गुरुवार, 4 जून 2015

ेतू मुखिवा को मारकर दामुल पर काहे नहीं चढ़ा रे

हिंदी सिनेमा में कलात्मक फिल्मों को समानांतर सिनेमा, कला फिल्में या क्लासिक फिल्मों के खाते में डाल दी जाती हैं। प्रकाश झा की जब दामुल आई तो इसे भी क्लासिक फिल्मों के खाते में डाल दिया गया। भारत में मुख्यधारा की जो फिल्में बनती हैं और जिसे बहुसंख्यक दर्शक देखना पसंद करते हैं, वह ऐसी फिल्में होती हैं, जहां हल्के-फुल्के विषय होते हैं, मधुर संगीत होता है, नाच-गाने होते हैं। यही मुख्यधारा का सिनेमा है और इसी के बूते हमारा हिंदी फिल्मों का उद्योग चल रहा है। इससे इतर जो निर्देशक थोड़ा गंभीर विषय का चुनाव करते हैं और ऐसी फिल्में, जो विशिष्ट दर्शकों की अपेक्षा करती हैं, इन्हें सार्थक या कला फिल्मों की कतार में खड़ा कर दिया जाता है। जब 1984 में प्रकाश झा की दामुल आई तो हिंदी सिनेमा की एकरसता में टूटन हुई। इसे कला समीक्षकों ने समानांतर सिनेमा के रूप में दर्ज किया। प्रकाश झा की ऐसी मंशा हो, चाहे न हो, लेकिन समीक्षकों ने इसे इसी रूप में लिया और दर्शकों के बीच भी यह फिल्म पसंद की गई। यशस्वी कथाकार शैवाल की कहानी दामुल की कथा पर बनी यह फिल्म अपने कहानीपन, अभिनय क्षमता, अद्भुत पृष्ठभूमि के रचाव से जो कलात्मकता का दर्शन कराती है, उससे दर्शक प्रभावित हुए बिना नहीं रहता। कहीं नामवर सिंह ने लिखा है कि साधारण लिखना बहुत कठिन होता है। उसी तरह रोजमर्रें की जिंदगी के फलसफे को पर्दे पर उतारना अपेक्षाकृत जबरदस्त हुनर की मांग करता है। हुनर ही नहीं, उस समझ की भी मांग करता है, जो फिल्म की कथा चाहती है। बिहार के इस प्रतिभावान निर्देशक ने कुछ ऐसा ही शास्त्रीय रचाव पैदा किया। शैवाल ने कहानी की पृष्ठभूमि में जहानाबाद को लिया है। (हालांकि फिल्म में मोतिहारी है) यह जहानाबाद बिहार की राजधानी से पचपन किमी दूर है। यह वही जहानाबाद है, जहां नक्सली प्रयोग से लेकर जेलब्रेक की घटनाओं ने देश के लोगों का ध्यान खींचा। इसी जिले के एक गांव की यह कथा है। गांवों में जैसा कि अमूमन होता है, दलित और पिछड़ों का भाग्य उन पर निर्भर करता है, जिसे माक्र्सवादी भाषा में सामंत कहते हैं और देशज भाषा में जमींदार। इस गांव का जमींदार परंपरा के विपरीत ठाकुर (राजपूत) नहीं, ब्राह्म्ण होता है और यही खलनायक है। बेकारी कराते-कराते छोटे जोतदारों की जमीने कैसे इस जमींदार की हो जाती है, यह उन किसानों को नहीं पता।
  मध्यकाल में जब जमींदारों का उदय हुआ तो खेतों के ये रखवाले हो गए। कुछ ऐसे लोगों के पास परंपरागत जमीन थी। कुछ लोगों ने जंगल साफ करके खेती लायक जमीन बनाई। यह उतनी ही जमीन होती, जितनी उसकी उपज से परिवार का निर्वहन हो सके। बाद में जब मुगल बादशाहों ने जमींदारों को पैदा किया तो किसानी पर ध्यान न
