शुक्रवार, 16 अगस्त 2013

नजरबंदी में भी रांची में जोश भरा था मौलाना ने

संजय कृष्ण, रांची
आजादी के एक प्रमुख सिपाही हिंदू-मुसलिम एकता के संबल मौलाना अबुल कलाम आजाद (11 नवंबर, 1888-22 फरवरी 1958) जब रांची से प्रकाशित साप्ताहिक पत्रिका 'आदिवासीÓ (वर्ष 18, अंक 28, 15 अगस्त, 1964) के एक अंक में समरुल हक ने 'आवाज गूंजती हैÓ नामक लेख में लिखा है कि 'रांची के बुजुर्ग जब मौलाना को देखते थे तो उन्हें विश्वास ही नहीं होता था कि इतनी कम उम्र का नौजवान इतना बड़ा साहित्यकार, ओजस्वी वक्ता और ब्रिटिश सरकार के लिए इतना भयानक हो सकता है। रांची में नजरबंद रहते हुए भी मौलाना आजाद की राजनीतिक और सामाजिक सरगर्मियां ठंडी नहीं पड़ी थी।Óमौलाना केवल तकरीर ही नहीं करते थे। लोगों में आजादी का जोश ही नहीं भरते थे। शिक्षा को लेकर अपनी चिंता को भी यहां परवाना चढ़ाया और कई संस्थाओं की नींव डाली। अगस्त, 1917 में उन्होंने अंजुमन इस्लामिया, रांची तथा मदरसा इस्लामिया की नींव डाली। ये दोनों आज भी हैं और उनकी स्मृतियों की गवाही देती हैं।
समरुल हक ने लिखा है कि जुमे की नमाज के बाद मसजिद में हिंदू भी मौलाना का भाषण सुनने के लिए आते थे। रांची के कुछ मुसलमानों ने विरोध प्रकट किया कि ये लोग मस्जिद में क्यों आ जाते हैं? उन लोगों की आपत्ति सुनकर मौलाना ने 'जामिल सवाहिदÓ नाम की किताब लिखी। यह हिंदू मुस्लिम एकता की बेजोड़ पुस्तक मानी जाती है।
रांची के गजनफर मिर्जा, मोहम्मद अली, डा. पूर्णचंद्र मित्र, देवकीनंदन प्रसाद, गुलाब नारायण तिवारी, नागरमल मोदी, रंगलाल जालान, रामचंद्र सहाय आदि उनसे अक्सर मिलते-जुलते रहते थे और आजादी पर चर्चा करते थे।
कहा जाता है कि 1919 में रांची के गौरक्षणी में हिंदू मुसलमानों की इतनी बेजोड़ सभा हुई कि इतनी भीड़ रांची  ने इसके पहले नहीं देखी थी। उस समय खिलाफत और असहयोग आंदोलन के बारे में ओज और तेज से भरी वक्तृताएं हुईं। मौलाना उस समय नजरबंद थे और सभा में जा नहीं सकते थे, फिर भी सारी प्रेरणा उनकी ही थी। सन 1919 में मौलाना की नजरबंदी से मुक्त हुए। उसके बाद वे रांची में गोशाला के गोपाष्टमी मेला के दिन अपना अंतिम भाषण देकर रांची से चले गए। उस दिन रांची गोशाला में हिंदू-मुसलमानों की इतनी सम्मिलित भीड़ थी, जैसा रांची के इतिहास में पहले कभी भीड़ नहीं जुटी थी। उनके जाने के बाद 1920 में यहां कांग्रेस का गठन हुआ। इसी साल गांधी भी रांची आए और लोगों से आंदोलन में भाग लेने की अपील की। इसके बाद तो कई बार गांधी आए और फिर रांची भी आजादी के दीवानों का एक प्रमुख केंद्र बन गया। 
रांची में नजरबंद थे तब भी आजादी का तकरीर करने से नहीं चूकते थे। कम से कम जुमे की नमाज के बाद तो उनकी तकरीर होती ही थी। वे आजादी का जोश भरते। उनकी तकरीर सुनने के लिए हिंदू भी मस्जिदों जाते थे। वे रांची में अप्रैल 1916 से 27 दिसंबर, 1919 तक रहे और आजादी के आंदोलन को परिपक्वता प्रदान की।

