गंवई गंध में लिपटी मिथिलेश्वर की कहानियां

मिथिलेश्वर tजी उन कथाकारों में हैं, जिनके यहां गांव अपनी पूरी प्रामाणिकता के साथ बोलता है। गंवई मन मिजाज के होते हुए भी वे गांव को स्थितप्रज्ञ दृष्टि से देखते हैं। यह देखने की दृष्टि ही उन्हें अन्य कथाकारों से अलग और विशिष्ट बनाती है। वे कहानियां लिखते नहीं, सुनाते हैं। सत्तर के बाद वे कहानी के मंच पर उपस्थित होते हैं और अब तक बने बने हुए हैं। बार-बार वे गांव की ओर देखते हैं और हर बार वे गांव से कंकड़-पत्थर ही नहीं मोती भी चुन कर ले आते हैं।
जरा याद करें सत्तर के बाद का समय। देश एक नई आजादी की ओर झुक रहा था। पटना से संपूर्ण क्रांति की चिंगारी उठी थी और उसी के एक साल पहले मिथिलेश्वर की कहानी 'अनुभवहीनÓ सारिका के नवलेखन अंक में छपी। एक नवविवाहित बेरोजगार युवक की कथा, जिसने बिहार पब्लिक कमिशन के आवेदन शुल्क के लिए नसबंदी कराया। इस सच्ची घटना ने 'अनुभवहीनÓ को जन्म दिया। इस तरह की अनेक घटनाएं ही आखिरकार संपूर्णक्रांति की जमीन तैयार कर रही थीं। यह वह दौर था जब आम आदमी तल्ख और खुरदुरे हकीकत से रूबरू हो रहा था। शहर ही नहीं, गांव की संस्कृति और आबोहवा भी बदल रही थी। शहरों में एक नया मध्यवर्ग उभर रहा था। राजेंद्र यादव, रवींद्र कालिया, कमलेश्वर, मोहन राकेश इसे ही अपना उपजीव्य बना रहे थे। शहर कहानियों में आ रहा था, पर गांव अपेक्षाकृत उपेक्षित था, जबकि देश की 75 प्रतिशत आबादी गांवों में बसती है। इनका दर्द कौन सुने?

यह भी सही है कि प्रेमचंद और रेणु का गांव हालांकि तेजी से बदल रहा था। यह बदलाव कई मोर्चे पर दिख रहा था। एक तो शहरी प्रभाव के कारण जातिगत बंधन ढीले हो रहे थे, वहीं जाति चेतना भी विकसित हो रही थी। लोगों का रोजगार की तलाश में शहरों की ओर पयालन भी बढ़ रहा था। पढ़े-लिखे लोग खेती-किसानी के प्रति उदासीन हो रहे थे। गांव के प्रति जो एक अतिरिक्त आकर्षण था, धीरे-धीरे छीज रहा था। नए मूल्य बन रहे थे तो पुराने टूट रहे थे। यह टूटन-फूटन एक नई संस्कृति को जन्म दे रही थी और मिथिलेश्वर इसी संस्कृति की पहचान कर अपने कथा शिल्प को नया आयाम दे रहे थे।

 वे ऐसे दौर में आए जब संस्मरण और यात्रा वृत्तांतों की प्रधानता बढ़ गई थी। जिन कहानियों में गांव उपस्थित था, वहां संवेदना की भारी कमी थी। कुछ अपवाद जरूर थे। डा. शिवप्रसाद सिंह की कहानियों का ताना-बाना गांव से बनता है। उनकी कहानियों में गांव है। वे भी गांव से होते हुए शहर की ओर जाते हैं। फिर शहर के वर्तमान से अतीत की ओर जाते हैं। लेकिन हिंदी जगत में उनकी चर्चा गाहे-बगाहे भी नहीं होती। उस दौर के बाद ग्रामीण परिवेश को लेकर मिथिलेश्वर भी कहानियां लिख रहे थे। उनकी कहानियां बताती हैं कि वे कभी शैली के कायल नहीं रहे। उन्होंने बहुत सीधी-सादी शैली अपनाई-लोककथा की शैली। शायद, यह मां का उनपर प्रभाव था। बचपन में मां द्वारा सुनी गई कथाओं का आकर्षण भी कह सकते हैं। उस जमाने में शायद ही किसी ने इस शैली को अपनाया हो। इस शैली के कारण उनकी कहानियों में सादगी है। और यह सादगी बतौर फैशन नहीं आई है। यह सादगी उन्हीं को हासिल है, जो ग्रामीण परिवेश में पले-बढ़े हैं। गांवों की राजनीति से जिनका पाला पड़ा हो।

मिथिलेश्वर जी की कहानियों की एक और विशेषता है, जिधर ध्यान किसी का नहीं गया। वह है उनका स्त्री के प्रति एक समानता का दृष्टिकोण। स्त्रियों को अपनी कथा की नायिका बनाते समय वे स्त्रीवादी विमर्शों के मोह में नहीं फंसे। आज कितने लोगों की दुकान इसी पर चल रही है। पर, मिथिलेश्वर को दुकान नहीं चलानी थी। सच-सच कहें तो उनकी कहानियों में भारतीय महिलाओं की दयनीय और दुदर्शापूर्ण स्थित बेधक ढंग से उभरी हैं, बिना किसी नारे के। ग्रामीण समाज की महिलाओं के प्रति भेदभाव, अपमान-तिरस्कार, शोषण-उपेक्षा को गांगिया फुआ, जी का जंजाल, वैतरणी भौजी, नए दंपति, भोर होने से पहले आदि में पढ़ा जा सकता है। ये गढ़ी हुई नायिकाएं नहीं, गांवों की जीवंत पात्र हैं। 'माटी कहे कुम्हार सेÓ नामक उपन्यास में भी मुनीला का जो चरित्र गढ़ा है, वह बार-बार याद आती है। उनका लेखन बताता है कि अपने घर से होते हुए, आस-पड़ोस और गांव में स्त्रियों की दशा को जो देखा, वही उनकी कहानियों का आधार बनीं।

 मिथिलेश्वर जी की कथा जिस ग्रामीण परिवेश से शुरू होती है, वह भोजपुरिया गांवों के मन-माटी-महक, खेती-किसानी के जटिल संघर्ष को सामने लाता है। जातिवादी मन-मस्तिष्क के साथ-साथ अल्पसंख्यक की पीड़ा को भी बहुत बारीकी से उकेरती हुई कहानियां शहरी आपाधापी के साथ आगे बढ़ती और विस्तार पाती हैं। शहर-गांव का द्वंद्व सिर्फ उनका
बचपन से लेकर युवा होने तक गांव की जो विभिन्न छवियां दिमाग में बनी थीं, वही आगे चलकर कहानी की शक्ल लेती गईं। 'बाबूजीÓ, 'नपुंसक समझौतेÓ, 'बीच रास्ते मेंÓ, ...आदि आदि। 16 सितंबर 1973 के 'धर्मयुगÓ में 'नपुंसक समझौतेÓ कहानी के प्रकाशन पर बहैसियत संपादक धर्मवीर भारती ने जो टिप्पणी की, वह बहुत कुछ कह जाती है। भारती की टिप्पणी थी, 'क्या गांवों के विकास के लक्षण नई पीढ़ी का पढ़-लिख जाना, अच्छी नौकरियां पाना और मिट्टïी के मकानों का ईंट की बिल्डिंगों में परिवर्तित हो जाना ही है? गांव में ऐसे भी तो पात्र यदा-कदा देखने को मिल जाते हैं, जिनके फैलते दृष्टिïकोण अपने घर के खंडहर तक हो जाने की प्रक्रिया प्रभावित हैं। विकास आखिर कहां हैं और किनके लिए? ...युवा कथाकार मिथिलेश्वर की यह कहानी आज के गांव की अंदरूनी हालात का सशक्त खाका खींचती है। धर्मयुग में यह उनकी प्रथम कहानी है।Ó
इस छोटी सी टिप्पणी के बाद कुछ और कहने को नहीं रह जाता है। आज भी गांव हाशिए पर है। हमें गांव के अंदरुनी हालातों का जायजा लेना होगा तो निश्चय ही हमें मिथिलेश्वर के पास जाना होगा। उनकी कहानियों से दोस्ती करनी होगी। उनके पात्रों से बोल-बतियाना होगा।

निजी द्वंद्व नहीं, समय का द्वंद्व बनकर उभरता है। गांवों के प्रति एक अतिरिक्त भावनात्मक आकर्षण, लेकिन बदलते दौर में गांव की सीमित भूमिका के मद्देनजर रोजी-रोजगार के कारण खींचता निष्ठुर शहर भीतर चल रहे द्वंद्व को एक तार्किक जामा पहनाता है। इस तरह गांव से शुरू हुई उनकी यात्रा शहर में आकर विराम लेती है। पर, गांव उनके अंतर्मन से बेदखल नहीं होता है। उनकी कहानियां, उनके उपन्यास या उनका कथेतर गद्य इसके प्रमाण हैं। सब कुछ सादगी-सरलता में लिपटा हुआ।

