वरिष्ठ कथाकार युवाओं को नहीं पढ़ते हैं : अनुज


संजय कृष्ण :  रांची की दीपिका कुमारी ने तीरंदाजी से देश का मान ही नहीं बढ़ाया है, उसने अपने संघर्ष से कथाकारों की नई पीढ़ी को भी प्रभावित किया है। अनुज नई पीढ़ी के कथाकार हैं। परिकथा के नए अंक में उनकी कहानी 'टार्गेटÓ आई है। कहानी दीपिका पर लिखी गई है, लेकिन क्रिकेट की चकाचौंध से इतर हाशिए पर जाते खेलों की चिंता भी कहानी में दर्ज है। अनुज रांची में हैं। बुधवार की शाम फिरायालाल की गहमगहमी के बीच दो पल बात करने का मौका मिला। उनके साथ थे युवा कथाकार पंकज मित्र, परिकथा के संपादक शंकर व अनुज के बहनोई डा. डीके सहाय। पूछता हूं, दिल्ली में रहते हुए रांची की दीपिका का ख्याल कैसे आया? बड़ी शाइस्तगी से कहते हैं, पहली बात तो यह खेल केंद्र में नहीं है। हाशिए पर चल रहा है। अखबारों के जरिए पता चला कि दीपिका के पिता रांची में आटो चलाते हैं। सो, इससे बेहतर कोई विषय नहीं हो सकता कहानी के लिए। और, इस तरह टार्गेट पाठकों के बीच आई। कहानी के केंद्र में दीपिका तो है ही लेकिन यहां उस ओर ध्यान दिलाया गया कि कैसे किसी की उपलब्धि को हमारे नेता 'इनकैशÓ करते हैं। मीडिया में भी नेताओं की बातें ज्यादा आईं। उसकी प्रतिभा, उसका संघर्ष नजरअंदाज कर दिया गया। मीडिया हाशिए के लोगों की नोटिस नहीं ले रहा है। जबकि उसे सपोर्ट करना चाहिए। अनुज कहते हैं, मीडिया का काम विचार बनाना है। उसे दिशा देना है।
कहानी के वर्तमान दौर पर चर्चा होती है। काशीनाथ सिंह चर्चा में हैं। सवाल वहीं से उठाता हूं। वरिष्ठ कथाकार काशीनाथ सिंह कहते हैं, युवा कथाकारों के पास जमीन नहीं है। वह कहां से लिख रहे हैं, कहां के रहने वाले हैं, कहानी में पता नहीं चलता। इस बात से कितना इत्तेफाक रखते हैं।
अनुज थोड़े गंभीर होते हैं। लंबी सांस छोड़ते हैं। फिर जवाब देते हैं। कहते हैं, उनकी (काशीनाथ सिंह) मजबूरी यह है कि वह किन कारणों से, शायद उम्र का तकाजा हो, वे पढ़ते नहीं हैं। दावे के साथ कह सकता हूं कि चाहे काशीनाथ सिंह हों, या उनकी पीढ़ी के दूसरे कथाकार, जो बड़े लोग हैं, उनमें बहुत कम लोग ऐसे हैं, जिन्होंने युवा कहानी या कहानीकारों पर टिप्पणी करते हुए, या करने से पहले युवाओं को पढ़ा है। दूसरी बात, पुरानी पीढ़ी में असुरक्षा की भावना है। उन्हें लगता है कि उनकी सत्ता अब खत्म हो रही है, उन्होंने जो कुछ लिखा है, वह सब युवाओं के आने के बाद खत्म हो रहा है, हालांकि ऐसा है नहीं। काशीनाथ सिंह युवा कथाकारों को मानवविरोधी कहते हैं, जो कहीं से भी स्वीकार्य नहीं है। अनुज कहते हैं, काशीनाथ सिंह से सवाल पूछा जाना चाहिए कि अगर नए लोगों ने कुछ नया नहीं लिखा है तो किए नए की अपेक्षा करते हैं। अनुज पूछते हैं, जो पुरानी पीढ़ी के लोग हैं, उनमें इतनी बेचैनी क्यों है कि युवा कहानीकार कुछ नहीं कर रहे हैं?
अनुज मौजूं सवाल उठाते हैं कि अभी तक पुरानी पीढ़ी का ही मूल्यांकन ठीक से नहीं हुआ है तो, अभी से कैसे तय हो गया कि युवा कुछ नहीं लिख रहे हैं। पहले पूरा मूल्यांकन तो होने दीजिए। कौन कहां रहेगा, यह तो समय बताएगा। कथा की दुनिया में आए हुए अनुज को अभी पांच साल ही हुए हैं। पहली कहानी वागर्थ में 2005 में आई थी। उनकी निगाहें प्रेमचंद से होती हुई रेणु, जैनेंद्र, अज्ञेय पर आकर ठहरती हैं। इसके बाद उदय प्रकाश पर आकर टिकती हैं। नई कहानी के दौर को भी अनुज नहीं भूलते, जिसमें से कमलेश्वर, मोहन राकेश और राजेंद्र यादव की तिकड़ी आई थी। खैर, चलते-चलते अनुज बताते हैं कि एक उपन्यास पर काम कर रहे हैं, जिसमें देश की राजनीति है मगर फंतासी के साथ। खैर, उनका साथ छोड़ आफिस की ओर चल पड़ता हूं। 