 अजीब लगता है कि एक ओर हम कहते हैं कि भारत कृषि प्रधान देश है और दूसरी ओर रोज किसानों की आत्महत्या की खबर पढ़ते हैं। अभी शिवमूर्ति का नया उपन्यास आखिरी छलांग इसी समस्या को गंभीरता से उठाता है। कथा साहित्य में इस समस्या पर कई लोगों ने अपनी कलम चलाई है। प्रेमचंद के गोदान से लेकर रेणु की परती परिकथा और मिथिलेश्वर के माटी कहे कुम्हार से तक की औपन्यासिक यात्रा में किसान, गांव, खेत-खलिहान देखे जा सकते हैं। जमींदारी के कारण कैसे उग्रवाद ने पांव जमाया, मिथिलेश्वर ने अपने इस उपन्यास में दर्ज किया है। फिल्मों में भी यह विषय अछूता नहीं रहा। मदर इंडिया से लेकर  विमल राय की दो बीघा जमीन में आखिर एक किसान का ही दर्द छलकता है। विमल राय ने जमींदारों के उत्पीडन को बड़ी बारीकी से उभारा है। जमींदारों की क्रूरता हिंदी फिल्मों का मसाला रहा है। किसान के लिए धरती माता है। इसलिए वह अपने खेत से उसी तरह जुड़ता है, जिस तरह एक बेटा अपनी मां से। लेकिन जब कोई उसके इस खेत को अपनी मिल्कियत बना लेता है तो वह बर्दाश्त नहीं कर पाता। कम से कम भारत में जितने आंदोलन हुए हैं, उनके पीछे कहीं न कहीं जमीन के सवाल ही जुड़े रहे हैं। झारखंड के आदिवासी अपनी जमीन को लेकर 1831-32 से ही लड़ते आ रहे हैं। तब अंग्रेजों से लड़ते थे। आज अपने लोगों से लड़ रहे हंै। यह भी ध्यान रखें के सत्तर के दशक में नक्सलवाद के पैदा होने के पीछेे जमीन ही मुख्य कारण रहा। जमीन के टुकड़ों ने ही नक्सलवाद को पैदा किया है। जमीन का मामला अपने देश में कितना क्रिटिकल है यह इस बात से जाहिर होता है कि विनोबा भावे को भूदान यज्ञ जैसे दीर्घजीवी कार्यक्रम चलाने पड़े। इस यज्ञ में जमींदारों ने अपनी जमीनों की आहुति तो दी, लेकिन उनकी दबंगई कम नहीं हुई और जमीन उनके हाथ में ही पड़ी रही। जिनके नाम जमीन दी गई उन्हें कभी जमीन पर कब्जा दिलाया ही नहीं गया। कारण स्पष्ट था। सत्ता, सरकार, प्रशासन में दलितों-भूमिहीनों की कोई आवाज सुनने वाला नहीं था न उनका कोई प्रतिनिधित्व। लिहाजा उनकी आवाज नक्कारखाने में तूती की आवाज बनकर दम तोड़ गई। इन स्थितियों ने ही वर्ग संघर्ष का रास्ता तैयार किया। बिहार में इसका सबसे पहला शिकार मुजफ्फरपुर का मुसहरी गांव बना। इसके बाद तो भोजपुर का इलाका वर्ग संघर्ष की आग में धधक उठा। फिर दूसरे इलाकों में इसने पांव पसारे। इसी में से एक जिला जहानाबाद भी था। इस जिले में कई बड़े नरसंहार हुए, जिसने पूरे देश का ध्यान खींचा। इन सबके बीच असल मसला जमीन का ही था। आज भी यह क्षेत्र रह-रह कर धधक उठता है।
  आजादी के बाद भूमि सुधार कानून बनाने वाला बिहार पहला राज्य था। लेकिन इकसठ सालों बाद भी यह कानून प्रभावी नहीं हो सका। क्योंकि नौकरशाही में इसी वर्ग का हस्तक्षेप थाध् है। न्याय भी उनके लिए दुर्लभ था। पुलिस-थाना-कचहरी इस वर्ग के लिए नहीं थी। यही कारण है कि बिहार में सबसे अधिक किसानों के आंदोलन खड़े हुए। स्वामी सहजानंद सरस्वती, राहुल सांकृत्यायन, कार्यानंद शर्मा जैसे लोगों ने किसान आंदोलन चलाए। भूमिहीन एवं गरीब किसानों को अपनी शक्ति बनाया। बावजूद इसके यह समस्या खत्म नहीं हुई। आज एक ओर नक्सली खड़े हैं तो दूसरी रणवीर सेना खड़ी है। आखिर यह कौन पूछेगा कि जब 1952 में जमींदारी खत्म कर दी गई तो उसका अस्तित्व क्यों और कैसे बचा हुआ है?
