आंजन गांव के रहस्य से पर्दा उठाता है 'द इटर्नल मिस्ट्रीÓ


संतोष किड़ो पेशे से पत्रकार रहे हैं और अब सेंट जेवियर्स कालेज में पत्रकारिता पढ़ाते हैं। पेश के दौरान भी वे खालिस पत्रकार नहीं रहे। उनमें एक रचनाकार भी था। एक कथाकार भी। अभी उनका पहला उपन्यास 'द इटर्नल मिस्ट्रीÓ छपकर आया है
दर असल, यह उपन्यास उनके दिमाग में लंबे समय से पक रहा था। गाहे-बेगाहे जब मिलते तो इसका जिक्र जरूर करते। इस उपन्यास के लिए उन्होंने काफी मेहनत की। शोध किया और आंजन गांव में हफ्तों रहे। उस मिथ और उस कथा सूत्र को पकडऩे की कोशिश की, जो हजारों सालों से कही जा रही थी। 
आंजन, आप सब जानते हैं, यह गुमला जिले में पड़ता है और यह हनुमान की जन्मस्थली मानी जाती है। यहां जो प्राचीन प्रतिमा है, वह देश के दूसरे हिस्सों में नहीं मिलती है। यहां वह अपनी मां अंजनी की गोंद में विराजमान है। भारत के गांव-गांव में स्थापित उनकी प्रतिमा से सब परिचित हैं, लेकिन यह प्रतिमा भी दुर्लभ मानी जाती है। देश का बड़ा हिस्सा नहीं जानता कि हनुमान की जन्मस्थली झारखंड में है। इस उपन्यास से लोग इस गांव के बारे में भी जानेंगे।   यह उपन्यास इस अर्थ में अलग है कि यह मिथ से विज्ञान और विज्ञान से मिथ की यात्रा करता है और इस यात्रा के दौरान कई रहस्यात्मक चीजों से साबका पड़ता है। मुंबई से एक वैज्ञानिक कुछ शोध करने के लिए सिलसिले में आंजन गांव आता है और इस दौरान उसे कुछ अजीब-अजीब एहसास होते हैं। शोध का काम पूरा करने के बाद वह रिपोर्ट भेज देता है और उसकी यात्रा शुरू होती है। उसे एहसास होता है, जीवन के बारे में, मृत्यु के बारे में और उस नदी के बारे में, जो कल-कल बहती है। जीवन और रहस्य भी इन तीनों के इर्द-गिर्द घूमता है। अंजनी सुत के साथ शिवलिंग के मिथ से भी पर्दा उठता है। एक अलग दुनिया खुलती है, जो अब तक अनजान रही। इस बीच कथा पहाड़ी नदी के प्रवाह की तरह आगे बढ़ती है। उबड़-खाबड़ और हजारों-लाखों साल पुराने पठारों-पहाड़ों से टकराती हुई। इस उपन्यास की खासियत यह है कि इसमें मिथ भी है, इतिहास भी, पुरातत्व और लोक का संसार भी। इसलिए यह उपन्यास जितना कल्पना है, उससे कहीं ज्यादा हकीकत। एक आदिवासी परिप्रेक्ष्य में भी आंजन गांव को देखने की कोशिश की गई है। दूसरे शब्दों में इसे रामकथा से भी जोड़ सकते हैं। संतोष ने अपने इस पहले उपन्यास से प्रकाशन जगत में भी कदम बढ़ा दिया है। प्रकाशन का नाम 'चेरो एंड साल बुक्सÓ है। आइआइएम रांची से निकले देवाशीष मिश्र के साथ इसकी स्थापना पिछले साल की थी। इस प्रकाशन की यह पहली पुस्तक है।     

अकबर के काल में शुरू हुआ था पोइला बोइशाख

डा. रामरंजन सेन, ङ्क्षहदी-बांग्ला साहित्यकार।
आज पोइला बोइशाख 1423 बंगाब्द है। बंग समुदाय का नव वर्ष। आज ही के दिन समाज के सभी लोग उल्लास के साथ वर्ष वरण अर्थात नए साल का हार्दिक स्वागत करते हैं। विगत वर्ष में हमारा जो संकल्प साकार नहीं हुआ, उसे हम नए उमंग के साथ इस नए साल में पूरा करने एवं अपनी संस्कृति की रक्षा करने का संकल्प लेते हैं-नव वत्सरे करिलाम पण, लव स्वदेशेर दीक्षा। नव वर्ष का स्वागत करने के लिए कवि गुरु की भाषा में हम कहते हैं-पुरातन वस्तरेर जीर्ण क्लांत रात्रि, घुचे जाक ओरे यात्री।
एक समय था जब यह उत्सव व्यवसायी तथा परिवार तक ही सीमित था, लेकिन आज वर्षवरण उत्सव सामाजिक तथा सांस्कृतिक उत्सव बन गया है। यह बंगाब्द तथा नव वर्ष की सूचना कब और कैसे हुई-इसकी चर्चा होनी चाहिए। इस संदर्भ में विद्वानों में मतभेद तो है ही, लेकिन अधिकतर विद्वानों का कहना है कि 593 ईस्वी में 12 अप्रैल यानी पोएला बैशाख, बैसाख का पहला दिन, सोमवार, शैव धर्मावलंबी राजा शशांक ने गौड़ (वर्तमान में बंगाल)देश के सिंहासन पर आरोहण किया। उसी दिन से उन्होंने बंगला नव वर्ष अर्थात बंगाब्द प्रारंभ किया। उस समय से गणना की जाए तो 2016-593 यानी 1423। तो आज 1423 बंगाब्द है। इसके बाद बंगला नव वर्ष बादशाह अकबर के समय से प्रारंभ हुआ। अबुल फजल की आइने अकबरी से ज्ञात होता है कि अकबर के निर्देश से राजस्वमंत्री टोडरमल ने चैती फसल के बाद बंगाल में नई कर व्यवस्था बैशाख की पहली तारीख से शुरू की। उसी समय से नया हिसाब-किताब बैशाख से शुरू करने का नियम चल पड़ा। तब से व्यापारी लोगों ने इसी दिन से हाल खाता प्रारंभ किया। तब नए कपड़े पहनना, मंदिर या दुकान में हाल खाता की पूजा करना तथा घरों में स्वादिष्ट भोजन में ही नव वर्ष सीमित था, लेकिन 19वीं सदी के द्वितीयार्ध से यह सामाजिक एवं सांस्कृतिक रूप धारण कर लिया। हाल खाता का सिलसिला भले बंद हो गया हो, लेकिन नव वर्ष से जुड़ा उल्लास आज भी बरकरार है। अंधानुकरण के इस दौर में भी हमारी नई पीढ़ी भटक न जाए, इसलिए उन्हें भी इस उत्सव के साथ जुडऩे तथा अच्छा संस्कार देने के लिए हमें सचेष्ट होना चाहिए।
कवि गुरु रवींद्रनाथ ठाकुर ने ठीक कहा कि जिस तरह काल बैशाखी की आंधी पुराने सूखे पत्ते को उड़ा कर ले जाती है, उसी तरह हमारे जीवन में से पुराने वर्ष की सभी ग्लानि दूर हो जाती है। अत: मुद्दे जाक ग्लानि, घुचे जाक जरा, अग्नि स्नाने शुचि होक धरा।

