सोमवार, 25 अक्तूबर 2010

जगजीत सिंह 70 वें जन्मदिन पर अपने चहेतों को देंगे तोहफा

संजय कृष्ण : खिलते हुए गेहुंआ रंग पर चटख लाल रंग की टी शर्ट। कंधे से झूलता लेदर बैग। चश्मे के भीतर से झांकती आंखें और उनसे बरसता नूर। आर्या होटल के रिसेप्शन कक्ष से सटे लॉन में मुखातिब गजल के शहंशाह जगजीत सिंह। राउंड टेबल द्वारा आयोजित 23 अक्टूबर की शाम-ए-गजल के सफल कार्यक्रम का चेहरे पर इत्मीनान झलक रहा था। मुख्तसर मुलाकात में बातों का सिलसिला शुरू हुआ। बात एक दो सवालों की थी, लेकिन कई सवालों का जवाब बेहद आत्मीयता से दिया।... तो रांची दूसरी बार आए थे। कहते हैं, बीस साल पहले आया था। तब काफी सिकुड़ी-सिकुड़ी थी। अब तो काफी फैल गई है। आपने ढेरों गजलें गाई हैं, कौन सी गजल आपके दिल को छूती है? वे प्रतिप्रश्न करते हैं, अब पिता से पूछ रहे हो कि आपको कौन बेटा प्रिय है? भई, पिता के लिए उसके हर बेटे प्रिय होते हैं। और शायर? शायरों के बारे में थोड़ी चूजी हूं। जो गजल पसंद होती है, उसे आवाज देता हूं। इसके लिए काफी मशक्कत करनी पड़ती है। गालिब से लेकर मीर , बशीर बद्र, निदा फाजली, जावेद अख्तर, खालिद कुवैती, जिगर मुरादाबादी, पयाम सइदी तक...और भी नाम हैं...।
शास्त्रीय संगीत की तालीम और साफ जुबान को गजल गायिकी का सबसे अहम पहलू बताते हुए जगजीत सिंह कहते हैं, पिछले चालीस साल से इस क्षेत्र में हूं और तीसरी पीढ़ी को गजल सुना रहा हूं। अजब यह कि तीनों पीढिय़ां साथ-साथ भी सुनती हैं। रांची में भी शनिवार को तीनों पीढिय़ां एक साथ शाम-ए-गजल का आनंद ले रही थीं। तो एक लंबा सफर तय किया है...। अगले साल आप अपना 70 वां जन्मदिन मनाएंगे। क्या तोहफा देना चाहेंगे अपने चाहने वालों को? इसके लिए कई योजनाएं हैं। देश-दुनिया में सत्तर बेहतरीन कार्यक्रम पेश करना हैं। यह कार्यक्रम अगले साल फरवरी से शुरू हो जाएगा। सत्तर गजलों का एक एलबम भी निकालना है। चाहूंगा की रांची में भी एक आयोजन हो।    
पॉप म्यूजिक की ओर बढ़ते युवाओं के रुझान के बारे में दो टूक राय रखते हुए गजल सम्राट कहते हैं, इन्हें जो तालीम मिलेगी, वही करेंगे न! हम जो परोसेंगे, वही वे खाएंगे। इसके लिए उनसे कहीं ज्यादा हम जिम्मेदार हैं। गजल गायिकी के अपने लंबे सफर के बारे में कहते हैं, मुझे लगता है कि मैं आज भी गजल गायिकी में टिका हुआ हूं। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि मैंने 15-20 वर्षों तक शास्त्रीय संगीत सीखा है।
गजल सम्राट जल्द ही एक फिल्म में संगीत निर्देशन करेंगे। यह फिल्म मशहूर अफसानानिगार सआदत हसन मंटो की कहानी पर फिल्म बन रही है। कहानी के नाम का उल्लेख उन्होंने नहीं किया। इधर के फिल्मी गीतों के बारे में भी वे टूक जवाब देते हैं। इस जवाब से आज के फिल्मी गीतकार कुछ सबक ले सकते हैं। सिंह कहते हैं, आज ऐसे गीत लिखे-गाए जा रहे हैं कि हॉल से बाहर आते ही दिमाग से निकल जाते हैं। ऐसे गीतों का कोई भविष्य नहीं। बातें और भी होतीं...लेकिन उनके फ्लाइट का समय हो रहा था...    