   सत्तर और अस्सी के दशक में जब जमीन की कीमतों के भाव बढने लगे तो गांव भी इससे अछूता नहीं रह सके। गांव में जमीनों को लेकर संघर्ष की नई इबारतें लिखी जाने लगीं। इन संघर्षों को दबाने के लिए सरकारी और गैरसरकारी प्रयास भी खूब हुए, लेकिन ये सारे प्रयास व्यर्थ साबित हुए। प्रधान हरिशंकर प्रसाद ने लिखा है कि भूस्वामियों और पुलिस के गठजोड़ ने निर्ममता से हमला बोला और यह सुनिश्चित किया कि इन हमलों की खबर बुर्जुआ अखबारों तक नहीं पहुंचे। लेकिन कुछ घटनाएं इतनी जघन्य थीं कि वे दबाई नहीं जा सकीं। इन घटनाओं ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। खास तौर पर विधानसभा के भूतपूर्व स्पीकर द्वारा 1971 में रूपसपुर-चंदवा में कराए गए जनसंहार और गहलौर तथा चैरी की घटनाओं ने।...श्री प्रसाद ने माना कि यह टकराव गहन होते शोषण और साथ ही उसके तेज होते प्रतिरोध की अभिव्यक्ति थी। (खेतिहर समाजरू प्रधान हरिशंकर प्रसाद, पेज 115)                                                   
  इस तरह बिहार के भूमिहीन किसान या छोटे किसान सामंतों की चंगुल से निकलने के लिए छटपटाने लगे। इसी दौर में नक्सलवादियों का प्रभाव विस्तार पाता है। प्रकाश झा ने इस समस्या का जिस बारीकी से पर्दे पर उकेरा है, वह समस्या को समग्रता में देखने की उनकी परिपक्व दृष्टि का उम्दा उदाहरण साबित होता है।
  श्याम बेनेगल अपने एक साक्षात्कार में बताते हैं कि हिंदी में 1970 के आस पास नए सिनेमा का दौर शुरू हुआ था और उस सिनेमा ने कई मायनों में एक आर्टिकुलेट मध्यम वर्ग, जो बहुसंख्यक नहीं बल्कि अल्पसंख्यक था, की रुचि को दर्शाया, उसकी जो सामाजिक चिंताएं थीं, वो फिल्मों में प्रतिबिंबित होने लगीं। अब उस मध्यम वर्ग की चिंताएं, उसके सरोकार ही बदल गए हैं। इसीलिए इस किस्म की फिल्मों को कोई देखने नहीं आता है। हालांकि वह यह भी जोड़ते हैं कि अब भी सामाजिक सरोकारों की फिल्में बनती हैं, लेकिन वो सामाजिक सरोकार ही बदल गए हैं। दूसरी बात यह है कि पहले ग्रामीण भारत में हम लोग बहुसंख्यक थे यानी ज्यादा ग्रामीण क्षेत्रों में कमाते खाते थे पर अब वह संतुलन भी बदल रहा है। तो स्वाभाविक है कि फिल्म उस बदलते संतुलन को दर्शाएगी।
श्याम बेनेगल अपने इसी साक्षात्कार में मानते हैं कि फिल्म का उद्देश्य सामाजिक बदलाव नहीं है, लेकिन वह आईना जरूरत बताते हैं। जैसा ऊपर उन्होंने कहा है। यह कहने में संकोच नहीं कि फिल्म भले समाज को बदलने का दंभ न भरे, लेकिन वह समाज का आईना बनती है और वह एक सीमा तक समाज को प्रभावित भी करती है। इधर की तमाम आतंक पर बनी फिल्मों में उस सच को पकडने की कोशिश की गई है। ए वेडनेस्डे, शूट आन साइट, मुुंबई मेरी जान...।
