गुप्तकथा

 गोपालराम गहमरी की यह रचना 1913 में बंबई से प्रकाशित हुई थी। वेंकटेश प्रेस से यह आई थी। यहां पर गहमरी जी काम भी करते थे। बाद में जासूस निकालने लगे। इसकी एक प्रति बची थी तो उन्‍होंने बंबई से भेज दिया। अभी लमही के अप्रैल जून अंक में इसे पुन: प्रकाशित कराया है। अब नेट पर भी यह रचना घूम रही है। आप भी इसे देखें पढे और अपनी प्रतिक्रया दें। जल्‍द ही उनके संस्‍मरणों की एक किताब आप सब के हाथों में होगी। -संजय

 

गुप्तकथा  

पहली झाँकी
जासूसी जान पहचान भी एक निराले ही ढंग की होती है। हैदर चिराग अली नाम के एक धनी मुसलमान सौदागर का बेटा था। उससे जासूस की गहरी मिताई थी। उमर में जासूस से हैदर चार पाँच बरस कम ही होगा, लेकिन शरीर से दोनों एक ही उमर के दीखते थे। मुसलमान होने पर भी हैदर जैसे और मुसलमान हिंदुओं से छिटके फिरते हैं, वैसे नहीं रहता था। काम पड़ने पर हैदर जासूस के साथ अठवाड़ों दिन रात रह जाता और जासूस भी कभी-कभी हैदर के घर जाकर उसके बाप चिराग से मिलता, उसके पास बैठकर बात करता था। चिराग अली भी इस ढंग से रहता था कि उसको जासूस अपने बड़ों की तरह मानता जानता था।
उन दिनों चिराग अली सत्तर से टप गया था। उज्ज्वल गौर बदन पर सफेद दाढ़ी मूँछ, सब शरीर भरा हुआ कांतरूप देखकर चिराग अली में सबकी भक्ति हो सकती है। इस बूढ़ेपन में भी देखने से जान पड़ता है कि चिराग अली चढ़ती जवानी में एक सुंदर रूपवान रहा होगा।
चिराग अली को कभी किसी ने किसी से टूट कर बोलते भी नहीं देखा। कोई उसका कुछ अपमान भी करे तो चिराग उसको सह लेता और उससे हँसकर बोलता था। कोई भीख माँगने वाला चिराग के द्वार से खाली हाथ नहीं गया।
सुनते हैं चिराग अली ने पहले बोट का काम शुरू किया और उसी काम से वह होते-होते एक मशहूर धनी हो गया। अपने बाहुबल से चिराग ने धन कमाकर राजमहल सा निवास भवन बनवाया और बहुत सा रुपया खजाने में जमा किया।
चिराग अली के महल में सदा आदमियों की भीड़ रहती थी। अपने परिवार में तो चिराग को अपनी बीवी, बेटे, बेटे की बीवी और कुछ छोटे-छोटे बच्चों के सिवाय और कोई नहीं थे किंतु धन होने पर जगत में मीत भी खूब बढ़ जाते हैं, इसी कारण चिराग के घर में खचाखच आदमी भर गए थे। उनमें बाप बेटे के नौकर चाकर स्त्रियों की दासी और बहुत से ऐसे नर नारी का समागम था जो धनहीन होने के कारण चिराग अली के साये में आ गए थे। चिराग अली अपने घर ही आए हुए गरीबों को नहीं पालते थे बल्कि बाहर भी बनेक दुखी दरिद्र लोगों का पेट भरते थे। इन सब बातों को कहने के बदले इतना ही ठीक होगा कि चिराग अली जैसे गंभीर मिलनसार और सबसे मीठे बोलने वाले थे वैसे ही दानी भी खूब थे। दया से उनका हृदय भरा पूरा था।
हैदर बाप के समान मीठा बोलने वाला और दानी नहीं था तो भी बुरे स्वभाव का आदमी नहीं था। हैदर का चाल चलन और दीन दुखियों पर उसकी समता देखने वाले मन में कहते थे कि वह भी बाप की तरह एक दयालु और दीनबंधु हो जाएगा।
बाप बेटे के चाल चलन के बारे में जो कुछ यहाँ हमने कहा है, उससे अब और कहने का काम नहीं है। हम इतना ही कहकर उनके गुणवर्णन का अध्याय पूरा करते हैं कि चिराग अली मानों अपने नगर का चिराग ही था। और सब लोगों में उसकी जैसी मान महिमा थी अपनी बिरादरी में भी वैसी ही बड़ाई थी। जहाँ कहीं जातीय सभा समाज भरती, वहीं चिराग अली को सभापति संपादक होना पड़ता। जहाँ कहीं किसी तरह का पंचायती मामला आता वहाँ चिराग अली के राय बिना उसका निबटारा नहीं होता था। मतलब यह कि हर तरह के काम में चिराग अली ही अगुआ था।
दूसरी झाँकी
दो तीन महीने बाद जब जासूस बाहर का काम करके कलकत्ते पहुँचा, उसके दूसरे दिन सवेरे पौ फटते ही हैदर उसके पास आया। पहले जैसे वह जासूस मिलता था आज उसका मिलना वैसा नहीं था। हैदर का चेहरा ही देखकर जासूस ने ताड़ लिया कि, हो न हो आज कुछ दाल में काला है। हैदर मुँह से बात करता है लेकिन भीतर धुकधुकी लगी है। आँखों से देखता है लेकिन उनमें पहले सी ज्योति नहीं हैं।
उसको देखकर जासूस ने पूछा – ‘क्यों हैदर! आज तुम्हारा चेहरा ऐसा क्यों है? घर में सब कुशल तो है? पिताजी तो अच्छे हैं न?’
हैदर ने कहा – ‘आपका समझना ठीक है। मैं सचमुच बहुत दुखी हूँ। और उस दुख को कहने ही के लिए आपके आया हूँ मेरे बाप मरने की दशा को पहुँचे हैं। अब जान निकले कि तब, बस यही बात हो रही है डाक्टर वैद्य दवा करते हैं सेवा के लिए भी नौकर चाकर उनको हाथों हाथ लिए हुए हैं, लेकिन किसी तरह उनकी बीमारी में बीच नहीं पड़ता। उनसे कोई हाल पूछे तो कुछ बतलाते नहीं। इतना ही कहते हैं कि, अबकी बचना नहीं है चाहे कितनी ही दवा दारू करो। अब मेरा मरने का ही दिन आ गया है। अब कहिए क्या किया जाए? मेरी तो अकल काम नहीं करती। अभी मैंने सुना कि, आप कल बाहर से आए हैं। इसी से दौड़ा आया हूँ कि उनका हाल सुनकर आप कुछ तदबीर बतलावेंगे।’
जासूस ने पूछा – ‘अच्छा! उनको क्या हुआ है सो कहो तो मैं अपनी राय पीछे कहूँगा।’
‘अच्छा आप सुनिए मैं उनका सब हाल कहता हूँ।’ कहकर हैदर कहने लगा -
‘तीन महीने हुए। एक दिन मैं संध्या को पिता के पास बरामदे में बैठा था। इतने में एक बूढ़े मुसलमान मेरे पिता से मिलने आए, ज्योंही आकर हम लोगों के पास की पड़ी कई कुरसियों में से एक पर बैठे त्योंही उन्होंने पिताजी से कहा – ‘क्यों? आप मुझे पहचानते नहीं हैं?’
पिता ने कहा – ‘आपका चेहरा हमें याद तो आता है लेकिन यह नहीं याद आता कि आपसे कहाँ मिले थे।’
जवाब में बूढ़े ने कहा – ‘मै एक बात बतला देता हूँ उसी से आपको याद आ जावेगा। मैं आपसे बंबई प्रदेश के एक गाँव में मिला था। आपको वहाँ के अली भाई का नाम याद होगा, मैं भी वहीं रहता हूँ मेरा नाम इब्राहिम भाई है।’
इतना सुनते ही पिता जी का चेहरा बदल गया। उन्होंने मुझे कहा – ‘बेटा! तुम थोड़ी देर को यहाँ से हट जाव मैं इनसे बात करूँगा।’
पिता की बात सुनकर मैं वहाँ से चला गया। फिर उन लोगों में क्या-क्या बात हुई सो मैं नहीं जानता। उनकी उमर पिता से ऊँची थी। सदा वह पिता जी के पास रहते थे इसी से मैं उनका कुछ पता भी नहीं जान सका वह तभी से मेरे घर रहने लगे। उनको रहने को पिता जी ने एक कोठरी ठीक कर दी उनके आराम को दो नौकर भी दे दिए गए।
पिता को कोई और आकर उसका पता पूछता तो वह इतना ही कहते थे कि, वह लड़कपन के साथी हैं।
पहले ही दिन की बात सुनकर मैंने इतना समझा था कि उनका नाम इब्राहिम भाई है और बंबई की ओर किसी एक गाँव के रहने वाले हैं। इसके सिवाय उनका और कुछ भी हाल मैं आज तक नहीं जानता।
पहले पहल तो वह बहुत सीधे सादे से मालूम हुए लेकिन जब वह पुराने हो चले तब उन्होंने अपना बड़ा रोब जमाया। हम लोगों को दबाने लगे। नौकर चाकरों पर बेकाम का हुक्म जारी करने लगे। जो उनका हुक्म नहीं माने व मानने में देर करे उसको पिता के सामने ऊँच नीच कहने के सिवाय मारपीट भी करने लगे। पिताजी उनका वह व्यवहार देखकर कुछ भी नहीं बोलते थे। इस कारण नौकर लोग सब सहने लगे। जिनसे नहीं सहा गया वह नौकरी छोड़कर चले जाने लगे। यहाँ तक कि, बहुत से पुराने नौकर नौकरी छोड़कर चले गए। हम लोगों को उनके चले जाने से बड़ा दुख हुआ। पिताजी उस बूढ़े पर क्यों इस तरह दया करते थे इसका कारण कुछ भी हम लोगों को मालूम नहीं हुआ।
व्यापार का सब काम जिस नौकर के हाथ में था उसको भी एक दिन बूढ़े ने बहुत ऊँच नीच कहा और बिना कसूर उसको इतना सताया कि, उससे सहा नहीं गया। उसने अपना सब दुख पिताजी से कह सुनाया। उस समय बूढ़ा भी पिताजी के पास बैठा था। पिताजी के सामने भी बूढ़े ने उसको बहुत सी बातों का बाण मारा। जब वहाँ भी पिता ने कुछ नहीं कहा तब वह पुराना विश्वासी नौकरी छोड़कर उसी दम यह कहता चला गया कि, अब इस दरबार में नौकरी करने का दिन नहीं रहा। भले आदमियों की इज्जत अब यहाँ नहीं बचती।
उसके चले जाने के बाद उसका सब काम मेरे सिर पड़ा। मुझसे जैसे बना मैं सब करता ही था। एक दिन उस बूढ़े ने मेरे पास आकर कि, ‘हैदर! एक चिलम तंबाकू तो भर ला।’
उसकी बात सुनकर मैंने एक नौकर से कहा कि, उनको एक चिलम तंबाकू भरकर ला दे।
इतना सुनते ही बूढ़ा आग हो गया। उसने कड़क कर कहा – ‘क्यों हैदर! तेरा इतना कलेजा! मेरा हुक्म नहीं मानता? मैंने जो काम करने का हुक्म दिया उसे न करके दूसरे नौकर को करने का हुक्म दिया? तेरे बाप ने जो काम काम आज तक नहीं किया वह काम तूने मेरे सामने कर दिखाया?’
उस इब्राहिम भाई पर हम लोगों को पहले ही से बहुत रंज था, लेकिन, पिताजी के सबब से हम लोग उससे कुछ नहीं कह सकते थे। लेकिन, उस दिन तो मुझसे उसकी बात नहीं सही गई और मैं एक जूता लेकर यह कहता हुआ उठा कि, अच्छा मैं अपने हाथ से ही तेरा कहना किए देता हूँ। और पास जाकर उसके सिर पर कई जमा दिए।
बूढ़ा जलते तेल का बैगन होकर उठा और मुझे बहुत अंडबंड बकता हुआ चला गया। मैंने उसकी ओर फिर आँख उठाकर भी नहीं देखा।
इस तरह उसको मेरे हाथ से पीटे जाते देखकर और सब लोग मन में कितने खुश हुए सो मैं नहीं कह सकता।
इस घटना के कुछ समय पीछे पिताजी ने मुझे बुला भेजा। मैं जब उनके सामने गया तब देखा वह बूढ़ा भी वहीं उनके पास बैठा था। उसको दिखाकर पिता ने कहा -
‘क्यों बेटा! तुमने इनको जूते से मारा है?’
मैंने कहा – ‘हाँ पिताजी! अपमान से जब क्रोध के मारे नहीं रहा गया तब मुझे ऐसा करना पड़ा।’ इतना कहकर उसने मुझे जो तंबाकू भर लाने को कहा था वह सब बात कह डाली और उसने और नौकरों के साथ जो व्यवहार किया था वह भी जहाँ तक याद आया पिताजी से कह सुनाया। मेरी बात सुनकर पिताजी थोड़ी देर तक चुप रहे फिर कहने लगे -
‘ओफ! तुमने बहुत खराब काम किया है। देखो तुम्हारे एक चिलम तंबाकू भर देने से ही यह खुश थे तो उसको कर देने से ही सब बखेड़ा मिट जाता। तुमने वैसा न करके बड़ा खराब काम किया है।’
पिता की बात सुनकर क्रोध के मारे मेरा शरीर काँपने लगा। मैंने बाप के सामने जैसी बात कभी नहीं कही थी वैसी बात कह डाली। मैंने उनकी बात से बिगड़कर कहा -
‘पिताजी! आपने कभी मुझे तंबाकू भरना तो सिखलाया नहीं, न तंबाकू भरने का हुक्म दिया कि मैं उस काम को सीखता। फिर जो काम ऐसा नीच है जिसको मैंने कभी नहीं किया, वैसा काम करने के लिए मुझे वह आदमी कहे जो पराया अन्न खाकर पेट पालता है। आप चाहें खुश हों या न हों मैं उसके कहने से ऐसा काम नहीं कर सकता।’ इतना सुनकर पिताजी ने कहा -
‘अरे बेसहूर तूने ऐसा खराब काम किया है जैसा कोई नहीं करेगा। जिनको मैं इतना आदर करता हूँ उनको तुमने जूते से मारा उस पर अपने खराब काम और कसूर की माफी तो क्या माँगेगा उलटे लंबा-लंबा जवाब दे रहा है। तुमको समझना चाहिए कि तुमने जो जूते मारे वह उनके सिर नहीं पड़े मेरे सिर पर पड़े हैं। तुमने उनको नहीं मारा मुझको मारा है। अब तुमको चाहिए कि किसी तरह हाथ पाँव पड़कर इनसे माफी माँगो नहीं तो तुम्हारे हक में अच्छा नहीं है।’ मैंने उनकी बात सुन कर कहा -
‘मेरे हक में अच्छा हो या न हो लेकिन इस बात में मैं आपका कहना नहीं कर सकता। आप हमें बिलकुल अनुचित हुक्म दे रहे हैं। इसकी मार से आप क्यों दुखी हुए हैं, वह मेरी समझ में नहीं आता। यह बड़ा नीच आदमी है, साधारण पाहुने की तरह घर में आकर अब यह अपने को घर मालिक समझता है और हम सब लोगों को नौकर चाकर गिनता है। इसको अपनी पहली हालत याद नहीं है। अभी इसको मैंने इसकी करनी का पूरा फल नहीं दिया है। मैं आपके सामने कह देता हूँ, अगर यह फिर हमारे साथ इस तरह करेगा तो मैं आपके आगे ही इसे मारे जूतों के रँग दूँगा। और उसी दम कान पकड़कर बाहर करूँगा।’ मेरी बात सुनकर पिताजी बोले -
‘देखो हैदर! मैंने समझा था कि तुम हमारी लायक औलाद हो। दया माया सब बातों में लोग तुमको मेरी ही तरह आदर से देखेंगे। लेकिन अब मैं देखता हूँ तो तुमको बिलकुल उलटा पाता हूँ। जो बेटा बाप की बात टाल दे उसका मुँह देखना भी पाप है। तू अभी मेरे सामने से दूर हो जा। बड़े लोग कहते आए हैं कि पिता की बात न मानने वाला बेटा बेटा नहीं है।’ अब मैंने पिता की बात सुनकर कहा -
‘पिताजी आप मुझ पर नाहक क्रोध करते हैं। दंड दीजिए तो दोनों को दीजिए। और नहीं तो आप हमारे जन्मदाता पिता हैं आपका हुक्म मुझे सरासर आँखों से मानना है। इसी से आपकी बात मानकर मैं यहाँ से जाता हूँ लेकिन जाती बार इस बूढ़े को सिखलाए जाता हूँ।’
इतना कहकर मैंने अपने पाँव से जूता निकालकर उस इब्राहिम भाई को खूब बाजार भाव दिया। पिताजी ने बहुतेरा उनको बचाना चाहा लेकिन बूढ़ेपन से शरीर कमजोर के सबब ‘अरेरे, हैं! अरे पाजी! दूर हो दूर!’ इतना कहने के सिवाय और कुछ नहीं कह सके। पिता ने चिल्लाकर नौकरों को बुलाया लेकिन वहाँ कोई नहीं आया, तब मैं मनमाना उनकी जूतन दास से पूजा करके इतना कहता हुआ चला गया कि अब फिर भी तुम यहाँ रहे तो जानिए कि हमारे ही हाथ तुम्हारा काल है।’
मुझ पर पिताजी इतना गुस्सा हुए थे कि उनके मुँह से फिर बात नहीं निकली वह वहीं बैठे काँपते रह गए।
वहाँ से तो हट गया लेकिन घर छोड़कर कहीं नहीं गया। पास के एक कमरे में छिपकर सुनने लगा कि अब वहाँ क्या होता है। मैंने एक दरार से देखा कि बूढ़ा वहाँ से उठा और पिताजी से बोला -
‘देखो अली साहब! मैं जाता हूँ लेकिन इसका बदला ले लूँ तब मेरा नाम इब्राहिम भाई नहीं तो नहीं।’ वह बूढ़ा वहाँ से चला गया। पिता ने उसको बहुत रोका लेकिन उसने कुछ न माना। वह घमंड के मारे उनकी बात न मानकर वहाँ से चला गया।
तीसरी झाँकी
जिस दिन वह बूढ़ा मेरे घर से चला गया उसी दिन से पिताजी का रंग बदला। उनके चेहरे पर कालिमासी पड़ गई। सदा वह किसी चिंता में चुपचाप रहने लगे। चिंता के साथ ही साथ उनका आहार भी घट गया, पहले जो उनका आहार था उसका अब दसवाँ भाग भी वह भोजन नहीं कर सकते थे।
