शनिवार, 25 जनवरी 2020

संताली साहित्य के सितारा पद्मश्री चित्त टुडू

पद्मश्री चित्त टुडू का जन्म एक दिसंबर 1929 को हुआ था। चित्त टुडू के पिताजी का नाम ढेना टुडू और मां का नाम तालो सोरेन था। टुडूजी का जन्म सहूपोखर गांव में हुआ था। यह गांव भागलपुर- दुमका रोड पर स्थित मंदार बैसि से 12 किलोमीटर दक्षिण और हंसडीहा से 15 किलोमीटर उत्तर में स्थित श्याम बाजार से पश्चिम लगभग एक किलोमीटर पश्चिम में स्थित है। श्यामबाजार में गाय-बैल, भेड़-बकरियों का बाजार लगता है, इसलिए इलाके का प्रसिद्ध हटिया है। सावा या सहूपोखर गांव संथालों का है। लगभग 70 परिवार यहां  रहता है। चित्त टुडू के मां-बाप का बचपन में ही देहांत हो गया था। उनके चाचा फाते टुडू की देखरेख और उन्हीं के प्यार से टुडूजी बड़े हुए। टुडुजी को मां का ममत्व और प्यार अपनी दादी से मिला!
सन् 1948 में मैट्रिक पास करने के उपरांत घर की आर्थिक हालत ठीक न होने पर वह राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की सलाह पर बिहार सरकार के सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग में प्रचार संगठन कर्ता के रूप में काम करने लगे। इसी विभाग में रहते हुए टुडुजी 1956 से गीतिनाट्य शाखा में संताली भाषा के संगठनकर्ता के रूप में काम करने ंलगे। नौकरी के नियम और टुडूजी की योग्यता को देखते हुए सरकार पदोन्नति करते रहे। 1958 में जनसंपर्क पदाधिकारी बन गए। 1959 में वह जिला जनसंपर्क पदाधिकारी बन गए। 1977 में उपजनसंपर्क निदेशक और 1984 में वह संयुक्त जनसंपर्क निदेशक बने। 1948 में मैट्रिक करने के बाद इनका विवाह पोड़ैयाहाट प्रखंड अंतर्गत साकरी गांव निवासी रानी मुर्मू से हो गया।  एक दिसंबर 1987 को सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के संयुक्त निदेशक के पद से अवकाश ग्रहण किया।
टुडू जी संताली साहित्य के आसमान का एक सितारा हैं। संताली साहित्य के विकास में उनका बहुमूल्य योगदान है। वह लेखक, कवि गीतकार, गायक और अनुवादक भी थे। वह हिंदी और संताली में साहित्य रचते थे। उन्होंने कई पुस्तकें रचीं। इनमें पंडित जवाहरलाल नेहरू की जीवनी, जावांय बाहू होरोक सेरेन्ज, सोना रेयाग सिकड़ी रूपा रेयाग माकड़ी, संताली लोक गीतों में मंदार पर्वत, मिलवा गाते पॉकेट पुथी (दोंग सेरेन्ज )आदि।
सन् 1976 से 1986 तक टुडुजी गणतंत्र दिवस के अवसर पर संताली नृत्यों का प्रदर्शन करवाते थे। इसके लिए उन्हें राष्ट्रपति और देश के प्रधानमत्री के हाथों सम्मान भी मिल चुका है। बिहार सरकार के प्रतिनिधि के रूप में वह पांच साल तक संगीत नाटक अकादेमी में सदस्य रहे। वह संताली सांस्कृतिक सोसाइटी के प्रथम उपाध्यक्ष भी रहे। सोसाइटी का जब सावा में शाखा विस्तार होता है तो वह वहां अध्यक्ष बनाया जाता है। वह आपने गांव में प्रथम से मैट्रिक तक की पढाई के लिए चंद्रशेखर आदिवासी उच्च विद्यालय, बांका बिहार का निर्माण करवाता है।.वह गरीब और निर्धनों की उन्नति के लिए लगातार काम करते थे। जिसके के कारण तत्कालीन राष्ट्रपति सी.आर.वेंकटरमण ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया। 1987 को बिहार सरकार की राजभाषा विभाग द्वारा पंडित जवाहरलाल नेहरू पुस्तक के लिए चार हजार रूपये से सम्मानित किया गया। टुडुजी एक कुशल प्रशासक, लेखक, कवि, अनुवादक के साथ-साथ गायक भी थे और मधुर आवाज में गाते भी थे। एक जुलाई 2016 को वे दुनिया छोड़ गए।
 -चंद्र मोहन किस्कू, संताली के युवा कवि

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