शुक्रवार, 4 अक्तूबर 2019

16 वीं शताब्दी का नवरतन गढ़ किला

 रांची से दक्षिण-पश्चिम में 40 मील दूर डोयसा नगर अब एक गांव की शक्ल ले चुका है। गुमला जिले के सिसई थाने का यह गांव कभी नागवंशियों की राजधानी थी। पर, आज उपेक्षा का दंश झेलते-झेलते खंडहर में तब्दील हो चुका है। यह सिर्फ नवरतन गढ़ किले की मार्मिक कहानी नहीं है। राज्य में फैले अनेक किले अपनी इस दुर्दशा पर आंसू बहा रहे हैं। पलामू के चेरो राजाओं का किला हो या फिर कोई ऐतिहासिक मंदिर। राज्य न इनके रख-रखाव को लेकर गंभीर रहा है न इन स्थलों को पर्यटन स्थल विकसित करने को ले गंभीर। यह अलग बात है कि सैकड़ों सालों से ये प्रकृति के थपेड़ों को सहते आज भी अपने अस्तित्व को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं।
नवरतन गढ़ का किला भी इनमें से एक है। करीब एक सौ एकड़ में फैला यह किला नागवंशियों द्वारा मुगल स्थापत्य का पहला राजमहल माना जाता है। अपने अनूठे मौलिक सौंदर्य व स्थापत्य कला के कारण खास पहचान बनाने वाले इस राजमहल का निर्माण 16 वीं शताब्दी में नागवंशी राजा दुर्जन शाल ने कराया था। दुर्जन शाल ग्वालियर के किले में 12 साल तक बंद था। बंदी का कारण लगान नहीं देना था। इब्राहिम खान 1615 में बंदी बनाया था। बाद में हीरे का पारखी होने के कारण तत्कालीन इब्राहिम खान ने दुर्जन को 1627 में आजाद कर दिया। तब नागवंशी राजा की राजधानी खुखरा में थी। इब्राहिम खान ने दुर्जन के साथ एक ऐसे व्यक्ति को भी लगा दिया, जो आर्किटेक था। इसके पहले नागवंशी राजा अपनी प्रजा के साथ घुल-मिलकर रहते थे। प्रजा से थोड़ा बड़ा इनका आवास होता था। महलों की कल्पना झारखंड में नहीं थी। दुर्जन शाल को उस आर्टिटेक ने ही मुगल सम्राटों के महलों के जैसे एक महल निर्माण का सुझाव दिया। दुर्जन ग्वालियर में महलों की शानोशौकत देख चुके थे। सो, वह मान गए। महल निर्माण के लिए उन्होंने एक नए स्थान का चयन किया। डोयसा नामक गांव में किले की नींव रखी गई। इस तरह वहां नवरतन गढ़ नामक किले का निर्माण किया गया। सौ एकड़ से ऊपर फैले इस किले को झारखंड का हंपी कहा जाता है।
बदलती रही है राजधानी
नागवंशियों की राजधानी हमेशा बदलती रही है। नागवंशी देश का एकमात्र ऐसा राजवंश है, जिसकी पीढिय़ां आज भी जीवित हैं। इनका इतिहास प्रथम शताब्दी से शुरू होता है। इनके पहले राजा थे फणिमुकुट राय। चौथे राजा मदन राय तक राजधानी सुतियांबे में रही, किंतु पांचवें राजा प्रताप राय ने अपनी राजधानी सन् 307 में चुटिया ले गए। 29 वें राजा भीमकर्ण ने 1079 में खुखरा को राजधानी बनाया। 45 वें राजा दुर्जनशाल ने अपनी राजधानी डोयसागढ़ में बनाई। 1514 में यहां महाराज देवशाह, जो 48 वें राजा थे, ने एक गढ़ का निर्माण कराया, जिसे नवरतन गढ़ कहा गया। इसका निर्माण 1585 में हुआ। पुन: नवरतन गढ़ को छोड़कर 51 वें राजा यदुनाथ शाह को 1707 में पालकोट आना पड़ा। रातू उनकी अंतिम राजधानी है। यह गढ़ पांच मंजिला है। और प्रत्येक मंजिल पर नौ कमरे हैं। गढ़ के चारों ओर मंदिर थे। एक मंदिर में सुरंग थी जो गढ़ तक जाती थी। राज्य म्यूजियम के अध्यक्ष डा. सरफुद्दीन कहते हैं कि पांच मंजिल इस किले का एक मंजिल अंदर धंस गया है। इसलिए ऊपर चार मंजिल की दिखाई पड़ता है। किले के चारो ओर सुरक्षाकर्मियों के कोटर बने हुए हैं। रानी के रहने के लिए अलग किला है। उनके नहाने के लिए तालाब भी है। किले से तालाब तक एक सुरंग भी है। वे कहते हैं, इस किले को वल्र्ड हेरिटेज में शामिल करने के लिए प्रयास किया जा रहा है। वहीं रांची विवि के मानवविज्ञानी डा. बीएन सहाय गांव में इस किले को देख अचंभित हैं। कहते हैं, इसकी देखभाल ही नहीं, इसका पुनर्निर्माण किया जाना चाहिए। यह राज्य ही नहीं, देश की धरोहर है। चूना-सुर्खी और लाहौरी ईंटों से बना यह किला मुगल काल के स्थापत्य को भी दर्शाता है। 

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