रविवार, 24 अक्तूबर 2010

मखमली घास पर ओस बन टपकी गजल

संजय कृष्ण : खुले आकाश में शरद की छिटकी चांदनी और जमीन पर फैली मखमली घास से टकराती गजल सम्राट जगजीत सिंह की कशिश भरी आवाज। कंपकंपाते होठों से झरते शब्द और हारमोनियम से खेलती उनकी उंगलियां। और, गीत-संगीत की लयबद्धता से टूटती खामोशी...। शनिवार की शाम कुछ ऐसी ही मदहोशी लेकर आई थी। रांची के जिमखाना क्लब का विशाल प्रांगण ही नहीं इस मदहोशी में झूम रहा था, पत्ता-पत्ता, बूटा-बूटा भी खामोशी से गजल का लुत्फ उठा रहे थे। अलाप से जगजीत ने गजल की शुरुआत की। गजल के बोल थे..ये इनायतें गजब की, ये बला की मेहरबानी, मेरी खैरियत भी पूछी किसी और की जुबानी।...ये घटा बता रही है, कि बरस चुका है पानी। गजल की इन पंक्तियों श्रोता झूम रहे थे। मानो नशे में हो। शायद श्रोताओं का मूड देख जगजीत ने उनकी पसंद की गजल सुनाई...ठुकराओ कि अब प्यार करो, मैं नशे में हूं, जो चाहो मेरे यार करो, मैं नशे में हूं...। और इस नशे से जमीं भी झूम रही थी और आसमां भी। पर, प्यार में तकरार न हो तो प्यार का मजा नहीं। बदले-वदले की बात भी प्यार में होती है। अपनी मखमली आवाज में जगजीत पूछते हैं, तुमने बदले हमसे गिन-गिन के लिए, क्या तुम्हें चाहा था इस दिन के लिए...। यह चाह ऐसी कि वस्ल का दिन भी मुख्तसर हो गया था। पूछना लाजिमी है, चि_ी न कोई संदेश, जाने वो कौन सा देश...। माहौल में थोड़ी हरकत हुई। तालियों की गडग़ड़ाहट ने सन्नाटे को तोड़ा। इस हौसलाफजाई से जगजीत ने वही सुनाई जिसकी चाह थी..बात निकली है तो दूर तलक जाएगी...। यकीनन, बात दूर तक गई। तभी, दौलत और शोहरत भी देने की बात जुबां पर आई। वाकई, क्या कोई बीते समय को लौटा सकता है। ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो, मगर मुझको लौटा दे...। माहौल की रूमानियत में गजलप्रेमी सुर-समंदर में गोते लगाते हुए भीग रहे थे। चांद था, रात थी चांदनी थी... तारों की बारात भी थी और था जगजीत का साथ। और इस साथ से श्रोताओं की खुमारी बढ़ती जा रही थी। भूख ऐसी कि हर ख्वाहिश पर दम निकलता जा रहा था...हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पर दम निकले। और फिर जब अपनी मशहूर गजल सुनाई...कल चौदहवीं की रात थी ...तो फिर पूरा प्रांगण तालियों से गूंज उठा। इसके बाद उन्होंने एक से बढ़कर अपनी चर्चित नज्में सुनाकर रांचीवासियों को मंत्रमुग्ध कर दिया। रात जैसे-जैसे जवां हो रही थी, महफिल भी वैसे-वैसे गजल के सागर में गोते लगा रही थी। तुमको देखा तो ये ख्याल आया..आग का क्या पल दो पल का....बुझते-बुझते एक जमाना लगता है।

मंगलवार, 19 अक्तूबर 2010

बीस रुपये में गुजारा करती लुप्त होती जनजाति

 