बारूद की जमीन पर फूलों की गंध

संजय कृष्ण : जैसे कांची नदी की किस्मत, वैसी कांची गांव की। दामोदर पुंडीदीरी नदियों की कहानी भी जुदा नहीं। झारखंड की अधिकतर नदियों का दर्द ऐसा ही है। पानी-पानी को प्यासी...। पंचायत चुनाव का अंतिम चरण। 24 दिसंबर। शुक्रवार का दिन। बुंडू, तमाड़, राहे और सोनाहातू...। हम कांची नदी के समानांतर गांव तक जाती सड़क के किनारे-किनारे होते हुए कांची गांव पहुंचते हैं। नदी प्रखंडों का बंटवारा करती है। इस तरफ बुंडू, नदी के पार तमाड़। कांची बुंडू का अंतिम गांव। मिट्टी और पक्के मकान। गांव के बीच में राजकीय मध्य विद्यालय पर जवान मुस्तैद हैं। मतदाता अपनी-अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं। यहां तीन बूथ हैं। तीनों पर कुल नौ सौ वोटर। मुंडा बहुल गांव में साहू, मछुआ, प्रमाणिक भी हैं। गांव के लिए बहुत संकीर्ण रास्ता है। गांव के बाहर खेत। इस साल पानी के अभाव में धान की बोआई नहीं हो पाई है। 65 वर्षीय गोपाल मुंडा कहते हैं, तैमारा घाटी से एक कांची पाइन यानी छोटी नहर आई है। पर, बरसात नहीं होने से खुद ही प्यासी है। नहर कच्ची है। सो, पानी बहुत दिन तक टिक नहीं पाता। इसकी प्यास बुझे तो खेत अवश्य लहललाने लगेंगे। इस नहर से कांची, हेट कांची और भोजडीह गांवों के खेतों को पानी मिल सकता है। पर, कोई सुनता नहीं। गांव के अरुण कुमार गुप्ता कहते हैं, पंचायत चुनाव के बाद नहर के पक्कीकरण पर जोर दिया जाएगा। वैसे, इस गांव की कई समस्याएं हैं। राजधानी रांची से महज साठ-सत्तर किमी दूर। जमशेदपुर तक जाती हाइवे की चमचमाती सड़क से एक डेढ़ किमी दूर गांव बसा है। हाइवे की सड़क गांव की सड़क को मुंह चिढ़ाती है। इसके बाद तमाड़ की ओर रुख करते हैं। रायडीह मोड़ से बुरूडीह पहुंचते हैं। बेहद खराब सड़क। राजकीय मध्य विद्यालय पर तीन बूथ हैं। तीनों पर लाइनें लगी हुई हैं। अमलेशा की महालेन भेंगरा अपना वोट डाल चुकी हैं। बस उनकी थोड़ी सी चाहत है। गांव में बिजली पहुंच जाए और खेत को पानी। बुरूडीह की शकुंतला देवी चाहती हैं कि बरसात में कादो-कीचड़ में पैर न सने। राजा पीटर का इलाका है। अब वे राज्य सरकार में मंत्री भी हो गए। पिछले चुनाव में झामुमो प्रमुख शिबू सोरेन को हराया था। तब शिबू राज्य के सीएम थे। उनके चुनाव हारते ही सरकार भी गिर गई थी। दुबारा चुनाव हुआ। जीते। पर, चुनाव के बाद उनका दर्शन नहीं हुआ। अब पंचायत से आस है। आजादी के 63 साल बाद भी इन गांवों में छोटी-छोटी खुशियां नहीं पहुंच पाई हैं। ये गांव मुख्य सड़क से बहुत दूर नहीं हैं। रायडीह से पुन: हम सारजोमडीह होते हुए बघाई तक पहुंचते हैं। सारजोमडीह से घना जंगल और भय हमारा साथ पकड़ लेते हैं। पुंडीदीरी नदी के पास पहुंचते ही पैर कांपने लगते हैं। नदी से गांव सटा हुआ है। चारों तरफ जंगल। सड़क बन रही है। याद होगा, डीएसपी प्रमोद कुमार को यहीं पर उड़ा दिया गया था। पर, तमाड़ का थाना प्रभारी 'चमत्कारिकÓ ढंग से बच गया था। हम आगे बढ़ते हैं। पेड़, पौधे, पहाड़ जैसे हमें ही घूर रहे हों...। एक अजीब दहशत। आस-पास खेतों में फैले सरसों के पीले-पीले फूल भी मानो हमें चेतावनी दे रहे हों, आगे मत बढऩा...। पूरी जमीन बारूदी। पर, कहीं-कहीं गेंदे के पीले फूलों की गंध हमारा ध्यान बारूदी जमीन से हटा देती है। हार्न बजाते हुए गाड़ी आगे बढ़ती है। सड़क में गड्ढे देख शरीर कांप जाता है। कहीं माइंस तो नहीं बिछा है। हम पातसायडीह होते हुए बघाई पहुंचते हैं। रायडीह मोड़ से 17 किमी दूरी तय कर घने जंगल में प्रवेश करते हैं। बघाई में खुले में मतदान हो रहा है। एक स्कूल है, जिस पर सीआरपीएफ के जवानों ने कब्जा कर रखा है। यानी स्कूल पुलिस कैंप में तब्दील। कैंप के सामने पहाड़ की तलहटी में खंखर पूस-पुआल की झोपड़ी। बांस के सहारे खड़ी। न कोई दीवाल न बेंच। पिछले चार साल से बच्चे इसी खुली झोपड़ी में पढ़ रहे हैं। चुनाव के आस-पास चार-पांच बच्चे दिखाई देते हैं। पूछता हूं, झोपड़ी में पढ़ाई कैसे होती है, कहते हैं, किसी तरह हो जाती हैं। कहीं दूसरा रास्ता भी नहीं। स्कूल में चार-पांच किमी की दूरी के बच्चे यहां पढऩे आते हैं। अब वे क्या करें। शिक्षा का कैसा मजाक झारखंड सरकार में चल रहा है...स्कूल की दशा देखकर समझ में आता है। इस रास्ते से सकुशल वापसी के बाद हम बुंडू से चुरगी का रास्ता पकड़ लेते हैं। लोआहतू, बारूहातू होते हुए। पहाड़ की तलहटी में बसा है बारूहातू गांव। चारों तरफ जंगल। सड़क की एक तरफ गांव और दूसरी तरफ पुलिस कैंप। पर, 18 नवंबर की रात माओवादी गांव में घुस गए और चार लोगों की हत्या कर दी। इनमें एक बच्ची भी शामिल थी। तीनों पूर्व माओवादी थे और अब एसपीओज थे। अब वे पुलिस के लिए काम रहे थे। रात्रि आठ बजे माओवादियों ने इनके घर पर धावा बोल दिया। गोलियां तड़तड़ाई और जंगल में समा गए। सौ गज की दूरी पर कैंप की पुलिस ताकती रही। गांव वाले पूछते हैं, जब कैंप की पुलिस हमारी रक्षा नहीं कर सकती, तो स्कूलों पर कब्जा क्यों? बच्चों की जिंदगी से खिलवाड़ क्यों? इसका जवाब तो राज्य सरकार की दे सकती है। खैर, पुलिस अब दूसरे ढंग से लड़ाई लड़ रही है। हम आगे बढ़ते हैं। चुरगी पहुंचते हैं। चुरगी के समानांतर कांची बहती है। यहां कांची दो जिलों का बंटवारा करती है। इस तरफ रांची और उस तरफ खूंटी। यहीं पर पांच करोड़ लूट की गाड़ी जलाई गई थी। नदी के उस पार अड़की प्रखंड, जो खूंटी जिले का हिस्सा बन गया है। माओवादी कुंदन पाहन का पैतृक घर। तीन बज रहे थे। मतदान संपन्न हो चुका था। सूरज पश्चिम की ओर ढरक रहा था। हम वापसी के लिए चल पड़ते हैं।

