सोमवार, 3 फ़रवरी 2020

पठार पर डूबते सूर्य और प्रेम की अमर गाथा


गीतामनी देवी ने चाय का स्टाल आज ही शुरू कर दिया। कारण, उसके पति सुनील बृजिया को पिछले नौ महीने से पर्यटन विभाग ने मानदेय नहीं दिया है। उसने सोचा कि अपने बच्चों का भरण-पोषण करने के लिए यह बेहतर विकल्प हो सकता है। नेतरहाट के इस मैग्नोलिया प्वाइंट पर प्रतिदिन आ रहे तीन सौ पर्यटकों से, बेशक, उसकी उम्मीद को उड़ान मिल सकती है।
इसमें उनका हाथ पति सुनील बृजिया भी बंटाते हैं। सुनील चाय बना रहे थे और गीतामनी पकौड़ी छान रही थीं। यह दुकान का पहला दिन था। अनुभव की कमी भले रही हो, उत्साह में नहीं। सुनील यहीं पर सफाई का काम करते हैं। सुनील ने सुना है मानदेय भी बढ़ गया है, लेकिन अब मिले तब तो पता चले। गीतामनी के सात बेटे हैं। बड़ा बेटा डाल्टनगंज में हास्टल में रहकर पढ़ता है। बाकी छोटे-छोटे बच्चे भी गीतामनी की मदद कर रहे थे।
पांचवीं तक पढ़े सुनील चुनाव को लेकर बहुत उत्साहित नहीं दिखते। उनका क्षेत्र मनिका विधानसभा में पड़ता है। उन्हें यह पता नहीं कि इस चुनाव में कौन खड़ा है और मतदान कब है? लेकिन वे उम्मीद जरूर जताते है कि जो भी सरकार बने, उनकी भी सुने। सुनील अपने टोले के बारे में कहते है कि यहां आदिवासी समुदाय के किसान और बृजिया के 60-65 घर होंगे। सुनील को पीएम आवास से पहली किश्त मिल चुकी है और पुराने घर के सामने ही नए घर की नींव रख दी गई। तीन फीट की दीवार भी खड़ी हो गई है। अब अगली किश्त का इंतजार कर रहे हैं। 
मैग्नोलिया पॉइंट के पास दो-तीन घर आदिवासियों के हैं, जहां सालों से पोचारा नहीं हुआ है। हां, यहां की फर्श पर नई टाइल्स बिछाई जा रही है। लोग आकाश की ओर टकटकी लगाए देख रह हैं, कब सूर्यास्त हो...।
इधर, गोधूलि बेला में आकाश सिंदूरी हो रहा था। दूर गायों के गले की लय में बजती घंटियां धीर-धीरे पास आती हुईं तेज हो रही थीं। गायों के गले में बंधी घंटियों और उनके खुरों की लय एक नए लोकतंत्र का राग रच रही थी। सड़क किनारे खड़े विमल 3500 फिट की ऊंचाई पर ढलती सांझ की हवा में सिहरन महसूस करते हुए कहते हैं कि इधर किसकी हवा बह रही है, कहना मुश्किल है? इस पसेरी पाट के टोले में 45 घरों में उरांव की आबादी ज्यादा है। कुछ दूसरे भी हैं। अभी सब धनकटनी में लगे हैं। नेता लोग दिन में आते है तो किसी से भेंट नहीं होती। सजग और सचेत युवा विमल विकास की बात करते हैं। वह अकेले नहीं हैं। विकास की बात रांची से 150 किमी दूर इस सुदूर पहाड़ के लोग भी करने लगे हैं। नेतरहाट तक आने वाली सड़कें पतली जरूर थीं, पर चमक रही थीं। यह चमक बनिया लकड़ा के चेहरे पर भी दिख रही थी। बनिया 68 के थे लेकिन 50 के लग रहे थे। वे 32 साल तक नेतरहाट स्कूल में क्लर्क रहे। उनकी बातों में साफगोई झलक रही थी। कहने लगे, पांच साल पहले इस सड़क पर चलना मुश्किल था। लेकिन अब रात-बिरात कोई डर नहीं। आदिवासियों का जीवन बदला है। अभी जो सोलर लाइट से सड़क उजियार दिख रही है, पांच साल पहले नहीं थी। घुप्प अंधेरे में सड़कें भी डराती थीं। महुआडांड़ के अजय उरांव कहते हैं कि लोकतंत्र में आदिवासियों का विश्वास बढ़ा है। नक्सलियों के तंत्र कमजोर हुए हैं। आदिवासी समाज तो पहले से ही लोकतांत्रिक रहा है। हमारा विश्वास समूह और समुदाय में है। यह और मजबूत हुआ है। आदिवासी अब किसी जात-पांत में नहीं बंटते। उन्हें विकास चाहिए। जो विकास करेगा, वह जितेगा। अजय यह कहना नहीं भूलते कि पहले तो नेतरहाट की घाटी में दिन में भी दो पायों से डर-भय लगता था। अब तो कभी भी गुजर सकते हैं। इसके पीछे लोकतांत्रिक चेतना ही है। अब आदिवासी समाज फिर से उस परंपरा को जीवित कर रहा है। समाज और समुदाय की आस्था भी मजबूत हुई है। सांझ गहरा गई थी... इस पहाड़ पर पार्टी का शोर सुनाई पडऩे लगा था...।

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