विकास, विस्थापन और आदिवासी

'यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज आदिवासी, जो कि संभवतया भारत के मूल निवासियों के वंशज हैं, अब देश की कुल आबादी के 8 प्रतिशत बचे हैं। वे एक तरफ गरीबी, निरक्षरता, बेरोजगारी, बीमारियों और भूमिहीनता से ग्रस्त हैं। वहीं दूसरी तरफ भारत की बहुसंख्यक जनसंख्या जो कि विभिन्न अप्रवासी जातियों की वंशज है, उनके साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार करती है।Ó
- जस्टिस मार्कंडेय काटजू व ज्ञानसुधा मिश्र की खंडपीठ की टिप्पणी, 5 जनवरी, 2011
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी हमारे लोकतंत्र पर भी एक टिप्पणी है, जहां एक बड़ी आबादी आज भी हाशिए पर जीने का विवश है। यह उस लोकतंत्र में, जहां की जड़े बहुत पुरानी मानी जाती हैं। हम इस लोकतंत्र पर इतराते भी हैं। जब भी मौका आता है, हम इसकी दुहाई देने का कोई मौका हाथ से जाने नहीं देते। एक बड़ी आबादी जो अब शायद दस करोड़ पहुंच गई है, क्यों बार-बार विकास की कीमत चुकाती है! क्यों बार-बार उसे उसकी जड़ों से, उसकी परंपराओं से, उसकी संस्कृति से उसे बेदखल कर दिया जाता है, विकास के नाम पर? सभ्य कहलाने वाली जातियां क्यों उनके साथ असभ्य और बर्बरता का व्यवहार करती हैं? क्या इसलिए कि वे अपने जंगल से प्रेम करते हैं, प्रकृति के साथ दोस्ताना रिश्ता रखते हैं, निजी के बजाय सामूहिकता में विश्वास करते हैं।
  झारखंड पर जब नजर डालते हैं तो शोषण का एक अंतहीन सिलसिला दिखाई पड़ता है। अंगरेजों के समय से भी बहुत पहले से। तब उनके जंगलों पर लोगों की नजर थी, आज उनकी जमीनों के भीतर छिपे खनिजों पर है। औपनिवेशिक काल से लेकर आज तक वे अपनी आजीविका के लिए संघर्ष करते आ रहे हैं। इस आजीविका के लिए कितने ही अपनी माटी से दूर चले गए। अपनी जड़ों से सदा-सदा के लिए उखड़ गए। इसका कोई हिसाब नहीं है।
  झारखंड में जहां ये बहुसंख्यक थे, आज अल्पसंख्यक हो गए हैं। जहां कभी चिराग जलते थे, अब वे बेचिरागी गांव बन गए हैं। यह सब अचानक नहीं, एक सोची-समझी राजनीति के तहत हुआ लगता है। उन्हें उनकी जड़ों से बेदखल करने के लिए कई तरह के हथकंडे अपनाए गए। लंबा संघर्ष भी चला। साहूकारों से लेकर अंग्रेजों तक। लड़ाई आज भी जारी है। आज विकास के नाम पर उनका विस्थापन हो रहा है। कहीं जबरन तो कहीं पैसे का लालच देकर उन्हें विस्थापित किया जा रहा है। उदारीकरण ने औद्योगीकरण के दरवाजे खोल दिए। इससे वे तो अंदर आ रहे हैं, लेकिन यहां के आदिवासी, दलित बाहर जा रहे हैं रोजी रोजगार की तलाश में। नई आर्थिक नीति ने तो मानो आदिवासियों को उजाडऩे का कानूनन अधिकार ही दे दिया है। इसने बाहरी उद्योगपतियों के लिए दरवाजे खोल दिए। झारखंड उनके लिए एक बड़ा चारागाह बन गया। सबका ध्यान यहां की खनिज संपदा लग गया। नाम दिया विकास का। थोड़े अतीत में चले और उसके परिणाम देख लें तो विकास की हकीकत समझ में आ जाएगी। बात आज से सौ साल पहले की है। 1908 में राज्य का पहला उद्योग स्थापित हुआ। बड़े-बड़े दावे किए गए है। आदिवासी और विस्थापितों की तकदीर बदल जाएगी। हर स्तर पर विकास किया जाएगा। कोई भूखा नहीं रहेगा। हर आदमी शिक्षित होगा। पर, सौ सालों की हकीकत कुछ और ही बयां करती है। आदिवासी सौ साल पहले जहां थे, आज भी वहीं हैं और टाटा? कहने की जरूरत नहीं। इस उद्योग ने कितना विकास किया, किसका विकास किया, यह जगजाहिर है। विकास के नाम आज भी आदिवासी अपनी जमीनों से बेदखल किए जा रहे हैं। झारखंड बनने के बाद भी स्थिति बदली नहीं, बदस्तूर जारी है।
                          ।। 2।।
अलेक्स हेली ने अपने उपन्यास रूट्स में जड़ों से कटने के दर्द का काफी विस्तार से वर्णन किया है। इस उपन्यास के पात्रों को बदलकर झारखंड के पात्रों को रख दिया जाए तो कोई अंतर नहीं पड़ेगा। इसमें भी वही दर्द है, जिसे झारखंड के लाखों लोग सालों से झेल रहे हैं। इस दर्द को वही समझ सकता है, जिससे उसकी जमीन ले ली गई हो, विकास के नाम पर। आदिवासियों की पीड़ा को मारिया वार्गास ल्योसा के उपन्यास किस्सागो में भी पढ़ा जा सकता है, जिसमें अमेजन नदी के किनारे बसने वाली आदिवासियों की व्यथा-कथा है। दूसरे अफ्रीकी लेखक चीनुवा एचेबे हैं, जिनकी कई कृतियों में आदिवासी समाज की पीड़ा व्यक्त हुई है। आदिवासियों के लेकर हमारा नजरिया बहुत कुछ पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति टामस जैफर्सन जैसा रहा है। उसने कहीं लिखा है, काले लोग, चाहे वे मूल रूप में अलग नस्ल के हों अथवा समय और परिस्थितियों ने उन्हें अलग नस्ल का बनाया हो, शरीर और दिमाग दोनों मामलों में गोरों के मुकाबले काफी हीन हैं।
यह मानसिकता अंगरेजों साथ-साथ कमोबेश भारत के मैदानी इलाकों के कथित सभ्य लोगों की भी है। हम भी आदिवासियों के मामले में किसी नस्लवादी से कम नहीं हैं। इनके लिए तरह-तरह के शब्दों का इजाद हमने किया है।  
।। 3।।
अंग्रेजों की साम्राज्यवादी सोच ने औपनिवेशिक काल में, कांग्रेस की स्थापना के एक दशक बाद, भू-अर्जन के लिए 1894 में कानून बनाया। इसके माध्यम से झारखंड के किसानों की खूंटकटी एवं कोड़कर भूमि पर कब्जा कायम करना शुरू किया गया। इस भूमि लूट का मूल मकसद था झारखंड में ब्रिटिश साम्राज्यवाद का विस्तार करने के लिए भूमि अर्जित करना। इसी भूमि अधिग्रहण की आड़ में लाखों ग्रामीणों को भूमिहीन और साधनविहीन बनाकर भिखारी बना दिया गया। जैसे-जैसे अंग्रेजों का अत्याचार बढ़ता गया, कानून की आड़ में, आदिवासियों को उनकी जमीन से बेदखल किया जाता रहा, वैसे-वैसे आदिवासियों ने उलगुलान किए। सबसे ताकतवर विद्रोह बिरसा का था। भू-अर्जन कानून बनने के एक साल बाद 1895 में यह उलगुलान प्रारंभ हुआ। इसके पूर्व भी कोल विद्रोह, भूमिज विद्रोह, मुल्की विद्रोह हुए। सभी उलगुलान के केंद्र जल, जंगल, जमीन और स्वशाासन की मांग थी। इनका नारा था-हमारा जमीन, जल एवं जंगल सिंगबोंगा की देन है। हमने अपना खून पसीना बहाकर जंगलझाड़ी काटकर भूमि योग्य खेत बनाया है।घ्अत: हम जान देंगे, जमीन नहीं। कानून बनाने की प्रक्रिया संताल विद्रोह के बाद ही शुरू हो गई। जब-जब विद्रोह का लावा फंूटा कानून के पानी से उसे शांत किया जाता रहा। पर, न अंग्रेजों की भूख कम होती न आदिवासियों का विद्रोह शांत हुआ। ये दोनों प्रक्रियाएं साथ-साथ चलती रहीं। दुर्भाग्य यह है ये आज भी साथ-साथ चल रही हैं। आजादी के बाद लगा अब शोषण करने वाले चले गए, लेकिन यह आदिवासियों के लिए छलावा ही साबित हुआ। उनकी जगह काले अंग्रेज बैठ गए। न्याय इन्हें नहीं मिला, कानून की धाराएं जरूर मिलती रहीं।घ्इस शोषण चक्र का ही परिणाम था कि अलग राज्य की मांग उठने लगी। लगा कि जब तक झारखंड अलग नहीं होगा, झारखंड का विकास नहीं होगा। आदिवासी-मूलवासी इसी तरह उपेक्षित होते रहेंगे। उन्नीसवीं शताब्दी के तीसरे दशक से अलग राज्य की मांग ने आजादी के बाद धार पकड़ी। कई उतार-चढ़ाव के बाद आखिरकार राज्य अलग हुआ। अलग होने के बाद लगा विकास होगा, कोई विस्थापित नहीं होगा। लेकिन यहां की बार-बार बदलती सरकारें आदिवासियों की किस्मत नहीं बदल सकीं। वे आज भी वहीं हैं, जहां हजारों साल पहले थीं।   
 ।। 4।।
आजादी के बाद संविधान सभा में आदिवासी इलाकों की खासियतों के कारण ही संविधान की पांचवीं व छठी अनुसूची का निर्माण हुआ। वहीं, आदिवासी इलाकों के विकास के लिए अलग रणनीति बनाने की भी बात कही गई थी। जवाहरलाल नेहरू भी मानते थे कि औद्योगीकरण के बुरे प्रभावों से आदिवासी संस्कृति का बचाव किया जाना चाहिए। उन्होंने वेरियर एल्विन और जयपाल सिंह मुंडा के साथ हुए विमर्शों के बाद आदिवासी इलाकों के विकास के लिए एक पंचशील की बात की थी। इस नीति के सूत्रा थे: 1-आदिवासी इलकों के लोगों को खुद ही विकसित होने दिया जाना चाहिए, हमें उनपर कुछ थोपने से बचना चाहिए, उनकी परंपरागत कला और संस्कृति को हर तरह से प्रोत्साहित करना चाहिए। 2-जमीन और जंगलों पर आदिवासियों के अधिकारों को सम्मान देना चाहिए। 3-प्रशासन और विकास का कार्य करने के लिए उनके बीच से ही लोगों के कार्यदल को प्रशिक्षित करना चाहिए। 4-हमें इन इलाकों पर ज्यादा प्रशासन नहीं लादना चाहिए। न ही उन पर भारी भरकम योजनाओं का बोझ डालना चाहिए। वहां सहज तरीके से ही ऐसे कार्य करना चाहिए जिससे उनकी सामाजिक-सांस्कृतिक संस्थाओं के साथ कोई प्रतिस्पर्ध पैदा न हो। 5- आदिवासी इलाकों में कितना धन खर्च हुआ और उसके क्या परिणाम निकले, इस मानक का त्याग कर गुणवत्ता और विकास के नए मानक तैयार करने चाहिए।
यदि नेहरू के इस पंचशील सिद्धांत का ख्याल रखा गया होता, आदिवासी इलाकों का इस मानक पर विकास किया गया होता, प्रकृति के साथ उनके रिश्ते और संस्कृति को समझा गया होता तो आज आदिवासी अस्मिता भी बची रहती और जो विद्रोह के लावे फूटते रहे हैं, नक्सली संगठनों के जो पांव पसर रहे हैं, यह सब कदापि न होता। राज्य के 24 में से 22 जिलों में नक्सलियों का प्रभाव है। नक्सलियों को खत्म करने के नाम पर केंद्र सरकार अरबों रुपये पानी की तरह बहा रही है। फिर भी उसका ध्यान मूल मुद्दों पर नहीं है। वह अब जंगलों से आदिवासियों को खदेडऩे का अभियान चला रही है ताकि जंगलों को कारपोरेट घरानों को सौंप सके। आदिवासी इसका विरोध कर रहे हैं। विरोध करना जायज है। जिन कंपनियों की स्थापना पिछले सौ सालों में हुई है, और कंपनियो ंकी स्थापना के क्रम में जिनकी जमीनें अधिग्रहित की गई, उनसे जो वादे किए गए, वे आज तक पूरे नहीं हुए। यही कारण है कि अब आदिवासी अपनी जमीन नहीं देना चाहते। जिनकी जमीनें गईं, वे आज मजदूर हो गए। जिनकी जमीनों से आज काला हीरा निकल रहा है, वे अब कोयला चोर कहलाने लगे हैं। कितनी पीड़ाजनक है कि कोई किसान अपने ही जमीन से बेदखल हो जाए और अपनी जमीन से पापी पेट के लिए थोड़ा कोयला निकाल ले तो कोयला चोर। आखिर, किसान से कोयला चोर किसने बनाया? कानून ने या सरकार ने?
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विकास क्या उद्योगों से ही सकता है? क्या उद्योगों से सबको रोजगार संभव है? झारखंड में जितने लोगों की जमीन ली गई, क्यों उन्हें उन कंपनियों ने नौकरी दी, जिसकी जमीन उन्होंने ली थी? उत्तर ना होगा। कंपनियों को सबको रोजगार देना संभव नहीं है। सौ साल पहले जब तकनीक उतनी उन्नत नहीं थी, तब तो उसने सबको रोजगार दिए नहीं, जहां मानव श्रम की ज्यादा जरूरत होती थी, आज तो तकनीक ने मानव श्रम का घटा दिया है। फिर कैसे कंपनियां, किस आधार पर लोगों को रोजगार देने और विकास की बात कर रही हैं? विकास के रहनुमा और राज्य की सरकार भी अच्छी तरह जानती है कि राज्य की लगभग 85 प्रतिशत आबादी खेती और जंगलों पर निर्भर है। आदिवासियों में यह निर्भरता और भी ज्यादा है यानी 92.33 प्रतिशत है। इस पर राज्य में न सिंचाई की कोई व्यवस्था है न बिजली की। पलामू में पिछले चालीस साल से डैम बन रहे हैं, आज तक पूरे नहीं हुए। तब उनकी लागत पचास करोड़ थी और अब हजार करोड़ पहुंच गई है। डैम बनाने के चक्कर में लोगों को चालीस साल पहले ही विस्थापित कर दिया गया, लोग कहां गए, क्या कर रहे हैं, सरकार का इससे कोई वास्ता नहीं। लेकिन ठेकेदारों और इंजीनियरों की चांदी कट रही है। क्योंकि हर साल उसकी लागत बढ़ जाती है। यह एक बानगी है।
इस तरह की कई योजनाएं पूरी नहीं हो पाई लेकिन लोग विस्थापित हो गए। थोड़ा आंकड़े पर बात करें तो बिजली और सिंचाई सुविधा प्रदान करने के लिए 50000 हेक्टेअर जमीन बांधों व जलाशयों के लिए कुर्बान हो चुकी हैं। लेकिन कुल कृषि क्षेत्र का केवल नौ प्रतिशत भाग ही सिंचित है। इसके अलावा खनन एक और कारण है, जिससे लोगों की जमीनें छिन रही हैं। विकास परियोजनाओं के लिए अधिग्रहित जमीन में से 34.4 प्रतिशत खनन के लिए अधिग्रहित हुुईं। अभी सरकार ने करीब सौ एमओयू किए हैं। सभी को धरातल पर उतार दिए जाएं तो झारखंड से जंगल गायब हो जाएंगे, खेती की जमीन नहीं बचेगी। लोग कहां जाएंगे, क्या करेंगे, इसकी चिंता सरकार को नहीं। दिलचस्प है कि सरकारें कैसे बड़ी पूंजीपतियों के हितों के लिए काम करती रही हैं, इसका पहला उदाहरण टाटा कंपनी है, जहां आज अरबों के उसके साम्राज्य को वारिस की खोज की जा रही है। जरा उसके अतीत पर नजर डालें।
 झारखंड में औद्योगिकरण की शुरुआत औपनिवेशिक काल में ही हो गई थी। 1907 में जमशेदजी टाटा ने काली माटी क्षेत्रा में अपनी फैक्ट्री की नींव रखी। इसके लिए  3564 एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया। इस फैक्ट्री ने हजारों परिवारों को विस्थापित किया। कंपनी की स्थापना के लिए छोटानागपुर टेंनेंसी एक्ट को चार साल तक ठंडे बस्ते में रखा गया ताकि टाटा को जमीन अधिग्रहण में ज्यादा कानूनी दांवपेंच का सामना न करना पड़े। क्योंकि एक्ट के प्रभावी हो जाने से टाटा को जमीन लेने में काफी दिक्कतें आतीं। इस अधिनियम के तहत आदिवासी जमीन गैरआदिवासियों को हस्तांतरित नहीं की जा सकती। सामाजिक कार्यकर्ता धनश्याम पूछते हैं, क्या यह सवाल पूछना बेमानी होगा कि टाटा रेलवे स्टेशन और उसके बगल में स्थित टाटा इस्पात कारखाना, जहां पहले कालीमाटी गांव था, वह गांव और उसके निवासी अब कहां गए? क्या इसकी जानकारी सरकार के पास है? यह बात हम मान सकते हैं कि अंगरेजों ने अपने मुनाफे के लिए उस जमीन को टाटा को लीज पर दिया था, लेकिन आजादी के बाद भी हमारी सरकार ने उस गांव की खोज-खबर क्यों नहीं ली?
यह किस्सा सिर्फ कालीमाटी गांव का नहीं है। बोकारो के साथ भी यही हुआ। बोकारो स्टील संयंत्र की स्थापना में भी हजारों एकड़ जमीन गई। विस्थापितों को नाममात्र का मुआवजा दिया गया। बोकारो में जब स्टील प्लांट बनना तय हुआ तो दामोदर नदी के उत्तर में एक जमीन के बड़े हिस्से को चिह्निïत कर इसे खाली कराने का काम शुरू हुआ। लगभग 60 गांव पूरी तरह और कुछ गांवों के कुछ हिस्से को सरकार ने जमीन अधिग्रहण कानून का इस्तेमाल करके अपने कब्जे में ले लिया। सरकारी दरों पर जमीन का मुआवजा दिया गया जो जमीन के बाजार भाव से बेहद कम थे। स्टील प्लांट में बड़ी संख्या में काम करने वालों की जरूरत थी। हर तरह के पदों पर लोग रखे जाने थे। लेकिन सरकार ने यह तय किया कि सिर्फ चौथी श्रेणी के पदों पर हर विस्थापित परिवार से एक आदमी को नौकरी दी जाएगी। इसके अलावा हर परिवार को रहने के लिए जमीन का एक टुकड़ा दिया जाएगा।
1960 के दशक में बुलडोजर चलाकर गांवों को समतल कर दिया गया और लोग अपने सामान बैलगाडिय़ों पर लाद कर दूसरी ठौर ढूंढ लिए। गांवों में घर, बाग, चारागाह, कुलदेवता के स्थान, श्मशान सभी कुछ थे। पर सब कुछ समतल हो गया था। विस्थापितों के साथ चुभने वाली बात यह हुई कि उनसे जमीन लेते समय कहा गया कि इस जमीन पर प्लांट बनेगा और वहां काम करने वालों के लिए कालोनियां बनाई जाएंगी। लेकिन विस्थापितों ने देखा कि स्टील प्लांट प्रबंधन ने प्रापर्टी डीलर की भूमिका अपना ली है। पहले तो एक को-आपरेटिव कालोनी बनाकर लगभग 500 प्लाट लीज पर दे दिए गए। इन 500 लोगों को प्लाट देते समय विस्थापितों को किसी तरह की वरीयता नहीं दी गई।...हद तो तब हो गई जब स्टील प्रबंधन ने मजदूरों के लिए बनाई गई कालोनियों के फ्लैट लीज पर देना शुरू कर दिया। इस तरह हजारों की संख्या में फ्लैट दे दिए गए। बाद में मामला अदालत में पहुंचा तो फ्लैट देने का सिलसिला तो रुका, लेकिन जिन्हें फ्लैट दिए जा चुके थे, उनसे वापस नहीं लिए गए। (दिलीप मंडल-एक विस्थापित का अविश्वास पत्र)
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  न्याय की आस में डिमना झील के विस्थापित आज भी भटक रहे हैं। डिमना बांध का निर्माण आजादी से पहले 1942-43 में किया था, जिसमें 12 गांवों के लोगों को विस्थापित किया गया। यह किसी और ने नहीं, टाटा कंपनी ने किया। मदन मोहन ने लिखा है टाटा कंपनी ने गैर कानूनी तरीके से 102 एकड़ जमीन भी अपने कब्जे में ले लिया है। जब सरकारी अधिकारी और टिस्को अधिकारी के समक्ष डिमना झील का सीमांकन किया गया तो पता चला कि टाटा कंपनी ने 102 एकड़ जमीन गैरकानूनी तरीके से कब्जा कर रखा है। बरसात के समय डिमना झील के पानी से 5.84 एकड़ की फसल नष्ट हो जाती है। डिमना झील के विस्थापित आज भी उचित मुआवजे की मांग कर रहे हैं। जब-तब आंदोलन भी होते रहता है। धरना-प्रदर्शन विस्थापित करते हैं, लेकिन न्याय उन्हें आज तक नहीं मिला। झारखंड मुक्ति वाहिनी विस्थापितों की लड़ाई लड़ रहा है। इस तरह न जाने कितने विस्थापित आज भी भटक रहे हैं। पलामू का मंडल डैम चालीस साल से बन रहा है। हर साल उसकी लागत बढ़ जाती है। 14 गांव के लोगों को चालीस साल पहले ही विस्थापित कर दिया गया। वे आज भी भटक रहे हैं। न ठीक से उन्हें मुआवजा दिया गया न उन्हें पुनर्वासित किया गया। इनमें आदिवासी और दलित ज्यादा थे। पी साईनाथ ने एक बार इस डैम का दौरा किया था और रिपोर्ट लिखी थी। पलामू में इस तरह की कई अन्य योजनाएं सिंचाई के लिए चल रही हैं, जो आज तक पूरी नहीं हुईं। लागत हर साल बढ़ती जाती है। अब तो इनके बनने की संभावना भी क्षीण हो चुकी है, क्योंकि आस-पास के इलाके में माओवादी सक्रिय हैं। ठेकेदारों के लिए भी चांदी है कि माओवादी काम नहीं करने देते, लेकिन सरकारी मशीनरी से कोई पूछने वाला नहीं कि साठ-सत्तर करोड़ की परियोजना एक एक हजार करोड़ में कैसे पहुंच गई, इसके लिए कौन जिम्मेदार है?
 पलामू में ही कनहर परियोजना 36 साल से लटकी है। परियोजना निर्माण के लिए राज्य के पूर्व मंत्राी हमेंद्र प्रताप देहाती ने हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर कर जल्द निर्माण किए जाने की मांग की है। परियोजना के निर्माण के बाद यह अपने लक्ष्य को प्राप्त करेगी, यह संशय ही है। क्योंकि जो परियोजनाएं बनीं, जो वादे किए गए थे, वे पूरे नहीं हुए।
 आजादी के बाद बनी डीवीसी परियोजना के मात्रा दो बांधों से 93,874 लोग विस्थापित हुए। इसमें अगर तिलैया, कोनार, मसानजोर को जोड़ दिया जाए तो विस्थापितों की संख्या एक लाख सत्तर हजार के आस-पास पहुंच जाती है। इन परियोजनों में विस्थापित होने वालों में तीन चौथाई आदिवासी थे। (झारखंड विकास पर विमर्श-घनश्याम)
भरत डोंगरा कहते हैं, हाल के समय में विस्थापन की समस्या ने विकराल रूप ले लिया है। विस्थापन की समस्या पहले भी मौजूद थी परंतु भूमंडलीकरण के दौर में पिछले दस-पंद्रह वर्ष के दौरान यह तेजी से बढ़ी है। पहले कम से कम ऊपरी तौर पर यह कहा जाता था कि सरकार किसी सार्वजनिक हित के लिए भूमि का अधिग्रहण कर रही है। परंतु अब तो वह खुलेआम निजी क्षेत्रों के बड़े पूंजीपतियों व बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए भूमि अधिग्रहण करने हेतु मात्र बेहद सक्रिय ही नहीं बल्कि आक्रामक भूमिका निभा रही है। ऐसे लगता है जैसे विश्व पूंजीवाद को पनपाने के लिए बाक्साइट, लौह अयस्क व और भी न जाने कितने खनिजों या उत्पादों की आपूर्ति के लिए सरकारें बड़े पैमाने पर किसानों, आदिवासियों व अन्य गांवववासियों को उजाडऩे के लिए तैयार बैठी हैं। इस मामले में सभी मुख्य राजनीतिक दल जैसे एक हो गए हैं। कलिंगनगर से लेकर नंदीग्राम की बेहद त्रासद घटनाएं बताती हैं कि इस विस्थापन हेतु सरकारें क्रूर हिंसा करने
के लिए भी तैयार हैं।
    अर्थशास्त्री गिरीश मिश्र ने झारखंड को लेकर लिखा है, खनिज पदार्थों की वहां विविधता और प्रचुरता है। उपजाऊ जमीन और पानी विपुल मात्रा में है तथा लोग मेहनती हैं। फिर भी विडम्बना है कि वह देश के निर्धनतम राज्यों में आता है। 2 करोड 88 लाख 46 हजार की जनसंख्या में लगभग 30 प्रतिशत आदिवासी हैं। 2 करोड 23 लाख 10 हजार लोग गांवों तथा मात्र 65 लाख 36 हजार शहरों में रहते हैं। कहना न होगा कि अधिकतर आदिवासी, दलित तथा अन्य पिछड़े वर्ग के लोग गांवों में ही रहते हैं। शहरो में अधिकांशतया उच्च और मध्यम वर्ग के लोग बसे हैं जो वाणिज्य-व्यापार, उद्योग, शिक्षा तथा सेवाओं के अन्य क्षेत्रों में कार्यरत हैं। झारखंड के ऊपर ग्रहण ब्रिटिश शासन के दौरान ही लग गया जब बाहरी शक्तिसम्पन्न लोगों ने उसके प्राकृतिक संसाधनों को हडपना शुरू कर दिया। यह आज भी जारी है और भी विकराल रूप में। अब अपने ही इस लूट रहे हैं, बेच रहे हैं। इन दो उद्धरणों से झारखंड की स्थिति को समझा जा सकता है।
  एक रिपोर्ट में 65 लाख विस्थापितों की बात कही गई है। इस आंकड़े पर गौर करें तो माइंस को ले 25.50 लाख, बड़ी सिंचाई परियोजनाओं में 16.40 लाख, फैक्टरी में 12.50 लाख, अभयारण्य को ले 11 लाख अब तक विस्थापित हो चुके हैं। सन 1960 से कुछ महत्वपूर्ण कंपनियों के लिए जो जमीन ली गई, वह इस प्रकार है-एचइसी के लिए 7,711एकड़, बोकारो स्टील के लिए 34,227 एकड़, दामोदर वैली प्रोजेक्ट के लिए 28,837 एकड़, आदित्यपुर इंडस्ट्रीज के लिए 34,432 एकड़ जमीनें ली गईं। वर्तमान में राज्य सरकार ने एक सौ से उपर एमओयू पर साइन किया है। इन उद्योगों के लिए एक लाख एकड़ से अधिक जमीन चाहिए। इससे कितने लोग विस्थापित होंगे, कितने जंगल कटेंगे, कितना पक्षियों और जानवरों का रहवास छिनेगा, राज्य के वातावरण पर क्या प्रभाव पड़ेगा, इसका कोई आकलन राज्य सरकार ने अभी तक नहीं किया है। उसे केवल विकास नजर आ रहा है। कैसा विकास, किसका विकास ...यह बताने की जरूरत वह नहीं समझती।
                
