गुरुवार, 11 नवंबर 2010

प्रेम गली अति साकरी

 संजय कृष्ण : हर युग में प्रेम की परिभाषा और उसकी कसौटियों को लेकर विमर्श के बिंदु उभरते रहे हैं। द्वापर के कृष्ण ने तो प्रेम की परिभाषा के बजाय उसे करना ज्यादा बेहतर समझा। वे इंद्र की तरह वासना से पीडि़त नहीं थे, बल्कि वे प्रेम के स्वस्थ प्रतीक बनकर उभरे। राधा, उनकी प्रेमिका थी, इसके अलावा उनकी चार पत्नियां भी थीं, लेकिन प्रेम किसी से कम न था। वैसे उनकी सोलह हजार पटरानियों का जिक्र भी मिलता है। लेकिन मिथक के इस अतिरेक में न भी जाएं तो, यह मानने में किसी को गुरेज नहीं होगा कि पत्नि के अलावा राधा उनकी चाह थी। राम चूंकि मर्यादा में बंधे हुए थी, इसलिए मर्यादा को तोडऩे की शक्ति उनमें नहीं थी। समाज के बंधे-बंधाए नियम राम के लिए सब कुछ था। दूसरे शब्दों में आप कह सकते हैं कि राम समाज के पीछे-पीछे चलने वाले व्यक्ति थे तो कृष्ण समाज के आगे-आगे चलने वाले प्रेरणा के पुंज। इसे काल और समय का अंतर भी मान सकते हैं। संस्कृत के महाकाव्य तो प्रेमगाथाओं से भरे पड़े हैं। यम-यमी से लेकर उर्वशी-पुरुरवा तक। लेकिन यहां प्रेम देह से ऊपर नहीं उठ पाता है। मध्यकालीन संत तो प्रेम में पूरे पगे नजर आते हैं। मीरा गली-गली अपने प्रेम की पीड़ा का अहसास कराती घूम रही हैं तो कबीर प्रेम गली को इतना संकरा बताते और कहते हैं कि उसमें दो का प्रवेश नहीं  सकता। प्रेम के मामले में 'दोÓ बड़ा अर्थपूर्ण है। इसे समझने की जरूरत है। किसी ने कहा है कि दो जब एक हो जाए तभी प्रेम की सार्थकता है। जब तक शरीर का भान है, दो का बोध है, समझिए प्रेम में कोई कसक रह गयी है। कबीर ऐसे प्रेम के कायल हैं, जहां दो का अस्तित्व ही न बचे, ऐसा प्रेमी ही प्रेम की गली में प्रवेश कर सकता है और उसे पा सकता हैै।
वस्तुत: प्रेम आकर्षण से उपजता है। यह आकर्षण ईश्वर के प्रति हो, गुरु के प्रति हो या विपरीत लिंगी हो। यह सच है कि प्रेम चाहना से उत्पन्न होता है, लेकिन चाहकर आप प्रेम नहीं कर सकते। यह अनायास-अचानक घट जाता है। लेकिन समाज की अपनी आचार-संहिता होती है, जहां दो स्त्री-पुरुष के प्रेम को समाजविरोधी करार दे दिया जाता है। चूंकि समाज का