गुरुवार, 25 फ़रवरी 2010

सौंदर्य की विरूपता


डालटनगंज से मनातू जाने के दो रास्ते हैं। एक लेस्लीगंज होते हुए। दूसरा पाटन होते हुए। दोनों रास्ते पलामू की हकीकत बयां करने के लिए काफी! पचास साठ किमी का सफर तीन घंटे में, वह भी अपनी सवारी से। इस बीच आप बार-बार इस अनुभव से गुजरेंगे कि गड्ढïेे में सड़क है या सड़क में गड्ढïा...। हालांकि इन रास्तों से गुजरते हुए बीच-बीच में टपक पड़तीं छोटी-बड़ी पहाडिय़ा, नदी-नाले आंखों को थोड़ा सुकून देते हैं। वन तुलसी की गंध भी मदहोश कर देती है। पलामू की ऐसी प्रकृति बरबस अपनी ओर खींच लेती है। प्रकृति के इस नैसर्गिक सौंदर्य के साथ-साथ यात्रा करते हुए जब हम मनातू पहुंचते हैं तो एक दूसरे सत्य से साक्षात्कार होता है। एक ओर प्रकृति की नियामत और दूसरी ओर सुविधा वंचित समुदाय। आजादी के बासठ साल में मनातू कहीं नहीं पहुंचा है। प्रगति के नाम पर मोबाइल टावर जरूर खड़े हो गए हैं, गली-गली शराब की दुकानें जरूर खुल गए हैं, लेकिन उन्हें स्वच्छ पेयजल की सुविधा नहीं मिल पाई है। मनातू प्रखंड से एक किमी की दूरी पर है बिहरा गांव। गांव में जब प्रवेश करते हैं तो सबसे पहले फुलवा कुंवर से सामना होता है। फुलवा की उम्र करीब सत्तर साल है। मैंने पूछा, क्या किसी नेता ने आपके गांव में कदम रखा है? वह कहती है, 'हमर जेतना उमर हो, हमर होश में कौनो नेता-विधायक नखो अइले।Ó साठ घरों की आबादी वाले इस गांव में वैसे तो उरांवों (आदिवासी) की बहुलता (२५-३० घर) है, लेकिन आठ घर यादव, दस घर कहार, चार घर चौधरी और शेष भुइयां जातियों का निवास है। गांव के भीतर जाने पर छोटे-छोटे टोले दिखाई पड़ते हैं। इन टोलों में बुनियादी सुविधाएं ढूंढे नहीं मिलतीं। न पेयजल की व्यवस्था है, न सिंचाई का कोई साधन नजर आता है। जगेश्वर उरांव, सत्तू उरांव, चंदारिक उरांव, रामदीप उरांव जैसे लोग थोड़ी-बहुत खेती करते हैं, सिंचाई का कोई पर्याप्त साधन नहीं होने के कारण इंद्र पर पूरी तरह इनकी निर्भरता है। इंद्र की कृपा हुई तो खेती हुई अन्यथा सिवान में सन्नाटा। बड़ी मायूसी से वे कहते हैं थोड़ी-बहुत जो फसल लगी थी, वह भी पानी के अभाव में मर गई। गांव में दो चापाकल है, लेकिन ये अक्सर खराब रहते हैं। तीन कुआं तो हंै, लेकिन जेठ में सभी सूख जाते हैं। तब, पानी के लिए दूर-दूर भटकना पड़ता है।

