गुरुवार, 28 जून 2018

हम न मरब मरिहैं संसारा

डॉ शुकदेव सिंह
डॉ शुकदेव सिंह

हिंदी जाति या भारत अपनी निजंधर कथाओं में महापुरुषों के जीवन प्रत्यय कुछ शुभंकर तिथियों का नियोजन करते हैं-पूर्णिमा, एकाक्षी, मंगल योग अथवा किसी भी महापुरुष को अयोनिज अर्थात स्त्री के मुख्य शरीर के अलावे कहीं अन्यत्र से पैदा होने की बात। गणेश, कृष्णानंद, चतुरानन, दशानन इत्यादि इसी प्रसंग से जुड़े हैं। इसी तरह से बुद्ध, कबीर और अन्य महापुरुष किसी विशेष तिथि को, किसी शाप या पुण्य या स्वप्न फल के रूप में ही इनके उत्पन्न होने की बात कही जाती है। इसी कल्पना कल्प या जाति वृत्ति से कबीर का जन्म-मरण भी जोड़ दिया गया है। वे न आकाश से उतरे, न कमल पत्र पर प्रकट हुए न विधवा ब्राह्मणी की संतान थे। उनके समकालीन सेननाई ने उनके जीवन काल में ही रैदास से यह स्पष्ट रूप से कहलाया-उनकी मां तुर्क थीं और पिता जुलाहा, कोरी अर्थात चमार थे। तुर्क लड़की से किसी छोटी जाति के वर का विवाह समाज के द्वारा स्वीकृत नहीं है। इसीलिए कबीर का जन्म विवाद में पड़ा और पंथ तथा कुपंथ के लोगों को उनकी जन्मकथा को गढऩे का अवसर मिल गया। तुर्क लड़की से तातार तक विवाह करने से घबराते थे। जुलाहा कोरी की क्या बिसात? प्रेमचंद की कहानी 'दिल की रानीÓ में तुर्क और तातार प्रेम के भय-संशय देखा जा सकता है और समझा जा सकता है कि क्यों कबीर का जन्म इस तरह की गढंत से जुड़ा। कबीर मुसलमान थे, सूफी थे, संत थे और साहसी कवि थे।

वे अशिक्षित नहीं, विद्वान, तपस्वी और आध्यात्मिक थे

कबीर की शिक्षा को लेकर प्राय: यह कहा जाता है कि वे अनपढ़ थे। मसि कागद छुयो नहीं कलम गह्यो नहीं हाथ, चारिउ जुग को महातम मुख ही जनाहि बात। इस साखी के आधार पर बात चल गई तो चल गई कि कबीर अनपढ़ थे। कबीर काशी के नागरिक थे। वेदांत, तर्कशास्त्र, वैराग्य, विद्या, जोगी, चिंतन, अघोरशास्त्र, तंत्र, ज्योतिष, तसव्वुफ और मलामत साधनाओं के वे बहुत बड़े पंडित थे। उन्होंने सांसारिक विषयों को-चारिउ जुग को महातम-मौखिक रूप से कहा, और अध्यात्म से संबंधित कविताओं को मलामत साधनाओं की गूढ़ प्रक्रिया के भीतर इलहाम और अनहद की भूमिका में जाकर लिखा। यह तनु जारिउ मसि करौ-लिखौ राम को नाऊं, लेखनि करौं करंक की, लिखि लिखि राम पढ़ांउं। स्पष्ट है कि यह पत्राचार विनय पत्रिका का पूर्वज है। कबीर के अनेक निर्वाण पद चिंतन के साथ लेखन से संबंद्ध हैं। सृष्टि विज्ञान संबंध उनकी अनेक रमैनी, रचनाएं, साखियां और सबद शिक्षित लेखन का परिणाम हैं। ''मुसलमानीÓÓ नाम से संग्रहित उनके पद अत्यंत गूढ़ लेखन के फल हैं। वे अशिक्षित नहीं, विद्वान, तपस्वी और आध्यात्मिक थे।