जिस दिन पिता के सामने उस बूढ़े को जूते लगाकर वहाँ से चला आया उसी दिन से फिर मैं पिता के सामने नहीं गया, लेकिन छिपकर सदा देखता रहा कि पिताजी क्या करते हैं, कैसे रहते हैं, उनका दिन कैसे बीतता है उसका सब हाल मैं नौकरों से लिया करता था। पिताजी की यह दशा देखकर मैं भी डर गया कि क्या होगा? इब्राहिम भाई के अपमान से पिताजी ने भी सचमुच अपना अपमान समझा है या क्या? मुझे इस बात की बड़ी चिंता हुई कि पिताजी किस कारण इतना दुखी हुए हैं और क्यों उनकी ऐसी दशा हो रही है। मैं दिनोंदिन इस बात की खोज करने लगा परंतु कुछ भी पता नहीं लगा कि क्या बात है? एक दिन सवेरे पिताजी अपनी बैठक में बैठे थे, देखने से मालूम पड़ता था कि वह किसी गहरी चिंता में चित्त दिए हुए कुछ मन ही मन विचार कर रहे हैं। इतने में डाकपियन ने आकर उनके हाथ में एक चिट्ठी दी। उसको बैठक में आकर अपने हाथ पिता को चिट्ठी देते हुए मैं बहुत अकचकाया, क्योंकि अब तक वह सदा द्वारपाल या और नौकरों को चिट्ठी दे जाता था। कभी भीतर बैठक में आकर अपने हाथ से पिताजी को चिट्ठी देते हुए मैंने उसके पहले किसी डाकपियन को नहीं देखा था।
लेकिन जब पीछे वह चिट्ठी मेरे हाथ आई तब देखा कि उस पर लिखा था, जिसके नाम चिट्ठी है उसके सिवाय किसी और के हाथ में नहीं देना।
डाकपियन के चले जाने पर पिताजी ने उस चिट्ठी को खोलकर पढ़ा। एक बार नहीं दो बार नहीं बीसों बार उसको बड़े उत्साह से पढ़ने के बाद चिट्ठी को अपनी जेब में रख लिया।
चिट्ठी पढ़ने के पीछे पिताजी का चेहरा बदल गया। उनके कालिमामय बदन पर हँसी की उज्जवल रेखा दीख पड़ी। बहुत दिनों की प्रसन्नता जो उनके बदन से एक तरह से दूर हो गई थी, उस दिन फिर मेरे देखने में आई।
चिट्ठी के पढ़ने के पीछे पिताजी को खुश होते देख मुझे भी बडा आनंद हुआ। मैंने समझा कि पिताजी ने चिट्ठी में कुछ ऐसा शुभ समाचार पाया है जिससे उनकी चिंता दूर हो गई है। किंतु पीछे जब देखा कि उनका खुश होना बहुत थोड़ी देर के लिए था तब मन में बहुत डरा। मुझे मालूम हुआ कि बुझता हुआ चिराग जैसे अंत में एक बार चमक उठता है। मरते समय मनुष्य जैसे एक बार थोड़ी देर को सब रोगों से छुटकारा पा जाता है, पिताजी का खुश होना भी ठीक वैसा ही था।
पिताजी उस चिट्ठी को पढ़ते ही प्रसन्न होकर उठे और एक नौकर को बुलाकर हुक्म दिया कि देखो बीमारी से कई अठवाड़े बीते मेरा नहाना खाना ठीक नहीं होता, आज स्नान भोजन का ठीक-ठीक प्रबंध करना। मेरा शरीर आज भला चंगा है। हुक्म पाकर नौकर ने ऐसा ही किया। उस दिन खुशी मन से पिताजी ने आहार भी अच्छी तरह किया। आहार करने के पीछे कुछ समय लेट जाने का उनको अभ्यास था लेकिन उस दिन उसका उल्टा देखकर मुझे बड़ी चिंता हुई।
पिताजी ने आहार के पीछे ही बैठक में आकर चिट्ठी लिखना शुरू किया। इस बात से मुझे और चिंता हुई। पिताजी सदा चिट्ठी लिखने का काम नौकरों को देते थे। उस दिन पिताजी को अपने हाथ से चिट्ठी लिखते मैंने पहले पहल देखा। चिट्ठी लिखना पिताजी ने भोजन करने के बाद ही शुरू किया था किंतु अंत कब किया सो मुझे मालूम नहीं। रात के दो बजे तक जब मैंने देखा कि उनका चिट्ठी लिखना खतम नहीं हुआ तब मैं सो गया फिर कब उनकी चिट्ठी पूरी हुई सो मुझे मालूम नहीं हुआ।
दूसरे दिन जब मैं पलंग से उठा तो देखा कि पिताजी सो रहे हैं। सदा सवेरे जब वह पलंग से उठते थे उससे दो तीन घंटे बाद भी नहीं उठे तब एक नौकर ने उनको जगाना चाहा। पिताजी ने उसको कहा कि -
‘मेरा शरीर अच्छा नहीं है। न मुझ सेज से उठने की ताकत है।’
‘नौकर के मुँह से ऐसी बात सुनकर मुझसे अब रहा नहीं गया। जिस दिन इब्राहिम भाई को मैंने जूते लगाए थे उसी दिन से मैं पिताजी के सामने नहीं जाता था, लेकिन जब पिताजी की वैसी बीमारी सुनी तो नहीं रहा गया। उसी दम उनके कमरे में जाकर सेज पर एक कोने में बैठा। उनके बदन पर हाथ फेरकर देखा तो सारा शरीर आग हो रहा था। मैंने पिताजी से पूछा कि आपको क्या हुआ है? शरीर कैसा है?
‘मेरी बात सुनकर पिताजी बोले – ‘बेटा! मुझे क्या हुआ है सो मैं खुद नहीं जान सकता तुम्हें क्या बतलाऊँगा। लेकिन इतना मालूम पड़ता है कि मुझे बड़े जोर का ज्वर हुआ है और इस ज्वर से मैं अब बच नहीं सकूँगा। इसी के हाथ मेरा काल है।’ उनकी बात सुनकर मैंने कहा -
‘पिताजी! ज्वर तो बहुत लोगों को हुआ करता है। आप इससे इतना क्यों डरते हैं? फिर कलकत्ते में डाक्टर वैद्यों की भी कमी नहीं है। उनकी दवा से आप ठीक हो जाएँगे।’ मेरी बात सुनकर पिताजी बोले -
‘जब मैं खूब जानता हूँ कि इस बार मेरा आराम होना नहीं लिखा है तब बेकाम रुपया फेंकने से क्या लाभ होगा?’ मैंने उनके जवाब में कहा – ‘रुपया है किसके वास्ते। यह सब अपार धन किसका है। जिंदगी भर कमाई करके आपने यह धन जमा किया फिर आप ही के लिए यह धन नहीं खर्च किया जाए तो इस धन से क्या होगा? किस काम में लगाया जाएगा। आप चाहे मानें या न मानें मैं इसमें अब देर नहीं करूँगा। आपका शरीर सुधारने और आपको भला करने के लिए जितना रुपया लगेगा लगाऊँगा। इसमें आपके मना करने से मैं नहीं मानूँगा। मैं अभी जाकर उसका उपाय करता हूँ।’ इतना कहकर वहाँ से चला गया। और उनकी सेवा सहाय के लिए जितने दास दासी थे उनसे और अधिक नौकर नौकरानी लगा दिए। अपने पुराने और विश्वासी कर्मचारीगणों से सलाह लेकर कलकत्ते के चतुर अनुभवी नामी डाक्टर वैद्यों को बुलाकर पिताजी के इलाज में लगाए। लेकिन सब कुछ होने पर भी दिनोंदिन पिताजी की बीमारी बढ़ने लगी। वैद्य और डाक्टरों ने जितना ही सावधानी से दवा की उतना ही रोग बढ़ता गया। किसी दवा से लाभ नहीं हुआ। सबने उल्टा फल दिखलाया। इस शहर में अब ऐसे कोई नामी डाक्टर नहीं रहे जिन्होंने पिताजी को एक बार नहीं देखा हो। इस समय उनकी दशा बहुत खराब है। अब उनके जीने का कुछ भी भरोसा नहीं है। उनको आप भी मरती बार चलकर देख लें तो अच्छा हो। आप अभी मेरे साथ चलें तो बेहतर है।
चौथी झाँकी
हैदर की सब कथा कान देकर जासूस ने सुन ली। जासूस चिराग अली को बहुत मानता था, हैदर की बात सुनते ही उसी दम वहाँ से उठा और हैदर की गाड़ी में बैठकर उसके बाप से मिलने को चला। लेकिन रास्ते में जासूस को तरह-तरह की चिंता होने लगी। चिराग अली के घर में इब्राहिम भाई का पाहुना होकर आना, चिराग अली का उसको देवता की तरह मानना, हैदर का उसको जूते लगाना, क्रोध में आकर इब्राहिम का वहाँ से चला जाना, इन सब बातों के साथ चिराग अली की बीमारी का कुछ संबंध है या नहीं, यही विचार जासूस के चित्त में आया। चिराग अली ने वह चिट्ठी कहाँ पाई, उसमें क्या लिखा था? उस चिट्ठी को पढ़ने के पीछे उसका रंग क्यों बदला था? फिर चिराग अली ने दो बजे रात से भी अधिक समय तक बैठकर अपने हाथ से लिखा था, वह क्या था? उन्होंने जो चिट्ठी पाई थी, उसी का उत्तर था या क्या? अगर उसी का उत्तर था तो उसे उन्होंने कैसे उसके पास भेजा? मन ही मन जासूस ने विचार कर हैदर से पूछा – ‘तुम्हारे पिता को जो चिट्ठी मिली थी; वह किसने भेजी थी, उसमें क्या लिखा था, इसका तुमको कुछ हाल मिला है?’
हैदर – ‘उस पत्र में क्या लिखा था, कहाँ से आया था, किसने उसको भेजा था इस बात को जानने के लिए मेरी भी इच्छा हुई थी। यहाँ तक कि वह चिट्ठी मेरे पास आ गई। अब भी वह हमारे पास है, लेकिन उसमें क्या लिखा है सो अब तक मेरी समझ में नहीं आया। उसपर लिखने वाले की सही भी नहीं है। आप देखिए शायद समझ सकें।’
इतना कहकर हैदर ने एक चिट्ठी जासूस को दी। जासूस ने उस चिट्ठी को कई बार पढ़ा, लेकिन कुछ भी उसका मतलब नहीं मालूम हुआ। चिट्ठी में जो लिखा था।
‘अली! सब ठीक हो चुका है। अब कुछ देर नहीं है। तैयार हो जाव।
शहर बंबई।’
जासूस ने उसे पढ़कर हैदर के हवाले किया और कहा – ‘लो रखो। इस चिट्ठी से तो कुछ भी इसका मतलब नहीं मालूम हो सकता। इतना जाना जाता है कि इस चिट्ठी के लिखनेवाले ने तुम्हारे पिता से कोई काम करने के लिए कहा था। उसने उस काम को पूरा करके तुम्हारे पिता को लिखा है, लेकिन तुम्हारे पिता ने किसको किस काम के लिए कहा था, इसको वह जब तक आप नहीं बतलावेंगे तब तक जानने का कुछ उपाय नहीं है। इस चिट्ठी को पाकर जो तुम्हारे पिता खुश हुए थे, इसका कारण यही है कि उन्होंने अपने काम में सफलता सुनकर ही प्रसन्नता दिखाई थी। इस चिट्ठी की लिखी बात से उनकी बीमारी का कुछ भी लगाव नहीं मालूम पड़ता। उन्होंने जो लंबी चिट्ठी लिखी थी उसके विषय में कुछ जानते हो?’
हैदर – ‘जानने का उपाय तो बहुत किया, लेकिन कुछ भी जान नहीं सका।’
जासूस – ‘अच्छा आपने यह भी कुछ मालूम किया कि जिसके लिए वह चिट्ठी लिखी गई उसको वह भेजी गई या नहीं?’
हैदर – ‘मैं जहाँ तक जानता हूँ जिस रात को वह पूरी हुई, उस रात को तो रवाना नहीं हुई, क्योंकि दो बजे रात तक मैं खुद जागता रहा और बाद का हाल नौकरों से पूछा तो उन्होंने भी ऐसी कोई बात नहीं कही, जिससे उसका रवाना होना मालूम होता।’
जासूस – ‘तो मैं समझता हूँ उन्होंने जो कुछ लिखा था वह चिट्ठी नहीं थी। उन्होंने अपनी बीमारी से मरने का अनुमान करके अपने मरे पीछे अपनी संपत्ति का प्रबंध करने के लिए वसीयत लिखी होगी और उसे कहीं बाहर भेजा भी नहीं, उनके घर में ही कहीं पड़ी होगी।
हैदर – ‘मैंने खूब ढूँढ़ा लेकिन घर में उसका कहीं पता नहीं चला।’ दोनों में ऐसी ही बातें हो रही थीं कि हैदर के मकान के सामने आ पहुँची।
पाँचवी झाँकी
हैदर और जासूस दोनों ही गाड़ी से उतर कर भीतर जाते हैं कि जनानखाने से रुलाई सुनाई दी। जाना गया कि हम लोगों के वहाँ पहुँचने से पहले ही चिराग अली का शरीर छूट गया।
चिराग अली को मरा जानकर जासूस लौट जाना चाहता था, लेकिन इस दशा में हैदर को छोड़कर जासूस से लौटते नहीं बना। आँसू सँभालता हुआ जासूस हैदर के साथ कुहरामपुरी में गया लेकिन वहाँ जाने पर मालूम हुआ कि चिराग अली के कमरे में जाने का कोई ढंग नहीं है। भीतर के महल से जिन स्त्रियों ने बाहर कभी पाँव नहीं रखा था, उन्होंने भी चिराग अली की बैठक में आकर चिल्ला चिल्लाकर आकाश फाड़ना शुरू किया है। नौकर चाकर सब अलग खड़े अपने आँसू पोंछ रहे हैं। महल में रहने वालों में कोई ऐसा नहीं जिसकी आँखों से आँसू न बहता हो।
जासूस के साथ हैदर भीतर गया, लेकिन वहाँ की दशा देखने पर उससे अब रहा नहीं गया, अधीर होकर लड़के की तरह रोने लगा। अब हैदर को चुप कराना कोई सहज काम नहीं है, ऐसा समझकर जासूस ने दो चार पुराने विश्वासी नौकरों को अलग बुलाकर समझाया और कहा कि स्त्रियों को कह दो जनाने में चली जाएँ। चिराग अली के मरने की खबर सुनकर थोड़ी देर में यहाँ शहर के इतने आदमी आ जावेंगे कि तिल रखने को भी जगह नहीं बचेगी। बेहतर हो कि वह अब तुरंत भीतर चली जावें और उनका सब काम जैसा आपके यहाँ होता है किया जाए।
उन नौकरों ने वैसा ही किया। सब स्त्रियों को भीतर भिजवा दिया। जब बैठक स्त्रियों से खाली हो गयी, चिराग अली का शरीर बाहर लाया गया। उसको मुसलमानी धर्म के अनुसार पलंग पर रखकर अनेक लोग दफन करने को ले गए। साथ में हैदर भी गया।
बैठक में अब अकेला जासूस ही रह गया। मृत शरीर बिदा होने पीछे चिराग अली के अनेक हितमित्र वहाँ आए लेकिन सब चले गए। दो ही तीन आदमी उनमें से जासूस के साथ वहाँ बैठे रहे।
अब घर सूना पाकर जासूस अपना काम करने लगा। पहले धीरे से उसी घर में पहुँचा जिसमें चिराग अली बीमार होकर पड़े थे। देखा तो वहाँ जिस पलंग पर हैदर के पिता पड़े थे वहाँ दो चार टेबल, कुर्सी, तिपाई के सिवाय उस घर में कुछ नहीं था। उस घर में जासूस को जाते देखकर चिराग अली का एक नौकर वहाँ पहुँचा। उसको जासूस ने कई बार चिराग अली के पास देखा था। उन्होंने उसे चिराग अली का पुराना और विश्वासी नौकर समझा था। उसको देखते ही जासूस ने उससे पूछा – ‘क्यों जी! यही चिराग अली के सोने का कमरा है?’
नौकर – ‘हाँ साहब कुछ दिन तो इसी में सोते थे। उनके सिवाय और किसी को यहाँ सोने का हुक्म नहीं था।’
जासूस – ‘कितने दिनों से वह इस घर में सोते थे?’
नौकर – ‘हम तो पाँच सात बरस से उनको इसी घर में सोते देखते थे?’
जासूस – ‘उनका संदूक वगैर किस घर में रहता है?’
नौकर – ‘उनको मैंने किसी चीज को कभी अपने हाथ से कहीं रखते नहीं देखा। जब उनको जो चीज की दरकार होती उसको वह हैदर अली साहब से माँग लेते थे या किसी नौकर से माँगते थे।’
जासूस – ‘वह अपने जरूरी कागज पत्र कहाँ रखते थे?’
नौकर – ‘हमने तो उनको कोई भी कागज पत्र अपने हाथ से रखते नहीं देखा।’
जासूस – ‘और रुपए पैसे?’
नौकर – ‘रुपए पैसे भी हमने कभी उनको अपने हाथ से छूते नहीं देखा। जब जरूरत होती नौकरों को हुक्म देकर पूरा करते थे।’
जासूस – ‘चिराग अली ने मरने से पहले अपने हाथ एक बड़ा कागज लिखा था तुमने देखा था?’
नौकर – ‘हाँ देखा था। एक दिन दिन-रात बैठकर उन्होंने बहुत सा लिखा था।’
जासूस – ‘तुमको मालूम है, उन्होंने उसको कहाँ रखा था?’
नौकर – ‘मैं नहीं जानता कि उन्होंने उसको क्या किया?’
जासूस – ‘उसे वह किसी को दे तो नहीं गए?’
नौकर – ‘किसी को देते भी नहीं देखा। जान पड़ता है उन्होंने किसी को दिया भी नहीं। दिया होता तो हम लोग जरूर जान जाते।’
जासूस – ‘तो फिर उसको किया क्या?’
नौकर – ‘मैं तो समझता हूँ कहीं रख गए हैं।’
जासूस – ‘रख गए हों तो कहाँ रख सकते हैं तुम जान सकते हो?’
नौकर – ‘रखने की तो कोई जगह मुझे नहीं मालूम होती। अगर रखा होगा तो जरूर इसी घर में कहीं न कहीं होगा। इससे बाहर तो नहीं रख सकते थे।’
जासूस – ‘अच्छा आओ हम तुम मिलकर खोजें देखें इस घर में से कागज को बाहर कर सकते हैं या नहीं?’
अब दोनों उस घर में वही चिराग अली का लिखा लंबा कागज ढूँढ़ने लगे। उस घर में कुछ बहुत सामान भरा तो नहीं था। पलंग के सिवाय घर में ढूँढ़ डालने में पूरे पाँच मिनट भी नहीं लगे।
इसके पीछे पलंग ढूँढ़ने लगे। ऊपर जो पाँच छह तकिए रखे थे उनको खूब देखने पर भी दोनों को कहीं कागज का पता नहीं लगा। फिर दो चादर बिछी थी, उनको भी उठा कर फेंक दिया। नीचे दो तोसक थे। वह भी उठाया गया, लेकिन कहीं कागज का पता नहीं लगा। तोसक के नीचे तीन गद्दियाँ बिछी थीं। ऊपर की गद्दी निकाल डाली तो भी कुछ हाथ नहीं आया।