हालांकि इस गांव के उरांवों, भुइयां आदि जातियों का मुख्य पेशा जलावन की लकड़ी बेचना है या दूसरों के खेत में मजदूरी। मजदूरी नहीं मिली तो दूसरे राज्यों में पलायन। अब राहुल गांधी भले ही मनरेगा की सफलता पर इतराते हों, लेकिन जब वे गांव की हकीकत से रूबरू होंगे तो शायद उन्हें अफसरों की फाइलों का सच पता चलेगा कि आखिर, सौ दिन रोजगार कितनों को मिला? मनातू के इस गांव में तो किसी को नहीं मिला। इन ग्रामीणों के पास जाब कार्ड पिछले चार साल से बना है। लेकिन इन्हें काम एक दिन का भी नहीं मिला। काम की मांग करते हैं तो बीडीओ पंचायत सेवक के पास भेज देता है और पंचायत सेवक इन्हें टरकाने लगता है। वन विभाग ने कुछ लोगों को काम दिया था बहुत पहले, लेकिन उसने मजदूरी आज तक नहीं दी। गांव की हकीकत यहीं नहीं रुकती। पूरे गांव में महज सात लोगों को वृद्धापेंशन मिलता है, जबकि वृद्धों की संख्या कहीं अधिक है। भोला उरांव के चेहरे पर उग आई झुर्रियां उनकी उम्र बयां करती हैं। चिंता में माथे की लकीरों की संख्या बढ़ती जा रही है। पर, इन्हें एक बार ही कई बार का बकाया ६४ सौ रुपए वृद्धा पेंशन मिला, लेकिन इसके बाद चार महीने हो गए, अभी तक एक पाई भी नहीं मिला।

प्रखंड का पद्मा गांव विधायक विदेश सिंह का गांव है। अब यहां दो-चार दुकानें उग आई हैं और चट्टïी होने का भ्रम पैदा करती हैं। अब यह कालाबाजारियों का मक्का बन चुका है। बिहरा गांव के ग्रामीण कहते हैं कि डीलर उन्हें कभी भी पूरा अनाज नहीं देता। केरोसिन भी कभी एक लीटर देता है कभी दो। राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण के तहत कुछ टोले में विद्युतीकरण तो किया गया है, लेकिन कुछ में तीन साल से पोल गिराकर छोड़ दिया गया है। जीवनंदन उरांव, प्रमोद भुइया, नंदलाल चौधरी कहते हैं कि बिजली पोल गाडऩे के लिए कृष्णा गिरी का लड़का बबूल गिरी पैसे मांगता है। सो, गांव वालों ने न पैसा दिया और न पोल लगा। शिक्षा और चिकित्सा की स्थिति तो और भी बुरी है। सरकारी डाक्टर दवाएं नहीं, पर्ची देते हैं। यह उस गांव की कहानी है जो प्रखंड से सटा है। उन गांवों की कल्पना कर सकते हैं, जो पहाड़ों और जंगलों की गोंद में बसते हैं, जहां पैदल के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं है। कभी आतंक का पर्याय रहे मनातू मउवार (जगदीश्वरजीत सिंह) कहते हैं, 'यह गांव यदि चाइना बार्डर पर रहता तो चाइना का हो जाता और सरकार को पता भी नहीं चलता।Ó

संजय कृष्ण

'हमरा ना मालूम गुरु जी कौन हैंÓ

रामधनी परहिया को मालूम नहीं है कि शिबू सोरेन कौन हैं। जब उससे पूछा, आपकाविधायक कौन है? उसने सिर्फ इतना ही बताया, कौनो चंद्रवंशी हैं। उनका पूरा नाम क्या है? नाम नइखी जानत। जब पूछा, गुरुजी को जानते हैं। तो उसने पास में बन रहे निर्माणाधीन एनपीएस के मास्टर को समझ लिया। जब कहा, गुरु जी माने शिबू सोरेन। तो उसने अनभिज्ञता प्रकट की और कहा, हमरा ओतना मालूम ना है। फिर, किसी और नेता के बारे में पूछना वाजिब नहीं समझा।