अपना तर्क है। उसने विवाह नामक संस्था बनायी है। और इस संस्था से बाहर यदि कोई प्रेम करने की जुर्रत करता है तो उसे सामाजिक मर्यादाओं के उल्लंघन का दोषी माना जाता है, और इसकी सजा हर समाज ने अलग-अलग से मुकर्रर कर रखी है। प्रेम के संदर्भ में समाज की प्रकृति दरअसल तानाशाह की है। वह अपने ऊपर किसी भी प्रकार के व्यवधान का प्रतिरोध करता है। कभी-कभी आक्रामक की मुद्रा में तो कभी उसे नष्टï करने की चेतना से लैस होकर। जबकि प्रेम सारे व्यवधानों, सीमाओं या बंधनों को दरकिनार कर स्वयं में ही केंद्रित रहता है। उसके लिए किसी भी प्रकार के बंधन अस्वीकार्य हैं। एक अर्थ में यह मनुष्य की स्वतंत्रता की परम अभिव्यक्ति के रूप में उभरता है। पर समाज इस स्वतंत्रता को अपने लिए घातक समझता है। समाज की अपनी चिंताएं होती हैं तो प्रेमियों की अपनी चाह। हां, समर्थवानों को कोई समस्या नहीं है। उच्च मध्यवर्ग के लिए प्रेम कोई बड़ी समस्या नहीं है। वहां प्रेम अंतत: परिणय में परिणित हो जाता है। न भी हो तो वे एक दूजे में रस तो लेते ही हैं। सारी समस्या मध्यवर्ग के लिए है, जो रूढिय़ों और परंपराओं से चिपके रहना भी चाहता है और आधुनिकता की वकालत भी करता है। इन दोनों के बीच द्वंद्व से सबसे अधिक प्रभावित होने वाला भी यही वर्ग है। दूसरे समाजों में इस तरह की बंदिशें नहीं है। आदिवासी समाज में 'घोटुलÓ नामक प्रथा स्त्री प्रेम की स्वतंत्रता का ही पक्षधर है। इस प्रथा के अंतर्गत गांव के बाहर युवक-युवतियों को एक साथ रहने के लिए छोड़ दिया जाता है। वे जरूरी चीजें लेकर रहने के लिए चले जाते हैं। मौज-मस्ती करते हैं, हडिय़ा पीते हैं, नाचते-गाते हैं, तब यह फैसला होता है कि वे एक साथ रह सकते हैं कि नहीं। यदि नहीं तो, फिर किसी और के साथ।
हमारे समाज की त्रासदी यह है कि मन-मिजाज से तो हम आधुनिक दिखना चाहते है, लेकिन अपने जड़ संस्कारों पर पुनर्विचार भी करने से परहेज करते हैं। कभी ग्रंथों का हवाला देते हैं कभी सामाजिक मर्यादाओं का। लेकिन खुद इन हवालों से दूर ही रहते हैं और बार-बार नैतिकता की लाठी से प्रेम को लहूलुहान करते रहते हैं।
                                          