जब जासूस ने झटकारकर दूसरी गद्दी फेंकी तब देखता क्या है कि दूसरी और तीसरी गद्दी के बीच में एक बड़ा लिफाफा पड़ा है। उसको जासूस ने उठाकर देखा तो उसपर लिखा था – ‘मेरे जीते जी कोई इस लिफाफे को पावे तो बिना खोले हुए मेरे पास लौटा दे।’ बस इसके नीचे चिराग अली की सही। उसको पढ़ते ही जासूस ने समझ लिया कि चिराग अली ने मरने से पहले दिन-रात जागरण करके जो कागज लिखा था वह इसी लिफाफे के भीतर है, जासूस के मन में उस लिफाफे को खोलकर पढ़ने की उत्कंठा हुई लेकिन फिर मन में कुछ सोचकर यही ठीक किया कि, जब तक हैदर अली कब्रिस्तान से न लौट आवे तब तक खोलना या पढ़ना उचित नहीं है।
छठी झाँकी
हैदर अपने बाप को दफन करके सब लोगों के साथ जब घर लौट आया तब जासूस ने उसके हाथ में वही गद्दी के नीचे पाया हुआ बड़ा लिफाफा दिया और जैसे उसको पाया था सो सब कह सुनाया।
हैदर उसको लेकर पहले ऊपर का लिखा पढ़ा, फिर तुरंत लिफाफे को फाड़कर भीतर से लंबी चिट्ठी निकाली वह चिट्ठी के ही ढंग पर लिखी थी लेकिन लंबी बहुत थी। उसकी लिखावट देखते ही हैदर ने कहा – ‘यह कागज हमारे बाबा के हाथ ही का लिखा हुआ है।’
इतना कहकर हैदर ने वह लंबी चिट्ठी जासूस के हाथ मे दिया और कहा – ‘मैं बहुत थका हुआ हूँ आप ही पढ़ डालिए देखे क्या लिखा हैं?’
जासूस हैदर से चिट्ठी लेकर पढ़ने लगा। उसमें यह लिखा था :
‘बेटा हैदर! तुम्हीं एक मेरे लड़के हो। तुमको भी मालिक ने लड़का दिया है। इससे तुम खूब समझ सकते हो कि तुम हमारे कैसे प्यार हो। जिस दिन तुम्हारे ऊपर नाखुश होकर मैंने तुमको सामने से दूर कर दिया था उस दिन की बात मुझे याद है? एक साधारण बेजान पहचान के आदमी को मारा था। मैंने उसके लिए तुम्हारा अपमान किया लेकिन वह इब्राहिम भाई कौन था सो मैंने तुमको नहीं बतलाया। उसको मैं इतना क्यों मानता था, उसके अनेक बड़े बड़े कसूर मैं क्यों माफ कर डालता था, उसके समान आदमी का इतना आदर मैंने क्यों किया था, इसके बतलाने का उस दिन अवसर नहीं था, आज उन सब बातों के बतलाने का मौका आया है।
‘मैं जानता हूँ कि वह तुम्हारे ऊपर बहुत जुल्म करते थे, हमारे बहुत पुराने और विश्वासी नौकरों को भी सताते थे, कई बार मैंने उनको दास दासियों पर बेकसूर मारपीट करते देखा है, बहुत से लायक आदमी उन्हीं के जुल्म से हमारा घर छोड़कर चले गए। उन नौकरों के चले जाने से तुम लोगों को बहुत दुख हुआ तो भी मैं उन दिनों उनका हाल तुमसे नहीं कह सका वह सब कहने का मौका अब आया है।
‘वह कौन थे और मैं उनके इतने अपराध क्यों सहता हूँ यह सब तुम उन दिनों जान सकते तो उनके अपराधों की ओर तुम भी कुछ ध्यान नहीं देते, वह जो कुछ करते सब तुम भी चुपचाप देखते रहते। लेकिन ऐसा न करने से तुम इसमें कुछ भी कसूरवार नहीं हो। तुम्हारा इसमें रत्ती भर भी दोष नहीं है। मैं अब उनका सब हाल कहने के पहले अपनी ही कथा कहता हूँ उसी से तुम सब समझ जावोगे।
‘देखो बेटा! मेरा असल नाम चिराग अली नहीं है न मैं इस कलकत्ते में पैदा हुआ हूँ। मेरा असल नाम अली भाई है। बंबई हाते का मदनपुर गाँव मेरा जन्मस्थान है। इब्राहिम भाई जहाँ रहते हैं वहीं का मैं भी पैदा हुआ हूँ। मेरे बाबा कुछ बहुत मशहूर नहीं तो कोई साधारण आदमी भी नहीं थे। मैं किसी बहुत बड़े धनी के घर में पैदा न होने पर भी जैसे धनी और कुमार्गी लोगों लड़कपन में संग होने से चाल चलन बिगड़ जाता है वैसे ही मेरी भी गति हुई। बेटा! मैं अपना यह सब हाल तुमसे कहते हुए शरमाता हूँ और मैं समझता हूँ तुम इस बात को समझते होगे। लेकिन क्या करूँ मैं इन सब गुप्त बातों को तुमसे न कह जाऊँ तो तुम जिंदगी भर संदेह में पड़े रहोगे। इसी से पिता को जो बात पुत्र से कहना लोकाचार से बाहर है, उसी को मैं आज कहता हूँ।
‘जिस गाँव में मैं रहता था वहाँ एक धनी जमीदार था। वह मेरे ही बराबर का एक लड़का छोड़कर मर गया। उन दिनों मैं सोलह या सत्तरह बरस का होऊँगा। मुझसे उस धनी पुत्र की मिताई थी। बहुधा धनी के लड़कों चाल चलन जैसा होता है, उसका भी ठीक वैसा ही था। फिर उसके सदा साथ रहने से मेरा चाल चलन वैसा ही बिगड़ जाएगा, इसमें क्या संदेह था। अपने बाप के मरने पर बहुत बड़े धन का मालिक होकर उसने अपना चाल चलन और बिगाड़ दिया। उसके साथ मेरे सिवाय और भी जो दो चार कुमार्गी थे, सबने मिलकर उसके धन से बड़ी मौज मारी और इतना कुकर्म करने लगे कि उस गाँव में भले आदमियों को स्त्री पुत्र के साथ रहना कठिन हो गया। हम लोगों की आँख जिस गृहस्थ की बेटी बहन पर पड़ती थी उसको छल से हो चाहे बल से हो चाहे धन से हो किसी तरह बिना बिगाड़े नहीं रहते थे। हम लोगों के दूत ऐसे लट्ठ थे कि जिस कसम को कहो उसको तुरंत का तुरंत पूरा कर देते थे, इसी तरह कुकर्म करते हम लोगों को कुछ दिन बीत गए किसी तरह हम लोगों का पापाचार नहीं घटा।
‘जिस गाँव में मैं रहता था, उसके पास ही एक दूसरे गाँव में हमारी ही जाति का एक बहुत बड़ा धनी आदमी था। उसके एक सुंदरी जवान लड़की थी। उस सुंदरी पर हमारे उसी धनी मित्र की आँख पड़ी। उसको हाथ में लाने के लिए हम लोगों ने बहुत सी तदबीर की, जब किसी तरह मतलब नहीं निकला तो तब हम लोगों ने डाकूपना करना शुरू किया। एक दिन उस सुंदरी का बाप कहीं किसी काम को बाहर गया, उसके साथ उसके घर के और कई नौकर गए थे। हम लोगों ने जासूस लगा रखे थे। जिस दिन यह खबर मिली उसी रात को हम लोगों नें अपना मतलब पूरा करने की तैयारी की। और ठीक आधी रात को हम लोग अपने साथियों सहित उसके घर में घुस गए और उस सुंदरी लड़की को लेकर आ गए। इस काम के कर डालने के बाद बड़ा गोलमाल हुआ। उसका बाप खबर पाकर बाहर से लौट आया। घर आते ही उसने थाने में इत्तिला की। पुलिस वाले कमर कसकर उस लड़की को खोज में निकले। उन्होंने खूब ढूँढ़ खोज करने पीछे थककर रिपोर्ट की कि डकैती की इत्तिला जो गई है वह झूठी बात है उस धनी के घर पर डकैती नहीं हुई क्योंकि एक तिनका भी उसके घर का नहीं गया। जान पड़ता है कि उस धनी की विधवा सुंदरी बाहर निकल गई है। उसको उस तरह में इत्तिला करने में अपनी बेइज्जती उसने डकैती का बहाना करके इत्तिला की है। उसका मतलब यह है कि पुलिस डाकुओं की खोज करेगी और उसी में उस लड़की का पता लग जाएगा तो उसका काम निकल जाएगा।
इधर हमारे धनी मीत ने कुछ दिन तो उस जवान विधवा के साथ काटे। इतने में उनको एक और सुंदरी लड़की की बात किसी ने आ कही, तब उन्होंने अपना मन उस ओर दिया। और बहुत धन खर्च करके तो उस सुंदरी को हाथ में किया। जब यह दूसरी सुंदरी आई तब उस पहली विधवा सुंदरी पर से उनकी चाह हट गई। किंतु मैं उनको वहाँ से अलग ले जाकर अपनी स्त्री की तरह पालने लगा। मेरा उन दिनों ब्याह नहीं हुआ था इस कारण उसी पर मेरा प्रेम दिनोंदिन बढ़ता गया। होते होते मैं उसको अपनी ब्याही घरनी के समान ही जानने लगा और उसके कामों से भी ऐसा ही जान पड़ता था कि वह मुझे अपने स्वामी के समान मानती है। इसी तरह हम दोनों का एक बरस बीत गया तो भी उसके बाप ने अपनी लड़की का कुछ पता नहीं पाया। वह लड़की भी बाप को अपना पता नहीं देना चाहती थी।
‘इसी तरह कुछ दिन और बीतने पर मुझे उसके चाल चलन में कुछ खटका हुआ। धीरे-धीरे ऐसे काम देखने में आए जिनसे मैंने समझ लिया कि मेरा संदेह बेजड़ पैर का नहीं है। जहाँ मैंने उसको रखा था वहाँ इसी इब्राहिम भाई का छोटा भाई यासीन रहता था। मुझे मालूम हो गया कि वह यासीन उस पापिन से मिला है। अब मैं मन ही मन उस अभागिनी पर बहुत बिगड़ा और दोनों को कब पाऊँगा, इसी से चिंता में दिन बिताने लगा। एक दिन मैं उस पापिनी से यह कहकर बाहर गया कि अपने मित्र के साथ दूसरे गाँव को जाता हूँ तीन चार दिन पीछे आऊँगा। बस घर से चलकर मैं उसी अपने मित्र के घर रात भर रहा। दूसरे दिन भी वहीं ठहरा। जब रात हुई खाना खाकर जब मेरा मित्र सो गया था, मैं एक बड़ी भुजाली लेकर वहाँ से चला। जहाँ उस पापिनी को रखा गया था, लेकिन भीतर न जाकर दरवाजे पर चोरी की तरह छिपा खड़ा रहा।
‘जब रात बहुत गई, गाँव के लोग सो गए, सर्वत्र सन्नाटा छा गया तब वह सुंदरी साँपिन घर से बाहर निकली और दरवाजे पर आकर खड़ी हुई। उसके थोड़ी ही देर बाद यासीन भी अपने घर से आया। तब दोनों एक साथ घर में घुस गए। दरवाजा बंद कर लिया। मैं पीछे की दीवार टपकर भीतर गया। आँगन से दालान में पहुँचता हूँ कि सामने ही यासीन मिला। अपने हाथ की भुजाली से मैंने उसको इतने जोर से मारा कि वह वहीं गिर गया। यासीन को गिरते देखकर पापिन चिल्ला उठी। मैंने उसी दम उसको भी काटकर उसका काम तमाम किया। और दोनों की लाश पास ही पास रखकर बाहर आया तो देखता हूँ कि मुहल्ले के बहुत से आदमी दरवाजे पर खड़े है। जब मैं बाहर निकला तब वह सब लोग मुझे पकड़ने दौड़े लेकिन हाथ में छुरी देखकर कोई पास नहीं आया। मैं अपनी जान बचाकर जल्दी से भागा लेकिन पीछे से किसी ने आकर मेरे हाथ पर ऐसी लाठी मारी कि भुजाली धरती पर गिर गई। तब मुझे खाली हाथ पाकर कई और दौड़ने वालों ने पकड़ लिया। होते होते पुलिस को खबर मिली। और मुझे हथकड़ी डालकर उसने हवालात में बंद किया।
‘मैंने तो अपनी समझ में उन दोनों को जान से मारकर छोड़ा था लेकिन जब मैं हवालात में गया तब सुनने लगा कि यासीन और वह पापिनी दोनों जीते हैं। थोड़ी देर बाद किसी ने आकर कहा कि अब दोनों ही मर गए।
‘दो खून करने के कारण मेरे ऊपर मुकदमा हुआ। इन्हीं दिनों उस कुकर्मिनी के बाप को भी खबर मिली उसने भी सरकार में नालिश की। अब मेरे ऊपर यह अपराध लगा कि मैंने ही उसके घर में डाका डालकर उस लड़की को चुराया था और अब मैंने ही उसका खून किया है। बस उसका बाप कचहरी में खड़ा होकर मेरे ऊपर मुकदमा साबित करने की तन मन धन से तदबीर करने लगा। उधर यासीन का खून करने के कारण उसका भाई यही इब्राहिम अपने भाई का बदला लेने के लिए पैरवी करने लगा। मैं हवालत में पड़ा सड़ने लगा।
‘पेशी पर पेशी बढ़ते बढ़ाते बहुत दिनों पीछे मुकदमा चला। मेरे बाप ने खूब धन खर्च करके मुझे बचाने के लिए बड़े नामी वकील बैरिस्टर खड़े किए मेरे उस धनी मीत ने भी खर्च के लिए हाथ नहीं खींचा। उसने भी मुझे बचाने के लिए बड़ी मदद की लेकिन किसी का किया कुछ नहीं हुआ। कसूर साबित होने से जज ने मुझे फाँसी पर लटकाने का हुक्म दिया। मेरा विचार जिले में नहीं हुआ जज साहब दौरे में थे। मेरा विचार भी एक गाँव में ही हुआ। जब विचार हो जाने पर मैं जिले में लाया जाने लगा तब रास्ते में रात हो जाने के कारण एक थाने में मैं रखा गया। थाने के गारद पर दो सिपाहियों को पहरा था। जब रात बहुत गई। ठंडी हवा चली नसीब की बात कौन जानता था दोनों पहरेदार वहीं सो गए। जब मैंने गारद के भीतर से ही उनको नींद में देखा घट जोर से हथकड़ी अलग कर ली। इसमें मेरे हाथ का चमड़ा बहुत कट गया था। हथकड़ी उसी गारद में छोड़कर बाहर आने की चिंता करने लगा, लेकिन खूब अच्छी तरह देखने पर मालूम हुआ कि गारद से बाहर होने का कहीं रास्ता नहीं है जो है वह बंद है। उसमें फाटक नहीं लोहे के छड़ लगे है और उसी के बाहर दोनों पहरेदार नींद में पड़े है।
‘मैंने उन छड़ों में से एक को पकड़कर हिलाया तो हिलने लगा। मालूम हुआ कि जिस चौखट में वह जड़े हैं वह सड़ गया है मैंने जोर से एक छड़ को खींचा तो वह सटाक से काठ से अलग हो गया। एक ही छड़ के निकल जाने पर मेरे निकल भागने की जगह हो गई। मैं गारद से बाहर होकर भागा।
‘बाहर तो भागा लेकिन पहरे वाले सिपाहियों में से एक की नींद खुल गई। ‘असामी भागा’ चिल्लाते हुए दोनों मेरे पीछे दौड़े। मैं भी जितना जोर से बना जी छोड़कर भागा। काँटे कुश कैसे क्या पाँव के नीचे पड़ते हैं कुछ भी मुझे ध्यान नहीं रहा। जिसको फाँसी पर चढ़ने की तैयारी हो चुकी है उसको जान का क्या लोभ? मैं उस अँधेरी रात में ऐसा भागा कि पीछा करने वालों को मेरा पता नहीं मिला। मैं भागता हुआ एक जंगल में घुसा फिर थोड़ी देर दौड़ने पर वह जंगल भी समाप्त हो गया। मैं फिर मैदान पाकर उसी तरह दौड़ता गया और बराबर रात भर दौड़ता रहा।
‘दौड़ते दौड़ते जब सवेरा हुआ तब मुझे एक सघन जंगल मिला मैं उसी में घुस गया। मुझे यह नहीं मालूम हुआ कि रात भर में कितना चला हूँ। जब दिन निकल आया उसी जंगल में दिन भर पड़ा रहा। जब सूरज डूब गया फिर मैं बाहर हुआ। और पहली रात के समान बराबर रात भर चला गया। दो रात बराबर चलने पर जी में अब भरोसा हुआ कि मैं बहुत दूर चला आया हूँ, जब सवेरा हुआ तब फिर मैं जंगल में नहीं गया। दिन निकलने पर मुझे एक बस्ती मिली। मैं एक गृहस्थ के द्वार पर गया उसने मुझे पाहुन की भाँति आदर दिया। कई दिनों बाद उस गृहस्थ का अन्न खाकर मैंने विश्राम किया। पूछने पर मालूम हुआ कि मैं अपने यहाँ से चालीस कोस दूर आ गया हूँ। दिन भर विश्राम करके फिर वहाँ से चला और जब सवेरा हुआ, ठहर गया।
‘अब मैंने अपना फकीरी वेष कर लिया। हाथ में दरयाई नारियल लेकर भीख माँगता राह काटने लगा। जहाँ कहीं सदावर्त्त या धर्मशाला मिलता वहीं पेट भर कर खाता और रात काटकर सवेरे चल देता। इस तरह छ्ह महीने चलने के बाद मैं कलकत्ते आ पहुँचा। जब मैं कलकत्ते में आया जब भीख से मेरे पास पच्चीस रुपए बच रहे थे।
‘कलकत्ता उन दिनों मेरे लिए बिलकुल बेजान पहचान का शहर था। मैं दिन भर घूमता रह गया रात भर घूमा लेकिन कहीं ठहरने को जगह नहीं मिली, कोई जान पहचान का आदमी नहीं था। बंबई की ओर के बहुतेरे मुसलमान यहाँ देखने में आए, लेकिन मैं पकड़े जाने के डर से उनके पास नहीं गया।
‘फकीरी वेश में घूमकर मैंने समझ लिया कि धनी बस्ती से बाहर छप्पर के मकानों में भाड़े पर कोई जगह लूँ तो दो तीन रुपए महीने खर्च करके बैठने को ठौर पा सकता हूँ।
‘चौथे दिन मैंने एक मुसलमान घर पर जाकर बाहर के दरवाजे के पास ही एक कोठरी सवा रुपए महीने भाड़े पर पाई। जब मैं घर में रहने लगा तब मैं अपना फकीरी रूप छोड़कर साधारण मुसलमान बन गया, लेकिन अपना पहले का पहनाव नहीं पहना।
‘कलकत्ते के साधारण मुसलमानों के वेश में मैं वहाँ रहने लगा। अब मन में यह चिंता हुई कि किस तरह दिन कटेंगे। कौन काम करूँ जिससे पेट भरे। इसकी फिकर करते-करते दस-पंद्रह दिन बीत गए। बिछौने बरतन और साधारण कपड़े तथा चावल दाल के खर्च में वह पच्चीस रुपए भी खतम हो चले, लेकिन सुख से दिन बिताने के लिए कोई ढंग नहीं किया।

