रविवार, 24 जनवरी 2010

कहां गए बाघ


संजय कृष्ण : वन्य जीव कोष ने इस साल को बाघ वर्ष घोषित किया है और इसी साल के पहले दिन टाइगर मैन बिली अर्जुन सिंह इस दुनिया से रुखसत हो गए। यह अजीब संयोग ही है। इस घोषित बाघ वर्ष में जाहिर है, सरकार की देश भर में बाघों को बचाने की कवायद शायद इस साल परवान चढ़े। जिस तेजी से बाघ इस धरती से विदा हो रहे हैैं, इसकी चिंता न केंद्र सरकार को है और उन राज्यों की सरकारों को, जहां बाघों के अभ्यारण्य हैं। कम से कम पलामू व्याघ्र आरक्ष (पलामू टाइगर रिजर्व, बेतला नेशनल पार्क)

में यही स्थिति है। यहां का वन्य प्राणी विभाग झूठे आंकड़ों जरिए अपनी पीठ थपथपाता है। राज्य की सरकार और विभागीय अधिकारी भी वन्य प्राणियों को बचाने की कवायद को लेकर तनिक भी गंभीर नजर नहीं आते। इसी का नतीजा है कि चालीस बाघों की संख्या से घटकर मात्र एक बाघिन ही बची रह गई है। वैसे, विभाग के अधिकारी सत्रह बाघों के होने का दावा करते हैं, लेकिन उनके इस दावे पर देहरादून स्थित संस्था ने सवाल उठा दिया है।

पलामू व्याघ्र आरक्ष तीन जिलों लातेहार, गढ़वा, गुमला जिलों के 1026 वर्ग किमी वनक्षेत्र में फैला हुआ है। छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले से भी यह सटा हुआ है। इसका सृजन 1974 में हुआ था। यहां बाघ सहित कई अन्य जानवर भी हैं। पर यहां के अधिकारी इसको लेकर संजीदा नहीं है। वनों की अंधाधुंध कटाई से वन्य प्राणी अपने अस्तित्व से जूझ रहे हैं। बेतला नेशनल पार्क के भीतर वनों की कटाई रेंजरों के माथे पर शिकन पैदा नहीं करती। भीतर के कीमती पेड़ भी वन माफियों की भेंट चढ़ गए हैं। यह सिलसिला जारी है। सरकार और वन विभाग भी इस मामले में शुतुरमुर्गी रवैया अपनाए हुए है। सो, वन्य प्राणी दोहरी मार झेल रहे हैं। कहने वाले कहते हैं कि यह सब सरकारी अधिकारियों की मिलीभगत से होता है। पिछली गर्मी में बेतला के भीतर जानवरों के पीने के लिए पानी की कोई समुचित व्यवस्था नहीं थी। चढ़ती गर्मी ने जानवरों का जीना मुहाल हर दिया था। सो, जानवर जंगल से निकल गांवों में पानी के लिए भटकते रहे। इस क्रम में कई जानवर ग्रामीणों के हाथों मारे गए तो कई वाहनों की चपेट में आकर अपनी जान गंवाए। पर, संवेदनहीन अधिकारी जानवरों की मौतों पर लीपापोती करने में जुटे रहे। लाख टके का सवाल है, क्या इसी तरह हम लुप्त हो रहे बाघों बचाएंगे?

सोमवार, 11 जनवरी 2010

ऐसे कैसे खत्म होगा नक्सलवाद



संजय कृष्ण

झारखंड को बने नौ साल हो गए। इस बीच झारखंड के जिलों की संख्या भी 24 हो गई। इस दृष्टिï से कुछ जिलों में नए प्रखंड और अनुमंडल भी बने। इन जिलों का निर्माण के पीछे क्षेत्रों के पिछड़ेपन को दूर करना उद्देश्य था। विकास का तर्क देने वालों ने प्रशासकीय सुविधा के लिए भी इन नए जिलों-अनुमंडलों-प्रखंडों का होना जरूरी बताया था। अब ये नए जिले, अनुमंडल-प्रखंड क्या रह रहे हैं, यह देखने के लिए उधर का रुख करना पड़ेगा कि ये अपने उद्देश्य में कितने सफल रहे। लेकिन इस बीच जो नक्सली गठन से पहले कुछ जिलों में सिमटे थे, उन्होंने अपना विस्तार पूरे सूबे में कर लिया। 24 में से 22 जिले उनकी पूरी तरह गिरफ्त में हैं। शेष बचे दो जिले भी उनकी जद से बाहर नहीं माने जा सकते। देश की बात करें 29 राज्यों में से 20 राज्यों के 223 जिलों के 2,000 से ज्यादा थाना क्षेत्रों को अपनी लपेट में ले लिया है। जिसमें सात राज्य तो बुरी तरह प्रभावित हैं। इन सात राज्यों में इनकी पकड़ इतनी मजबूत है कि उनकी समानांतर सरकार चलती है। माओवादी-नक्सली अपने आधार वाले क्षेत्र को वे रक्त वीथिका (रेड कारीडोर) के नाम से पुकारते हैं, जो काठमांडू से लेकर पं बंगाल, झारखंड, ओड़ीसा, आंध्रप्रदेश होते हुए महाराष्टï्र तक फैला है।

