बुधवार, 17 अगस्त 2011

जन की मुक्ति के योद्धा डॉ विनयन

संजय कृष्ण : भ्रष्टाचार के खिलाफ एक लड़ाई अन्ना हजारे भी लड़ रहे हैं और एक लड़ाई जेपी ने भी लड़ा था। तब जेपी ने इसे दूसरी आजादी का नारा दिया था। जेपी के इस आंदोलन में कई प्रतिभावान अपने कॅरियर को दांव पर लगाकर आंदोलन में कूद पड़े थे, उनमें एक नाम डॉ विनयन का भी है। विनयन अब हमारे बीच नहीं हैं। 18 अगस्त, 2006 को पटना मेडिकल कालेज में मलेरिया और टाइफाइड से जूझते हुए उन्होंने अंतिम सांसें ली। आजादी मिलने के एक महीने बाद 11 सितंबर, 1947 को झांसी में उनका जन्म हुआ था, लेकिन पैतृक स्थान आगरा था। आरभिंक पढ़ाई-लिखाई आगरा व लखनऊ में हुई। एमबीबीएस की फाइनल परीक्षा छोड़ यायावरी को ओर प्रवृत्त हो गए। हिमालय की ओर कूच किया और 40 दिन का उपवास किया। साधु-संतों का जीवन निकट से देखा तो इनके प्रति भी विरक्ति पैदा हो गई। पर सत्य की खोज के लिए अनवरत यात्रा जारी रही। स्वामी अग्निवेश के साथ राजनीति में पहला कदम रखा। लेकिन यह साथ ज्यादा दिनों तक नहीं रहा। इसी बीच अगस्त 1974 में दिल्ली में जेपी से भेंट हुई और जेपी के कहने पर बिहार आंदोलन से जुड़ गए। अगले महीने पटना पहुंचे और जेपी के निर्देश पर गांव स्तरीय सरकार गठन के लिए जहानाबाद आ गए। इसके बाद तो मृत्युपर्यंत जहानाबाद ही इनका हाल-मुकाम रहा। जहानाबाद इनकी कर्मभूमि रही। इसी धरती पर उन्होंने विचारों की सान को तेज किया और लगातार प्रयोग करते रहे।
विनयन का कुल जमा परिचय यही नहीं हैं। विनयन ने बिहार के पिछड़े जिले जहानाबाद से जो लड़ाई शुरू की, आगे चलकर उसने देश का भी ध्यान खींचा। विनयन ने गरीब-गुरबों की लड़ाई के लिए समय-समय पर कई संगठनों को खड़ा किया। इनमें 1980 में मजदूर किसान संग्राम समिति और 1988 में जनमुक्ति आंदोलन प्रमुख हैं। विनयन जंगल बचाने और जंगल पर आदिवासियों के अधिकार को लेकर नेशनल फ्रंट आफ फारेस्ट पीपल एंड फारेस्ट वर्कर्स का आरंभ किया। इस संगठन ने बिहार-झारखंड-उत्तर प्रदेश के कई सीमावर्ती जिलों में काफी काम किया। आगे चलकर, 2006 में वन अधिकार अधिनियम जो बना, उसमें इस आंदोलन की ही देन प्रमुख है। विनयन कई संस्थाओं से भी जुड़े रहे इनमें लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी, मसूरी  योजना आयोग प्रमुख है। योजना आयोग की बैठकों में वे जाते रहे।  जहानाबाद विनयन का केंद्र था, लेकिन कैमूर की पहाडिय़ों से लेकर रांची की पहाडिय़ों तक उनका कार्यक्षेत्र फैला हुआ था। दलित-आदिवासी, असंगठित मजदूरों, भूमिहीनों के साथ-साथ महिलाओं और पिछड़ों की लड़ाई को भी विनयन ने एक धार दी। उसे एक तार्किक जामा पहनाया। हिंसा में विश्वास नहीं करने वाले विनयन ने एक समय मजदूरों और दलितों की लड़ाई के लिए नक्सली संगठनों से भी हाथ मिलाया। जिसके कारण उन्हें नक्सली करार देकर एक लाख का इनाम भी घोषित कर दिया गया। पर, हिंसा को कभी मन से स्वीकारा नहीं। 