कबीर के पाठ

कबीर के पाठ को लेकर बड़ी बहसें हुई हैं और अनर्गल बातें कही गई हैं। पाठ संपादन में हस्तलेखों और शब्दों के औचित्य को लेकर माथापच्ची की गई है, पाठों के बीच संकीर्ण संबंध के 'पोस्टग्रेट शैलीÓ अपनाई गई है, यह सब गलत है। उनकी रचनाएं कबीर पंथ-जिसका काफी दूर तक जोगियाकरण, भगवाकरण या हिंदूकरण हो चुका है-उस पंथ में उनकी रचनाएं की गई हैं-ऐसी रचनाओं का संग्रह बीजक है। इसके भगताही पाठ मुंगरेबनी पाठ, दानापुर पाठ और कई-कई पाठ प्रचलित हैं। पहली दूसरी रमैनी को दो एक करके शब्दों का क्रम बदलकर साखियों के 3 5 3 में घट-बढ़कर के कहरा, चौतिसा जैसे आठ काव्य रूपों को सबद के भीतर डालकर बीजक का या ग्रंथ बनता है। इस तरह से बीजक के पाठकों पर विचार हो सकता है। उनकी संकीर्ण संबंध की खोज की जा सकती है। लेकिन, दादूपंथी पाठ, सिखपंथी गुरुग्रंथ पाठ या अन्य 83 संप्रदायों में कबीर के पाठ की तुलना नहीं हो सकती। पंथों के दबाव के कारण पंक्तियां नीचे-ऊपर होती हैं, घटती हैं, बढ़ती हैं, जुड़ती हैं। जीववाद और ब्रह्मवाद के हिसाब से उलट-पलट होती है-यह पूरी प्रक्रिया सामुदायिक है, इसलिए एक पद के विभिन्न रूपों को देखते समय शब्द, भाषा, पंक्ति, अनुलेखन अक्षर का घुमाव, मंगलाचरण, पुष्पिका का विचार गौण रूप से होना चाहिए, मुख्य रूप से नहीं। सामुदायिक पाठों को समझने के लिए विज्ञान योग या कबीर विद्या संबंधी गोष्ठी, सागर, तिलक, बोध, पंचग्रंथी, सरोदय, प्राण संकली इत्यादि का गहन अध्ययन आवश्यक है। अन्यथा समुदाय के भीतर साधे हुए पाठ से खेलना खेलवाड़ ही है। जैसाकि पारसनाथ तिवारी, ज्वाला कैबर्ट जैसे अनेक पाठ विचारकों ने किया है-उन्हें कबीर के पाठ के बारे में कुछ नहीं मालमू। इसी तरह नामवर सिंह और रामस्वरूप चतुर्वेदी जैसे शिशु, बबुआ कबीर विद्या के विद्यार्थियों पर भी दया करनी चाहिए। ये छपी हुई किताबें पढ़कर बोलने वाले 'हिंदीवालाÓ हैं। हस्तलेखों, संप्रदायों और एक अक्षर के बदलने, तोडऩे-मरोडऩे, तत्सम से तद्भव करने की जटिलता के विषय में ये 'बबुआÓ कुछ नहीं जानते। कबीर के लिखित पाठ कबीर पंथ, दादू पंथ, सिख पंथ और परिवर्तन व्यास से बावरी पंथ, दरिया पंथ, प्रणामी, सतनामी, अप्पा पंथ, वामनदास पंथ-जैसे अनेक पंथों में अनेक ढंग से अलग होते हैं। इसी तरह कबीर के पहले मठ भगताही मठ, खेमसा, दरभंगा के कारण खेमसरी पाठ, मैथिली भाषा में, मालवीय देवास पाठ मध्यप्रदेश में, राजस्थानी पाठ हस्तलेखों के साथ खान विरासी, निर्गुण गायकों में और तथाकथित अध्ययनपतियों से संबंधित पुरबिया पाठ, धोबी, मुसहर, चमार, कहार, जोगी, मंगता, कावरिया-अनेक निर्गुनियां कलाजीवी पूर्वाश्रम में साधु और बाद गृहस्थों में पाए जाते हैं। इन पाठों में कबीर के मूलवचन में राग, रंग के कारण भी अनेक अंतर आते हैं। गायक निर्गुनियां (तानसेन और वक्षुनायक की परंपरा) में भैरो ठाठ, विहागराग, अनेक रागिनियां और रागपुत्रों के भीतर सुर और तान संप्रेषण और रुझान के कारण भी पाठ अंतर होते हैं। देवास के कुमार गंधर्व और महाराष्ट्र के ओंकारनाथ ठाकुर इन्हीं लोक रंगों को शास्त्रीय रूप देने वाले थे। कबीर के पाठ को मठ से लेकर भिक्षाजीवी तथा शास्त्रीय संगी और रंडी गायकों की परंपरा में अलग-अलग ढंग से देखना होगा। मानना होगा कि-सोना, सज्जन साधु जन, टूट जुटेहि सतबार-कबीर की कविता सोना है-जो सौ बार टूटती है और जुटती है। वह दुर्जन कंग कुमार का, धागा दरार नहीं है-कि माता प्रसाद गुप्त, पारसनाथ तिवारी, नामवर सिंह या रामस्वरूप चतुर्वेदी जैसे बवने खिलवाड़ करें।

