चुटियानागपुर की सुंदरता

  -मिशन इंस्पेक्टर एच. काउश एवं मिशनरी एफ. हान

   जब कोई मिशन का मित्र हिंदुस्तान के बारे में सुनता है तो वह एक ऐसे जादुई देश की कल्पना करने लगता है जिसे प्रकृति ने शृंगार किया हो। लेकिन जैसा कि विदित है हिंदुस्तान अपने में एक दुनिया है। सभी जगहों पर उष्णकटिबंध की हरियाली भरी सुंदरता राज नहीं करती। कुछ ऐसे भी क्षेत्र हैं जो कवि की कल्पना से मेल नहीं खाते। विशेषकर उत्तरी हिंदुस्तान प्रकृति की सुंदरता में कई मायने में कम है और चुटियानागपुर का हमारा मिशन क्षेत्र भी सामान्यत: तुलना में श्रीलंका अथवा बड़े सुंडाद्वीप के आकर्षण के बराबर नहीं है। फिर भी चुटिया नागपुर में सुंदरता के कई स्मारक सृष्टिकर्ता ईश्वर की कृपा से मौजूद हैं। हमारी तस्वीर में दिखाया गया सुंदर जलप्रपात इसका प्रमाण है। भूरे ग्रेनाइट की चट्टानों से सफेद झागदार पानी दिल थाम लेने वाली चौड़ाई में 100 फीट नीचे आवाज करता हुआ टूट कर गिरता है। नीचे एक प्यारा नीले रंग का छोटा झील बन जाता है जो साफ और पारदर्शक दिखाई देता है। सभी प्रकार की मछलियां विशेष कर सर्पमीन और कतला जाति की सौर पानी में विचरण करती हैं। बहुत गहराई में उदविलाव मछली, हां, स्वयं घडिय़ाल और बहुत सारे पानी सांप पाए जाते हैं। किनारे पर जहां पानी छिछला होता है, लोग नहाते-धोते हैं।
  इस क्षेत्र के जलप्रपातों में स्वर्णरेखा नदी का हुंडरू घाघ सबसे बड़ा है, जो रांची से 25 मील उत्तर पूर्व में है और 320 फीट की ऊंचाई से गिरता है। हमारी तस्वीर में चट्टानों के ऊपर घने जंगलों का भाग दिखाई देता है, जिसमें विभिन्न चौड़े पत्तों वाले वृक्ष तथा शिरीष के पेड़ दिखाई देते हैं। कहीं पर भी ताड़ के वृक्षों का नामोनिशान नहीं, ताड़ के नाम पर सिर्फ खजूर के पेड़ मिलते हैं। इसके विपरीत जंगल का मुख्य पेड़ सखुआ है, जो हमारे जर्मनी के ओक पेड़ के समान दिखाई देता है। इसकी लकड़ी घर बनाने के काम आती है। उसकी छाल से रस्सी बनाई जाती है। उसकी राल से हिंदुस्तान में अपरिहार्य धुवन बनता है। इसके अलावा जंगल के बड़े हिस्से में बांसों के झुंड पाए जाते हैं।
आगे हम महुआ पेड़ का भी जिक्र कर रहे हैं, जिसके फूलों से मादक द्रव्य बनाया जाता है। कुसुम पेड़ की डालियों पर लाह के कीड़े पाए जाते हैं। सुंदरता में सबसे अलग है आम के पेड़ जिनके बड़े फल हमारे यहां के आलूबुखारा की तरह होते हैं और जिन्हें बड़े चाव से खाया जाता है। करीब सभी गांवों के आने आम के बगीचे हैं। सबसे विशिष्ट है बरगद का पेड़ जो समांतर डालियों से जड़ों को नीचे गिराता है और जब वे जमीन के अंदर पहुंचती है तो उनसे नया पेड़ निकलता है। बहुधा ऐसा होता है कि वर्षों के अंतराल में एक अकेला बरगद एक सरीखे का छोटा जंगल बन जाता है। पीपल के पेड़ को विशेषकर हिंदुओं की ओर से धार्मिक सम्मान मिलता है। प्रत्येक पत्ती पर लोग कहते हैं कि देवता निवास करते हैं। जब बारिश होती है तब लोग इसकी पूजा करते हैं। यह पेड़ समूचे हिंदुस्तान का परोपकारी पेड़ है, क्योंकि यह लोगों को सबसे ज्यादा छाया प्रदान करता है। इमली का पेड़ भी छाया का धनी है और लोग गांव के अखरा में इसे लगाना पसंद करते हैं, क्योंकि बारिश की बूंदों को भी इसी पेड़ की घनी पत्तियां रोक लेती हैं। जंगल जीवन से भरपूर है। चुटियानागपुर में पहले के उल्लेख के अलावा, जंगली जानवरों की भरमार है, यहां वहां हाथी भी दिखाई देते हैं। यहां के रहने वाले हिरण, हिरणी और खरगोश का शिकार करते हैं किंतु बिना आग्नेय शस्त्रों का प्रयोग किए। लोग हो हल्ला कर जानवरों को खदेड़ कर एक जगह लाते हैं और मारते हैं अथवा अधिक से अधिक तीरों से शिकार करते हैं। जंगली सुअर लगाए हुए बीजों को काफी नुकसान पहुंचाते हैं। सियारों की संख्या बहुत अधिक है। विभिन्न तरह की चिडिय़ां मधुर संगीत सुनाती हैं, गरुड़, गिद्ध, बगुला, तोता, कोयल, कौआ, गोरैया, बगेरी और अबावील। कीड़े-मकोड़ों की भरमार के बारे में शायद ही शिकायत सुनने को मिलती है। सबसे ज्यादा परेशानी जाहिर है, दीपक द्वारा होती है जो सभी चीजों को बर्बाद कर देती हैं। मच्छरों से बचाव के बहुत सारे उपाय पहले से मौजूद हैं। काफी संख्या में जुगनू अंधकार में निकलते हैं और भरे जंगल में एकमात्रा लालटेन का काम करते हैं।  
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1885 में लिखा गया लेख। जर्मन से अनुवाद दोमिनिक बाड़ा।