विनयन की प्रतिभा एक क्षेत्र तक सीमित नहीं रही। पढऩा, सोचना, नई बातों पर बहस करना उनका प्रिय शगल था। पटना के एएन सिन्हा संस्थान से लेकर जेएनयू और दिल्ली विवि के बौद्धिक केंद्रों में बैठकी करते। मीडिया से लेकर पुलिस और गुप्तचर विभाग तक उनको जानने-मानने वाले लोग थे। कभी-कभी गुप्तचर विभाग वाले ही उन्हें आगाह भी करते थे।
विनयन धार्मिक नहीं थे लेकिन चर्च का रैडिकल तबका, प्रगतिशील मुस्लिम व सिक्खों के संगठन के बीच भी लगातार आवाजाही करते रहे। जब बिहार सरकार ने एक लाख का इनाम रखा था तो चर्च ने ही उन्हें संरक्षण दिया था। जहानाबाद का अरवल कांड काफी चर्चित हुआ था, जिसमें पुलिस ने 23 लोगों की नृशंस हत्या कर दी। यह अप्रैल, 1986 का साल था। अरवल में मजदूर किसान संग्राम समिति की शांतिपूर्ण सभा हो रही थी, जिस पर पुलिस ने अंधाधुंध गोलियां चलाई। पुलिस के इस नरसंहार ने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींचा। 
विनयन संपूर्ण क्रांति से लेकर नक्सल आंदोलन और सुधारवाद से लेकर गांधीवाद तक का सफर तय करते रहे। गांधी की तरह लगातार प्रयोग करते रहे। किसी खास विचारधारा के कायल कभी नहीं रहे। प्रयोग के तौर सबको आजमाया जरूर। लेकिन किया वहीं, जो विवेक ने कहा।
जब 1992 में देश में सांप्रदायिकता का उभार हो रहा था, मंदिर-मस्जिद का विवाद गहरा रहा था, तब विनयन ने पटना से अयोध्या तक पदयात्रा की। एक मार्च से लेकर 15 मार्च तक। इस पदयात्रा में सौ लोग शामिल हुए जिनमें छह महिलाएं, 20 आदिवासी एवं अधिकांश हरिजन, पिछड़े व कुछ ऊपरी जातियों के थे। यही नहीं, इसमें तीन ईसाई, एक मुस्लिम और बाकी हिंदू थे। इस तरह वह एक ओर सामंतों से लड़ रहे थे तो दूसरी ओर सांप्रदायिकता से। इन लड़ाइयों के अलावा आगे जो खतरा देख रहे थे, वह था बहुराष्ट्रीय कंपनियों को। तब अपने एक इंटरव्यू में कहा था, 27-28 सालों तक हमने खेत मजदूरों की लड़ाई लड़ी जो भू-स्वामियों, सामंती सोच वालों अैर राजसत्ता के खिलाफ थी। मगर आज बहुराष्ट्रीय कंपनियों का खतरा सामने खड़ा है। इस खतरे के सामने तो खेत मजदूर क्या और किसान क्या? बड़े किसान भी इस खतरे से बच नहीं पाएंगे, तो छोटे किसानों की औकात क्या?
विनयन का यह दूरदर्शितापूर्ण विचार क्या आज का हकीकत नहीं है? झारखंड, छत्तीसगढ़, कर्नाटक, मध्यप्रदेश तक.....क्या देश की खनिज संपदा को लीलने के लिए बहुराष्ट्रीय कंपनियां आतुर नहीं हैं?
आज विनयन नहीं हैं। उनके विचार जिंदा है। हर साल उनकी बरसी पर जहानाबाद जिले के नवादा आश्रम में उनके चाहने वाले एकत्रित होते हैं, उन्हें याद करते हैं। क्या आपको विनयन की याद नहीं?