‘एक दिन मैं सवेरे गंगाजी के किनारे बैठा था। जहाज पर कोई काम मिल जाता तो अच्छा होता यहीं मन में विचारता था कि इतने में एक बूढ़े मुसलमान ने आकर मुझसे पूछा – ‘यहाँ क्यों बैठा है? मैंने जवाब में कहा – ‘कोई पेट भरने के रोजगार की चिंता में बैठा हूँ।’
मेरी बात सुनकर उसने कहा – ‘अच्छा एक दिन के वास्ते तो मैं तुमको काम देता हूँ। एक जहाज पर कुछ काम करते हैं उनकी देखरेख करने को जो मेरा आदमी था वह आज काम पर नहीं आया है। तुम उस काम को कर सको तो मेरे साथ आओ मैं उस काम पर तुमको आज के वास्ते रखता हूँ।’
‘बूढ़े की बात मानकर मैं उसके साथ गया। एक जहाज पर उसके सौ कुली या सौ से ऊपर रहे होंगे, काम कर रहे थे। मुझे उनकी देखरेख के वास्ते वहाँ रखकर बूढ़ा आप वहाँ से चलता हुआ। बूढ़े ने चलती बेर कहा कि छुट्टी के समय से पहले ही मैं आ जाऊँगा।
‘ठीक समय पर बूढ़ा लौट आया। मेरा काम देखकर बहुत खुश हुआ। उस दिन और दिनों से उस बूढ़े का ड्यौढ़ा काम हुआ। सब कुलियों को मजदूरी देकर बूढ़े ने विदा किया और मुझे एक रुपए देकर उसी काम पर बीस रुपए महीने पर नौकर रखा। मेरे काम से वह दिनोंदिन खुश होता गया। यहाँ तक कि मैं पाँच बरस तक बराबर काम करता गया। पाँचवें वर्ष उसने मेरा पचास रुपए वेतन कर दिया था। उसी साल वह मर गया। उसका काम भी उसके मरने से बंद हो गया। मेरे पास जो रुपए जमा हो गए थे उससे मैंने एक बोट खरीदा और उसको भाड़े पर चलाने लगा। उससे मुझे खूब लाभ हुआ। यहाँ तक कि एक के बाद मैंने दस बोट खरीदे और उनसे मुझे इतनी आमदनी हुई कि मैं धनी हो गया। मेरी गिनती नामी महाजनों में होने लगी। मैंने छप्पर का घर छोड़कर पक्का छहमंजिला मकान लेकर उसमें आफिस खोला, उन्हीं दिनों मैंने अपना ब्याह किया। मेरा दिन ऐसा फिरा कि धन लाभ के साथ ही तुम्हारा भी जन्म हुआ। अब मेरा कारोबार खूब बढ़ गया। मैंने कलकत्ते में आते ही अपना नाम बदल लिया था। वही नाम यहाँ के सब लोग जानते हैं। मैं फाँसी का असामी हूँ। गारद से हथकड़ी तोड़कर भाग आया हूँ सो यहाँ कोई नहीं जानता।
मैंने यहाँ से अपने बाप माँ को लिख भेजा कि मैं मरा नहीं भाग आया हूँ। यहाँ अच्छी तरह हूँ। वहाँ आऊँगा नहीं न तुम लोगों से भेट करूँगा, लेकिन तुम लोगों को रुपए भेजता जाऊँगा चिट्ठी भी नहीं लिखूँगा। मैंने उसके बाद फिर उनको चिट्ठी नहीं लिखी न उनसे भेंट की। हर साल इतना रुपए भेज देता था कि उनको किसी तरह की तकलीफ नहीं होती थी। रुपए मैं कलकत्ते से नहीं भेजता था कभी मद्रास, कभी रंगून, कभी और कहीं किसी दूर शहर में जाकर वहीं से डाक में रुपए भेजता फिर यहाँ चला आता था।
‘इतने दिन मेरे इसी तरह यहाँ सुख से कटे किसी को कुछ पता नहीं लगा लेकिन न जाने से मेरी खबर पाकर इब्राहिम भाई कैसे यहाँ चला आया। तुम अब समझ गए होगे कि मैं क्यों उसको इतना मानता और उसका सब सहता था। अब वह यहाँ से बिगड़कर बंबई गया है और वहाँ की पुलिस से सब हाल बताकर उसने मुझे चिट्ठी लिखी है।
‘पुलिस अब तुरंत यहाँ आवेगी और मुझे पकड़कर बंबई ले जाएगी। यहाँ मुझे फाँसी तैयार है। बेटा हैदर! यही हमारा गुप्तभेद है।
‘पुलिस जब यहाँ आवेगी तब चुपचाप व्यर्थ मनोरथ होकर लौट जाएगी। क्योंकि मैं यहाँ नहीं रहूँगा। इस कारण कि यहाँ कुछ गोलमाल होना तुम्हारी मान मर्यादा में बट्टा लगावेगा। मैं यहाँ नहीं रहूँगा। अब मेरा मरने का समय आया है। मैं खुशी से संसार छोड़ता हूँ। बेटा! मुझे विदा दो। तुम्हारे वास्ते जो कुछ चाहिए मैंने सब कर दिया है। तुम मेरी तरह किसी कुकर्म में न फँसो मैं यही चाहता हूँ।
पूरी चिट्ठी पढ़कर सब लोग चकित हुए। जासूस ने मन में कहा। ओफ! क्या भयानक लीला है। यह बूढ़ा भी गजब का आदमी था।
इसके पंद्रह दिन बाद बंबई से पुलिस के आदमी आ पहुँचे। जब उन्होंने सुना कि अली भाई उर्फ चिराग अली अब जगत में नहीं हैं, तब दुखी होकर सब लौट गए।