सांप्रदायिकता और प्रांतीयतावाद



जयपाल सिंह मुंडा
 भारतीय राष्ट्रवाद का कीड़ा बहुत पुराना है। यह सच है कि भारतीय राष्ट्रवाद सांप्रदायिकता और क्षेत्रवाद से ऊपर नहीं उठ पाया है न ही स्पष्ट रूप से यह सामंती समाज और धर्म के खिलाफ हो सका है। इसने कभी भी कोई मौलिक क्रांतिकारी मांग नहीं उठाई और इसीलिए व्हाइट हाउस के साम्राज्यवादियों को भारत के मु_ी भर विद्रोहियों को बेहद छोटे स्तर पर भारतीयकरण की तुष्टीकरण कर उनसे निबटने में खास दिक्कत नहीं हुई। धार्मिक कट्टवादियों ने सार्वजनिक मंचों पर कब्जा कर लिया है और वे उन संस्कृतियों पर हमला कर रहे हैं जो उनसे अलग अपनी पहचान रखते हैं। मतभेदों या सहमति के बावजूद विभिन्न राजनीतिक दलों और जो सच्चे हमवतनी हैं उन्हें भी अल्पसंख्यक विरोधी विचार अपनाने के लिए बाध्य किया किया जा रहा है। यह सभी रोग, जो भयावह रूप में व्याप्त हैं, भारतीय राष्ट्रवाद के लिए अनोखे नहीं हैं। ये दूसरे देशों में भी फले-फूले हैं पर वहां के नेता-जनता इनसे ऊपर उठे हैं और राष्ट्रवाद की सीमाओं के परे जाकर उन्होंने अंतर्राष्ट्रीयतावाद और सार्वभौमवाद को अपनाया है। ग्रेट ब्रिटेन में 'लैसेस फेयरÓ (व्यक्तियों और समाज के आर्थिक मामलों में न्यूनतम सरकारी हस्तक्षेप की नीति) या मुक्त व्यापार का इतिहास हमें उन आर्थिक परिस्थितियों के बारे में बताता है, जो राजनीतिक सिद्धांतों के बचाव में आया। विश्व बाजार में ग्रेट ब्रिटेन अपना आधिपत्य तभी तक बरकरार रख सकता है जब तक कि दूसरे देश ब्रिटिश एकाधिकार को यह धमकी देना शुरू नहीं कर देते कि संरक्षणवादी पूंजी की वापसी हो सकती है।
हमारे लोकप्रिय नेताओं ने विरोधाभासी और दमनकारी परिस्थितियों के बीच बहादुरी से संघर्ष किया है। विदेशों में भारतीय छात्रों को खुद को भारतीय मानने में कोई कठिनाई नहीं होती, लेकिन भारत में उनको वही भारतीय राष्ट्रवाद पसंद आता है जिसमें सांप्रदायिक और कट्टरपंथी राजनीति होती है। इस तरह के विरोधाभासों का सबसे बढिय़ा उदाहरण गांधीजी हैं। वह हमेशा रहस्यवादी अहिंसा और पश्चाताप वाली हिंसा के बीच डोलते रहे हैं। पारंपरिक तौर पर बड़ी पूंजी प्रगतिशील अर्थव्यवस्था का कट्टर दुश्मन है। यह बात गांधीजी से अविभाज्य रूप में जुड़ी है क्योंकि उनके पास अपने संरक्षक पूंजीपतियों से अलग होने का साहस बिल्कुल नहीं है। अपने पूर्वाग्रहों और कमजोरियों से वही व्यक्ति ऊपर उठ पाता है जिसके पास अत्यंत तर्कसंगत वैज्ञानिक नजरिया है। सबको पता है कि इस बीमारी की अचूक दवा कहां है तब भी हम ठोस कार्रवाई करने के लिए तैयार नहीं हैं। अगर हम अपने स्वार्थी दावों को त्यागने के लिए तैयार नहीं हैं, तो फिर आपसी सौहार्द, विश्व बंधुत्व, सार्वभौमिक मताधिकार और लोकतंत्र की बात करने का क्या मतलब है? हम अपने अधिकारों के बारे में बहुत अधिक सोचते हैं और उसकी मांग करते हैं, लेकिन हम हद दर्जे की असंवेदनशीलता के साथ अपने प्राथमिक कर्तव्यों की उपेक्षा करते हैं। ऐसी स्थिति में जब हमारे नेताओं ने 20 लाख बंगालियों को मरने के लिए छोड़ दिया है, यह दावा बहुत ही बकवास है कि हम भ्रष्टाचाररहित एक ईमानदार सरकार के लिए राजनीतिक रूप से तैयार हैं। इंग्लैंड में भुखमरी से एक मौत होने पर पूरे राष्ट्र में विद्रोह फूट पड़ेगा और सरकार गिर जाएगी। यहां हमारे नेता उस व्यक्ति को क्लीन चिट दे देंगे जो असंख्य मौतों का जिम्मेदार है और उसके साथ गलबहियां डालकर मजे करेंगे।
मैं अपनी राजनीतिक प्रगति बनाए रखना चाहता हूं, पर इसके साथ ही एकतरफा अधिकारों और विशेषाधिकारोंपर जो जोर है, उससे धीरे-धीरे मुक्त होने की कोशिश भी कर रहा हूं। धर्म, पूंजी और सामंती समाज हमारे दुश्मन हैं। ये बीमारियां हमारे वास्तविक राष्ट्रवाद को निगल रही हैं। इनके खिलाफ साहसपूर्ण संघर्ष चला कर ही भारतीय राष्ट्रवादी एक बेहतर देश की रचना कर सकते हैं। देश को दीमक की तरह खा रहे इन कीड़ों की पहचान मुश्किल नहीं है। हमारा फौरी कार्यभार यही है कि इनका अस्तित्व पूरी तरह से नष्ट कर देने के लिए हम तुरंत ठोस कार्रवाई में उतरें।