इनके फैलाव, रणनीतियों, हिंसक गतिविधियों और लगातार भारतीय राज-व्यवस्था के समक्ष नित नई पेश करते चुनौतियों के मद्देनजर हमारे सबसे बड़े लोकतंत्र के अगुवा मनमोहन सिंह आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा मानते हैं। अर्थशास्त्री पी चिदंबरम जब से गृहमंत्री की कमान संभाले हैं, उनके लिए भी यह किसी बड़े खतरे से कम नहीं है। इतना कि आतंकवाद भी इसके आगे बौना है। इसलिए, इससे मुकाबला करने के लिए उन्होंने 70 हजार अर्धसैनिक बलों को उतारने का फैसला लिया है। वायु सेना के कमांडर भी हवाई हमले का लालायित हैं। हालांकि सरकार अपनी छिछालेदर से बचने के लिए ही सेना को उतारने मेें संकोच कर रही है। सवाल है कि यह समस्या इतनी विकराल क्यों हुई कि राज-सत्ता को अपने ही घरवालों से चुनौती मिलने लगी? इसके पीछे, जैसा कि विशेषज्ञ मानते हैं असमान विकास-आर्थिक-सामाजिक पिछड़ापन। योजना आयोग ने भी अस्सी-नब्बे पेजों की रिपोर्ट में इसके लिए कई कारणों के साथ विकास को भी जिम्मेदार ठहराया है। पर, इसका जवाब तो सरकार ही दे सकती है। आखिर, आजादी के बासठ सालों में केंद्र और राज्य की सरकारें क्या करती रहीं? देश की नौकरशाही क्या करती रही कि देश असमान विकास का शिकार हो गया और देश के कई हिस्सों में लोग बंदूक थामने को मजबूर हो गए? उदारीकरण के बाद तो और भी फासला बढ़ा है। अमीर और अमीर होते गए और गरीब और गरीब। देश में अस्सी करोड़ लोग 20 रुपए रोजाना पर गुजारा करते हैं। उदारीकरण के हिमायती और तब के वित्तमंत्री और अब के प्रधानमंत्री ने अपने इस फलसफे पर पुनर्विचार करने की जहमत नहीं उठाई।

