गुरुवार, 4 अक्तूबर 2018

झारखंड में गांधी

संजय कृष्ण, रांची
अपने जीवन काल में महात्मा गांधी रांची और झारखंड 1917 के चंपारण आंदोलन से लेकर अंतिम बार रामगढ़़ में संपन्न रामगढ़ कांग्रेस में भाग लेने आए थे। इस तरह 1917 से 1940 के बीच करीब चालीस-पचास दिन की अवधि ठहरती है। सबसे पहले उनका आगमन चंपारण आंदोलन के सिलसिले में हुआ था। दो जून 1917 को पटना से रांची आए और तीन को पहुंचे और चार जून को पूर्व कार्यक्रम के तहत बिहार-ओडिशा के लेफ्टिनेंट गर्वनर सर एडवर्ट गेट से आड्रे हाउस में उनका मुलाकात हुई। गांधीजी की यह छोटी अवधि की यात्रा थी। इस यात्रा में उनके बेटे और पत्नी भी शामिल हुईं थी। इसके बाद वे बिहार चले गए। अगले महीने आठ जुलाई को लिखे गए दो पत्र रांची के पते से मिलते हैं। इसके बाद 23 सितंबर, 1917 का पत्र रांची से लिखा मिलता है, जिसे मगनलाल गांधी को लिखा गया था। वह फिर चंपारन समिति की बैठक के सिलसिले में रांची आए थे। 24 सितंबर को चंपारन समिति की बैठक रांची में ही हुई थी। यह बैठक काफी लंबी चली और आंदोलन को लेकर काफी विमर्श हुआ। 25 जुलाई 1917 को गांधी जी ने लीडर अखबार के संपादक के नाम पत्र रांची से ही लिखा। गांधीजी चंपारण आंदोलन के सिलसिले में फिर पूना से 18 सितंबर को चले और 22 को रांची पहुंचे। यहां करीब 24 से 28 तक चंपारण जांच समिति की बैठक में शामिल हुआ। इसके बाद पांच अक्टूबर को वे रांची से पटना चले गए। 25 सितंबर को ही जमनालाल बजाज को भी पत्र लिखा। इसके बाद मगन लाल गांधी को, जिसे जिक्र किया कि बुखार से मुक्त नहीं हुआ हंू। बुखार में भी वे चंपारन समिति की बैठक में भाग लेते रहे। एक पत्र 27 सितंबर को जीए नटेसन को लिखा और उसमें भी अंत में लिखा कि 'मेरे ज्वर के कारण आप चिंतित न हों। वह अपने समय से ही जाएगा। वह यहां अक्टूबर के पहले सप्ताह तक रांची रहे। रांची में गांधीजी के रहने के बारे में चार अक्टूबर 1917 तक का जिक्र मिलता है। चंपारन के इस आंदोलन में रांची भी जुड़ गया और यह एक प्रमुख केंद्र बन गया। गेट ने एक कमीशन बना दी और गांधीजी को इसका मेंबर बनाने के लिए राजी कर लिया। इसके बाद कमीशन का काम बेतिया से शुरू हुआ। एक तरह से चंपारण आंदोलन की नीति, रणनीति और जांच समिति का रांची में ही गठन किया गया। फिर इस आंदोलन की सफलता की कहानी सब जानते हैं। गांधीजी यहां श्रद्धानंद रोड में रहते थे। पर, अब किसी को पता नहीं कि वह कौन सा मकान था। पटना के एक वकील जो गांधीजी के साथ थे, उनका कोई रिश्तेदार यहां थे तो पहली बार वे यहीं रहे। इस दौरान एक उल्लेखनीय बात यह हुई कि उनकी मुलाकात टाना भगतों से हुई। यह आंदोलन 1914 से शुरू हुआ और यहा धार्मिक पाखंड के साथ अंग्रजों के लगान के खिलाफ था और अहिंसक था। गांधी ने आठ जुलाई 1917 को अपनी डायरी में इसका उल्लेख किया है। लिखा है, आज मैंने टाना भगत नामक आदिवासी जमात के लोगों से बात की। ये अहिंसा और सदाचार को मानने वाले हैं।Ó
13 से 18 सितंबर तक चार पहिया से घूमा झारखंड