(जयपाल सिंह मुंडा का यह अंग्रेजी लेख 'द बिहार हेराल्डÓ, पटना के 13 नवंबर 1945 में छपा था, जिसे शीघ्र प्रकाश्य पुस्तक 'आदिवासियतÓ से लिया है। आजादी के 70 साल बाद पहली बार हिंदी में प्रकाशित होने वाली 'आदिवासियतÓ में जयपाल सिंह मुंडा के 19 चुनींदा लेख और भाषण हैं जिसका अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद और संपादन अश्विनी कुमार पंकज ने किया है। पुस्तक का प्रकाशन प्यारा केरकेट्टा फाउंडेशन, रांची द्वारा किया जा रहा है जो फरवरी दूसरे सप्ताह से पाठकों के लिए उपलब्ध होगी।)

अंधकार की आत्मीयता

काका कालेलकर
 एक बार संताल लोगों की परिस्थिति देखने के लिए हम घूम रहे थे। सांझ के समय एक गांव में आ पहुंचे। हम लोगों ने गांव के लोगों के साथ वार्तालाप शुरू की। धीरे-धीरे प्रकाश कम होने लगा। वहां के एक गृहस्थ से मैंने कहा-'अंधकार हो चला है-दीया ले आयें, तो अच्छा होगा!Ó
आश्र्च से मेरी तरफ  देखते हुए, वे बोले-'दीया? इस गांव में दीया कहां से मिलेगा? हम लोग दीया कभी इस्तेमाल नहीं करते। सूरज छिप गया कि, हमारा कारोबार समाप्त हो जाता है। फिर सुबह की पौ फटी कि हमलोग अपने-अपने काम में लग जाते हैं।Ó
 मनुष्य की बस्ती में अंधेरे का यह साम्राज्य? मैं बड़ी चिंता में पड़ गया। पर, इन लोगों को इसका कुछ भी बुरा नहीं लगता। अंधेरा तो रात को आयेगा ही। उसका दु:ख मानना चाहिए, यह बात भी इन लोगों के दिमाग में नहीं आती। भारत-भूमि, भारतीय जीवन और भारतीय संस्कृति के बारे में बराबर बोलते रहने वाले, मुझे इस दीप-विहीन जीवन की तब तक कल्पना ही नहीं थी। थोड़ी देर सोचने पर मुझे लगा कि, वस्तुत: इन लोगों पर तरस खाने के बदले मुझे अपने आप पर ही तरस खाना चाहिए।
 परिपक्वता आने पर, उपनिषद की प्रार्थना 'तमसो मां ज्योतिर्गमय!Ó से, अंधकार और प्रकाश जगत में सर्वव्यापी और परस्पर भिन्न जीवन-तत्व की बात ध्यान में आयी और प्रकाश के प्रति भक्ति दुगुनी हुई; लेकिन इसके साथ-ही-साथ अंधकार भी एक व्यापक व सार्वभौत तत्व है, इसकी कल्पना स्पष्ट हो जाने से अंधकार का महत्व भी समझ में आया। आध्यात्मिक दृष्टि से, हम अज्ञान को अंधकार कहते हैं। समस्त जीवन का विचार करते समय, जगत का अंधकार और हृदयाकाश का अज्ञान, ये भिन्न नहीं हैं-एक ही हैं, ऐसा प्रतीत हुआ।
 अनुभूति की एक और प्रसंग उपस्थित हुआ। एक बार एक कुटुम्ब पर दारुण संकट उपस्थित हुआ। घर के सब बड़े लोग शोक में डूब गये, लेकिन सिर्फ बालक हंस-खेल रहे थे। यह देखकर मन में विचार आया कि, ईश्वर की कितनी बड़ी कृपा है कि, इन बच्चों को कुटुम्ब पर आये संकट की कल्पना ही नहीं हो सकती। अगर उन्हें सच्ची परिस्थिति की कल्पना हो सकती, तो उनके कोमल हृदय पर आघात होने से उनके प्राण ही निकल जाते। मुर्गी के बच्चों का आकार बनने से पहले, जिस प्रकार उन्हें अंडे के कवच का रक्षण चाहिए उसी प्रकार मन पक्का हो, तब तक के लिए बच्चों को ईश्वर ने यह अज्ञान का कवच दिया है। यह उसकी बड़ी कृपा ही है।
 पर जब हम तत्वदर्शी होकर अथवा तत्व-जिज्ञासु बनकर जीवन का विचार करते हैं, तब जीवन और मृत्यु दोनों परस्पर पूरक, पोषक और एक सरीखे आवश्यक तत्व है, यह बात हमारी नजर में आती है। अज्ञान और ज्ञान-अंधकार और प्रकाश-के संबंध में भी ऐसी ही बात है।
 अंधकार-संबंधी एक और प्रसंग याद आ गया। शांति निकेतन में महर्षि देवेंद्रनाथ टैगोर रात की प्रार्थना के समय दीया हटा देते थे। रवींद्रनाथ ने यही परंपरा आगे चलायी। शांति निकेतन की यह पद्धति गांधीजी को इतनी पसंद आयी कि उन्होंने भी रात की और सुबह की प्रार्थना के समय दीय हटा देने की परिपाटी चला दी।