दामुल भी आईना है बिहार का। यह बिहार के सामाजार्थिक स्थितियों का खुलासा करती है। वर्गीय चरित्र को परत दर परत उघाड़ती है। राजनीतिक भ्रष्टाचार से जूझते और जातिवाद का दंश झेलते उन दलितों की असहायता को बिना किसी तर्क और लाग-लपेट के परोसती है, जिसे देखकर हिंदू समाज की उस जड़ता को समझ सकते हैं, जहां आदमी जनावर होने के लिए अभिशप्त है। प्रकाश झा इनसे बचने की कोशिश नहीं करते। समाज में जो घटित हो रहा था, उसे ही वे पर्दे पर पूरे कौशल के साथ उतार देते हैं। यह वही समय था जब केरल के अडूर गोपालकृष्णन मुखामुखम (1984) बनाकर आजादी के बाद कम्युनिस्ट पार्टी के अंतरविरोध, बिखराव और अस्मिता के संकट को दर्शा रहे थे। यही वह समय है जब प्रकाश झा दामुल के जरिए बिहार के खदबदाते समाज की बेचैनी को अपनी कल्पनाशीलता के साथ समझने की कोशिश कर रहे थे। प्रकाश झा की एक खूबी यह है कि वह किसी भी समस्या को समग्रता में देखते हैं। इसी क्रम में देखें तो वे अपने अभिनेताओं का चयन भी बहुत सोच समझकर करते हैं। मनोहर सिंह, अन्नू कपूर, दीप्ति नवल, सीमा मजूमदार, रंजन कामथ, प्यारे मोहन सहाय जैसे मजे हुए कलाकार फिल्म को प्रभावी बनाते हैं। कलाकारों ने जो अभिनय किया है, वह फिल्म को जीवंत बना देता है। उनकी दूसरी खूबी यह है कि वे अपने ऊपर तकनीक को हावी होने नहीं देते। तकनीक को अपने अनुकूल इस्तेमाल करते हैं। उनकी इस विशेषता को भी ओझल नहीं किया जा सकता कि वे फिल्म में बिहार के समाज, संस्कृति, परंपरा सभी कुछ का इस्तेमाल कर बिहार को पर्दे पर जीवंत करने की कोशिश करते हैं। उनकी दृष्टि मुंबइया निर्देशन पद्धति से अलग और अलहदा कही जा सकती है। शायद इसके पीछे उनका बिहारी होना भी हो सकता है। यह भी ध्यान रखना चाहिए कि वे फिल्म निर्माण के क्रम में किसी परंपरा या परिपाटी की लीक पर कभी नहीं चले। कथानक की संवेदना के भीतर से निर्देशन का कौशल फूंटता है। वह कभी कथानक पर निर्देशन के व्यक्तित्व को थोपते नहीं। उनके कथानक में एक केंद्रीय समस्या होती और उससे जुड़े सारे संबंद्ध सूत्रों को वे निर्देशन के क्रम में माला की मोती की भांति पिरो देते हैं। दामुल है तो बंधुआ मजदूर की कहानी, लेकिन कोई बंधुआ मजदूर कैसे बनता है, उसे किन-किन नारकीय परिस्थितियों से गुजरना पड़ता है, न चाहते हुए भी उसे वह काम करना पड़ता है, जो वह नहीं चाहता, वैसे समाजों का वर्गीय चरित्र क्या है, पुलिस-सिपाही-कानून किसके इशारे पर नाचते हैं, ठेकेदारी और राजनीति के क्या अंतर्संबंध हैं, ओवसियर बाबू कैसे ठेका पास करते हैं, मजूदरों का शोषण कैसे होता है...