सोमवार, 9 जुलाई 2018

मेरी पहली रचना


प्रेमचंद
उस समय मेरी उम्र कोई 13 साल की रही होगी। हिन्दी बिलकुल न जानता था। उर्दू के उपन्यास पढऩे का उन्माद था। मौलाना शरार, पं रतननाथ सरशार, मिर्जा रूसवा, मौलवी मुहम्मद अली हरदेई-निवासी उस वक्त के सर्वप्रिय उपन्यासकार थे। इनकी रचनाएं जहां मिल जाती थीं, स्कूल की याद भूल जाती थी और पुस्तक समाप्त करके ही दम लेता था। उस जमाने में रेनाल्ड के उपन्यासों की धूम थी। उर्दू में उनके अनुवाद धड़ाधड़ निकल रहे थे और हाथों हाथ बिकते थे। मैं भी उनका आशिक था। स्व. हजरत रियाज ने, जो उर्दू के प्रसिद्ध कवि हैं और जिनका हाल में देहान्त हुआ है, रेनाल्ड की एक रचना का अनुवाद 'हरम सराÓ के नाम से किया था। उसी जमाने में लखनऊ के साप्ताहिक 'अवधपंचÓ के संपादक स्व. मौलाना सज्जाद हुसेन ने, जो हास्यरस के अमर कलाकार हैं, रेनाल्ड के दूसरे उपन्यास का अनुवाद धोखा या तिलस्मी फानूस के नाम से किया था। ये सारी पुस्तकें मैंने उसी जमाने में पढ़ी और पं रतननाथ सरशार से तो मेरी तृप्ति ही न होती थी। उनकी सारी रचनाएं मैंने पढ़ डाली। उन दिनों मेरे पिता जी गोरखपुर में रहते थे और मैं भी गोरखपुर ही के मिशन स्कूल में आठवें में पढ़ता था, तो तीसरा दरजा कहलाता था। रेती पर एक बुकसेलर बुद्धि लाल नाम का रहता था। मैं उसकी दुकान पर जा बैठता था और उसके स्टाक से उपन्यास ले लेकर पढ़ता था, मगर दूकान पर सारे दिन तो बैठ न सकता था। इसलिये मैं उसकी दूकान से अंग्रेजी पुस्तकों की कुजिंयां और नोट्स लेकर अपने स्कूल के लड़कों के हाथ बेचा करता था और इसके मुआवजे में दूकान से उपन्यास घर लाकर पढ़ता था। दो-तीन वर्षों में मैंने सैकड़ों ही उपन्यास पढ़ डाले होंगे। जब उपन्यासों का स्टाक खतम हो गया, तो मैंने नवल किशोर प्रेस से निकले हुए पुराणों के उर्दू अनुवाद भी पढ़े, और तिलस्मी होशरूबा के कई भाग भी पढ़े। इस वृहद् तिलस्मी ग्रंथ के 17 भाग उस समय निकल चुके थे और एक-एक भाग बड़े सुपर रायल के आकार के दो-दो हजार पृष्ठों से कम न होगा। और इन 17 भागों के उपरान्त उसी पुस्तक के अलग-अलग प्रसंगों पर पच्चीसों भाग छप चुके थे। इन में से भी मैंने कई पढ़े। जिसने इतने बड़े ग्रंथ की रचना की, उनकी कल्पना-शक्ति कितनी प्रबल होगी, इसका केवल अनुमान किया जा सकता है। कहते हैं, ये कथाएं मौलाना फैजी ने अकबर के विनोदार्थ फारसी में लिखी थीं। इसमें कितना सत्य है, कह नहीं सकता, लेकिन इतनी वृहद कथा शायद ही संसार की किसी भाषा में हो। पूरी एन्साइक्लोपीडिया समझ लीजिए। एक आदमी तो अपने 60 वर्ष के जीवन में उनकी नकल भी करना चाहे तो नहीं कर सकता, रचना तो दूसरी बात है।
 
उसी जमाने में मेरे एक नाते के मामू कभी कभी हमारे यहां आया करते थे। अधेड़ हो गये थे, लेकिन अभी तक बिन ब्याहे थे। पास में थोड़ी जमीन थी, मकान था, लेकिन घरनी के बिना सब कुछ सूना था। इसीलिए घर पर जी न लगता था। नातेदारियों में घूमा करते थे और सब से यही आशा रखते थे कि कोई उनका ब्याह करा दे। इसके लिये सौ दो सौ खर्च करने को भी तैयार थे। क्यों उनका ब्याह न हुआ, यह आश्चर्य था। अच्छे खासे हृष्ट-पुष्ट आदमी थे, बड़ी-बड़ी मूंछे, औसत कद, सांवला रंग। गांजा पीते थे, इससे आंखें लाल रहती थीं। अपने ढंग के धर्मनिष्ठ थे। शिव जी को रोजाना जल चढ़ाते थे और मांस-मछली नहीं खाते थे।