शनिवार, 13 अगस्त 2011

नागार्जुन की पाषाणी

संजय कृष्ण : आजादी के दो महीने पहले जून, 1947 में नागार्जुन की लंबी मिथकीय रचना पाषाणी छपी थी। यह कविता युगधारा, रत्नगर्भ, भूमिजा में इसे संकलित किया गया था। हालांकि पहली बार यह रचना इलाहाबाद से निकलने वाली त्रैमासिक पत्रिका प्रतीक में 1947 में प्रकाशित हुई थी। यह लंबी कविता नागार्जुन ने बरवै छंद में रची। यह छंद, बकौल नागार्जुन कवि गुरुओं का मनचीता (प्यारा) है। इस छंद को रहीम ने भी पसंद किया है और बाबा तुलसी ने भी। तुलसीदास ने तो इस छंद में बरवै रामायण की रचना ही की है। कहते हैं, प्रतीक में जब यह रचना प्रकाशित हुई थी तो इसे काफी लोगों ने पसंद किया था। इसी छंद में आगे चलकर नागार्जुन ने भस्माकुंर खंड काव्य की रचना की। पाषाणी, अहिल्या पर केंद्रित लंबी कविता है। करीब 220 पंक्तियां। रचना पुरुष सत्ता के क्रूर, क्षणमति, दुर्विग्ध संशय को रेखांकित करती है। विष्णुचंद्र शर्मा नागार्जुन की पक्षधरता को देख वे महाकवि से विभूषित करते हैं। उनके शब्द हैं, ...भिक्षुणी, चंदना, पाषाणी, जया जैसी कविताओं में नागार्जुन, किसान और नारी को मुक्ति की प्रगतिशील भूमिका पर जोर देने वाले आज हिंदी जगत के महाकवि हैं। नागार्जुन ने अपनी बात कहने के लिए, आरंभिक समय में मिथकों का सहारा लिया था। जब हिंदी साहित्य में स्त्री विमर्श उपस्थित नहीं हुआ था, नागार्जुन स्त्री पक्षधरता पर कविता लिख रहे थे। उनके लिए अहिल्या से बड़ा चरित्र कोई दूसरा नहीं दिखाई दिया। अहिल्या छल की मारी थी। पति ऋषि गौतम ने शाप दे दिया। वह पाषाणी हो गई। अहिल्या नाम भी शायद इसलिए पड़ा कि वह हिल-डुल नहीं सकती। अहिल्या का एक अर्थ नागार्जुन ने  उद्बोधन नामक कविता में भी खोला है। पाषाणी के साथ उद्बोधन को भी पढ़ा जाना चाहिए।
नागार्जुन जब अपनी कविता की शुरुआत करते हैं, इन आरंभिक पंक्तियों में पूरा वातावरण उपस्थित हो जाता है। वह बताता कि बिना स्त्री के घर, परिवार ही नहीं, आश्रम भी संस्कारविहीन हो जाते हैं। यह नारी की प्रतिष्ठा है। राम जब आश्रम में पहुंचते हैं, उन्हें आश्रम शून्यप्राय दिखाई देता है। यत्र-तत्र तृण उग आए हैं। सारा प्रांगण था संस्कारविहीन दिखाई पड़ता है।
राम देखते हैं
आंगन से हटकर कुछ थोड़ी दूर
एक झोंपड़ी थी उत्तर की ओर
वहां पहुंचकर देखा अद्भुत दृश्य:
भू-लुंठित थी नारी-प्रतिमा, ओह!
ग्लानि-क्षोभ का वैसा करुण प्रतीक
देख सामने राम रह गए दंग
वहीं धम्म से बैठ गए तत्काल...
लक्ष्मण पूछते हैं
साधारण-सी इस प्रतिमा में, आर्य!
क्या है जिससे हुआ आपको खेद?
