गुरुवार, 23 जनवरी 2020

फादर कामिल बुल्के : लौटना 36 साल बाद

 यह लौटना कोई इत्तेफाक नहीं था। दिल्ली जैसे अजनबी शहर से पूरे 36 साल बाद अपनी कर्मभूमि रांची वापसी। उस शहर से, जिससे कोई नाता नहीं, कोई संबंध नहीं, कोई सरोकार नहीं। कोई लगाव और रचाव भी नहीं। नाता यही कि इसी अजनबी शहर में फादर कामिल बुल्के ने 17 अगस्त, 1982 को एम्स में अंतिम सांस ली। ईसाई धर्मबंधुओं ने बुल्के को दिल्ली में ही दफनाने का निर्णय लिया। उनके अंतिम दिनों के साथी फा. पास्कल तोपनो, ये.सं. लिखते हैं, 'एक महत्वपूर्ण निर्णय मुझको लेना था-फादर बुल्के को कहां दफनाया जाए, दिल्ली में या रांची में। रांची की जनता निश्चय ही बुल्के के अंतिम दिन दर्शन के लिए तरसेगी और अंतिम संस्कार में सम्मिलित होना चाहेगी-इसका अनुमान मुझे था। फिर भी मैंने हाल की घटनाओं ने मेरी यह धारणा पक्की कर दी थी कि फादर बुल्के के पार्थिव अवशेष को रांची तक सही सलामत पहुंचा पाना कोई सहज काम नहीं। लालफीताशाही से डरा हुआ था।Ó फादर के ये शब्द पीड़ा से उपजे थे। वह भी नहीं चाहते थे कि उन्हें दिल्ली में दफनाया जाए, लेकिन जिस व्यक्तिको पद्मविभूषण मिला हो, उसके इलाज के लिए भी सरकारी अस्पताल में परेशान होना हो तो आखिर उस अगस्त की गर्मी में वे क्या कर सकते थे? 
आखिरकार, फादर बुल्के को वहीं, उसी बेगाने दिल्ली के हवाले कर दिया गया, लेकिन फादर की आत्मा तो रांची आने के लिए बेचैन थी।
बेशक, 1982 का 17 अगस्त रांची के लिए बहुत भारी साबित हुआ होगा और तब तो और, जब उन्हें पता लगा होगा कि फादर का अंतिम दर्शन भी नहीं कर सकते!  
पर, रांची को एक लंबा इंतजार करना पड़ा। 36 साल। दिल्ली से रांची उनके पवित्र अवशेषों को ले आने में सोसाइटी ऑफ जीसस रांची प्रोविंस के प्रोविंशियल फादर जोसेफ  मरियानुस कुजूर की अहम भूमिका रही। दो सालों से इस अभियान में लगे थे। उनके कारण ही यह संभव हो पाया और फादर अपनी कर्मभूमि लौट पाए। इसी 13 मार्च को उनका अवशेष रांची ले आया गया और फिर 14 मार्च को उसी जेवियर कॉलेज के प्रांगण में उन्हें पूरे सम्मान व उत्सव के साथ दफनाया गया। यहीं वे पढ़ाते थे। इस आंगन के चप्पे-चप्पे से वाकिफ थे। ईंट की दीवारें, परिसर की मिट्टी, पेड़-पौधे, लता-द्रुम, हवा-पानी सचमुच इस दिन इन्हें भी एक भरपूर तृप्ति का एहसास हुआ होगा और उस लंबी प्रतीक्षा के पूर्ण होने पर एक ठंडी सांस भरी होगी।  
सचमुच, फादर की आत्मा को भी अब असीम शांति मिली होगी। जो उस समय दर्शन नहीं कर पाए थे, उन्होंने अब किया और पूरी श्रद्धा के साथ उन्हें याद किया। कॉलेज के युवा पीढ़ी के लिए यह किसी कौतूहल से कम नहीं था। हजारों छात्रा-छात्राएं और सैकड़ों गणमान्य और फादर को चाहने वाले उनके इस दुबारा अंतिम क्रिया में शामिल होने आए थे। नई पीढ़ी पहली बार जानी कि जिस शहर से कभी रांची की पहचान हुआ करती थी, वह कोई सामान्य आदमी नहीं था। उसका विराट व्यक्तित्व था और जो बाबा तुलसी के भक्तथे। ऐसी भक्ति अब दुर्लभ होती जा रही है!
