शनिवार, 25 जनवरी 2020

फिल्मकारों का पसंदीदा लोकेशन है पतरातू डैम

रांची से करीब 40 किमी दूर पतरातू डैम पहले प्रवासी पक्षियों को ही आकर्षित करता था, अब दुनिया को करेगा। सात समंदर पार से पक्षी हर साल यहां आते हैं, महीनों रहते हैं और फिर चले जाते हैं। अब दुनिया के लोग भी पतरातू डैम का आनंद उठा सकेंगे। यहां रह सकेंगे। अब इसकी पहचान भी 'पतरातू लेक रिजॉटÓ केरूप में होगी। गांधी जयंती के मौके पर आज संध्या चार बजे इसका भव्य उद्घाटन सूबे के मुखिया रघुवर दास करेंगे। यह सरकार का ड्रीम प्रोजेक्ट था। 134 करोड़ रुपए से इसे टूरिस्ट डिस्टिनेशन के रूप में विकसित किया जा रहा है। पहले चरण में 68 करोड़ का काम पूरा हो चुका है। अभी म्यूरल आर्ट से दीवारें सजाई गई हैं। आकर्षक मुख्य द्वार, पैदल पथ का निर्माण, छठ घाट, चिल्ड्रेन पार्क, दुकानें, पार्किंग एरिया, गेस्ट हाउस, डैम टापू सब कुछ सुंदर और आकर्षित करने के लिए तैयार है। यहां आइए और फिर पतरातू घाटी का भी आनंद लीजिए। 
वैसे, घाटी हो या डैम, फिल्मकारों को भी आकर्षित करता रहा है। 2015 से जो सिलसिला शुरू हुआ, वह अब तक जारी है। रांची में फिल्म पीआर का काम देखने वाले संजय पुजारी बताते हैं कि सबसे पहली फिल्म यहां 2015 में शूट हुई थी। वह भोजपुरी फिल्म थी-नाचे नागिन गली-गली। इसके बाद 2016 मेंब काशी अमरनाथ, 2017 में हर-हर महादेव, हिंदी फिल्म, चरखारी, बेगम जान, 2018 में नागपुरी फिल्म महुआ, देवा रिक्शावाला, पंजाबी फिल्म रुपिंदर गांधी, रांची डायरी, रवि किशन की हिंदी फिल्म हंच, अर्जुन रामपाल की फिल्म नास्तिक, भोजपुरी फिल्म संघर्ष, 2019 में अक्षय खन्ना की हिंदी फिल्म सब कुशल मंगल आदि की शूटिंग इस इलाके में हुई। इस क्षेत्र में आने के बाद निर्देशक को पहाड़ की खूबसूरती, डैम, घाटी सब कुछ एक साथ एक ही जगह पर मिल जाते हैं। फिल्मों की शूटिंग होने से हमारे झारखंड सरकार को फायदा हो रहा है और यहां के स्थानीय कलाकारों को। होटल व ट्रैवल के क्षेत्र में भी रोजगार की संभावना बढ़ी है तो पर्यटक भी अब यहां आ रहे हैं। अब रिजार्ट बन जाने से यहां ठहरने की भी व्यवस्था हो गई है।
क्या-क्या है खास
पतरातू लेक रिसॉर्ट शहर की भीड़-भाड़, कोलाहल से दूर एक ऐसा पर्यटक स्थल है जहाँ बच्चे, बुजुर्ग एवं युवा यानी की हर उम्र के लोग ख़ुशी का अनुभव कर सकते हैं। यहां वॉटर पार्क में विभिन्न प्रकार के वॉटर स्पोर्ट्स, जैसे जेट स्कीइंग, हाई स्पीड मोटरबोट, पड़ले बोट, कस्ती और पैरासेलिंग का अनुभव किया जा सकता है। इसके अलावा एम्यूजमेंट पार्क में वॉल क्लाइम्बिंग, बंजी जंपिंग, मल्टीलेयर्ड रोप कोर्स है। पतरातू में लगभग 21 एकड़ में फैला हुआ पतरातू लेक रिसॉर्ट में म्यूरल कलाकृति से सजा प्रवेश द्वार, दीवारें एवं स्तंभ, गोदना चित्रकला की याद दिलाते हैं। पतरातू लेक रिसॉर्ट को एक ओपन आर्ट गैलरी की तरह विकसित किया गया है, मुख्य द्वार से प्रवेश करते ही यहा देश के अलग-अलग राज्यों के 52 नामचीन एवं कुछ युवा कलकारों द्वारा बनायी गई म्यूरल कलाकृतियां लगाई गई हैं। सूर्यास्त का मनोरम दृश्य देखने के लिए नाव के जरिए पतरातू आइलैंड के सनसेट पॉइंट पर पहुंचा जा सकता है। सूर्यास्त देखने के लिए मचान और कूंच बनाए गए हैं।  इसके अतिरिक्त पर्यटकों के लिए यहां पर हस्तकला और फैंसी वस्तुएं खरीदने के लिए दुकान एवं स्वादिष्ट खान-पान के लिए उत्तम रेस्टोरेंट की व्यवस्था की गई है। पतरातू लेक रिसॉर्ट में बॉन फायर का आनंद लेने के लिए आठ ब्लॉक का कैंपिंग प्लींथ एरिया बनाया गया है। सुबह का शैर एवं संध्या का विचरण के लिए डैम के ऊपर 3.5 किमी का प्रोमेनार्ड बनाया गया है, जहां सैैलानी घूमते हुए प्रकृति का आनंद उठा सकते हैं। पर्यटकों के ठहरने के लिए यहाँ सभी सुविधाओं से युक्त आधुनिक गेस्ट हाउस की व्यवस्था है। पर्यटक अपनी सुविधा अनुसार कमरे या डॉरमेट्री में प्रवेश कर सकते हैं।
-------------
रांची से दूरी 40 किमी
रांची से कांके रोड होते हुए पतरातू डैम पहुंचा जा सकता है।