बहती नदी, प्यासे खेत और उदास आंखें

संजय कृष्ण:  सर्द हवाओं के थपेड़े से जंगल भी सहमे थे। सूरज की किरणों में गर्मी तो थी, लेकिन सर्द हवाओं के आगे वह भी बेबस...। यह हाल नामकुम के जंगली इलाकों से लेकर अनगड़ा, सिल्ली, मुरी तक था। 20 दिसंबर, सोमवार को पंचायत चुनाव का चौथा चरण था। रांची-मुरी मार्ग पर इक्का-दुक्का वाहन खामोशी से गुजर रहे थे। यह चुनाव का असर था कि लोग पैदल भी जाते दिखे। सुबह की बेला। खिलती धूप। अनगड़ा ब्लाक के साल्हन गांव पहुंचते हैं। मतदान केंद्र पर भीड़ है। भीड़ के पास कई तरह की समस्याएं हैं। विकास की बातें हैं। सुदेश महतो का इलाका। विकास के नाम प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना के बोर्ड ज्यादा दिखाई पड़ते हैं बनिस्पत सड़कों के। रासबिहारी साहु मैट्रिक पास हैं। ठेकेदारी करते हैं। उम्मीद जताते हैं कि पंचायत चुनाव से कुछ काम होगा। ब्लाक पर बार-बार दौड़ लगाने से छुटकारा मिलेगा। गांव से थोड़ी दूर पर स्वर्णरेखा बहती है। यहां से ही नदी की धारा दिखाई पड़ती है, पर गांव और खेत दोनों प्यासे हंै। आंखें उदास हैं। यहां से वापस लौटते हैं और कोचो पंचायत के लगाम पर पहुंचते हैं। घड़ी की सुइयां 11 बजा रही थीं। प्राथमिक विद्यालय लगाम दक्षिणी पर तीन मतदान केंद्र बने हैं। बूथ संख्या 164 पर 365 मतों से 164 वोट पड़ चुके हैं। दूसरे 165 पर 342 में से 116 और तीसरे बूथ पर 166 पर 327 में से 185। सिल्ली से मुरी का रास्ता पकड़ते हैं। सिल्ली-रामगढ़ के रास्ते पर आगे बढ़ते हुए हाकेदाग का रास्ता। हाकेदाग के गाझा गांव में अंतूराम माझी अवकाश प्राप्त शिक्षक हैं। वोट डाल चुके हैं। उम्मीद जताते हैं कि गांव में सिंचाई की व्यवस्था होगी। गांव में 65 घर हैं, जिनमें बेदिया, करमाली, मुंडा और 20-25 घर मुसलमान। यहां भी बुनियादी समस्याएं मुंह बाए खड़ी हैं। हालमाद गांव में कुछ दुकानें चट्टी का आभास पैदा करती हैं। हाकेदाग हालमाद से टाटी सिंगरी होते हुए डुमरा गांव। बीच में घने जंगल। तीखे मोड़। सर्पीली सड़कें और सीढ़ीदार खेत। बीच-बीच में कहीं प्यासे खेत तो कहीं सरसों के फूलों की चादर। जंगल इतना गझिन कि आगे का रास्ता भी दिखाई न दे। घाटियों से गुजरते हुए बार-बार जीवन की दुहाई। जंगल की खूबसूरती आनंदित भी कर रही थी और भयभीत भी। इस मार्ग से जाते हुए कुछ बच्चियां माथे पर सूखी लकडिय़ों का ग_र लिए चल रही हैं। उम्र यही कोई छह सात से लेकर बारह-तेरह वर्ष। कपड़े के नाम पर कुछ स्कूली डे्रस। नाम पूछने पर नहीं बताती। आज छुट्टी का दिन है उनके लिए। जोन्हा जल प्रपात पर भी दो बच्चियां अमरूद और बेर बेच रही थीं। एक शोभा कुमारी और दूसरी जसवंती कुमारी। दोनों कक्षा तीन की छात्रा। जोन्हा से चलते हुए गौतमधारा प्राथमिक स्कूल पर पहुंचते हैं। तीन बज रहे हैं। चुनाव खत्म। पीठासीन अधिकारी बक्से को सील कर रहे हैं। झारखंड जगुआर के जवान मुस्तैद। चेहरे पर इत्मीनान के भाव। स्कूल से बाहर सड़क पर युवाओं की भीड़। कुछ अधेड़ भी हैं। वे हमें घेर लेते हैं और अपनी समस्याएं गिनाने लगते हैं। पानी नहीं, बिजली नहीं। सड़क नहीं। यह जो सड़क है, वह जोन्हा तक चमचमाती जाती है, क्योंकि इस पर पर्यटक जाते हैं, पर हमारे गांव में पगडंडी भी नहीं...। हम वापसी की ओर रुख करते हैं। गांव के बाहर यानी प्रवेश द्वार पर एक पांच फीट का पत्थल गड़ा है। उस पर लिखा है, 'गुड़ीडीह सबसे अच्छा ग्रामसभाÓ। हम उम्मीद करते हैं, चुनाव के बाद पत्थलगड़ी की बात सच निकले।

वंदनवार वृक्ष, प्यासी धरती और वोटों की बारिश

संजय कृष्ण : रांची जिले के मांडर, बुड़मू, खलारी और चान्हो...चारों प्रखंडों में कहीं एमसीसी, कहीं पीएलएफआई तो कहीं टीपीसी जैसे उग्रवादी संगठन। इनके इशारे पर ही यहां की हवाएं अपना रुख तय करती हैं। आदमी की बिसात ही क्या? सोमवार का दिन। पंचायत चुनाव का तीसरा चरण। हम मांडर के अन्ना हाई स्कूल पर पहुंचते हैं। बंधु तिर्की का इलाका। वे यहां के विधायक हैं। ठंड की अलसाई सुबह के बावजूद मतदान केंद्र पर भीड़ जमी है। कहीं कोई बाधा नहीं। शांतिपूर्वक मतदान चल रहा है। वोट देकर आते रणसी खलखो से पूछता हूं पंचायत चुनाव से क्या कुछ बदलाव आएगा? कहते हैं, इसीलिए तो आधा कोस से चलकर आया हूं। माथे पर उभर आई रेखाएं उनकी उम्र का पता देती हैं। आपके प्रतिनिधि बंधु तिर्की हैं, फिर भी पीने के लिए पानी की किल्लत...। कहते हैं, कई बार उनसे कहा गया, लेकिन कुछ नहीं हुआ। सो, अब हिम्मत जवाब दे गई। रणसी करकच्चों गांव के हैं। गांव की आबादी वे तीन हजार बताते हैं। कहते हैं, पीने का पानी भी ठीक से मयस्सर नहीं। कुआं सूख चुका है। चापानल एक चल रह है, बाकी सब खराब। उनकी बातों की ताइद मांडर के प्यासे खेत भी करते हैं। मांडर से जब पतली सड़क पकड़ तिगोई अंबा टोली की ओर बढ़ते हैं तो सड़क के दोनों किनारे दूर-दूर तक फैले खेत अपनी पीड़ा खुद बयां करते हैं। सूखे खेतों में घास का तिनका तक नहीं। गाय-बैल-बकरी के लिए चारा जुटाना भी मुश्किल। मतदान केंद्र के बाहर खड़े अंबा टोली के पारा टीचर इम्तियाज अंसारी कहते हैं कि यहां सिंचाई को कोई साधन नहीं है। सिंचाई की व्यवस्था हो तो खेत सोना उगले। दो साल से बारिश भी ठीक से नहीं हो रही है, सो खेती प्रभावित है। इस बार धान की खेती भी नहीं हुई। इसी गांव के तिगई के सिब्बा उरांव वोट डाल चुके थे। इत्मीनान से धूप सेवन कर रहे थे। उनकी भी शिकायत वही थी। कहने लगे, चेकडैम गांव से एक किमी दूर बना है, लेकिन बारिश में बह गया। अब न पानी उसमें रुकता है न खेती हो पाती है। जनप्रतिनिधि चुनाव के दौरान आते हैं फिर वे कहां चले जाते हैं, खोजना मुश्किल। कहते हैं, पंचायत चुनाव से एक आस है। खेत प्यासे हैं, पेट भूखा है। पेट की आग तो मजदूरी से बुझा लेते हैं, लेकिन खेत...। इसी प्रखंड का हात्मा, छोटा हात्मा सब जगह एक ही नजारा था। वोट डालने के लिए लाइनें लगी थीं। मांडर की प्यासी धरती को छोड़ बुढ़मू की ओर बढ़ चलते हैं। पतली-सर्पीली राह से गुजरते हुए सड़क के दोनों ओर झाड़-झंखाड़। सिदरौल राजी टोला का वोट पंचायत भवन पर पड़ रहा है। पास में कुआं सूख चुका है। मतदान देने आए जगदीश साहु अपनी शिकायत की पोटली खोल देते हैं। न बीपीएल सूची में नाम दर्ज हुआ न इंदिरा आवास मिला। रांची में तीन हजार महीने में गार्ड की नौकरी और पांच जने का पेट। अधिकारी सुनते ही नहीं...। उमेडंडा के लैम्पस भवन पर वोटरों की भारी भीड़। अव्यवस्था का आलम। उमेश कुमार कहते हैं, छह बजे आए और 11 बजे वोट दिए। अधिकारी एकदम सुस्त हैं। यही शिकायत कई और वोटर करते हैं। एक कहता है कि यहां दो सौ वोटरों का नाम ही काट दिया गया। यहां से अब जंगल की ओर रुख करते हैं। सरले होते हुए राय बाजार, डकरा और खलारी। सरले से खलारी तक पांच किमी की दूरी और सड़क के दोनों ओर जंगल और पहाड़। सड़क के दोनों ओर सखुआ के विशाल वृक्ष वंदनवार खड़े। सूनसान सड़क। बीच-बीच में कोई आदिवासी दिख जाता है। जंगल से लकड़ी ले आता। छोटी-छोटी पहाडिय़ों पर छोटे-छोटे खपरैल के घर दूर से दिखाई पड़ते हैं। सीढ़ीदार पहाड़ और उसपर बसे मकान। जैसे दार्जिलिंग के किसी पहाड़ पर चल रहे हों...। खलारी अंतिम पड़ाव। कोयले की कालिख से पूरा शहर काला। दुकानें, मकान और लोग भी...। यहां एसीसी की खलारी सिमेंट फैक्ट्री भी है और यहीं पर सीसीएल का खदान भी है। शहर से बेहतर कस्बा इसे कह सकते हैं। यहां अस्सी प्रतिशत बिहारी हैं। खलारी से होते हुए चान्हो के चामा पहुंचते हैं। घड़ी की सुइयां तीन बजा रही हैं। मतदान केंद्र के बाहर सड़क पर काफी चहल-पहल। यहां दो बूथ हैं और दोनों पर लाइनें लगी हैं। ये अतिसंवेदनशील हैं। चुनाव अधिकारी बताते हैं कि आधे घंटे और चलेगा। वे मतदाताओं को पर्ची बांट रहे हैं। सुरक्षा में लगे जवान काफी मुस्तैद दिखे। धीरे-धीरे हम आगे बढ़ते हैं। बीजूपाड़ा, मांडर होते हुए पुन: वापस। प्यासी धरती पर वोटों की बारिश आश्वस्त कर रही थी कि अब वे ज्यादा दिन तक नहीं टिकने वाली। उम्मीद की लौ हम भी जला लेते हैं...