।। 7।।
 एक समय झारखंड में आदिवासियों की आबादी 70 प्रतिशत थी। पर, धीरे-धीरे इनकी जनसंख्या कम होती गई। शशिभूषण कड़वार व अलेक्स एक्का ने लिखा है, 1901 से 1951 तक आदिवासी जनसंख्या क्रमश: 59.35 प्रतिशत से 60.48 प्रतिशत तथा 68.60 प्रतिशत से 48. 18 प्रतिशत बनी रही। पूरा छोटानागपुर में इस अवधि में आदिवासी जनसंख्या क्रमश: 34.84 प्रतिशत, 31.14  प्रतिशत रह गई।घ्देश की आजादी के बाद तो झारखंड में गैरआदिवासियों की संख्या बाढ़ की तरह हो गई और आज बढ़कर 72.33  प्रतिशत हो गई है। आदिवासियों की जनसंख्या में गिरावट के तीन कारण रहे हैं। पहला, आप्रवास, औद्योगीकरण और शहरीकरण। बाहर से लोग आकर राज्य में बसते गए, औद्योगीकरण ने भी महती भूमिका निभाई। बड़े-बड़े उद्योग लगे, डैम बने तो बाहर आकर लोग रोजगार-नौकरी करने लगे। शहरीकरण ने भी लोगों को रोजगार मुहैया कराया। इस तरह बाहर से आकर लोग राज्य में बसते गए। एक ओर रोजगार के लिए बाहरी लोग झारखंड में आए तो आदिवासी रोजगार की तलाश में बाहर जाने लगे। कुछ का जाना मौसमी थी, कुछ दूसरी जगहों पर जाकर बस गए। कुछ जबरिया भी ले जाए गए। असम के चाय बगानों में सैकड़ों साल पहले अंगरेजों ने जबरन झारखंड के लोगों को काम करने के लिए ले गए। कुछ विस्थापन का शिकार होकर अपने वतन से दूर चले गए। इस तरह ये अपने ही घर में अल्पसंख्यक होते चले गए। एक और बड़ी वजह है जनगणना। जनगणना में इनके लिए कोई कॉलम नहीं हैं। देश की संप्रभु सरकार इनकी उपस्थिति को ही नकारती है। इसको लेकर राज्य में काफी आंदोलन हुए, हो रहे हैं। ये अलग से चिद्दित करने की मांग कर रहे हैं। डॉ रामदयाल मुंडा कहते हैं, भारतीय संविधान ने आदिवासियों को एक विशिष्ट समुदाय के रूप में मान्यता दी है और उनकी सुरक्षा और विकास के लिए कई प्रावधान किए हैं किंतु धर्म के मामले में उसने यह स्वतंत्राता दे रखी है कि जो जिस धर्म का अनुसरण करना चाहे, करे। व्यवहार में जैसा कि जनगणना के आंकड़ों से पता चलता है, आदिवासी की अपनी धार्मिक पहचान नहीं के बराबर है। गणना प्रणाली में अब तक अन्य धर्मों-हिंदू, मुस्लिम-सिख, ईसाई इत्यादि-की तरह अपनी धार्मिक पहचान दर्ज करने के लिए कोई निश्चित जगह न पाकर आदिवासियों को 'अन्यÓ के ही अंतर्गत गिनाने के लिए बाध्य होना पड़ता है। (आदि धरम का प्राक्कथन डॉ रामदयाल मुंडा-रतन सिंह मानकी) इस तरह आदिवासियों की लगातार घटती जनसंख्या के पीछे भी कई पेंच, राजनीति और साजिश दिखाई पड़ती है। ये केवल, विकास और विस्थापन के मारे हुए नहीं हैं, इनका मिटाने एक गहरी साजिश भी दिखाई देती है। क्योंकि जहां-जहां ये हैं, उनकी धरती के नीचे सोना है। इस पर नजर बहुराष्ट्रीय कंपनियों की है। दुर्भाग्य से यही वह इलाका है, जिसे लाल गलियारा कहा जा रहा है और जिसके लिए ग्रीन हंट आपरेशन चलाया जा रहा है। आदिवासियों के सामने इधर कुआं-उधर खाई की स्थिति पैदा हो गई है। औपनिवेशिक दासता से मुक्ति के बाद यह सिलसिला थमता नजर नहीं आ रहा। नागार्जुन ने आजादी के आस-पास सितंबर 1947 में एक कविता लिखी थी, उदबोधन, जो युगधारा में संकलित है। वे उसी समय भांप गए थे और आदिवासियों को जागरूक करते हुए कहा, उठो, उठो...।
पंक्तियों पर गौर करें-
झारखंड सतपुड़ा सदृश तव स्कंध!
रत्नाकर हो अगर तुम्हारा नाम
सागर को क्या कुछ होगी आपत्ति?
अबरख और कोयला और पेट्रऊऊोल
हीरा और जवाहर (मणिमाणिक्य)
सोना चांदी लोहा औÓ इस्पात...
अंदर दबी पड़ी हैं सौ-सौ खान
उठो, उठो, उठ जाओ विन्ध्य महान!
मांग रहा युग तुमसे जीवनदान !
.................
कविता की अंतिम पंक्तियां हैं-
भील, गोंड, हो, मुंडा औÓ संथाल
अब भी तो विकसित हों तेरे बाल
देखो तुमसे मांग रहे द्युति दान
निर्विकल्प निश्चल सौ-सौ दिनमान
उठो, उठो, उठ जाओ विन्ध्य महान!
      ---------------------------
इस कविता के साथ अरुंधती रॉय के उस लेख के कुछ अंश भी देख लें, शायद स्थिति स्पष्ट हो जाएगी। रॉय आउटलुक में मिस्टर चिदंबरम वार लेख में लिखती हैं, 'झारखंड और उड़ीसा आदि की पहाडिय़ों में जितनी बाक्साइट भरी पड़ी है, उसकी कीमत आंकी जाए तो उसमें 12 शून्य आता है। वह पूछती हैं, इसके क्या मायने है? कहती हैं, झारखंड में पिछले दिनों मधु कोड़ा की अवैध 4,500 करोड़ की संपत्ति का मामला काफी गरमाया था। झारखंड खनिजों का भंडार है। वहां भी आदिवासी हैं। वहां भी सरकार 'विकासÓ कर रही है और माओवादी तो वहां हैं ही। जाहिर है, जो पैसे मधु कोड़ा एंड कंपनी ने कमाए, वे खनिज और कोयले से ही आए हैं। कंपनियों की जहां तक बात है, आर्सेलर मित्तल-जिंदल से लेकर कौन है, जो झारखंड में मौजूद नहीं। यानी, खनिज, आदिवासी, माओवाद, धन, विकास, जंगल, जमीन, निजी पूंजी, आंतरिक सुरक्षा-ये तमाम शब्द दरअसल एक ही संदर्भ से ताल्लुक रखते हैं, जो एक ही किस्म के भौगोलिक परिक्षेत्रा पर लागू होते हैं।Ó
 अब ऐसे विकास के क्या मायने हैं, और जो कंपनियां यहां उद्योग लगाने को आतुर क्यों हैं, यह समझने के लिए बहुत दिमाग पर जोर डालने की जरूरत नहीं है। उनके इस विकास से वास्तव में विकास किसका होगा, यह भी अबूझ नहीं है। इसलिए, यदि आदिवासी आज जमीन नहीं देने की बात कर रहे हैं तो वे गलत नहीं हैं। शायद वे अपनी पुरानी गलती को दुर$स्त कर रहे हैं।

विकास, विस्थापन और आदिवासी


तुम किस खोह में खोये हो

तेलंगना, नक्सलबाड़ी और श्रीकाकुलम की मिट्टी
सोनभद्र और पुनपुन की तराई में जमकर
एक नया सपना उगाने में लगी हैं-
तुम किस खोह में खोये हो?

