शुक्रवार, 21 फ़रवरी 2020

झारखंड के कण-कण में शिव की व्‍याप्ति

झारखंड का कंकर कंकर शंकर है। जहां देखिए, जहां खोदिए, वहीं कोई न कोई शिव लिंग का दर्शन हो जाता है। शिव का एक नाम झारखंडे भी है। अपने पूर्वी उत्तरप्रदेश में कई लोगों के नाम झारखंडे है। राज्य का नाम भी झारखंड। राज्य के नामकरण के पीछे शिव हैं या यहां का झाड़-झंखाड़, कहना मुश्किल है। हिंदी के महान कवि जयशंकर प्रसाद का एक नाम झारखंडे था। प्रसाद के पिता जी ने देवघर के बाबा शिव से आरजू की थी। पुत्र हुआ तो नामकरण देवघर में हुआ। देवघर शिव का घर है। वैसे, इसे देवताओं का घर भी कह सकते हैं। रांची पहाड़ी की सबसे ऊंची चोटी पर भगवान शिव विराजमान हैं। श्रद्धालु इन्हें पहाड़ी बाबा भी कहते हैं। यह मंदिर कितना प्राचीन है, कहना मुश्किल है। इस पहाड़ी की दूसरी गाथा भी है। अंग्रेजों ने कई स्वतंत्रता सेनानियों को यहीं पर फांसी पर लटकाया गया। रांची के बेड़ो महादानी शिव हैं। देवड़ी के पास हाराडीह में शिव मंदिर मिला है। आम्रेश्वर धाम विख्यात है हीं। सोनाहातू गांव में भी प्राचीन शिव मंदिर है।

360 शिवलिंग
भगवान शिव के ही एक अंश माने जानेवाले अनन्य राम भक्त हनुमान का ननिहाल झारखंड में ही है। उसे आंजन ग्राम के रूप में जानते हैं। गुमला जिले के अवस्थित आंजन ग्राम ही माता अंजनी और हनुमान का जन्मस्थल माना जाता है। गांव की सीमा पर स्थित एक पहाड़ी को आंजन पहाड़ भी कहा जाता है, जिसमें एक गुफा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार उसी गुफा में भगवान रुद्र स्वरूप हनुमान का अवतार हुआ था। एक मान्यता के अनुसार इस गांव में प्राचीन काल में 360 तालाब व उतनी ही संख्या में शिवलिंग थे। माता अंजनी में भगवान शिव की अनन्य भक्ति थी, जो प्रतिदिन एक-एक तालाब में स्नान कर एक-एक शिवलिंग की पूजा करती थीं। अब भी गांव में सौ से अधिक शिवलिंग मौजूद हैं, जो विभिन्न आकार-प्रकार के हैं। अंजनी गुफा में प्राचीन काल से स्थापित अंजनी माता की सुंदर प्रस्तर-प्रतिमा को आंजन गांव में एक मंदिर बना कर स्थापित कर दिया गया है। साथ ही मंदिर में एक सुंदर प्रतिमा भी स्थापित की गई है। इस तीर्थ की सबसे बडी विशेषता यह है कि वहां स्थापित प्रतिमा में माता अंजनी शिशु हनुमान को स्तनपान कराती दिखाई गई हैं। कहते हैं, इस मुद्रा की प्रतिमा देश के अन्य किसी भी तीर्थ में सुलभ नहीं है। आंजन ग्राम को भगवान शिव के श्रद्धालु भक्त विशेष फलदायक तीर्थ मानते हैं। ऐसा विश्वास है कि अंजनी गुफा के अंदर ही अंदर एक सुरंग है, जो पास बहने वाली खटवा नदी तक जाती है तथा जिससे होकर अंजनी माता नदी तक स्नान करने जाती थीं। अभी भी दूर दराज से लोग अंजनी माता के दर्शन करने आते हैं तथा खटवा नदी में स्नान कर भगवान शिव की पूजा-अर्चना करते हैं। इस स्थान को सिद्ध स्थल माना गया है और ऐसा विश्वास है कि यहां मनौतियां बहुत जल्दी फलवती होती हैं। विशेष कर सुयोग्य पुत्र प्राप्त होने की मनौती। गुमला में ही टांगीनाथ मंदिर है। इसे 12 वीं शताब्दी का माना जाता है। पहाड़ की चोटी पर स्थित मंदिर के पास एक विशाल त्रिशूल है। इस पहाड़ पर हजारों शिवलिंग बिखरे पड़े हैं। जहां खुदाई कीजिए, एक शिवलिंग निकल आता है।
गुमला के ही सिसई प्रखंड के नागफेनी गांव में प्रसिद्ध शिव मंदिर है। माना जाता है कि झारखंड में शैव मत वाले सर्वाधिक थे। इसीलिए यहां पर शिव लिंग काफी संख्या में मिलते हैं।

लोहरदगा के खखपरता शिव मंदिर के परिसर में सातवीं शताब्दी की 6 मूर्तियां मिली हैं। यहां मंदिर को भव्य रूप दिया गया और इस पर ओडिया शैली का प्रभाव है। यह अब पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित है।
हजारीबाग में बाराकर नदी के पास दूधपानी नाम की जगह है। वहां से 1894 में कुछ अभिलेख मिले थे। लिपि के आधर पर अभिलेख का काल 8वीं शताब्दी माना गया है। दूधपानी के पास ही दुमदुमा है। वहां पालकालीन (8वीं से 12वीं शताब्दी) मूर्तियां, पत्थर के अवशेष और शिवलिंग प्राप्त हुआ है। इसी जिले के मांडू प्रखंड के तिलैया गांव में तीन सौ साल पुराना शिव मंदिर है। विष्णुगढ़ में भी शिव का प्राचीन मंदिर है। गढ़वा के भवनाथपुर, कोडरमा, पूर्वी सिंहभूम के चित्रेश्वर मंदिर, धनबाद के झिझनी पहाड़ी पर 11 वीं शताब्दी का शिव मंदिर, राजमहल की पहाड़ी का शिव गद्दी, ढालभूम का कपिलेश्वर मंदिर अपने अतीत की याद दिलाते हैं। बेनी सागर की खुदाई में कई शिव मंदिर मिले हैं, मिल रहे हैं। बासुकी नाथ को कौन भूल सकता है।
रामगढ़ का प्राचीन कैथा मंदिर भी शिव को समर्पित है। इसी जिले में  पंद्रह सौ वर्ष पुरानी टूटी झरना मंदिर भी है। मंदिर की सबसे बड़ी खासियत यह है कि मां गंगा जल अर्पित करती हैं। शिव लिंग पर एक टूटी है, जिससे पानी निकलते रहता है। लोग मानते हैं कि इसका स्रोत गंगा हैं। कोडरमा का ध्वजाधारी धाम भी प्राचीन है। यहां जिले के अलावा गिरिडीह, हजारीबाग, धनबाद, बिहार के नवादा व गया से सैकड़ों की संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। ध्वजाधारी धाम में 777 सीढ़ी चढ़कर श्रद्धालु बाबा भोले को जलाभिषेक करते हैं।

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