गुरुवार, 18 दिसंबर 2014

बस यारा, बंद करो यह लंगर

हुसैन कच्छी 
पाकिस्तान जिसको एक दुनिया गेटवे टू इस्लामिक वल्र्ड यानी इसलामी मुल्कों तक जाने का सदर दरवाजा कहलाती है, वहां बेकसूर लोगों के कत्ल का बाजार लगे हुए कई साल हो गए हैं। पेशावर उसका सदर मुकाम बना हुआ है। वही पेशावर जो एक वक्त में दमिश्क से चीन तक कारोबार के लिए आने-जाने के रास्ते में मुसाफिरों के लिए राहते जान का दर्जा रखता था। यात्रा वृत्तांत लिखने वालों ने इस शहर को तकिया कहा है। सारे जहां के लोग यहां एक दूसरे से मिलते थे। सब अनजाने लोग यहां जाने-पहचाने बन जाते थे। अपने-अपने इलाकों की बातें बताते थे। सफर की दास्तानें सुनाते थे। किस्से-कहानियों का सिलसिला सदियों तक जारी रहा। इस शहर की इसी खसूसियत की वजह से यहां के मशहूर बाजार किस्सा ख्वानी का नाम पड़ा। वही किस्सा ख्वानी बाजार जिसके अंदर मुहल्ला खुदा आबाद में दिलीप कुमार का जन्म हुआ था। नजदीक ही पृथ्वी राजकपूर और राज, शम्मी और शशि कपूर का पैतृक घर भी है, जहां राजकपूर की आदमकद तस्वीर सामने से गुजरने वालों का इस्तकबाल करती है और बताती है कि यह शहर तहजीबों, रिवायतों का गहवारा रहा है। इस शहर ने हिंदुस्तान के अजीम अदाकार दिलीप कुमार, नहीं, यूसुफ खां, नहीं, दिलीप कुमार को पाकिस्तान का सबसे बाइज्जत शहरी सम्मान सितारा-ए-पाकिस्तान के लकब से नवाजा गया। इसी शहर में पैदा हुए शायर अहमद फराज ने कहा, 'अबके हम बिछड़े तो शायद कभी ख्वाबों में मिलें, जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलेंÓ तो माडर्न लिटरेचर के जानकार उर्दू शायरी के इस ताजा फूल को और नजदीक से देखने की कोशिश कर रहे थे। उसी गजल में जब वह कहते हैं, 'तू खुदा है न मेरा इश्क फरिश्तों जैसा, दोनों इंसां हैं तो क्यों इतने हिजाबों में मिलेंÓ तो जमाने ने महसूस किया कि दरअसल फराज पेशावर की सबसे बाइज्जत और बाबरकत शख्सीयत अजीम सूफी शायर रहमान बाबा की रिवायत को ही आगे बढ़ा रहे हैं। रहमान बाबा पश्तो भाषा में रुह की गहराई तक उतर जाने वाली शायरी करते थे। उनकी शायरी का तर्जुमा दुनिया भर की भाषाओं में किया गया है। पेशावर में उनके मुरीदों ने उनका आलीशान मजार तामीर किया जहां अकीदतमंदों का हुजूम लगा रहता है। नापाक उग्रवादियों को रहमान बाबा की तालीम से डर लगता है क्योंकि वो कहते थे सब इंसान बराबर हैं। यह दुनिया सबके लिए है और अमन भाईचारा अमृत है। अमन का धर्म अजीम धर्म है। बाकी सब धोखा। रहमान बाबा जब लोगों के बीच थे तो उनके आस-पास मजमा लगा रहता था। प्यार मुहब्बत के तलबगारों का मजमा। सच्ची और ईमानदार तालीम के तलबगारों का मजमा। ऐसे तलबगारों को ही तालिबान कहते हैं। ढोंगियों को नहीं। रहमान बाबा ने आंखें मूंद लीं तो और भी ताकतवर हो गए। उनका मजार दुनिया में उनके चाहने वालों के लिए राहत की जगह है और पनाहगाह बन गया है। दुनिया करवट लेती रही, ढोंगियों का गिरोह शक्लें बदल-बदल कर जमीन पर फैल गया। उन्हीं ढोंगियों में ये झूठे तालिबान शामिल हो गए। यह तालिबान नहीं बल्कि बबूल रोपने वाले बागबान हैं और जो इंसानी खून से कांटों की खेती को सींचते हैं। रहमान बाबा ने अपनी शायरी में बहुत पहले कहा था, 'तुम दूसरों पर तीर चलाओगे तो वही तीर पलटकर आएंगे और तुम्हें छेदेंगे।Ó इसके साथ उन्होंने यह भी कहा था कि 'तुम दूसरों के लिए कांटे बोओगे तो वह तुम्हारे पैरों में आकर तुम्हें ही लहूलुहान कर देंगे।Ó बदकिस्मती से जब इन नापाक तालिबानों की बुआई शुरू हुई तो पाकिस्तान अफगानिस्तान में कुछ लोग इसको दीन की खिदमत समझने की गलती कर बैठे। इसका नतीजा सामने है। पेशावर, जो दिलचस्प किस्सागोई, माहौल में फलों-फूलों की खुशबू, हस्तशिल्प, लाजवाब फनकारों, खुबसूरत लोगों, शुजाअत और बहादुरी की मिसाल, आजादी की लड़ाई में अंग्रेजों के सामने सीना तानकर खड़े होने का हौसला रखने के लिए मशहूर था, आज एक सहमा हुआ, रोता-बिलखता शहर है। सौ से ज्यादा स्कूली बच्चों का कत्लेआम पाकिस्तान की पेशानी का ही नहीं, दुनिया के तमाम अमनपसंद शहरियों के सीने का दाग बन चुका है। ये सिलसिला बंद होना ही चाहिए। जाहिर में खबरें कुछ भी बताएं लेकिन टेलीविजन पर एक आदमी जो यह कह रहा था कि यार बस करो, तुम्हें खुदा का वास्ता, रसूल का वास्ता...। , उसी दरम्यान उसने यह भी कहा, यार अफगानिस्तान में अमरीका का एक भी कुत्ता नहीं मरता, यहां कितने बच्चों की लाशें पड़ी हुई हैं।
पता नहीं क्यूं, कुछ चैनल वाले अमरीकी कुत्ता वाली बात को एडिट कर रहे थे, अखबारों का भी यही हाल रहा। पेशावर में मौत का लंगर बांटा गया, डेढ़ सौ के करीब जिंदगियां बुझ गईं। इसकी पहली खबर के बाद दिल की बेचैनी का आलम लिए दिल ही दिल में रहमान बाबा के मजार में हाजिरी हुई और यह शिकायत पेश की, यह गुजारिश भी कि बस यारा, अब बंद करो यह लंगर। अब और सहा नहीं जाता। यहां मुझे विभाजन के वक्त अमृता प्रीतम की कही हुई दो पंक्तियां याद आ रही हैं, जिसके मायने हैं, आज वारिस शाह से पूछूंगी, कभी कब्र से बाहर आकर बोल और ये कत्लोगारतगरी रोक। यही पंक्तियां रहमान बाबा के आस्ताने में याद आ रही हैं।
                                                                 हुसैन कच्‍छी रांची के जिंदादिल इंसान और संस्‍क़तिकर्मी हैं।