सोमवार, 20 जनवरी 2020

लोकसंस्कृति के अध्येता जगदीश त्रिगुणायत

लोक साहित्य के अध्येताओं के लिए जगदीश त्रिगुणायत का नाम अनजाना नहीं होना चाहिए। नाम से भी परिचित होंगे और असाधारण काम से भी। हिंदी-भोजपुरी समाज से वास्ता रखने वाले इस लोक साधक ने एक दूसरे गोत्र की भाषा-संस्कृति के अध्ययन-मनन में अपने जीवन को लगा दिया। उनकी साधना एकनिष्ठ थी। किसी प्राप्य की अपेक्षा नहीं थी। ऐसे साधक को जीते जी ही हमने भुला दिया और जब सात सितंबर, 2010 को अपने जनपद देवरिया (उत्तरप्रदेश) में रहते हुए 87 साल की उम्र में दुनिया से विदा हुए तो हिंदी समाज ने भी कोई नोटिस नहीं ली।
उनका जन्म देवरिया में ही एक मार्च 1923 को हुआ था। महज 18 साल की उम्र में वे झारखंड चले आए। झारखंड में रहते हुए उन्होंने एक बड़ा काम किया। यद्यपि वे आए थे दूसरे काम से। 1941 में महात्मा गांधी और डा. राजेंद्र प्रसाद की प्रेरणा से खादी ग्रामोद्योग के प्रचार-प्रसार के सिलसिले यहां भेजे गए थे। वे अकेले नहीं आए थे, बल्कि उनकी मंडली में पांच आदमी थे- मोती बीए, सदानंद ब्रह्मचारी, कवि शंभुनाथ सिंह और एक उपाध्यायजी और वे खुद। रांची के जगन्नाथपुर के पास तिरिल आश्रम इनका ठिकाना था। आश्रम भी 1929 में ही खुला था। इस ग्रामोद्योग का उद्देश्य आदिवासियों में आजादी के प्रति जागृति, उनका उत्थान, चरखा का प्रचार आदि शामिल था। ये लोग एक साल तक छोटानागपुर के गांवों को घूमते रहे। गांवों की संस्कृति-संस्कार, रहन-सहन, नृत्य-गीत, रीति-रिवाज को देखते-परखते रहे। देखते-परखते कुछ लोगों को झारखंड की आबोहवा भा गई तो वे यहीं के होकर रह गए। पर कुछ अपनी निजी जिम्मेदारियों या अन्य वजहों से यहां से चले गए। उन दिनों की प्रकृति को लेकर शंभुनाथ सिंह ने लिखा है, 'सुबह जब पहाड़ी पर निकलते थे, पूरा रास्ता फूलों की सुगंध से मादक हो जाता था। इतनी स्वच्छता थी कि कोई भी यहां के देहातों में रह सकता है। पेड़-पौधे, आकाश, वायु सभी स्वच्छता की आभा से दमक रहे हैं।Ó शंभुनाथ सिंह एक साल के बाद एमए करने के लिए इलाहाबाद चले गए। इसी तरह और लोग भी यहां से चले गए सिवाय सदानंद ब्रह्मचारी और जगदीश त्रिगुणायतजी के। सदानंद भी दूसरे कामों में लग गए। बच गए त्रिगुणायतजी। इनसे प्रकृति कुछ और काम कराना चाहती थी। आए थे प्रचार-प्रसार करने। यह काम चल रहा था कि इस बीच खूंटी हाई स्कूल बना तो त्रिगुणायतजी उसमें प्राध्यापक हो गए और वहीं छात्रावास में छात्रों के साथ रहने लगे। बहुत दिनों तक वहां अध्यापकी की। जब रांची के एक छोर धुर्वा में 1958 में एचईसी की स्थापना  हुई, त्रिगुणायतजी वहां जनसपंर्क अधिकारी के रूप में पदस्थापित हो गए और यहीं से सन् 1981 में अवकाश लिया। इसके बाद भी 1991 तक रांची में रहे। फिर अपने जनपद देवरिया लौट गए। वहीं हाल में ही सात सितंबर, 2010 को उनका निधन हुआ। त्रिगुणायतजी जब एचइसी में जनसंपर्क अधिकारी थे, तब हर साल कवि सम्मेलन का आयोजन कराते। उस समय के हिंदी के अनेक महत्वपूर्ण कवि भाग लेने रांची आते। इस तरह हिंदी साहित्य में भी एक रांची की पहचान बन रही थी। 
