शनिवार, 18 जनवरी 2020

धरती के हर प्राणी की चिंता करता है आदिवासी

हैदराबाद से आए डॉ सुरेश जगन्नाथम झारखंड के आदिवासी असुर-बिरजिया की मौखिक परंपरा पर काम कर चुके हैं। वे घुमंतू शोधार्थी हैं। केरल-कर्नाटक आदि प्रदेशों के आदिवासियों पर भी काम कर चुके हैं। खुद भी आदिवासी हैं। वे आदिवासी दर्शन के बाबत कहते हैं, आदिवासी केवल मनुष्य की चिंता नहीं करता। उसके चिंता के केंद्र में धरती का हर प्राणी और पूरा ब्रह्मांड है। वे कहते हैं, इस चिंता में हमारा पूरा मौखिक साहित्य भरा पड़ा है। वे नेतरहाट के असुरों के एक लोकगीत का जिक्र करते हैं। अभी आस्ट्रेलिया के जंगल में आग से लाखों जानवर मर गए। यहां सैकड़ों साल से यह गीत मौखिक परंपरा से चला आ रहा है-जंगल जल रहे हैं, जीव-जंतु भाग रहे हैं। शेर-भालू भाग रहे हैं, लेकिन जो छोटे-छोट जीव हैं, रेंगने वाले जीव हैं, वह कैसे भाग पाएंगे? इस गीत में छोटे जीव-जंतु के प्रति करुणा है, संवेदना है। दरअसल, यही आदि दर्शन है। 
वे कहते हैं, आदिवासी प्रकृति से अलग नहीं रह सकता है। तथाकथित सभ्य संस्कृति ने आदिवासियों से बहुत कुछ लिया, लेकिन आज वे पिछड़ा मानते हैं। सुरेश इसे एक उदाहरण से समझाते हैं। वे कहते हैं कि केरल में जब आप किसी के घर जाएंगे तो पानी जो मिलेगा, उसमें कुछ मिला हुआ होगा। वे जीरा को उसमें मिलाते हैं। यहां की जलवायु के लिए यह जरूरी है। लेकिन इसका मूल आदिवासी है। आदिवासियों में यह परंपरा मिलती है, जिसे लोगों ने अपनाया। अभी मकर संक्राति का पर्व बीता है। हम लोग भी मकर संक्राति मनाते हैं, लेकिन मकर संक्रांति के तीन तीन बाद। हम इसमें अपने पूर्वजों को याद करते हैं। हम पांच से सात पीढ़ी तक के पूर्वजों को उनके पसंद के व्यंजन परोसते हैं। पीढिय़ों से चले आ रहे इस विश्वास को अगली पीढ़ी को सौंपते हैं। इसमें किसी प्रकार का तर्क नहीं, यह हमारा विश्वास है। इसका मकसद यही है कि हम अपने पूर्वजों को कतई न भूलें।
वे इस बात पर चिंता व्यक्त करते हैं कि आज धरती को उपभोक्तावादी संस्कृति लील रही है। जल, जंगल, जमीन खत्म होते जा रहे हैं। जहां आदिवासी आबादी है, वहीं जंगल सुरक्षित है। चाहे अपने देश की बात हो या विदेश की। आदिवासी संस्कृति का मूल एक ही है, भले भाषा अलग-अलग हो। आज हमारी भाषा, संस्कृति के सामने भी कई चुनौतियां हैं। इनका सामना करना होगा। हवा, पानी की शुद्धता जंगल पर निर्भर है, लेकिन जंगलों को बेरहमी से काटा जा रहा है। इस विकास के मॉडल को बदलना होगा।

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