सरसों के फूल, हडिय़ा की गंध और पठार पर कोहरा

संजय कृष्ण : रांची से नगड़ी, इटकी, बेड़ो और उससे होते हुए लापुंग। घुमावदार राहों से गुजरते हुए कभी कच्ची सड़क मिलती, तो कभी पक्की। कहीं-कहीं बेहद पतली-दुबली। सड़क के दोनों किनारों पर खिलते सरसों के पीले-पीले मुस्कुराते फूल...तो पठार और जंगलों का संग-साथ। बूंदा-बांदी के साथ नथुनों में समाती वन तुलसी की गंध। कहीं पंचायत चुनाव से बेखबर किसान धान ओसाते, तो कहीं मतदान केंद्रों पर मतदाताओं की उमड़ती भीड़। लोकतंत्र की छोटी इकाई में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करने को लोग बेताब। इस तरह, खूबसूरत प्रकृति की मनोहारी छटा को निहारते जब हम लापुंग प्रखंड पहुंचते हैं, तो दो बड़े होर्डिंग हमारा स्वागत करते हैं। एक होर्डिंग पर सूबे के मुखिया का हंसता चेहरा और खेलते बच्चे हैं। होर्डिंग पर बड़े-बड़े हरफों में एक स्लोगन है, पंचायत की पहली सीढ़ी, देख रही है अगली पीढ़ी। अगली होर्डिंग 32 साल बाद हो रहे चुनाव के बारे में जागरूक करता है। पर, अगली पीढ़ी...लतरातू का एक युवक करमवीर तिर्की शिकायती लहजे में कहता है, गांव में आज तक बिजली नहीं। सड़क नहीं। कच्ची सड़क से आना-जाना होता है। सिबन उरांव की उम्र साठ के आस-पास। बूढ़ी आंखें। माथे पर झुर्रियां। पूछता हूं, उम्र कितनी है। कहती हैं- का जानबे बाबू। अपनी उम्र नहीं बता पाती है। रंथी उरांव चुनाव में मशगूल है। वोटरों को उनके नाम की पर्ची खोज-खोज दे रहा है। ककरिया का फागू बैठा 50 वसंत देख चुका है। वह चुनाव से आश्वस्त है। कहता है, कुछ तो बदलाव आएगा ही....। जहां कुछ नहीं था, वहां कुछ तो होगा ही। बदना मुंडा भी पचास के पार है। वोट डालने के लिए इंतजार कर रहा है। कहता है, बहुत भीड़ है। थोड़ा निकस जाए तो जाएं। ककरिया चट्टी है। दो-चार दुकानें उग आई हैं। जरूरत की चीजें सब कुछ मिलती हैं। पाजी लोहरा अपनी पर्ची लेकर घूम रहा है। सुबह से हडिय़ा से आचमन कर चुका है। किसी दूसरे को खोज रहा है...शायद एकाध शीशी की व्यवस्था हो जाए...। पक्की सड़क छोड़कर हम कच्चे रास्ते से रामाटोली में पहुंचते हैं। चुनाव की गहमा-गहमी। चेहरे से साठ के पार लगती सुकरा मुंडाइन से पूछता हूं, वोट डाल देली। वह अपना अंगूठा दिखाती है। उसे लगता है कि हम कोई प्रत्याशी हैं, इसलिए पूछ रहे हैं। तुरंत कहती है, एक पौआ के देब...। जब तक मैं उसकी बात समझ पाता, एक युवक उसे पकड़ दूसरी ओर खींच ले जाता है...चल-चल हम देबी। यहां से दूसरे गांव की ओर रुख करता हूं। आकाश में सूरज का सुबह से ही अता-पता नहीं है। बादलों ने घेरा डाल रखा है। कभी-कभी बूंदा-बांदी। लगता है- जैसे पठार पर बैठा है खामोश कोहरा।

