हैलो, हैलो माइक टेस्टिंग, एआइआर रांची

 हैलो, हैलो माइक टेस्टिंग। एआइआर रांची...। 1957 में आकाशवाणी से इसी तरह कार्यक्रम प्रसारित होते थे। लोग इस आवाज को भी सुनते। इसके



बाद तो समाचार की शुरुआत ही इस लहजे से होती थी...यह आकाशवाणी है, अब आप...से समाचार सुनिए। एक दौर में सूचना का एक मात्र स्रोत रेडियो हुआ करते थे। समाचार पत्र तो सुबह-सुबह आ जाते, लेकिन कोई दोपहर की घटना हो, संध्या की घटना हो तो उसके लिए आकाशवाणी ही एकमात्र माध्यम हुआ करता था। समाचार का समय निर्धारित था। सो, लोग ध्यान से समाचार सुनते। सिर्फ समाचार ही नहीं, मनोरंजन का भी स्रोत यही था। नाटक, रेडियो वार्ता, कहानियों का पाठ, कृषि से लेकर अन्य क्षेत्रीय कार्यक्रम भी प्रसारित होते। क्षेत्रीय भाषा में गीत-संगीत का प्रसारण भी होता।
रांची में 27 जुलाई, 1957 को आकाशवाणी केंद्र की स्थापना की गई। इसी साल इसका नाम आकाशवाणी रखा गया। इसके पहले इसका नाम भारती प्रसारण सेवा हुआ करता था। 1936 में इसका नाम ऑल इंडिया रेडियो था 1957 में आकाशवाणी।
रांची में केंद्र खुलने से छोटानागपुर को विशेष लाभ हुआ। यहां की स्थानीय भाषाओं में कार्यक्रम प्रसारित होने लगे। नागपुरी, मुंडारी, उरांव, हो, संताली भाषाओं की रचनाएं, गीत आदि का प्रसारण होता। डा. श्रवणकुमार गोस्वामी कहते हैं पहले केवल पटना में था। यहां के कलाकारों को मौका ही नहीं मिलता। जब खुलने की बात आई तो लोगों में काफी उत्साह देखा गया। जब उद्घाटन की तिथि आई तो कलाकारों के उत्साह का पूछना ही नहीं था। तब वेलफेयर सेंटर में इसका उद्घाटन हुआ। उद्घाटन आकाशवाणी के महानिदेशक जगदीश चंद्र माथुर एवं बिहार के राज्यपाल डा. जाकिर हुसैन ने किया था। शुरुआत में यहीं से इसका प्रसारण होता था। 
गोस्वामीजी कहते हैं आकाशवाणी केंद्र की स्थापना से यहां की बोलियों को एक नई शक्ति प्राप्त हुई। छोटानागपुर लोक साहित्य की दृष्टि से संपन्न क्षेत्र है। पर, लोगों ने छोटानागपुर की इस विशिष्टता की ओर ध्यान नहीं दिया। आकाशवाणी ने सभी बोलियों की सेवा की। बोलियों और लोक साहित्य का भी उद्धार होने लगा।
साहित्यकार डा. अशोक प्रियदर्शी कहते हैं कि उस समय हिंदी के प्रमुख साहित्यकार राधाकृष्ण यहां विशिष्ट अधिकारी थे। उस समय लाइव रिकार्डिंग होती थी। जब रिकार्डिंग के लिए लोग पहुंचते तो कह दिया जाता, खांसना है, खांस लीजिए, स्टूडियो में कोई आवाज नहीं होगी। आकाशवाणी से प्रसारण का मतलब था कि आप अमर हो गए। एक बार दो कहानियां भेजी। पर कोई जवाब नहीं आया। एक दिन सुना कि श्रवणकुमार गोस्वामी की कहानी प्रसारित हो गई। लगा, वे तो अमर हो गए। इसके बाद में एक पत्र लिखा लाल बाबू को। राधाकृष्ण लाल बाबू के नाम से ही चर्चित थे। उन्होंने पोस्टकार्ड लिखा और बुलाया। बाद में मेरी कहानी रिकार्ड की गई। उस समय मुझे 15 रुपये पारिश्रमिक मिला था। तब से आज तक आकावाणी से जुड़ा हूं।
आकाशवाणी ने रोजलिन लकड़ा को एक नई पहचान दी। उन्हें लोग सुगिया बहन के नाम से जानने लगे। 1964 से वह आकाशवाणी से जुड़ीं। वह यादों को साझा करती हुई कहती हैं कि उन दिनों हम लोगों की बातचीत, हम लोगों का हंसना, बोलना, हमारे श्रोताओं को बहुत अच्छा लगता था। उनके बहुत सारे प्रशंसा भरे पत्र आते थे। श्रोता हमारे कार्यक्रमों को सुनते थे और तारीफ करते थे। बातचीत की भाषा नागपुरी होती थी। वह बताती हैं कि कार्यक्रम को रोचक बनाने के लिए मगन भाई बहिरा का रोल करते थे। जब बाजार भाव में बताते थे कि आटे का यह भाव है तो मगन भाई जान बूझकर बहिरा बनकर वो आटे को भाटा समझ जाते और कहते, हां-हां सुगिया बहिन, हमके भाटा कर भाव बढिय़ा से बताय देउ, कालेकि हमके भाटा कर भरता बहुते सवाद लागेला। 