इत्तफाक है कि आदिवासियों के इलाके में ही नक्सलवाद पसरा है और आदिवासियों की ही जमीन के नीचे खनिज संपदा बिखरी है। इसे सरकार अपने कब्जे में लेकर औने-पौने दामों में बहुराष्टï्रीय कंपनियों को दे रही है। इसका विरोध आदिवासी कर रहे हैं। देखा जाए तो पिछले 62 साल से केंद्र की सरकार और पिछले नौ सालों से झारखंड की आया राम-गया राम सरकारें आदिवासी हितों को अपने पैरों तले रौंदती रही हैं। उन्हें हाशिए पर ही छोड़ दिया और विकास की तथाकथित मुख्यधारा में उन्हें लाने का ईमानदार जतन नहीं किया गया। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कहते हैं कि आदिवासियों को आर्थिक व्यवस्था में स्थान देने में व्यवस्थागत असफलता रही, जिसके नतीजे अब खतरनाक मोड़ ले रहे हैं। पर, वह यह हुंकार भी करते हैं कि अब और आदिवासियों का शोषण बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। और, हाशिए पर मौजूद समुदायों के वैध अधिकारों को सुनिश्चित किए बिना समान विकास संभव नहीं है। वे यह भाषण हाल में संपन्न वन और जनजातीय विकास मंत्रियों के दो दिवसीय उद्घाटन में बोल रहे थे। वह अपने भाषण में यह जोडऩा भी नहीं भूलते कि जनजातीय समुदायों का शोषण और सामाजिक, आर्थिक भेदभाव लंबे समय तक सहन नहीं किया जा सकता। परंतु यह भी सच है कि बंदूक के सहारे नक्सली समस्या का कोई हल संभव नहीं है, न ही जनजातियों के हितों के लिए बोलने का दावा करने वालों ने कोई रास्ता सुझाया, जो व्यवहार्य हो। प्रधानमंत्री की दुविधा यह है कि एक ओर वह नक्सलियों के खिलाफ अर्धसैनिक बल उतार रहे हैं तो दूसरी ओर यह भी कह रहे हैं कि बंदूक से सहारे नक्सली समस्या का हल संभव नहीं है। पर नेहरू से लेकर मनमोहन ने क्या वाकई आदिवासियों की चिंता की? 2006 में बना वन अधिकार नियम को लागू नहीं किया गया। सरकार की गलत नीतियों के कारण ही 8 लाख एकड़ भूमि से आदिवासियों का अधिकार छीन गया। उसने कभी ईमानदारी से नियमों को लागू कराने में दिलचस्पी नहीं दिखाई। योजना आयोग ने आदिवासियों की भूमि व्यवस्था पर एक अध्ययन समूह का गठन किया, जिसकी अध्यक्षता प्रो बीके राय बर्तन ने की थी। डा. बर्मन ने उड़ीसा के कुछ स्थानों के भूमि सर्वेक्षण व सेटलमेंट कार्य का ब्यौरा देते हुए बताया कि जिस भूमि का आदिवासी उपयोग कर रहे थे, उसमें मात्र एक प्रतिशत पर ही उनके अधिकार को रिकार्ड किया गया है। यही हाल झारखंड में भी है। यहां कई पीढिय़ों से अपनी जंगल में अपनी जमीन जोत-बो रहे हैं, पर उनके पास इसका कोई रिकार्ड नहीं हैं। जहां रहा भी तो वह छप्परपोश मकान में कहां गायब हो गया या फिर नष्टï हो गया, पता नहीं। पर झारखंड की नौकरशाही वन अधिकार कानून बन जाने के बाद भी उनके अधिकार से खिलवाड़ कर रही है। यह सिर्फ आदिवासियों तक ही सीमित नहीं है। गरीबों के लिए बनी योजनाएं भी नौकरशाही की लूट के कारण उन तक नहीं पहुंच पा रही हैं। यहीं पर जिलों-अनुमंडलों-प्रखंडों की निरर्थकता भी उजागर हो जाती है।

चूंकि इस देश में किसी की जवाबदेही नहीं है, इसलिए वे अपने बचने का आसान रास्ता खोज ही लेते हैं। यह तो गरीब-आदिवासियों के घावों पर नमक छिड़कने जैसा है कि विकास की राशि गरीबों तक महज दस फीसदी पहुंच पाती है। इस तरह के बयान यह साबित करने के लिए काफी है कि सरकार का नौकरशाही पर नियंत्रण नहीं है। दूसरे नौकरशाही एसी ड्राइंग रूम में गरीबों के लिए योजनाएं बनाती हैं, जिसे जमीनी हकीकत से कोई वास्ता ही नहीं होता। मनमोहन सिंह या मोंटेेक सिंह या पी चिदंबरम...। इन्हें भारतीय समाज, इतिहास और संस्कृति का उतना ही पता है, जितना इनके पश्चिमी आकाओं ने बताया है। गांधी की तरह इन्होंने देश का भ्रमण तो रेल के तीसरे दर्जे में किया नहीं। आकाश में उड़कर ऊपर से नीचे देखते रहे। इस समझ से वे नक्सलवाद को खत्म करना चाहते हैं। कुछ लोग उन्हें सुझाव भी दे रहे हैं कि इस बार इन्हें नेस्तनाबूद कर देना है। पर, वे अपने ही अतीत को झुठलाना चाहते हैं। नक्सलबाड़ी से उठे बसंत के वज्रनाद को भी तत्कालीन बंगाल सरकार ने दमन से मिटा दिया था, लेकिन वे फिर जीवित हो उठे। और, बंगाल ही नहीं, कई प्रदेशों में और शक्तिशाली होकर उठ खड़े हुए। इसलिए, हो सकता है कि चिदंबरम की 70 हजार अर्धसैनिक बल उन्हें मिटा दें, लेकिन इसकी क्या गारंटी है कि वे फिर फिनिक्स की तरह जिंदा नहीं हो उठेंगे? तो समाधान क्या है? समाधान तो सरकार के पास ही है? इस लोकतंत्र में सबकी जवाबदेही तय हो। चाहे वह न्यायाधीश हों, नौकरशाह हों या नेता। मुकदमों का समय निर्धारित हो, कौन मुकदमा कितने दिनों तक चल सकता है? विकास की योजनाएं असफल होती हों या गरीबों तक नहीं पहुंच पाती हैं या भ्रष्टïाचार में फंस गई हों तो इसकी जवाबदेही अधिकारियों की है। भ्रष्टï अधिकारियों पर अंकुश लगे। पुलिस की कार्यप्रणाली में सुधाई हो। सरकार गांवों तक जाए। पलामू ही नहीं झारखंड के कई ऐसे गांव हैं, जो जंगलों और पहाड़ की तलहटियों में बसे हैं, जहां आजादी के बाद कोई अधिकारी या नेता नहीं पहुंचा। वे अपने हाल पर हैं। न उन्हें स्वच्छ पानी नसीब है, न चिकित्सा न शिक्षा। इसलिए सरकार को पहले लोगों को बुनियादी समस्याओं से मुक्ति दिलाने के प्रयास करने चाहिए। कुछ लोग कहते हैं कि विकास को नक्सलियों ने रोक दिया है। पर, जब नक्सली नहीं थे, तब कौन सा विकास किया गया? झारखंड में बांध-बराज की योजनाएं चालीस साल से चल रही हैं। राशि बढ़ती गई, पर आज तक काम नहीं पूरा हो सका। 40 करोड़ की योजनाएं हजार करोड़ में पहुंच गई हैं तो इसकी जवाबदेही किसकी है? सचमुच में यदि मनमोहन आदिवासियों के प्रति संवेदनशील हैं तो उन्हें या उनकी सरकार को कई स्तरों पर सुधार की प्रक्रिया अपनानी होगी। दोनों ओर से चलने वाली गोली में निर्दोष लोग ही मरेंगे।