प्रेम गली अति साकरी

 संजय कृष्ण : हर युग में प्रेम की परिभाषा और उसकी कसौटियों को लेकर विमर्श के बिंदु उभरते रहे हैं। द्वापर के कृष्ण ने तो प्रेम की परिभाषा के बजाय उसे करना ज्यादा बेहतर समझा। वे इंद्र की तरह वासना से पीडि़त नहीं थे, बल्कि वे प्रेम के स्वस्थ प्रतीक बनकर उभरे। राधा, उनकी प्रेमिका थी, इसके अलावा उनकी चार पत्नियां भी थीं, लेकिन प्रेम किसी से कम न था। वैसे उनकी सोलह हजार पटरानियों का जिक्र भी मिलता है। लेकिन मिथक के इस अतिरेक में न भी जाएं तो, यह मानने में किसी को गुरेज नहीं होगा कि पत्नि के अलावा राधा उनकी चाह थी। राम चूंकि मर्यादा में बंधे हुए थी, इसलिए मर्यादा को तोडऩे की शक्ति उनमें नहीं थी। समाज के बंधे-बंधाए नियम राम के लिए सब कुछ था। दूसरे शब्दों में आप कह सकते हैं कि राम समाज के पीछे-पीछे चलने वाले व्यक्ति थे तो कृष्ण समाज के आगे-आगे चलने वाले प्रेरणा के पुंज। इसे काल और समय का अंतर भी मान सकते हैं। संस्कृत के महाकाव्य तो प्रेमगाथाओं से भरे पड़े हैं। यम-यमी से लेकर उर्वशी-पुरुरवा तक। लेकिन यहां प्रेम देह से ऊपर नहीं उठ पाता है। मध्यकालीन संत तो प्रेम में पूरे पगे नजर आते हैं। मीरा गली-गली अपने प्रेम की पीड़ा का अहसास कराती घूम रही हैं तो कबीर प्रेम गली को इतना संकरा बताते और कहते हैं कि उसमें दो का प्रवेश नहीं  सकता। प्रेम के मामले में 'दोÓ बड़ा अर्थपूर्ण है। इसे समझने की जरूरत है। किसी ने कहा है कि दो जब एक हो जाए तभी प्रेम की सार्थकता है। जब तक शरीर का भान है, दो का बोध है, समझिए प्रेम में कोई कसक रह गयी है। कबीर ऐसे प्रेम के कायल हैं, जहां दो का अस्तित्व ही न बचे, ऐसा प्रेमी ही प्रेम की गली में प्रवेश कर सकता है और उसे पा सकता हैै।
वस्तुत: प्रेम आकर्षण से उपजता है। यह आकर्षण ईश्वर के प्रति हो, गुरु के प्रति हो या विपरीत लिंगी हो। यह सच है कि प्रेम चाहना से उत्पन्न होता है, लेकिन चाहकर आप प्रेम नहीं कर सकते। यह अनायास-अचानक घट जाता है। लेकिन समाज की अपनी आचार-संहिता होती है, जहां दो स्त्री-पुरुष के प्रेम को समाजविरोधी करार दे दिया जाता है। चूंकि समाज का अपना तर्क है। उसने विवाह नामक संस्था बनायी है। और इस संस्था से बाहर यदि कोई प्रेम करने की जुर्रत करता है तो उसे सामाजिक मर्यादाओं के उल्लंघन का दोषी माना जाता है, और इसकी सजा हर समाज ने अलग-अलग से मुकर्रर कर रखी है। प्रेम के संदर्भ में समाज की प्रकृति दरअसल तानाशाह की है। वह अपने ऊपर किसी भी प्रकार के व्यवधान का प्रतिरोध करता है। कभी-कभी आक्रामक की मुद्रा में तो कभी उसे नष्टï करने की चेतना से लैस होकर। जबकि प्रेम सारे व्यवधानों, सीमाओं या बंधनों को दरकिनार कर स्वयं में ही केंद्रित रहता है। उसके लिए किसी भी प्रकार के बंधन अस्वीकार्य हैं। एक अर्थ में यह मनुष्य की स्वतंत्रता की परम अभिव्यक्ति के रूप में उभरता है। पर समाज इस स्वतंत्रता को अपने लिए घातक समझता है। समाज की अपनी चिंताएं होती हैं तो प्रेमियों की अपनी चाह। हां, समर्थवानों को कोई समस्या नहीं है। उच्च मध्यवर्ग के लिए प्रेम कोई बड़ी समस्या नहीं है। वहां प्रेम अंतत: परिणय में परिणित हो जाता है। न भी हो तो वे एक दूजे में रस तो लेते ही हैं। सारी समस्या मध्यवर्ग के लिए है, जो रूढिय़ों और परंपराओं से चिपके रहना भी चाहता है और आधुनिकता की वकालत भी करता है। इन दोनों के बीच द्वंद्व से सबसे अधिक प्रभावित होने वाला भी यही वर्ग है। दूसरे समाजों में इस तरह की बंदिशें नहीं है। आदिवासी समाज में 'घोटुलÓ नामक प्रथा स्त्री प्रेम की स्वतंत्रता का ही पक्षधर है। इस प्रथा के अंतर्गत गांव के बाहर युवक-युवतियों को एक साथ रहने के लिए छोड़ दिया जाता है। वे जरूरी चीजें लेकर रहने के लिए चले जाते हैं। मौज-मस्ती करते हैं, हडिय़ा पीते हैं, नाचते-गाते हैं, तब यह फैसला होता है कि वे एक साथ रह सकते हैं कि नहीं। यदि नहीं तो, फिर किसी और के साथ।
हमारे समाज की त्रासदी यह है कि मन-मिजाज से तो हम आधुनिक दिखना चाहते है, लेकिन अपने जड़ संस्कारों पर पुनर्विचार भी करने से परहेज करते हैं। कभी ग्रंथों का हवाला देते हैं कभी सामाजिक मर्यादाओं का। लेकिन खुद इन हवालों से दूर ही रहते हैं और बार-बार नैतिकता की लाठी से प्रेम को लहूलुहान करते रहते हैं।
                                          

हाय रे हामर हीरानागपुर

संजय कृष्ण : झारखंड यानी झाड़-झंखाड़ों का प्रदेश। नदी-नालों का 'देसÓ। ऊंचे-नीचे, पहाड़-पर्वतों का देस। झरनों से निकलते संगीत का देस। मांदर की थाप पर नाचते-गाते लोगों का देस...और प्रकृति और परंपराओं के अनुरागियों का देस। एक ऐसा देस, जहां आ जाएं तो फिर लौटने का मन नहीं करता..आखिर असुर, मुंडा, उरांव जैसी जनजातियां जब यहां की धरती के पांव पखारीं तो फिर इस धरती की होकर ही रह गईं। उन्होंने यहां रहते हुए एक नई संस्कृति और समाज की नींव रखी। इसके बाद भी इस वन प्रदेश में लोगों के आने-जाने का सिलसिला कभी बंद नहीं हुआ। इस संदर्भ में यह लोकगीत शायद हमारी बात को और पुख्ता कर सकता हैै। देखं-
कहां जनमले मैना, कहां सिरजला रे
रूइदासगढ़ जनमले मैना, नागपुरे अड्डïा मारै।