खूंटी में रहते हुए वे मुंडा संस्कृति के संपर्क में आए। यहीं पर मुंडारी गीतों को सुनते हुए उनके संकलन की बात सोची।  फादर हाफमैन यह काम पहले कर चुके थे। दो सौ मुंडारी गीतों का उन्होंने अंग्रेजी अनुवाद किया था। आर्चर ने भी कुछ काम किया। सब अंग्रेजी में। जगदीशजी ने यह काम हिंदी में किया। एक लंबा समय गीतों के अध्ययन में लगाया। मुंडा भाषा सीखा। सभी जानते हैं, मुंडा आस्ट्रिक-परिवार की भाषा है। फिर भी अपने अध्यवसाय से सीखा और मुंडारी गीतों की लय पकड़ी। इसके बाद पुस्तक तैयार हुई तो बिहार ग्रंथ अकादमी ने 'बांसरी बज रहीÓ नाम से इसे छापा। पहले संस्करण की भूमिका शिवपूजन सहाय ने लिखी। फिर कुमार विमल जब अकादमी के निदेशक थे, तब पुस्तक के बारे में एक गंभीर भूमिका लिखी। दूसरा संस्करण 1971 में आया था और पहला 1957 में। निराला और पंत ने अपनी अमूल्य सम्मतियां दी, जिसे दूसरे संस्करण में प्रकाशित किया गया। 527 पेज की पुस्तक में 63 पेज की भूमिका सिर्फ लोकगीत के इतिहास, नृतत्वशास्त्र, परंपरा, मुंडा संस्कृति के बारे में ही पड़ताल नहीं करती, मुंडा समाज के अध्येता रहे फादर हाफमैन और शरतचंद्र राय की लोकगीतों के अंग्रेजी अनुवाद की कमियों के बारे में भी सोदाहरण प्रकाश डालती है। इस तरह यह भूमिका एक मशाल की तरह काम करती है। उनकी यह भूमिका पढऩे के बाद ही कुछ और जानने की इच्छा हुई तो एक सुबह उनके शिष्य पद्मश्री डा. रामदयाल मुंडा से उनके आवास पर मिला। त्रिगुणायतजी के बारे में पूछा तो बड़े भावुक हो गए। कहने लगे, उनका रुझान शुरू से ही आदिवासी जीवन के प्रति रहा। यहां के लोक गीत, लोक नृत्य और लोक कथाओं के बारे में अधिकाधिक जानने का उत्सुक रहते। अपनी जिज्ञासा शांत करने के लिए कभी छात्रावास के बच्चों से पूछते, कभी आस-पास के पुराने लोगों सेे। कभी खुद गांवों में निकल पड़ते और रात उन्हीं लोगों के साथ गुजारते। सात्विक प्रवृत्ति के कारण कभी-कभी गंावों में माड़-भात पर ही गुजारा कर लेते और पुआल पर सोकर रात गुजार लेते। इस तरह खुद भी गीतों का संग्रह करते और छात्रावास के बच्चों को भी एक-एक  गीत लिखकर ले आने को प्रेरित करते। इसी प्रक्रिया के तहत उन्होंने मुंडारी गीतों को संग्रहित किया। अब मुंडाजी भी जीवित नहीं हैं। मुंडाजी ने ही त्रिगुणायतजी का मोबाइल नंबर दिया था। यह वाकया 2007-08 का है। फिर उनसे बातचीत हुई तो त्रिगुणायतजी बताने लगे, 'उनकी (आदिवासियों) सेवा करने का मौका नहीं मिलता तो उनकी संस्कृति को नहीं जान पाते। उनके गीतों के संग्रह के लिए पहले उनके दुख-सुख में शामिल हुआ। उनके जीवन संघर्षों को समझा। उनके साथ आत्मीयता कायम की। उनको समझने का प्रयत्न किया। उन्होंने भी मुझे समझा और मुझपर विश्वास किया। इस तरह उनके साथ एक रिश्ता बना जो विश्वास की डोर से बंधा था।Ó