गांधीजी की दूसरी यात्रा 1925 में शुरू हुई। उन्होंने 1925 में 13 से 18 सितंबर तक  झारखंड की यात्राकी चार पहिया से। इस दौरान वे पुरुलिया, चाईबासा, चक्रधरपुर, खूंटी, रांची, मांडर, हजारीबाग में रहे और इन स्थानों पर आयोजित अनेक बैठकों को संबोधित किया। 17 को उन्होंने रांची के संत पॉल स्कूल के मैदान में तीन बजे सभा को संबोधित किया। उन्होंने चरखा की बात की और लोगों ने एक हजार रुपये की थैली उस सभा में गांधीजी को भेंट की।
अपनी झारखंड यात्रा में अनेक लोगों से भी मिले और कई महत्वपूर्ण संस्थानों को भी देखा था। झारखंड से लौटने के बाद 'यंग इंडियाÓ के आठ अक्टूबर 1925 के अंक में  'छोटानागपुर मेंÓ शीर्षक से उन्होंने दो संक्षिप्त संस्मरण लिखे...सितंबर की यात्रा का जिक्र करते हुए गांधीजी लिखते हैं, छोटानागपुर की अपनी पूरी यात्रा मैंने मोटरकार से की। सभी रास्ते बहुत ही बढिय़ा थे और प्राकृतिक सौंदर्य अत्यंत दिव्य तथा मनोहारी था। चाईबासा से हम चक्रधरपुर गए फिर बीच में खूंटी और एक-दो अन्य स्थानों पर रुकते हुए रांची पहुंचे। हमारे रांची पहुंचने के वक्त ठीक सात बजे शाम को महिलाओं ने एक बैठक का आयोजन रखा था। बैठक में आयोजकों ने मुझसे देशबंधु मेमोरियल फंड के लिए अपील करने की कोई बात नहीं की थी, ऐसा मेरा ख्याल है। फिर भी मैं शायद ही कभी किसी सार्वजनिक सभा या बैठक में इस अपील को रखने से चुका हूं और मैंने नि:संदेह इस बैठक में भी यह अपील की। बैठक में शामिल लोगों में बंगाली बहुसंख्यक थे।

योगदा आश्रम में भी गए गांधीजी
गांधीजी आगे लिखते हैं, 'छोटानागपुर प्रवास के दौरान और भी कई दिलचस्प बातें हुई जिनमें खद्दर पर एन.के. रॉय और उद्योग विभाग के एस.के. राव के साथ हुई चर्चा तो शामिल है ही ब्रह्मचर्य आश्रम (अब योगदा सत्संग आश्रम) का विजिट भी स्मरणीय है, जिसकी स्थापना कासिमबाजार के महराजा की देन है। मोटरगाड़ी से ही हम रांची से हजारीबाग गए, जहां पहले से तयशुदा कार्यक्रमों के अलावा मुझे संत कोलम्बा मिशनरीज कॉलेज, जो बहुत पुराना शिक्षण संस्थान है, के छात्रों को भी संबोधित करने का आमंत्रण मिला। गांधीजी ने वहां भी संबोधित किया और फिर पलामू आदि की भी यात्रा की। अंतिम बार गांधीजी ने रामगढ़ कांग्रेस में आए थे और करीब दस दिनों तक यहां रहे थे। 

मोटरकार से गए रामगढ़
मार्च, 1940 में कांग्रेस का अधिवेशन रांची से 40 किमी दूर रामगढ़ में हुआ। रांची से वे कार से गए। वह कार आज भी सुरक्षित है। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के इस महत्वपूर्ण अधिवेशन में मौलाना अब्दुल कलाम आजाद अध्यक्ष बनाए गए थे। दामोदर नदी के किनारे जंगलों में सैकड़ों पंडाल लगाए गए थे, जिसमें महात्मा गांधी, सरदार वल्लभ भाई पटेल, डॉ श्रीकृष्ण सिंह, डॉ.राजेन्द्र प्रसाद जैसे तमाम नेताओं की भागीदारी हुई थी। इस बार जब वे आए तो  रांची में वे बिरला कोठी, लालपुर में ठहरे थे, जहां अब बीआइटी चलता है। वे रांची से फोर्ड गाड़ी में रामगढ़ पहुंचे थे। रांची के स्वतंत्रता आंदोलन लक्ष्मी नारायण जायसवाल के पास फोर्ड कंपनी की बीआरएफ -50 गाड़ी थी। इस गाड़ी को खुद लक्ष्मी नारायण ड्राइव कर रहे थे। रांची और रामगढ़ इसी गाड़ी से आना जाना होता था। गांधीजी 1940 में एक मार्च 20 मार्च तक रहे। हालांकि वे 12 मार्च की शाम ईसाई मिशनरियों से बातचीत करने के लिए रामगढ़ से चले आए। 14 मार्च को रामगढ़़ में खादी ग्रामोद्योग प्रदर्शनी का उद्घाटन किया। 19 मार्च की सुबह ठक्कर भवन एवं हरिजनों एवं आदिवासियों के लिए भवन का उद्घाटन करने के बाद रामगढ़ चले गए। रामगढ़़ कांग्रेस ऐतिहासिक रहा। खूब आंधी-पानी भी आई। इसके बाद भी सम्मेलन संपन्न हुआ।  

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