बावजूद इसके यहां पहले से रह रही सदान जातियों की संस्कृति और समाज पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ा, हां एक दूसरे से प्रभाव अवश्य ग्रहण करते रहे। कोई भी समाज अपनी संस्कृतियों के कारण ही पहचान का बायस बनता है और संस्कृतियों के जरिए ही उस समाज की अंदरूनी लय को समझा जा सकता है, उसके गतिशास्त्र को पढ़ा जा सकता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि संस्कृतियों की वाहक भाषा होती है। कोई भी संस्कृति अपनी भाषा के जरिए ही विस्तार और विश्वास ग्रहण करती है। इस अर्थ में भाषा का यहां दोहरा चरित्र हो जाता है। यानी वह संप्रेषण के साथ-साथ संस्कृति के वाहक की भूमिका भी निभाती है। अफ्रीकी लेखक न्गुगी वा थ्योंगो ने लिखा है-''एक संस्कृति के रूप में भाषा इतिहास में जनता के अनुभवों का सामूहिक स्मृति-भंडार (मेमोरी बैंक) है। संस्कृति उस भाषा से लगभग पूरी तरह अविभेद्य है, इसकी उत्पत्ति, निर्माण, विकास, अभिव्यक्ति और यथार्थ में एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक संप्रेषण का काम करती है।ÓÓ कहना न होगा कि भाषा और संस्कृति एक दूसरे को आगे बढ़ाने में मदद करते हैं। किसी भी संस्कृति को उसके भाषा के जरिए ही उसके मूल आस्वाद को पा सकते हैं। अनुवाद की भाषा में वह संप्रेषण नहीं होता कि हम मूल के आस्वाद को पा सकें। इसीलिए संस्कृति के खोजियों ने उन संस्कृतियों को जानने के लिए वहां की भाषा सीखी। पाली भाषा के बिना बौद्ध धर्म के मूल आस्वाद को नहीं पा सकते हैं और न संस्कृत के बिना सनातन सत्यता को समझ सकते हैं। आखिर मुंडाओं के इतिहास को जानने और उसे लिपि बद्ध करने के लिए कुमार सुरेश सिंह को मुंडारी सीखनी ही पड़ी थी। थ्योंगो ने ठीक ही लिखा है कि 'संप्रेषणीयता और संस्कृति के  रूप में भाषा एक दूसरे का उत्पाद है।Ó दूसरी बात यहां ध्यान देने योग्य यह है कि संस्कृतियों का बहुत कुछ हिस्सा 'लोकÓ से निर्मित हुआ रहता है। उन लोक कथाओं में उन संस्कृतियों के बीज छिपे रहते हैं, जो हमारी स्मृति में रचे-बसे होते हैं। लोक में ही अनेक पर्वों को मनाने की परंपरा भी निहित होती है। ये सभी तत्त्व मिलकर ही संस्कृति का निर्माण करते हैं, उसकी पहचान को रेखांकित करते हैं। केवल भौतिक उपादान ही किसी संस्कृति का निर्माण नहीं करते बल्कि उसके साथ तमाम अवयव, जो मानसिक क्रियाओं से उद्भूत होते हैं, संस्कृति के निर्माण और उसके विस्तार में सहयोगी भूमिका निभाते हैं। ऐसे में यहां यह विशेष ध्यान रखने योग्य हैंकि संस्कृति से लेकर समाज तक- एक दूसरे से प्रभाव ग्रहण करते रहे हैं और चीजें एक दूसरे में घुल-मिलकर एक दूसरे का हिस्सा बनती रही हैं। यहां प्रकृति पर्वों की अटूट शृंखला है। अभी-अभी सरहुल समाप्त हुआ है। यह पर्व नए साल के आगमन और नए फसलों की तैयारी की पृष्ठïभूमि में मनाया जाता है। इस मौसम में पत्ता-पत्ता, बूटा-बूटा सब गुनगुनाने लगते हैं। हिंदुओं की बात करें तो होली के साथ ही चैत महीने के चढ़ते नए साल की शुरुआत हो जाती है। आदिवासी भी इसी महीने से नए साल में प्रवेश करते हैं। फगुआ, सरहुल, झंडा, मंडा, रथयात्रा, करमा, जीतिया, ईंद ,दसँय, सोहराइ, देवउठान, मागे, आदि पर्व हिंदू और आदिवासी कुछ परिवर्तन के साथ, साथ-साथ मनाते देखे जा सकते हैं। यही नहीं, यहां के पारंपरिक लोकगीतों में देवी-देवताओं के जो नाम आते हैं, उन्हें दोनों ही मानते हैं। मुण्डारी भाषा में एक जदुर गीत गाया जाता है, जिसकी प्रथम दो पंक्तियों का अर्थ है:
' हमने हल चलाते समय उसे पाया था।
हम उसे सीता नाम देंगे।Ó
( सीतान रेगे होबु नामेलिआ
सीता नुतुमेबु नुतुमिआ।)

विवाह संस्कार के अवसर पर वर-वधू के लिए मंगल कामना की जाती है। कुछ पंक्तिया देखें-
अन्न माता, लक्ष्मी माता,
खेती-कृषि की देवियां
तुम्हारे साथ वास करें...