कितने ही योगी सांझ की, जब प्रकाश क्षीण होकर अंधकार प्रारंभ होता है, तब ध्यान में बैठना पसंद करते हैं। कारण, अंधकार एकाग्रता के लिए-अंतर्मुख वृत्ति के लिए-विशेष सहायक होता है। रात की बेला इतनी सौम्य और शांत होती है कि, अंतर्मुख होकर ध्यान करने में बाहर की परिस्थिति जरा भी बाधक नहीं होती।
 भगवान, हमें ऐसे प्रकाश में से शांतिदायक अंधकार की तरफ ले जाओ, ऐसी प्रार्थना करने के दिन सचमुच ही आ गये हैं। प्राकृतिक प्रकाश में मनुष्यता होती है। प्राकृतिक अंधेरे में आत्मीयता होती है और चिंतन के लिए अवसर भी मिलता है। प्राकृतिक प्रकाश और प्राकृतिक अंधकार दोनों ईश्वरदत्त प्रसाद है। दोनों में मनुष्य का व्यक्तित्व निखरता है और विकसित होता है। प्रकाश प्रवृत्तिपरायण होने के कारण विचलित कर सकता है। अंधकार में आत्मपरीक्षण का स्थान है और इसलिए वह साधना के लिए अनुकूल है।
 अंधकार की भावात्मक कही चाहे अभावात्मक, वह मनुष्य के मन के लिए, हृदय के लिए, आत्मा के लिए, पोषक वस्तु है-बहुत-से बंधन तोड़कर छुटकारा देने वाली हितकर वस्तु है। सारी रात कमरे में प्रकाश रखने की सुभीता होने पर भी सोने वाला व्यक्ति अंधकार का ओढऩा ही पसंद करता है। दिन में सोनेवाला व्यक्ति भी प्रकाश कम करके सोता है। नींद जिस तरह थके हुए व्यक्ति को आराम देकर ताजा करती है, उसी प्रकार अंधकार भी थकान दूर करके ताजगी उत्पन्न करता है। मनुष्य अंधकार में जाकर बैठता है, तो उसे नयी-नयी कल्पनाएं सूझती हैं, भरमाये हुए मनुष्य को संकट से मुक्त होने का मार्ग सूझता है और निराश मनुष्य की आशवा की खुराक मिलती है।
गोवा की राजधानी पणजर में एक बार मेरा व्याख्यान था। लोग एकाग्रता से सुन रहे थे। इतने में बिजली बंद हो गयी और दीवानखाने में निरा अमावस-सरीखा घुप्प अंधेरा हो गया। पेट्रोमैक्स लाने केलिए लोग भागे। थोड़ी देर ठहरकर मैंने समझाया-दीए की क्या दरकार है। आपलोगों ने मुझे देखा है, मैंने आपको देखा है। अपने विषय में हतम रंग चुके हैं। हम अंधेरे में ही व्याख्यान अभी क्यों न चलावें? प्रश्नोत्तर भी एक दूसरे का चेहरा देखे बिना चलाए जा सकेंगे। चेहरे पर का भाव यदि न भी दिखाई दिया, तो आवाज से एक दूसरे की वृत्ति ध्यान में आ सकेगी।
 सब शांत होकर एकाग्रता से सुनने लगे। और, सचमुच ही उस दिन का व्याख्यान और उसके बाद के प्रश्नोत्तर आकर्षक और सजीव हुए। सभा का काम समाप्त होते-होते कोई एक मोमबत्ती ले लाया। मोमबत्ती के पीछे-पीछे अपना विज्ञापन करता पेट्रोमैक्स भी आ गया। उसने लोगों की आंखें चौंधिया दी; पर उसके पक्ष की इतनी बात तो कबूल करनी ही चाहिए कि उसके प्रकाश के कारण सभा से लौटने वाले लोगों को अपने-अपने जूत खोज सकना सहज हो गया।
  इस सभा में मुझे एक नया ही अनुभव हुआ। अंधकार में वक्ता और श्रोता के बीच का संपर्क अधिक अच्छी तरह स्थापित हो सका। आपस में चेहरे दिखाई नहीं देते, मानों इसी के कारण हम सब अभिन्न मित्रा हो गए। एक दूसरे को देख नहीं सकते। इस अड़चन के कारण सबको सबके बारे में सहानुभूति हो गयी थी और अंधेरे की अड़चन की भरपाई करने के लिए सभी लोग, अपनी सज्जनता और आत्मीयता की पूंजी, खुले दिल से व्यवहार करने लगे थे। मुझे लगा कि अंधकार ने एक तरह से उपकार ही किया है। उस दिन अंधकार की इस शक्ति की तरफ मेरा ध्यान पहली बार गया।
-'यात्राओं में झारखंडÓ पुस्तक से साभार।