पहला जुलूस महावीर चौक से सदर अस्पताल तक गया था

अशोक पागल, रंगकर्मी-लेखक।

चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि। उत्तम पुरुष श्री राम का जन्म। यानी रामनवमी। एक व्रत, एक त्योहार, एक उत्सव का दिन।
रामनवमी का पर्व पूरे छोटानागपुर में अपना एक विशेष महत्व रखता है। होली के बीतते ही रामनवमी की धूम शुरू हो जाती है। होली के बाद पडऩे वाले पहले मंगलवार को ही विभिन्न अखाड़ों में महावीरी पताका फहरने लगते हैं। जगह-जगह अस्त्र-शस्त्र संचालन का कौशल प्रदर्शन शुरू हो जाता है। मंगलवारी जुलूस अपर बाजार, महावीर चौक स्थित हनुमान मंदिर तक आता है। यहां हनुमानजी को भोग लगाया जाता है। उत्साही भक्त माथा टेकते हैं।
रामनवमी के एक दिन पहले अष्टमी को पौराणिक कथा पर आधारित आकर्षक झांकियों की प्रतियोगिता होती है। झांकी प्रतियोगिता का आयोजन श्री रामनवमी शृंगार समिति करती है। अनुष्ठान देर रात तक चलता है। इस दिन अखाड़ों, झंडाधारियों के अतिरिक्त दर्शकों की भीड़ उमड़ती है। आयोजन स्थल महावीर चौक होता है। अब डोरंडा, चर्च रोड आदि क्षेत्रों में भी झांकी प्रतियोगिता होने लगी हैं।
रामनवमी की मुख्य शोभायात्रा की विशालता का कहना ही क्या? लाखों लोग इस दिन सड़क पर उतरते हैं। चारों तरफ जयश्री राम का उद्घोष। हाथ में महावीरी पताका। घरों पर महावीरी पताका। इसके आरंभ की भी अनोखी कहानी है।
सन् 1928 में जमादार मौलवी के घर मुस्लिम लीग का गठन हुआ। इसी की प्रतिक्रिया में अपर बाजार, महावीर चौक के नेमन साहु के घर पर ङ्क्षहदू महासभा का गठन किया गया। महंत ज्ञान प्रकाश नागा बाबा इसके प्रथम अध्यक्ष हुए। मुहर्रम के समानांतर रामनवमी के अवसर पर शोभायात्रा निकालने की योजना सबसे पहले यहीं बनी। इस योजना में नेमन साहु, जगन्नाथ साहु, रामचंद्र साहु, कृष्ण लाल साहु, गंगाधर वर्मा, राम बड़ाइक आदि प्रमुख थे। 1929 में पहली बार राम नवमी की शोभायात्रा निकली थी। इस अवसर पर एकमात्र महावीरी झंडा निकला था और वह एकमात्र झंडा जगन्नाथ साहु का था। झंडा ढोने वाले थे अनिरुद्ध राम। साथ में नौवा टोली के 15-20 उत्साही नौजवान लाठी-भाला लेकर जै-जै करते चल रहे थे।
राम नवमी का यह पहला जुलूस अपर बाजार, महावीर चौक से निकल कर सदर अस्पताल गेट तक गया था। तब सदर अस्पताल का गेट मेन रोड पर, अल्बर्ट एक्का चौक से थोड़ा आगे था। जुलूस में दो हाथ रिक्शे भी शामिल थे, जिनमें से एक पर नंदकेश्वर पाठक व बुधना बतौर गायक बैठे थे। दूसरे रिक्शे पर खोखा और सूरज गोप ढोलक पर ठेका देते चल रहे थे।
सन् 1929 के बाद 1930 में भी रामनवमी शोभायात्रा का यही मोटा-मोटी स्वरूप था। इस बार भी इसका गंतव्य सदर अस्पताल गेट ही था। सन 1931 में जुलूस में दो झंडे शामिल हुए। इनमें से एक झंडा नेमन साहू का था व दूसरा कांग्रेसी झंडे की तरह तिरंगा था, जिसकी एक ओर चरखा व दूसरी ओर हनुमानजी की आकृति बनी हुई थी। यह झंडा किसका था, ज्ञात नहीं। इस वर्ष रामनवमी जुलूस चर्चा रोड स्थित महावीर मंदिर तक गया। सदर अस्पताल के गेट से आगे बढ़ाकर जुलूस चर्च रोड स्थित महावीर मंदिर तक गया था। सदर अस्पताल के गेट से आगे बढ़ाकर जुलूस को चर्च रोड, महावीर मंदिर तक ले ताने का श्रेय गुलाब नारायण तिवारी को जाता है। इस समय तक रामनवमी महोत्सव शोभायात्रा में गंगाधर वर्मा, जैन मुंशी, नान्हू गोप, शिवदीप सहाय, हंसेश्वर दयाल, गंगा प्रसाद बुधिया, राधाकृष्ण बुधिया आदि लोगों की भूमिकाएं उल्लेखनीय हो गईं।
सन 1935 में रामनवमी व मुहर्रम एक दिन पड़ा था। प्रशासन द्वारा दोनों ही जुलूसों पर रोक लगा दी गई। तब ङ्क्षहदुओं की ओर से राधाकृष्ण बुधिया व मुसलमानों की ओर से खान बहादुर हबीबुर्रहमान द्वारा बांड भरे जाने के बाद दोनों जुलूस निकले थे। इसी वर्ष रामनवमी जुलूस पहली बार डोरंडा के तपोवन स्थित राम मंदिर तक गया था। तब से अब तक रामनवमी जुलूस तपोवन मंदिर तक ही जाता है। इसी वर्ष महावीर मंडल के गठन की बात चली और सन 1936 में इसका गठन हुआ। तब से इस संगठन के माध्यम से ही इसका आयोजन होता आ रहा है।

एशो हे बोइशाख एशो-एशो...