मंगलवार, 9 नवंबर 2010

हाय रे हामर हीरानागपुर

संजय कृष्ण : झारखंड यानी झाड़-झंखाड़ों का प्रदेश। नदी-नालों का 'देसÓ। ऊंचे-नीचे, पहाड़-पर्वतों का देस। झरनों से निकलते संगीत का देस। मांदर की थाप पर नाचते-गाते लोगों का देस...और प्रकृति और परंपराओं के अनुरागियों का देस। एक ऐसा देस, जहां आ जाएं तो फिर लौटने का मन नहीं करता..आखिर असुर, मुंडा, उरांव जैसी जनजातियां जब यहां की धरती के पांव पखारीं तो फिर इस धरती की होकर ही रह गईं। उन्होंने यहां रहते हुए एक नई संस्कृति और समाज की नींव रखी। इसके बाद भी इस वन प्रदेश में लोगों के आने-जाने का सिलसिला कभी बंद नहीं हुआ। इस संदर्भ में यह लोकगीत शायद हमारी बात को और पुख्ता कर सकता हैै। देखं-
कहां जनमले मैना, कहां सिरजला रे
रूइदासगढ़ जनमले मैना, नागपुरे अड्डïा मारै।

बावजूद इसके यहां पहले से रह रही सदान जातियों की संस्कृति और समाज पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ा, हां एक दूसरे से प्रभाव अवश्य ग्रहण करते रहे। कोई भी समाज अपनी संस्कृतियों के कारण ही पहचान का बायस बनता है और संस्कृतियों के जरिए ही उस समाज की अंदरूनी लय को समझा जा सकता है, उसके गतिशास्त्र को पढ़ा जा सकता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि संस्कृतियों की वाहक भाषा होती है। कोई भी संस्कृति अपनी भाषा के जरिए ही विस्तार और विश्वास ग्रहण करती है। इस अर्थ में भाषा का यहां दोहरा चरित्र हो जाता है। यानी वह संप्रेषण के साथ-साथ संस्कृति के वाहक की भूमिका भी निभाती है। अफ्रीकी लेखक न्गुगी वा थ्योंगो ने लिखा है-''एक संस्कृति के रूप में भाषा इतिहास में जनता के अनुभवों का सामूहिक स्मृति-भंडार (मेमोरी बैंक) है। संस्कृति उस भाषा से लगभग पूरी तरह अविभेद्य है, इसकी उत्पत्ति, निर्माण, विकास, अभिव्यक्ति और यथार्थ में एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक संप्रेषण का काम करती है।ÓÓ कहना न होगा कि भाषा और संस्कृति एक दूसरे को आगे बढ़ाने में मदद करते हैं। किसी भी संस्कृति को उसके भाषा के जरिए ही उसके मूल आस्वाद को पा सकते हैं। अनुवाद की भाषा में वह संप्रेषण नहीं होता कि हम मूल के आस्वाद को पा सकें। इसीलिए संस्कृति के खोजियों ने उन संस्कृतियों को जानने के लिए वहां की भाषा सीखी। पाली भाषा के बिना बौद्ध धर्म के मूल आस्वाद को नहीं पा सकते हैं और न संस्कृत के बिना सनातन सत्यता को समझ सकते हैं। आखिर मुंडाओं के इतिहास को जानने और उसे लिपि बद्ध करने के लिए कुमार सुरेश सिंह को मुंडारी सीखनी ही पड़ी थी। थ्योंगो ने ठीक ही लिखा है कि 'संप्रेषणीयता और संस्कृति के  रूप में भाषा एक दूसरे का उत्पाद है।Ó दूसरी बात यहां ध्यान देने योग्य यह है कि संस्कृतियों का बहुत कुछ हिस्सा 'लोकÓ से निर्मित हुआ रहता है। उन लोक कथाओं में उन संस्कृतियों के बीज छिपे रहते हैं, जो हमारी स्मृति में रचे-बसे होते हैं। लोक में ही अनेक पर्वों को मनाने की परंपरा भी निहित होती है। ये सभी तत्त्व मिलकर ही संस्कृति का निर्माण करते हैं, उसकी पहचान को रेखांकित करते हैं। केवल भौतिक उपादान ही किसी संस्कृति का निर्माण नहीं करते बल्कि उसके साथ तमाम अवयव, जो मानसिक क्रियाओं से उद्भूत होते हैं, संस्कृति के निर्माण और उसके विस्तार में सहयोगी भूमिका निभाते हैं। ऐसे में यहां यह विशेष ध्यान रखने योग्य हैंकि संस्कृति से लेकर समाज तक- एक दूसरे से प्रभाव ग्रहण करते रहे हैं और चीजें एक दूसरे में घुल-मिलकर एक दूसरे का हिस्सा बनती रही हैं। यहां प्रकृति पर्वों की अटूट शृंखला है। अभी-अभी सरहुल समाप्त हुआ है। यह पर्व नए साल के आगमन और नए फसलों की तैयारी की पृष्ठïभूमि में मनाया जाता है। इस मौसम में पत्ता-पत्ता, बूटा-बूटा सब गुनगुनाने लगते हैं। हिंदुओं की बात करें तो होली के साथ ही चैत महीने के चढ़ते नए साल की शुरुआत हो जाती है। आदिवासी भी इसी महीने से नए साल में प्रवेश करते हैं। फगुआ, सरहुल, झंडा, मंडा, रथयात्रा, करमा, जीतिया, ईंद ,दसँय, सोहराइ, देवउठान, मागे, आदि पर्व हिंदू और आदिवासी कुछ परिवर्तन के साथ, साथ-साथ मनाते देखे जा सकते हैं। यही नहीं, यहां के पारंपरिक लोकगीतों में देवी-देवताओं के जो नाम आते हैं, उन्हें दोनों ही मानते हैं। मुण्डारी भाषा में एक जदुर गीत गाया जाता है, जिसकी प्रथम दो पंक्तियों का अर्थ है:
' हमने हल चलाते समय उसे पाया था।
हम उसे सीता नाम देंगे।Ó
( सीतान रेगे होबु नामेलिआ
सीता नुतुमेबु नुतुमिआ।)