संजय कृष्ण : केंद्र और राज्य सरकार की कल्याणकारी योजनाएं भी आदिवासियों के जीवन स्तर में सुधार नहीं ला पा रही हैं। सो, यहां की अधिकांश आबादी आज भी आदिम युग में जीने को अभिशप्त हैं। उनकी रोजाना आय बीस रुपए से भी कम है। आंकड़े बताते हैं कि पांच सौ रुपए आय वर्ग में कुल आबादी का 70.28 प्रतिशत है। छह सौ रुपए कमाने वालों की संख्या 10.88 है। सात सौ कमाने वालों की संख्या 8.49 है। आठ सौ कमाने वाले 6.24, एक हजार कमाने वाले 2.72 और एक हजार से ऊपर कमाने वाले 1.09 प्रतिशत हैं। यह अलग बने झारखंड की कहानी है। राज्य की कुल आबादी 2,69,09,428 है। इनमें लुप्तप्राय जनजातियों की संख्या 1,92,425 है। यानी 0.72 प्रतिशत। इनमें बिरहोर (6579), परहिया (13848), माल पहाडि़या (60783), सावर (9949), सौरिया पहाडि़या (61121), हिल खडि़या (1625), कोरवा (24027), असुर (9100), बिरजिया (5393)हैं। आदिम जनजातियों की सर्वाधिक संख्या साहेबगंज में 35,129 है और सबसे कम धनबाद में महज 137। इनकी आजीविका जंगल पर निर्भर है। जंगल में वन विभाग और माओवादियों की चलती है। 2006 में वन अधिकार कानून लागू हुआ लेकिन सरकारी महकमा इसे लागू करने के प्रति उदासीन है। जिसके कारण आदिवासियों को इसका लाभ नहीं मिल पा रहा है। खेती से इनकी जीविका में सुधार हो सकता है, लेकिन सिंचाई के अभाव में इनकी अधिकांश भूमि असिंचित ही रह जाती है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि लुप्तप्राय जनजातियों के पास कृषि योग्य भूमि 23,876 एकड़ है। इनमें सिंचित भूमि 6594 एकड़ हैं और 17282 एकड़ भूमि पर सिंचाई नहीं हो पाती है। ये आंकड़े सरकार को ही मुंह चिढ़ाते हैं। उनकी योजनाओं के हश्र की कहानी बयां करते हैं। पिछले दिनों अर्जुन सेन गुप्ता ने भी अपने रिपोर्ट में लिखा था कि देश की आबादी का 80 प्रतिशत 20 रुपए रोज पर गुजारा करती है।

कम्बख्तो, मैं तुम लोगों की तरह पागल नहीं हूं...