                                                  *****

'जनता ने मेरे चीते को बाघ बना दिया और मीडिया ने आदमखोरÓ

 मनातू मउवार को लोग 'आदमखोरÓ मानते हैं। कहते हैं मनातू की फिजाओं में उनके आतंक के किस्से अब भी तैरते हैं। उनकी दबंगई और क्रूरता से आस-पास का पूरा इलाका ही नहीं, पूरा प्रदेश थर्रा उठता था। साठ-सत्तर के दशक में देश की कोई ऐसी पत्रिका नहीं, अखबार नहीं, जो मनातू के इस कथित आदमखोर के किस्सों से अटा पड़ा न हो। लेकिन मउआर साहब इन आरोपों-विशेषणों को खारिज करते हैं। कभी किसी का विरोध नहीं किया। क्यों? कहते हैं 'कीचड़ से कीचड़ नहीं साफ किया जा सकता है।Ó ऊपर से दिखाई देने वाले इतने विनम्र आदमी के बारे में जो किस्से सुनाई पड़ते हैं, उससे मउवार साहब का मेल बिठाना मुश्किल है। कभी आतंक का पर्याय यह व्यक्ति अपनी विनम्रता से किसी को भी आकर्षित कर सकता है। जब मैंने पूछा, आपने बाघ पाला था और जो आपका विरोध करता, उसे बाघ के हवाले कर देते थे। मउवार साहब कहते हैं, बाघ नहीं चीता। मीडिया ने मेरे चीते को बाघ बना दिया और मुझे आदमखोर। भला मैं आदमखोर दिखता हूं। बड़ी विनम्रता से वे जवाब देते हैं। फिर मीडिया ने आपको ही निशाना क्यों बनाया? इसके पीछे जाति और राजनीतिक कारण रहे हैं। वह कहते हैं, 'पलामू के ही भीष्म नारायण सिंह जो एक समय बिहार में मंत्री रहे, बाद में राज्यपाल बने, इसी डालटनगंज के सर्किट हाउस में उनसे किसी बात पर अनबन हो गई। लिहाजा, उनके इशारे पर उस समय हमारे खिलाफ अखबारों में लिखा जाने लगा। बिहार से निकलने वाला 'शानदारÓ नामक अखबार ने मेरे खिलाफ खूब लिखा। जितनी गालियां देना संभव थी, दी। यह सब उनके इशारे पर हुआ। पलामू में एसपी से लेकर डीसी तक उनकी पसंद के आते और उनका एक ही मकसद था मउवार को परेशान करना।Ó

हालांकि आस-पास के इलाके वाले उनकी दबंगई की बात तो स्वीकारते हैं, लेकिन मीडिया ने जिस ढंग से उन्हें प्रस्तुत किया, उसे अतिरंजित बताते हैं। बाघ के बाबत वे कहते हैं, मैंने चीता पाला था। चीता ही नहीं, हाथी, घोड़े, कुत्ते आदि भी पाले थे। यह मेरा शौक था। अब चूंकि उनकी देखभाल नहीं कर सकता, इसलिए इस शौक को तिलांजलि देनी पड़ी। वैसे, अब समय भी नहीं रहा।
मउवार यानी जगदीश्वरजीत सिंह। अस्सी की अवस्था है। अब वे महादेव की शरण में हैं। किसी तरह अपने विशाल खपरैल के मकान में दिन काट रहे हैं। उनके पास पुरानी एक डाज कार है। इस कार ने वर्षों से सड़क का मुंह नहीं देखा है। लोग कहते हैं उनकी हालत भी इसी कार की तरह हो गई है। कभी मनातू तो कभी डालटनगंज उनका हाल मुकाम है। 

जमीन के मामले कहते हैं कि मेरे पास अब केवल चार सौ एकड़ जमीन है। हम बारह लोग हैं। कानून प्रति व्यक्ति 40 एकड़ जमीन रखने का अधिकार देता है। खेती-बारी के बारे में वे कहते हैं, सारी जमीन माओवादियों के कब्जे में है। किसी तरह कुछ जमीनों पर खाने-पीने भर उगा लिया जाता है। बहुत सालों बाद इस बार खेती की है। माओवादियों को लेकर वे कुछ नहीं बोलते। इतना ही कहते हैं कि जब उनके एक आह्वïान पर झारखंड की सरकार थथम जाती है, तो हम क्या हैं? मउआर साहब सैकड़ों मुकदमा लड़े। जमीन से लेकर बंधुआ मजदूर रखने के आरोपों को झेला। जिले से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक गए। कुछ मुकदमे खारिज हो गए, कुछ में जीत हासिल हुई। पर, बंधुआ मजदूरों से बेेगारी कराने के आरोप का खंडन करते हुए कहते हैं कि मेरा कसूर इतना ही कि मैंने मजदूरों को अपनी जमीन पर बसाया, दुख-दर्द, बीमारी-परेशानी में उनका साथ दिया, मदद की। अब यह लोगों की नजर में अपराध है तो मैं क्या कर सकता हूं। हम एक ऐसे युग में रह रहे हैं, जब बेटा बाप से भी बंधा रहना नहीं चाहता तो भला मजदूरों को कैसे बंधुआ बना सकता था!


उनके होठों पर मुस्कराहट हमेशा तैरती है और आंखें कुछ ढूंढती लगती हैं। गौर वर्ण और आकर्षक व्यक्तित्व के धनी मउआर साहब बड़ी शाइस्तगी से कहते हैं, 'नेचर से प्रेम करने वाला निर्दयी नहीं हो सकता है।Ó महाश्वेता देवी के 'भूखÓ और मनमोहन पाठक के 'गगन घटा घहरानीÓ जैसे उपन्यासों में मनातू के मउआर का अक्स है। एक समय मनातू मउआर के कारण सुर्खियों में रहा तो आज माओवादियों के कारण सुर्खियों में है।

साझी विरासत का पर्व है होली

होली साझी विरासत का पर्व है। जब दो संस्कृतियों का मिलन हुआ तो संस्कृति के साथ-साथ पर्व-त्योहार भी एक दूसरे के हो लिए। होली की बात करें तो यह भले हिंदुओं का पर्व है, लेकिन इसने अपनी सीमाएं तोड़ी हैं। यह मुसीबतों में भी मस्ती का एहसास कराता है। इस पर्व पर शायरों ने भी अपनी खूब कलम तोड़ी है। यह हमारी अनमोल साझी विरासत और इंसानी रिश्तों को एक सूत्र में बांधता है। फ़ाइ$ज देहलवी ने फरमाया है, आज है रोज़े-वसंत अय दोस्तां, सर्व $कद हैं, बोस्तां के दरमियां...अज अबीर-ओ-रंगे-केशर और गुलाल, अब्र छाया है सफेद-ओ-जर्द-ओ-लाल।
मीर तकी मीर की तो पूछिए ही मत। फरमाते हैं-होली खेला आसिफुद्दौला वजीर, रंगे-सुहबत से अजब है खुर्द और पीर। एक और नज्म देखिए-जश्ने नौरोजे हिंद होली है, राग-ओ-रंग और बोली-ठोली है। जश्ने नौरोजे यानी नए साल का समारोह। होली के साथ ही नया साल भी प्रारंभ हो जाता है।
नज़ीर अकबराबादी के फन से तो वाकिफ ही होंगे-जब फागुन रंग झमकते हों, तब देख बहारें होली की। और दफ के शोर खड़कते हों, तब देख बहारें होली की। परियों के रंग दमकते हों तब देख बहारें होली की...लड़-भिड़ के नजीर फिर निकला, कीचड़ में लत्थड़-पत्थड़ हो, जब ऐसे ऐश झमकते हों, तब देख बहारें होली की।
शाह 'हातिमÓ लिखते हैं, मुहैया सब है अब अस्बाबे होली, उठो यारों भरो रंगों से झोली...कोई है सांवरी कोई है गोरी, कोई चंपा बरन उम्रों में थोड़ी। सआदत यार खां 'रंगींÓ पिचकारी में रंग भरने की बात कहते हैं, भर के पिचकारियों में रंगीं रंग, नाजनीं को खिलाई होली सं...और...यह हंसी तेरी भाड़ में जाए, तुझको होली न दूसरी आये। इस तरह बहुत से उर्दू शायरों ने होली पर नज्म कही है। 

मरंग गोड़ा वाया आदित्य श्री

अपने पहले ही उपन्यास से चर्चित, प्रशंसित, पुरस्कृत महुआ माजी का दूसरा उपन्यास 'मरंग गोड़ा नीलकंठ हुआÓ राजकमल प्रकाशन से अभी-अभी आया है। छपने से पहले इसकी पांडुलिपि भी पुरस्कृत हो गई। उपन्यास का टैग लाइन है, विकिरण, प्रदूषण व विस्थापन से जूझते आदिवासियों की गाथा। यह गाथा कोल्हान के उस क्षेत्र की है, जहां के आदिवासी पिछले कई दशकों से यूरेनियम के कचरे का शिकार हो जवानी में ही दम तोड़ दे रहे हैं। कई तरह की बीमारियां, गर्भपात हो जाना, लाइलाज चर्म रोग और असमय बुढ़ापे की मार...ये सब अतिरिक्ति सौगातें हैं। विकास का एक भयावह चेहरा यहां दिखाई देता है। हालांकि कंपनी इससे अपना पल्ला झाड़ती रही है, लेकिन देश-विदेश के कई विशेषज्ञों की टीम ने इस क्षेत्र का दौरा किया और पाया कि ये सारी बीमारियां यूरेनियम के कचरे की वजह से पैदा हो रही हैं। महुआ माजी ने अपने उपन्यास में इसी विषय को उठाया है। पिछले तीन-चार साल से वह इस विषय पर काम कर रही थीं।
कहना न होगा कि जब हिंदी की मुख्यधारा में अभी तक आदिवासी ही नहीं आ पाए हैं तो उनकी समस्याएं कहां से आ पातीं? वह भी जादूगोड़ा के आदिवासी। कहा जा रहा है कि पहली बार जादूगोड़ा के आदिवासियों को आवाज मिली है। तब, महुआ इसके लिए वाकई बधाई की पात्र हैं।    मरंग गोड़ा को आप यहां जादूगोड़ा भी पढ़ सकते हैं। पर, पर मरंग गोड़ा नीलकंठ कैसे हो गया? यह समझ से परे है। नीलकंठ तो भगवान शिव का एक नाम है, जिन्होंने समाज के लिए विष पिया था। इन आदिवासियों को तो जबरन विष पिलाया जा रहा है।
402 पेज के उपन्यास में लेखिका ने 167 पेज तो अपनी आंखों से मरंग गोड़ा को देखने की कोशिश की है। दृष्टि भले आधी-अधूरी हो। लेकिन 168 पेज से लेखिका मरंग गोड़ा को कैमरे की आंख से देखती हंै। कैमरामैन का मना है आदित्यश्री। तआरुफ देखिए...'इनसे मिलिए, यही है वो फिल्म बनाने वाला पत्रकार-आदित्यश्री।Ó लेखिका के कृतज्ञता से भरे शब्द हैं, 'पहले दिन मरंग गोड़ा में कदम रखते ही उस युवा पत्रकार आदित्यश्री ने देखा था, ढेर सारे औरत, मर्द, बच्चे, बूढ़े एक तालाब में उछल कूद करते हुए हाथ से ही मछली पकड़ रहे हैं। बड़ा आश्चर्य हुआ था उसे। अपने वीडियो कैमरे से शॉट लेते हुए उसने जाना था कि अचानक उस दिन तालाब की तमाम मछलियां मर मरकर पानी की सतह पर चली आई थीं। तभी इतनी आसानी से लोग उन्हें पकड़ पा रहे थे। बाद में सगेन ने खुलासा किया था-'तालाब में टेलिंग डैम का जहरीला पानी कुछ ज्यादा ही चला आया था शायद...ÓÓ
सगेन उपन्यास का नायक है। सगेन को ततंग यानी उसके दादा पत्थरों का डाक्टर बनाना चाहते थे, लेकिन जैसे-जैसे सगेन बड़ा होता है, उसे जादूगोड़ा का सच दिखाई देने लगता है और फिर लोगों को जागरूक करने, एकजुट करने के लिए कमर कस लेता है। सगेन की भेंट जब आदित्यश्री से होती है तब जादूगोड़ा के सच से देश-दुनिया परिचित होती है। आदित्यश्री जादूगोड़ा पर कई डाक्यूमेंट्री बनाता है। उसका प्रदर्शन जापान सहित कई अन्य देशों में होता है। इस डाक्यूमेंट्री के माध्यम से आदिवासियों का दर्द लोगों के सामने आता है। जब देश-दुनिया में कंपनी की करतूतों का पता चलता है तो कंपनी वाले भी थोड़ा मानवीय रुख अपनाने को बाध्य होते हैं। 
आदित्यश्री एक एनजीओ की मदद से ही डाक्यूमेंट्री बनाता है। एनजीओ का नाम देने से लेखिका ने परहेज किया गया है। वहीं, एनजीओ के मुख्य कर्ता-धर्ता का नाम भी यहां बदल दिया गया है, जबकि उपन्यास में कुछ पात्र अपने सही नामों के साथ उपस्थित हैं। जादूगोड़ा के साथ ही सारंडा की कहानी भी कही गई है। साल बनाम सागवान की लड़ाई को भी उठाया गया है, लेकिन उस समय के एक बहुत बड़े आंदोलन कोल्हान विद्रोह को छोड़ दिया गया है।
1977 में केसी हेम्ब्रम और उस समय के मानकी मुंडा के प्रमुख नारायण जोंको ने कोल्हान रक्षा संघ का गठन किया था। आंदोलन की लपटें बहुत दिनों तक उठती रहीं। 1981 में अलग कोल्हान की मांग की गई। यहां तक कि कॉमनवेल्थ सचिव के सामने इसकी मांग रख दी गई। इसकी मांग यूएनओ में भी गूंजी। केसी हेम्ब्रम पर राष्ट्रदोह का मुकदमा भी चला। शुरुआत में इस संगठन के लोगों ने जादूगोड़ा में विकिरण के दुष्प्रभावों को सामने लाने की कोशिश की। आंदोलन को वैचारिक धार देने के लिए ही उक्त एनजीओ का गठन किया गया। पर उपन्यास में इस आंदोलन का कहीं जिक्र ही नहीं है। लेखिका ने आदित्यश्री के माध्यम से  जो देखा, सुना, समझा, बताया, या जो दिखाया गया, वही उपन्यास में परोस दिया गया। और, इस उपन्यास की सबसे बड़ी कमी तो यह है कि  उपन्यास उत्तराद्र्ध मरंग गोड़ा की कथा न होकर आदित्यश्री की संघर्ष गाथा लगने लगती है। फिल्म निर्माण, उसका विदेशों में प्रदर्शन, प्रेम का घटना और इसका शरीर के तल पर घटित होना ...। शक होने लगता है कि हम मरंग गोड़ा की कथा पढ़ रहे हैं या आदित्यश्री की। कहीं-कहीं उपन्यास में शोध इतना हावी हो गया है कि कथा पीछे छूट जाती है। दिल्ली वालों के लिए भले ही यह उपन्यास अंतरराष्ट्रीय लगे, जिनका कभी न आंदोलन से वास्ता रहा न आदिवासी समाज से, लेकिन झारखंडवासियों के लिए इसे पचाना मुश्किल ही होगा। फिर भी, उपन्यास को इसलिए पढ़ा जाना चाहिए ताकि हम जादूगोड़ा के दर्द को समझ सकें। दूसरा यह कि जापान ने अपनी जनता के विरोध के कारण विकिरण के खतरे को देखते हुए परमाणु संयंत्रों को बंद कर दिया। उपन्यास हमें विकिरण के खतरे से आगाह करता है। बताता है कि 'यूरेनियम को धरती के भीतर ही पड़े रहने दो। उसे मत छेड़ो। वरना सांप की तरह वह हम सबको डंस लेगा।Ó  