रामधनी परहिया उग्रवाद प्रभावित पांडू प्रखंड के एक गांव घाटतर का रहने वाला है। यह घासीदाग पंचायत के अंतर्गत पड़ता है। इस गांव तक पहुंंचने के लिए जो सड़क गई है वह दो-तीन किमी पहले ही आपका साथ छोड़ देती है। तब दोपहिया वाहन कुछ मदद कर सकता है, लेकिन बस्ती में जाने के लिए तो आपको सड़क से नहीं, पैदल चलकर जाना पड़ेगा। क्योंकि उनके घर तक सड़क गई ही नहीं है। ऊबड़-खाबड़ खेतों से गुजरते हुए इनके घरों तक पहुंचना होता है। लेकिन बरसात में रास्ता खोजना इनके लिए मुश्किल हो जाता है। यह गांव जंगल और पहाड़ की तलहटी में बसा है, जहां कोई साधन नहीं। आजीविका के लिए पूरी आबादी जंगल की लकडिय़ों पर निर्भर है। देवनारायण परहिया की उम्र 30 के आस-पास है। वह निरक्षर है। वह अपने घर से सटे छोटा सा रकबा वाले खेत में हल जोत रहा था। मंगनी के बैल से। उसके पास इतना रुपया नहीं कि अपना बैल रख सके। खेत भी मामूली। नाममात्र के। सो, वह भी जंगल की लकड़ी बेचकर अपना गुजारा करता है। कहता है, एक ग_ïर लकड़ी चालीस से साठ रुपए में बिकती है। पांच लोगों का परिवार। हारी-बीमारी सो अलग। लेकिन इस ग_ïर के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ती है। फिर, गांव से आठ किमी दूर कजरू बाजार में उसे बेचना पड़ता है, जिसमें पूरा दिन लग जाता है। यह रोज का काम है। रोजगार के नाम पर कुछ नहीं। नरेगा के तहत कोई काम नहीं मिला। गांव के 21 लोगों के पास कार्ड, लेकिन अगस्त के बाद आज तक एक छटांक अनाज नहीं मिला। वही हाल केरोसिन का। घासीदाग का डीलर उन्हें आसानी से बेवकूफ बना देता है। गांव में पोल और तार झूल गए हैं, लेकिन पिछले चार महीनों से बिजली के दर्शन नहीं हुए। शासन-प्रशासन के लोग भूल से भी उधर नहीं गुजरते। सो, इनके सुख-दुख की जानकारी उनके पास नहीं है। पांच साल पहले 11 बिरसा आवास इस बस्ती को मिले, लेकिन छप्पर आज तक नहीं पड़ा। हारी-बीमारी इनके लिए जानलेवा ही साबित होती है। क्योंकि सरकारी अस्पताल पांडू में है, लेकिन वहां कोई रहता नहीं। थक-हारकर इन्हें विश्रामपुर प्रखंड में शरण लेनी पड़ती है। इनके पास कोई साधन भी नहीं। करीब बीस किमी पैदल चलकर ये विश्रामपुर पहुंचते हैं। ऐसे में रोगी और उसके परिजनों के पास भगवान पर भरोसे के सिवाय और कोई विकल्प नहीं बचता है। यही हाल लोटो टोला की है। यह टोला घाटतर से आगे है। और छतरपुर प्रखंड में पड़ता है, लेकिन पांडू से जुड़े हैं। यहां पर बैगा जनजाति के बीस-बाइस घर हैं। इनकी आजीविका भी जंगल पर निर्भर है। ललिता देवी कहती है कि गांव में काम नइखे। शिक्षा, चिकित्सा, रोजगार का कोई साधन नहीं। अलबत्ता, देसी शराब की दुकानें जरूर खुल गई हैं। पर, उनके लिए स्वच्छ पानी की व्यवस्था सरकार नहीं कर पाई है। यह कहानी झाटीनाथ, लालीमाटी आदि आधा दर्जन गांवों की है, जो पहाड़ की तलहटी में बसे हैं जहां 'सरकारÓ अभी नहीं पहुंच पाई है। सो, लाल दस्ते ने अपनी पकड़ मजबूत बना ली है। यहां उसी की सरकार चलती है।