                                                                                                                  -कुमारेंद्र पारसनाथ सिंह
सपने आज भी जिंदा हैं। जिंदा न होते तो महाराष्ट्र से पं बंगाल तक आंध्रप्रदेश से लेकर उड़ीसा और झारखंड तक की जंगलों में दिनों दिन आग की लपटें बड़ी नहीं होती। आज भी इन इलाकों में जल, जंगल, जमीन की लड़ाई जारी है-आजादी के 63 साल बाद भी। यह देश के लिए गर्व का विषय है या शर्म का-इसका जवाब तो देश के प्रधानमंत्री ही दे सकते हैं। क्या यह अजीब नहीं लगता कि देश की करीब दस करोड़ आबादी, जिसे आदिवासी कहा जाता है, वह आज भी विकास की कीमत चुका रही है? उसकी भाषा, उसकी संस्कृति सबकुछ नष्ट करने के लिए तथाकथित सभ्य समाज और उसके नुमाइंदे कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहे? क्या ऐसा नहीं लगता कि इस देश में लोकतंत्र का अर्थ सबके लिए एक ही नहीं है? आजादी, अभिव्यक्ति, और अस्मिता जैसे शब्द भी एक ही माने नहीं रखते। क्या वर्ग बदलते ही इनकी अवधारणा नहीं बदल जाती हैं। आजादी के बाद का इतिहास तो यही दर्शाता है।
हमारे देश के प्रधानमंत्री अपने विशेष विमान से देश को संबोधित करते हुए कहते हैं दुनिया भारत को आगे बढ़ते हुए देखना चाहती है। मनमोहन सिंह से पूछना चाहिए कि इसमें रुकावट कौन है? उनका इशारा आदिवासियों की ओर तो नहीं है? आखिर, विकास में सबसे बड़े बाधक तो उनकी नजर में यही हैं। उनके इस संदेश के पीछे छिपे निहितार्थ तो यही लगते हैं? जैसे कारपोरेट गृहमंत्री को आदिवासी और माओवादी में अंतर नहीं समझ में आता है और इन्हें समाप्त करने के लिए उन्होंने आपरेशन ग्रीन हंट चला रखा है। महाश्वेता देवी पूछती हैं आपरेशन ग्रीन का क्या मतलब है? ग्रीन यानी जंगल का शिकार? क्यों भाई? इसलिए कि जंगल को बहुराष्ट्रीय कंपनियों को सौंपना है। वे कंपनी लगाएंगे, इससे देश की तरक्की होगी। देश आगे बढ़ेगा? अब ये आदिवासी इसमें बाधक हैं। वे जंगलों में रहते हैं। माओवादी भी जंगलों में रहते हैं। तो, दोनों को खत्म करने के लिए इससे आसान रास्ता क्या हो सकता है कि सभी को माओवादी घोषित कर दो। न भी करो तो आपरेशन के बाद खुद आदिवासी जंगल छोड़ देंगे। फिर पी चिदंबरम का मार्ग निष्कंटक हो जाएगा। पं सिंहभूम आदि क्षेत्रों से ऐसी खबरें भी आ रही हैं कि जवान गांवों में घुसकर महिलाओं और ग्रामीणों के साथ जबरदस्ती कर रहे हैं, मारपीट कर रहे हैं। उनके उत्पात से लोग गांव छोड़ रहे हैं। छत्तीसगढ़ की हालत किसी से छिपी नहीं है। लेकिन जो रास्ता अख्तियार केंद्र सरकार की है, उसकी जो अदूरदर्शी सोच है, उससे लगता नहीं कि वह इस समस्या से पार पाएगी। क्योंकि जो लोग आदिवासियों के इतिहास की थोड़ी बहुत भी समझ रखते हैं वह जानते हैं कि जल, जंगल, जमीन के लिए ये कुछ भी कर सकते हैं। बहुत दिनों तक इनकी भलमनसाहत का फायदा नहीं उठाया जा सकता। औपनिवेशिककाल इसका सबसे अच्छा उदाहरण है।
अंग्रेजों ने झारखंड में प्रवेश करने के बाद यहां के जंगल और जमीन पर एकाधिकार स्थापित करने के लिए कई कानून बनाए। 1793 में स्थायी बंदोबस्त कानून बनाया और आदिवासियों को अलग-थलग कर दिया। जमीन के बाद जंगल पर एकाधिकार के लिए 1865 में कानून बनाया। विकास के लिए 1894 में भूमि अधिग्रहण कानून बनाया। यानी शोषण को कानूनी जामा पहनाया। लेकिन आदिवासी उसके कानून के झांसों में नहीं आए। इसी का परिणाम रहा आदिवासी क्षेत्रों में अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह। 1855 से लेकर आजादी मिलने तक कई विद्रोह हुए..मानभूम विद्रोह, चेरो विद्रोह, तमाड़ विद्रोह, कोल विद्रोह, गंगनारायण विद्रोह, संथाल विद्रोह, भुइयां टिकैत विद्रोह आदि-आदि। उल्लेखनीय है कि 1857 के महान राष्ट्रव्यापी संघर्ष से पहले ही झारखंड की धरती ने 1855 में ही संघर्ष का सिंहनाद कर दिया था। चार भाइयों सिदू-कान्हों-चांद-भैरव की अगुवाई वाले इस संघर्ष को संताल हूल के नाम से जाना जाता है, जिसमें दस हजार लोग बलिदान हुए थे। संताल गजेटियर में लिखा है, संताल विद्रोह के पीछे जमीन पर एकछत्र अधिकार की स्थापना की लालसा थी। इस विद्रोह का क्षेत्र व्यापक था और इसने लंबे समय तक झारखंड के मानस को हिलोड़ते रहा और क्रांति के लिए उकसाता रहा। इस महान हूल को मुख्यधारा के इतिहासकारों ने उपेक्षित ही छोड़ दिया। यह अकारण नहीं कि सखुए की टहनी को गांव-गांव घुमाकर 30 जून, 1855 को भगनाडीह गांव में संतालों को एकत्रित होने के लिए आमंत्रित किया गया था। कहते हैं इस दिन करीब चार सौ गांवों से दस हजार लोग अपने पारंपरिक हथियारों के साथ जुटे थे। अब क्या था, क्रांति का बिगुल फूंक दिया गया। नारा दिया, खेत हमने बनाए हैं, इसलिए ये हमारे हैं। इसके लिए किसी को कर देने की जरूरत नहीं है। इस वाक्य ने जो हुंकार भरी, वह अप्रत्याशित था। सालों का दबा आक्रोश अचानक फूंट पड़ा। यह अलग बात है इस संघर्ष में दस हजार लोग मारे गए। लेकिन इसने संघर्ष की पीठिका तैयार कर दी। इसके दो साल बाद 1857 में धरती फिर धधक उठी। इस बार पूरे देश में आग लग गई। झारखंड का पलामू, मानभूम, सिंहभूम, रांची और उसके आस-पास के क्षेत्रों में आग की लपटें तेज होने लगीं। ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव, पांडेय गणपत राय, नीलांबर-पीतांबर आदि ने जगह-जगह नेृतत्व संभाला। विद्रोह ने नया मुकाम हासिल किया। रांची, चाइबासा, चक्रधरपुर, कोल्हान, हजारीबाग आदि क्षेत्र भी रह-रह कर सुलगते-सुलगते धधक उठते। संघर्ष चलता रहा। अंग्रेजों के अत्याचार व शोषण में कमी नहीं आ रही था। अलबत्ता कानून बनाकर थोड़ी-थोड़ी रियायत जरूर दे रहे थे। आगे चलकर झारखंड को एक और नायक मिला, जिसने बहुत दूर तक इस राज्य को प्रभावित किया। नाम था बिरसा मुंडा। संताल हूल बीस साल बाद बिरसा का जन्म हुआ। बहुत कम आयु पाई थी। 9 जून, 1900 को रांची कारा में देहावसान हो गया। कुल पच्चीस की उम्र में पूरे झारखंड को बेचैन करने वाले इस युवा ने अंग्रेजी की चपलनीति, उनकी मानसिकता, लूट, धर्मातरण आदि पर जमकर प्रहार किया, लोगों को एकजुट किया। संघर्ष को आगे बढ़ाया। लोगों को संगठित कर साम्राज्यवादी सत्ता से लड़ने का ऐलान किया.. कहा, अब सरकार की बात कानने की जरूरत नहीं है। उनका संघर्ष धीरे-धीरे पठारों से होते हुए गांवों में फैलने लगा। लोग संगठित होकर अंग्रेजों के खिलाफ उठ खड़े हुए। मुक्ति की कामना लिए हुए सैकड़ों नौजवान बिरसा के साथ हो लिए। चक्रधरपुर, खूंटी, चाईबासा, कर्रा, तोरपा, बसिया आदि में आजादी की चाह की आग सुलगने लगी। बिरसा ने डोम्बारी बुरू और सइल रकाब के सुरक्षित जंगलों से, जो खूंटी में पड़ता है, आंदोलन की धार को तेज कर दिया। 24 दिसंबर 1899 को पूर्व योजना के अनुसार मिशनों और सरकारी दफ्तरों तथा सैनिकों पर हमले होने लगे। सात जनवरी को खूंटी पर आक्रमण किया गया। बिरसा का आंदोलन बढ़ता जा रहा था। अंग्रज प्रशासन इसे किसी भी स्तर पर कुचलने के लिए तैयार थी। लिहाजा, सइन रकाब और डोम्बारी बुरू को बुरी तरह घेर लिया गया। अंग्रेजों से मुखबिरी कर दी कि बिरसा डोम्बारीबुरू पर डेरा डाले हुए है। अब अंग्रेजों का काम आसान हो गया था। उस पहाड़ को चारों तरफ से घेर लिया गया था। युद्ध शुरू हो गया। इसमें काफी लोग मारे गए। कुछ दिनों के बाद संतरा के जंगल से बिरसा को गिरफ्तार कर लिया गया। इसके बाद बिरसा और उनके अनुयायियों पर मुकदमा चला। लेकिन सुनवाई के दौरान उनकी मृत्यु हो गई। बिरसा को लेकर खूंटी और आस-पास के क्षेत्रों में मुंडारी भाषा में गीत प्रचलित हैं। इसे कुमार सुरेश सिेह ने संकलित कर एक पुस्तक ही लिख डाली है, जिसमें बिरसा की पूरी कहानी और आंदोलन को समेटा है। खैर, भगवान बिरसा के बाद भी आंदोलन का सिलसिला थमा नहीं। बाद के दिनों में कांगे्रस का फैलाव जैसे-जैसे होता गया, गांधी का प्रभाव भी बढ़ता गया और आंदोलन का रुख भी बदलता गया। गांधी से प्रभावित झारखंड में टाना भगतों का अहिंसक आंदोलन चला। आज ये उपेक्षित हैं। क्यों, क्या ये आजादी की कीमत चुका रहे हैं?
इन आंदोलनों के पीछे क्या था? जल, जंगल, जमीन ही न? फिर आजाद देश की सरकार कैसे सोच रही है कि वह जवानों की बदौलत उनकी जमीन हड़प लेगी? वह बार-बार विकास की दुहाई देती है-दे रही है। विकास माने विनाश तो नहीं होता। आजादी के बाद और कुछ उसके पूर्व झारखंड में बडे़-बड़े उद्योग स्थापित हुए। इससे आदिवासियों का विस्थापन हुआ। उन्हें शर्त के अनुसार न मुआवजा दिया न नौकरी। बोकारो, एचईसी, कोयलकारो आदि उद्योगों-परियोजनाओं की कीमत आदिवासियों ने चुकाई और वे आज भी चुका रहे हैं। आज स्थिति और भी भयावह है। पहले सरकार के पास कुछ नैतिकता भी और समाज कल्याण की भावना भी थी। पर, 1991 के बाद सबकुछ बदल गया। मनमोहन सिंह ने नई आर्थिक क्रांति का फलसफा तैयार किया, उसे उदारीकरण का नाम दिया। यह उदारता किसके लिए, गरीबों के लिए या अमीरों के लिए! समय और अनुभव तो यही बताते हैं कि पूंजीपतियों की तिजोरी भरने के लिए उदार नियम बनाए गए। इस नियम ने आम जनता को हाशिए पर ढकेला और पूंजीपति लगातार समृद्ध होते गए। करोड़पतियों-अरबपतियों की संख्या बढ़ती गई। इनका मुनाफा भी तेजी से बढ़ता गया। लेकिन गरीबी भी तेजी से बढ़ती गई। आज देश के सौ अमीरों के पास 276 बिलियन डालर की पूंजी है, जो सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 25 प्रतिशत है। 2008 में भारतीय अरबपतियों की संख्या 27 थी, जो एक वर्ष में बढ़कर 52 हो गई। एक वर्ष में भारतीय अरबपतियों की संपत्ति पांच लाख करोड़ बढ़ी है। 2009-10 में भारत का सकल घरेलू उत्पाद 1100 बिलियन डालर रहने की उम्मीद है, यानी सौ करोड़ से ज्यादा आबादी वाले देश का एक चौथाई पैसा सौ लोगों के पास है। यह मनमोहन सिंह के आर्थिक उदारीकरण की भयावह तस्वीर का एक छोटा रूप है। दूसरी तरफ इस वित्तीय वर्ष की समाप्ति (मार्च 2010) पर देश का वित्तीय घाटा 4 लाख करोड़ का होने का अनुमान है। यह सब देश के अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के उदारवादी सिद्धांत का कमाल है। जब से यह व्यवस्था लागू हुई है, एक और अरबपतियों की संख्या बढ़ी है तो दूसरी ओर गरीबों की संख्या। अर्जुन सेन गुप्ता की रिपोर्ट बताती है कि 84 करोड़ भारतीय रोजाना बीस रुपए से कम पर गुजर-बसर करते हैं। 30 प्रतिशत ग्रामीण जनता रोज 19 रुपए और 10 प्रतिशत शहरी जनता 13 रुपए प्रतिदिन पर गुजर-बसर कर रही है। बीस करोड़ की आबादी मात्र 12 रुपए से भी कम पर अपने जीवन की गाड़ी चला रही है। कहने की जरूरत नहीं कि आम आदमी की कीमत पर ही आर्थिक विकास की इमारत खड़ी की जा रही है।
विषमता की ऐसी खाई समस्याओं को ही जन्म दे सकती है। नागार्जुन ने बहुत पहले पूछा थाभुक्खड़ के हाथों में यह बंदूक कहां से आई? इसका जवाब तो मनमोहन सिंह ही दे सकते हैं। 
नई आर्थिक नीति में किसानी की चिंता नहीं, बड़े कारपोरेट घरानों की चिंता है। सरकार का ध्यान गरीबों पर नहीं अमीरों पर है। अब संसद में भी गरीबों के हक की आवाज नहीं सुनाई देगी क्योंकि संसद में भी अमीर सांसद बहुमत में हैं। कमल नयन काबरा कहते हैं कि 'आज का भारतीय राज्य एक पक्षपाती राज्य है जो पूंजीपतियों की सेवा करता है, और जनता के हितों की बेशर्मी से उपेक्षा करता है।'
अब सरकार के सरोकारों पर और कुछ कहा जा सकता है? हम जो विकास करना चाहते हैं या  विकास का जो माडल हमने बनाया है, ज्यादा सही होगा कि हमने विकसित देशों से उधार लिया, उसने विनाश ही ज्यादा किया। जगह-जगह सेज बनाने की सरकार ने घोषणा कर रखी है। राज्य की सरकारें एमओयू के जरिए राज्य की संपदा को औने-पौने दामों में कंपनियों को मुहैया करा रही हैं। दुर्भाग्य यह है कि जहां-जहां मिनरल्स हैं, कोयला है, सोना है, यूरेनियम है, उन क्षेत्रों में आदिवासियों का रहवास है। और, इन्हीं क्षेत्रों में लाल आतंक फैला हुआ है। केंद्र की सरकार इनके खात्मे के लिए आपरेशन ग्रीनहंट चला रही है। कई मानवाधिकार संगठन और महाश्वेता देवी तक यही मानती हैं कि ग्रीन हंट आपरेशन नक्सलियों के सफाए के लिए नहीं जंगल से आदिवासियों को बेदखल करने के लिए चलाए जा रहे हैं। इन संगठनों का कहना है कि एक ओर आपेरशन ग्रीन चलाया जा रहा है तो दूसरी ओर खनिज संपदा का हवाई सर्वेक्षण हो रहा है। आखिर, इसका क्या मतलब है? एक और प्रश्न उठता है कि आखिर, 63 साल बाद सरकार को आदिवासी इलाकों में विकास की सुध क्यों जगी? झारखंड, छत्तीसगढ़, पं बंगाल का लालगढ़ इलाका, मध्यप्रदेश के कुछ हिस्से, उड़ीसा, आंध्रप्रदेश आदि में रहने वाले आदिवासियों की सुधि पहले क्यों नहीं ली गई?
अचानक, जब सरकार ने बड़ी-बड़ी कंपनियों से एमओयू किए और उन्हें आदिवासियों ने अपनी देने से इनकार कर दिया तो सरकार ने बहुत सुनियोजित तरीके से दुष्प्रचार करना शुरू किया। विकास का नारा उछाला। जंगलों से माओवादियों को खदेड़ने का अभियान शुरू किया। इस अभियान में माओवादी भले बच निकले, आदिवासियों दोहरी मार झेलने का मजबूर हो गए हैं। एक ओर माओवादी तो दूसरी ओर  आरपीएफ के जवान। अब ये पलायन न करें तो क्या करें? वैसे, सरकार के इस आपरेशन पर भी लोग सवाल उठा रहे हैं। दंतेवाड़ा की घटना ने सरकार की रणनीति और उसकी इच्छा शक्ति दोनों की पोल खोल दी है। इसने साबित कर दिया है कि उसके पास कोई ठोस योजना नहीं है। या फिर वह जवानों को शहीद करवाकर नक्सलियों की भयावहता रेखांकित करना चाहती है ताकि वह सेना को उतार सके। सेना ने चूंंकि पहले ही कह दिया है, अपनों के खिलाफ हथियार नहीं उठाएंगे। सो, कारपोरेट गृहमंत्री  चाहते हैं कि इस तरह की घटना हो। गृहमंत्री जी विकास का रट लगाए हुए हैं। सवाल उठता है कि सरकार यदि आदिवासी क्षेत्रों में विकास ही करना चाहती है तो पहले उसे उन आदिवासी क्षेत्रों में विकास करके दिखाना चाहिए जो लाल आतंक से मुक्त हैं। छत्तीसगढ़ के 18 जिलों में छह जिले ही हैं जहां नक्सलियों की धमक हैं। चार जिलों में उनकी उपस्थित शून्य है। सरकार को बाकी के जिलों में विकास करके तो दिखाना चाहिए। इसी तरह झारखंड की बात कर सकते हैं। ऐसा नहीं कि झारखंड के 24 जिले पूरी तरह लाल आंतक से ग्रस्त हैं। इनमें कुछ ही जिले हैं, जहां उनकी चलती है। लेकिन सरकार मौन साधे हैं। यहां तो वृद्धापेंशन के लिए भी सरकारी हाकीमों को घूस देना पड़ता है। इंदिरा आवास, बिरसा मुंडा आवास, मनरेगा आदि की हालत किसी गांव में जाकर देख सकते हैं। पर, सरकार अपने बेईमान अधिकारियों पर कोई अंकुश लगाना मुनासिब नहीं समझती।
राज्यसभा सांसद डा. रामदयाल मुंडा तो स्पष्ट कहते हैं कि विकास हो लेकिन जनता की शर्त पर, पूंजीपतियों की शर्त नहीं। उन्होंने कई बार दुहराया है कि सरकार जो भी विकास करना चाहती है, उसमें जनता कहीं भी नहीं है। इस विकास के माडल में उसे विस्थापित ही होना पड़ता है। वहीं, झारखंड के बौद्धिक अगुवा
डा. बीपी केशरी कहते हैं कि विकास से हमारा विरोध नहीं है, लेकिन सरकार उपनिवेशवादी विकास कर रही है। इस विकास से पूंजीपतियों का विकास तो हो रहा है लेकिन बड़ी आबादी भिखारी बनती जा रही है। वह कहते हैं कि सरकार आदिवासियों को खत्म करना चाहती है। आस्ट्रेलिया, जापान, अमेरिका में वहां के मूल निवासियों को खत्म कर दिया गया। पूरी दुनिया में कई जातियों विकास की भेंट चढ़ गई। उनका अस्तित्व ही खत्म हो गया। यही काम अब अपने देश की सरकार कर रही है। वह कहते हैं कि विकास का यह जहरीला तरीका है। हमें वैकल्पिक विकास की योजना बनानी चाहिए। जनता के विकास का प्रोग्राम बनना चाहिए। विकास कैसा हो, किस तरह का हो, यह गांव की जनता सोचे। लेकिन सरकार सोच नहीं पा रही है। वन अधिकार कानून को भी ठीक से लागू नहीं कर पा रही है। जो कानून आदिवासी हितों के लिए बने भी उन पर वर्चस्वशाली जातियों ने अपने हितों की ओर मोड़ दिया। आदिवासी समाज जहां 63 साल पहले खड़ा था, वहीं आज भी खड़ा है। क्या उनके जज्बात, उनके आक्रोश, उनकी जायज मांगों, उनके हकों को लेकर हम या हमारी सरकार, मुख्यधारा का मीडया कभी संजीदा हुआ है?  
नोट * दो साल पहले लिखी रचना है।