पालकी पर पलामू की यात्रा

संजीब चट्टोपाध्याय
   अरसा पहले मैं एक बार पलामू गया था। उद्देश्य था लौटकर उस क्षेत्र के बारे में लिख्ंाूगा। एक दो दोस्त मुझे बार-बार इस बारे में कहते, पर तब मैं उनका मजाक उड़ाता। आजकल कोई नहीं कहता पर मैं अपना भ्रमण वृत्तांत लिखने बैठा हूँ। मतलब इस उम्र में कहानियां सुनाना वाकई इस उम्र की बीमारी होती है। कोई सुने या ना सुने, बूढ़ा आदमी अपनी कहानी कहे जाता है।
कहानी आज की नहीं, बहुत पहले की है। वही कहानी सुना रहा हूं। इस उम्र में सब कुछ याद भी नहीं। ऐसा भी नहीं कि पहले लिखने से लिखा जाता। आज भी नहीं लिखा जा रहा है। तब, बात यह है कि जिन आँँखों से वीरान पहाड़ और खिले वन को देखा था, आज वे नहीं हैं। आज के पहाड़ मात्र पत्थरों के ढेर और जंगल केवल काँँँटे भरे लगते हैं और वहाँँँ के रहने वाले लोग प्रवंचक। इसलिए, उस लिहाज से जो लोग केवल शोभा और सौंदर्य ही देखना पसंद करते हैं, इस वृद्ध के लेख में उन्हें तृप्ति नहीं मिलेगी।
जब मेरा पलामू जाना तय हुआ, तब पता नहीं था, वह स्थान कहां है? कितनी दूरी पर है और किस दिशा में है? लिहाजा, नक्शे के सहारे पथ-निर्देश प्राप्त किया। हजारीबाग के रास्ते जाना था, इसलिए इनलैंड ट्रªªांजिट कंपनी की डाकगाड़ी किराये पर लेकर रात के दूसरे पहर में रानीगंज से प्रस्थान किया। सबेरे जाकर बराकर नदी के पूर्वी तट पर गाड़ी रुकी। छोटी सी नदी। उन दिनों पानी बहुत कम था। लोगबाग पैदल ही पार हो रहे थे। गाड़ी को ठेलकर पार ले जाना था, इसलिए गाड़ीवान मजदूर बुलाने गया।
   पूर्वी तट से मैंने देखा कि उस घाट पर ही साहब अपने बंगले में बैठा वाइन पी रहा है। सामने चपरासी-जैसा एक आदमी हाथ में गेरुवा रंग की मिट्टी लिए खड़ा है। जो व्यक्ति पार होने के लिए घाट पर आ रहा है, चपरासी उसी मिट्टी से उसकी देह में एक अंक लिख देता है। पार जाने वालों में जंगली किस्म के लोग ही अधिक हैं, उनकी युवतियां मिट्टी से रंगे अपने-अपने हाथों की ओर तिरछी नजर डाल रही हैं और खिलखिला रही हैं। फिर दूसरों के हाथों में कैसे दिख रहा है, उसे भी कभी-कभार देख ले रही हैं। अंत में युवतियां दौड़ती हुई नदी पार कर जा रही हैं। उनकी खिलखिलाहट से नदी के पानी में उछाल आ जाता है।
   मैं अनमना-सा इस तमाशे को देखे जा रहा था कि कहीं से कुछ बच्चों ने आकर मेरी गाड़ी को घेर लिया। कहने लगे-साहब, एक पैसा दो, एक पैसा दो न! धोती चादर वाले मूक निरीह बंगाली को देखकर साहब कहकर क्यों पुकार रहे हैं, यह जानने के लिए मैंने कहा- मैं साहब नहीं हूं। इस पर नाक में उंगली जैसा गहना पहने एक बच्ची ने गहने पर नख चुभोकर कहा- तब तुम कौन हो! मैंने कहा- मैं तो एक बंगाली हूं। उसे विश्वास नहीं हुआ। उसने कहा- नहीं, तुम साहब हो। लगता है, उन्हें बस इतना ही मालूम है कि जो गाड़ी पर चढ़ता है, वह साहब जरूर होगा।
   इतने में डेढ़-दो साल का बच्चा आकर आसमान की ओर मुँँह किए मेरे आगे हाथ पसारकर खड़ा हो गया। उसे नहीं पता, उसने क्यों हाथ पसारा। मैंने उसकी हंथेली में एक पैसे का सिक्का दिया, उसने उसे गिरा दिया। और फिर से हाथ पसारा। एक दूसरे बच्चे ने उसे उठा लिया तो उसकी बहन उससे लड़ गई। इन सबके बीच मेरी गाड़ी उस पार जा लगी।
बराकर से एक ऊंची छोटी-मोटी पहाड़ी दिखती है। बंगाली लोग केवल मिट्टी देखने के आदी होते हैं, मिट्टी के ढेर देखने से ही उसका मन नाचने लगता है। अतः इन छोटी-छोटी पहाड़ियों को देखकर मेरे मन में खुशियों की लहरें उठने लगीं, इसमें आश्चर्य क्या? बचपन में पहाड़ों के बारे में काफी कुछ सुना था। एक बार एक बैरागी के अखाड़े में चूना-पुते एक गिरि गोवर्धन को देखकर उसे ही पहाड़ समझ लिया था। किसानों की लड़कियां सूखे गोबर का जो ढेर लगाती हैं, गोवर्धन उससे बस थोड़ा सा बड़ा था। उसी के आस-पास चार-पांच ईंटें जोड़कर एक-एक बुर्ज तैयार कर लिया गया था। फिर सबसे ऊंचे बुर्ज के पास सांप का एक फन बनाकर उसे हरे-पीले रंगों से रंग दिया गया था। फन कहीं लोगों की आंखों के सामने उजागर न हो, इसलिए उसका आकार कुछ बड़ा कर दिया था। फलस्वरूप पहाड़ी की चोटी से ज्यादा बड़ा वह फन ही हो गया था। उसमें कारीगर की कोई बहादुरी नहीं है। बैरागी का भी कोई दोष नहीं। सांप है। कृष्ण कन्हैया का कालियादमन का सांप है। अतः उसका फन पहाड़ी की चोटी से थोड़ा बड़ा होता, उसमें आश्चर्य की कौन सी बात है! बैरागी के इस गिरि गोवर्धन को देखकर ही मुझे बचपन में पहाड़ का अहसास हुआ था। बराकर के समीप उन पहाड़ियों को देखकर मेरे बचपन में बने संस्कार में कुछ परिवर्तन होना शुरू हुआ। चलते-चलते अपराह्न बेला में देखा, गाड़ी एक सुदृश्य पर्वत के पास से गुजर रही है। इतने करीब कि पहाड़ के छोटे-छोटे पत्थरों के साये भी दिख रहे हैं। मैंने गाड़ीवान से कहा- गाड़ी रोको। मैं उतर गया। उसने पूछा- साहब कहां जाएंगे? मैंने कहा, उस पहाड़ी के पास जाउंगा। उसने हंसकर कहा- हुजूर पहाड़ी यहां से काफी दूर है। शाम से पहले वहां पहुंच नहीं पायेंगे। मुझे उसकी बात पर विश्वास नहीं हुआ। मैं तो देख रहा था कि वह मात्र पांच मिनट से ज्यादा का रास्ता नहीं है। उसकी बातों को अनसुना करके मैं पहाड़ की ओर चल पड़ा। लंबी डेगें भरते हुए मैं पांच की जगह पंद्रह मिनट तक चलता रहा। पहाड़ तब भी उसी पांच मिनट के रास्ते के फासले पर खड़ा था। मेरा भ्रम टूट गया। मैं वापस गाड़ी के पास आ गया। पहाड़ों की दूरियों को ठीक से नापना बंगालियों के बस की बात नहीं है, इसे मैंने पलामू जाकर बार-बार अनुभव किया।
  दूसरे दिन दोपहर के आस-पास मैं हजारीबाग पहुंचा। वहां जाकर सुना कि वहां के किसी संभ्रांत व्यक्ति के घर में मेरे खाने का बंदोबस्त था। करीब दो दिनों से कुछ खाया भी नहीं था। अतः भोजन के नाम पर भूख ने जोर मारना शुरू कर दिया। जिन सज्जन ने मेरे खाने का बीड़ा उठाया था, उन्हें मेरे आने की सूचना कैसे मिली, इसे जानने का मौका ही नहीं मिला। गाड़ी लेकर तुरंत उनके यहां पहुंचाने का फरमान जारी कर दिया। मैं जिनके घर जा रहा हूं, उन्हें मैंने कभी देखा तक नहीं। मैंने उनका नाम सुना था, ख्याति भी सुनी थी। वे सज्जन हैं, इसलिए सब लोग उनकी प्रशंसा करते हैं। पर मैंने उन प्रशंसाओं पर विशेष ध्यान नहीं दिया था क्योंकि मैं जानता हूं कि बंगाली मात्र ही सज्जन होते हैं। बंगाल में केवल पड़ोसी ही दुर्जन होते हंै। जो भी शिकायतें सुनने को मिलती हैं, वे उनके बारे में ही। पड़ोसी दूसरों की भलाई सहन नहीं कर पाते, वे झगड़ालू, अहंकारी, लालची, कंजूस और दूसरांे की चीजें हड़पने की फिराक में रहने वाले होते हैं। वे अपने बच्चों को अच्छे-अच्छे कपड़े इसलिए पहनाते हैं ताकि हमारे बच्चे उन्हें देखकर रोएं, अपनी बहुओें को वस्त्र अलंकार आदि से सुसज्जित इसलिए करते हैं, ताकि हमारी बहुएं मुंह लटकाएं फिरें। पड़ोसी पापी होते हैं। जिनके पड़ोसी नहीं होते, उन्हंे क्रोध भी नहीं होता। वे ही ऋषि कहलाते हैं। ऋषि केवल वही गृहस्थ होते हैं, जिन्होंने पड़ोसियों को त्याग दिया है। आप किसी भी ऋषि के आश्रम में जाएं और बगल में किसी पड़ोसी को बसायें, तीन दिन में ही ऋषि का ऋषित्व खत्म हो जाएगा। पहले दिन पड़ोसी की बकरी ऋषि के फूलों को कुड़ देगी, दूसरे दिन उसकी गाय आकर ऋषि का कमंडल तोड़ डालेगी। तीसरे दिन पड़ोसी की पत्नी आकर ऋषि-पत्नी को अपने जेवरात दिखाएगी। इसके बाद ऋषि को या तो वकालत की परीक्षा में शामिल होना पड़ेगा या डिप्टी मजिस्टेªट बनने के लिए दरख्वास्त देनी होगी।