राधाकृष्ण :  यों तो वह बिना किसी कारण के मुस्कराता रहता था।
ऐसे आदमी पागल होते हैं। अगर कोई अपने मतलब से अपने स्वार्थ से मुस्कराता है, तो वह ठीक है। कम से कम वह पागल तो नहीं है। लेकिन अगर कोई बिना वजह के मुस्कराता है तो वह मुस्कान का अपव्यय करता है। इस व्यापारिक युग में अपव्यय बड़ी खराब चीज है। इससे दिवाला निकल जाता है। सो, मुस्कान का भी अपव्यय नहीं होना चाहिए। जो फिजूल बिना कारण के मुस्कराता रहता है, वह पागल नहीं तो और क्या है?
खाने-पीने का भी उसका ठीक नहीं। जो मिला सो खा लिया। नहीं मिला, नहीं खाया। अपनी मौज में मुस्कराते रहे। जरूर ही वह पागल है, वरना खाना तो आदमी को दोनों वक्त मिलना ही चाहिए। इसी दोनों वक्त के भोजन के लिए आदमी चोरी, डकैती, घूसखोरी, जालसाजी और बेईमानी करता है। इसी भोजन के लिए राज्यक्रांतियां होती हैं, षड्यंत्र होते हैं, हत्याएं होती हैं, तख्त उलटते और पलटते हैं। भोजन ही तो सारवस्तु है। उस भोजन की ओर से लापरवाह? उस भोजन के बिना भी अलमस्त? वह जरूर पागल है। यदि वह पागल नहीं होता, तो अपने भोजन के लिए अवश्य ही जाल-फरेब करता, चोरी-डकैती करता अथवा किसी से भीख मांगता। मगर वह तो, यह सबकुछ भी नहीं करता। जरूर वह पागल है।
रहने का भी ठौर ठिकाना नहीं। जहां जमे वहीं अपना घर है। सड़क पर है, तो वहीं आराम है। जरूर वह पागल है, अन्यथा उसका कोई अपना घर जरूर होता। अगर अपना घर नहीं होता, तो कोई किराये का घर तो जरूर होता। अगर वह भी नहीं होता, तब भी किसी मकान या जमीन के लिए किसी अदालत में उसका कोई दीवानी मुकदमा जरूर चलता होगा। नहीं-नहीं वह पागल है। उसे अपने कपड़े-लत्ते का ख्याल नहीं। वह अपने भोजन की भी परवाह नहीं करता। उसके रहने का भी ठीक नहीं। ऊपर से वह बिना किसी कारण के मुस्कराता रहता है। उसके पास भीख मांगने की झोली तक नहीं और वह अलमस्त बना रहता है। जरूर वह पागल है। 
ऐसे पागल से कौन बोले? मैं भी नहीं बोलता। उसके पास तो अपनी कोई कामना नहीं। फिर वह दूसरों के काम में दिलचस्पी क्यों लेगा? जिसके पास अपना स्वार्थ नहीं, उससे दूसरे किसी का स्वार्थ कुछ भी नहीं सधेगा। वह फिजूल है। समाज और सामाजिक चेतना के लिए वह पागल है। पागल से नहीं बोलना चाहिए। मैं शाम-सवेरे, दिन-दोपहर, आते-जाते उसे बराबर देखता हूं। वह बराबर मुस्कराता रहता है, बराबर हंसता रहता है। मैं उससे बोलता ही नहीं।
वह पागल बराबर मेरे मुहल्ले में चक्कर काटता था, मेरे ही मुहल्ले में रहता था। घर तो उसका था ही नहीं। अपना पड़ोसी भी उसे कैसे कहूं? मगर वह मेरे ही मुहल्ले में रहता था।
सन 1946 की बात है। संप्रदाय और मजहब आपस में टकराने लगे। मुझे मालूम नहीं कि भगवान और अल्लाहताला कभी लड़ते होंगे, खुदाबंदा करीम और श्री रामचंद्र आपस में छूरेबाजी करते होंगे? लेकिन हिंदू और मुसलमान तो जरूर लडऩे लगे। सारा देश इस वातावरण में लीन हो गया।