मेरी मनोरंजक भूलें

राधाकृष्ण
जब स्कूल में नाम लिखाकर पढऩे के लायक पैसे नहीं, साथ खेलने के लायक उपयुक्त साथी नहीं, तमाम खाली-खाली वक्त और करने को कुछ काम नहीं। ऐसी हालत में कोई लड़का क्या कर सकता है? या तो वह पाकेटमारी और लफंगेबाजी करके अपनी आर्थिक स्थिति सुधारेगा या इधर-उधर फटीचरी करके अपनी तबीयत बहलाता रहेगा। उस समय रांची छोटा-सा नगर था और हां पाकेटमारी की कला विकसित नहीं हुई थी। बदमाशी को भी उस समय पेशे के रूप में नहीं लिया गया था।
 सबसे बड़ी बात यह भी थी कि मुझे ऐसे साथी भी नहीं मिले थे और मैं अपने ढंग का अकेला लड़का था। अतएव मैंने अपने मनोरंजन के लिए एक अच्छे उपाय का आविष्कार कर लिया था और उससे मेरा इतना पर्याप्त मनोरंजन होता था कि उसकी याद आने पर मैं बड़ी देर तक हंसता रहता था। करता क्या था कि जब तबीयत नहीं लगती और कुछ फटीचरी का विचार आता, तो मन बहलाने के लिए किसी दूसरे मुहल्ले में चला जाता। वहां सड़क के किनारे उपयुक्त स्थान देखकर कुछ खोजना शुरू कर देता। इधर देखता, उधर देखता, बड़ी तन्मयता के साथ किसी काल्पनिक चीज की खोज करता रहता। विस्मय प्रकाश करते हुए दूसरे लड़के आते और पूछते, क्या हुआ जी, कुछ खो गया है क्या?
मैं उदास लहजे में कहता, क्या बतलाऊं, एक रुपया था। सो, यहीं गिर गया है और खोज रहा हूं तो मिलता नहीं।
उस समय एक रुपये का अच्छा-खासा महत्व था। रुपया पाने के लोभ में वे लड़के भी लग जाते और तन्मयता के साथ खोजना शुरू कर देते। कभी-कभी एक आध बड़ी उम्र के आदमी भी आते और उस काल्पनिक रुपये को खोजने लगते। जब खोजने वाले की संख्या पांच-छह हो जाती और मैं देख लेता कि लोग रुपया पाए बिना खोजना बंद नहीं करेंगे तो मैं वहां से चुपचाप खिसक जाता और ये रुपया खोजने वाले खोजते रहते।
मैं यह भी जानता था कि यह किस्सा एक ही जगह अधिक दिनों तक चलने वाला नहीं है। इसलिए मैं दूर-दूर के मुहल्लों की यात्राएं करता। कभी इस मुहल्ले, कभी उस मुहल्ले में वहां जाकर मेरा काल्पनिक रुपया खो जाता और मैं उसे ध्यानपूर्वक खोजना शुरू कर देता। सदा की तरह उत्सुक लड़के आ जुटते, फिर बड़-बूढ़े आते और इस तरह रुपया न भुलाने का आदेश दे कर वे भी उस रुपये को खोजने लगते। मौका देखकर मैं चुपचाप फिरंट हो जाता।
इस खेल में इतना मजा आता था कि मैं रात के समय भी अकेले में हंसता रहता था। मेरा यह खेल काफी जम गया था और मैंने इस बात की ओर ध्यान भी नहीं दिया कि कुछ लड़कों ने मेरी शैतानी भांप ली है।
इस कारस्तानी के लिए जब मैं एक दिन हिंदपीढ़ी मुहल्ले पहुंचा तो एक लड़का एक लंबी सी डोर का छोर पकड़ मानो मेरे स्वागत में ही खड़ा था। मुझे देखते ही उसने कहा, या, जरा इस डोर को पकड़ कर खड़े हो जाओ, तो मैं तुम्हें एक तमाशा दिखलाऊं।
मैंने पूछा, क्या तमाशा?
उसने कहा, तुम इसे पकड़कर खड़े रहो और मैं जाकर इसका कनेक्शन ग्रामोफोन से मिला देता हूं। तब पांच मिनट में ही तुम्हें तरह-तरह के गाने सुनाई देने लगेंगे।
बड़ा कुतूहल मालूम हुआ। यह तो बड़े मजे की चीज है। मैं डोर पकड़कर खड़ा हो गया और मेरा यह अनजान मित्र एक गली में मुड़ा और ओझल हो गया।
मैं खड़ा हूं और खड़ा हूं। ग्रामोफोन की आवाज आती नहीं। कोई गाना सुनाई नहीं देता। पांच की जगह पंद्रह मिनट बीत गए। तब मुझे संदेह हुआ और मैंने गली में जाकर देखा कि उस डोर का दूसरा छोर एक दीवार की खिड़की में फंसाकर छोड़ दिया गया था। मेरे उस अनजान मित्र का पता नहीं था।
मैंने समझा कि बदला लिया गया है और मुझसे भूल हा गई है।
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धर्मयुग, 16 जनवरी, 1972

डोंबारी बुरू : जहां हुआ थाा अंतिम उलगुलान, पर आज है उपेक्षित

बिरसा मुंडा की अंतिम लड़ाई का गवाह उपेक्षा का शिकार
-बिरसा स्मारक बहुउद्देशीय विकास समिति ने कराया था निर्माण
-समिति के सचिव थे डॉ रामदयाल मुंडा
-तत्कालीन मंडलायुक्त सीके बसु ने किया था स्मारक का उद्घाटन
-9 जून, 1991, बिरसा मुंडा के शहादत दिवस पर हुआ था लोकार्पण
100 फीट ऊंचा है डोंबारी बुरू का स्मारक
30 फीट कास्य की प्रतिमा अब हो रही है जर्जर


आज से ठीक 118 साल पहले नौ जनवरी, 1900 को डोंबारी बुरू पर ब्रिटिश सेना-पुलिस और बिरसा मुंडा के आंदोलनकारियों बीच जंग छिड़ी थी