कायस्थों ने उठाई थी बिहार की मांग

बिहार ने पिछले साल अपने गठन का शतवार्षिकी मनाया, लेकिन हम उन सपूतों को याद करने से भी परहेज कर रहे हैं, जिन्होंने बिहार को अलग करने की मांग पहले पहल उठाई थी। बंगभंग आंदोलन की इसमें बड़ी भूमिका है। 1905 के बाद ही अलग बिहार की मांग जोर पकडऩे लगी थी। इसे जानने के लिए थोड़ा अतीत में जाना हैं। बंगभंग विरोधी आंदोलन से बिहार तथा बंगाल में क्रांतिकारी आंदोलन प्रारम्भ हो गया। बिहार के डा. ज्ञानेन्द्र नाथ, केदारनाथ बनर्जी एवं बाबा ठाकुर दास प्रमुख थे। बाबा ठाकुर दास ने 1906-07 . में पटना में रामकृष्ण मिशन सोसायटी की स्थापना की और समाचार-पत्र द्वारा दी मदरलैंड का संपादन एवं प्रकाशन शुरू किया ।
बिहार प्रादेशिक सम्मेलन की स्थापना 12-13 अप्रैल, 1906 में पटना में हुई जिसकी अध्यक्षता अली इमाम ने की थी, इसमें बिहार को अलग प्रांत की मांग के प्रस्ताव को पारित किया गया। अली इमाम का संबंध रांची है। रांची में हजारीबाग मार्ग पर जिमखाना क्लब के सामने उनकी मजार है। मजार से सटी उनकी कोठी थी, जिसे इमाम कोठी कहा जाता था। सरकार ने इस कोठी को संरक्षित करने का प्रयास नहीं किया। सो, उनके वंशजों ने इसे बेच दिया। हालांकि मजार के साथ आज भी काफी जमीन है, जिसे कला संग्रहालय बनाने की मांग उठती रही है। खैर, इसकी चर्चा फिर कभी। इतिहास के पन्नों को पलटते हैं तो पाते हैं कि 1908 . में ही नवाब सरफराज हुसैन खां की अध्यक्षता में बिहार कांग्रेस कमेटी का गठन हुआ। इसमें स'िचदानन्द सिंह, मजरूलहक हसन, इमाम, दीपनारायण सिंह आदि शामिल थे। कांग्रेस कमेटी के गठन के बाद इसका अध्यक्ष इमाम हुसैन को बनाया गया ।
1909 . में बिहार कांग्रेस सम्मेलन का दूसरा अधिवेशन भागलपुर में हुआ। इसमें भी बिहार को अलग राज्य की मांग जोरदार ढंग से की गई। यानी कांग्रेस ने भी इस मांग पर अपनी मुहर लगाई। 1910 . में मार्लेमिंटो सुधार के अंतर्गत प्रथम चुनाव आयोजन में स'िचदानन्द सिंह ने चार महाराजाओं को हराकर बंगाल विधान परिषद् की ओर से केंद्रीय विधान परिषद में विधि सदस्य के रूप में नियुक्त हुए । 1911 . में दिल्ली दरबार में जार्ज पंचम के आगमन में केन्द्रीय परिषद् के अधिवेशन के दौरान स'िचदानन्द सिंह, अली इमाम एवं मोहम्मद अली ने पृथक बिहार की मांग की। फलत: इन बिहारी महान सपूतों द्वारा 12 दिसम्बर, 1911 को दिल्ली के शाही दरबार में बिहार और उड़ीसा को मिलाकर एक नया प्रांत बनाने की घोषणा हुई। इस घोषणा के अनुसार एक अप्रैल, 1912 को बिहार की नए प्रान्त के रूप में विधिवत स्थापना की गई। बिहार के स्वतन्त्र अस्तित्व का मुहर लगने के तत्काल बाद पटना में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का 27वां वार्षिक सम्मेलन हुआ।
मुगलकालीन समय में बिहार एक अलग सूबा था। मुगल सत्ता समाप्ति के समय बंगाल के नवाबों के अधीन बिहार चला गया। फलत: बिहार की अलग राज्य की मांग सर्वप्रथम मुस्लिम और कायस्थों ने की थी। जब लार्ड कर्जन ने बंगाल को 1905 . में पूर्वी भाग एवं पश्चिमी भाग में बांध दिया था तब बिहार के लोगों ने इस प्रस्ताव का विरोध किया एवं स'िचदानन्द सिंह एवं महेश नारायण ने अखबारों में वैकल्पिक विभाजन की रूपरेखा देते हुए लेख लिखे थे जो पार्टीशन ऑफ बंगाल और लेपरेशन ऑफ बिहार 1906 . में प्रकाशित हुए थे।
इस समय कलकत्ता में राजेन्द्र प्रसाद अध्ययनरत थे वे वहां वे बिहारी क्लब के मंत्री थे। डा. 'िचदानन्द सिंह, अनुग्रह नारायण सिंह, महेश नारायण तथा अन्य छात्र नेताओं से विचार-विमर्श के बाद पटना में एक विशाल बिहार छात्र सम्मेलन करवाया। यह सम्मेलन दशहरा की छुट्टी में पहला बिहारी छात्र सम्मेलन पटना कॉलेज के प्रांगण में पटना के प्रमुख शर्फुद्दीन के सभापतित्व में संपन्न हुआ था। इससे बिहार पृथक्करण आंदोलन को विशेष बल मिला। बिहार के साथ उड़ीसा भी था। 19&5 में बिहार से उड़ीसा अलग हुआ और इसके 65 साल बाद झारखंड। बिहार के निर्माण में बिहार टाइम्स की भी प्रमुख भूमिका रही है। 1906 . में बिहार टाइम्स का नाम बदलकर बिहारी कर दिया गया। 1907 . में महेश नारायण का निधन हो गया। स'िचदानन्द ने ब्रह्मदेव नारायण के सहयोग से पत्रिका का सम्पादन जारी रखा। पत्रिका का प्रकाशन 1894 में शुरू हुआ था। इसका उद्देश्य भी बिहार को एक अलग राज्य के रूप में स्थापित करना था।

पहाड़ों का मौन आमंत्रण

झारखंड के पहाड़ों, पठारों, झरनों, नदियों के पास हजारों साल की अनमोल कहानियां हैं। इन कहानियों का एक सिरा पाषाण काल तक जाता है तो दूसरा सिरा आज के वर्तमान तक फैला हुआ है। इन दोनों के बीच हजारों साल का फासला है। इन फासलों से जब होकर गुजरेंगे तो झारखंड का एक दूसरा ही चेहरा दिखेगा, जिसे आज तक पढ़ने की कोशिश मुख्यधारा के इतिहासकारों ने कतई नहीं की है। जैसे प्राचीन काल में लोगों के लिए यह प्रदेश गूढ़ रहा, वैसे ही आज के इतिहासकारों के लिए भी यह प्रदेश सिर्फ झाड़-झंखाड़ तक ही सीमित रहा है। राज्य का विकास कितना हुआ, कैसे हुआ, यह हम सब जानते हैं।

देश को यहां का लोहा चाहिए, खनिज चाहिए, अभ्रक चाहिए, पत्थर चाहिए, कोयला चाहिए बिजली पैदा करने के लिए, लेकिन यहां का विकास उनकी प्राथमिकता में नहीं हैं। यहां के कोयले से देश रोशन होता है और अपना झारखंड अंधेरे में? 12 साल के झारखंड में भी यहां के शासनकर्ताओं ने विकास की कोई बड़ी लकीर नहीं खींची। फिर भी झारखंड चल रहा है, जैसे देश चल रहा है। चलना इसकी नियति है। ऐसा इसलिए कि इसकी संस्कृति और समाज बेहद गतिशील है। इनमें बड़ी भूमिका आदिवासी-सदान समाज की है। इनकी परंपराएं और पर्व इन्हें एक सूत्रा में बांधती और पिरोती हैं और निरंतर चलने की प्रेरणा देती हैं। ये परंपराएं ही सामूहिक चेतना का निर्माण करती हैं। सामूहिकता इनके जीवन का केंद्रीय राग है। यहां कुछ भी निजी नहीं। न गोपन है। न रहस्य भरा। सब कुछ खुला और मिल-बांटकर खाने-रहने, पहनने का जीवंत सामाजिक दर्शन। हालांकि आधुनिकता यहां भी धीरे-धीरे पांव पसार रही है, जिसके कारण अखरा संकुचित और सिकुड़ रहा है। संस्कृति के ध्वंस का खेल भी जारी है। संस्कृति बिखरी तो समाज बिखरने में देर नहीं लगता। ये बाहरी तबका जानता है। संस्कृति ही वह धागा है, जो सबको एक सूत्रा में पिरोती है।

यह पुस्तक इसी दिशा में एक छोटी सी पहल है। हम अपने अनमोल विरासत को जाने, समझे और बचाएं।

झारखंड में सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक स्थलों की भरमार है। पर पुरातात्विक और ऐतिहासिक दृष्टि से झारखंड में जो काम होना चाहिए, वह 12 सालों में न के बराबर हुआ है। जो हुआ है, वह मानवविज्ञान के क्षेत्रा में। अब तो मानवविज्ञान भी कुंद पड़ गया है।

झारखंड इस माने में भी महत्वपूर्ण है कि यहां पर धर्म-धार्मिकता के प्राचीन अवशेष मिलते हैं। यहां के छोटानागपुर के पठारों पर शिवलिंगों की बहुतायत है। वहीं, बौद्ध एवं जैन धर्म से जुड़े प्राचीन स्थलों की भी कमी नहीं है। हजारों साल पुराने मेगालिथ यहां मिलते हैं। ऐसे स्मारक हजारीबाग, रांची, चतरा, लोहरदगा आदि जिलों में हैं। मेगालिथ के संबंध में दुखद बात यह रही कि 17वीं-18वीं शताब्दी से ही इनके विषय में कई तरह के भ्रम फैलाए जाते रहे हैं। कुछ लोगों ने असुर जनजाति से संबंधित स्मारक बताया तो कुछ और ही कल्पना करते रहे। अधकचरे ज्ञान के कारण झारखंड में मेगालिथ मात्रा रोमांचक पुरातात्विक सामग्री भर बन कर रह गए हैं।

मेगालिथ दो यूनानी शब्द मेगा और लियोस का मिला-जुला रूप है, जिसका अर्थ होता है बड़ा पत्थर। मेगालिथ उन प्राचीन शवागारों को कहते हैं, जिनमें विशालकाय प्रस्तर खंडों का इस्तेमाल किया जाता है। प्राचीनतम मेगालिथ लंदन के समीप स्टोनहेंज नामक स्थान पर पाए गए हैं, जिन्हें आज से लगभग 5000 वर्ष पुराना माना जाता है। भारत में प्राचीनतम मेगालिथ कश्मीर घाटी में बुर्जहोम नामक स्थान पर पाए गए हैं, जो लगभग 1800 ईपू बनाए गए थे। जहां तक झारखंड में मेगालिथ का सवाल है, यहां भी बड़ी संख्या में मेगालिथ लगभग हर जिले में खोज लिए गए हैं। यहां के संदर्भ में सबसे उत्साहवर्द्धक बात यह है कि झारखंड की कई जनजातियों में मेगालिथ की परंपरा अब भी जीवित है। विशेषकर मुुंडा एवं उरांव जनजातियों में ससनदिरी की परंपरा कुछ और नहीं, बल्कि मेगालिथिक पंरपरा का आधुनिक एवं जीवंत रूप है।