विवाह संस्कार के अवसर पर वर-वधू के लिए मंगल कामना की जाती है। कुछ पंक्तिया देखें-
अन्न माता, लक्ष्मी माता,
खेती-कृषि की देवियां
तुम्हारे साथ वास करें...

 महाश्वेता देवी तो काली और कृष्ण, शिव और पार्वती तक को आदिवासी मूल का ही बताती हैं। हिंदुओं के अनेक पर्व और परंपराएं आदिवासियों से ही ली गयी हैं। आज आदिवासी समुदायवाचक संज्ञा है, जबकि  प्राचीन काल से लेकर अंग्रेजों के आगमन से पूर्व तक उन्हें उनके नाम मसलन कोल, भील, मुडंा, गोंड़, किरात, निषाद गिरिजन आदि के नाम से ही संबोधित किया जाता रहा है। सुग्रीव, बाली और हनुमान को आदिवासी ही माना जाता है। संयोग है कि ये सभी झारखंडी हंै। एक बात और भी अचरज पैदा करती है कि जो लोग यहां के आदिवासियों को यहां के प्राचीन निवासी मानते हैं, उन्होंने इस ओर गौर किया है कि नहीं कि यहां नदियों के नाम क्यों संस्कृत में मिलते हैं-दामोदर, कोयल, कांची, स्वर्णरेखा, शंख, देवनदी आदि। इसी तरह उर्दू में भी एक नदी पहचानी जाती है-अमानत नदी। हो सकता है कि इस नदी का पूर्व नाम कुछ और रहा हो और मुगलकाल में इसे अमानत का नाम मिल गया। क्योंकि ऐसा तो नहीं है कि इस नदी का उद्भव ही इस काल में हुआ होगा। यह तो हास्यास्पद बात होगी। यहां जंगलों में जो पुरातत्त्व के अवशेष भी मिलते हैं तो उनमें शिवलिंगों की बहुतायत रहती है। इतिहास के अध्येता जानते हैं कि यहां नागवंशियों से संबंधित अनेक चिह्नï मिलते हैं। नागवंशियों ने यहां लंबे समय तक राज किया है। वे शिवभक्त थे और शिवप्रिय नागों के भी। शिव को लिंग के रूप में भी पूजा जाता है। एक और जाति थी-भारशिव। वह अपनी भुजाओं में शिव लिंगों को बांधे रखती थी-संभवत: इसीलिए उसे भारशिव कहा गया। डा. काशी प्रसाद जायसवाल और ललित निबंधकार कुबेरनाथ राय ने इन पर विस्तार से प्रकाश डाला है। पर उनके अवशेषों पर अभी बहुत काम नहीं हुआ है और न यहां के जंगलों में बिखरे मूर्ति या अन्य पत्थरों की ओर ध्यान ही लोगों का गया है। यदि गंभीरतापूर्वक इनका अध्ययन किया जाए तो कई मिथ टूट सकते हैं और झारखंड के इतिहास के विलुप्त अध्याय पर से रहस्य के पर्दे उठ सकते हैं।
 हिंदुओं के प्रसिद्ध ग्रंथ रामायण के एक महत्वपूर्ण पात्र हनुमान को भी लोग झारखंडी और आदिवासी मानते हैं और आंजन ग्राम को लोग हनुमान और उनकी माता अंजनी से जोड़ते हैं। सीता तो मुंडारी गीतों में भी रची-बसी हैं। डा.रामदयाल मुंडा की माने तो सीता शब्द मुंडारी भाषा का है, जिसका अर्थ होता है-हल चलाना। मुंडारी में मूल शब्द 'सीÓ है, जिसका वही अर्थ ध्वनित होता है। हर कोई जानता है कि राजा जनक को सीता हल चलाते समय मिली थीं। संस्कृत में सीता का अर्थ फाल ही होता है, विद्वानों ने भी सीता शब्द को इसी अर्थ में ग्रहण किया है। अरविंद कुमार अपने थिसारस में भी सीता का यही अर्थ लगाते है। संस्कृत ग्रंथों में आज की तरह आदिवासी बनाम गैरआदिवासी का विभाजन नहीं मिलता है। दोनों के बीच ऐसी कोई विभाजन रेखा थी ही नहीं। इसमें कोई संदेह नहीं कि आज जो हिंदू धर्म का स्वरूप है, उसके भीतर अनेक पर्वों और त्यौहारों की जो शृंखला मिलती है-उसका बहुत कुछ उत्स यही आदिवासी समाज का सांस्कृतिक पक्ष ही है। इन रक्त संबंधों से जाहिर होता है कि किसी न किसी प्रकार इनसे आर्यों के संबंध की रेखाएं रही होंगी, तभी तो ये एक दूसरे की स्मृतियों में रचे-बसे हैं। आखिर मिथिला की सीता, मुंडाओं की स्मृति में कैसे आ बसीं? क्या इस पर विचार नहीं होना चाहिए।