टैगोर हिल सुनाती है ज्योतिरींद्र की गाथा

संजय कृष्ण, रांची
टैगोर हिल के शिखर पर ब्रह्म मंदिर के खुले स्थान पर जैसे आज भी कोई ध्यान मुद्रा में बैठा है। सैकड़ों सीढिय़ां चढऩे के बाद इस एहसास से आप अलग नहीं हो सकते। सीढिय़ों के दाए-बाएं शिलाखंड, पेड़, पौधे, पत्तियां जैसे आज भी अपनी कहानी सुनाने को बेताब हों कि वह व्यक्ति कहां-कहां टहलता रहा। पेड़-पौधों और शिलाओं से कैसे बातचीत करता रहा? वह कुसुम का विशाल वृक्ष भी, जिसकी सौ साल से ऊपर उम्र हो गई है, उसकी चरणों में बैठक ज्योतिरींद्रनाथ टैगोर ध्यान लगाया करते थे। यहां आने पर कुछ भी अबूझ, अज्ञात और अव्यक्त नहीं है। कोई मौन नहीं, सब मुखर हैं।

वह आवास जहां ज्‍योतिरींद्र रहते थे
कण-कण बोलते हैं। हृदय को स्पंदित करते हैं। कभी-कभी यादों के झरोखें से झांकने पर बेचैन भी। कुसुम वृक्ष न जाने कितनी घटनाओं का साक्षी है। यहीं पर बैठकर ज्योति दा बाल गंगाधर तिलक की गीता रहस्य का अनुवाद करते थे। यहीं पर बैठकर नई-नई धुनें बनाते थे। यह धुन आज भी सुनाई देता है। रात के सन्नाटे में जब आप यहां से गुजरें तो लगेगा कि ज्योति दा की धुनों के साथ पेड़-पौधे, शिलाएं कोरस गा रही हैं।
सूरज की पहली किरण और फिर आखिरी किरण पड़ते ही इस पहाड़ी में चैतन्यता आ जाती है। सूरज का स्वागत भी करती है और संध्या विदा भी। अब आप सोच रहे हैं, क्यों निर्जीव की कथा सुना रहे हैं और यह ज्योतिरींद्रनाथ हैं कौन?  
ज्योतिरींद्रनाथ महर्षि देवेंद्रनाथ के पांचवें पुत्र थे और गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर से 12 साल बड़े थे। संगीतज्ञ, गायक, पेंटर, अनुवादक, नाटककार, कवि...कला के जितने रूप हो सकते हैं, उनमें वे सिद्धहस्त थे। रवींद्रनाथ पर इनका गजब का प्रभाव था। 1868 में कादंबरी देवी से इनका विवाह हुआ। पर, कादंबरी देवी ने 19 अप्रैल, 1884 को आत्महत्या कर ली। इससे ये बड़े दुखी हुए। इसके बाद इनका मन उचटने लगा। वे ठाकुरबाड़ी छोड़कर कुछ दिनों तक अपने अग्रज भारत के पहले आईएएस सत्येंद्रनाथ टैगोर के साथ रहने लगे।
 1905 में अपने पिता महर्षि देवेंद्र नाथ के निधन के बाद उन्होंने कुछ दिनों तक विरागी होकर विभिन्न स्थानों का भ्रमण किया। बड़े भाई सत्येंद्रनाथ टैगोर के साथ पहली बार वे 1905 में रांची आए। यहां की आबोहवा उनके मन के अनुकूल लगी। कुछ दिन रहने के बाद वे चले गए। फिर तीन साल बाद एक अक्टूबर, 1908 को रांची रहने के लिए ही आ गए। यहां पर मोरहाबादी स्थित पहाड़ी इन्हें पसंद आ गई। तब तक यह वीरान था। यहां पर 1842 से 48 तक कैप्टन एआर ओस्ली रहे। उन्होंने ही यहां पर एक रेस्ट हाउस बनवाया था। ओस्ली यहां 1839 में रांची आए। वे प्रतिदिन प्रात:काल काले घोड़े पर सवार होकर मोरहाबादी मैदान टहलने जाते थे। फिर रेस्ट हाउस में आकर विश्राम करते थे। उनके भाई ने किसी अज्ञात कारण से इस रेस्ट हाउस में आत्महत्या कर ली। इसके बाद ओस्ली का मन यहां से उचट गया और इसके बाद फिर वे कभी नहीं आए। इसके बाद यह वीरान हो गया।
प्रवेश द्वार
ज्योतिंद्रनाथ आए तो उन्होंने यहां के जमींदार हरिहरनाथ सिंह से मुलाकात की और 23 अक्टूबर 1908 को पंद्रह एकड़ अस्सी डिसमिल जमीन पहाड़ी के साथ बंदोबस्त कराई। यह जमीन उन्होंने अपने भाई सत्येंद्रनाथ ठाकुर के पुत्र सुरेंद्रनाथ ठाकुर यानी भतीजे के नाम से लिखा-पढ़ी कराई। इसका सालाना लगान 295 रुपये वार्षिक था। लेने के बाद टूटे-फूटे रेस्ट हाउस को दुरुस्त करवाया। पहाड़ पर चढऩे के लिए काफी धन खर्च कर सीढिय़ां बनवाई। मकान के प्रवेश द्वार पर एक तोरण द्वार बनवाया। द्वार के निकट विभिन्न प्रजातियों की चिडिय़ां, कुछ हिरण, कुछ मोर रखकर एक आश्रम का रूप दिया गया। वे ब्रह्म समाजी थे। इसलिए बुर्ज पर एक खुला मंडप बनवाया ध्यान-साधना के लिए। नाम रखा शांतालय। पहाड़ के नीचे सत्येंद्रनाथ एक मकान बनवाए थे, जिसका नाम रखा था 'सत्यधामÓ। कहा जाता है कि रांची में हाथ रिक्शा का प्रचलन इन्हीं के कारण हुआ। हाथ रिक्शे से ही वे रांची घूमते थे। कभी-कभी वे अपनी पॉकिट घड़ी का समय मिलाने के लिए रांची डाकघर तक आते थे, जो उन दिनों सदर अस्पताल के पास था। आर. अली साहब की दुकान से केक, बिस्कुट आदि खरीदते थे। हजारीबाग रोड के किनारे कुमुद बंधु चक्रवर्ती के अन्नपूर्णा भंडार से अपनी जरूरत की चीजें लेते थे। कुमुद बाबू उनके बायोकेमिक चिकित्सक थे। और, विष्णुपुर घराने के सुविख्यात सितार वादक नगेंद्रनाथ बोस से वे सितारवादन सीखते थे। जब अवनींद्रनाथ ठाकुर सपरिवार रांची आते थे तब उनकेच्बच्चों के लिए ढेर सारी चीजें खरीदकर खिलाया करते थे। ऐसे अवसरों पर उनके आवास में हंसी-खुशी का माहौल छा जाता।
कुसुम ताल
ज्योतिरींद्र नाथ की डायरी से पता चलता है कि उन दिनों रांची के गणमान्य लोग उनके भवन में प्राय: आते थे तथा साहित्य, संगीत, उपासना आदि कार्यक्रमों में शामिल होते थे। और, वे खुद भी दूसरों के यहां जाया करते थे। थड़पकना हाउस के उद्धव रॉय, नवकृष्ण राय, भूपालचंद्र बसु, त्रिपुराचरण राय उनमें प्रमुख हैं।
मंजरी चक्रवर्ती ने लिखा है कि 'स्वतंत्रता संग्राम के अन्यतम योग्य नेता विपिनचंद्र पाल के मध्यम पुत्र मेरे पिता ज्ञानांजन पाल, मेरी छोटी फूफी वीणा चौधुरी, जब पुरुलिया के देशबंधु सी आर दास के घर आए थे, तब वे ज्योतिरींद्रनाथ से मिलने रांची भी आए। तब पहाड़ों पर घूमते समय ज्योति दा ने मेरी फूफी और सास के चित्र भी बनाए थे।Ó
एक बात यहां उल्लेखनीय है कि रवींद्रनाथ टैगोर यहां भले न आए लेकिन उनके परिवार का नाता इस धरती से बहुत पुराना है। रवींद्रनाथ टैगोर के दादा द्वारिका नाथ टैगोर ने पलामू के राजहरा में एक अंग्रेज व्यापारी से मिलकर कोलियरी चलाई थी। फर्म का नाम था मेसर्स कार्र-टैगोर एंड कंपनी। 1834 में इस फर्म के जरिए कोयले का व्यापार शुरू किया गया। विलियम कार्र एवं विलियम प्रिंसेप का इंग्लैंड के साथ सिल्क व नील का व्यापार था। इन्होंने ही कोयले का व्यापार भी शुरू किया। 1936 में रानीगंज कोलियरी खरीदा गया। इसे मूलत: विलियम जान्स ने खोला था। इस कोलियरी को खरीदने के बाद कार्र-टैगोर फर्म ने अपनी कंपनी का विस्तार किया। इसके साथ डीन कैंपवेल एवं डा. मैकफर्सन इसके अतिरिक्त पार्टनर बन गए। कलकत्ता (अब कोलकाता) कार्यालय का काम डोनाल्ड मैकलियोड गार्डन देखते थे और कोलियरी का काम सीबी टेलर। खैर, आगे चलकर द्वारिका नाथ इस व्यवसाय से अलग हो गए। धु्रब मित्र बताते हैं कि 1920 के आस-पास गुरुदेव के भाई अवनींद्रनाथ ठाकुर कोकर में दो बेहद खूबसूरत मकान बनवाए थे, जिसका नाम रखा था सन्नी नूक। भवन विभिन्न प्रकार के फूलों, वृक्षों, पौधों से पटा था। इसी भवन पर बाद में रामलखन सिंह कालेज बना। दूसरा भवन भी सड़क के ठीक विपरीत में था, जिसे कुछ लोगों ने प्लाटिंग करके बेच दिया। इनके साथ ही सत्येंद्रनाथ की सुपुत्री इंदिरा देवी एवं उनके पति प्रख्यात साहित्यकार प्रमथ चौधुरी ने भी एक मकान रांची में खरीदा था और वे लोग अक्सर यहां रहा करते थे। आज जहां रामकृष्ण मिशन का पुस्तकालय है, वहीं पर उनका मकान हुआ करता था। यही नहीं, गुरुदेव की एक भतीजी सुप्रभा एवं उनके पति सुकुमार हालदार सामलौंग, रांची में ही रहते थे। ये सभी गुरुदेव को रांची आने को कहते। ज्योति दा की डायरी से पता चलता है कि उनका कार्यक्रम भी बना, लेकिन वे यहां नहीं आ सके। हालांकि गुरुदेव ने एक पारिवारिक तनाव से दूर रहने को लेकर पत्र में लिखा था कि कलकत्ता की अपेक्षा रांची में रहना बेहतर होगा। खैर, गुरुदेव नहीं आ सके। ज्योति दा ने यहीं पर अपनी अंतिम सांसें ली। चार मार्च 1925 को सदा-सदा के लिए चले गए। उनकी यादों को सहेजने का प्रयास किया जा रहा है।

साठ साल की सक्रियता ने रचा शोध का नया आयाम


संजय कृष्ण, रांची
डॉ.बीपी केशरी। बहुमुखी प्रतिभा का स्थापित मानदंड। बिरल व्यक्तित्व। उम्र के पड़ाव का आठवां दशक। चिंतन और विचार से तेजस्क्रिय। यह जमाना उन्हें किस रूप में याद करना चाहेगा- एक संस्कृतिकर्मी के रूप में, झारखंड आंदोलन के बौद्धिक अगुवा के रूप में या एक गहन साहित्य के शोधार्थी के रूप में। इन तीनों रूपों में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण है। किसी में कमतर नहीं। इतिहास में एक मुकम्मल जगह उन्होंने बना ली है। लेकिन, एक काम ऐसा है, जिसे करने के बाद उन्हें असीम संतुष्टि मिली। वह है- नागपुरी कवियों पर काम। यह काम पिछले पचास वर्षों से चल रहा था।  हौले-हौले। कई तरह की बाधाएं भी आईं। झारखंड आंदोलन में व्यस्तता रही। फिर भी पूरा हुआ। निस्संदेह यह एक शलाका पुरुष की सारस्वत साधना का सद्परिणाम है। रांची विवि में जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग की स्थापना...बीच-बीच में ऐसे काम आए, जो वह भी कम महत्वपूर्ण नहीं थे। फिर यह काम बंद नहीं हुआ। एक हसरत जरूर थी कि यह ऐतिहासिक काम उनके जीते जी हो जाए और हो भी गया। पांच मार्च को जब वे अशोक पागल के यहां बैठे थे और बार-बार उनका फोन आ रहा था कि मैं इंतजार कर रहा हूं तो भागा-भागा बीमारी में भी उनसे मिलने गया। उनके चेहरे पर एक असीम खुशी तैर रही है। काम की पूर्णता का एहसास उनकी बातों से लग रहा था। उन्होंने एक प्रति दी। छाप-छपाई और कवर देखकर बहुत आनंद हुआ।