त्रिगुणायतजी तो हिंदी-भोजपुरी भाषी थे, लेकिन काम किया मुंडा और उरांवों की भाषा पर। वह लिखते हैं, मुंडा भाषा की मौलिक शब्दावली में वन-पर्वत संबंधी वस्तुओं के शब्दों की भरमार है, पशु-पालन, ग्राम व्यवस्था तथा खेती बारी संबंधी मौलिक शब्द इस जाति की मूल संस्कृति पर प्रकाश डालते हैं। धातु के बर्तन, कपास के वस्त्र, वाणिज्य व्यवसाय, कर्ज, महाजन, आदि संबंधी शब्द मुंडा भाषा के अपने नहीं हैं। मुंडारी में इन बातों के लिए आर्य भाषाओं के शब्दों को देखकर पता चलता है कि मुंडाओं की मूल संस्कृति में ये बातें विद्यमान नहीं थीं, किंतु नृत्य, गान, वाद्य, बांसुरी आदि के उनके अपने शब्द हैं। (बांसरी बज रही- पृष्ठ तीन)।  त्रिगुणायत जी ने लिखा है, मुंडाओं की भाषा, छोटानागपुर पहाडिय़ों की संथाल, हो तथा अन्य जातियों द्वारा बोली जाने वाली भाषाओं के साथ भाषाओं के उस परिवार से संबंध रखती हैं जिसे आस्ट्रो-एशियाटिक कहते हैं और जिसमें मान-ख्मेर, वापालंग, निकोवारी, खासी, मलक्का की आदिवासी भाषाएं सम्मिलित हैं। त्रिगुणायतजी लिखते हैं, 'मुंडा छोटानागपुर कब आए, इसका तो पता नहीं, पर यहां आने पर उनकी दो शाखाएं हुईं, जिनमें एक शाखा 'संथालÓ, आधुकि संथाल परगना की ओर बढ़ी और दूसरी शाखा मुंडा रांची की पच्छिमी घाटियों में उतरी। कुछ दिन बाद, जब उरांव, कर्नाटक की ओर से, नर्वदा के तटों पर होते हुए, विन्ध्य की घाटियों से सोन की घाटी में आकर और कुछ दिन बाद रोहतासगढ़ में राज्यकर, किसी राजा द्वारा हटाए जाने पर, रांची के उसी भाग में आए, तब मुंडा पूरब-दक्षिण की ओर सरक गए। रांची के पच्छिमी भाग में, जो आज उरांवों का क्षेत्र बन चुका है, एक दिन मुंडा सभ्यता की खेती लहरा रही थी। उसके छूटे-छटके हुए बीज, वहां की धरती में मौजूद हैं जो पीले धान के खेत में, लाल बालियों की तरह सरलता से पहचान लिए जा सकते हैं।Ó
त्रिगुणायतजी की 'बांसरी बज रहीÓ हिंदी साहित्य के लिए तो और भी महत्वपूर्ण है। उनकी 'मुंडारी लोक कथाएंÓ की भी 94 पेज की भूमिका त्रिगुणायतजी के व्यक्तित्व को ही नहीं खोलती है, बल्कि भारत की आदिम राग-रागिनियां, संस्कृति-संस्कार, प्रवृत्ति-परंपरा, मिलन-बिछोह के न जाने कितने अनछुए कथा-प्रसंग भी खुलती है। त्रिगुणायतजी ने भाषा पर और भी काम किया था। इसके साथ ही वे बांग्ला के भी जानकार थे। शिवपूजन सहाय ने लिखा था कि 'आप (त्रिगुणायतजी)हिंदी के कवि भी हैं, तथा अंगरेजी और बांग्ला की कविताओं का हिंदी पद्यानुवाद भी किया है। 'अरुणोदयÓ और 'छायागानÓ नामक पुस्तकों में मौलिक और अनुदित कविताएं प्रकाशित हैं।Ó त्रिगुणायतजी ने रांची से ही प्रकाशित आदिवासी पत्रिका और देश की दूसरी पत्रिकाओं में भी लेख आदि लिखा करते थे जो आदिवासी और भारतीय संस्कृति से जुड़े होते थे। आज उन्हें खोजने-सहेजने की जरूरत है।


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