झारखंड में शैल चित्रा और गुफा चित्रा भी काफी पुराने मिलते हैं। हजारीबाग-पलामू-लोहरदगा, गुमला, पूर्वी एवं पश्चिमी सिंहभूम जैसे इलाकों में इन्हें देखा जा सकता है। हजारीबाग के इस्को गांव में मिली राॅक पंेटिंग दो से पांच हजार ईसा पूर्व की बताई जाती है। अभी हाल में गुमला जिले के कोजेंगा के जंगल में हजारों साल पुरानी एक राॅक पेंटिंग खोज निकाली गई है। पुराविद्ों का मानना है कि यह पेंटिंग इस्को से भी ज्यादा उत्कृष्ट है। इन पेंटिंगों पर काम करने की जरूरत है। इसी तरह पलामू के लिखलाही पहाड़ की एक गुफा में बने शैल चित्रा को देखकर बनाने वाले की कलात्मक बोध को समझ सकते हैं, जो आज के आधुनिक कलाकारों से कतई कम नहीं थे। अभी सरकारी मशीनरियों ने विधिवत झारखंड के बारे में जानने का प्रयास नहीं किया है। यह सब खोजी और उत्साही लोगों ने कर दिखाया है।

झारखंड की प्रमुख आदिम जनजाति असुर हैं। ये प्राचीनतम जनजाति में शामिल हैं। यही यहां के सबसे पुराने बाशिंदे माने जाते हैं। ऋग्वेद में इन्हें पुर निर्माता कहा गया है। लोहा गलाने की पद्धति सबसे पहले इन्होंने ही ईजाद की थी। इनसे जुड़े ऐतिहासिक स्थल भी जमींदोज हो रहे हैं। राज्य सरकार की उदासीनता इन ऐतिहासिक स्थलों के लिए भारी पड़ रही है। रांची, खूंटी, लोहरदगा, हजारीबाग, चाइबासा आदि में अनेक असुर साइट हैं। खूंटी जिले में ही कुथारटोली, कुंजला, सारीदकेल, कठारटोली एवं हांसा को संरक्षित स्मारक घोषित किया जा चुका है। सारीदकेल करीब पचास एकड़ में फैला है। सारीदकेल खूंटी-तमाड़ रोड पर स्थित है। तजना नदी के तट पर एक विशाल टीला आज भी मौजूद है। वहां से कई प्रकार के अवशेष मिलते रहते हैं। इसकी खोज सबसे पहले एससी राय ने 1915 में खूंटी के बेलवादाग में की थी। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा खुदाई में यहां से मनके, चूडियां, चाकू, भाला, मकानों के अवशेष, मृदभांड आदि मिले हैं। विशाल टीले को देखकर उस बस्ती का अंदाजा लगा सकते हैं। कुंजल खूंटी से पश्चिम में है। तीन एकड़ में फैले इस साइट की खोज भी शरतचंद्र राय ने ही की। कठारटोली रांची से दक्षिण चाइबासा रोड पर है। चैबीस एकड़ में फैले इस साइट से भी खुदाई में तांबे की चूडियां मिली हैं, जो पटना संग्रहालय में रखी हैं। खंूटी टोला भी तीन एकड़ में है। कोटरी नदी के किनारे। यहां भी मिट्टी के दीये, चूडि़यां, घंटी, अंगूठी आदि मिले हैं। हांसा रांची से दक्षिण दिशा में है। 1944 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के निदेशक ने खोज की। इनके मकान ईंटों से बनाए गए हैं। ईंटों का आकार काफी बड़ा है, पर दुर्भाग्य से इतिहास में नया मोड़ ले आने वाली यह असुर जाति आज धीरे-धीरे इतिहास के पृष्ठों में सिमटती जा रही है।

इसी तरह पलामू के हुसैनाबाद प्रखंड के पंसा व सहराविरा गांव में दो स्तूप मिले हैं। झारखंड में अब तक बौद्धकालीन मूर्तियां व उनके अवशेष तो मिलते रहे हैं, स्तूप पहली बार मिले हैं। स्तूप मिट्टी के बने हैं। इसकी परिधि 15 मीटर हैं और ऊंचाई आठ मीटर। स्तूप के ऊपर ईंटों का भी इस्तेमाल हुआ है जिनका साइज है 10 गुणा 7 गुणा तीन। सात गुणा पांच गुणा तीन। दस गुणा सात गुणा तीन सेंटी मीटर। यहां लाल रंग के मृदभांड भी पाए गए हैं। गांव वाले इस स्तूप पर धान निकालते या ओसावन करते हैं। उन्हें इसकी ऐतिहासिकता की जानकारी नहीं है। उनके लिए यह एक मिट्टी का टीला है। दूसरा स्तूप सहारविरा गांव में मिला है। यह पंसा गांव से 5 किमी दूर है। इस स्तूप की ऊंचाई तीन मीटर है और परिधि आठ मीटर। इसमें पके ईंटों का भी इस्तेमाल हुआ है। स्तूप के बीच में पत्थर का स्तंभ है। स्तंभ के ऊपरी हिस्से पर बौद्ध की आकृति है। स्तंभ स्तूप में धंसा हुआ है। यह 6वीं-7वीं शताब्दी का माना जा रहा है। स्तूप के ऊपर व आस-पास झाड़-झंखाड़ उग आए हैं। स्तूप से झांकती बुद्ध की प्रतिमा अपनी कहानी खुद की बयां करती है।

लोहरदगा जिले के खखपरता गांव में भी अभी हाल में यहां से मां दुर्गा और भगवान विष्णु की दो प्राचीन मूर्तियां मिली हैं। दोनों मूर्तियां 7वीं से 8वीं सदी की हैं। दोनों मूर्तियां स्थानीय बलुआ पत्थर से निर्मित हैं। खखपरता में नागर शैली के भवन निर्माण कला का उत्कृष्ट उदाहरण मिला है। वहां मिले शिव मंदिर की यह विशेषता है कि यह मंदिर एक चट्टान के ऊपर बनाया गया है। मंदिर की खास विशेषता यह है कि इसका प्रवेश द्वार पूरब दिशा में है, जबकि ऐसा बहुत कम ही होता है। वहीं मंदिर के उत्तरी दिशा में आठ मंदिरों का एक समूह भी मिला है। इसमें से सात मंदिरों की पहचान शिव मंदिर के रूप में हुई है और वहां से शिवलिंग भी प्राप्त हुए हैं। इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि प्राचीन काल से ही स्थानीय लोग शैव धर्म का पालन करते आ रहे हैं।

पश्चिमी सिंहभूम के मझगांव ब्लाॅक में बेनी सागर या बेणु सागर नाम का ऐतिहासिक, धार्मिक एवं पुरातात्विक स्थल मौजूद है। आज यहां ‘हो’ नामक जनजातियों का बाहुल्य है। बेनी सागर जहां स्थित है, यहां से उड़ीसा का क्योंझर 12 किमी दूर है। यहां पर दस हजार साल पुराने अवशेष मिले हैं। प्राप्त अवशेषों से ज्ञात होता है कि बेनीसागर के आस-पास आदि मानव का निवास लगभग दस हजार पूर्व से था। अभी तक के उत्खनन में शिव मंदिर, पंचायतन मंदिर, 35 से अधिक शिवलिंग, सूर्य, भैरव, लकुलिस, अग्नि, कुबेर, गणेश, महिषासुरमर्दिनी एवं द्वारपाल की मूर्तियां प्रमुख हैं। इसके अलावा लोहे की चूडि़यां, अंगूठी, तीर, भाला, चाकू, मिट्टी के मनके आदि भी प्राप्त हुए हैं। पुराविदों का अनुमान है कि यह स्थान पांचवीं सदी ईसा से लेकर सोलहवीं-सत्राहवीं शताब्दी तक लगातार बसा रहा।

झारखंड के कुछ ऐसे प्राचीन मंदिर हैं जो अपनी कहानी खुद बयां करते हैं। झारखंड में मंदिरों के व्यवस्थित निर्माण का सिलसिला गुप्तवंश से हुआ माना जा सकता है, जो आगे निरंतर समृद्ध होता रहा। यही वह दौर था जब मंदिरांे के स्थापत्य पर विशेष ध्यान दिया जाने लगा। सुदूर जंगलांे के भीतर या दुर्गम पहाड़ों पर मंदिर या मूर्ति को देखकर मन आह्लादित हो जाता है। इनमें देवघर के बाबा बैजनाथ, रांची एवं सरायकेला जगन्नाथ मंदिर, गढ़वा का वंशीधर, गुमला का टांगीनाथ, रांची जिले की सोलहभुजी मां दुर्गा का देउड़ी मंदिर, महामाया, चतरा की मां भद्रकाली, पारसनाथ का जैन तीर्थ, पहाड़ी मंदिर, रामगढ़ का रजरप्पा व कैथा, दुमका का बासुकीनाथ व मालूटी आदि मंदिरों के नाम बहुचर्चित हैं। यहां हर साल हजारों श्रद्धालु और पर्यटक आते हैं। कुछ ऐसे भी मंदिर हैं, जो प्राचीन हैं, लेकिन हम उनके बारे में बहुत नहीं जानते।

रांची शहर के अंदर बोड़ेया ग्राम मोरहाबादी स्थित टैगोर हिल से लगभग तीन किलोमीटर उत्तर मदन मोहन मंदिर है, जिसका निर्माण नागवंशी शासक रघुनाथ शाह द्वारा 1665 में कराया गया था। इस पूरबमुखी मंदिर का सिंह द्वार उत्तर दिशा मंे है। उपलब्ध अभिलेख के अनुसार इसका निर्माण अनिरुद्ध शिल्पकार की देख-रेख मंे हुआ था। राधा-कृष्ण को समर्पित इस मंदिर में जो सबसे महत्वूर्ण बिंदु है, वह है इसके स्थापत्य में΄इस्लामिक स्थापत्य का प्रभाव। गर्भ-गृह एवं भोग मंडप के बीच के अंदरूनी ऊपरी हिस्से को देखने से मस्जिद स्थापत्य का प्रभाव स्पष्ट परिलक्षित होता है। इसी प्रकार रांची-कांके मार्ग पर रांची से 16 किलोमीटर उत्तर की ओर पिठोरिया का प्रस्तर मंदिर लगभग 150 साल पुराना कहा जाता है, किंतु स्थापत्य का यह आकर्षक नमूना है। लगभग 40 फीट ऊंचाई का यह प्रस्तर मंदिर एशलर मेसोनरी तकनीक से बना है। अर्थात् इसमें सूर्खी, चूना आदि निर्माण सामग्री का उपयोग नहीं΄ किया गया है। तैयार किए गए प्रस्तर खंडों को एक दूसरे पर सजाते-अड़ाते हुए इसका निर्माण किया गया है। इसका शिखर षष्टाकार है। इसके गर्भ गृह में शिव-पार्वती, राम-सीता-लक्ष्मण और हनुमान की मूर्तियां स्थापित हैं। शिवरात्रि के दिन यहां काफी चहल-पहल होती है।

पूर्वी सिंहभूम जिले में घाटशिला प्रखंड के अंतर्गत महुलिया ग्राम मे रंकिनी देवी का मंदिर भी महत्वपूर्ण है। पूर्व मंे΄ विशेषज्ञों ने इस देवी के संदर्भ में चर्चा करते हुए बताया कि चूंकि इस देवी का नाम प्राचीन धर्मग्रंथों में नहीं आया है, अतः संभवतः यह तत्कालीन स्थानीय शासकांे΄की कुल देवी रही होंगी। मंदिर मंे स्थापित देवी अष्टभुजी हंै, जिनके ऊपर के दो हाथों मंे΄हाथी, एक दाएं हाथ में डाकिनी एवं बाएं हाथ मंे΄जोगिनी तथा अन्य चार हाथों मंे΄ ढाल-तलवार आदि अस्त्रा-शस्त्रा है। रेखा देवल शैली में निर्मित इस मंदिर का निर्माण काल स्थापत्य शैली के आधार पर 14वीं-15वीं शताब्दी बताया जाता है।

हजारीबाग जिले में भी आकर्षक मंदिर समूह पाए गए हैं। कैथा मंदिर के भग्नावशेष रामगढ़-बोकारो मार्ग पर रामगढ़ से ठीक तीन किमी की दूरी पर मुख्य सड़क की बाईं ओर स्थित है, जिसके विषय में काफी कुछ लिखा जा चुका है, किंतु इस बात की जानकारी कम लोागों को होगी कि इसी शैली के 12-14 मंदिर रामगढ़ के आस-पास के क्षेत्रा मंे निर्मित थे, जिन्हें आज भी देखा जा सकता है। टाटी झरिया गांव में भी इसी शैली का मंदिर स्थित है। कहा जाता है कि इसे रामगढ़ के तत्कालीन मंत्राी, जो रीवा मध्यप्रदेश के निवासी थे, द्वारा बनवाया गया था। पं. सिंहभूम के चाइबासा के समीप ईचाक स्थित सप्तचूड़ा का राम मंदिर भी उच्च स्तरीय अलंकरणों से युक्त है। इसका शिखर रेखा देवल तथा अन्य भागांे के शीर्ष पीढ़ देवल शैली में निर्मित है। इस पंचायतन मंदिर का प्रस्तर अलंकरण देखकर इसके शिल्पकारों की सिद्धहस्तता का अनुमान लगाया जा सकता है। इसका निर्माण 1803 में स्थानीय शासक दामोदर सिंह देव ने कराया था।

इसी प्रकार गुमला जिला मुख्यालय से उत्तर-पश्चिम दिशा में डुमरी प्रखंड के मझगांव गांव में टांगीनाथ मंदिर के अवशेष स्थित हैं। यह स्थल पुरातात्विक दृष्टिकोण से राज्य के सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्थलों मंे΄से एक है। एक छोटी सी पहाड़ी पर ईंट निर्मित मूल मंदिर का अवशेष यहां आज भी देखा जा सकता है, जिसके इर्द-गिर्द सैकड़ों प्राचीन प्रस्तर मूर्तियां बिखरी पड़ी हैं, जिनमें विभिन्न प्रकार के शिवलिंग, उमा-महेश्वर, महिष-मर्दिनी, सूर्य, गणेश एवं विष्णु आदि की प्रमुखता है।

शिव को समर्पित इस मंदिर स्थल पर प्राचीन प्रस्तर स्तंभ आदि एकत्रित कर सजा कर रखे गए हैं, जहां एक विशाल लौह त्रिशूल भी भग्न अवस्था में है। इसकी तुलना कुतुब मीनार के लौह स्तंभ से की जाती है, जिस पर गुप्तकालीन अभिलेख अंकित हैं। यह मंदिर भी लगभग 8 से 10 सौ वर्ष पुराना कहा जाता है, किंतु इस स्थल की तिथि और पुरानी हो सकती है।

राज्य में किले भी कम नहीं। लेकिन देख-रेख के अभाव में वे दम तोड़ रहे हैं। तेलियागढ़ का किला हो या पलामू का या कंुदा का, सबकी स्थिति एक जैसी है। नवरतनगढ़ के किले को तो झारखंड का हंपी कहा जाता है, जो सौ एकड़ में फैला हुआ है। पलामू के कई प्रखंडों मंे छोटे-छोटे राजे-रजवाड़ों-जमींदारों ने किले बनवा रखे थे, जिनके भग्नावशेष मरम्मती की मांग कर रहे हैं। झारखंड में किला निर्माण का सिलसिला 15वीं शताब्दी से शुरू हुआ। मुगलकाल में यह परवान चढ़ा। इस दौर में कई मस्जिदें भी बनीं।