ऐसे तमाम बिंदु हैं, जिसे प्रकाश झा अपनी अंतर्दृष्टि से देखते हैं, उकेरते हैं। ब्राह्मण और राजपूत के आपसी वर्चस्व में हरिजन और दलित कैसे पिसते हैं, यह प्रकाश झा की आंख देखती है। सोचना पड़ता है कि जिस प्रदेश में जगजीवन राम और कर्पूरी ठाकुर जैसे हरिजन-दलित राजनेता राजनीति के सर्वोच्च शिखर पर विराजते हैं, उस प्रदेश में उस समय तक कोई राजनीतिक जागरूकता पैदा क्यों नहीं हो सकी।                
सन 1990 के बाद मंडल आंदोलन के बाद ्रपिछड़ों के साथ दलितों में भी राजनीतिक चेतना विकसित हुई। पास का पड़ोस यानी उत्तर प्रदेश इस मामले में आगे रहा। कांशीराम ने उप्र में दलितों के भीतर राजनीतिक चेतना का प्रचार जरूर किया और वे अपने मताधिकार को लेकर बेहद जागरूक हुए। उनकी आर्थिक स्थिति में भले कोई क्रांतिकारी बदलाव के लक्षण न दिखते हों, राजनीतिक रूप में उनमें विलक्षण जागरूकता पैदा हुई है। कभी तिलक, तराजू और तलवार को जूते मारने वाली उनकी पार्टी अब तिलक के साथ सत्ता का सुख भोग रही है। सत्ता का अपना गणित होता है। वह अपने ढंग से आदमी को ढाल लेती है। मायावती भी अब ढल गई हैं। उनका दलित एजेंडा पीछे छूट गया है। पर, दामुल में दलितों के भीतर इतनी जागरूकता नहीं आई थी कि वे अपने शोषण का प्रतिकार कर सकते। बच्चा सिंह की खुन्नस यह है कि परधानी में माधो पाड़े ही जीतते आ रहे हैं। उन्हें हराने के लिए वे एक चाल चलते हैं और हरिजन टोले के गोकुल को चुनाव में खड़ा कर देते हैं। बच्चा सिंह हरिजन टोले में जाकर माधो पाड़े का कच्चा चिऋा खोलते हैं। कहते हैं छुआछूत, भेदभाव इ बाभन लोग का बनाया हुआ है। बच्चा सिंह अपनी चाल में सफल तो हो जाते हैं, लेकिन गोकुल चुनाव नहीं जीत पाता, क्योंकि बच्चा सिंह को छोडकर सभी राजपूत टोले के लोग अपने मत का प्रयोग करने नहीं जाते। बच्चा सिंह का तर्क भी कि, खड़ा किए हम, जिताएंगे हम तो राज कौन करेगा, चमार? कोई असर नहीं करता। उधर, बोगस वोट के जरिए माधो पाड़े चुनाव जीत जाते हैं। बाहर के गुंडों को बुलाकर हरिजनों को उन्हीं के एक अहाते में बंधक बना देने वाले माधो पाड़े अपनी चाल में सफल हो जाते हैं। पर, लंबे समय से चुनाव जितने की  तैयारी कर रहे बच्चा सिंह अपने ही लोगों से हार जाते हैं। मेले में उनका हरिजनों के साथ उठना-बैठना, उनकी बस्तियों में आना-जाना, उनके साथ अपनापन पैदा करना सब कुछ बेकार चला जाता है। गांव की परतदार राजनीति में जातियां कैसे मोहरा बनती हैं, यह छिपा नहीं रहता। कहना न होगा कि जाति की राजनीति से छोटी पंचायत से लेकर बड़ी पंचायत तक आज भी मुक्त नहीं हो सकी है।