रांची से मारीशस यात्रा की दारुण गाथा है 'माटी माटी अरकाटीÓ

रांची से मारीशस की यात्रा वाकई में दारुण थी। 1850 के समय में यहां के आदिवासियों-मूलवासियों को जबरन मारीशस ले जाया गया, लेकिन
उपन्यास का उपशीर्षक है-हिल कुली की कहानी। तो यह भी जानिए कि हिल कुली का मतलब क्या है? पंकज जी भूमिका में लिखते हैं, 'भारत में ब्रिटिश उपनिवेश द्वारा यहां से बाहर ले जाए गए मजदूरों को तत्कालीन कंपनियां और उनके एजेंट उन्हें दो नामों से पुकारते थे। दक्षिण भारत, बिहार और पश्चिमी उत्तरप्रदेश के गैर आदिवासियों को वे कुली जबकि झारखंड के सदान और आदिवासियों को हिल कुली, धांगर और कोल संबोधन का इस्तेमाल करते थे।Ó
'गिरमिटियाÓ शब्द भी वस्तुत: एग्रीमेंट का बिगड़ा रूप है क्योंकि यहां से मजदूर एक एग्रीमेंट के जरिए ही मारीशस, गयाना, फिजी, सूरीनाम, त्रिनिदाद आदि कैरैबियन देशों में भेजे गए थे। इन देशों में गए कई भोजपुरी भाषी ने अपनी व्यवथा-कथा को कई बार लिखा है। वीएस नायपाल सबसे महत्वपूर्ण लेखकों में शुमार हैं, जिन्हें साहित्य का नोबेल मिल चुका है। लेकिन इन सबके बावजूद आदिवासी कहीं नहीं थे। जबकि इंटरनेट पर भरपूर सामग्री मौजूद है।  जाहिर है, इस शोध और खोजपरक उपन्यास को रचने में समाज के प्रति एक जवाबदेही तो लेखक की बनती है। इस अर्थ में अपने समाज और पुरखों को याद करने और ऋण चुकाने की बानगी के तौर पर भी इसे देख सकते हैं। हालांकि पंकजजी ने इसे 2008 में लिखने का मन बनाया था, लेकिन जितनी जानकारियां चाहिए थी, नहीं थी। पर न हार मानी न हिम्मत। जैसे एक लंबी यातना सहते हुए यहां के हिलकुली मारीशस गए, कुछ ऐसा ही उस मनोभाव और रेचन की प्रक्रिया से गुजरते हुए इस उपन्यास को रचा गया है। पुस्तक के अंत में करीब-करीब 142 संदर्भों का हवाला दिया गया है, जिससे आप समझ सकते हैं यह उपन्यास कैसे और किस शिद्दत से रचा गया है। कोंता और कुंती के बहाने हम रांची, झारखंड से मारीशस की यात्रा करते हैं। यह उपन्यास कई सवाल खड़े करता है और आंखों में पड़े हमारे पर्दे को भी हटाता है। सवाल यह है कि कैसे और कब गिरमिटिया कुलियों की नवनिर्मित भोजपुरी दुनिया से हिल कुली गायब हो गए? ऐसा क्यों हुआ कि गिरिमिटिया कुली खुद तो आजादी पा गए, लेकिन उनकी आजादी हिल कुलियों को चुपचाप गड़प कर गई। सवाल कई हैं? सभ्यता के इस संघर्ष में आदिवासी नजरिए और आदिवासियों की व्यथा-कथा को बहुत ही संवेदनशीलता के साथ इस उपन्यास में उकेरा गया है, जिसे अभी-अभी राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली ने प्रकाशित किया है।   
ङ्क्षहदी की विशाल पट्टी के लेखकों ने इस कथा को विषय नहीं बनाया। गिरिराज किशोर ने गांधी को केंद्र में जरूर 'पहला गिरमिटियाÓ लिखा, लेकिन गांधी नहीं, आदिवासी पहले गिरमिटिया थे। इस विषय पर पहली बार रांची के अश्विनी कुमार पंकज ने कलम चलाई और उन्होंने 'माटी माटी अरकाटीÓ में इस यात्रा का वर्णन किया है। माटी का मतलब तो माटी सभी जानते हैं। अरकाटी का मतलब दलाल होता है। ये दलाल ही यहां के भोले-भाले लोगों को कंपनी के एजेंटों के हवाले कर देते थे।

