाल बनूं।

ये पंक्तियां अब मुहावरा बन चुकी हैं। उन्होंने अपनी कलम की सदैव रक्षा की। उनके लिए कलम की स्वाधीनता ही असली धन था। मेरा धन स्वाधीन कलम। अपनी इस विशिष्टता के कारण ही वे भीड़ों में खोए नहीं। वे सदैव नवीन कल्पना करते रहे। आम आदमी के दुख-दर्द को शब्द देते रहे-दिन गए बरस गए, यातना गई नहीं, रोटियां गरीब की, प्रार्थना बनी रहीं। जाति के झंझावतों में फंसी हिंदू समाज की चेतना को भी झकझोरा-बिछड़े परिजन मिले बढ़ाते हाथ प्रेम का मिलने को/पर, जाता सम्मान हमारा उन हरिजन को छूने में। नागार्जुन की हरिजन कविता को याद करें। तब साहित्य में दलितवाद उपस्थित नहीं हुआ था। लेकिन नेपाली और नागार्जुन हिंदू समाज की जड़ता पर प्रहार कर रहे थे।

इन विशिष्टताओं के साथ-साथ उनके प्रकृति के प्रति एक अनुराग था। शायद चंपारण और देहरादून में बीते बचपन के कारण प्रकृति से उनका एक गहरा लगाव पैदा हो गया था। यही वजह है कि उनकी रचनाओं में मौलसिरी, पंछी, हरीघास, पीपल, किरण, सरिता, बेर आदि का अत्यंत सजीव चित्रण मिलता है।
नेपाली ने पत्रकारिता भी की। निराला के साथ 'सुधाÓ मासिक पत्र में काम भी किया। इसके बाद 'रतलाम टाइम्सÓ, 'पुण्य भूमिÓ तथा 'योगीÓ के संपादकीय विभाग में काम किया। उत्तर छायावाद के महत्वपूर्ण कवियों में शुमार नेपाली ने लोकतत्वों से संस्कार लेकर हिंदी गीतों को समृद्ध किया। एक नई भाषा दी। उसका विस्तार किया। एक नई पहचान बनाई। 'हम धरती क्या आकाश बदलने वाले हैं, हम तो कवि हैं, इतिहास बदलने वाले हैं।