 
आखिर एक बार उन्होंने वही किया, जो बिन ब्याहे लोग अकसर किया करते हैं। एक चमारिन के नयन बाणों से घायल हो गये। वह उन के यहां गोबर पाथने, बैलों को सानी पानी और इसी तरह के फुटकल कामों के लिये नौकर थी। जवान भी थी, छबीली थी और अपने वर्ग की अन्य रमणियों की भांति प्रसन्नमुख और विनोदिनी थी। 'एक समय सखि सूअर सुन्दरÓ वाली बात थी। मामू साहब का तृषित हृदय मीठे जल की धारा देखते ही फिसल पड़ा। बातों-बातों में उससे छेड़छाड़ करने लगे। वह इनके मन का भाव ताड़ गई। ऐसी अल्हड़ न थी। और नखरे करने लगी, केशों में तेल भी पडऩे लगा, चाहे सरसों का ही क्यों न हो, आंखों में काजल भी चमका, ओठों पर मिस्सी भी आई और काम में ढिलाई भी शुरू हुई। कभी दोपहर को आई और  झलक दिखा कर चली गई, कभी सांझ को आई और एक तीर चलाकर चली गई। बैलों को सानी-पानी मामू साहब खुद दे देते, गोबर दूसरे उठा ले जाते, युवती से बिगड़ते क्यों कर्र वहां तो अब प्रेम का उदय हो गया था। होली में प्रथानुसार एक साड़ी दी, मगर अब की गाजी की साड़ी न थी, खूब सुन्दर सी सवा दो रुपये की चुंदरी थी। होली की त्योहारी भी मामूली से चौगुनी दी। और यह सिलसिला यहां तक बढ़ा कि वह चमारिन ही घर की मालकिन हो गई। एक दिन संध्या-समय चमारों ने आपस में पंचायत की। बड़े आदमी हैं तो हुआ करें, क्या किसी की इज्जत लेंगे? एक इन लाला के बाप थे कि भी किसी मेहरिया की ओर आंख उठा कर न देखा, (हालांकि यह सरासर गलत था) और एक यह है कि नीच जात की बहू-बेटियों पर भी डोरे डालते हैंसमझाने बुझाने का मौका न था। समझाने से लाला मानेंगे तो नहीं, उलटे और कोई मामला खड़ा कर देंगे। इनके कलम घुमाने की तो देर है। इसलिये निश्चय हुआ कि लाला साहब को ऐसा सबक देना चाहिये कि हमेशा के लिए याद हो जाय। इज्जत का बदला खून से ही चुकता है, लेकिन मरम्मत से ही उसकी कुछ पुरौती हो सकती है।

दूसरे दिन शाम को जब चम्पा मामू साहब के घर आई, तो उन्होंने अन्दर का द्वार बन्द कर दिया। महीनों से असमंजस और हिचक और धार्मिक संघर्ष के बाद आज मामू साहब ने अपने प्रेम को व्यावहारिक रूप देने का निश्चय किया था। चाहे कुछ हो जाय, कुल-मरजाद रहे या जाय, बाप दादा का नाम डूबे या उतराये! 
उधर चमारों का जत्था ताक में था ही। इधर किवाड़ बन्द हुए, उधर उन्होंने द्वार खटखटाना शुरू किया। पहले तो मामू साहब ने समझा, कोई आसामी मिलने आया होगा, किवाड़ बन्द पाक लौट जायगा, लेकिन जब आदमियों का शोरगुल सुना तो घबड़ाये। जाकर किवाड़ों के दराज से झांका। कोई बीस पच्चीस चमार लाठियां लिये द्वार रोके खड़े किवाड़ी तो तोडऩे की चेष्टा कर रहे थे। अब करें तो क्या करें। भागने का कहीं रास्ता नहीं, चम्पा को कहीं छिपा नहीं सकते। समझ गये कि शामत आ गई। आशिकी इतनी जल्दी गुल खिलायगी यह क्या जानते थे, नहीं इस चमारिन पर दिल को आने ही क्यों देते। उधर चम्पा उन्हीं को कोस रही थी-तुम्हारा क्या बिगड़ेगा, मेरी तो इज्जत लुट गई। घर वाले मूंड़ ही काट कर छोड़ेंगे। कहती थी, अभी किवाड़ बन्द न करो, हाथ-पांव जोड़ती थी, मगर तुम्हारे सिर पर तो भूत सवार था। लगी मुंह में कालिख कि नहीं?