आंजन गांव के रहस्य से पर्दा उठाता है 'द इटर्नल मिस्ट्रीÓ


संतोष किड़ो पेशे से पत्रकार रहे हैं और अब सेंट जेवियर्स कालेज में पत्रकारिता पढ़ाते हैं। पेश के दौरान भी वे खालिस पत्रकार नहीं रहे। उनमें एक रचनाकार भी था। एक कथाकार भी। अभी उनका पहला उपन्यास 'द इटर्नल मिस्ट्रीÓ छपकर आया है
दर असल, यह उपन्यास उनके दिमाग में लंबे समय से पक रहा था। गाहे-बेगाहे जब मिलते तो इसका जिक्र जरूर करते। इस उपन्यास के लिए उन्होंने काफी मेहनत की। शोध किया और आंजन गांव में हफ्तों रहे। उस मिथ और उस कथा सूत्र को पकडऩे की कोशिश की, जो हजारों सालों से कही जा रही थी। 
आंजन, आप सब जानते हैं, यह गुमला जिले में पड़ता है और यह हनुमान की जन्मस्थली मानी जाती है। यहां जो प्राचीन प्रतिमा है, वह देश के दूसरे हिस्सों में नहीं मिलती है। यहां वह अपनी मां अंजनी की गोंद में विराजमान है। भारत के गांव-गांव में स्थापित उनकी प्रतिमा से सब परिचित हैं, लेकिन यह प्रतिमा भी दुर्लभ मानी जाती है। देश का बड़ा हिस्सा नहीं जानता कि हनुमान की जन्मस्थली झारखंड में है। इस उपन्यास से लोग इस गांव के बारे में भी जानेंगे।   यह उपन्यास इस अर्थ में अलग है कि यह मिथ से विज्ञान और विज्ञान से मिथ की यात्रा करता है और इस यात्रा के दौरान कई रहस्यात्मक चीजों से साबका पड़ता है। मुंबई से एक वैज्ञानिक कुछ शोध करने के लिए सिलसिले में आंजन गांव आता है और इस दौरान उसे कुछ अजीब-अजीब एहसास होते हैं। शोध का काम पूरा करने के बाद वह रिपोर्ट भेज देता है और उसकी यात्रा शुरू होती है। उसे एहसास होता है, जीवन के बारे में, मृत्यु के बारे में और उस नदी के बारे में, जो कल-कल बहती है। जीवन और रहस्य भी इन तीनों के इर्द-गिर्द घूमता है। अंजनी सुत के साथ शिवलिंग के मिथ से भी पर्दा उठता है। एक अलग दुनिया खुलती है, जो अब तक अनजान रही। इस बीच कथा पहाड़ी नदी के प्रवाह की तरह आगे बढ़ती है। उबड़-खाबड़ और हजारों-लाखों साल पुराने पठारों-पहाड़ों से टकराती हुई। इस उपन्यास की खासियत यह है कि इसमें मिथ भी है, इतिहास भी, पुरातत्व और लोक का संसार भी। इसलिए यह उपन्यास जितना कल्पना है, उससे कहीं ज्यादा हकीकत। एक आदिवासी परिप्रेक्ष्य में भी आंजन गांव को देखने की कोशिश की गई है। दूसरे शब्दों में इसे रामकथा से भी जोड़ सकते हैं। संतोष ने अपने इस पहले उपन्यास से प्रकाशन जगत में भी कदम बढ़ा दिया है। प्रकाशन का नाम 'चेरो एंड साल बुक्सÓ है। आइआइएम रांची से निकले देवाशीष मिश्र के साथ इसकी स्थापना पिछले साल की थी। इस प्रकाशन की यह पहली पुस्तक है।     