 महाश्वेता देवी तो काली और कृष्ण, शिव और पार्वती तक को आदिवासी मूल का ही बताती हैं। हिंदुओं के अनेक पर्व और परंपराएं आदिवासियों से ही ली गयी हैं। आज आदिवासी समुदायवाचक संज्ञा है, जबकि  प्राचीन काल से लेकर अंग्रेजों के आगमन से पूर्व तक उन्हें उनके नाम मसलन कोल, भील, मुडंा, गोंड़, किरात, निषाद गिरिजन आदि के नाम से ही संबोधित किया जाता रहा है। सुग्रीव, बाली और हनुमान को आदिवासी ही माना जाता है। संयोग है कि ये सभी झारखंडी हंै। एक बात और भी अचरज पैदा करती है कि जो लोग यहां के आदिवासियों को यहां के प्राचीन निवासी मानते हैं, उन्होंने इस ओर गौर किया है कि नहीं कि यहां नदियों के नाम क्यों संस्कृत में मिलते हैं-दामोदर, कोयल, कांची, स्वर्णरेखा, शंख, देवनदी आदि। इसी तरह उर्दू में भी एक नदी पहचानी जाती है-अमानत नदी। हो सकता है कि इस नदी का पूर्व नाम कुछ और रहा हो और मुगलकाल में इसे अमानत का नाम मिल गया। क्योंकि ऐसा तो नहीं है कि इस नदी का उद्भव ही इस काल में हुआ होगा। यह तो हास्यास्पद बात होगी। यहां जंगलों में जो पुरातत्त्व के अवशेष भी मिलते हैं तो उनमें शिवलिंगों की बहुतायत रहती है। इतिहास के अध्येता जानते हैं कि यहां नागवंशियों से संबंधित अनेक चिह्नï मिलते हैं। नागवंशियों ने यहां लंबे समय तक राज किया है। वे शिवभक्त थे और शिवप्रिय नागों के भी। शिव को लिंग के रूप में भी पूजा जाता है। एक और जाति थी-भारशिव। वह अपनी भुजाओं में शिव लिंगों को बांधे रखती थी-संभवत: इसीलिए उसे भारशिव कहा गया। डा. काशी प्रसाद जायसवाल और ललित निबंधकार कुबेरनाथ राय ने इन पर विस्तार से प्रकाश डाला है। पर उनके अवशेषों पर अभी बहुत काम नहीं हुआ है और न यहां के जंगलों में बिखरे मूर्ति या अन्य पत्थरों की ओर ध्यान ही लोगों का गया है। यदि गंभीरतापूर्वक इनका अध्ययन किया जाए तो कई मिथ टूट सकते हैं और झारखंड के इतिहास के विलुप्त अध्याय पर से रहस्य के पर्दे उठ सकते हैं।
 हिंदुओं के प्रसिद्ध ग्रंथ रामायण के एक महत्वपूर्ण पात्र हनुमान को भी लोग झारखंडी और आदिवासी मानते हैं और आंजन ग्राम को लोग हनुमान और उनकी माता अंजनी से जोड़ते हैं। सीता तो मुंडारी गीतों में भी रची-बसी हैं। डा.रामदयाल मुंडा की माने तो सीता शब्द मुंडारी भाषा का है, जिसका अर्थ होता है-हल चलाना। मुंडारी में मूल शब्द 'सीÓ है, जिसका वही अर्थ ध्वनित होता है। हर कोई जानता है कि राजा जनक को सीता हल चलाते समय मिली थीं। संस्कृत में सीता का अर्थ फाल ही होता है, विद्वानों ने भी सीता शब्द को इसी अर्थ में ग्रहण किया है। अरविंद कुमार अपने थिसारस में भी सीता का यही अर्थ लगाते है। संस्कृत ग्रंथों में आज की तरह आदिवासी बनाम गैरआदिवासी का विभाजन नहीं मिलता है। दोनों के बीच ऐसी कोई विभाजन रेखा थी ही नहीं। इसमें कोई संदेह नहीं कि आज जो हिंदू धर्म का स्वरूप है, उसके भीतर अनेक पर्वों और त्यौहारों की जो शृंखला मिलती है-उसका बहुत कुछ उत्स यही आदिवासी समाज का सांस्कृतिक पक्ष ही है। इन रक्त संबंधों से जाहिर होता है कि किसी न किसी प्रकार इनसे आर्यों के संबंध की रेखाएं रही होंगी, तभी तो ये एक दूसरे की स्मृतियों में रचे-बसे हैं। आखिर मिथिला की सीता, मुंडाओं की स्मृति में कैसे आ बसीं? क्या इस पर विचार नहीं होना चाहिए।
यदि खोजा जाए तो और भी संस्कृति-सूत्र मिल सकते हैं, जिससे एक दूसरे की निकटता को संभव बनाते हैं। जैसे रावण को कुड्ुख भाषी उरावं अपना पूर्वज मानते हैं। यह भी ज्ञात हैं कि रावण ब्राह्मïण था और वैदिक शास्त्रों का अद्भुत ज्ञाता भी। और हां, शिव का भक्त तो था ही। यहां पर आज भी अनेक चिह्नï शिव से संबंधित मिलते रहते हैं। लेकिन यहां भी वही बात है कि वह छोटानागपुर का नहीं था। स्मृतियों में वह लंकावासी था। इतिहासकारों की बहुत माथापच्ची के बाद भी अभी तक रावण के स्थान को आधिकारिक रूप से चिह्निïत नहीं किया जा सका हैै। भाषाई दृष्टि से कुड्ुख और तमिल के शब्द संपदाओं पर विचार होना चाहिए। हो सकता है कि कुछ सूत्र और संदर्भ हाथ लगे। कुड्ुखभाषियों की स्मृति को भी बल मिल सकता है। इन तमाम संस्कृति-संबंधों से यह बात स्पष्ट होती है कि वैदिक काल से लेकर रामायण और महाभारत काल तक आदिवासी (हालांकि आदिवासी संज्ञा वर्तमान की देन है, खासकर रिज्ले और कर्नल डाल्टन की, जिन्होंने सबसे पहले इस शब्द को गढ़ा और प्रयोग किया, जिनका विश्वास समाज को बांटने में ज्यादा था)और आर्यों के बीच केवल सांस्कृतिक आदान-प्रदान ही नहीं होते थे, बल्कि नातेदारी भी प्रचलित थी। वैदिक काल के अनेक राजाओं और ऋषियों के वैवाहिक संबंध गैरआर्यों से भी होते थे। लेकिन हमें आदिवासी बनाम वनवासी जैसे शुद्ध राजनीतिक नारों से परहेज करना चाहिए और उनसे भी सावधान रहने की जरूरत है जो आदिवासी के नाम पर राजनीति करते हैं। जिन्हें संस्कृति की समझ होती है, वह जानते हैं कि अलगाव और बंटवारे से कोई भी समाज आगे नहीं बढ़ता है, हां, उसका विकास जरूर प्रभावित होता है। अमृता प्रितम ने एक जगह लिखा है कि राजनीति बांटने में ही विश्वास और विकास करती हैै और संस्कृति जोडऩे और जुडऩे में ही अपने वजूद को कायम रख पाती है।
 सांस्कृतिक वैशिष्टï्य के बावजूद यह स्वीकार करना पड़ेगा कि झारखंड की स्थिति दिनोंदिन बदतर होती जा रही है। खनिज संपदा से भरपूर इस प्रदेश का आम आदमी गरीबी, कुपोषण और बीमारी से जूझता हुआ अपनी अंतिम यात्रा की ओर बढ़ता जा रहा है। जो सपने देखे थे, अलग झारखंड के और विकास के, वे अब भी अधूरे हैं। दूसरी ओर विकास के नाम  लोगों के विस्थापन के मद्देनजर बनी पुनर्वास की नीतियां कितनी कारगर हैं, यह कोई छिपी बात नहीं है। सोचना होगा कि आखिर हीरानागपुर कहलाने वाला यह प्रदेश क्यों दिन ब दिन 'कंगालÓ होता जा रहा है, क्यों लाखों लोग पलायन के लिए विवश होते रहे हैं, क्यों आदिवासी लड़कियां अपने 'देसÓ से दूर परदेस में जाने के लिए विवश होती हैं? हमें अपनी संस्कृति और अस्मिता को बचाने के लिए इन सवालों से टकराना ही होगा, अन्यथा 'अखराÓ सूना हो जाएगा, क्या हम ऐसा ही चाहते हैं?..... 

बचपन की दिवाली

संजय कृष्ण : दिवाली आते ही बचपन की यादें ताजा हो जाती हैं। सोचता हूं यादों में खोना आदमी की फितरत तो नहीं। क्या यह मजबूरी है? आदमी क्या अपने बस में है? फिर यादें कैसे बस में हो सकती हैं? लेकिन यादें हैं कि बरबस याद आने लगती हैं। अब दिवाली को ही देखिए? बचपन में दिवाली की आहट आने से ही मन तरंगित होने लगता था। तरह-तरह के सपने तैरने लगते थे। इच्छाएं आकाश चूमने लगती थीं। तब, स्कूल जाना काफी बोरिंग लगता था। एक-एक पल जैसे पहाड़ लगता। कब दीवाली आए और घरों, मुंडेरों पर दीप जलाएं। जगमग करे सारा जहां। आखिर, प्रकाश किसको प्रिय नहीं होता! कहा भी तो गया है, तमसो मां ज्योतिर्गमय:। रात के अंधेरे में दीपों का उत्सव...। एक खूबसूरत समां। तो, बचपन की दीवाली सिर्फ इसलिए नहीं याद आ रही है कि हम मंदिरों, अपने घरों, पास-पड़ोस में दीप जलाते थे। याद इसलिए आ रहा है, दीवाली के बाद सुबह की घनघोर प्रतीक्षा करते। कब रात जाए और सुबह आए और दीपों को मुंडेरो, घरों से लूट लें...। इसके लिए कभी-कभी आपस में हम बच्चे झगड़ा भी कर लेते...। अब आप सोच रहे होंगे कि इन दीयों को लूट कर करते क्या होंगे। तो बता दें कि हम लोग दीयों को लूट का तराजू बनाते। दीयों को लेते और उसमें एक-एक दीये में तीन-तीन छेद करते और उसमें सूतली डालकर डंडी से बांध देते। डंडी का भी जुगाड़ हम लोग पहले कर लेते थे। लकड़ी के रोल में जो कपड़े लपेट कर आते, उस रोल का इस्तेमाल डंडी में करते। और, इस तरह हमारा तराजू बनकर तैयार हो जाता। अब बचपन बीते एक जमाना हो गया है। लेकिन यादों की हूंक उठती है तो मन बचपन में लौट जाता है। पता नहीं, आज के कान्वेंटी स्कूल में पढऩे वाले बच्चे अपने बचपन को आने वाले समय में किस तरह याद करेंगे?