आजादी की मुनादी और वो रात

संजय कृष्ण, रांची
अगस्त का महीना था। 1947 का साल। राजनीतिक वातावरण काफी विषाक्त हो गया था। तरह-तरह की अफवाहें हवा में तैर रही थीं। मेरी उम्र उस समय 18 साल थी। एक रात घर में हम लोग आराम से सोए थे कि पटाखे छूटने लगे। गलियों-सड़कों से होती हुई खबर घर में भी दाखिल हुई, 'पाकिस्तान बन गया।Ó
मुल्तान के पास बहावलपुर स्टेट था। उस स्टेट में एक गांव था कायमपुर। उस गांव के हम वाशिंदे थे। गांव में 85 प्रतिशत आबादी मुसलमानों की थी और 15 प्रतिशत हम लोगों की।
रातू रोड, कृष्णापुरी गुरुद्वारे में प्लास्टिक की कुर्सी पर अपनी छड़ी के साथ बैठे आपबीती सुनाते ऋषिकेश गिरधर की आंखें रह-रहकर सजल हो उठती हैं। कहते हैं, पाकिस्तान बनने की खबर जैसे ही आई, दंगे शुरू हो गए। इन दंगों में अफवाहों ने बड़ी भूमिका निभाई। 14 अगस्त की रात तो इतनी स्याह थी कि कभी वैसी रात देखी ही नहीं। दंगों की खबरें आती तो पूरा शरीर कांप जाता। लगता, मौत अब सामने खड़ी है। 
किसी तरह गांव के सभी लोग गुरुद्वारे में जमा हो गए। बच्चे, बूढ़े, महिलाएं सभी। गुरुद्वारे की खिड़कियां और दरवाजों को मजबूती से बंद कर दिया गया। मेरे बहनोई बालकृष्ण दो बजे रात को लालटेन लेकर ऊपर चढ़े देखने के लिए। तभी एक गोली की आवाज सुनाई दी। दंगाइयों ने उन्हें गोली मार दी। वे छत पर ही ढेर हो गए। हम लोग कुल पंद्रह सौ के करीब थे। घरों को लूटने की खबर आई। खेतों को आग के हवाले कर दिया गया। अब सवाल बहू-बेटियों का था। बुजुर्गों ने बड़ा कठोर फैसला लिया...गुरुद्वारे में ही उन्हें आग के हवाले कर दिया जाए ताकि अपने सामने इन्हें बेआबरू होते न देख सकें। इस प्रस्ताव की खबर गुरुद्वारे से बाहर जा पहुंची। भीड़ में मुसलमानों के एक पीर थे अब्दुल्ला शाह। उन्हें इसका पता चला तो खबर भिजवाई, ऐसा मत करिए।
गिरधर की आंखों में आंसू आ गए। आंसू पोछने के बाद फिर बताते हैं, पीर ने खबर भिजवाई अपने डेरे चलने के लिए। अब माहौल ऐसा था कि उनकी बात पर विश्वास किया जाए या नहीं? खैर, अंतत: चांस लिया गया। जितने लोग थे, अपने गहने मुसलमानों को हवाले करते जाते और फिर उनके साथ चल दिए। दस दिन उनके डेरे पर रहा गया। फिर एक दिन पांच सौ के करीब मुसलमान गांवों से पहुंच गए और कहने लगे कि ये मुसलमान बन जाएंगे तो इन्हें छोड़ देंगे। कुछ तैयार भी हो गए, पर ऐसी नौबत ही नहीं आई। वाहे गुरु ने सुन ली। उसी रास्ते से एक अंग्रेज आफिसर जा रहे थे फोर्स के साथ। आगे एक गांव में भारी तबाही मची थी। जब हम लोगों को पता चला तो रास्ते में हम लोगों ने उन्हें रोक लिया। कहानी सुन उनका दिल पसीजा। उन्होंने ऊपर के अधिकारियों से बात की। हमारी गिनती हुई और हमें मिलिट्री वालों को सुपुर्द कर दिया गया। इसके बाद दोनों देश के बीच बातचीत हुई। तय हुआ कि एक ट्रेन पाकिस्तान से जाएगी और एक हिंदुस्तान से। इस तरह 26 सितंबर को वहां से हम लोग ट्रेन से चले और 28 को राजस्थान के बार्डर पर जो अंतिम स्टेशन था, हिंदू मलकोट वहां उतरे। हिंदू मलकोट से पांच मील पहले ही एक दरिया के पुल पर हमें फिर दंगाइयों ने घेर लिया। पर, मिलिट्री के कारण हम सुरक्षित भारत की सीमा में दाखिल हो गए। स्टेशन पर रांची से आए फिरायालाल, जीव लाल, गोपालदास मुंजाल, शिवदयाल छाबड़ा आदि स्वागत के लिए खड़े थे। ये लोग भी हमारे गांव के ही थे, पर व्यापार के सिलसिले में सत्तर-अस्सी साल पहले इनका परिवार यहीं का हो गया था। हिंदू मलकोट से लोग बिखर गए। सौ-डेढ़ सौ लोग रांची आए। मैं, माता-पिता और भाई सभी यहीं आए। चार लोग आए थे और आज चौवन लोग हैं। केंद्र और बिहार की सरकार ने इनलोगों की खूब मदद की। गिरधर बताते हैं कि पीर का पत्र आते रहा कि आप अपना सामान ले जाइए। उनके पास आते समय काफी सोना रख आए थे। पर, फिर वहां जा नहीं सके। कहते हैं, आजादी की वह काली रात आज भी सिहरन पैदा कर जाती है।       