अकबर के काल में शुरू हुआ था पोइला बोइशाख

डा. रामरंजन सेन, ङ्क्षहदी-बांग्ला साहित्यकार।
आज पोइला बोइशाख 1423 बंगाब्द है। बंग समुदाय का नव वर्ष। आज ही के दिन समाज के सभी लोग उल्लास के साथ वर्ष वरण अर्थात नए साल का हार्दिक स्वागत करते हैं। विगत वर्ष में हमारा जो संकल्प साकार नहीं हुआ, उसे हम नए उमंग के साथ इस नए साल में पूरा करने एवं अपनी संस्कृति की रक्षा करने का संकल्प लेते हैं-नव वत्सरे करिलाम पण, लव स्वदेशेर दीक्षा। नव वर्ष का स्वागत करने के लिए कवि गुरु की भाषा में हम कहते हैं-पुरातन वस्तरेर जीर्ण क्लांत रात्रि, घुचे जाक ओरे यात्री।
एक समय था जब यह उत्सव व्यवसायी तथा परिवार तक ही सीमित था, लेकिन आज वर्षवरण उत्सव सामाजिक तथा सांस्कृतिक उत्सव बन गया है। यह बंगाब्द तथा नव वर्ष की सूचना कब और कैसे हुई-इसकी चर्चा होनी चाहिए। इस संदर्भ में विद्वानों में मतभेद तो है ही, लेकिन अधिकतर विद्वानों का कहना है कि 593 ईस्वी में 12 अप्रैल यानी पोएला बैशाख, बैसाख का पहला दिन, सोमवार, शैव धर्मावलंबी राजा शशांक ने गौड़ (वर्तमान में बंगाल)देश के सिंहासन पर आरोहण किया। उसी दिन से उन्होंने बंगला नव वर्ष अर्थात बंगाब्द प्रारंभ किया। उस समय से गणना की जाए तो 2016-593 यानी 1423। तो आज 1423 बंगाब्द है। इसके बाद बंगला नव वर्ष बादशाह अकबर के समय से प्रारंभ हुआ। अबुल फजल की आइने अकबरी से ज्ञात होता है कि अकबर के निर्देश से राजस्वमंत्री टोडरमल ने चैती फसल के बाद बंगाल में नई कर व्यवस्था बैशाख की पहली तारीख से शुरू की। उसी समय से नया हिसाब-किताब बैशाख से शुरू करने का नियम चल पड़ा। तब से व्यापारी लोगों ने इसी दिन से हाल खाता प्रारंभ किया। तब नए कपड़े पहनना, मंदिर या दुकान में हाल खाता की पूजा करना तथा घरों में स्वादिष्ट भोजन में ही नव वर्ष सीमित था, लेकिन 19वीं सदी के द्वितीयार्ध से यह सामाजिक एवं सांस्कृतिक रूप धारण कर लिया। हाल खाता का सिलसिला भले बंद हो गया हो, लेकिन नव वर्ष से जुड़ा उल्लास आज भी बरकरार है। अंधानुकरण के इस दौर में भी हमारी नई पीढ़ी भटक न जाए, इसलिए उन्हें भी इस उत्सव के साथ जुडऩे तथा अच्छा संस्कार देने के लिए हमें सचेष्ट होना चाहिए।
कवि गुरु रवींद्रनाथ ठाकुर ने ठीक कहा कि जिस तरह काल बैशाखी की आंधी पुराने सूखे पत्ते को उड़ा कर ले जाती है, उसी तरह हमारे जीवन में से पुराने वर्ष की सभी ग्लानि दूर हो जाती है। अत: मुद्दे जाक ग्लानि, घुचे जाक जरा, अग्नि स्नाने शुचि होक धरा।

पहला जुलूस महावीर चौक से सदर अस्पताल तक गया था

अशोक पागल, रंगकर्मी-लेखक।

चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि। उत्तम पुरुष श्री राम का जन्म। यानी रामनवमी। एक व्रत, एक त्योहार, एक उत्सव का दिन।
रामनवमी का पर्व पूरे छोटानागपुर में अपना एक विशेष महत्व रखता है। होली के बीतते ही रामनवमी की धूम शुरू हो जाती है। होली के बाद पडऩे वाले पहले मंगलवार को ही विभिन्न अखाड़ों में महावीरी पताका फहरने लगते हैं। जगह-जगह अस्त्र-शस्त्र संचालन का कौशल प्रदर्शन शुरू हो जाता है। मंगलवारी जुलूस अपर बाजार, महावीर चौक स्थित हनुमान मंदिर तक आता है। यहां हनुमानजी को भोग लगाया जाता है। उत्साही भक्त माथा टेकते हैं।
रामनवमी के एक दिन पहले अष्टमी को पौराणिक कथा पर आधारित आकर्षक झांकियों की प्रतियोगिता होती है। झांकी प्रतियोगिता का आयोजन श्री रामनवमी शृंगार समिति करती है। अनुष्ठान देर रात तक चलता है। इस दिन अखाड़ों, झंडाधारियों के अतिरिक्त दर्शकों की भीड़ उमड़ती है। आयोजन स्थल महावीर चौक होता है। अब डोरंडा, चर्च रोड आदि क्षेत्रों में भी झांकी प्रतियोगिता होने लगी हैं।
रामनवमी की मुख्य शोभायात्रा की विशालता का कहना ही क्या? लाखों लोग इस दिन सड़क पर उतरते हैं। चारों तरफ जयश्री राम का उद्घोष। हाथ में महावीरी पताका। घरों पर महावीरी पताका। इसके आरंभ की भी अनोखी कहानी है।
सन् 1928 में जमादार मौलवी के घर मुस्लिम लीग का गठन हुआ। इसी की प्रतिक्रिया में अपर बाजार, महावीर चौक के नेमन साहु के घर पर ङ्क्षहदू महासभा का गठन किया गया। महंत ज्ञान प्रकाश नागा बाबा इसके प्रथम अध्यक्ष हुए। मुहर्रम के समानांतर रामनवमी के अवसर पर शोभायात्रा निकालने की योजना सबसे पहले यहीं बनी। इस योजना में नेमन साहु, जगन्नाथ साहु, रामचंद्र साहु, कृष्ण लाल साहु, गंगाधर वर्मा, राम बड़ाइक आदि प्रमुख थे। 1929 में पहली बार राम नवमी की शोभायात्रा निकली थी। इस अवसर पर एकमात्र महावीरी झंडा निकला था और वह एकमात्र झंडा जगन्नाथ साहु का था। झंडा ढोने वाले थे अनिरुद्ध राम। साथ में नौवा टोली के 15-20 उत्साही नौजवान लाठी-भाला लेकर जै-जै करते चल रहे थे।
राम नवमी का यह पहला जुलूस अपर बाजार, महावीर चौक से निकल कर सदर अस्पताल गेट तक गया था। तब सदर अस्पताल का गेट मेन रोड पर, अल्बर्ट एक्का चौक से थोड़ा आगे था। जुलूस में दो हाथ रिक्शे भी शामिल थे, जिनमें से एक पर नंदकेश्वर पाठक व बुधना बतौर गायक बैठे थे। दूसरे रिक्शे पर खोखा और सूरज गोप ढोलक पर ठेका देते चल रहे थे।
सन् 1929 के बाद 1930 में भी रामनवमी शोभायात्रा का यही मोटा-मोटी स्वरूप था। इस बार भी इसका गंतव्य सदर अस्पताल गेट ही था। सन 1931 में जुलूस में दो झंडे शामिल हुए। इनमें से एक झंडा नेमन साहू का था व दूसरा कांग्रेसी झंडे की तरह तिरंगा था, जिसकी एक ओर चरखा व दूसरी ओर हनुमानजी की आकृति बनी हुई थी। यह झंडा किसका था, ज्ञात नहीं। इस वर्ष रामनवमी जुलूस चर्चा रोड स्थित महावीर मंदिर तक गया। सदर अस्पताल के गेट से आगे बढ़ाकर जुलूस चर्च रोड स्थित महावीर मंदिर तक गया था। सदर अस्पताल के गेट से आगे बढ़ाकर जुलूस को चर्च रोड, महावीर मंदिर तक ले ताने का श्रेय गुलाब नारायण तिवारी को जाता है। इस समय तक रामनवमी महोत्सव शोभायात्रा में गंगाधर वर्मा, जैन मुंशी, नान्हू गोप, शिवदीप सहाय, हंसेश्वर दयाल, गंगा प्रसाद बुधिया, राधाकृष्ण बुधिया आदि लोगों की भूमिकाएं उल्लेखनीय हो गईं।
सन 1935 में रामनवमी व मुहर्रम एक दिन पड़ा था। प्रशासन द्वारा दोनों ही जुलूसों पर रोक लगा दी गई। तब ङ्क्षहदुओं की ओर से राधाकृष्ण बुधिया व मुसलमानों की ओर से खान बहादुर हबीबुर्रहमान द्वारा बांड भरे जाने के बाद दोनों जुलूस निकले थे। इसी वर्ष रामनवमी जुलूस पहली बार डोरंडा के तपोवन स्थित राम मंदिर तक गया था। तब से अब तक रामनवमी जुलूस तपोवन मंदिर तक ही जाता है। इसी वर्ष महावीर मंडल के गठन की बात चली और सन 1936 में इसका गठन हुआ। तब से इस संगठन के माध्यम से ही इसका आयोजन होता आ रहा है।