भगवान बुद्ध का झारखंड से सीधा संपर्क था या नहीं, कहना कठिन है। लेकिन अपने 45 वर्षों के परिभ्रमण काल में वह संभवतः झारखंड भी आए थे, जिस कारण इस क्षेत्रा में भी बौद्ध धर्म का खूब प्रचार-प्रसार हुआ। झारखंड में अनेक स्थानों पर बौद्ध धर्म से जुड़े अवशेष बिखरे पड़े हैं। पलामू में मूर्तियां एवं स्तूप हाल में मिले हैं। लातेहार जिले का बालूमाथ बौद्ध मठ का विकृत नाम ही लगता है। धनबाद क्षेत्रा मंे दालमी तथा बारहमसिया गांवों के बीच लाथोनटोंगरी पहाड़ी पर 20 वीं शती के कुछ बौद्ध अवशेश्ष थे। पुरुलिया के निकट कर्रा व घोलमारा में कुछ बौद्ध खंडहर हैं। रांची-मूरी मार्ग पर गौतमधारा है। यहां पर एक बुद्ध की प्रतिमा भी स्थापित है। चतरा जिले का ईटखोरी अब बौद्ध साइट बनने जा रहा है। वहां पर लंबे समय से खुदाई चल रही है। यहां तीन स्तूप मिले हैं। कई अवशेष भी। आने वाले समय में यह गया के बाद सबसे बड़ा बौद्ध कंेद्र बनने जा रहा है। राज्य सरकार भी इसके लिए प्रयास कर रही है। इसी तरह चतरा के कौलेश्वरी पहाड़ पर भी बौद्ध और जैन धर्म से जुड़ी प्रतिमाएं हैं। यह पहाड़ तीन धर्मों का संगम है। हिंदू, बौद्ध और जैन। पहाड़ पर ही दो हजार फीट की प्राकृतिक झील पर्यटकों को आकर्षित करती है। इस स्थल को दसवंे जैन तीर्थंकर शीतलनाथ का जन्मस्थल भी माना जाता है। इसका उल्लेख डिस्टिक गजेटियर आफ हजारीबाग 1957 में भी है। यहीं पर जिनसेन ने भी तपस्या की थी। जैन धर्मावलंबी कौलेश्वरी देवी के प्राचीन मंदिर को भी पूर्व मंे जैन मंदिर होने की बात करते हैं। लोक मानस में यह सुरक्षित है कि राम अपने वनवास काल में यहां पर अपने भ्राता एवं धर्मपत्नी सीता के साथ रहे। हालांकि इसका कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलता है। लेकिन यहां की प्राचीनता और बिखरे पत्थर यहां के पौराणिक इतिहास की गवाही तो देते ही हैं।

पारसनाथ हिल तो जैन धर्म का सबसे बड़ा तीर्थ स्थल है। श्री सम्मेद शिखरजी के रूप में चर्चित इस पुण्य क्षेत्रा में जैन धर्म के 24 में से 20 तीर्थकरों ने मोक्ष प्राप्त किया। यहीं 23 वें तीर्थकर भगवान पाश्र्वनाथ ने भी निर्वाण प्राप्त किया था। सम्मेद शिखर की उत्तरी तलहटी पर प्रकृति की गोद पर मंदिरों की नगरी मधुवन बसा हुआ है। यहां अनेक दर्शनीय स्थल हैं। यहां के घुमावदार रास्ते, पहाड़ों की सुंदरता आंखों को सुकून देती है। शिखर पर पहंुचकर सारी थकानें मिट जाती है। इनके अलावा भी मानभूम जैनियों का गढ़ रहा है। पाकबीरा, पवनपुर, पलमा, चर्रा तथा गोलमारा में उनके समृद्ध मंदिर थे, जिनमें अनेक मूर्तियां स्थापित थीं। बलरामपुर, करा, कतरास में जैनियों के खंडहर आज भी देखे जा सकते हैं। तेलकुप्पी में जैन संस्कृति का विशिष्ट केंद्र था। सिंहभूम के सरक जैन श्रावक ही थे। हो लोगों ने बाद में निकाल बाहर किया। पलामू पर इस धर्म का प्रभाव सबसे कम पड़ा।

राज्य की दूसरी राजधानी दुमका से पूरब 55 किमी दूर शिकारीपाड़ा प्रखंड में मंदिरों का गांव मालूटी है। इस गांव की जानकारी देश-दुनिया को 22-23 साल पहले हुई। गांव से बाहर इस मंदिर के बारे में लोग नहीं जानते थे। यहां पहले 108 शिव मंदिर थे, लेकिन अब 75 से 80 मंदिर ही शेा हैं। बंगाल की सीमा पर स्थित होने के कारण मंदिरों की शैली पर इसका प्रभाव स्पट देखा जा सकता है। यह तंत्रा साधना का बड़ा केंद्र था। 1979 में भागलपुर के तत्कालीन आयुक्त अरुण पाठक ने पहली बार इसे देखा था। तब इसके बाद यह गांव पुरातत्व के नक्शे पर आया। इस गांव को अमेरिकी संस्था के सहयोग से संवारा जा रहा है।

भारत के लोक देवता हनुमान की जन्मस्थली के बारे में देश नहीं जानता। जबकि हनुमान पूरे देश में पूजे जाते हैं। देश को यह पता चल जाए कि हनुमान झारखंड के गुमला जिले में जन्मे थे तो यहां श्रद्धालुओं का तांता लग जाए। हनुमान का जहां जन्म हुआ वह गुमला जिले से 18 कि.मी. दूर आंजन गांव में है। इस गांव का नाम हनुमान की मां अंजनी के नाम पड़ा है। यहां से चार किमी की दूरी पर अंजनी गुफा है जो बहुत आकर्षक है। कहा जाता है कि प्राचीन समय में इस गुफा में हनुमान की मां रहती थीं और यहीं पर उन्होंने हनुमान को जन्म दिया था। अंजनी गुफा के पास एक प्रतिमा भी है जिसमें अंजनी हनुमान को गोद में लिए हुए हैं।

प्राकृतिक सुंदरता के झारखंड में कदम-कदम पर दर्शन होते हैं। हर जिले में ऐसे जलप्रपात हैं, जो सैलानियों को आकर्षित करते हैं। यहां के पहाड़ों का सौंदर्य, गिरते झरनों का संगीत और जंगलों से आती पक्षियों की सुमधुर आवाजें एक नए और स्वर्गिक आलोक की रचना करती हैं। मसानजोर डैम की अथाह जलराशि एक छोटे समुद्र का एहसास कराती है। इसी तरह पंचैत डैम, कांके डैम, हटिया डैम, गेतलसूद डैम और रांची शहर के बीच विशाल तालाब का सौंदर्य तो चकित ही करता है।

बाघों के संरक्षण का काम देश में सबसे पहले झारखंड के पलामू में शुरू हुआ। पहली गणना भी यहीं हुई। आज वह बेतला टाइगर रिजर्व के नाम से जाना है। इसके अलावा भी एक दर्जन पशु-पक्षियों के अभयारण्य राज्य में हैं, जहां हम इन्हें नजदीक से निहार सकते हैं।

यह तो सिर्फ झारखंड का एक झरोखा भर है। यहां संस्कृति की इतनी विविधता और नृत्यों की इतनी शैलियां हैं कि यहां बार-बार आने का मन करता है। झारखंड का हर गांव अपनी एक विरासत के साथ खड़ा है। यहां कुछ भी फालतू नहीं। हो सकता है, आप जिस पहाड़ पर चल रहे हों वह हिमालय से भी पुराना है। यही तो है यहां की गाथा। फिर भी पहाड़, ये झरने आपको आमंत्रित करते हैं। आइए और देखिए। यह ऐसा प्रदेश है, जहां हर बार आने और फिर जाने के बाद लगेगा कि कुछ छूट रहा है। बाजार द्वारा बना दी गई छवि से एकदम उलट और विशिष्ट। क्या ऐसे रमणीय प्रदेश में आना नहीं चाहेंगे?

मनरेसा हाउस में फादर कामिल बुल्‍के

रांची की हृदय स्थली अल्बर्ट एक्का चौक से दस कदम की दूरी पर सर्जना चौक है। इस चौक से, जाहिर है, नाम के अनुरूप कई राहें फूटती हैं और एक राह पुरुलिया की ओर निकल पड़ता है। पुरुलिया पं बंगाल में पड़ता है। सर्जना चौक के पास से कभी पुरुलिया के लिए बसें खुलती थीं। इसलिए, यह रोड पुरुलिया रोड के नाम से मशहूर हो गया। इसी रोड पर मनरेसा हाउस है, जहां तीन कमरों में फादर कामिल बुल्के की दुनिया आबाद थी। पहले छप्पर के थे बाद में पक्के का बन गया। सर्जना चौक से जो राह पुरुलिया की ओर फूटती है, ठीक उसी नाके पर प्राचीन श्रीराम का मंदिर है और दस कदम की   दूरी पर रामकथा के अनन्य गायक फादर रहा करते थे। बीच में जेवियर्स कालेज। यहीं पर वे हिंदी-संस्कृत के विभागाध्यक्ष रहे। पता नहीं, रामकथा पर लिखते हुए वे इस प्राचीन श्रीराम मंदिर में कभी गए थे या नहीं, पर सर्जना चौक से जो राह फूटी वह सिर्फ पुरुलिया तक नहीं गई, देश-देशांतर तक गई। अब यह राह फादर के नाम से जानी जाती है।

मनरेसा हाउस में प्रवेश करते ही अब सबसे पहले फादर की झक-झक सफेद आदमकद संगमरमर की मूर्ति से सामना होता है। थोड़ा आगे बढ़ें तो उनके नाम का पुस्तकालय, शोध संस्थान जिसमें उनकी किताबें, पत्रिकाएं, शोध ग्रंथ आदि हैं, जिनका लाभ छात्र, अध्यापक और शोधार्थी उठाते हैं। जो किताबें रांची विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में नहीं, वह यहां मिल जाती है। इतना संपन्न है फादर का पुस्तकालय। फादर का पुस्तकालय इतना संपन्न कैसे हुआ, इसका खुलासा वरिष्ठ साहित्यकार डा. श्रवणकुमार गोस्वामी करते हंै...संत जेवियर्स कालेज में पढ़ाने का काम छोड़ दिया था और पढऩे-लिखने में अपना समय लगा दिए। विद्यार्थी-शोधार्थी उनसे मिलने आते। कहते, फादर यह किताब नहीं मिल रही है? फादर, उस किताब को नोट करते, फिर मंगवाते और दे देते। देने के बाद उसे नोट कर लेते? इसका कोई हिसाब नहीं रखते। काम होने पर कुछ वापस कर देते, कुछ नहीं। इस तरह फादर के निजी पुस्तकालय में पुस्तकें बढ़ती गईं। संस्कृत और हिंदी के ग्रंथों का तो पूछना ही नहीं। कहते हैं, वह हर आने वाले की सहायता करते।

फादर को सुनने में दिक्कत होती थी। इसलिए वह एडी लगाते थे। कभी-कभी कोई बकवास करता तो एडी बंद कर देते। कहते, भगवान ने मुझे बहरा बनाकर बड़ी कृपा की है। बेकार की बातों को सुनने से बच जाता हूं। फादर को एक और दिक्कत थी। वह दमे के मरीज थे। इसलिए वे इनहेलर का इस्तेमाल करते। मशहूर कथाकार राधाकृष्ण भी दमे के मरीज थे। फादर बाहर से कई इनहेलर मंगाते। विदेश से आने वाले भी ले आते और उसमें से वे एक राधाकृष्ण को भी दे देते। दरअसल, दोनों रांची की पहचान थे। बाहर से कोई साहित्यकार आता तो बस ये दो नाम ही याद आते। बिना मिले कोई जाता नहीं।

हिंदी के प्रति लगाव, समर्पण और श्रद्धा के बारे में तो कहना ही नहीं। एक बार एक युवक अपने चाचा के साथ उनसे मिलने आया। सुबह का वक्त। दोनों ने कहा, गुड मार्निंग फादर। कुछ देर तक देखते रहे। युवक ने अपने चाचा की ओर इशारा करते हुए कहा, मेरे अंकल हैं। फादर की भवें खींच गईं-अंकल मतलब? पूछा : अंकल मतलब क्या होता है? अंकल मतलब अंकल? चाचा, ताऊ, मामा...क्या? अंगरेजी में तो इनके लिए बस एक ही शब्द है। पर हिंदी में अनगिनत और इससे रिश्ते भी पहचाने जा सकते हैं। जब हिंदी इतनी समृद्ध-संपन्न है तो फिर अंगरेजी बोलते शर्म नहीं आती? यह फादर की घुड़की होती।

फादर के पुस्तकालय को व्यवस्थित करने वाले और अब संस्थान के निदेशक डा. फादर इम्मानुएल बखला कहते हैं कि जब फादर का निधन हुआ तो यहां किताबों के ढेर लगे थे। जगह-जगह। उनको तरतीब करने में छह महीने लग गए। पहले तो यह हुआ इतनी किताबों का क्या जाए? यहां के किसी पुस्तकालय ने लेने से इनकार कर दिया तो फिर तय हुआ कि जिन कमरों में वह रहते थे, उन्हें ही शोध संस्थान का रूप दे दिया जाए। इस काम में आस्ट्रेलिया के फादर विलियम ड्वायर, जिन्होंने हिंदी में भी पीएच डी की थी, बहुत मदद की। फादर अगस्त, 1982 में चल बसे और 1983 में यह शोध संस्थान अस्तित्व में आया। बखला कहते हैं, जब संत जेवियर्स कालेज से 1967-70 के दौरान बीए कर रहा था, तब फादर यहां विभागाध्यक्ष थे, लेकिन वह पढ़ाते नहीं थे। वह अपने घर पर ही रहकर अनुवाद-कोश आदि का काम रहे थे। बाइबिल का अनुवाद और कोश का काम कर रहे थे। कोश के निर्माण में ऐसे लगे थे कि एक शब्द पर कभी-कभी दिन भर लगा देते। दर्जी के बारे में जानकारी लेनी है तो वह उनके घर चले जाते और तत्संबंधी शब्दों की जानकारी लेते। उसके सही उच्चारण और शब्द की तलाश करते। फादर बखला उनके समय की पाबंदी पर भी जोर देते हैं। कहते हैं, उनका समय निर्धारित था। कितने बजे सुबह का नाश्ता, कितने बजे दोपहर का भोजन करना है और संध्या का नाश्ता सब तय। समय की पाबंदी के साथ वे घनघोर आस्थावान भी थे। फादर लोगों को दिन में छह बार प्रार्थनाएं करनी होती। यह काम भी वे नियमित करते। एक उनकी हॉवी थी क्रास वल्र्ड पजल्ड सुलझाने की। चाय पीने के समय वह यह काम किया करते। खुद को ताजा और दिमाग को फ्रेश रखने के लिए वह यह नियमित करते।
डा. दिनेश्वर प्रसाद अब नहीं हैं। प्रसाद भी उनके अनन्य सहयोगी रहे। उनके निधन के बाद फादर की कई अधूरे कामों को पूरा किया। कोश में कई शब्द जोड़े। उनके लेखों को प्रकाशित कराया। एक किताब अंगरेजी में संपादित की। उनके पास मेरी बैठकी अक्सर होती। यादों का अनमोल पिटारा था उनके पास। एक बार फादर के बारे में दिनेश्वर बाबू बताने लगे...दोपहर के कुछ देर बाद दो-ढाई बजे के आस-पास उनके परिचित-अपरिचित उनसे मिलने आते थे और फादर बड़ी-बड़ी प्लेटों में मक्खन और पाव रोटी फिर काफी के प्याले उनके जलपान के लिए लाते थे। फादर अक्सर काफी खुद बनाते थे। काफी की मात्रा एक व्यक्ति की काफी पूरे बॉल में उसे दी जाती थी और वह बहुत रुचिपूर्वक उनके साथ बातचीत करते हुए उसका आनंद उठाता था। फादर से बातचीत करने के अनेक विषय होते थे। समान्यत: पारिवारिक, वैदुषिक और सामाजिक। लेकिन किसी-किसी दिन जब अतिथि शीघ्र चले जाते और सांझ होने लगती तो फादर संस्मरणशील हो जाते। उन्हें अपना अतीत याद होने लगता और वे कभी बचपन के दिनों की घटनाएं, माता की परोपकारिता, पिता का चारित्रिक दृढ़ता, मित्र बंधुओं के साथ उल्लासपूर्ण बातचीत आदि के प्रसंग सुनाते। एक-दो अवसर ऐसे भी आए जब वह मां के स्नेह के प्रसंग सुनाते-सुनाते रोने लगते थे।Ó