आजादी की लड़ाई में गंवा दी अपनी जमीन

मोहनदास करमचंद गांधी पहले नेता थे, जिन्होंने आजादी के आंदोलन की शुरुआत करने से पहले पूरा देश का भ्रमण किया। इसके बाद उन्होंने अपनी रणनीति बनाई। मैदानी इलाकों से एकदम अलग-थलग रहने वाले रांची की पठार पर भी उनके कदम पड़े। यह वाकया 1920 का है। असहयोग आंदोलन शुरू हो गया था। वे देश का दौरा कर रहे थे। इसी क्रम में वे रांची भी आए। गांधीजी जब रांची आए तो यहां उनकी मुलाकात टाना भगतों से हुई। इसका श्रेय डा. राजेंद्र प्रसाद को जाता है। टाना भगत भी छह साल पहले ही अस्तित्व में आए थे। वे गांधी के व्यक्तित्व से इस कदर प्रभावित हुए कि फिर गांधी के ही होकर ही रह गए।
श्री नारायणजी ने 'आदिवासीÓ के  गांधी अंक, 2 अक्टूबर, 1969 में लिखा है, 'टाना भगत महात्मा गांधी के अनन्य भक्त बन गए। आजादी की लड़ाई में टाना भगतों ने अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। कितने जेल गए, हजारों की जमीन नीलाम हुई, कितने जेल में खेत आए। स्वराज्य का संवाद सुनने के लिए कांग्रेस अधिवेशन में सम्मिलित होने के लिए सैकड़ों पांव पैदल गया, कानपुर, बेलगांव और कोकोनाडा गए।
1922 के गया कांग्रेस में करीब तीन सौ टाना भगतों ने भाग लिया। ये रांची से पैदल चलकर गया पहुंचे थे। 1940 में रामगढ़ कांग्रेस में इनकी संख्या तो पूछनी ही नहीं थी।
  पांच अक्टूबर, 1926 को रांची में राजेंद्र बाबू के नेतृत्व में आर्य समाज मंदिर में खादी की प्रदर्शनी लगी थी तो टाना भगतों ने इसमें भी भाग लिया। 1934 में महात्मा गांधी हरिजन-उत्थान-आंदोलन के सिलसिले में चार दिनों तक रांची में थे। इस समय भी टाना भगत उनके पास रहते थे। साइमन कमीशन के बॉयकाट में टाना भगत भी शामिल थे। टाना भगतों की जमीन तो अंगरेजी सरकार ने पहले ही नीलाम कर दी थी, फिर भी वे आजादी के आंदोलन से पीछे नहीं हटे, मार खाई, सड़कों पर घसीटे गए, जेल की यातनाएं सही, फिर भी गांधीजी की जय बोलते रहे, अंतिम दम तक। देश जब आजाद हुआ तो टाना भगतों ने अपनी तुलसी चैरा के पास तिरंगा लहराया, खुशियां मनाईं, भजन गाए। आज भी टाना भगतों के लिए 26 जनवरी, 15 अगस्त व दो अक्टूबर पर्व के समान है। हरवंश भगत ने 'पंद्रह अगस्त और टाना भगतÓ लेख में बताया है कि '15 अगस्त को टाना भगत पवित्र त्यौहार के रूप में मनाते हैं। इस दिन टाना भगत किसी प्रकार खेतीबाड़ी आदि का काम नहीं करते। प्रात: उठकर ग्राम की साफ-सफाई करते हैं। महिलाएं घर-आंगन की पूरी सफाई करती हैं। स्नानादि के बाद समूह रूप में वे राष्ट्रीय गीत गाकर राष्ट्र-ध्वज फहराते हैं। अभिवादन करते हैं। स्वतंत्र भारत की जय, महात्मा गांधी की जय, राजेंद्र बाबू की जय, जवाहर लाल नेहरू की जय तथा सभी टाना भगतों की जय का नारा लगाते हैं। गांव में जुलूस निकालते हैं। प्रसाद वितरण भी करते हैं। अपराह्न आम सभा होती है। सूत काता जाता है और आपस में प्रेम और संगठन को दृढ़ करने की चर्चा होती है।Ó पर, आजादी के ये अहिंसक सिपाही आज भी अपनी जमीन वापसी के लिए संघर्ष कर रहे हैं।