पंकज मित्र,  वरिष्ठ कथाकार
शायद ही बांग्लाभाषी समुदाय का कोई सदस्य होगा, जिसकी स्मृति में कविगुरु रवीन्द्रनाथ ठाकुर का यह नववर्ष का आह्वान गीत गूंजता न हो। यह गीत सिर्फ बांग्ला नववर्ष का स्वागत गान मात्र नहीं, प्रतीक भी है कविगुरु की विश्वदृष्टि का, सत्यं शिवं सुंदरम की उनकी अवधारणा का, मानवता के प्रति उनकी शुभेषणाओं का। बचपन से ही गांव-मोहल्ले में 'पोइला बोइशाखÓ यानी बांग्ला कैलेंडर के प्रथम माह बैशाख के प्रथम दिवस के अवसर पर आयोजित होनेवाले छोटे-बड़े समारोहों में राष्ट्रगान की तरह ही अनिवार्यत: गाया जानेवाला यह गीत नववर्ष का आगमनी गीत तो है ही बांग्ला की जातीय स्मृति का अभिन्न अंग भी रहा है। शारदीय नवरात्र के आरम्भ होने से पूर्व जिस तरह 'महिषासुरमर्दिनीÓ या 'महालयाÓ का पाठ एवं गायन बंगभाषी समुदाय की नस-नाड़ी में स्फुरण भर देता है, वैसे ही एशो हे बोइशाख के गायन से नववर्ष के आगमन का संकेत रुधिर वाहिकाओं में नगाड़े की तरह बजने लगता है। कविगुरु के इस अमर गीत के बहाने आज हम इस पावन अवसर को उल्लसित हृदय से उर्जस्वित करेंगे। पता नहीं इतिहासविदों की इस स्थापना में कितना सत्य है कि बैशाख माह से आरंभ होनेवाल बांग्ला कैलेंडर की आवश्यकता मुगल सम्राट अकबर के समय में तब पड़ी, जब लगान-मालगुजारी-वसूली का कार्य हिजरी संवत के अनुसार संभव नहीं हो पाता था। बंगदेश का फसलचक्र ऋतुओं पर आधारित था और कारिंदे मालगुजारी वसूल करने आ जाते थे जब फसलें खेतों में ही खड़ी रहती थी। तब बादशाह अकबर ने अरबी विद्वान शिराजी को जिम्मेवारी दी कि ऋतुओं और फसल चक्र के अनुरूप दिन-तारीख को समायोजित किया जाए। कुछ विद्वान मानते हैं कि पिछले वर्ष की मालगुजारी चुका देने के बाद का उत्सव था 'पोइला बैशाखÓ। संभवत: मालगुजारी के उत्पीडऩ से मुक्ति के उत्सव के रूप में बादशाह ने ही उत्सव मनाने की रीत आरंभ करवाई हो। हर काल के और हर प्रकार के बादशाहों की यही तो खासियत है कि वे चालाक होते हैं। बंगभाषी समुदाय खासतौर पर बांग्लादेश के लोगों के लिए सांस्कृतिक प्रतिरोध की अर्थछवियां भी शामिल हैं इस उत्सव की निर्मिति में। तब के पूर्वी पाकिस्तान का बंगभाषी समुदाय पाकिस्तान सरकार के संस्कृति थोपने के अभियान के कारण बहुत उत्पीडि़त तथा सांस्कृतिक रूप से ठगा गया महसूस करता था। 60 के दशक में ही प्रतिरोध जोर पकड़ चुका था। कविगुरु की रचनाओं के पाठ-प्रदर्शन पर पाकिस्तान सरकार रोक लगा चुकी थी। अब जिस समुदाय का रग-रेशा ही कविगुरु और नजरूल जैसे कवियों की रचनाओं से निर्मित हुई हो, वह समुदाय भला यह अन्याय कैसे सहन करता। उसे तो प्रतिकार करना ही था। उत्पीड़क सत्ता की 'बांटो और राज करोÓ की नीति बंगभाषी समुदाय की जाति-धर्म से इतर सांस्कृतिक एकजुटता के आगे हार गई। 'छायानटÓ नाम के सांस्कृतिक संस्थान ने 'पोइला बैशाखÓ के दिन को प्रतिरोध दिवस के रूप में मनाने की ठानी और ढाका के रमण पार्क के बरगद तले आयोजित हुआ सांस्कृतिक समारोह, जिसमें कविगुरु का यह गीत उद्बोधन गीत बन गया। बाद में ढाका विश्वविद्यालय के सांस्कृतिक संस्थान 'चारूकलाÓ ने सांस्कृतिक झाकियां की शोभायात्रा निकालनी आरंभ की और 'पोइला बैशाखÓ बन गया एक राष्ट्रीय उत्सव।
बंगभाषी समुदाय इस उत्सव को धार्मिक-सांस्कृतिक एवं 'हालखाताÓ के रूप में व्यावसायिक आयाम भी देता है जब अल्पना, पूजा-पाठ, आनंद मेले एवं हिसाब-किताब के लिए नया खाता आरंभ करना और किसिम-किसिम के व्यंजन-मिठाइयां तो शामिल है ही। साथ-साथ सांस्कृतिक-आयोजनों का अविभाज्य अंग है कविगुरु का यह गीत- 'एशो हे बैशाख एशो-एशो। गीत की पंक्तियों से गुजरते हुए कविगुरु की वैश्विक दृष्टि बरबस ध्यान आकर्षित कर लेती है। बैशाख का आह्वान करते हुए कहते हैं कि तापस निश्वास के द्वारा मुमूर्ष को उड़ा दो। वर्षभर जो आवर्जना (कूड़ा-कर्कट, गंदगी, अपशिष्ट, असांस्कृतिक चीजें) जमा हो गई हैं वो सब दूर हो जाएं। कैसी उज्ज्वल दृष्टि, कैसी शुभेषणा, जिसकी आवश्यकता हम सभी को हमेशा रहती है-मूछे जाक ग्लानि/घूचे जाक जरा/अग्नि स्नाने शुचि होक घरा-संपूर्ण विश्व के कल्याण की कैसी अद्भुत कामना से ओत-प्रोत पंक्तियां - ग्लानि मिटे/हटे जरा (रोग-वार्धक्य)/अग्नि स्नान से शुचि हो धरा/लाओ तुम्हारा प्रलय शंख बजाओ/माया का कुंज्झटिजाल हटाओ/-कविगुरु भविष्य दृष्टा थे जैसे हर बड़ा कवि होता है। सिर्फ भारत ही क्यों सम्पूर्ण विश्व को आज कितनी आवश्यकता है इन शुभेषणाओं की जब जरा (रोग-वार्धक्य), माया (पूंजी) के कुंज्झटिजाल ने विश्व को घेर रखा है तो 'पोइला बैशाखÓ का प्रलय शंख निश्चित रूप से एक पल-पल नूतन होती धरा का संदेश लेकर आता ही है। इस संदेश को हम सुने-गुने और एक बेहतर दुनिया बनाने के स्वप्न को जीवित रखें। नववर्ष पर एक शुभकामना संदेश आप सबके लिए -
    'बोछोर शेषेर झरा पाता, बोललो उड़े एशे
    एकटि बोछोर पेरिये गेलो हावार साथे भेसे
    नोतून बोछोर आसछे ताके जोत्नो कोरे रेखो
    स्वप्नो गुलो शोत्ति होबे आशा निए थेकोÓ

(वर्षांत का झरता पात उड़ गया है कहकर
बीत गया एक और साल हवा के साथ बहकर
आ रहा है साल नया इसे बड़े जतन से रखना
सपने सच होंगे तुम्हारे बस तुम उम्मीद रखना।)
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राम नवमी : बड़ागाई से 1952 में निकला था पहला महावीरी जुलूस

डा. बिरेंद्र साहु, अध्यक्ष, श्री महावीर मंडल, बडग़ाई।
श्री महावीर मंडल, रांची के तत्वावधान में 1929 से निकलने वाली शोभायात्रा की एक कड़ी में 1952 से ग्राम बड़ागांई का मुख्य अखाड़ा वेलटंगरा से भी शोभायात्रा प्रारंभ हुई थी। यों तो 1951 में ही श्रीराम नवमी महोत्सव शोभायात्रा निकालने के लिए द्वारिका महतो, सूरज मिस्त्री, दर्शन महतो, गणपत साहू, भवानी साहू, मलाल मिस्त्री, लोकनाथ महतो, बंधन उरांव, बहादुर पहान, जीवाधन महतो, दशरथ पहान आदि ने बेलटंगरा में बैठक की थी। लेकिन उस साल मुस्लिम समुदाय के विरोध एवं शांति समिति का गठन न होने के कारण प्रशासन ने शोभायात्रा निकालने की अनुमति नहीं दी। तब बेलटंगरा मुख्य अखाड़ा में ही एक चबूतरा बनाकर व आम की डाल का खूंटा गाड़कर एक महावीरी पताका लगाकर शुभारंभ किया गया।
1952 मेें पिछले साल के विरोध को देखते हुए गांव के प्रमुख लोगों ने श्री महावीर मंडल, रांची से संपर्क किया। उस समय के मंडल पदाधिकारियों किशोरी यादव, झन्नालाल यादव आदि ने सहयोग किया। प्रशासन से मिल-जुलकर लाइसेंस निर्गत करने एवं जुलूस का मार्ग निर्धारित कराने में उन लोगों ने मदद की। इस तरह इस शोभायात्रा की विधिवत शुरुआत 1952 में हुई। तय मार्ग से आज भी शोभायात्रा निकाली जाती है। 19 अप्रैल, 1956 प्रशासन ने सौ आदमी, पांच बजे, पांच तलवार, 25 लाठी, दो झंडा की अनुमति प्रदान की। जुलूस का लाइसेंस द्वारिका महतो के नाम निर्गत हुआ। 1953 में द्वारिका महतो के नेतृत्व में बेलटंगरा में श्री श्री हनुमान मंदिर का निर्माण कराया गया, जो आज भी है।
बड़ागाईवासी पहली बार 1952 में लगभग सात सौ से एक हजार की संख्या में स्त्री, पुरुष व बच्चे मिलकर रांची के महावीर चौक स्थित हनुमान मंदिर पहुंचकर मुख्य शोभायात्रा में शामिल होकर निवारणपुर स्थित राममंदिर में महावीरी पताका सहित पूजा-अर्चना की। ग्राम बड़ागाई में महाअष्टमी की रात अस्त्र-शस्त्र व गाजे-बाजे के साथ झांकी निकालने की परंपरा थी। अस्त्र-शस्त्र का प्रदर्शन करते हुए पूरे गांव में लोग घूमते थे। सभी महावीरी चबूतरे पर महावीरी पताका खड़ा करते थे। स्त्रियां लोकगीत गाती हुई जुलूस में शामिल होती थीं-
तुलसी कर बुदा तरे महावीर सपरालंय
आइज तो अंजनी कर कोरा में होवंय महावीर...जये-जयकी रामे-राम।