फादर की एक आदत थी कि वे संझा साइकिल से निकल पड़ते। शुक्रवार को उन्होंने अपने लिए अवकाश घोषित कर रखा था। पर, साइकिल की सवारी वह नियमित करते। कभी दोस्तों के यहां तो कभी सुदूर जंगलों में निकल पड़ते। तीस-चालीस किमी की यात्रा कर अंधेरा होते-होते मनरेसा हाउस लौट जाते।
फादर ने लुवेन विश्वविद्यालय से 1930 ई में अभियांत्रिकी स्नातक विज्ञान की उपाधि प्राप्त की थी। संयोग ऐसा कि वे भारत चले गए और फिर भारत को वे अपना दूसरा घर कहने लगे। उन्होंने मुक्तकंठ स्वीकार किया कि ऋषि-मुनियों संतों की पावन भूमि भारत में खींच लाने का संपूर्ण श्रेय गोस्वामी तुलसीदास जी को है। रामचरितमानस के रचयिता का गुणगान वे आजीवन करते रहे। उन्होंने कभी कहा था कि मरणोपरांत यदि कहीं यह अवसर आए कि मिलना राम अथवा तुलसी से तो मैं राम से नहीं तुलसी से मिलना चाहूंगा। उनके हृदय में बाबा तुलसी ने जगह बना ली थी। जीवन की संध्या में तुलसी संबंधी चिंतन को पूरे विस्तार से शब्दबद्ध करना चाहते थे, लेकिन काल को कुछ और ही मंजूर था। उन्हें गैंग्रीन हो गया था। उनका इलाज पहले रांची के मांडर, फिर पटना किया गया, परंतु हालत में कोई सुधार नहीं देख पटना से फिर दिल्ली ले जाया गया, लेकिन वहां भी कोई सुधार नहीं हुआ और 17 अगस्त, 1982 को एम्स में अंतिम सांसें ली। दिल्ली में ही उन्हें दफना दिया। उनके अधूरे कामों को डा. दिनेश्वर प्रसाद ने कुछ पूरा किया। अब दिनेश्वर बाबू भी चले गए। मनरेसा हाउस में शोध संस्थान के जरिए फादर कामिल बुल्के जीवित हैं। हां, उनकी कुर्सी निस्पंद पड़ी है। शायद, अपनी साइकिल से कहीं निकले हों...।

रांची में मजाज के चंद महीने

1936 में प्रगतिशील लेखक संघ के गठन के तीन साल बाद 18 वर्षीय एक नौजवान ने अपना तआरुफ कुछ इस तरह कराया- खूब पहचान लो असरार हूं मैं, जिन्स-ए-उल्फत का तलबगार हूं मैं।
फित्न-ए-अक्ल से बेजार यह असरार जब मजाज बना तो उसकी राह स्पष्ट हो चुकी थी। दुर्भाग्य यह कि हमारे देश के नक्काद (आलोचक) उन्हें कभी इंकलाब के सांचे में फिट करते तो कभी उर्दू का कीट्स करार दे अपनी ऊर्जा जाया करते रहे। मजाज को मजाज की नजर से देखने की कोशिश नहीं की गई। देखा जाए तो मजाज की जिंदगी में सुर्ख रंग ही छाया रहा। इश्क, इंकलाब या शराब, सभी रूपों में। एक नजरिए से देखें तो इसी सुर्ख रंग ने उनकी जिंदगी गर्क कर दी जबकि दूसरे से इसी ने मजाज को मजाज बनाया। शायद, बड़ा व्यक्तित्व विरोधाभासों से ही बनता है।

मजाज की जिंदगी ने बड़े-बड़े उतार -चढ़ाव देखे। उनका समय भी कुछ ऐसा ही था। उनकी नज्में इस बात की तसदीक करती हैं। जुनूने इश्क और शराबनोशी ने उन्हें पागलखाने तक का सफर कराया। मजाज जब रांची के पागलखाने (अब उसका नाम केंद्रीय मनोचिकित्सा संस्थान है) में भरती थे तो सलाम मछलीशहर ने एक पुरदर्द नज्म कही थी, जिसके कुछ मिसरे यूं हैं- ...जैसे रांची की पहाड़ी से ये आती हो सदा... अब भी कुछ हेाश है बा$की तेरे दीवाने में, तेरा दीवाना गमे दह्र पे छा जाएगा...।

कहने की जरूरत नहीं कि आज मजाज दह्र पे छा गए हैं। लेकिन, हिंदी हो या उर्दू अदब, मजाज का मूल्यांकन आज भी बाकी है। एक तरक्कीपसंद शायर, जिसने कभी नरगिस को देखकर कहा था- तेरे माथे पे यह आंचल बहुत ही ख़ूब है... लेकिन, तू इस आंचल से इक परचम बना लेती तो अच्छा था...।
महान शायरों की रचनाओं की तो चर्चा खूब होती है, लेकिन वह किन- किन हालात से गुजरा, इस पर कितने लोगों का ध्यान जा पाता है। कम ही लोग जानते हैं कि इस महान शायर को तीन-तीन बार नर्वस ब्रेकडाउन का शिकार होना पड़ा। मजाज पर बीमारी के बार-बार हमले से परिवार को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता। बेटे के हाल पर मां को रोना आता। वह खुदा से कहने लगतीं- या इलाही, या तो मुझे उठा ले या मेरे बेटे को। मां के सीने में उभरता दर्द, पिता की बेबसी और बहनों की लाचारी... बहुत कुछ कह जाती है। इसकी जानकारी उनसे संबंधित पत्रों और संस्मरणों से होती है। मजाज की बहन सफिया अख्तर के पत्रों से ऐसी जानकारी हासिल होती है। उनकी बीमारी को लेकर परिवार कितना परेशान था और उर्दू वाले इसे भी भुनाना चाहते थे।
सफिया की कैफियत यह है कि वह आज के मशहूर गीतकार जावेद अख्तर की मां थीं। उनके पति का नाम जांनिसार अख्तर था, जो खुद भी एक बड़े शायर थे और मजाज के दोस्तों में शुमार थे। सफिया के पत्रों का संग्रह पाकिस्तान से प्रकाशित है। नाम है 'सफिया के खुतूत जांनिसार अख्तर के नामÓ। प्रकाशक है तरतीब पब्लिशर्स, मियां मार्केट, गजनी स्ट्रीट, उर्दू बाजार, लाहौर। मंसूर अहमद भट्ट और ताहिर एस मलिक ने इसका संपादन किया है। पत्र तो काफी हैं, लेकिन दो पत्र मजाज से संबंधित और खास हैं। ये पत्र मजाज की दिमागी हालत, उर्दू अदब की बेगैरत दुनिया से बावस्ता कराते हैं।
पहले पत्र 12 मई, 1952 को जां निसार अख्तर को लिखा गया पत्र है। मजमून देखें-
अच्छे अख्तर,
बहुत सा प्यार
खत मिला। चलो, एक खत तो मेरा तुम तक मेरा पहुंच गया। गनीमत है। इस डाक के इंतजाम को अल्लाह समझे।
यहां इस तरफ तकरीबन हर रोज शाहिद परवेजी, यूसुफ इमाम, सुहैल अजीमाबादी की तहरीरें आती रहीं। इसरार भाई (मजाज) की दिमागी हालत का ये आलम हो गया था कि कलकत्ता (अब कोलकाता) की सड़कों पर भीख मांगने की नौबत थी। अंसार भाई यूसुफ इमाम को हमराह लेकर कल रांची पहुंचे हैं और कल रात ही दाखिला की इत्तिला का तार आया है। उनकी दिमागी हालत को देखते हुए हवाई जहाज से ये सफर मुकम्मल करना पड़ा। पूरा एक हजार इस सई व काविश की नजर उबाला हो चुका है। इस जईफी के आलम में जिस इस्तकलाल से वो इन तमाम परेशानियों को बर्दाश्त कर रहे हैं। इससे मेरे जेहन पर उनकी अज्मत का नक्श बहुत गहरा होता जा रहा है। तुम लिखना कि सुहैल से तुम्हारी कैसी वाकफियत है और ये किस तरह के आदमी हैं। अब इसरार भाई की देखभाल का जरिया उन्हीं को बनाया जा सकता है।
आज ही जोश साहेब (जोश मलीहाबादी)का खत फिर मिला अम्मा के नाम, इसी सिलसिले में आया है। उन्हें भी जवाब लिखना है।
पत्र में अब घरेलू बातों की चर्चा है और अंत में लिखा है-
अच्छा अख्तर मुझे और अपनी अजीज अमानतों को अपने प्यार से जिंदा कर जाओ।
तुम्हारी
सफ्फो

अब दूसरा पत्र भी देखें-
तारीख है 3 नवंबर 1952
...प्रकाश (प्रकाश पंडित)का खत आया है। उसने लिखा है कि 'मजाज फंडÓ की अपील शाया करने की इजाजत उसने तुमसे कलकत्ता में ले ली थी। दिलचस्प बात है मैंने खत लिखवा दिया है कि मुझे अख्तर की गय्यूर तबीयत पर इस दर्जा एतमाद है कि यकीन नहीं आता कि उन्होंने मजाज के जुनून और बेजरी का ढिंढोरा रिसाले के जरिए पीटकर पढऩे वालों से दो-दो चार-चार रुपयों का चंदा वसूल करने का मशविरा दिया हो।
अख्तर, तुम जानते हो इसरार भाई अस्पताल से डिस्चार्ज होने वाले हैं। अब इस एक महीने के लिए दूसरों के आगे हाथ फैलाने से क्या हासिल?
शाहरार (पत्रिका)वाले अपने सर सेहरा बांधना चाहते हैं, लेकिन मजाज फंड का हश्र तो सुनो कि मजाज के नाम पर यहां पिछले महीने सिर्फ 17.25 पैसे जमा हो सके। इससे उर्दू वालों की अदब दोस्ती का भी अंदाजा कर लो।
बहुत सा प्यार
तुम्हारी सफिया

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पत्र से उर्दू वालों की दरियादिली की भी जानकारी मिलती है कि कितने दरियादिल थे मजाज को लेकर। पत्र में कई शायरों का जिक्र है। सुहैल अजीमाबादी, प्रकाश पंडित, जोश मलीहाबादी आदि। प्रकाश पंडित और जोश किसी परिचय के मोहताज नहीं है। दोनों उनके मित्र थे। सुहैल भी नहीं। सुहैल तब रांची में रहते थे और उर्दू के प्रचार-प्रसार के लिए काफी सक्रिय थे। रांची में मजाज की देखभाल सुहैल और अपने जमाने के मशहूर कथाकार राधाकृष्ण करते थे। राधाकृष्ण के पुत्र सुधीर लाल बताते हैं कि दोनों रिक्शे से पागलखाना जाते और उनका हालचाल लेते रहते।

रांची में भर्ती के वाकये का जिक्र उनकी छोटी बहन हलीमा भी करती हैं। लिखती हैं, 'दिल्ली से 'जोशÓ साहब का खत आया कि मजाज को आगरा भेज दिया जाए। मजाज और आगरा का पागलखाना? दिल पर कैसी चोट लगी। लेकिन मजाज पागल था। इस हकीकत से क्योंकर इनकार हो सकता था। पागल को आखिर कहां तक और कैसे भुगता जाता। जोश साहब को मैंने पत्र लिखा कि अपनी पहुंच का इस्तेमाल कर रांची में जगह दिलवा दें। जोश साहब को खत मिला या नहीं, मैं जवाब के इंतजार ही में रही। डाक्टर दिवेश, रांची हस्पताल के इंचार्ज से सीधे पत्रों से संबंध साधा और जगन भय्या (मजाज को वे जग्गन ही बुलातीं) की लाइफ हिस्ट्री लिखकर भेजी। शायद उनके जीवन की घटनाओं से असर लेकर उसने बी क्लास वार्ड में एक बेड दे ही दिया।...मजाज को मुश्किल से रांची भेजा गया। पिता ने अपनी पूंजी की आखिरी कौड़ी उन्हें बचाने में लगा दी। और छह महीने बाद वह बचकर आ गए।Ó
हालांकि मजाज की वापसी के एक महीने बाद ही सफिया अख्तर का निधन हो गया। इस सदमे का असर उन पर बिजली गिरने जैसा हुआ।

रांची में जब भर्ती हुए तब उन्हें तीसरा और अंतिम नरवस ब्रेक डाउन का हमला हुआ था। पहला, 1940 में हुआ। दिल्ली के कयाम के दौरान उनके दिल पर जो चोट लगी उसी का नतीजा था। मुहब्बत में नाकामी आदमी को आदमी नहीं रहने देती। इलाज ह़ुआ। चार-छह महीने के लिए बड़ी बहन के साथ नैनीताल चले गए और वहां से तंदुरुस्त होकर आ गए। जिंदगी आहिस्ता-आहिस्ता पटरी पर आने लगी। पर होनी को कुछ और ही मंजूर था। मजाज के पैरों में शादी की बेडिय़ा डालने की कोशिशें शुरू हुईं। शायद, जीवन के पतझड़ में बसंत के फूल खिल सके। बात आगे बढ़ी। पर, लड़की के प्रिंसिपल पिता को यह गवारा न हुआ कि मजाज डेढ़ सौ रुपये महीना कमाते हैं। रिश्ता बनने से पहले टूट गया। इसका असर यह हुआ कि मजाज को दूसरी बार 1945 में दीवानगी का हमला हुआ। डाक्टरों की कोशिश और जीतोड़ तीमारदारी और दिलजोई से किसी तरह काबू में आ गए। लेकिन जिंदगी का ढर्रा बदल न सका। तीसरी बार हमला 1952 में हुआ। इस बार उन्हें रांची में भर्ती कराया गया। यहां से भी ठीक-ठाक होकर वापस चले गए। पैरों में बेड़ी डालने की कोशिशें फिर की गईं, लेकिन नाकाम रहीं। इश्क की नाकामी, तन्हाई शराबनोशी की ओर ले गई। दोस्तों ने भी आग में घी डालने का काम किया। और एक दिन, उन्हें जाड़े की ठिठुरती रात में पीने-पिलाने के बाद उनके दोस्तों ने सड़क पर छोड़ दिया। दिमाग की नसें फट गईं। किसी राहगीर की नजर पड़ी। उन्हें सीधे बलरामपुर अस्पताल पहुंचाया गया। तब तक बहुत देर हो चुकी थी। 5 दिसंबर, 1955 का वह मनहूस दिन इस महान शायर की जिंदगी का आखिरी दिन साबित हुआ, जिसने कभी लिखा था- खूब पहचान लो असरार हूं मैं/ हुस्ने उलफत का तलबगार हूं मैं।
....न तूफान रोक सकते हैं, न आंधी रोक सकती है/ वह मुझको चाहती है और मुझ तक वह आ नहीं सकती/ मैं उसको पूजता हूं और उसको पा नहीं सकता...। तड़प, चाहत, बेचैनी, तन्हाई, आवारगी से बेजार आखिरकार 44 की उम्र में मजाज बज्मे-नाज से चला ही गया।