इस महती योजना का प्रारंभ कैसे किया। यह काम कितने दिनों में हुआ और कैसे मन में विचार आया?
केशरी : 1951 का साल। आइए की परीक्षा देकर घर आया था। एक चचेरी बहन की शादी थी। गर्मी का मौसम था। चांदनी रात में घर और पास-पड़ोस की मां-बहनें शादी पर झूमर खेल रही थीं। आंगन नागपुरी गीतों से नहा रहा था। अचानक कुछ पंक्तियों पर मेरा कान लग गया-
अम्बा मंजरे मधु मातलयं रे,
तइसने पिया मातल जाय।
नाग-नागिन कांचुर छोड़लयं रे,
तइसने पिया छोड़ल जाय।

इस झुमटा गीत की लय, शब्द रचना और अर्थ-व्यंजना ने मुग्ध कर दिया। दिल-दिमाग एकमेक हो गए और सोचने लगा, इतनी सुंदर पंक्तियों का रचयिता कौन है? छिटक रही चांदनी की उस रात ने ऐसा बेचैन किया कि फिर इस तरह के गीतों की तलाश में जुट गया। आस-पास के गांव, घर, खेत-खलिहान और संगी-साथियों से अनायास ही कुछ गीत मिल गए। इस काम में आदिवासी पत्रिका से भी सहायता मिली। काम आगे बढ़ा। फिर जीएल कालेज डालटनगंज में नियुक्ति हो गई। इसके बाद छुट्टियों में ही कुछ काम कर पाता।
कवियों की खोज कैसे की और कहां-कहां गए?
डॉ.केशरी बताते हैं कि 1957 में आकाशवाणी की स्थापना हुई। इसके तीन साल बाद 1960 में रांची विवि की। इससे नागपुरी जगत में हलचल हुई। 1960 में ही नागपुरी भाषा परिषद का गठन भी हुआ। नागपुरी पत्रिका का प्रकाशन शुरू हुआ। इससे काम आसान हुआ। कई लेख इसमें छपे। गीतों के संग्रह में भी आसानी हुई। 1964-65 में नागपुरी क्षेत्र का व्यापक दौरा किया। नागपुरी जानने वालों से संपर्क किया, साक्षात्कार लिया। पांच सौ नए-पुराने कवियों के लगभग 15000 गीत मिले। काम को आगे बढ़ाने के लिए 1967 में एक पुस्तिका छपाई-नगपुरिया कविमनक सूची। धीरे-धीरे काम बढ़ रहा था।

नागपुरी गीतों में ही पीएचडी करने का विचार कैसे आया?
नागपुरी में काम कर रहा था। इसलिए इसी में पीएच डी करने का मन बनाया। 1971 में रांची विवि से नागपुरी गीतों में शृंगार रस पर पीएच डी की डिग्री मिली। इसके पहले जर्मनी के बौन विवि से मोनिका जॉर्डन और रांची विवि से डॉ.श्रवणकुमार गोस्वामी को नागपुरी में यह डिग्री मिली थी। इस बीच झारखंड आंदोलन भी तेज हो रहा था। शोषण का क्रम जारी था। एक तरह से यह आंतरिक उपनिवेश बन गया था। इस बीच झारखंड का इतिहास लेखन, झारखंड पार्टी की सदस्यता लेना, पार्टी का मैनिफेस्टो लिखना, नागपुरी में जय झारखंड पत्रिका निकालना, यहां की भाषाओं की समस्याओं एवं संभावनाओं पर आलेख तैयार करना आदि काम करने पड़े।
आंदोलन के साथ रचनात्मक काम कैसे करते रहे?
 1972 में झारखंड मुक्ति मोर्चा के गठन से लेकर छोटानागपुर सांस्कृतिक संघ, नागपुरिया संघ, शालपत्र के प्रकाशन की कहानी बताई। रांची विवि के जनजातीय भाषा विभाग में आने और स्नातकोत्तर विभाग की स्थापना भी रोचक कहानी है। विभाग की स्थापना में कुमार सुरेश सिंह का विशेष योगदान रहा। फिर डॉ. रामदयाल मुंडा ने इस बिरवे को वृक्ष बनाया। विभाग ने सांस्कृतिक नवजागरण की भूमिका निभाई।
फिर नागपुरी संस्थान की स्थापना की बात दिमाग में कैसे आई?
1993 में अवकाश प्राप्ति के बाद भी शोध का काम आगे चलता रहा। उम्र बढ़ रही थी और शैक्षिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक व्यस्तताएं पीछा नहीं छोड़ रही थीं। काम आगे बढ़ाने के लिए किसी तरह अपने गांव में ही नागपुरी संस्थान की स्थापना की। इसके बाद लोगों के सहयोग से काम को तेज किया। अथक परिश्रम के बाद 650 कवियों की सूची बनी। लेकिन पुस्तक में 248 कवियों एवं उनकी रचनाओं को ही शामिल कर सका।
इस उपलब्धि पर क्या कहना चाहेंगे?
केशरी जी कहते हैं कि शोधयात्रा के दौरान लगभग 35 हजार नागपुरी गीत-कविता, 61 कवियों-संपादकों की 119 पुस्तक-पुस्तिकाएं मिलीं, जो नागपुरी संस्थान में उपलब्ध हैं। संग्रह में 1600 ईस्वी से लेकर 2000 ईस्वी के रचनाकारों को शामिल किया गया है। अभी मुझे बस फ्रैंकलिन डी रूजवेल्ट की पंक्तियां याद आ रही हैं। इसे मेरा भावोच्छवास भी कह सकते हैं। कविता की पंक्तियों का आशय है-'आनंद मात्र धन संग्रह में नहीं। यह रचनात्मक प्रयासों के रोमांच में, उपलब्धियों के उल्लास में है।Ó यह उपलब्धि मेरे लिए कुछ ऐसा ही अर्थ रखती है।   

आजादी से ही लड रहे हैं अपनी जमीन वापसी के लिए टाना भगत

टाना भगतों का योगदान देश की आजादी में भी तो अभूतपूर्व रहा, लेकिन इन्हें वह सम्मान आज तक नहीं मिला। कुछ ताम्रपत्र जरूर मिले, लेकिन उनकी जमीन नहीं मिली। इसके लिए ये आज भी अपनी लड़ाई अहिंसात्मक ढंग से जारी रखे हुए हैं। नेहरू से लेकर राहुल गांधी तक ने इसकी कहानी सुनी, वादा किया, लेकिन वादे आज तक पूरे नहीं हो सके। अपने अधिकार और हक की लड़ाई ये आज भी लड़ रहे हैं। शांतिपूर्ण धरना-प्रदर्शन के जरिए सरकार को अपनी बात भी सुनाते हैं, लेकिन सरकार इतनी संवेदनशील होती तो ये 66 सालों से लड़ते ही क्यों?
यह लड़ाई वैसे तो आजादी के तुरंत बाद ही शुरू हो गई थी। सरकार ने इनकी जमीन वापसी की प्रक्रिया भी शुरू कर दी थी, लेकिन बहुतों को जमीन का आज भी इंतजार है। आजादी के तत्काल बाद, 1947 में ही इनकी जमीन वापसी का कानून बना। बिहार राज्य सरकार ने रांची जिला टाना भगत रैयत कृषि प्रत्यावर्तन अधिनियम पारित किया, जिसके अनुसार सन् 1913 से 1942 तक स्वतंत्रता संग्राम के दौरान लगान नहीं देने पर नीलाम कर दी गई उनकी जमीन वापसी का प्रावधान है। इस अधिनियम के तहत उस समय कुल 358 टाना भगतों को कुल 3722.26 एकड़ जमीन वापस की गई एवं जमीन पर दखलकार विपक्षियों को कुल 13,05,669 रुपये क्षतिपूर्ति के रूप में भुगतान किया गया है।
हालांकि इस कानून में कुछ कमियां थीं। यह रांची तक ही सीमित था, जबकि कई अन्य जिलों के टाना भगतों को इससे लाभ नहीं मिलता था। फिर इस कानून को 1961-62 में संशोधित किया गया। 1968-69 में जो जमीन वापसी की गई थी, उस बारे में पता चलता है कि उस समय कुल 1,200 मुकदमे दायर हुए। 232 परिवारों को लाभ मिला। 7,38,98 रुपये खर्च हुआ। 88 मामले लंबित दिखाया गया और 2,808 एकड़ 80 डिसमिल जमीन वापस की गई।
तत्कालीन बिहार सरकार ने इनकी समस्याओं को निपटारे के लिए 1966 में टाना भगत बोर्ड का गठन किया, जिसमें 14 टाना भगत इसके सदस्य थे। यह बोर्ड कल्याण विभाग के अधीन था। प्रत्येक महीने इसकी बैठक होने की बात कही गई थी, लेकिन चार-पांच महीने बाद ही बंद कर दी गई।
हालांकि बोर्ड के बंद हो जाने के बाद भी जमीन वापसी का सिलसिला जारी रहा। 1972 में भी इन्हें सरकारी जमीन दी गई। उस समय कुल 389 टाना भगतों को कुल 827.06 एकड़ जमीन सरकार से बंदोबस्त की गई। बंदोबस्त की गई जमीन ऐसी थी कि उसमें फसल भी नहीं होती। इसके लिए भूमि कर्षण विभाग से कृषि योग्य बनाने के लिए संपर्क किया गया था।
जमीन वापसी के संघर्ष का उनका लंबा इतिहास है। इंदिरा गांधी से लेकर राजीव गांधी और राहुल गांधी तक अपनी बात रख चुके हैं। फिर भी इनकी मांग पूरी नहीं हो पा रही है। एक समय टाना भगतों को न्याय दिलाने के लिए परमेशचंद्र सिंह ने अखिल भारतीय टाना विकास परिषद् नामक संस्था का गठन किया था। उन्होंने टाना भगतों को इंदिरा गांधी व राजीव गांधी से मिलवाया। परमेशचंद्र सिंह अपने नेतृत्व में 28 दिसंबर, 1983 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से कलकत्ता में हो रहे अखिल भारतीय कांग्रेस अधिवेशन में मिलवाया और अपनी बात सुनाई। प्रधानमंत्री ने इन्हें पूर्ण आश्वासन दिया। यही नहीं, उन्होंने इनके एक प्रतिनिधि को राज्यसभा में तथा प्रांतीय स्तर पर एक प्रतिनिधि को कौंसिल में भी मनोनीत करने का आश्वासन दिया। इसके बाद 3 जनवरी, 1984 को रांची के मेसरा में अखिल भारतीय विज्ञान कांग्रेस के अधिवेशन के मौके पर भी परमेशचंद्र सिंह ने टाना भगतों को फिर प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से मिलवाया। पर, इसी साल अक्टूबर में उनकी हत्या कर दी गई और आश्वासन भी उन्हीें के साथ दफन हो गया। पर, टाना भगतों ने हिम्मत नहीं हारी। परमेशचंद्र सिंह ने फिर इन्हें प्रधानमंत्री राजीव गांधी से मिलवाया। यह दिसंबर 1985 की बात है। टाना भगतों ने राजीव गांधी को सम्मानित कर रस्म पगड़ी और मान पत्र भेंट किया। प्रधानमंत्री ने मार्च 1986 में इनकी नीलाम जमीन की वापसी के लिए बिहार के मुख्यमंत्री बिंदेश्वरी दुबे को आदेश दिया। आदेश के बाद काफी लोगों को जमीनें मिलीं। पर सभी को नहीं। लंबे समय बाद आज फिर 48 टाना भगतों को हेमंत सोरेन ने जमीन का पट्टा दिया। हेमंत को पहल कर सभी टाना भगतों को उनकी जमीन दे देनी चाहिए। ये गांधी के सच्चे अनुयायी हैं और अहिंसक तरीके से आज भी ये लड़ रहे हैं।