आज परंपरागत महावीरी पताका खड़े किए जाते हैं, लेकिन अस्त्र-शस्त्र की खनक एवं लोकगीतों की ठनक अब देखने-सुनने को नहीं मिलती। महानवमी को मुख्य अखाड़ा बेलटंगरा से श्री रामनवमी महोत्सव की शोभायात्रा निकाली जाती थी, जो पूरे गांव में महाअष्टमी की रात को खड़ा किए गए सभी महावीरी पताकों के साथ लेकर ग्राम भ्रमण कर मेडिकल चौक, करमटोली चौक, महावीर चौक होते हुए निवारणपुर जाती थी। हर घर से लोग इसमें शामिल होते थे। दिन में ग्राम भ्रमण एवं रात में निवारणपुर से वापसी के समय महावीरी पताकाओं का चरण धोकर धूप-अगरबत्ती दिखाती हुई महिलाएं आशीर्वाद प्राप्त करती थीं। हालांकि यह परंपरा आज भी कायम है।  
बड़ागाई की विशेषता यह रही कि होली के तुरंत बाद मंदिरों एवं अखाड़ों में ढोल-ढाक की गूंज व अस्त्र-शस्त्र संचालन का अभ्यास शुरू हो जाता था। रांची के मल्लाह टोली, लेक रोड, चर्च रोड, चुटिया आदि अनेक स्थानों पर होने वाली अस्त्र-शस्त्र प्रतियोगिता में लोग भाग लेते थे। प्रतियोगिताएं तो आज भी होती हैं, लेकिन यहां के लोग अब भाग नहीं लेते। पर, महावीरी जुलूस में यहां के लोग बढ़-चढ़कर भाग लेते हैं। बडग़ाई से लेकर तपोवन मंदिर तक जयश्री राम की गूंज तो सुनाई देती है।
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पहली शोभायात्रा 17 अप्रैल 1929 को निकली थी

सुधीर लाल, लेखक
रांची में पहली रामनवमी की शोभायात्रा 17 अप्रैल, 1929 को निकली थी। यहां रामनवमी की शुरुआत हजारीबाग के रामनवमी जुलूस को देखकर किया गया था। हजारीबाग में रामनवमी जुलूस गुरु सहाय ठाकुर ने 1925 में वहां के कुम्हार टोली से प्रारंभ की थी। रांची के श्रीकृष्ण लाल साहू की शादी हजारीबाग में हुई थी। 1927 में रामनवमी के समय वे अपने ससुराल में थे और वहां की रामनवमी जुलूस को देखा। रांची आकर अपने मित्र जगन्नाथ साहू सहित अन्य मित्रों को वहां की रामनवमी के बारे में बताया। इसके बाद मित्रों में उत्सुकता जगी और 1928 में वहां की रामनवमी को देखने लोग हजारीबाग गए और इसके बाद 1929 में रांची में इसकी शुरुआत कर दी।
पहली शोभायात्रा 17 अप्रैल, 1929, दिन बुधवार को निकली। इसके लिए खादी का झंडा बनवाया गया। इसका रंग कत्थई था, जो आज भी सुरक्षित है। इस काम में श्रीकृष्ण लाल साहू के दोनों बड़े भाई लोकनाथ साहू व रामकृष्ण साहू का भी सहयोग रहा। श्रीकृष्ण साहू के पिता ठेसा साहू और जगन्नाथ साहू के पिता नेमन साहू ने दोनों को प्रोत्साहित किया और अलग से पैसे भी दिए। भुतहा तालाब निवासी अनिरुद्ध राम उन दिनों जगन्नाथ साहू के यहां कार्यरत थे। उन्होंने झंडे के लिए बांस काटा। रामनवमी के दिन ननकू की मां ने नेमन साहू की दुकान के समाने गोबर लीपकर पूजन स्थल और प्रसाद के लिए सेट तैयार किया। जगन्नाथ साहू की पत्नी कुम्हारिन देवी ने पूजा की तैयारी की। 17 अप्रैल की सुबह पंडित गुमान मिश्र ने पूजा करवाई। इसके बाद बजरंगबली की जय का घोष करते हुए श्रीकृष्ण लाल साहू, टेसा साव, कोल्हा साव, लोकनाथ साहू, रामकृष्ण लाल, गुमान मिश्र, जगदीश साव, भगवत दयाल साहू आदि थोड़े से मुहल्लेवासी झंडे को लेकर अमला टोली, वर्तमान श्रद्धानंद रोड होते हुए मेन रोड तक आए। आज जहां अल्बर्ट एक्का की प्रतिमा है, वहां एक बंगाली की दुकान हुआ करती थी। वहां का चक्कर लगाकर शोभायात्रा अमला टोली होते हुए वापस महावीर चौक लौट गई। शोभायात्रा के आगे अनिरुद्ध राम झंडे को और जागो मोची डंका बजाते हुए चल रहे थे। शोभायात्रा में शामिल सभी उपवास पर थे। इस पहली शोभायात्रा की चर्चा महीनों होती रही। उन दिनों रांची एक कस्बाई नगर था। उस समय अपर बाजार में ङ्क्षहदू-मुस्लिम की मिली-जुली आबादी थी। लगभग सभी के मकान कच्चे और खपरैल के थे। महावीर चौक के आस-पास ही आबादी थी। उसके आगे खेत और पेड़ों से भरा था। आज जहां दुर्गा मंदिर है, वहां पेड़ों का एक बगीचा था। इस तरह रामनवमी की शोभायात्रा यहां प्रारंभ हुई। आगे चलकर कुछ तनाव हुआ तो 1936 में श्री महावीर मंडल का गठन किया गया, जिसके पहले अध्यक्ष नागा बाबा ज्ञान प्रकाश बनाए गए। इसके बाद महावीर मंडल के नेतृत्व में ही शोभायात्रा निकलने लगी। मंडल का गठन होते ही रांची में उत्साह का वातावरण बन गया। इसके बाद यह शोभायात्रा तपोवन मंदिर तक जाने लगे। मुहल्लों में अखाड़ों का गठन किया जाने लगा। महावीर चौक पर गणेश मंदिर का भी निर्माण किया गया। आज शोभायात्रा और भव्य रूप में निकल रही है। हर दिन भीड़ बढ़ती जा रही है। 

