बुधवार, 22 जनवरी 2020

आजादी की लड़ाई में पलामू के योद्धाओं ने लिखी इबारत

देश की आजादी में पलामू का भी योगदान रहा है। मुल्क को आजाद कराने में पलामू के युवकों ने हर स्तर पर कुर्बानी दी। इसमें स्वतंत्रता सेनानी केश्वर विश्वकर्मा, हरिनाराण वाजपेयी, महावीर प्रसाद, नीलकंठ सहाय, यदुवर सहाय समेत कई योद्धा शामिल थे। इनमें अब नीलकंठ सहाय को छोड़कर इस दुनियां में कोई नहीं रहा। हां स्वतंत्रता की लड़ाई में उनकी कुर्बानी की गाथा लोगों को याद है। जरूरत है नवयुवकों को अंग्रेजी शासनकाल में उनकी छीन ली गई शारीरिक,आर्थिक,सामाजिक व राजनीतिक आजादी की कहानी से रूबरू कराने की। प्रस्तुत है  पलामू जिला के विश्रामपुर प्रखंड के कंडा गांव निवासी स्वतंत्रता सेनानी स्वर्गीय केश्वर विश्वकर्मा की कहानी।

केश्वर विश्वविश्वकर्मा
वर्ष 1918 में रामजतन विश्वकर्मा के घर पर केश्वर विश्वकर्मा का जन्म हुआ। उनकी प्रारंभिक शिक्षा कंडा गांव में हुई थी। वे समाज में मृदुभाषी व कोमल स्वभाव के व्यक्ति के रूप में पहचाने जाने लगे। केश्वर विश्वकर्मा होश संभालते ही अंग्रेजी हुकूमत का विरोध शुरू कर दिया। जवान होते ही भारतीयों के शोषण के खिलाफ वे आजाद भारत अभियान में कूद पड़े। उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा कि क्या खोया व पाया। भारत आजाद हुआ और अपने परिजनों के साथ आजाद भारत में 68 बसंत देखे। उन्होंने अपने 18 वर्ष की उम्र में कांग्रेस से प्रभावित होकर 1936 में कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण की। वे अपने साथियों के साथ मिलकर अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन में कूद पड़े। 1940 में रामगढ़ में हुए कांग्रेस अधिवेशन में भाग लिया। 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आसपास के दर्जनों पुल-पुलिया को काटकर सड़क अवरुद्ध कर दिया। इनकी देश भक्ति देख अंग्रेजी शासन आक्रोशित हो उठा। अंग्रेजो ने इन्हें पकडऩे के लिए स्थानीय लोगों के साथ मिलकर अभियान चलाया। स्व.विश्वकर्मा अपने साथियों के साथ मिलकर सड़क काट रहे थे कि इसी बीच रास्ते से गुजर रही अंग्रेजी फौज की निगाह उन पर पड़ गई। अंग्रेज सिपाही उन्हें गिरफ्तार कर पटना के फुलवारी शरीफ स्थित कैंप जेल में डाल दिया। वहां 50 रुपये जुर्माना के साथ 18  माह तक की सजा काटी।

पुत्र के जेल जाते ही पिता चल बसे
जेल जाने की खबर को केश्वर विश्वकर्मा के पिता रामजतन विश्वकर्मा सहन नहीं कर सके। उनका हर्ट अटैक हो गया। इससे उनकी मौत हो गई। जेल से निकलने के 9 माह बाद 1943 मे राष्ट्र पिता महात्मा गांधी की भारत छोड़ो आंदोलन के शांत होते अन्य लोग भी जेल से बाहर आए। इसके बाद केश्वर फिर अपने साथियों के साथ कांग्रेस में शामिल हो गए।

इंदिरा गांधी व एपीजे अबुल कलाम ने किया था पुरस्कृत
स्वतंत्रता सेनानी स्व केश्वर विश्वकर्मा की मुलाकत देश के प्रथम राष्ट्रपति डा. राजेंद्र प्रसाद व प्रधान मंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू से भी हुई। उनसे वे काफी प्रभावित होकर देश प्रेम व सेवा में अपना जीवन समर्पित कर दिया। देश की प्रथम महिला प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी से उनकी 1972 में मुलाकात हुई। उन्हें प्रधानमंत्री ने ताम्र पत्र से  नवाजा था। देश के तत्कालीन राष्ट्रपति एपीजे अबुल कलाम ने 2003 में दिल्ली स्थित राष्ट्रपति भवन बुलाकर उन्हें सम्मानित किया था।

 कंडा गांव में रखी गांधी आश्रम की नींव
केश्वर विश्वकर्मा राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या को सहन नहीं कर सके। वे हर रोज रात में घर में बैठकर रोते रहते थे। घर वालों की ओर से पूछने पर वे सहज ही बताते थे कि जिसने देश को आजाद कराया उसे मौत की सजा मिली। स्व. विश्वकर्मा गांधी जी से इतने प्रभावित थे कि वे गांव में ही गांधी स्मारक भी बनाने का संकल्प लिया। वे कंडा गांव स्थित एनएच 98 के किनारे गांधी आश्राम की नींव गांधी जी के दशगात्र के दिन 1948 में रखी। यह आज भी कायम है।

10 वर्षो तक की सरकारी सेवा
भारत को आजाद होने के बाद स्थानीय जिला प्रशासन की पहल पर स्व. विश्वकर्मा ने नौकरी भी की। वे गांव स्थित कंडा के डाकघर में 10 वर्षो तक सेवा की। वे नौकरी में बंधे रहना नहीं चाहते थे। वे नौकरी को छोड़कर समाज सेवा में कूद पड़े। इससे उनकी लोकप्रियता क्षेत्र में दिन प्रतिदिन बढ़ती गई। वे जीवन के अंत तक समाज सेवा के क्षेत्र में जुटे रहे।

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