संताली साहित्य के सितारा पद्मश्री चित्त टुडू

पद्मश्री चित्त टुडू का जन्म एक दिसंबर 1929 को हुआ था। चित्त टुडू के पिताजी का नाम ढेना टुडू और मां का नाम तालो सोरेन था। टुडूजी का जन्म सहूपोखर गांव में हुआ था। यह गांव भागलपुर- दुमका रोड पर स्थित मंदार बैसि से 12 किलोमीटर दक्षिण और हंसडीहा से 15 किलोमीटर उत्तर में स्थित श्याम बाजार से पश्चिम लगभग एक किलोमीटर पश्चिम में स्थित है। श्यामबाजार में गाय-बैल, भेड़-बकरियों का बाजार लगता है, इसलिए इलाके का प्रसिद्ध हटिया है। सावा या सहूपोखर गांव संथालों का है। लगभग 70 परिवार यहां  रहता है। चित्त टुडू के मां-बाप का बचपन में ही देहांत हो गया था। उनके चाचा फाते टुडू की देखरेख और उन्हीं के प्यार से टुडूजी बड़े हुए। टुडुजी को मां का ममत्व और प्यार अपनी दादी से मिला!
सन् 1948 में मैट्रिक पास करने के उपरांत घर की आर्थिक हालत ठीक न होने पर वह राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की सलाह पर बिहार सरकार के सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग में प्रचार संगठन कर्ता के रूप में काम करने लगे। इसी विभाग में रहते हुए टुडुजी 1956 से गीतिनाट्य शाखा में संताली भाषा के संगठनकर्ता के रूप में काम करने ंलगे। नौकरी के नियम और टुडूजी की योग्यता को देखते हुए सरकार पदोन्नति करते रहे। 1958 में जनसंपर्क पदाधिकारी बन गए। 1959 में वह जिला जनसंपर्क पदाधिकारी बन गए। 1977 में उपजनसंपर्क निदेशक और 1984 में वह संयुक्त जनसंपर्क निदेशक बने। 1948 में मैट्रिक करने के बाद इनका विवाह पोड़ैयाहाट प्रखंड अंतर्गत साकरी गांव निवासी रानी मुर्मू से हो गया।  एक दिसंबर 1987 को सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के संयुक्त निदेशक के पद से अवकाश ग्रहण किया।
टुडू जी संताली साहित्य के आसमान का एक सितारा हैं। संताली साहित्य के विकास में उनका बहुमूल्य योगदान है। वह लेखक, कवि गीतकार, गायक और अनुवादक भी थे। वह हिंदी और संताली में साहित्य रचते थे। उन्होंने कई पुस्तकें रचीं। इनमें पंडित जवाहरलाल नेहरू की जीवनी, जावांय बाहू होरोक सेरेन्ज, सोना रेयाग सिकड़ी रूपा रेयाग माकड़ी, संताली लोक गीतों में मंदार पर्वत, मिलवा गाते पॉकेट पुथी (दोंग सेरेन्ज )आदि।
सन् 1976 से 1986 तक टुडुजी गणतंत्र दिवस के अवसर पर संताली नृत्यों का प्रदर्शन करवाते थे। इसके लिए उन्हें राष्ट्रपति और देश के प्रधानमत्री के हाथों सम्मान भी मिल चुका है। बिहार सरकार के प्रतिनिधि के रूप में वह पांच साल तक संगीत नाटक अकादेमी में सदस्य रहे। वह संताली सांस्कृतिक सोसाइटी के प्रथम उपाध्यक्ष भी रहे। सोसाइटी का जब सावा में शाखा विस्तार होता है तो वह वहां अध्यक्ष बनाया जाता है। वह आपने गांव में प्रथम से मैट्रिक तक की पढाई के लिए चंद्रशेखर आदिवासी उच्च विद्यालय, बांका बिहार का निर्माण करवाता है।.वह गरीब और निर्धनों की उन्नति के लिए लगातार काम करते थे। जिसके के कारण तत्कालीन राष्ट्रपति सी.आर.वेंकटरमण ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया। 1987 को बिहार सरकार की राजभाषा विभाग द्वारा पंडित जवाहरलाल नेहरू पुस्तक के लिए चार हजार रूपये से सम्मानित किया गया। टुडुजी एक कुशल प्रशासक, लेखक, कवि, अनुवादक के साथ-साथ गायक भी थे और मधुर आवाज में गाते भी थे। एक जुलाई 2016 को वे दुनिया छोड़ गए।
 -चंद्र मोहन किस्कू, संताली के युवा कवि

राधाकृष्ण और उनकी ‘मूल्य’

-संजय कृष्ण   हिंदी कथा साहित्य को बहुविध ढंग से समृद्ध करने वाले रांची के राधाकृृष्ण साहित्य की दुनिया में अब अपरिचित नाम हो गए हैं। पुरान...