रांची से बंगाल का नाता है पुराना

रांची या कहें, झारखंड से बंगाल का पुराना रिश्ता रहा है। यायावर संत चैतन्य महाप्रभु झारखंड से गुजरे और बड़े आत्मीय ढंग से यहां की विशेषता का उल्लेख अपने पद में किया। सचमुच, यह रिश्ता बड़ा आत्मिक रहा है। बांग्ला के कई मशहूर लेखकों ने अपने-अपने ढंग से इस हरे-भरे प्रदेश, यहां की संस्कृति, पठार, झरने को याद किया। कई बांग्ला लेखकों की ख्याति में झारखंड की अरण्यक संस्कृति की बड़ी भूमिक रही है। रवींद्र नाथ टैगोर के दादा से लेकर उनके बड़े भाई ज्योतिरींद्र नाथ टैगोर, महान लेखक बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के बड़े भाई संजीब चट्टोपाध्याय, विभूति शंकर वंद्योपाध्याय, शरत चंद्र चट्टोपाध्याय, फिल्मकार सत्यजीत रे, ऋत्विक घटक से लेकर काजी नजरूल इस्लाम, श्यामा प्रसाद मुखर्जी, सुकांत भट्टाचार्य और महाश्वेता देवी तक...। फेहरिश्त बड़ी है। किन-किनकों याद करें। इनकी स्मृतियों में झारखंड रहा है और कुछ तो अलग-अलग कारणों से यहां रहे।

तीन पीढिय़ों से रहा है टैगोर परिवार का वास्ता
झारखंड से रवींद्रनाथ टैगोर के परिवार का तीन पीढिय़ों से संबंध रहा है। टैगोर के दादा द्वारिका नाथ टैगोर ने पलामू के राजहरा में एक अंग्रेज व्यापारी से मिलकर कोलियरी चलाई थी। फर्म का नाम था मेसर्स कार्र-टैगोर एंड कंपनी। 1834 में इस फर्म के जरिए कोयले का व्यापार शुरू किया गया। विलियम कार्र एवं विलियम प्रिंसेप का इंग्लैंड के साथ सिल्क व नील का व्यापार था। इन्होंने ही कोयले का व्यापार भी शुरू किया। 1936 में रानीगंज कोलियरी खरीदा गया। इसे मूलत: विलियम जान्स ने खोला था। इस कोलियरी को खरीदने के बाद कार्र-टैगोर फर्म ने अपनी कंपनी का विस्तार किया। एक लंबे अंतराल के बाद हजारीबाग में रवींद्रनाथ टैगोर के कदम पड़े। गुरुदेव के परिवार के अनेक सदस्य भी गर्मी की छुट्टियों में रांची में आकर रहते थे। 1920 के आस-पास गुरुदेव के भाई अबनींद्रनाथ ठाकुर कोकर में दो बेहद खूबसूरत मकान बनवाए थे, जिसका नाम रखा था सन्नी नूक। टैगोर हिल को रवींद्रनाथ के बड़े भाई ज्योतिरींद्रनाथ टैगोर ने खरीदा था। इसके बाद अपने ढंग से वहां निर्माण करवाया। वे बड़े भाई सत्येंद्रनाथ टैगोर के साथ पहली बार वे 1905 में रांची आए। फिर तीन साल बाद एक अक्टूबर, 1908 को रांची रहने के लिए ही आ गए। ज्योतिरींद्र यहां आए तो फिर यहीं के होकर रह गए। यहीं पर उनका निधन हुआ और टैगोर हिल पर ही उनकी समाधि बनी हुई है। हरमू के मुक्तिधाम में उनका अंतिम संस्कार किया गया था। रांची में हाथ गाड़ी रिक्शा का प्रचलन भी इन्होंने की किया था।

बंकिम के बड़े भाई संजीब ने लिखी 'पलामूÓ
वंदे मातरम के लेखक बंकिम चंद्र चटर्जी के बड़े भाई संजीब को अंग्रेज सरकार ने डिप्टी मजिस्ट्रेट बनाकर पलामू भेज दिया। उनकी यह पहली पोस्टिंग थी। यहां के पेड़, पौधे, झरने उन्हें खूब पंसद आए। दो साल वे यहां की मनोरम प्रकृति और संस्कृति का खूब आनंद लिया। इसके बाद 'पलामूÓ लिखा। पलामू पर लिखा यह पहला यात्रा वृत्तात हैं। पं बंगाल में यह काफी लोकप्रिय रचना है। 1880 में यह छपी थी। पहले बंग दर्शन में यह धारावाहिक रूप में छपी। इसकी प्रशंसा गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने भी की। इसे पढ़कर ही सत्यजीत रे ने पलामू में अपनी फिल्म 'अरण्येदिनेरात्रिÓ की शूटिंग की थी। 
जोन्हा झरने पर फिदा हो गए थे सुकांत
सुंकात भट्टाचार्य महज 21 साल की उम्र दुनिया से विदा ली। उन्हें राजरोग था यानी टीबी। उस दौर में यह लाइलाज बीमारी थी। कैंसर की तरह। इलाज के क्रम में ही सुकांत रांची आए थे और निवारणपुर के अनंतपुर में वे रहते थे। गुलामी के दौर में 15 अगस्त, 1926 को वे पैदा हुए, लेकिन आजादी से ठीक पहले 13 मई, 1947 को वे चल बसे। सुकांत ने अपनी छोटी से उम्र में खूब लिखा। वे काजी और गुरुदेव से खासे प्रभावित रहे, लेकिन उनकी कविता का स्वर काजी के साथ संगत करता है। विद्रोह की लालिमा उनकी कविताओं में मिलती है। उन्होंने रांची के अपने ठिकाने, 2 अनंतपुर, हिनू, रांची से एक पत्र अरुण को लिखा था। इस पत्र में रांची से जोन्हा का सजीव वर्णन है। जोन्हा फाल की रात में आती आवाज का भी मनमोहक वर्णन किया। रांची पर एक कविता भी लिखी।
हिनू था काजी का ठिकाना
बांग्ला के महत्वपूर्ण क्रांतिकारी कवि काजी नजरुल इस्लाम (25 मई 1899-29 अगस्त 1976) गर्मी की छुट्टी रांची में ही बिताते थे। उनका ठिकाना हिनू हाउस था। इसी आवास में राय साहब प्रफुल्ल चंद्र दास गुप्ता रहते थे, जिनकी बहन की बेटी प्रमिला देवी से नजरूल का विवाह हुआ था। राय साहब प्रफुल्ल चंद्र को नजरूल मामा कहते थे। काजी अपनी बीमारी में यहां सीआइपी में भी इलाज करवाए। पर ठीक नहीं हो सके। सीआइपी में छह महीने उनका इलाज हुआ। इसके अलावा वे श्यामा प्रसाद मुखर्जी के मधुपुर वाले घर पर भी रहे। देवघर भी रहे। यह महान कवि लंबी अवधि तक अवाक रहा। इसके बाद बांग्लादेश में इनकी मृत्यु हो गई।

आदिवासी जीवन के पहले फिल्मकार थे ऋत्विक घटक
आदिवासी जीवन पर पहली बार ऋत्विक घटक ने डाक्यूमेंट्री बनाई। बिहार सरकार का यह प्रयास था। ऋत्विक की तब उम्र यही कोई 25 के आस-पास थी। इप्टा से जुड़ चुके थे और नाटक लिखना भी शुरू कर दिया था। झारखंड से उनका परिचय हो चुका था। उन्होंने अपने कॅरियर की शुरुआत 'बेदिनीÓ फिल्म से की थी। 1952 में फिल्म यूनिट को लेकर घाटशिला आए और स्वर्णरेखा नदी के किनारे 20 दिनों तक रहे और शूटिंग की। हालांकि यह फिल्म रिलीज नहीं हो सकी। ऋत्विक आदिवासी समाज को सत्यजीत रॉय की तरह नहीं देखते थे। उन्होंने 'आदिवासी जीवन के स्रोतÓ एवं 'उरांवÓ बनाई तो आदिवासी समाज को, उनकी संस्कृति को निकट से देखने की कोशिश की। झारखंड से उनका परिचय मशहूर कथाकार राधाकृष्ण ने कराई थी। राधाकृष्ण के स्क्रिप्ट पर ही झारखंड पर कई डाक्यूमेंट्री उन्होंने बनाई।