  गोकुल की वह आशंका भी सच साबित होती है कि इस चुनाव में बहुत खून खराबा होगा। उनका तो कुछ नहीं बिगड़ता। लेकिन हरिजन टोला मातमी माहौल में बदल जाता है। इस फिल्म में इतना सब कुछ होने के बावजूद भी हरिजन टोले में जमींदारों के प्रति कोई आक्रोश पैदा नहीं होता। माधो पाड़े ऐसा कोई कुकर्म नहीं, जो नहीं करते। महत्माइन (जो जवानी में ही विधवा बन जाती हैं) की जर-जमीन ही नहीं उसकी देह को भी नोचता है। जब माधो पाड़े के भाई राधो पाड़े के लोग हरिजन बस्ती में इस बात के लिए आग लगा देते हैं कि मजदूर पंजाब जा रहे थे कमाने के लिए। आग लगने और दर्जनों की हत्या करने के बाद माधो पाड़े बच्चा सिंह से मिलते हैं और गिला-शिकवा दूर कर साथ देने की बात करते हैं। बच्चा सिंह माधो पाड़े से मिल जाते हैं। इसके बाद तो फिर पुलिस, नेता, कानून हरिजनों के दर्द को कैसे समझते? लेकिन जब यही महत्माइन माधो पाड़े के खिलाफ उठ खड़ा होती हैं तो माधो पाड़े रात में उनकी हत्या करा देता है और संजीवना को उसकी हत्या में फंसा देता है। यह संजीवना उनका बंधुआ है। उनके लिए, अपने बाप का कर्ज चुकाने की एवज में गाय-बैल चोरी करने के लिए विवश होता है। सादे कागज पर अंगूठा लगवाया जाता है। उसके सामने कोई विकल्प नहीं बचता। उसकी भलमनसाहत कि बाप का कर्ज हम नहीं चुकाएंगे तो कौन चुकाएगा? पता नहीं बाप ने कर्ज लिया भी था या नहीं। लेकिन माधो पाड़े का बही-खाता तो यही बोलता है।
   कानून तो उनके लिए है जो ताकतवर हैं।  संजीवना तो बंधुआ था। जिस जाल में माधो संजीवना को फंसा देते हैं वह उसके लिए दामुल साबित होता है। उसे महत्माइन की हत्या में फांसी हो जाती है। माधो एक तीर से दो शिकार करते हैं। गरीब आदमी कैसे अपना केस लड़ सकता है। लड़ भी जाए तो कैसे वह जीत सकता है। सभी तो उसी जात और जमात के लोग हैं। 
  प्रकाश झा ने कानून की नब्ज को पकडने की कोशिश की है। न्यायपालिका पर अब भी लोगों का भरोसा है, लेकिन इसी न्यायपालिका पर गरीबों की आस क्यों नहीं जगती। इस पर हमारी न्यायपालिका बहुत संजीदा नहीं है। बड़े लोग कानून की मार से बच निकलते हैं। अपवाद ही होता है कि कोई रसूख वाला सजा का हकदार हो जाए। सवाल है, क्या कानून सचमुच अंधा होता है? आखिर, उसकी आंख की पट्टी कब खुलेगी? 