फिर हमारा ही नगर क्यों चुप रहे? क्या गया के हिंदुओं ने मां का दूध नहीं पिया है? क्या मुसलमानों के पास इस्लाम की आन नहीं? अल्लाओ-अकबर! बजरंग बली की जय!!...लो, दोनों ओर ठन गई। खचाखच छुरियां चलने लगीं, बीच-बीच में बंदूकों से फायर होने लगे। फटाफट तमाम घरों के सभी दरवाजे बंद हो गए। सारे शहर में सन्नाटा छा गया। बस, कभी दूर से हर-हर महादेव की आवाज आती या फिर आत्र्तनाद का स्वर सुनाई देता। सड़कों पर लहू के धब्बे थे और निरीह की लोथ थी। ओह, कैसा बुरा वक्त था।
मगर वह पागल तब भी घूम रहा था, तब भी हंस रहा था। मैंने अपने मकान की खिड़की को खोलकर देखा। वह भागते हुए लोगों को देखकर हंस रहा था, मुर्दा पड़ी हुई लाशों को देखकर हंस रहा था।
आज पहली बार मुझे उस पागल पर ममता आई। डर लगा कि कहीं कोई उसे मार न डाले। मैंने खिड़की बंद की। जल्दी-जल्दी नीचे उतरा। पास जाकर बोला, तुम कहीं छिप क्यों नहीं जाते?
वह मुस्कराता रहा, मेरी ओर देखता रहा।
मैंने कहा-देखते नहीं, चारो ओर मार-काट मची हुई है?
उसने मुस्कराकर कहा-हां, मार-काट मची हुई है। सब पागल हो गए हैं।
वह ऐसा वक्त था कि आदमी या तो हिंदू था या मुसलमान था। इसके सिवा वह कुछ भी नहीं था। इसके सिवा वह कुछ हो भी नहीं सकता था। मेरे मन में एक संदेह ने सिर उठाया। मैंने उससे पूछा-तुम हिंदुओं की ओर हो या मुसलमानों की तरफ?
उसने हंसते हुए कहा-क्या तुम मुझे भी पागल समझ लिया है? मैं किसी की तरफ क्यों रहूं? मैं पागल नहीं हूं।
और, वह मुझे लक्ष्य करके हंसा, फिर गली की ओर चलकर मुड़ गया। जाते-जाते वह बड़बड़ा रहा था कि लोग पागल हो गए हैं कि मुझे पागल समझ रहे हैं। कम्बख्तो, मैं तुम लोगों की तरह पागल नहीं हूं।...
राधाकृष्ण की यह कहानी उनके पुत्र सुधीर लाल ने उपलब्ध कराई है। राधाकृष्ण के बारे में यही कहना है प्रेमचंद ने एक बार कहा था कि यदि पांच कहानीकारों की सूची बनाई जाए तो उनमें एक नाम राधाकृष्ण का भी होगा। प्रेमचंद के निधन के बाद राधाकृष्ण ने हंस का भी कुछ दिनों के लिए संपादन किया। सैकड़ों कहानियां लिखीं, दर्जनों उपन्यास लिखे। रांची से आदिवासी नामक पत्रिका का भी संपादन किया। पर, आज हिंदी के ख्यात आलोचकों का ध्यान राधाकृष्ण पर नहीं है। जबकि यह उनका जन्मशताब्दी वर्ष है। पर, हम इन्हें भूल गए। हिंदी का लेखक इतना कृतघ्न क्यों है...।
 यह कहानी क्यों, यह कहानी इसलिए कि हर ओर अयोध्या कांड को ले अरण्यरोदन जारी है। यह कहानी हमारी संवेदना को झिंझोड़ती है। 
                                                                                                                          