फिल्मों में होगी गांव की वापसी : कमलेश पांडेय

फिल्मों में गायब होते गांव को लेकर फिल्म लेखक कमलेश पांडेय भी चिंतित हैं। वे इस बार जयपुर इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल (जिफ) के अध्यक्ष हैं। एक कार्यक्रम में भाग लेने रांची आए कमलेश पांडेय ने कहा कि सचमुच यह चिंता का विषय है। इस वजह को ढूंढना होगा? गांव तो मेरे अंदर आज भी जिंदा है। सोचना चाहिए कि आज भी गांव में 80 प्रतिशत आबादी निवास करती है। गांव में समस्याएं आज भी हैं। कहानियां भी हैं। 'लगानÓ के बाद तो गांव एकदम से गायब हो गए। खेती किसान छोड़ रहे हैं। चार करोड़ किसान आत्महत्या कर चुके हैं। पहले ऐसी स्थिति नहीं थी। किसान संघर्ष करता रहा है, लेकिन आत्महत्या नहीं करता था। सरकार ने भी किसानों को अपने हाल पर छोड़ दिया है। उसकी चिंता में मल्टीनेशनल कंपनियां हैं। हम अपने देश में ही किसानों का अपमान कर रहे हैं। जबकि आज भी जो इकोनॉमी है, कृषि आधारित ही है। किसानों के प्रति यही रवैया रहा हो अगले पचास साल में हम अनाज के लिए तरसेंगे और आधी आबादी भूख से मरेगी। जयपुर फिल्म फेस्टिवल में एक सत्र गांव पर केंद्रित रखा गया है। 

ग्लैमर देखकर आ रहे फिल्म बनाने
पांडेय ने कहा कि 90 प्रतिशत फिल्म बनाने वाले ग्लैमर देखकर आते हैं। उन्हें फिल्म की क्वालिटी से मतलब नहीं है। इनमें ऐसे धंधेबाज लोग ज्यादा है, जिनके पास अफरात पैसा है। ऐसे लोग एक करोड़ देकर शाहरूख खान के साथ डीनर करते हैं। ऐसे लोगों से क्या उम्मीद कर सकते हैं? इनका फिल्म के व्याकरण से कुछ लेना-देना नहीं है। दस प्रतिशत लोग ही ऐसे हैं, जिनके लिए फिल्म बनाना एक पैशन है। जुनून है। वे कुछ समाज को देना चाहते हैं। यह नगरी ऐसी है कि एक दूसरे से लोग झूठ बोलते हैं। सच कहने का साहस नहीं रखते।
आमिर को मुल्क की समझ नहीं
आमिर के साथ काम कर चुके कमलेश ने कहा कि आमिर को इस तरह का बचकाना बयान नहीं देना चाहिए। वे राजनीतिज्ञ नहीं हैं। इस मुल्क की विविधता को समझना चाहिए। अलग-अलग संवेदनाएं है। यह मुल्क क्या है, इसके रुट्स क्या हैं, इसे समझने की जरूरत है। आखिर वे मुल्क छोड़कर जाएंगे कहां? अमेरिका, जहां उन्हें कोई जानता नहीं। यूरोप...कौन जानता है? आमिर ने डिस्प्यूडैंसी शब्द का प्रयोग किया। यह बड़ा भारी शब्द है। नेताओं को तो कुर्सी की फिक्र है। वे इस तरह का बयान देते रहते हैं। उनके अंदर खालीपन है। पर आप तो समझदार हैं। 
पहली बार दिखेगा असल युद्ध
राकेश मेहरा के साथ 1962 के भारत-चीन युद्ध पर फिल्म बना रहे हैं। यह वस्तुत: शहीद जसवंत सिंह की बायोपिक है, लेकिन इसमें असल युद्ध दिखाई देगा। 1962 के युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए जसवंत सिंह की शहादत से जुड़ी सच्चाइयां बहुत कम लोगों को पता है। उन्होंने अकेले 72 घंटे चीनी सैनिकों का मुकाबला किया और विभिन्न चौकियों से दुश्मनों पर लगातार हमले करते रहे और तीन सौ चीनियों को मारा। जसवंत सिंह की शहादत से जुड़ी कुछ किंवदंतियां भी हैं। इसी में एक है कि जब रात को उनके कपड़ों और जूतों को रखा जाता था और लोग जब सुबह उसे देखते थे तो ऐसा प्रतीत होता था कि किसी व्यक्ति ने उन पोशाकों और जूतों का इस्तेमाल किया है। इसलिए उनकी पूजा आज भी होती है। उन्हें सेना ने पिछले साल ही रिटायर किया।
सेना का मिल रहा सहयोग
पांडेय ने बताया कि सेना ने काफी मदद की है। शोध के दौरान एक-एक जानकारी सेना ने मुहैया कराई है। जसवंत एक लीजेंड का नाम है। एक गरीब परिवार का लड़का। इस फिल्म में उस संवेदना को भी पकडऩे की कोशिश की गई कि आखिर जब सामने मौत खड़ी हो तो एक सैनिक क्या सोचता है? इस फिल्म में पहली बार युद्ध के कारणों की पहचान की गई है। 