यदि खोजा जाए तो और भी संस्कृति-सूत्र मिल सकते हैं, जिससे एक दूसरे की निकटता को संभव बनाते हैं। जैसे रावण को कुड्ुख भाषी उरावं अपना पूर्वज मानते हैं। यह भी ज्ञात हैं कि रावण ब्राह्मïण था और वैदिक शास्त्रों का अद्भुत ज्ञाता भी। और हां, शिव का भक्त तो था ही। यहां पर आज भी अनेक चिह्नï शिव से संबंधित मिलते रहते हैं। लेकिन यहां भी वही बात है कि वह छोटानागपुर का नहीं था। स्मृतियों में वह लंकावासी था। इतिहासकारों की बहुत माथापच्ची के बाद भी अभी तक रावण के स्थान को आधिकारिक रूप से चिह्निïत नहीं किया जा सका हैै। भाषाई दृष्टि से कुड्ुख और तमिल के शब्द संपदाओं पर विचार होना चाहिए। हो सकता है कि कुछ सूत्र और संदर्भ हाथ लगे। कुड्ुखभाषियों की स्मृति को भी बल मिल सकता है। इन तमाम संस्कृति-संबंधों से यह बात स्पष्ट होती है कि वैदिक काल से लेकर रामायण और महाभारत काल तक आदिवासी (हालांकि आदिवासी संज्ञा वर्तमान की देन है, खासकर रिज्ले और कर्नल डाल्टन की, जिन्होंने सबसे पहले इस शब्द को गढ़ा और प्रयोग किया, जिनका विश्वास समाज को बांटने में ज्यादा था)और आर्यों के बीच केवल सांस्कृतिक आदान-प्रदान ही नहीं होते थे, बल्कि नातेदारी भी प्रचलित थी। वैदिक काल के अनेक राजाओं और ऋषियों के वैवाहिक संबंध गैरआर्यों से भी होते थे। लेकिन हमें आदिवासी बनाम वनवासी जैसे शुद्ध राजनीतिक नारों से परहेज करना चाहिए और उनसे भी सावधान रहने की जरूरत है जो आदिवासी के नाम पर राजनीति करते हैं। जिन्हें संस्कृति की समझ होती है, वह जानते हैं कि अलगाव और बंटवारे से कोई भी समाज आगे नहीं बढ़ता है, हां, उसका विकास जरूर प्रभावित होता है। अमृता प्रितम ने एक जगह लिखा है कि राजनीति बांटने में ही विश्वास और विकास करती हैै और संस्कृति जोडऩे और जुडऩे में ही अपने वजूद को कायम रख पाती है।
 सांस्कृतिक वैशिष्टï्य के बावजूद यह स्वीकार करना पड़ेगा कि झारखंड की स्थिति दिनोंदिन बदतर होती जा रही है। खनिज संपदा से भरपूर इस प्रदेश का आम आदमी गरीबी, कुपोषण और बीमारी से जूझता हुआ अपनी अंतिम यात्रा की ओर बढ़ता जा रहा है। जो सपने देखे थे, अलग झारखंड के और विकास के, वे अब भी अधूरे हैं। दूसरी ओर विकास के नाम  लोगों के विस्थापन के मद्देनजर बनी पुनर्वास की नीतियां कितनी कारगर हैं, यह कोई छिपी बात नहीं है। सोचना होगा कि आखिर हीरानागपुर कहलाने वाला यह प्रदेश क्यों दिन ब दिन 'कंगालÓ होता जा रहा है, क्यों लाखों लोग पलायन के लिए विवश होते रहे हैं, क्यों आदिवासी लड़कियां अपने 'देसÓ से दूर परदेस में जाने के लिए विवश होती हैं? हमें अपनी संस्कृति और अस्मिता को बचाने के लिए इन सवालों से टकराना ही होगा, अन्यथा 'अखराÓ सूना हो जाएगा, क्या हम ऐसा ही चाहते हैं?..... 

