शनिवार, 21 मई 2011

जनजातीय वेदना की जुबां है 'जोहारÓ

संजय कृष्ण :  गुरुवार को हुई राष्ट्रीय अवार्ड घोषणा में झारखंड की रचनात्मकता को सम्मान मिला। इनमें दो झारखंड के हैं और एक कोलकाता के। मेघनाथ भट्टाचार्य व बिजू टोप्पो रांची हैं, जिनकी दो डाक्यूमेंट्री एक रोपा धान व लोहा गरम है को अवार्ड मिला। वहीं कोलकाता के फिल्ममेकर नीलांजन भट्टाचार्च की जोहार को भी बेहतर पटकथा के लिए अवार्ड दिया गया।
ऐसा पहली बार नहीं हुआ। श्रीप्रकाश के कई वृत्तचित्रों को पुरस्कार मिला, देश-दुनिया के फिल्मोत्सव में वाहवाही बटोरी। फिर भी कहीं कोई हलचल नहीं। सरकार का कोई प्रयास नहीं। इस बाबत श्रीप्रकाश कहते हैं, जो भी फिल्में बनती हैं, व्यक्तिगत प्रयास से। संस्थागत या सरकारी मदद किसी भी स्तर पर उपलब्ध नहीं है। बंगाल को छोड़कर पूर्वी भारत में यह झारखंड ने यह मिसाल कायम किया है कि उसने अपने बूते देश-दुनिया में जगह बनाई है, पुरस्कार जीते हैं।
मेघनाथ लंबे समय से फिल्म निर्माण  से जुड़े हैं। रचनात्मक और आलोचनात्मक दोनों तरह की फिल्में बनाते हैं। एक रोपा धान उनकी रचनात्मक फिल्म है और लोहा गरम है मुद्दापरक। दोनों ने राष्ट्रीय अवार्ड जीते। 'लोहा गरम हैÓ को बनाने में तीन साल लगे। झारखंड, उड़ीसा, बंगाल आदि राज्यों में शूटिंग की गई। कई तरह की दिक्कतें भी आईं। स्पंज आयरन इंडस्ट्रीज के प्रदूषण से आस-पास की जिंदगियां कैसे प्रभावित हो रही है, इसे दिखाने का प्रयास किया गया है। बताया गया कि जहां १९८५ में इसके तीन प्लांट थे, २००५ आते-आते २०६ प्लांट लग गए। अब यह संख्या ४३० से पार कर गई है। ये छत्तीसगढ़, झारखंड, पं बंगाल और कुछ-कुछ गोवा, महाराष्ट्र व कर्नाटक में हैं। इन पर प्रदूषण बोर्ड का नियंत्रण है न सरकार का। स्वास्थ्य, कृषि, पर्यावरण कैसे प्रभावित हो रहे हैं, प्लांट के आस-पास देखा जा सकता है।
'एक रोपा धानÓ अलबत्ता झारखंड की दूसरी तस्वीर पेश करती है। बिजू टोप्पो कृषि-जल संकट के बीच धान की खेती कैसे करें, पैदावार कैसे बढ़ाएं, इसे ग्रामीणों को बताते हैं। आज से पचीस साल पहले मेडागास्कर में हेनरी डे लौलीने ने धान की खेती के लिए एसआरआई (सिस्टम आफ राइस इनटेंसीफिकेशन) विधि की खोज की। ग्रामीण इसे एक रोपा धान कहते हैं। इस विधि से कैसे खेती कर पैदावार बढ़ा सकते हैं, इसे ग्रामीणों को बताती है। बिजू टोप्पो बताते हैं, पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण पैदावार कैसे बढ़ाई जाए, इसको लेकर इसका निर्माण किया गया है। नीलांजन भट्टाचार्य की 'जोहार : वेलकम टू अवर वल्र्डÓ जनजातीय दर्द को जुबां देती हैं। इसे कोलकाता के नीलांजन भट्टाचार्य ने बनाया है। इसे बेस्ट पटकथा का पुरस्कार मिला है। वृत्तचित्र देखने पर महसूूस होता है कि यह दर्शकों को जनजातीय वेदना की जुबां बनकर कथा सुना रहा हो। नीलांजन ने बताया कि आदिवासी समाज के प्रति एक अतिरिक्त आकर्षण ने इस फिल्म को बनाने के लिए प्रेरित किया। झारखंड पड़ोस में था। कई मित्र रांची में हैं। इसलिए झारखंड को ही चुना। नीलांजन कहते हैं, आदिवासी समाज अपनी गुरबत में भी अपनी संस्कृति को नहीं भूलता। जंगल उजाड़े जा रहे हैं। आजीविका का संकट लगातार घना हो रहा है। ट्राइबल फूड के साथ उनकी ट्राइबल मेडिसिन भी धीरे-धीरे खत्म हो रही है। जोहार में इन्हीं समस्याओं को कैद करने का प्रयास किया गया है। ग्रामीण वन अधिकारी, वन माफिया और माओवादी तीनों से त्रस्त हैं। वन कानून है, लेकिन कागज पर। बीपीएल के लिए आदिवासियों को सड़क जाम करना पड़ता है। नीलांजन आदिवासियों की जिजीविषा से सलाम करते हैं। कहते हैं, गांव में बहुत दिक्कते हैं। फिर भी वे नाचना-गाना नहीं भूलते। उनकी संस्कृति बहुत गहरी है। अब उनका खान-पान प्रभावित हो रहा है। माइनिंग ने वातावरण को प्रदूषित कर दिया है, फिर भी वे जी रहे हैं।