जैसे उड़ी जहाज को पंछी, पुनि जहाज पर आवेÓ

'जैसे उड़ी जहाज को पंछी, पुनि जहाज पर आवे।Ó यह कहावत हिंदी के प्रतिष्ठित किस्सागो राकेश कुमार सिंह पर चरितार्थ होती है। सोलहो आना। राकेश का जन्म पलामू में हुआ। पढ़ाई-लिखाई के बाद अब बिहार के आरा में नौकरी। लेकिन उनकी रचनाओं का केंद्र झारखंड। पलामू से लेकर संताल की यात्रा उनकी रचनाओं में सन्निहित है। देर से कहानी लेखन के क्षेत्र में उतरे। पर, यह देर, उन्हें स्थापित करने में विलंबित राग नहीं छेड़ा। देर आए पर दुरुस्त। तब से वे ङ्क्षहदी कथा साहित्य को समृद्ध कर रहे हैं। अपनी अलग पहचान, भाषा और किस्सागोई के साथ। एक पंक्ति पढ़कर आप पहचान जाएंगे कि यह किसकी पंक्ति है। यह पहचान किसी-किसी के नसीब में आती है। सो, इस नसीब वाले कथाकार ने अपना नसीब खुद बनाया। पलामू से चलकर आरा होते हुए फिर-फिर पलामू की यात्रा अपने रुट की यात्रा। अपने होने की यात्रा। खुद को जानने की यात्रा। इस यात्रा की पहली परिणति 2003 में दिखी, जब 'जहां खिले हैं रक्तपलाशÓ नामक उपन्यास पाठकों के हाथ में पहुंचा। वहां के भूमिगत आंदोलन को केंद्र में रखकर लिखी गई यह कृति एक दस्तावेज भी है। 
एक निजी कार्यक्रम में वे रांची आए थे। गुरुवार की सुबह, सच पूछिए तो दोपहर होने वाली थी, हम अल्बर्ट एक्का चौक पर मिले। इंदुजी की दुकान पर। फिर साथ चाय पी। साथ उनके बेटा भी था, जो यहीं पर हाईकोर्ट में वकालत करते हैं। लंबे अरसे बाद मुलाकात हुई थी। बातों-बातों में ही उनकी गहरी संवेदनशीलता और रचनाशीलता से रूबरू हुआ। यह भी ज्ञात हुआ कि झारखंड के प्रति उनकी प्रतिबद्धता प्रचारात्मक किस्म की नहीं है। गहरे कर्तव्यबोध से जुड़ी है। यही कारण है कि उसी साल, 'पठार पर कोहराÓ नामक उपन्यास आया और खूब चर्चित रहा। 
पलामू से संताल की यात्रा के बारे में कहते हैं कि हूल क्रांति को वह स्थान नहीं मिला, जिसकी वह हकदार है। 1857 की पहली क्रांति के दो साल पहले एक बड़ी क्रांति झारखंड के सुदूर अंचल में घटित हुई, लेकिन उसे स्थानीय कहकर उसके ऐतिहासिक महत्व को कमतर कर दिया गया। इसलिए, 'जो इतिहास में नहीं हैÓ, उपन्यास लिखा और उसके केंद्रीय महत्व को लाने का एक प्रयास किया। इसी प्रकार, 1755 में पहाडिय़ों का विद्रोह हुआ था। तिलका मांझी को बहुतेरे लोगों ने संताल बताया, जबकि वह पहाडिय़ा थे। राकेश बताते हैं, इस चरित्र को लेकर बड़ा घालमेल रहा है और अब भी है। ऐतिहासिक छानबीन के बाद 'हूल पहाडिय़ाÓ लिखा और तिलका मांझी के पूरे चरित्र, आंदोलन और उस दौर को समेटने का प्रयास किया। तिलका संताली नहीं, पहाडिय़ा थे। 
राकेश कहते हैं, पता नहीं क्यों, जब-जब यहां आता हूं, घूमता हूं, लोगों से मिलता हूं तो कुछ न कुछ शेष रह जाता है। इसी साल ज्ञानपीठ से 'महाअरण्य में गिद्ध आया।Ó पूरा झारखंड आंदोलन इसके केंद्र में है। झारखंड के पृथक आंदोलन की पृष्ठभूमि पर यह उपन्यास खड़ा है, लेकिन इसमें बहुत कुछ है। एक बड़ा हिस्सा पलामू पर है। इसमें एक चरित्र पलामू का आदमखोर भी है। 
राकेश बताते हैं कि झारखंड पर ही 'आपरेशन महिषासुरÓ प्रेस में जाने को तैयार है। झारखंड बनने के बाद उदारीकरण, भूमंडलीकरण और आदिवासी जन-जीवन पर इसके प्रभाव-दुष्प्रभाव को इसमें रखा गया है। अपनी रचनाओं में बार-बार झारखंड को केंद्र में रखने के बाबत कहते हैं कि झारखंड से बाहर निकलने की कोशिश करता हूं। 'साधो, यह मुर्दों का गांवÓ लिखा। यह छोटा उपन्यास है, जो विचाराधीन कैदियों पर है। इस देश में साठ हजार कैदी विचाराधाीन हैं। इस विषय पर इस तरह का पहला प्रयास था। लोगों ने इसे पसंद किया। 
पर, कहते हैं न जैसे जहाज का पंछी कहीं घूमे-उड़ान भरे, फिर-फिर वह अपने मस्तूल पर आ ही जाता है, वही हाल मेरा है। झारखंड में इतना चुंबक है कि यह बार-बार खींच लेता है। यहां के जंगलों में मन भटकने लगता है।