। सईल रकब से लेकर डोंबारी बुरू तक घाटियां सुलग उठी थीं। 25 दिसंबर 1899 से लेकर नौ जनवरी 1900 तक खूंटी का कई इलाका अशांत था। रांची से लेकर खूंटी-चाइबासा तक। मुंडा आंदोलनकारियों के साथ नौ जनवरी की लड़ाई अंतिम लड़ाई साबित हुई। इसके बाद बिरसा मुंडा के साथियों की धर-पकड़ तेज हो गई। बिरसा मुंडा भी तीन फरवरी, 1900 को बिरसा मुंडा गिरफ्तार कर लिए और नौ जून को उन्होंने अंतिम सांस ली।      
डोंबारी बुरू बिरसा मुंडा के जन्म स्थान उलिहातु से थोड़ी दूर है। उस ऐतिहासिक युद्ध की स्मृति में उस पहाड़ पर एक विशाल स्तंभ निर्माण मुंडारी भाषा के विद्वान जगदीश त्रिगुणायत के प्रयास से किया गया। इसके लिए बिरसा स्मारक बहुउद्देशीय विकास समिति का गठन किया गया और इस समिति के सचिव बनाए गए डॉ रामदयाल मुंडा। ऐतिहासिक लड़ाई की स्मृति को बनाए रखने के लिए स्मारक के गठन का प्रयास शुरू हुआ। इसके बाद पहाड़ पर 100 फीट ऊंचा है डोंबारी बुरू का स्मारक पत्थरों से बनाया गया। यह स्मारक दूर से दिखाई देता है। उस समय मंडलायुक्त थे सीके बसु। उन्हीं के कर-कमलों से स्मारक का उद्घाटन 9 जून, 1991 बिरसा मुंडा के शहादत दिवस पर किया गया था। पहाड़ की तलहटी में एक मंच भी बनाया गया और उसके पास ही 30 फीट की बिरसा मुंडा की कास्य प्रतिमा भी स्थापित की गई। कास्य प्रतिमा का निर्माण नेतरहाट के राजेंद्र प्रसाद गुप्ता ने किया है। इस साल भी अंकित है 1990। प्रतिमा तक पहुंचने के लिए सीढिय़ां बनाई गई हैं, लेकिन आज जर्जर हो चुकी हैं। लोहे की रेलिंग में जंग लग गया है। सीमेंट जगह-जगह से छोड़ रहा है। प्रतिमा का बेस कभी भी क्षतिग्रस्त हो सकता है। पिछले 28 सालों से इसका रंग-रोगन भी नहीं हुआ है।
यहीं पर एक छोटा सा मैदान भी है। एक विशाल मंच भी है। इसके बाद अंदर स्मारक तक जाने के लिए सीमेंटेड सड़क बनी है। यहां तक पहुंचने के लिए सीधी चढ़ान है। यहीं से सइल रकब भी दिखाई देता है। सरकार का विकास केवल बिरसा मुंडा के जन्मस्थल तक ही सिमट गया है, जबकि उनसे जुड़े ऐतिहासिक स्थल उपेक्षा के शिकार हैं। एक महत्वपूर्ण स्मारक, उपेक्षित है। जबकि उस समय यहां एक छोटा सा अस्पताल और स्कूल खोलने की बात भी थी। पर, बिहार के समय जो काम हुआ, राज्य बनने के बाद फिर एक ईंट भी नहीं रखी गई। अलबत्ता स्थानीय लोगों ने ग्राम पंचायत गुटुहातु, मुरहू के सौजन्य से यहां नौ जनवरी 2014 को एक पत्थलगड़ी जरूर कर दी है, जिस पर अंग्रेजों के गोलीकांड में शहीद छह लोगों के नाम दर्ज है।

दो साल में भी नहीं बन सका अलबर्ट एक्‍का का स्‍मारक

बड़े ताम-झाम के साथ रांची राजधानी से 175 किमी दूर परमवीर अलबर्ट के गांव जारी में उनकी जमीन पर मुख्यमंत्री रघुवर दास ने स्मारक समाधि-शौर्य स्थल का शिलान्यास किया था। यह तारीख थी, तीन दिसबंर, 2015। तीन दिसंबर को ही अलबर्ट देश के लिए शहीद हो गए थे। साल था 1971। जारी गांव में शिलान्यास के 22 महीने बीत जाने के बाद आज तक वहां एक ईंट भी नहीं रखी गई।
यह तब है, जब अलबर्ट एक्का के शहीद होने के 44 साल बाद उनके गांव को उनकी मिट्टी नसीब हुई थी, जिस मिट्टी में खेलकूद कर बड़े हुए थे। उनकी मिट्टी त्रिपुरा से ले आई गई। मिट्टी आई तो रांची से लेकर गुमला-जारी तक उत्सव का माहौल था और इस उत्सव के दौरान ही शौर्य स्थल की नींव रखी गई और आज तक वहां एक ईंट भी नसीब नहीं हुई। सरकार शिलान्यास कर जारी गांव को भूल गई। भूली न होती तो कम से कम चैनपुर से उस गांव तक एक बेहतर सड़क बना सकती थी। चैनपुर से जारी गांव का 12 किमी का सफर तय करना किसी पथरीली चढ़ाई से कम नहीं है। जारी गांव अब प्रखंड बन गया है, लेकिन विकास से अब भी कोसों दूर है।
एक ओर भारतीय सैनिकों के प्रति पाकिस्तान की बर्बरता को लेकर लोगों के मन में आक्रोश और दुख है। आक्रोश पाक के प्रति और दुख शहीद सैनिकों के परिवारों के प्रति। हम सैनिकों को लेकर भी राजनीति करने से बाज नहीं आते। सरकार की घोषणाएं कागजों पर ही सिमट गई है। समाधि स्थल की चारदीवारी भी नहीं की गई है। समाधि पर एक छोटा सा क्रास है। मैदान में चारों तरफ गोबर फैला रहता है। गाय-भैंसों की आवाजाही मैदान में होती रहती है।
पुश्तैनी मकान भी ढह गया
अलबर्ट जिस खपरैल के मकान में पैदा हुए थे, वह मकान भी ढह रहा है। यहां कोई नहीं रहता। कुछ गांव में ही 1994 में बने मकान में रहते थे। अब उस पुश्तैनी मकान को देखने वाला कोई नहीं। अलबर्ट एक्का की पत्नी बलमदीना एक्का रुआंसे गले से गुहार लगाती हैं कि उनका वह पैतृक खपरैल का मकान बन जाए। वह कहती हैं, उस मकान से मेरी भी यादें जुड़ी हैं। इसी मकान में अलबर्ट जवान हुए और सेना में भर्ती हुए। इसी घर में खेलते-कूदते बड़े हुए। उनकी यह निशानी है। सरकार ध्यान दे तो यह निशानी बच सकती है और यहां एक स्मारक बन सकता है।
2013 में बेटे को लगी नौकरी
अलबर्ट एक्का के एकलौते बेटे विनसेंट एक्का अपनी मां एवं अपने परिवार के साथ चैनपुर में रहते हैं। यहीं पर अपने बेटों को पढ़ाते हैं। सरकार ने बस दस क_ा जमीन दे दी। उनके बेटे ने खुद ही यहां एसबेस्टस का मकान बनाकर रहते हैं। चैनपुर में 2013 में लिपिक की नौकरी सरकार ने दी।    