  प्रकाश झा दामुल से लेकर अपहरण की यात्रा को बिहार की राजनीतिक यात्रा के बतौर देखते हैं। वह कहते हैं कि मेेरी फिल्में समाज के वर्तमान बदलते परिदृश्य और उभरते समीकरण को रेखांकित करती हैं। दामुल से लेकर मृत्युदंड, गंगाजल से लेकर अपरहण तक बिहार के तीन दशकों की राजनीतिक यात्रा को दर्शाती हैं। प्रकाश झा इन फिल्मों को किसी खास श्रेणी में रखने की अपेक्षा नहीं करते। उनकी फिल्मों को किसी खांचें में नहीं रखा जा सकता है। क्योंकि उनकी कोई भी फिल्म भले की किसी खास विषय पर केंद्रित हो, लेकिन वह अपनी पूरी समग्रता में रूपायित होती है। यह प्रकाश झा की विशेषता है। दामुल के बारे में उनके शब्द हैं, दामुल फिल्म इसलिए बन पाई कि मैं मूलतरू गांव का हूं और गांव की सामाजिक व्यवस्था और उसके पीछे की राजनीति को समझ सकता हूं। गांव की यह समझ ही गांव को उसकी समग्रता में पर्दे पर उतार पाने में प्रकाश झा सक्षम होते हैं। गांव में हाट-बाजार के दृश्य, संजीवना का पहनावा, हरिजन टोले की बस्ती और उनके लोगों का रहन-सहन, खेत-खलिहान, बोली-बानी इतना सजीव को उठता है तो यह उनकी गंवई मन मिजाज के कारण। लोकेशन, संवाद अदायगी, ग्रामीण समाज की जो झलक फिल्म में देखने को मिलती हैं, कहीं से बनावटीपन का अहसास नहीं होता। संपादन कला में निष्णात प्रकाश झा की यह फिल्म बहुस्तरीयता को व्याख्यायित करती है और कथानक चमत्कारिक ढंग से आगे बढ़ता है। गीत के नाम पर महज दो गाने और वह भी पारंपरिक। एक लौंडा नाच दूसरा कीर्तन। और ये गीत भी कथानक को आगे बढ़ाते हैं। संवाद भी आंचलिकता की महक से गमक उठते हैं-
-हमरा इज्जत डौन करना चाहता है।
-यहां बाभन लोग सबका खून चूस लेगा।
-तो का इन सालों से मीठा-मीठा बात करते।
-महत्माइन बहुत उड़ रही हैं मालिक।
-हमरा बात सुनेगा तो जिनगी भर कौनो तकलीफ नहीं होगी। बाप की जिम्मेदारी संभाल ले।
   गौर करने की बात यह है कि जो हरिजन बस्ती जमींदारों के शोषण-उत्पीडन के खिलाफ उठ खड़ा नहीं होता, उस समाज की एक औरत प्रतिकार करती है। जब माधो पाड़े ठंड की रात में अपने गुर्गों के साथ अलाव ताप रहे थे, रजुली (संजीवना की पत्नी)गंड़ासा लेकर आती है और सीधे माधो पाड़े के गले पर प्रहार कर देती है। माधो कुर्सी से गिर कर छटपटाने लगता है और अंततरू दम तोड़ देता है। रजुली को लोग पकड़ लेते हैं, रजुली तीव्र आक्रोश में फूट पड़ती है...तू मुखिवा को मारकर दामुल पर काहे नहीं चढ़ा रे...।
 प्रकाश झा अपनी इस फिल्म में, जिसने कई अवार्र्ड जीते, ऐसा प्रयोग नहीं करते, जिससे लगे कि यह फिल्म में अनावश्यक और अप्रासंगिक है। वे सिनेमा की औपचारिक युक्तियों के साथ गांव के वृत्तांत को जिस ढंग से खोलते हैं, उसे सिनेमाई अभिव्यक्ति में एक मिसाल कही जा सकती हैै। संपादन, कैमरे का कोण, सूर्य के उदय और अस्त होते बिंबों के जरिए अपनी बात कहने की कला फिल्म को पूर्णता और सार्थकता प्रदान करते हैं। वे सीमाओं को तोड़ते भी हंैं, गढ़ते भी हैं। ऐसा इसलिए संभव हो पाया कि वे सीखने में विश्वास करते हैं। घूमना और समझना और उस समझ को पर्दे पर उतारना यही उनका शगल है। दामुल देखकर ऐसा महसूस किया जा सकता है।