जगजीत सिंह 70 वें जन्मदिन पर अपने चहेतों को देंगे तोहफा

संजय कृष्ण : खिलते हुए गेहुंआ रंग पर चटख लाल रंग की टी शर्ट। कंधे से झूलता लेदर बैग। चश्मे के भीतर से झांकती आंखें और उनसे बरसता नूर। आर्या होटल के रिसेप्शन कक्ष से सटे लॉन में मुखातिब गजल के शहंशाह जगजीत सिंह। राउंड टेबल द्वारा आयोजित 23 अक्टूबर की शाम-ए-गजल के सफल कार्यक्रम का चेहरे पर इत्मीनान झलक रहा था। मुख्तसर मुलाकात में बातों का सिलसिला शुरू हुआ। बात एक दो सवालों की थी, लेकिन कई सवालों का जवाब बेहद आत्मीयता से दिया।... तो रांची दूसरी बार आए थे। कहते हैं, बीस साल पहले आया था। तब काफी सिकुड़ी-सिकुड़ी थी। अब तो काफी फैल गई है। आपने ढेरों गजलें गाई हैं, कौन सी गजल आपके दिल को छूती है? वे प्रतिप्रश्न करते हैं, अब पिता से पूछ रहे हो कि आपको कौन बेटा प्रिय है? भई, पिता के लिए उसके हर बेटे प्रिय होते हैं। और शायर? शायरों के बारे में थोड़ी चूजी हूं। जो गजल पसंद होती है, उसे आवाज देता हूं। इसके लिए काफी मशक्कत करनी पड़ती है। गालिब से लेकर मीर , बशीर बद्र, निदा फाजली, जावेद अख्तर, खालिद कुवैती, जिगर मुरादाबादी, पयाम सइदी तक...और भी नाम हैं...।
शास्त्रीय संगीत की तालीम और साफ जुबान को गजल गायिकी का सबसे अहम पहलू बताते हुए जगजीत सिंह कहते हैं, पिछले चालीस साल से इस क्षेत्र में हूं और तीसरी पीढ़ी को गजल सुना रहा हूं। अजब यह कि तीनों पीढिय़ां साथ-साथ भी सुनती हैं। रांची में भी शनिवार को तीनों पीढिय़ां एक साथ शाम-ए-गजल का आनंद ले रही थीं। तो एक लंबा सफर तय किया है...। अगले साल आप अपना 70 वां जन्मदिन मनाएंगे। क्या तोहफा देना चाहेंगे अपने चाहने वालों को? इसके लिए कई योजनाएं हैं। देश-दुनिया में सत्तर बेहतरीन कार्यक्रम पेश करना हैं। यह कार्यक्रम अगले साल फरवरी से शुरू हो जाएगा। सत्तर गजलों का एक एलबम भी निकालना है। चाहूंगा की रांची में भी एक आयोजन हो।    
पॉप म्यूजिक की ओर बढ़ते युवाओं के रुझान के बारे में दो टूक राय रखते हुए गजल सम्राट कहते हैं, इन्हें जो तालीम मिलेगी, वही करेंगे न! हम जो परोसेंगे, वही वे खाएंगे। इसके लिए उनसे कहीं ज्यादा हम जिम्मेदार हैं। गजल गायिकी के अपने लंबे सफर के बारे में कहते हैं, मुझे लगता है कि मैं आज भी गजल गायिकी में टिका हुआ हूं। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि मैंने 15-20 वर्षों तक शास्त्रीय संगीत सीखा है।
गजल सम्राट जल्द ही एक फिल्म में संगीत निर्देशन करेंगे। यह फिल्म मशहूर अफसानानिगार सआदत हसन मंटो की कहानी पर फिल्म बन रही है। कहानी के नाम का उल्लेख उन्होंने नहीं किया। इधर के फिल्मी गीतों के बारे में भी वे टूक जवाब देते हैं। इस जवाब से आज के फिल्मी गीतकार कुछ सबक ले सकते हैं। सिंह कहते हैं, आज ऐसे गीत लिखे-गाए जा रहे हैं कि हॉल से बाहर आते ही दिमाग से निकल जाते हैं। ऐसे गीतों का कोई भविष्य नहीं। बातें और भी होतीं...लेकिन उनके फ्लाइट का समय हो रहा था...    

मखमली घास पर ओस बन टपकी गजल

संजय कृष्ण : खुले आकाश में शरद की छिटकी चांदनी और जमीन पर फैली मखमली घास से टकराती गजल सम्राट जगजीत सिंह की कशिश भरी आवाज। कंपकंपाते होठों से झरते शब्द और हारमोनियम से खेलती उनकी उंगलियां। और, गीत-संगीत की लयबद्धता से टूटती खामोशी...। शनिवार की शाम कुछ ऐसी ही मदहोशी लेकर आई थी। रांची के जिमखाना क्लब का विशाल प्रांगण ही नहीं इस मदहोशी में झूम रहा था, पत्ता-पत्ता, बूटा-बूटा भी खामोशी से गजल का लुत्फ उठा रहे थे। अलाप से जगजीत ने गजल की शुरुआत की। गजल के बोल थे..ये इनायतें गजब की, ये बला की मेहरबानी, मेरी खैरियत भी पूछी किसी और की जुबानी।...ये घटा बता रही है, कि बरस चुका है पानी। गजल की इन पंक्तियों श्रोता झूम रहे थे। मानो नशे में हो। शायद श्रोताओं का मूड देख जगजीत ने उनकी पसंद की गजल सुनाई...ठुकराओ कि अब प्यार करो, मैं नशे में हूं, जो चाहो मेरे यार करो, मैं नशे में हूं...। और इस नशे से जमीं भी झूम रही थी और आसमां भी। पर, प्यार में तकरार न हो तो प्यार का मजा नहीं। बदले-वदले की बात भी प्यार में होती है। अपनी मखमली आवाज में जगजीत पूछते हैं, तुमने बदले हमसे गिन-गिन के लिए, क्या तुम्हें चाहा था इस दिन के लिए...। यह चाह ऐसी कि वस्ल का दिन भी मुख्तसर हो गया था। पूछना लाजिमी है, चि_ी न कोई संदेश, जाने वो कौन सा देश...। माहौल में थोड़ी हरकत हुई। तालियों की गडग़ड़ाहट ने सन्नाटे को तोड़ा। इस हौसलाफजाई से जगजीत ने वही सुनाई जिसकी चाह थी..बात निकली है तो दूर तलक जाएगी...। यकीनन, बात दूर तक गई। तभी, दौलत और शोहरत भी देने की बात जुबां पर आई। वाकई, क्या कोई बीते समय को लौटा सकता है। ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो, मगर मुझको लौटा दे...। माहौल की रूमानियत में गजलप्रेमी सुर-समंदर में गोते लगाते हुए भीग रहे थे। चांद था, रात थी चांदनी थी... तारों की बारात भी थी और था जगजीत का साथ। और इस साथ से श्रोताओं की खुमारी बढ़ती जा रही थी। भूख ऐसी कि हर ख्वाहिश पर दम निकलता जा रहा था...हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पर दम निकले। और फिर जब अपनी मशहूर गजल सुनाई...कल चौदहवीं की रात थी ...तो फिर पूरा प्रांगण तालियों से गूंज उठा। इसके बाद उन्होंने एक से बढ़कर अपनी चर्चित नज्में सुनाकर रांचीवासियों को मंत्रमुग्ध कर दिया। रात जैसे-जैसे जवां हो रही थी, महफिल भी वैसे-वैसे गजल के सागर में गोते लगा रही थी। तुमको देखा तो ये ख्याल आया..आग का क्या पल दो पल का....बुझते-बुझते एक जमाना लगता है।