थाक-थाक तोमार घोड़ागाड़ी आमरा हेंटे इ जाबो

-डॉ शिवप्रसाद सिंह

 बंगलादेश में चलने वाले स्वाधीनता-संघर्ष में हंसते-हंसते मरने वाले लोगों के बारे में मैं जब भी कोई बयान पढ़ता हूं, मुझे रवि बाबू का गीत याद आने लगता है-
कोन कानने जानिने फूल
गंधे एत करे आकुल
कांन गगने उठे रे चांद
एमन हांसि हंसे
ओ मां आंखि मेलि तोमा आलो
देखे आमार चोख जुड़ालो
ए आलोके नयन रेखे
मुंदबा नयन शेषे
सार्थक जनम आमार
जन्मेछि ए देशे।
  नहीं जानता कि किसी और कानन में ऐसे फूल होते हैं, जिनकी गंध प्राणों का ऐसा आकुल कर सकती है। मुझे नहीं मालूूम कि किसी और गगन में ऐसा चां
द होता है, जो इस तरह खिल खिलाकर हंसता है। हे मां, तुम्हारा इस आलोक को देख कर मेरे नयन जुड़ाते हैं। इसी आलोक को आंखों में लिए चयन बंद कर लूं, यही कामना है। मैं ऐसे देश में जन्मा कि जीवन सार्थक हो गया।
  लाखों लाख व्यक्तियों का यह जोश न तो गद्दारी है न देशद्रोह। इन्हें राज्य और शासन की मर्यादा का ढोल पीटकर दबाया नहीं जा सकता। शासन उस वक्त शैतान बन जाता है, जब वह जनता की इच्छाओं को, जीने और जीते रहने की मामूली ख्वाहिशों को संगीनों की नोंक पर उछालने की कोशिश करता है और आदमी के मामूली सपनों को अपने भद्दे बूटों से कुचल देने की बहशियापाना हरकत करता है। ऐसे शासन को लानत है। पाकिस्तानी फौजी शासन ने खुलेआम इस क्रांति को शरारतपसंदों की छेड़छाड़ कहा और फौजी छावनियों में घोषण की गई कि मुजीब कहता है कि बंगाली बहुमत में हैं इसलिए वे पाकिस्तान पर हुकूमत करेंगे, हमें इन्हें अल्पमत में बदल देना है ताकि ये पंजाबी और पठानों पर शासन का मनसूबा न रख सकंे।
  उसने खुले चौराहे पर लोगों की भीड़ को संबोधित करते हुए कहा-‘सुनो लोगो, संसार के तमाम खूंखार दरिंदों से कहीं बदतर एक जानवर होता है जिसे शासन कहा जाता है। यह निहायत बदसूरत और गलीज झूठ बोलता है। ये अल्फाज सिर्फ इसी की जुबान से निकलते है कि, मैं यानी शासन ही जनता है। हां...हां...हां। यह झूठ है। सरासर झूठ है। निर्माता वह है जिसने जनता को बनाया। उसने इनके उ$पर मुहब्बत और विश्वास की छांव डाली और हुकूमत? हुकूमत वह ध्वंसकारी गिरोह है जो बहुमत को हिकारत से देखती है और जनता पर तलवार और संगीनों की छाया तानती हैै।’ इस तरह बोला जरथुस्ट। नीत्से का यह पागल दार्शनिक आज जाने क्यों बार-बार याद आता है। साढ़े सात करोड़ जनता ने अपने सपनों और अरमानों को पूरा करने के लिए जिस आदमी को चुना, जिसे उन्होंने खुलेआम अपना एकमात्रा रहनुमा और नेता करार दिया, वह देशद्रोही और गद्दार है, जबकि दुनिया भर से भीख मांगकर बटोरे हुए जंगी सामानों की ढेरी पर खड़ा याहिया खान पाकिस्तान का सदर है और वह मुल्क की एकता और हुकूमत की मर्यादा को बचाने के नाम पर जो कुछ कर रहा है, वह पाकिस्तान का अंदरुनी मामला है। कैसी बदसूरत होती है, हुकूमतों के नाम पर बनाई गई यह संवैधानिक साजिश। इसने दुनिया को छोटे-बड़े तमाम हुकूमतों के मुंह सिल दिए हैं। असल में हुकूमतों की भी एक अंतरराष्टीय गिरोहगर्दी होती है, जहां एक दूसरे के जुल्म और अमानवीय कार्य को ढंकना-तोपना गिरोहस्वार्थ की संहिता का परम पवित्रा उद्देश्य होता है।
  हमारे देश के लोग परेशान हैं कि यदि ऐसी घटनाओं का समर्थन दें तो एक दिन नागालैंड, कश्मीर, तमिलनाडु आदि का भी देश से अलग होने से बचाया न जा सकेेगा। कुछ लोग कहते हैं क्या दोनो बंगाल मिलकर एक हो जाएं। पता नहीं इस शंका पर पागल दार्शनिक जरथुष्ट क्या कहता पर एक मामूली बौद्धिक भी आसानी से कह सकता है कि क्या पूर्वी पाकिस्तान की घटनाओं से इतना भी नहीं सीख पाए कि मुहब्बत और विश्वास की छाया के नीचे ही एकता होती है, संगीनें और तलवारें एकता नहीं पैदा कर सकतीं।