मंगलवार, 2 नवंबर 2010

बचपन की दिवाली

संजय कृष्ण : दिवाली आते ही बचपन की यादें ताजा हो जाती हैं। सोचता हूं यादों में खोना आदमी की फितरत तो नहीं। क्या यह मजबूरी है? आदमी क्या अपने बस में है? फिर यादें कैसे बस में हो सकती हैं? लेकिन यादें हैं कि बरबस याद आने लगती हैं। अब दिवाली को ही देखिए? बचपन में दिवाली की आहट आने से ही मन तरंगित होने लगता था। तरह-तरह के सपने तैरने लगते थे। इच्छाएं आकाश चूमने लगती थीं। तब, स्कूल जाना काफी बोरिंग लगता था। एक-एक पल जैसे पहाड़ लगता। कब दीवाली आए और घरों, मुंडेरों पर दीप जलाएं। जगमग करे सारा जहां। आखिर, प्रकाश किसको प्रिय नहीं होता! कहा भी तो गया है, तमसो मां ज्योतिर्गमय:। रात के अंधेरे में दीपों का उत्सव...। एक खूबसूरत समां। तो, बचपन की दीवाली सिर्फ इसलिए नहीं याद आ रही है कि हम मंदिरों, अपने घरों, पास-पड़ोस में दीप जलाते थे। याद इसलिए आ रहा है, दीवाली के बाद सुबह की घनघोर प्रतीक्षा करते। कब रात जाए और सुबह आए और दीपों को मुंडेरो, घरों से लूट लें...। इसके लिए कभी-कभी आपस में हम बच्चे झगड़ा भी कर लेते...। अब आप सोच रहे होंगे कि इन दीयों को लूट कर करते क्या होंगे। तो बता दें कि हम लोग दीयों को लूट का तराजू बनाते। दीयों को लेते और उसमें एक-एक दीये में तीन-तीन छेद करते और उसमें सूतली डालकर डंडी से बांध देते। डंडी का भी जुगाड़ हम लोग पहले कर लेते थे। लकड़ी के रोल में जो कपड़े लपेट कर आते, उस रोल का इस्तेमाल डंडी में करते। और, इस तरह हमारा तराजू बनकर तैयार हो जाता। अब बचपन बीते एक जमाना हो गया है। लेकिन यादों की हूंक उठती है तो मन बचपन में लौट जाता है। पता नहीं, आज के कान्वेंटी स्कूल में पढऩे वाले बच्चे अपने बचपन को आने वाले समय में किस तरह याद करेंगे?