सोमवार, 20 जनवरी 2020

योगदा आश्रम शांति का परम धाम




रांची स्टेशन से थोड़ी दूर स्थित योगदा आश्रम शांति का परम धाम है। शहर के बीचोंबीच इस आश्रम में पहुंचने से शहर का सारा शोरगुल शांत हो जाता है। यहां आने पर लगता है, हम किसी दूसरी दुनिया में आ गए हैं, जहां सिर्फ  शांति ही शांति है। प्रांगण की हरियाली, विभिन्न प्रकार के फूल खिलखिलाते हुए हर आंगतुक का स्वागत करते हैं और उन्हें सुकून बख्शते हैं। यहां वैसे तो हमेशा कार्यक्रम होते रहते हैं, लेकिन 'शरद संगमÓ कार्यक्रम सबसे बड़ा आयोजन होता है। यह शरद ऋतु में होता है। आश्रम क्रिया योग की पाठशाला है। 
1917 में स्थापना
रांची में योगदा सत्संग सोसाइटी आफ इंडिया की स्थापना 1917 में परमहंस योगानंद ने की थी। सात मार्च, 1977 को उनके सम्मान में एक डाक टिकट जारी करते हुए भारत सरकार ने कहा था, 'उनका स्थान भारत के महानतम संतों में हैं। उनका कार्य लगातार बढ़ रहा है। उनकी कांति विश्व भर के सत्यान्वेषियों को ईश्वर-प्राप्ति के मार्ग पर आकर्षित कर रही है।Ó युवकों की शिक्षा में परमहंस जी की गहन अभिरुचि थी। 
राजा ने दी दान में जमीन
सन् 1918 में कासिम बाजार के महाराज मणींद्र चंद्र नंदी ने रांची में अपने महल और पचीस एकड़ भूमि आश्रम एवं विद्यालय के लिए दान दे दी, जिसे योगदा सत्संग ब्रह्मचर्य विद्यालय कहा जाता था। अब यह योगदा सत्संग शाखा मठ बन गया, जो पत्राचार कार्यालय एवं योगदा सत्संग पाठमाला एवं योगदा सत्संग सोसाइटी के प्रकाशनों के वितरण केंद्र का काम करता है।
1920 में उन्हें उनके गुरु ने अमेरिका में हो रहे उदारवादियों के विश्व धर्म सम्मेलन में भारत के प्रतिनिधि के रूप में भेजा। उस समय पूरे अमेरिका का दौरा किया और व्याख्यान दिया। 1936 में परमहंसजी ने योगदा सत्संग सोसाइटी आफ इंडिया (वाइएसएस) को एक असांप्रदायिक और धर्मार्थ संस्था के रूप में पंजीकृत हुआ। वाइएसएस का पंजीकृत मुख्य कार्यालय योगदा सत्संग मठ है, जो दक्षिणेश्वर, कोलकाता में गंगा किनारे स्थित है। 
कौन हैं योगानंद परमहंस
उत्तरप्रदेश के गोरखपुर में परमहंस योगानंद जी का जन्म पांच जनवरी, 1893 को एक बंगाली परिवार में हुआ था। माता-पिता ने उनका नाम मुकुंद लाल घोष रखा। जन्म के कुछ समय बाद उनकी माता, उन्हें अपने गुरु लाहिड़ी महाशय के आशीर्वाद के लिए बनारस ले गईं। लाहिड़ी महाशय ने कहा, 'छोटी मां, तुम्हारा पुत्रा एक योगी होगा।Ó परम सत्य की खोज के क्रम में अपने गुरु स्वामी युक्तेश्वर गिरि जी के पास पहुंचे। सन् 1915 में दस वर्षों के आध्यात्मिक प्रशिक्षण के बाद योगानंद जी ने संन्यास का स्वामी पद ग्रहण किया। परमहंस ने मार्च 1952 में अपना शरीर त्यागा।  
क्रिया योग का पुनरुत्थान
2012 में आश्रम में क्रिया योग की 150 वीं वर्षगांठ मनाई गई। परमहंस जी ने अपनी योगी कथामृत में एक अध्याय क्रियायोग विज्ञान के लिए समर्पित किया है। स्वामी जी ने स्पष्ट किया कि यह वही विज्ञान है, जिसकी भगवान कृष्ण ने भागवतगीता में चर्चा की है और जिसका ज्ञान महर्षि पतंजलि को भी था। यह एक सरल मन:कायिक प्रणाली है, जिसके द्वारा मानव-रक्त कार्बन रहित तथा ऑक्सीजन से प्रपूरित हो जाता है। इस अतिरिक्त ऑक्सीजन के अणु जीवन प्रवाह में रूपांतरित होकर मस्तिष्क और मेरुदंड के चक्रों को नव शक्ति से पुन: पूरित कर देते हैं। प्राकृतिक नियम या माया के अंतर्गत मनुष्य की प्राण शक्ति का प्रवाह बहिर्विश्व की ओर होता है, जिससे उस शक्ति का प्रवाह इंद्रियों के दुरुपयोग के कारण व्यर्थ ही खत्म हो जाता है। मानसिक प्रक्रिया प्राण शक्ति अंतर्जगत की ओर बहती है और मेरुदंड-स्थित सूक्ष्म शक्तियोंं के साथ पुन: मिल जाती हैं। इस प्रकार प्राण शक्ति के प्रबलीकरण द्वारा योगी के शरीर तथा मस्तिष्क के कोष आध्यात्मिक अमृत से पुनर्नवीन हो जाते हैं। परमहंस जी ने कहा था, क्रिया योग गणित की तरह काम करता है। इसके परिणाम सुनिश्चित हैं। 

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