राम लक्ष्मण से चुपचाप बैठने को कहते हैं और पाषाणी के मुखमंडल को निर्निमेष निहारते हैं। थोड़ी देर बार पाषाणी के पास आते हैं, मूर्ति को स्पर्श करते हैं। शिर से लेकर तलवे तक अंग-प्रत्यंग। पूरे मनोयोग से राम हाथ फेरते हैं। हाड़ों का वह शिलाभूत संसार हिलता है डोलता है तो दाशरथी रोमांच से भर जाते हैं। वे लक्ष्मण की ओर देखते हैं और लक्ष्मण नि:शब्द उत्तर देते हैं। और, इस तरह राम पाषाणी में प्राण संचार करते हैं।
नागार्जुन पाषाणी के मुंह से कहलवाते हैं-
'कौन देव, तुम मेरे हृदयाधार ?
असुर क्रूर, तो सुर होते हैं धूत्र्त;
क्षणमति होते किन्नर औÓ गंधर्व,
दुर्विग्ध संशयी, हृदय से हीन
होता मानव, तुम हो उससे भिन्न!
धन्वंतरि का कर-पल्लव-संस्पर्श
सुनती हूं, करता अमरत्व प्रदान
धनश्याम, बतालाओ, तुम हो कौन?
पाषाणी में डाल दिए हैं प्राण।Ó
राम ने विनीत होकर अपना परिचय दिया। राम ने पाषाणी से परिचय
अहोभाग्य ! मैं किंतु, पूछ लूं नाम,
गोत्र और कुल...कैसा यह अभिशाप?
'गौतमदार अहिल्या मेरा नाम
यहीं कहीं होंगे मुनि भी हे राम!
दिया उन्होंने मुझको यह अभिशाप: पर नर दूषित, पुंश्चलि, तेरी देह, हो जाए निस्पंद कुलिश-पाषाण।Ó
अहिल्या अपनी पूरी कथा बताती है। कि उसने अपने पति को छोड़ किसी का ध्यान नहीं धरा। वह पूछती है, यदि कोई पति का रूप धरकर आ जाए तो उसका क्या दोष?
पति के इस अन्याय से ही पाषाण हो गई। अहिल्य अपनी व्यथा सुनाते-सुनाते उसकी आंखों से अश्रु की धारा बहने लगी। राम उसके उत्तरीय से आंसू पोछते हैं। राम आश्वासन देते हैं, रोवे मत, देवि!
अब न होगा आपको कोई कष्ट!
गदगद होकर मुनिपत्नी ने कहा धन्य!
पाकर तेरे करकमलों का स्पर्श
प्राणवंत हो उठा आज का पाषाण
अहिल्या राम से कहती है, क्या भूल तो नहीं जाओगे। राम कहते हैं, क्या तुम रघुकुल की रीति नहीं जानती। राम अहिल्या के दोनों पैर छूकर प्रतिज्ञाबद्ध होते हैं कि जीवन भर वह तुम्हे रखेगा दया, नारी के प्रति कभी न होगा क्रूर, नही करेगा वह दूसरा विवाह। अहिल्या आशीष देती है-'पाया जिसने तुम सा राजकुमार
युग-युग जियो दयालु, दीन जन बंधु, होगी तुमसे प्रजा यथार्थ सनाथ...Ó आशीर्वाद ले दोनों भाई जनकपुर की ओर प्रस्थान कर जाते हैं। और, कविता समाप्त हो जाती है।
यही कविता का विषय है। अहिल्या के उद्धार की। इस उद्धार में नारी की पीड़ा है। पुरुष सत्ता समाज में नारी कुचली जाती रही है। इस आधुनिक युग में भी स्त्री उपेक्षिता ही है। कविता जब रची गई थी, विमर्श के केंद्र में स्त्री नहीं थी। आजादी का आंदोलन चरम पर था। इस आंदोलन में स्त्रियां किसी से पीछे नहीं थी। नागार्जुन याद कर रहे थे। आजादी के बाद स्त्रियां अहिल्या की तरह शापित न हो। इसलिए इस प्रतीक का इस्तेमाल किया अपनी कविता में। इस