नेहरू का निधन और ‘आदिवासी’ की श्रद्धांजलि

  देश के पहले प्रधानमंत्राी पं जवाहर लाल नहेरू का निधन जब 27 मई, 1964 को दिल्ली में हुआ तब उसके अगले दिन ‘आदिवासी’ का नया अंक 28 मई को आया। आदिवासी का यह सत्राहवां अंक था और साल 18। पहले पेज पर नेहरू की एक तस्वीर दी गई और नई दिल्ली डेड लाइन से खबर प्रकाशित की गई। खबर का शीर्षक था, शान्ति का मसीहा-भारत का राष्टनायक उठ गया। तीसरी पंक्ति में थी प्रधानमंत्राी नेहरू का देहावसान और अंतिम पंक्ति मंे थी, सारा देश शोकाकुल। खबर इस प्रकार थी। ‘नई दिल्ली। 27 मई के अपरा दिन के दो बजे यहां प्रधानमंत्राी जवाहरलाल नेहरू
  नेहरू के निधन का समाचार रांची भी पहुंचा। वे रांची कई बार आ चुके थे। रांचीवासियों के मन में नेहरू की एक अमिट छाप थी। यहां भी उनके देहावसान का समाचार बिजली की तरह फैल गया। सभी के चेहरे पर उदासी छा गई और सारा नगर मातम में डूब गया। उस दिन रांची में मंत्रिमंडल की बैठक होने वाली थी, परंतु शोक समाचार मिलते ही बैठक स्थगित कर दी गई। कार्यालय, संस्थान तथा दुकानें बंद कर दी गईं।उस दिन स्थानीय कांग्रेस कमेटी से दिन के दो बजे शोक जुलूस निकला। यह जुलूस मुख्य सड़क होते हुए बीएमपी मैदान में सभा में परिणत हो गया। वहां दिवंगत आत्मा के प्रति श्रद्धांजलि अर्पित की गई। स्वास्थ्य मंत्राी अब्दुल क्यूम अंसारी ने सभा की अध्यक्षता की थी। पंचायत मंत्राी सुशील कुमार बागे ने भी अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की।
    राष्टपति ने राष्ट के नाम संदेश दिया। नेहरू को मानव जाति का एक बड़ा मुक्तिदाता बताया। राष्टपति ने 27 को ही प्रसारित अपनी विज्ञप्ति में गुलजारी लाल नंदा को प्रधानमंत्राी नियुक्त किया और उन्हें मंत्रियों को नियुक्त करने के लिए उन्हें सिफारिश करने को भी कहा। ‘आदिवासी’ का अगला अंक 4 जून, 1964 को प्रकाशित हुआ। अंक के मुख पृष्ठ के दाहिने ‘श्री लालबहादुर शास्त्राी कांग्रेस संसदीलय दल के नेता निर्वाचित’ होने का समाचार प्रमुखता से छापा गया था। शास्त्राी ने नेहरू के पदचिों पर चलने का संकल्प दुहराया और समाजवाद को अपना लक्ष्य निर्धारित किया।
    हालांकि दाह संस्कार की खबर विस्तार से इसी अंक में प्रकाशित हुई। दस लाख लोगों ने अपने प्रिय नेता को अंतिम श्रद्धांजलियां देने के लिए अंतिम संस्कार के समय उपस्थित थे। जबकि नेहरू के निवास स्थान से लेकर यमुना के तट तक करीब बीस लाख लोगों ने अपने प्रिय नेता का अंतिम दर्शन करने के लिए पंक्तिबद्ध खड़े थे। ऐतिहासिक पुरुष की शवयात्रा भी ऐतिहासिक थी। कई देशों के प्रधानमंत्राी, राजकुमार, नेता, कूटनीतिज्ञ से लेकर आम लोग तक शामिल थे। ब्र्रिटेन के प्रधानमंत्राी सर डगलस होम, अर्ल माउंटबेटेन, लंका की प्रधानमंत्राी भंडार नायक, रूस के प्रथम उपप्रधानमंत्राी कोसीजिन,  नेपाल मंत्रिपरिषद के अध्यक्ष डाक्टर तुलसी गिरि, अमेरिका के परराष्टपति श्री डीन रस्क, संयुक्त अरब गणराज्य के उपाध्यक्ष श्री हुसैन सफी, युगोस्लाविया के प्रधानमंत्राी श्री पी स्टाम बोलिच, पाकिस्तान के परराष्ट मंत्राी श्री भुट्टो, इरान के गृहमंत्राी, फ्रांस के परराष्ट मंत्राी भी उपस्थित थे। हर आंखें डबडबाई थीं। कुछ लोग रो भी रहे थे।
    मई की महीना था। चिलचिलाती धूप थी। लाखों लोग यमुना तट पर जमा थे और अर्थी की प्रतीक्षा रहे थे। पानी का फुहारा देकर गर्मी को शांत किया जा रहा था। फिर भी गर्मी में बहुत से लोग बेहोश भी हो जा रहे थे। एक विदेशी कूटनीतिज्ञ की पत्नी भी बेहोश हो गई थीं। यहीं नहीं, भीड़ इतनी थी कि कई लोग घायल हो गए। प्रधानमंत्राी के निवास स्थान से जब नेहरू की शवयात्रा निकाली गई तो उस समय करीब अस्सी हजार लोग थे। यहां दो व्यक्ति दबकर मर गए और एक दर्जन से अधिक लोग घायल हो गए, जिन्हें एंबुलेंस से अस्पातल भेजा गया। भीड़ यहां इतनी बेकाबू थी कि लोग पुलिस पर पत्थर व जूते फेंकने लगे। खैर, किसी तरह यहां से शवयात्रा निकाली गई। पूरा पथ पंडित नेहरू अमर रहे है नारे लगे। अर्थी ज्योंही श्मशान पहंुची कि एक हेलीकाप्टर ने पर से गुलाब के फूलों की वर्षा करना शुरू कर दिया। कार्यकारी प्रधानमंत्राी गुलजारी लाल नंदा, निर्विभागीय मंत्राी लालबहादुर शास्त्राी, प्रतिरक्षा मंत्राी चैहान, मोरारजी देसाई, कृष्ण मेनन चिता के चारों ओर खड़े थे। सैनिक अफसरों ने दिवंगत नेहरू के पर से तिरंगा झंडा हटाया। यह अवसर बड़ा मार्मिक था। सबकी आंखें गीली थीं। पंडितों ने वेद का पाठ शुरू किया। पवित्रा जल शव पर छिड़का गया। संजय ने चिता में आग दी। चिता की लपटें पर उठने लगीं। बंदूकें गरज उठीं। नेहरू अमर रहे के गगनभेदी उद्घोष से पूरा वातावरण गूंज उठा। पास में ही सौ गज की दूरी पर महात्मा गांधी भी अपनी समाधि में सोए हुए थे और अपने प्रिय शिष्य को पांचों तत्व में मिलते हुए देख रहे थे।    
    नेहरू के निधन पर देश-दुनिया से शोक संदेश आने लगे। पूरा विश्व नेहरू के निधन से शोकाकुल था। वे वैश्विक व्यक्तित्व थे। अमेरिका, आस्टेलिया, युगोस्लाविया, सोवियत संघ, संयुक्त अरब गणराज्य, चीन, श्रीलंका, नेपाल, अरग, सूडान, पाकिस्तान आदि के मुखिया शोकाकुल थे। रामकृष्ण प्रसाद ‘उन्मन’ और दीनेश्वर प्रसाद ‘स्वतंत्रा’ ने अपने छंदों के माध्यम से श्रद्धांजलि दी। जमशेदपुर, धनबाद, चक्रधरपुर के अलावा रांची के कई स्थानों पर सभाएं कर चाचा नेहरू को श्रद्धांजलि अर्पित की गई।
    ‘आदिवासी’ का 19 वां अंक भी नेहरू को ही समर्पित था। यह 11 जून 1964 को निकला था। इस अंक में उनके भस्मावशेष प्रवाहित होने की सूचना थी। साथ ही दाह संस्कार की कुछ तस्वीरें भी छापी गई थीं। नेहरू की अस्थियां इलाहाबाद के संगम में प्रवाहित की गईं। 8 जून को प्रातः 8 बजकर 45 मिनट पर वैदिक मंत्रोच्चारण के बीच संगम में प्रवाहित की गईं। यहां भी दिवंगत नेता को श्रद्धांजलि देने के लिए करीब दस लाख लोग जमा थे। अकबर के ऐतिहासिक किले के नीचे जुलूस में आए लाखों व्यक्ति नेहरूजी अमर रहे, चाचा नेहरू जिंदाबाद के गगनभेदी नारे लगा रहे थे। राजीव व संजय ने टक से अस्थिकलश को नीचे उतारकर एक विशेष जेट्टी में रखा। सैनिक अपने हथियारांे को झुकाकर नतमस्तक हो गए। हजारों लोग गंगा में खड़ा होकर अपने प्रिय नेता को श्रद्धांजलि दे रहे थे। नेहरू जी का परिवार को मनोनीत प्रधानमंत्राी लाल बहादुर शास्त्राी एक नाव पर सवार थे। नेहरू के साथ उनकी पत्नी कमला नेहरू की अस्थियां भी प्रवाहित कर दी गईं। नेहरू ने कमला नेहरू का भी भस्मावशेष अब तक अपने पास ही रखा था। अस्थि कलश एक विशेष टेन से नई दिल्ली से इलाहाबाद ले आया गया था। टेन इलाहाबाद 4 बजकर 55 मिनट पर पहंुची थी। यहां  भस्मावशेष का स्वागत करने के लिए पहले से ही आए लाल बहादुर शास्त्राी, रेल मंत्राी सरदार स्वर्ण सिंह वायुयान से आ गए थे। टेन से राजीव व संजय अस्थियां लेकर उतरे। दोनों भाई नंगे पैर थे। उनके पीछे इंदिरा गांधी, विजयलक्ष्मी पंडित, कृष्णाहठी सिंह व नेहरू परिवार के अन्य सदस्य थे। स्टेशन से आनंद भवन अस्थिकलश पहंुचा। स्टेशन से लेकर आनंद भवन तक चार मील तक लोग खड़े रो रहे थे। नेहरू का यह पैतृक घर था। यहां लोगांे के लिए दर्शनार्थ अस्थिकलश रखा गया था। यहां से फिर संगम की ओर यात्रा प्रारंभ हुई। रामधुन के बीच जुलूस आठ बजे संगम तट पहुंचा। और, फिर पुरोहितों ने अस्थिकलश को संगम में प्रवाहित कराने का अनुष्ठान पूरा कराया। इस तरह भारत का खोजी, स्वप्नदर्शी, शांति का संदेश वाहक संगम में सदा-सदा के लिए विलीन हो गया। 
का देहांत हो गया। वे 27 मई के प्रातःकाल अचानक बीमार हो गये थे। नेहरूजी की उम्र 74 वर्ष की थी। उनके निधन का समाचार पाते ही राष्टपति राधाकृष्णन और केंद्रीय मंत्रिपरिषद के सदस्य तुरत उनके निवास स्थान पहुचे। लोकसभा में केंद्रीय इस्पात और खान मंत्राी श्री सी सुब्रह्मण्यम ने उनके निधन की घोषणा की। सदन के कई सदस्य यह समाचार सुनते ही रोने लगे। लोकसभा अध्यक्ष सरदार हुकुम सिंह ने यह खबर पाते ही लोकसभा की बैठक स्थगित कर दी। ज्योंही उनके निधन का समाचार फैला, बहुत बड़ी संख्या में लोग नेहरूजी के निवासस्थान के बाहर एकत्रा हो गये।’ अगले पेज पर खबरें विस्तार से थीं। अगले दिन शवयात्रा की खबर भी थी। बताया गया कि नेहरूजी की शवयात्रा 28 मई को एक बजे दिन में उनके निवास स्थान से शुरू हुई और राजघाट पर अंत्येष्टि क्रिया संपन्न हुई। उनके दौहित्रा श्री संजय गांधी ने दाह-संस्कार किया। कई मील लंबा शोक जुलूस था। देश-विदेश के नेता पहुंचे और अंतिम श्रद्धांजलि अर्पित की।