कबीर के गुरु रामानंद नहीं

कबीर के गुरु रामानंद नहीं थे। लेकिन कबीर के जाने के बाद ही गुरुमत परंपरा के धर्ममत के समानांतर इतना व्यापक प्रचार हुआ कि कबीर की तीसरी पीढ़ी में अनंत दास वैष्णव ने जब संवत 1645 में परिचइयां लिखीं, तो यह 60-70 वर्ष पहले से स्थापित था कि रामानंद के शिष्य मंडल में थे। वामादास, प्रियादास, राघवदास जैसे जीवनी लेखकों ने विश्वासपूर्वक उसका अनुमोदन किया और हिंदू रुझान के कबीर पंथियों ने इसे प्रमाणपूर्वक मान लिया। लेकिन गरीब दास के पथ में और धर्मदास की बनिया सूरी शाखा में इसे मान्यता नहीं मिली। कबीर वस्तुत: स्वयं जगतगुरु परंपरा के विरोध में सद्गुरु परंपरा के उन्नायक थे। शंकराचार्य ने कहा है-ब्रह्म सत्यं, जगत मिथ्या-लेकिन शंकराचार्य की गद्दियों पर जगतगुरु यानी मिथ्यागुरु बैठे हैं। इसके विरोध में कबीर ने सतगुरु-संतों भक्ति सतोगुर आनी-की नींव डाली और सतगुरु, सतनाम, सद्धाम, सतलोक, सत्यनारायण और सतश्री अकाल-तथा सतनामी समुदाय और जगतगुरु अर्थात मिथ्या पाखंड परंपरा के विरोध में सच्चाई की संस्कृति का विकास है। फिर जगतगुरु, सतगुरु और शिवगुरु जैसी गुरु गोठियां तंत्र, मंत्र, दीक्षा, साधना, रति, और भोग से संबंध हो गई। कबीर सतगुरु परंपरा के उन्नायक हैं। और तुलसी शिव परंपरा के अनुयायी-श्रीगुरु चरन सरोज राज, निजमन मुकुर सुधार-में शिव तत्व को देखा जा सकता है। कबीर के कारण ही गुरु वाणी, गुरुपद पर आसीन है। गुरुग्रंथ के बाद कोई गुरु नहीं, सिखपंथ में, बीजक के बाद कोई सद्गुरु नहीं कबीर पंथ में। 'राम जहाजÓ के बाद कोई गुरु नहीं बावरी पंथ में। कलजन स्वरूप के बाद कोई गुरु नहीं प्रणामी पंथ में। पांजी पंथ प्रकाश के बाद कोई गुरु नहीं, वचन वंश में। इस तरह कबीर के कारण महान गुरुओं की वाणी ही गुरुपदों पर आसीन हो गई। गुरु समाप्त हुए और उनकी जगह पर गद्दी, आसन, चंवर, पीठ पर बैठने वाले महंत और आचार्य आने लगे। गुरु परंपरा के निधन के कारण ही महंथों और संपत्ति बटोरों का विकास हुआ।