मामू साहब बेचारे इस कूचे में कभी न आये थे। कोई पक्का खिलाड़ी होता तो सौ उपाय निकाल लेता, लेकिन मामू साहब की तो जैसे सिट्टी-पिट्टी भूल गई। बरौठे में थर थर कांपते 'हनुमान चालीसाÓ का पाठ करते हुए खड़े थे। कुछ न सूझता था।
 
और उधर द्वार पर कोलाहल बढ़ता जा रहा था, यहां तक कि सारा गांव जमा हो गया। ब्राह्मण, ठाकुर, कायस्थ सभी तमाशा देखने और हाथ की खुजली मिटाने के लिये आ पहुंचे। इससे ज्यादा मनोरंजक और स्फूर्तिवद्र्धक तमाशा और क्या होगा कि एक मर्द और एक औरत के साथ घर में बन्द पाया जाय! फिर चाहे कितना ही प्रतिष्ठित और विनम्र क्यों न हो, जनता उसे किसी तरह क्षमा नहीं कर सकती। बढ़ई बुलाया गया, किवाड़ फाड़े गये और मामू साहब भूसे की कोठरी में छिपे हुए मिले। चम्पा आंगन में खड़ी रो रही थी। द्वार खुलते ही भागी। कोई उससे नहीं बोला। मामू साहब भाग कर कहां जाते? वह जानते थे, उनके लिये भागने का रास्ता नहीं है। मार खाने के लिये तैयार बैठे थे। मार पडऩे लगी और बेभाव की पडऩे लगी। जिसके हाथ जो कुछ लगा-जूता, छड़ी, छाता, लात, घूंसा सभी अस्त्र चले। यहां तक कि मामू साहब बेहोश हो गये और लोगों ने उन्हें मुर्दा समझकर छोड़ दिया। अब इतनी दुर्गति के बाद वह बच भी गये, तो गांव में नहीं रह सकते और उनकी जमीन पट्टीदारों के हाथ आएगी।
इस दुर्घटन की खबर उड़ते-उड़ते हमारे यहां भी पहुंची। मैंने भी उसका खूब आनन्द उठाया। पिटते समय उनकी रूपरेखा कैसी रही होगी, इसकी कल्पना करके मुझे खूब हंसी आई।
 
एक महीने तक तो वह हल्दी और गुड़ पीते रहे। ज्योंही चलने-फिरने लायक हुए, हमारे यहां आये। यहां अपने गांव वालों पर डाके से इस्तगासा दायर करना चाहते थे।
अगर उन्होंने कुछ दीनता दिखाई होती, तो शायद मुझे उनसे हमदर्दी हो जाती, लेकिन उनका वही दमखम था। मुझे खेलते या उपन्यास पढ़ते देख कर बिगडऩा और रोब जमाना, और पिताजी से शिकायत करने की धमकी देना, यह अब मैं क्यों सहने लगा था? अब तो मेरे पास उन्हें नीचा दिखाने के लिये काफी मसाला था।
आखिर एक दिन मैने यह सारी दुर्घटना एक नाटक के रूप में लिख डाली और अपने मित्रों को सुनाई। सब-के-सब खूब हंसे। मेरा साहस बढ़ा। मैंने उसे साफ-साफ लिख कर वह कापी मामू साहब के सिरहाने रख दी, और स्कूल चला गया। दिल में कुछ डरता भी था, कुछ खुश भी था, और कुछ घबड़ाया हुआ भी था। सबसे बड़ा कुतूहल यह था कि ड्रामा पढ़कर मामू साहब क्या कहते हैं। स्कूल में जी न लगता था। दिल उधर ही टंगा हुआ था। छुट्टी होते ही घर चला, मगर द्वार के समीप आकर पांव रुक गये। भय हुआ, कहीं मामू साहब मुझे मार न बैठें, लेकिन इतना जानता था कि वह एकाध थप्पड़ से ज्यादा मुझे मार न सकेंगे, क्योंकि मैं मार खाने वाले लड़कों में न था।
मगर यह मामला क्या है। मामू साहब चारपाई पर नहीं हैं, जहां वह नित्य लेटे हुए मिलते थे। क्या घर में चले गये? आकर कमरा देखा। वहां भी सन्नाटा। मामू साहब के जूते, कपड़े, गठरी सब लापता। अन्दर जाकर पूछा। मालूम हुआ मामू साहब किसी जरूरी काम से घर चले गये। भोजन तक नहीं किया।
मैंने बाहर आकर सारा कमरा छान मारा, मगर मेरा ड्रामा-मेरी वह पहली रचना-कहीं न मिली। मालूम नहीं मामू साहब ने उसे चिराग अली के सुपुर्द कर दिया या अपने साथ स्वर्ग ले गये?
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प्रेमचंद की यह रचना साहित्यकारों की आत्मकथा नामक पुस्तक से ली गई है, जिसका संपादन देवव्रत जी ने किया था। देवव्रतजी उस समय नवशक्ति के संपादक थे। यह पुस्तक पटना से ही नवशक्ति प्रेस से 1939 में छपी थी।
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