                                                                                                                                             -संजय कृष्ण

शुक्रवार, 15 अक्तूबर 2010

हेसो के आंसू को कौन पढ़ेगा


संजय कृष्ण: रांची से पचास किलोमीटर दूर नामकुम प्रखंड का एक गांव है हेसो। बस इतनी-सी दूरी में रांची और हेसो में सैकड़ों सालों का फासला है। इस गांव से थोड़ी दूर पर एक पतली छिछली नदी बहती है। उसका नाम भी हेसो है। जैसे नदी की तकदीर वैसे ही गांव की। गांव तक जाने के लिए सड़क नहीं। उबड़-खाबड़ रास्ते से होकर गांव जाना पड़ता है। कहीं-कहीं बीच-बीच में पीसी पथ। इसके बाद फिर कच्ची सड़क। कुल पंद्रह से ऊपर किमी की मुख्य सड़क से गांव की दूरी तय करने में घंटों का समय लग जाता है। पहाड़ी रास्ते की अड़चने अलग से। जब सड़क नहीं पहुंची है तो बिजली कैसे पहुंच सकती है। राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण का हाल भी यह गाव बयां करता है। जब हम किसी तरह गांव पहुंचते हैं तो गांव के लोग कौतुहल से देखत हैं। कौन आ गया? गांव के आस-पास प्रकृति का नजारा लेते हैं। गांव को सारजोम बुरु (पहाड़) चारों ओर से घेरे हुए है। खेतों में पड़ी पपड़ी बारिश का इंतजार कर रही थी। माहौल में नमी जरूर थी।
गांव की आबादी चार सौ है। कुल अस्सी घर में मुंडा आदिवासियों के 60 घर हैं। गंझू दो घर और शेष अनुसूचित जाति के। गांव में प्राथमिक पाठशाला है। इसके बाद की पढ़ाई पास के फतेहपुर गांव में जाना पड़ता है। और आगे पढऩा हो तो बुंडू। गांव से बुंडू की दूरी सोलह किमी है। सबसे नजदीक स्वास्थ्य केंद्र बुंडू में ही है। हारी-बीमारी में सबसे नजदीक स्वास्थ्य केंद्र यहीं है। स्थिति बिगड़ गई तो रांची। बुनियादी सुविधाओं के नाम पर गांव में कुछ भी नहीं। छह चापाकल में सभी खराब। लोग महीनों से हेसो नदी का पानी पी अपनी प्यास बुझा रहे हैं। चापाकल खराब होने की शिकायत पिछले छह माह से नामकुम प्रखंड में संबंधित अधिकारियों से करते आ रहे हैं। पर इनकी सुने कौन? इनका सबसे बड़़ा दोष यह है कि ये आदिवासी हैं। निरक्षर हैं। सीधे हैं। गांव में अधिकतर लोगों के पास जॉब कार्ड है। पर, काम किसी के पास नहीं। सतीबाला और फुलोकुमारी का जॉबकार्ड मई 2006 में बना। काम मिला 2007 व 2008 में महज छह दिन। हालांकि कार्ड में काम के दिनों की संख्या बीस है। सतीबाला (48) बताती है हमें छह दिन की काम मिला। इसी तरह गांव के जुरा डोम, सुखदेव मिर्धा भी हैं। इनका कार्ड भी 2006 में ही बना, पर काम आज तक नहीं मिला। मनरेगा की यह हकीकत है। काम नहीं मिलने से जंगल ही एकमात्र सहारा है, पर जंगल में नक्सली और पुलिस का आतंक है। सो, जो जवान हैं, वे तो पलायन कर रहे हैं, लेकिन बूढ़े कहां जाएं? यहां मुंडा आदिवासियों के पास कुछ खेती लायक जमीन है, लेकिन बरसात नहीं होने के कारण खेत सूखे पड़े हैं। दलित हरिजनों की हालत सबसे दयनीय है। इनके पास न जमीन है न मजदूरी। कुछ बांस की टोकरी से 20 से 40 रुपए के बीच दिन में कमा लेते हैं तो चूल्हा जलता है। भोगल सिंह मुंडा 1982 से लकवा पीडि़त हैं। पिछले चार-पांच सालों से विकलांग पेंशन के लिए प्रखंड जाते-जाते थक चुके हैं। कहते हैं, एक बार जाने में चालीस-पचास रुपए खर्च हो जाता है। कहां से आएंगे पैसे कि रोज-रोज प्रखंड का चक्कर लगाएं? कमाई का कोई साधन भी नहीं। अंबिता देवी पिछले कई सालों से विधवा पेंशन के लिए भटक रही है। लेकिन उसे पेंशन नहीं मिला। हेसो की यह कहानी यहीं विराम नहीं लेती। हेसो पुलिस की नजर में नक्सलग्रस्त इलाका है। आपरेशन ग्रीन हंट के नाम पर पुलिस का आतंक हावी है। दिन में पुलिस और रात में नक्सली...। पुलिस का आंतक इतना कि कोई मोबाइल भी नहीं रखता। गांव के संतोष मुंडा बुंडु में बीए में पढ़ता है। उसने एक मोबाइल क्या रख ली, आफत ही बुला ली। नामकुम थाना पुलिस ने दो दिन थाने में उसे रख पूछताछ करती रही। जब पूरी तरह आश्वस्त हो गई कि नक्सलियों से इसके संबंध नहीं हैं, तब जाकर उसे छोड़ा। अब तो उसने गांव भी छोड़ दिया है। उसकी तरह कई युवा हैं, जिसे पुलिस प्रताडि़त करती रहती है। एक युवक कहता है, पुलिस नक्सलियों का सफाया करना चाहती है, लेकिन उसका रवैया नक्सलियों की ताकत को बढ़ा रहा है। गंगाधर मुंडा कहता है कि पुलिस ने चेतावनी दे रखी है कि जंगल में मत जाना नहीं गोली लग जाएगी। जंगल इनकी आजीविका है। इस आजीविका पर भी ग्रहण लग गया। मनरेगा काम नहीं दे पा रहा। रोजगार का कोई साधन नहीं। वन अधिकार कानून को लागू करने में भी अधिकारी व वन विभाग दिलचस्पी नहीं ले रहे। पिछले साल अक्टूबर में 40 आवेदन दिए गए थे। जिनमें पांच आवेदनों का सत्यापन किया गया। लेकिन उन्हें जमीन आज तक नहीं मिली। यह हेसो की कहानी है। झारखंड में ऐसे गांवों की संख्या अधिक है। और, ऐसे ही गांवों को घेरे है नक्सलियों का लाल कारीडोर।