सोमवार, 3 फ़रवरी 2020

राजमहल का माघी पूर्णिमा मेला

राजमहल में गंगा तट पर माघी पूर्णिमा मेला में झारखंड के अलावा बिहार, बंगाल, ओडिशा, असम एवं नेपाल के सनातन धर्म को मानने वाले सफाहोड़ समाज के अनुयायी अपने अपने जान गुरुओं के सानिध्य में मां गंगा, भगवान शिव व माता पार्वती का पूजन करने पहुंचते हैं। श्रद्धालुओं के इस महाकुंभ में आदिवासी समाज के साथ गैर आदिवासी भी शिरकत करते हैं। मेले की महत्ता इस बात से समझ सकते हैं कि 2016 में राज्य सरकार ने इसे राजकीय मेला का दर्जा दिया है।
आदिवासी सफाहोड़ समाज के श्रद्धालु गंगातट के अलावा बालू प्लाट, रेलवे मैदान, पुराना थाना परिसर, अनुमंडल कार्यालय परिसर, सिंहीदलान, अनुमंडलीय अस्पताल परिसर में भगवान शिव के लिए मांझी थान तथा मां पार्वती के लिए जाहेर थान बनाकर पूजा करते हैं। गंगा स्नान के क्रम में गंगा पूजन एवं मांझी थान व जाहेर थान में परंपरागत वाद्य यंत्रों की धुन पर पूजा की अनूठी परंपरा सभी को आश्चर्यचकित कर भारत की आदिवासी संस्कृति को अनूठे अंदाज में बयां करती है। पूजा के दौरान मरांग गुरु विशेष महत्व है। माना जाता है कि सफाहोड़ समुदाय की पूजन पद्धति हड़प्पाकालीन सभ्यता के समकक्ष है। मेला में अपने अपने अनुयायियों के साथ जान गुरुओं द्वारा अलग अलग अखाड़े भी लगते हंै। जान गुरु यहां परंपरागत तरीके से अपने शिष्यों के कष्टों के निवारण के लिए पूजा करते हैं। राजमहल के सूर्यदेव घाट, संगत घाट, काली घाट, गुदारा घाट में श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ता है।

आजादी के पूर्व भी लगता था माघी पूर्णिमा मेला
माघी पूर्णिमा मेला के प्रारंभ होने के वर्ष का कोई प्रामाणिक साक्ष्य नहीं है। इस बारे में राजमहल के रहने वाले 93 वर्षीय पत्रकार हीरालाल राय बताते हैं कि आजादी के पूर्व से ही इस मेला को लगते हुए देख रहे हैं। पहले यह मेला सिर्फ आदिवासी व ग्रामीणों का माना जाता था, अब प्रशासनिक व राजनीतिक सहयोग ने इसे वृहद स्वरूप दे दिया है। मेले के धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक महत्व को देखते हुए विधायक अनंत कुमार ओझा के प्रयास से इसे 2016 में राजकीय मेला का दर्जा मिला।

जब थी कबीला संस्कृति तब से हो रहा गंगा तट पर पूजन
मेले को लेकर कई किवदंती हैं। आदिवासी मानते हैं कि जब कबीला राज हुआ करता था तब विपत्तियों से बचने के लिए माघ पूर्णिमा को यहां गंगा तट पर भगवान शंकर की पूजा की जाती थी। तब से यहां श्रद्धालु पूजा करने आ रहे हैं। जान गुरुओं की मान्यता है कि भगवान श्रीराम ने भी इसी गंगातट पर आकर लंका पर विजय के लिए भगवान शिव की पूजा की थी।
दैनिक जागरण

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