                                                                     संजय कृष्ण

बांग्लादेश की आजादी में रांची के 26 सपूतों ने गंवाई थी अपनी जान


संजय कृष्ण, रांची
रांची का फिरायालाल चौक अब अल्बर्ट एक्का चौक कहा जाता है। अल्बर्ट उन शहीदों में शुमार हैं, जिन्होंने अपना बलिदान देकर बांग्लादेश को पूर्वी पाकिस्तान से आजाद कराया। अल्बर्ट को मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। बांग्लादेश की आजादी में अल्बर्ट अकेले नहीं थे, रांची और आस-पास के करीब 26 जवानों ने अपनी जान की आहुति दी थी।
बंगलादेश की आजादी में भारत की बड़ी भूमिका रही। भारतीय सैनिकों की जांबाजी का ही यह नतीजा था कि पाकिस्तान की तानाशाह सैनिकों को समर्पण करना पड़ा। 14 दिन के घमासान युद्ध के बाद 1971 में 16 दिसंबर की कड़कड़ाती ठंड में पाकिस्तान के सपने जमींदोज हो गए। 7 जनवरी, 1972 को रांची के रोटरी हॉल में ले. जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा ने पूरी कहानी बयां की। उनकी गाथा को तब 'आदिवासीÓ पत्रिका ने संपादित कर छापा था। एक अंश देखिए, 'भारतीय सेना का लौह शिकंजा कसने के साथ हमारे दिलेर एवं दक्ष हवाबाजों ने ढाका में ठीक निशाने पर पाकिस्तान गवर्नर डॉ. मल्लिक के सरकारी निवास-स्थान पर बम बरसाए। हमने ढाका एवं इस्लामाबाद में हुई बातचीत भी सुन लिया। जब तीसरी बार हमारे चतुर हवाबाजों ने बम की वर्षा की तो गवर्नर के होश फाख्ता हो गए तो उसकी सरकार ने इस्तीफा दे दिया और होटल इंटर कांटिनेेंटल में उसने शरण मांगी।Ó आगे बताया, 'हमारी पहली टुकड़ी ने ढाका छावनी के करीब पहुंचकर गोलाबारी शुरू की। उस समय उनके पास चार तोपें थीं, लेकिन पाकिस्तानियों का हौसला पस्त हो चुका था।Ó...  '15 दिसंबर को प्रात:काल पाकिस्तानी जनरल नियाजी ने संदेश भेजा कि वह युद्ध विराम चाहते हैं, हमने जवाब दिया कि युद्ध विराम नहीं। कल सवेरे 9 बजे तक आत्मसमर्पण करें।Ó हुआ भी यही। पाकिस्तान के पास अब कोई विकल्प नहीं था। रांची के जवानों की कहानियां यहीं तक नहीं है। पाकिस्तान फौज के दुर्जेय समझे जाने वाले गढ़ जैसोर को रांची स्थित 9 वीं पैदल डिवीजन ने मुक्त कराया था। बांग्लादेश आजाद हो गया तो अपने देश में भी जश्न का माहौल था। यह जश्न पत्र-पत्रिकाओं में झलका। नए साल का स्वागत आजादी के तराने के साथ शुरू हुआ। आदिवासी के उसी अंक में रोज टेटे ने खडिय़ा में अपनी भावनाएं व्यक्त कीं, जिसे हिंदी अनुवाद के साथ प्रकाशित किया गया। रोज ने लिखा, जय मिली देश को, हार गया दुश्मन। जन्मा नया देश, नया सूर्य उदित हुआ, नए वर्ष में। रामकृष्ण प्रसाद 'उन्मनÓ ने उत्साहित होकर विजय गीत लिखा, 'लोकतंत्र की विजय हो गई, हार गई है तानाशाही, हम आगे बढ़ते जाते हैं, हर पग पर है विजय हमारी।Ó आचार्य शशिकर ने च्मुक्त कंठÓ से गाया, मुक्त कंठ, गाओ यह गान, धरा मुक्त है, मुक्त है आसमान। प्रो. रामचंद्र वर्मा 'विजय पर्वÓ का संदेश लेकर आए, 'वतन के सपूतों, खुशी अब मनाओ, विजय पर्व आया, विजय गीत गाओ। पराजित हुई शत्राु सेना समर में, फहरती हमारी ध्वजा अब गगन में। जहां में हमारा सुयश छा गया है, धवल कीर्ति को तुम अमर अब बनाओ।Ó
 देश में भी एक उत्साह था। सैनिकों ने देश का मस्तक ऊंंचा किया था। सैनिकों के प्रति देश नतमस्तक था। रांची में शहीद परिवारों को सहयोग देने के लिए होड़ लग गई थी। 26 शहीद परिवारों को पांच-पांच हजार की मुआवजा राशि तो दी ही गई। जमीन, नौकरी आदि का आश्वासन भी सरकार की ओर से दिया गया। 21 जनवरी को रांची के बारी पार्क में एक समारोह का आयोजन किया गया। इसमें 7 लाख, पांच हजार रुपयों का वितरण किया गया। बिहार के राज्यपाल देवकांत बरुआ ने शहीद परिवार वालों को ये रुपये दिए। परमवीर चक्र विजेता अल्बर्ट एक्का के परिवार को राच्यपाल ने अपनी ओर से 25 हजार रुपये देने की घोषणा की। उनके गांव में पांच एकड़ भूमि भी दी गई, जिसका पर्चा 21 जनवरी को ही राच्यपाल ने अल्बर्ट एक्का के पिता को दिया। उस समय श्रीमति डेविस ने श्रीमति एक्का के लिए डेड़ सौ रुपये मासिक की नौकरी की व्यवस्था की। कहा कि जब वे चाहेंगी, उन्हें यह सुविधा मुहैय्या करा दी जाएगी। यही नहीं, अल्बर्ट एक्का की स्मृति में वेलफेयर सिनेमा के पास स्थित सरकारी भवन का नाम भी अल्बर्ट एक्का के नाम पर किए जाने की सहमति बनी।
 रांची के तत्कालीन डीसी ईश्वर चंद्र कुमार ने भी शहीद परिवार वालों के लिए कई योजनाओं की घोषणा की। कुमार ने बताया कि  '12 शहीदों के परिवार वालों को नौकरी देने की बात तय हो गई है। तीन लोगों ने शिक्षक बनने की चाहना की है। जिला परिषद की ओर से उन्हें शिक्षक का पद दिया जाएगा। 4 व्यक्तियों ने एचइसी में नौकरी करने की इच्छा व्यक्त की है। उन्हें टाउन प्रशासकीय विभाग में नौकरी दिलाने के लिए एचइसी के अधिकारियों से मैंने बात कर ली है। 3 व्यक्तियों को पुलिस की नौकरी में बहाल कर दिया जाएगा। घर बनाने के लिए जो खर्च पड़ेगा उसके लिए मैंने रांची नगर पालिका के अध्यक्ष शिव नारायण जायसवाल से बातें कर ली है। वे खर्च अपने पास से देने को प्रस्तुत हैं।Ó
शहीद परिवारों की सहायता के लिए कई संगठन भी आए और आर्थिक सहायता दी। कुमार ने इसकी भी जानकारी दी, '5.51 लाख रुपये नागरिकों एवं ग्रामीणों द्वारा, 51हजार विजय मेले से आई राशि, 11 हजार विधवा कल्याण हेतु श्रीमती अरोड़ा को प्रेषित, 11 हजार श्री बागची द्वारा, 27,800 रोमन कैथोलिक द्वारा, 3,500 एक अन्य चर्च द्वारा, 2,500 छात्राओं द्वारा एकत्र श्रीमती मेरी लकड़ा के मार्फत से प्राप्त, 12,200 बीआइटी मेसरा, पांच हजार विकास विद्यालय, 7,500 एसपी रांची द्वारा आइजी को प्रेषित, 20,000 एजी द्वारा सेंट्रल आफिस को प्रेषित।Ó इस सभा में यह भी जानकारी दी गई कि श्रीमती डेविस के अमेरीकी परिचित व्यक्ति को जब ज्ञात हुआ कि वे राष्टीय सुरक्षा कोष के लिए धन एकत्रित कर रही है तो भूतपूर्व अमेरिकी सिनेटर श्री डॉन हेवार्ड ने 40 डॉलर की सहायता श्रीमती डेविस के पास भेजी। इसके अतिरिक्त श्रीराम ग्रुप द्वारा 20 लाख रुपये तथा एसीसी ग्रुप द्वारा सात लाख रुपये का दान दिया गया।Ó डा. डेविस कांके मन:चिकित्सा केंद्र के निदेशक थे। बाद में वहीं पर उन्होंने अपना अलग अस्पताल खोल लिया था।

पंद्रह पंक्तियों की कथा पर लिख डाला उपन्यास

 
संजय कृष्ण, रांची
दशमफॉल और उसके आस-पास के जंगलों में छैला संदु की कहानी आज भी विचरती है। छैला संदु नाम का कोई प्रेमी था या नहीं। या फिर यह मिथक है? यह सब किसी को पता नहीं। पर, सैकड़ों सालों से लोग इस कथा को सुनते आ रहे हैं। कहानी भी बहुत लंबी नहीं।
खंूटी के कथाकार मंगल सिंह मुंडा जब इस मिथक को पकड़ सच की तलाश में निकले तो बूढ़े-बजुर्गों ने महज 15 पंक्तियों की कथा सुनाई। पहले तो अचरज से पूछा, कहां से आए हो, क्या काम है, क्यों सुनना चाहते हो? जब मुंडा ने बात बताई और कहा कि हम आपके ही बच्चे हैं। मुंडा हैं, तब लोगों ने विश्वास किया। एक सप्ताह तक जंगलों की खाक छानने के बाद मंगल सिंह ने इस कथा को आगे बढ़ाने की सोची। इसके बाद इस उपन्यास को पूरा किया। छैला संदु के बहाने आदिवासी जीवन के संघर्ष, उनके शोषण और संस्कृति को भी पिरोने का काम किया। पूरा हो गया तो छपाई की समस्या। मंगल कहते हैं, उस समय (1996) कोलकाता में नौकरी करता था। वहां पुस्तक मेला लगा था। मेले में राजकमल प्रकाशन का स्टाल था और उसके मालिक अशोक माहेश्वरी आए थे। उनसे किसी तरह बात हुई। पांडुलिपि को भेजने के लिए कहा। दिल्ली भेज दिया। उन्होंने तो विश्वास ही नहीं हुआ कि कोई आदिवासी लिख भी सकता है। उन्होंने रांची के एक पत्रकार को पांडुलिपि पढऩे के लिए भेजी। यहां से ओके होने के बाद फिर छपने की प्रक्रिया शुरू हुई। 2004 में पुस्तक छपकर आ गई और लोगों ने इसका खूब स्वागत किया। हर साल पुस्तक की रायल्टी मिलती है।
1945 में खूंटी के रंगरोंग गांव में जन्मे मंगल सिंह मुंडा ने काफी संघर्ष किया है। पिता राम मुंडा कवि और शिक्षक थे। समाज सुधारक भी थे। पर मां-बाप का प्यार नसीब नहीं हो सका। बचपन में ही मां-बाप चल बसे। चाचा ने पढ़ाया। एसएस हाई स्कूल खंूटी से पढ़ाई की। इसके बाद नदिया हायर सेकेंडरी स्कूल, लोहरदगा से मैट्रिक किया। चाइबासा के टाटा कालेज में प्रवेश लिया और पढ़ाई शुरू की। तभी रेलवे में नौकरी लग गई। पढ़ाई छोड़कर नौकरी करने लगा। पढऩे की फिर ललक उठी। इसके बाद पत्राचार से बीए किया। छात्र जीवन से ही लिखना शुरू कर दिया था। नौकरी के समय भी लिखता। कलकत्ते में डा. श्रीनिवास शर्मा थे। वे पत्रिका निकालते थे। उन्होंने लिखने की प्रेरणा दी। खूब प्रोत्साहित किया। इसके बाद तो लिखने लगा। पहली रचना वैसे रांची से निकलने वाली पत्रिका आदिवासी में 1982 में छपी। इसके बाद शुभ तारिका अंबाला में भी रचना छपी। पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं छपने लगीं।
महुआ का फूल कहानी संग्रह दिल्ली से छपकर 1998 में आया। इसके बाद रांची झरोखा से 'कामिनालाÓ  मुंडारी-हिंदी में आया। कामिनाला का मतलब होता है काम की खोज। झरोखा से ही दुरंग को कोरे आद जाना? आया। अर्थ है गीत कहां खो गए। यह भी दोनों भाषाओं में हे। दो रचनाएं डायन और कॉलेज गेट प्रकाशित होने वाले हैं। डायन हिंदी में उपन्यास है और दूसरा नाटक।
2005 में रेलवे से अवकाश लेने वाले मंगल सिंह आज भी लिख रहे हैं। पर, हिंदी के कथित मुख्यधारा के रचनाकारों ने नोटिस नहीं लिया। उन लोगों ने भी नहीं, जो खुद को आदिवासियों का प्रवक्ता के तौर पर पेश करते हैं। रांची में ही गैरआदिवासी और हिंदी में प्रतिष्ठित लेखक और आलोचक हैं। लेकिन ये लोग खुद को स्थापित और दूसरे को विस्थापित करने में लगे हैं। पर आदिवासी साहित्य और आदिवासी लेखकों की ओर भूल से भी नजर नहीं डालते। जबकि आदिवासी पत्रिका के पुराने अंकों को पलटिए तो सैकड़ों आदिवासी रचनाकारों की सूची मिल जाएगी। लेकिन आज हम उन रचनाकारों को नहीं जानते। साहित्य में तो दलित विमर्श ने अपना एक मुकाम पा लिया। आदिवासी साहित्य को उसका प्राप्य कब मिलेगा? जबकि आदिवासी साहित्य का इतिहास भी सौ साल से कम नहीं। इस बात का कोफ्त मंगल सिंह मुंडा को भी है।    

बड़े उर्दू अदब नवाज थे समीउल्लाह शफक

हुसैन कच्‍छी

हुसैन कच्छी :  शहर के अतीत इसकी तहजीब की बात हो रही है तो इस वक्त मुझे एक बेहद दिलचस्प शख्सियत समीउल्लाह शफक की याद आ रही है। कुछ साल पहले तक वो हमारे दरम्यान थे। उनको जानने वाले मानेंगे कि उनके चले जाने से एक तहजीब रुखसत हो गई। रांची के मेन रोड पर अंजुमन प्लाजा के बाहरी हिस्से में 'सबरंग बुक्सÓ नाम की एक गुमटी होती थी। अभी भी है, लेकिन अब वहां अला-बला चीजें मिलती हैं। समी साहब के जमाने में यह गुमटी उर्दू नवाजों में ऐसी मशहूरो मकबूल थी जैसे बड़े-बड़े मॉल्स होते हैं। समी साहब इसके मालिक थे जिनकी जिंदगी उर्दू अदब की खिदमत के लिए वक्फ थी, वो किसी खजाने के मालिक नहीं थे, इसके बावजूद सबरंग में उर्दू के आशिकों के लिए बड़ा जखीरा रखते थे। उन दिनों मुल्क भर के जाने माने अखबार, पत्रिकाएं बच्चों के लिए कहानी की किताबें, औरतों के मैगजीन, शेरो-शायरी के संग्रह, नॉवेल, पॉकेट बुक्स के अलावा पढऩे के शौकीनों की फरमाइश पर कोई उम्दा किताब वगैरह वो मंगवाते रहते। उनके दम से सबरंग बुक्स शहर के उर्दू वालों के मिलने-मिलाने की जगह थी। अदीब, शायर, प्रोफेसर, सहाफी और उर्दू के स्टूडेंट्स इस गुमटी को एक दूसरे तक पैगाम रसानी के लिए इस्तेमाल करते और समी साहब उनके पैगाम रसां बनते। ये खिदमत उन्होंने तीस-चालीस साल निभाई, निहायत मासूमियत से। वो जब तक जिंदा रहे न खुद बदले न उनकी गुमटी बदली न उनकी तर्जे जिंदगी में तब्दीली आई। बस इस चाहत के साथ जीते रहे कि उर्दू पढ़ी जाए, उर्दू लिखी जाए, उर्दू बोली जाए। उनके रोजाना के विजिटर्स में ऐसे लोग भी होते थे जो कुछ खरीदते नहीं थे, घंटों सबरंग पर खड़े-खड़े दो तीन अखबार चाट जाते, रिसालों को पढ़ डालते। इस दरम्यान समी साहब कुल्हड़ वाली चाय पिला देते, किसी-किसी को सिगरेट का कश लगवा देते। कुछ तो ऐसे भी होते जो उनसे किताब और रिसाले लेकर घर ले जाते और फिर मुफ्त में पढ़कर उन्हें वापस लौटा देते। ऐसे में समी साहब का न चेहरा बदलता न कोई उनसे यह जानने की जहमत उठाता के समी साहब ये सबआप कैसे कर लेते हैं। वो किसी से शिकायत भी तो नहीं करते थे ना। यह सब दिल की बात है। समी साहब शायर थे, हुलिया ऐसा था कि कोई भी उन्हें देखकर बता सकता था कि वो शायर हैं। उनकी शायराना अजमत पर बेहतर राय कोई बड़ा नक्काद दे सकता है। लेकिन मेरे नजदीक उर्दू के खिदमतगारों में वो एक बुलंद दर्जे के मालिक थे। सिर्फ मुशायरे की भनक मिलते ही उनकी बॉडी लैंग्वेज में जो तब्दीली आ जाती थी वो देखने और महसूस करने लायक होती। मुशायरे वाले दिन का तो खैर कहना ही क्या, शहर का कोई भी शायर इतने शानदार और रिवायती अंदाज से स्टेज पर जलवा अफरोज नहीं होता था। जितनी खुशी समी साहब के रुख पर होती थी साफ-सुथरा कुर्ता पाजामा ऊपर से शेरवानी, साथ में छोटी सी पान की डिबिया और उंगलियों के दरम्यान सिगरेट, गाव तकिए से लगे बैठे हैं और सामने एक चमड़े के थैले में अपनी शायरी का दीवान। इधर उनके नाम का एलान हुआ उधर, मुशायरा सुनने आए लोगों के चेहरे खिल उठे, एक हलचल सी मची और महफिल गुलजार हो गई। समी साहब इसके बाद माइक के सामने खड़े हो जाते, अपना कलाम सुनाने लगते। ज्यादातर मेहमान शायरों की तरफ मुखातिब होकर कलाम सुनाते, ऐसे में यूं महसूस होता कि वो एक दूसरी दुनिया में पहुंंच चुके हैं और समझ रहे हैं कि मजमा उनके कलाम में डूब चुका है। इतना लहक-लहक कर शेर पढ़ते कि उनपर प्यार आ जाता था। बाद में उनसे मुलाकात होती तो पूछिए मत, वो उसी कैफियत में शराबोर नजर आते। इतने सादा दिल अदब नवाज की याद में कोई शाम आयोजित की जानी चाहिए। अंजुमन इसलामिया के साये में इतने साल गुजारने के बाद उनका हक बनता है कि खुद अंजुमन इसका एहतेमाम करे।

हुसैन कच्‍छी हरफन मौला इंसान हैं।  कुछ दिनों तक राजनीति में भी सक्रिय रहे। चुनाव भी लड़े। अब संस्कृतिकर्मी। लिखना-पढऩा और अड्डेबाजी शगल।  रांची में निवास पर परिवार पाकिस्‍तान में।