गुरुवार, 7 जनवरी 2010

'मेरे बेटे को मार डालाÓ

पलामू में बढ़ती उग्रवादी घटनाओं से परेशान पुलिस अब निर्दोष लोगों पर अपना गुस्सा उतारने लगी है। छतरपुर थाना के अंतर्गत पडऩे वाला गांव तेलाड़ी इन दिनों इसलिए सुर्खियों में है कि यहां के राजेंद्र यादव नामक युवक को पुलिस ने पूछताछ के बहाने पकड़ा और उसे मार डाला। उसके पिता दशरथ यादव बताते हैं कि 30 दिसंबर को सुबह पुलिस वाले घर पहुंचे और राजेंद्र यादव को अपने साथ लेते गए। पूछने पर पुलिस ने कहा, पूछताछ के बाद शाम को छोड़ दिया जाएगा। लेकिन उसे नहीं छोड़ा। दूसरे दिन गुरुवार की सुबह 10-11 बजे थाना पहुंचा तो प्रभारी नेेे कहा कि उसे डालटनगंज भेज रहे हैं। इसी बीच थाने में फोन आता है कि एक और व्यक्ति को पकड़ लिया गया, दोनों को साथ भेज दें। बताते-बताते दशरथ की आंखें भर आती हैं। अपने को काबू कर बताते हैं, अपराह्नï तीन बजे सदर थाना आया। यहां कुछ नहीं पता चला। फिर, एसपी आवास गया। वहां भी किसी ने मदद नहीं की। शाम हो गई हो तो वापस घर आ गया। एक जनवरी शुक्रवार को पुन: शहर थाना पहुंचा। यहां कुछ भी पता नहीं चला। लेकिन कई पुलिसकर्मियों ने मदद की। उसने बताया कि दो लोग छतरपुर से आए हैं। कौन हैं, नहीं पता। इसके बाद वह हाजत तक गए। जब अपने पुत्र को देखा तो वह बेहोश था। दूसरे कैदी रमेश यादव से पूछा तो उसने बताया कि इसे पुलिस वालों ने सौ लाठी मारा है। हमें भी बीस-पच्चीस लाठी मारी। रमेश ने भी कांपते-कांपते कहा, देखो तुम्हारे पिताजी आए हैं। किसी तरह उसकी आंख खुली। पिता ने कहा, कुछ खाने को ले आऊं। उसने अटकते-अटकते सेऽऽऽब कहा। इसके बाद पिता उसे सेब लाकर दिए। इतना बताते-बताते दशरथ यादव की आंखें भीग जाती हैं। सिसकते हुए कहते हैं, मैं भी घर चला आया। लेकिन एक जनवरी को साढ़े सात बजे के आस-पास खबर आई.....कि वह मर गया। पुलिस की इस कार्रवाई से पिता के भरोसे की लाठी तो टूट ही गई, राजेंद्र के दो अबोध बच्चे भी अपने बाप के साये से वंचित हो गए। सवाल उठता है कि क्या ऐसे निर्दोष लोगों की जान लेने से नक्सलवाद खत्म हो जाएगा?
संजय कृष्ण