कविता पर आलोचकों का ध्यान कम गया। शायद, इस मिथक से उन्हें परेशानी होती हो...। राम की प्रतिष्ठा इस कविता में की गई है। और, आलोचकों को राम का कंकड़ की तरह चुभ रहा है। हमने अपने प्रतीकों, मिथकों को संघ के हवाले कर दिया है। इन बात नहीं की जा सकती। बात करना पुराणपंथी करार दिया जा सकता है। पर, नागार्जुन हैं कि मानते ही नहीं। बार-बार पुरौणिक जंगलों में घूमने लगते हैं। क्या यह संस्कृत का प्रभाव था, पाली को या...।
नागार्जुन की इस कविता के साथ एक और कविता पढ़ा जाना चाहिए उद्बोधन।
जाने किस गौतम का पाकर शाप
सारी धरती बनी अहल्या हाय
यहां कवि ने इसका अर्थ दिया है,  हल से कृषि करने के अयोग्य धरती। वह आह्वान करते हैं कि
भील, गोंड, हो, मुंडा, औÓ संथाल
अब भी तो विकसित हों तेरे बाल
देखो तुमसे मांग रहे द्युति दान
निर्विकल्प निश्चल सौ-सौ दिनमान
उठो, उठो, उठ जाओ विंध्य महान! यह रचना सितंबर, 1947 में रची गई थी। यह भी युगधारा में संकलित है। नागार्जुन इस कविता में अगस्तय की धूर्तता का वर्णन करते हैं कि जिसमें उन्होंने विंध्य की पहाड़ी को अपने दक्षिण प्रवास से लौटने तक विनयावनत रहने की आज्ञा दे जाते हैं। नागार्जुन अगस्त्य की धुतर्ता को लक्ष्य करते हुए विंध्य को उद्बोधन देते हैं, उठो, उठो।
झारखंड सतपुड़ा सदृश तव स्कंध !
रत्नाकर हो अगर तुम्हारा नाम
सागर को क्या कुछ होगी आपत्ति?
अबरख और कोयला और पेट्रोल
...
अंदर दबी पड़ी हैं सौ-सौ खान
उठो, उठो, उठ जाओ विंन्ध्य महान! मांग रहा युग तुमसे जीवन दान।
क्या इन कविताओं का पुनर्पाठ नहीं होना चाहिए।

गुरुवार, 11 अगस्त 2011

छत्तीसगढ़ की राह पर झारखंड

संजय कृष्ण : झारखंड भी अब छत्तीसगढ़ की राह चल पड़ा है। यहां भी एसपीओ भर्ती अभियान तेज हो गया है। इसका दूसरा पहलू यह है कि पुलिस-माओवादियों के बीच अब एसपीओ (स्पेशल पुलिस आफिसर) भी पिसने लगे हैं। पुलिस इन्हें भर्ती करती है। मारे जाने पर इनसे अपना पल्ला झाड़ लेती है। माओवादीे इन्हें अपने निशाने पर ले रहे हैं क्योंकि ये उनकी गतिविधियों की जानकारी पुलिस तक पहुंचाते हैं।
गत 25 जुलाई को खूंटी-चाइबासा मुख्य पथ पर 40 वर्षीय विक्रांत लोहरा की गोली मारकर हत्या कर दी गई। पुलिस अब इस बात से पल्ला झाड़ रही है कि वह एसपीओ था। उसकी पत्नी सुमी देवी कहती है कि 2006 से वह एसपीओ था। इसके अलावा वह ठेकेदारी भी करता था। उसके छह बच्चे अब अनाथ हो गए। कुछ लोग कहते हैं कि वह पहले माओवादी था। पुलिस एसपीओ में या तो पूर्व माओवादियों को शामिल कर रही है या फिर आदिवासी युवकों को। यह पहली घटना नहीं है। पिछले साल 18 नवंबर को बुंडू प्रखंड के बारूहातू गांव में प्रदीप मुंडा सहित तीन लोग मारे गए। दो उसके मित्र थे और एक बच्ची भी माओवादियों की