एशो हे बोइशाख एशो-एशो...

पंकज मित्र,  वरिष्ठ कथाकार
शायद ही बांग्लाभाषी समुदाय का कोई सदस्य होगा, जिसकी स्मृति में कविगुरु रवीन्द्रनाथ ठाकुर का यह नववर्ष का आह्वान गीत गूंजता न हो। यह गीत सिर्फ बांग्ला नववर्ष का स्वागत गान मात्र नहीं, प्रतीक भी है कविगुरु की विश्वदृष्टि का, सत्यं शिवं सुंदरम की उनकी अवधारणा का, मानवता के प्रति उनकी शुभेषणाओं का। बचपन से ही गांव-मोहल्ले में 'पोइला बोइशाखÓ यानी बांग्ला कैलेंडर के प्रथम माह बैशाख के प्रथम दिवस के अवसर पर आयोजित होनेवाले छोटे-बड़े समारोहों में राष्ट्रगान की तरह ही अनिवार्यत: गाया जानेवाला यह गीत नववर्ष का आगमनी गीत तो है ही बांग्ला की जातीय स्मृति का अभिन्न अंग भी रहा है। शारदीय नवरात्र के आरम्भ होने से पूर्व जिस तरह 'महिषासुरमर्दिनीÓ या 'महालयाÓ का पाठ एवं गायन बंगभाषी समुदाय की नस-नाड़ी में स्फुरण भर देता है, वैसे ही एशो हे बोइशाख के गायन से नववर्ष के आगमन का संकेत रुधिर वाहिकाओं में नगाड़े की तरह बजने लगता है। कविगुरु के इस अमर गीत के बहाने आज हम इस पावन अवसर को उल्लसित हृदय से उर्जस्वित करेंगे। पता नहीं इतिहासविदों की इस स्थापना में कितना सत्य है कि बैशाख माह से आरंभ होनेवाल बांग्ला कैलेंडर की आवश्यकता मुगल सम्राट अकबर के समय में तब पड़ी, जब लगान-मालगुजारी-वसूली का कार्य हिजरी संवत के अनुसार संभव नहीं हो पाता था। बंगदेश का फसलचक्र ऋतुओं पर आधारित था और कारिंदे मालगुजारी वसूल करने आ जाते थे जब फसलें खेतों में ही खड़ी रहती थी। तब बादशाह अकबर ने अरबी विद्वान शिराजी को जिम्मेवारी दी कि ऋतुओं और फसल चक्र के अनुरूप दिन-तारीख को समायोजित किया जाए। कुछ विद्वान मानते हैं कि पिछले वर्ष की मालगुजारी चुका देने के बाद का उत्सव था 'पोइला बैशाखÓ। संभवत: मालगुजारी के उत्पीडऩ से मुक्ति के उत्सव के रूप में बादशाह ने ही उत्सव मनाने की रीत आरंभ करवाई हो। हर काल के और हर प्रकार के बादशाहों की यही तो खासियत है कि वे चालाक होते हैं। बंगभाषी समुदाय खासतौर पर बांग्लादेश के लोगों के लिए सांस्कृतिक प्रतिरोध की अर्थछवियां भी शामिल हैं इस उत्सव की निर्मिति में। तब के पूर्वी पाकिस्तान का बंगभाषी समुदाय पाकिस्तान सरकार के संस्कृति थोपने के अभियान के कारण बहुत उत्पीडि़त तथा सांस्कृतिक रूप से ठगा गया महसूस करता था। 60 के दशक में ही प्रतिरोध जोर पकड़ चुका था। कविगुरु की रचनाओं के पाठ-प्रदर्शन पर पाकिस्तान सरकार रोक लगा चुकी थी। अब जिस समुदाय का रग-रेशा ही कविगुरु और नजरूल जैसे कवियों की रचनाओं से निर्मित हुई हो, वह समुदाय भला यह अन्याय कैसे सहन करता। उसे तो प्रतिकार करना ही था। उत्पीड़क सत्ता की 'बांटो और राज करोÓ की नीति बंगभाषी समुदाय की जाति-धर्म से इतर सांस्कृतिक एकजुटता के आगे हार गई। 'छायानटÓ नाम के सांस्कृतिक संस्थान ने 'पोइला बैशाखÓ के दिन को प्रतिरोध दिवस के रूप में मनाने की ठानी और ढाका के रमण पार्क के बरगद तले आयोजित हुआ सांस्कृतिक समारोह, जिसमें कविगुरु का यह गीत उद्बोधन गीत बन गया। बाद में ढाका विश्वविद्यालय के सांस्कृतिक संस्थान 'चारूकलाÓ ने सांस्कृतिक झाकियां की शोभायात्रा निकालनी आरंभ की और 'पोइला बैशाखÓ बन गया एक राष्ट्रीय उत्सव।
बंगभाषी समुदाय इस उत्सव को धार्मिक-सांस्कृतिक एवं 'हालखाताÓ के रूप में व्यावसायिक आयाम भी देता है जब अल्पना, पूजा-पाठ, आनंद मेले एवं हिसाब-किताब के लिए नया खाता आरंभ करना और किसिम-किसिम के व्यंजन-मिठाइयां तो शामिल है ही। साथ-साथ सांस्कृतिक-आयोजनों का अविभाज्य अंग है कविगुरु का यह गीत- 'एशो हे बैशाख एशो-एशो। गीत की पंक्तियों से गुजरते हुए कविगुरु की वैश्विक दृष्टि बरबस ध्यान आकर्षित कर लेती है। बैशाख का आह्वान करते हुए कहते हैं कि तापस निश्वास के द्वारा मुमूर्ष को उड़ा दो। वर्षभर जो आवर्जना (कूड़ा-कर्कट, गंदगी, अपशिष्ट, असांस्कृतिक चीजें) जमा हो गई हैं वो सब दूर हो जाएं। कैसी उज्ज्वल दृष्टि, कैसी शुभेषणा, जिसकी आवश्यकता हम सभी को हमेशा रहती है-मूछे जाक ग्लानि/घूचे जाक जरा/अग्नि स्नाने शुचि होक घरा-संपूर्ण विश्व के कल्याण की कैसी अद्भुत कामना से ओत-प्रोत पंक्तियां - ग्लानि मिटे/हटे जरा (रोग-वार्धक्य)/अग्नि स्नान से शुचि हो धरा/लाओ तुम्हारा प्रलय शंख बजाओ/माया का कुंज्झटिजाल हटाओ/-कविगुरु भविष्य दृष्टा थे जैसे हर बड़ा कवि होता है। सिर्फ भारत ही क्यों सम्पूर्ण विश्व को आज कितनी आवश्यकता है इन शुभेषणाओं की जब जरा (रोग-वार्धक्य), माया (पूंजी) के कुंज्झटिजाल ने विश्व को घेर रखा है तो 'पोइला बैशाखÓ का प्रलय शंख निश्चित रूप से एक पल-पल नूतन होती धरा का संदेश लेकर आता ही है। इस संदेश को हम सुने-गुने और एक बेहतर दुनिया बनाने के स्वप्न को जीवित रखें। नववर्ष पर एक शुभकामना संदेश आप सबके लिए -
    'बोछोर शेषेर झरा पाता, बोललो उड़े एशे
    एकटि बोछोर पेरिये गेलो हावार साथे भेसे
    नोतून बोछोर आसछे ताके जोत्नो कोरे रेखो
    स्वप्नो गुलो शोत्ति होबे आशा निए थेकोÓ