 सदेह मुक्त हुए कबीर

कबीर मरे नहीं, सदेह मुक्त हुए, उनकी शव की जगह फूल मिले। रौजा भी बना और समाधि भी बनीं। रीवां के वीर सिंह बघेल और गाजीपुर के बिजली खां ने रौजा और समाधि को एक कबीर में नहीं, दो जगह बांटकर स्थापित किया। यह श्रद्धा की लीला है-रामलीला और कृष्णलीला की तरह। कबीर और रैदास दोनों सदेह मुक्त हुए अर्थात उन्हें खास से गायब  किया गया। वास्तव में जैसे सबकी मृत्यु होती है, वैसे ही इन संतों की भी मृत्यु हुई थी। और, कबीर को खास तरह से बांटा गया था। लेकिन 50 वर्षों के निरंतर अनुसंधान के बाद मेरा मत है-मगहर के कबीर का रौजा या मजार पहले बना था और वहीं उनके पुत्र कमाल का भी मजार बना। हिंदू रुझान के कबीर पंथियों ने भी समानांतर समाधि बनाई। कबीर से जुड़ा हुआ पहला मठ पिथौराबाद-खेमसर, तीसरी जगन्नाथपुरी चौथा मगहर में बना। इनके समय के बारे में 10-15 वर्ष का आगा-पीछा हो सकताहै। समय के विवाद में मैं नहीं पडऩा चाहता। कबीर चौरा मठ 1801 ईस्वी में स्थापित हुआ। यद्यपि मैंने ही अपनी पुस्तक कबीर के स्मरण तीर्थ में-कबीर चौरा मठ को मगहर मठ से जोड़कर सूरत गोपाल को निर्माता लिखा है, लेकिन सूरत गोपाल की समाधि तो पूरी में है। मेरे गुरु पं हजारी प्रसाद द्विवेदी कहा करते थे कि कबीर चौरा 16 वें गुरु के जमाने में स्थापित हुआ तो मुझे विस्मय होता था लेकिन बे्रस्टकाट ने यह सबूत दिया है कि रामनगर के काशीनरेश बलवंत सिंह और उनकी पत्नी के निर्देश पर बाद में सन् 1801 में कबीर चौरा वाली भूमि-मगहर के मठवासियों या नीरू टोला के वैरागियों को उपलब्ध कराई गई। कबीर मगहर में ही मरे-मगह मरे न मरे नहीं पावै-सो कबीर को मगहर में मरण नहीं मिला, वे जीवित हैं और आदमी-आदमी के फर्क की हद जब तक बनी रहेगी, तब तक मगह मरे न मरन नहीं पावै।

करीब 20 साल पहले डाॅ शुकदेव सिंह से बातचीत की थी। कबीर के बारे में उन्‍होंने कई नई जानकारियां साझा की थीं। वे कबीर के अध्‍येता नहीं, कबीर काे वे जीते थे। उनका अध्‍ययन विशाल था। यह बातचीत उनके घर कबीर विवेक पर ही हुई थी।
    

रांची की नजर में गांधी

मैं रांची हूं। झारखंड की राजधानी। जब बिहार था, तब भी मुझे ग्रीष्मकालीन राजधानी का ओहदा मिला था। यहां की आबोहवा को देखकर ही अंग्रेजों ...