 फादर ने तीन बड़े काम किए। एक रामकथा: उत्पत्ति और विकास। दूसरा काम उन्होंने बाइबल का हिंदी अनुवाद कर किया। और, तीसरा शब्दकोश। हिंदू और ईसाई आस्था का उनमें अपूर्व संगम था। बाइबल उनके अंतिम दिनों की कृति है। हालांकि बाइबल अनुवाद वे पूरा नहीं कर सके। 150 पृष्ठों का अनुवाद शेष रह गया था। 930 पृष्ठ का अनुवाद वे कर चुके थे। बाद में उनके अधूरे काम को उनके अनन्य सहयोगी डॉ दिनेश्वर प्रसाद ने पूरा किया। इसकी भी एक कहानी है। फादर ने अपने ईश्वर से महज चार सौ घंटे की मोहलत मांगी थी ताकि अधूरा काम पूरा हो सके। पटना के कुर्जी अस्पताल में जब वे भर्ती थे, वहां डॉ दिनेश्वर प्रसाद और डॉ श्रवण कुमार गोस्वामी मिलने पहुंचे। फादर बोले?'डॉक्टर कहते हैं, पैर काटना पड़ सकता है। पैर कट ही जाएगा तो क्या होगा? मैं काम तो कर ही सकूंगा। डॉक्टर का कहना है कि मैं ठीक तो हो जाऊंगा, पर कम से कम छह महीने तक मुझे विश्राम करना होगा। कोई बात नहीं। अब मैं जनवरी 1983 से फिर काम शुरू करूंगा। मैंने हिसाब लगा लिया? मुझको केवल चार सौ घंटे चाहिए। चार सौ घंटों में बाइबिल के अनुवाद का काम पूरा जाएगा।Ó ईश्वर उन्हें जल्दी अपने पास बुलाना चाहता था और इन्हें बाबा तुलसी से मिलने की आतुरता था। रांची के मांडर, पटना और फिर दिल्ली...स्थिति में कोई सुधार नहीं। पैर में गैंगरीन हो गया था। दोनों गुर्दे जवाब दे गए थे। बीमारी बढ़ती जा रही थी और फादर लड़ते-लड़ते थकते जा रहे थे कि अचानक छोड़कर चले गए...फादर की इच्छाएं अधूरी ही रह गईं...फादर कहते थे, 'मुझे अभी जीवित रहना है। बाइबल के हिंदी अनुवाद को पूरा करना है, तुलसी पर एक ग्रंथ लिखना है और शब्दकोश को और भी वैज्ञानिक बनाना हैै।Ó 
फादर के जाने के बाद रामकथा पर उनके अंग्रेजी निबंधों को संपादित कर डॉ दिनेश्वर प्रसाद ने छपवाई। यह पांडुलिपि भी प्रकाशक के यहां दस सालों तक धूल फांकती रही। तब, दिनेश्वर बाबू भी अपने अंतिम दिनों में चल रहे था। उनके साथ उठना-बैठना होता था तब वे इसकी चिंता करते थे। हालांकि फादर की कुछ और सामग्री भी उनके यहां थी, लेकिन अब क्या हुई पता नहीं। उनके जीवित रहते अंग्रेजी का वह निबंध संग्रह छप कर आ गया। उनकी आंखें तृप्त हो गईं। उस किताब को देखकर उनकी धुंधली आंखों में एक गजब सी चमक दिखी। अब दिनेश्वर बाबू भी नहीं रहे।
नई पीढ़ी को तो पता ही नहीं था कि फादर बुल्के की कब्र रांची में नहीं, दिल्ली में थी। उनके नाम से जरूर पुरुलिया रोड का नाम बदलकर फादर कामिल बुल्के पथ कर दिया गया। मनरेसा हाउस, जहां वे रहते थे, एक आदमकद उनकी प्रतिमा लगी हुई है। उनकी निजी किताबें, उनके नाम से बने पुस्तकालय में थीं। अब यह पुस्तकालय भी जेवियर कॉलेज का हिस्सा बन गया, जहां फादर संस्कृत विभाग के अध्यक्ष और यहीं से अवकाश ग्रहण लिया। अब उसी प्रांगण में उन्हें फिर से दफ ना दिया गया।
फादर पैदा तो बेलजियम के फ्लैंडर्स प्रांत के रम्सकपैले गांव में एक सितंबर, 1909 को हुए थे, लेकिन उन्हें तुलसी के प्रति ऐसी भक्ति जागी कि वे भारत चले आए और फिर सालों तुलसी को गुनते रहे। इसके लिए संस्कृत भी सीखी और हिंदी भी पढ़ी। इलाहाबाद विवि से धीरेंद्र वर्मा के निर्देशन में रामकथा पर काम किया। देश-दुनिया में प्रचलित रामकथा का अध्ययन आज तक हिंदीवाले भी नहीं कर पाए। हम तो राम के अस्तित्व पर ही सवाल उठाते रहे....। यह भी इत्तेफाक नहीं था कि उनके लिए अभिनंदन ग्रंथ तैयार हो रहा था, तब फादर ने कहा, इसे 75 साल पूरे होने पर समर्पित करना, लेकिन 75 साल आया नहीं और अभिनंदन ग्रंथ, स्मृति ग्रंथ के रूप में प्रकाशित करना पड़ा। बाइबल भी 1986 में पूरा होकर छप गई...। ऐसे तुलसी भक्त को शत-शत प्रणाम।





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