(वर्षांत का झरता पात उड़ गया है कहकर
बीत गया एक और साल हवा के साथ बहकर
आ रहा है साल नया इसे बड़े जतन से रखना
सपने सच होंगे तुम्हारे बस तुम उम्मीद रखना।)
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राम नवमी : बड़ागाई से 1952 में निकला था पहला महावीरी जुलूस

डा. बिरेंद्र साहु, अध्यक्ष, श्री महावीर मंडल, बडग़ाई।
श्री महावीर मंडल, रांची के तत्वावधान में 1929 से निकलने वाली शोभायात्रा की एक कड़ी में 1952 से ग्राम बड़ागांई का मुख्य अखाड़ा वेलटंगरा से भी शोभायात्रा प्रारंभ हुई थी। यों तो 1951 में ही श्रीराम नवमी महोत्सव शोभायात्रा निकालने के लिए द्वारिका महतो, सूरज मिस्त्री, दर्शन महतो, गणपत साहू, भवानी साहू, मलाल मिस्त्री, लोकनाथ महतो, बंधन उरांव, बहादुर पहान, जीवाधन महतो, दशरथ पहान आदि ने बेलटंगरा में बैठक की थी। लेकिन उस साल मुस्लिम समुदाय के विरोध एवं शांति समिति का गठन न होने के कारण प्रशासन ने शोभायात्रा निकालने की अनुमति नहीं दी। तब बेलटंगरा मुख्य अखाड़ा में ही एक चबूतरा बनाकर व आम की डाल का खूंटा गाड़कर एक महावीरी पताका लगाकर शुभारंभ किया गया।
1952 मेें पिछले साल के विरोध को देखते हुए गांव के प्रमुख लोगों ने श्री महावीर मंडल, रांची से संपर्क किया। उस समय के मंडल पदाधिकारियों किशोरी यादव, झन्नालाल यादव आदि ने सहयोग किया। प्रशासन से मिल-जुलकर लाइसेंस निर्गत करने एवं जुलूस का मार्ग निर्धारित कराने में उन लोगों ने मदद की। इस तरह इस शोभायात्रा की विधिवत शुरुआत 1952 में हुई। तय मार्ग से आज भी शोभायात्रा निकाली जाती है। 19 अप्रैल, 1956 प्रशासन ने सौ आदमी, पांच बजे, पांच तलवार, 25 लाठी, दो झंडा की अनुमति प्रदान की। जुलूस का लाइसेंस द्वारिका महतो के नाम निर्गत हुआ। 1953 में द्वारिका महतो के नेतृत्व में बेलटंगरा में श्री श्री हनुमान मंदिर का निर्माण कराया गया, जो आज भी है।
बड़ागाईवासी पहली बार 1952 में लगभग सात सौ से एक हजार की संख्या में स्त्री, पुरुष व बच्चे मिलकर रांची के महावीर चौक स्थित हनुमान मंदिर पहुंचकर मुख्य शोभायात्रा में शामिल होकर निवारणपुर स्थित राममंदिर में महावीरी पताका सहित पूजा-अर्चना की। ग्राम बड़ागाई में महाअष्टमी की रात अस्त्र-शस्त्र व गाजे-बाजे के साथ झांकी निकालने की परंपरा थी। अस्त्र-शस्त्र का प्रदर्शन करते हुए पूरे गांव में लोग घूमते थे। सभी महावीरी चबूतरे पर महावीरी पताका खड़ा करते थे। स्त्रियां लोकगीत गाती हुई जुलूस में शामिल होती थीं-
तुलसी कर बुदा तरे महावीर सपरालंय
आइज तो अंजनी कर कोरा में होवंय महावीर...जये-जयकी रामे-राम।