फायरिंग में मारी गई। माओवादियों ने उसपर पुलिस मुखबिरी का आरोप लगाया था। प्रदीप भी एसपीओ था। प्रदीप और उसके दो बड़े भाई कुलजीवन सिंह मुंडा (40)कुलदीप सिंह मुंडा (35) कभी माओवादी दस्ते में सक्रिय थे। वे विचारधारा से प्रभावित होकर नहीं, आर्थिक मजबूरियों के कारण दस्ते की ओर आकर्षित हुए थे। बाद में मोहभंग हो गया और एसपीओ में शामिल हो गए। प्रदीप के मारे जाने के बाद पुलिस ने हाथ खड़े कर दिए। कहा, वह एसपीओ नहीं था। प्रदीप की पत्नी लखीमनी ने बताया कि वह (प्रदीप)पुलिस कैंप में सोने जाता था। कभी-कभी घर पर डबल बायरल बंदूक भी लेकर आता था। वह स्पष्ट कहती है कि पुलिस के साथ काम करने से पहले वह पार्टी के लिए काम करता था। प्रदीप के बड़े भाई कुलजीवन सिंह मुंडा भी बताते हैं कि वह पहले माओवादी थे। पिछले छह महीने से पुलिस के लिए काम कर रहे हैं। इन्हें तीन हजार महीने की भुगतान पर रखा गया, लेकिन आज तक इन्हें एक रुपया भी नहीं मिला। इस बाबत जब तत्कालीन एसएसपी प्रवीण कुमार से पूछा गया तो उनका जवाब था, झारखंड में एसपीओ नहीं हैं। एसपी अपने स्तर से माओवादियों की गतिविधियों व अन्य सूचना प्राप्त करने के लिए कुछ लोगों को रखता है। उन्हें इसके लिए पेमेंट भी किया जाता है। पुलिस को स्वीकार करने में आठ महीने लग गए। आठ जून को आईजी सह पुलिस प्रवक्ता एसएन प्रधान ने कहा कि तीन हजार एसपीओ पहले से काम कर रहे हैं। 34 सौ और भर्ती करना है। एसपीओ के लिए अस्सी प्रतिशत राशि केंद्र सरकार देती है और 20 प्रतिशत राज्य सरकार। अभी इसी महीने की पांच जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने एसपीओ की भर्ती को असंवैधानिक करार दिया है। केंद्र सरकार को भी आड़े हाथों लेते हुए कहा कि 'केंद्र सरकार सुनिश्चित करे कि कोई भी धन एसपीओ भर्ती के लिए न जाए।Ó मानवाधिकार कार्यकर्ता व एसेसमेंट एंड मानिटरिंग आथारिटी (योजना आयोग) के सदस्य ग्लैडसन डुंगडुंग कहते हैं कि 'पुलिस अब माओवादियों से सीधे लड़ाई न लड़कर अप्रत्यक्ष लड़ाई लडऩा चाहती है। एसपीओ की भर्ती व उन्हें हथियार देना संविधान का उल्लंघन है। पुलिस की इस स्ट्रेटजी से गांव-गांव में विभाजन होने लगा है। यदि पुलिस को एसपीओ भर्ती करना ही है तो नियमबद्ध करे। क्योंकि इनके मारे जाने के बाद वह इनसे पल्ला झाड़ लेती है। स्टेट के लिए लडऩे के बावजूद उन्हें शहीद का दर्जा भी नसीब नहीं होता।Ó प्रदेश के डीजीपी गौरी शंकर रथ कहते हैं कि प्रदेश में तीन हजार एसपीओ हैं। तीन हजार और बहाली करनी थी। सुप्रीम कोर्ट के निर्णय से तत्काल इस पर ब्रेक लग गया है। हालांकि नौ स्टेट के 81 जिलों में एसपीओ हैं। इनकी संख्या 13566 है जबकि 12000 और भर्ती करना है। इनमें छत्तीसगढ़ और झारखंड पर विशेष जोर है।