आज परंपरागत महावीरी पताका खड़े किए जाते हैं, लेकिन अस्त्र-शस्त्र की खनक एवं लोकगीतों की ठनक अब देखने-सुनने को नहीं मिलती। महानवमी को मुख्य अखाड़ा बेलटंगरा से श्री रामनवमी महोत्सव की शोभायात्रा निकाली जाती थी, जो पूरे गांव में महाअष्टमी की रात को खड़ा किए गए सभी महावीरी पताकों के साथ लेकर ग्राम भ्रमण कर मेडिकल चौक, करमटोली चौक, महावीर चौक होते हुए निवारणपुर जाती थी। हर घर से लोग इसमें शामिल होते थे। दिन में ग्राम भ्रमण एवं रात में निवारणपुर से वापसी के समय महावीरी पताकाओं का चरण धोकर धूप-अगरबत्ती दिखाती हुई महिलाएं आशीर्वाद प्राप्त करती थीं। हालांकि यह परंपरा आज भी कायम है।  
बड़ागाई की विशेषता यह रही कि होली के तुरंत बाद मंदिरों एवं अखाड़ों में ढोल-ढाक की गूंज व अस्त्र-शस्त्र संचालन का अभ्यास शुरू हो जाता था। रांची के मल्लाह टोली, लेक रोड, चर्च रोड, चुटिया आदि अनेक स्थानों पर होने वाली अस्त्र-शस्त्र प्रतियोगिता में लोग भाग लेते थे। प्रतियोगिताएं तो आज भी होती हैं, लेकिन यहां के लोग अब भाग नहीं लेते। पर, महावीरी जुलूस में यहां के लोग बढ़-चढ़कर भाग लेते हैं। बडग़ाई से लेकर तपोवन मंदिर तक जयश्री राम की गूंज तो सुनाई देती है।
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पहली शोभायात्रा 17 अप्रैल 1929 को निकली थी

सुधीर लाल, लेखक
रांची में पहली रामनवमी की शोभायात्रा 17 अप्रैल, 1929 को निकली थी। यहां रामनवमी की शुरुआत हजारीबाग के रामनवमी जुलूस को देखकर किया गया था। हजारीबाग में रामनवमी जुलूस गुरु सहाय ठाकुर ने 1925 में वहां के कुम्हार टोली से प्रारंभ की थी। रांची के श्रीकृष्ण लाल साहू की शादी हजारीबाग में हुई थी। 1927 में रामनवमी के समय वे अपने ससुराल में थे और वहां की रामनवमी जुलूस को देखा। रांची आकर अपने मित्र जगन्नाथ साहू सहित अन्य मित्रों को वहां की रामनवमी के बारे में बताया। इसके बाद मित्रों में उत्सुकता जगी और 1928 में वहां की रामनवमी को देखने लोग हजारीबाग गए और इसके बाद 1929 में रांची में इसकी शुरुआत कर दी।
पहली शोभायात्रा 17 अप्रैल, 1929, दिन बुधवार को निकली। इसके लिए खादी का झंडा बनवाया गया। इसका रंग कत्थई था, जो आज भी सुरक्षित है। इस काम में श्रीकृष्ण लाल साहू के दोनों बड़े भाई लोकनाथ साहू व रामकृष्ण साहू का भी सहयोग रहा। श्रीकृष्ण साहू के पिता ठेसा साहू और जगन्नाथ साहू के पिता नेमन साहू ने दोनों को प्रोत्साहित किया और अलग से पैसे भी दिए। भुतहा तालाब निवासी अनिरुद्ध राम उन दिनों जगन्नाथ साहू के यहां कार्यरत थे। उन्होंने झंडे के लिए बांस काटा। रामनवमी के दिन ननकू की मां ने नेमन साहू की दुकान के समाने गोबर लीपकर पूजन स्थल और प्रसाद के लिए सेट तैयार किया। जगन्नाथ साहू की पत्नी कुम्हारिन देवी ने पूजा की तैयारी की। 17 अप्रैल की सुबह पंडित गुमान मिश्र ने पूजा करवाई। इसके बाद बजरंगबली की जय का घोष करते हुए श्रीकृष्ण लाल साहू, टेसा साव, कोल्हा साव, लोकनाथ साहू, रामकृष्ण लाल, गुमान मिश्र, जगदीश साव, भगवत दयाल साहू आदि थोड़े से मुहल्लेवासी झंडे को लेकर अमला टोली, वर्तमान श्रद्धानंद रोड होते हुए मेन रोड तक आए। आज जहां अल्बर्ट एक्का की प्रतिमा है, वहां एक बंगाली की दुकान हुआ करती थी। वहां का चक्कर लगाकर शोभायात्रा अमला टोली होते हुए वापस महावीर चौक लौट गई। शोभायात्रा के आगे अनिरुद्ध राम झंडे को और जागो मोची डंका बजाते हुए चल रहे थे। शोभायात्रा में शामिल सभी उपवास पर थे। इस पहली शोभायात्रा की चर्चा महीनों होती रही। उन दिनों रांची एक कस्बाई नगर था। उस समय अपर बाजार में ङ्क्षहदू-मुस्लिम की मिली-जुली आबादी थी। लगभग सभी के मकान कच्चे और खपरैल के थे। महावीर चौक के आस-पास ही आबादी थी। उसके आगे खेत और पेड़ों से भरा था। आज जहां दुर्गा मंदिर है, वहां पेड़ों का एक बगीचा था। इस तरह रामनवमी की शोभायात्रा यहां प्रारंभ हुई। आगे चलकर कुछ तनाव हुआ तो 1936 में श्री महावीर मंडल का गठन किया गया, जिसके पहले अध्यक्ष नागा बाबा ज्ञान प्रकाश बनाए गए। इसके बाद महावीर मंडल के नेतृत्व में ही शोभायात्रा निकलने लगी। मंडल का गठन होते ही रांची में उत्साह का वातावरण बन गया। इसके बाद यह शोभायात्रा तपोवन मंदिर तक जाने लगे। मुहल्लों में अखाड़ों का गठन किया जाने लगा। महावीर चौक पर गणेश मंदिर का भी निर्माण किया गया। आज शोभायात्रा और भव्य रूप में निकल रही है। हर दिन भीड़ बढ़ती जा रही है।