  हुकूमत हमेशा झूठ बोलती है। जनता एक न एक दिन अपने खून का हिसाब मांगती है, उसे जिस दिन यह विश्वास हो जाएगा कि अलगाव की बात करने वाले गिरोह-स्वार्थ की संहिता का पालन कर रहे हैं, वह उन हुकूमतों को इसी तरह दफना देगी, जैसे बांगलादेश में हो रहा है। एकता एक दूसरे की मदद से बेहतर जीवन जीने के बुनियादी प्रश्न पर टिक सकती है। यदि ऐसा नहीं है तो वह नकली एकता है। सवाल इस या उस हिस्से का नहीं, सवाल इंसान का है, जनता का है। आप जनता के नाम पर कुछ ही समय तक अपना उल्लू सीधा कर सकते हैं। कागज की नाव हमेशा नहीं चला करती। इसलिए हमें बांगलादेश की घटनाओं पर नए सिरे से सोचने की जरूरत है। बहुत बरसों के बाद इस उप महाद्वीप की जनता और नेताओं के सामने ऐसा अवसर आया है कि हम स्वार्थ और संकुचित सीमाओं से बाहर निकल कर कठोर यथार्थ की जमीन पर खड़े होकर सही ढंग से सोचना शुरू करें। इस नव चिंतन में बहुत-सी चीजें टूटेंगी, जिन से हमारा मोह भी हो सकता है, पर मोहविद्ध स्थिति से छूटकारा पाने का सुअवसर भी जातियों को कभी-कभी ही मिलता है।
   स्वतंत्राता जन्मसिद्ध अधिकार है, कहने वाला मांडले के जेल में बंद कर दिया गया। यह स्वतंत्राता शब्द भी खूब छलावा है। स्वतंत्राता के नाम पर आज कल एक-से-एक नारे प्रज्ज्वलित हो गए हैं। हम इसीलिए असली और नकली स्वतंत्राता में भेद करना होगा। असली स्वतंत्राता विश्वव्यापी मानवता की जरूरत है, नकली स्वतंत्राता गिरोहस्वार्थ वालों की सत्तालिप्सा का आवरण होती है। मैं कम्युनिस्ट शासन मंे व्यक्ति की सत्ता और स्वतंत्राता को नकारने वाली हुकूमत की लफ्फाजी का सख्त विरोधी हूं, पर मुझे फ्रेडरिक एंजिल्स का यह कथन हमेशा ही सही और सार्थक लगता रहा है कि ‘स्वतंत्राता प्राकृतिक नियमों को इन्कार करने की काल्पनिक स्थिति का नाम नहीं है, बल्कि मनुष्य की जरूरयात को पूरा करने की छूट की स्वीकृति है।’ मनुष्य की मामूली जरूरतें पूरी करने की भी जहां छूट नहीं होती, वहीं असली स्वाधीनता संघर्ष जन्म लेता है। यह असली स्वाधीनता मनुष्यता की स्वाभाविक अस्तित्वमूलक विशेषता है। यह कभी विभाजित नहीं होती। कभी धर्म, राष्ट, संस्कृति आदि की मामूली सीमाओं से घेरी नहीं जा सकती। इस स्वाधीनता के सैलाब को मजहब या राष्टीय एकता के नाम पर कुचला नहीं जा सकता और इसीलिए हर मनुष्य का यह स्वधर्म है कि मनुष्यता की इस अविभाज्य आत्मिक मांग को पूरा समर्थन दे। बांगलादेश की स्वाधीनता का संघर्ष असली स्वाधीनता संघर्ष है क्योंकि वह संघर्ष वहां की जनता के जीवन की मामूली जरूरतों को पूरी न हो सकने की स्थिति से जन्मा है, इसलिए यह एक आंतरिक असली और बुनियादी स्वाधीनता-संग्राम है। इसे स्वीकार करने में धर्म, संविधान, राष्टीयता, अंतरराष्टीय तौर-तरीकों की दुहाई देकर हिचकना अमानवीय और मानवधर्म के विपरीत है।
 असली स्वाधीनता संग्राम एक प्रकाश स्तंभ होता है जो न केवल अपने मूल स्थान में अंधकार और तमस की जड़ता से टकराता और उस का विनाश करता है, बल्कि अपनी ओर सहानुभूति और मानवधर्मिता के भाव से देखने वालों को भी नया प्रकाश और उत्साह प्रदान करता है। असली स्वाधीनता संग्राम को राजनीतिक मतवादों की घुसपैठ से धूमिल और निरर्थक बनाने की कोशिशें भी कम नहीं होतीं, बल्कि प्रायः इन से बच पाना असंभव नहीं तो कठिन तो अवश्य ही रहा है, पर कभी-कभी प्रकृति मनुष्यता को सही दिशा-निर्देश्श देने के लिए शुद्ध स्वाधीनता-आंदोलन को जन्म देकर उदाहरण भी पेश करने का काम करती रहती है। आज यदि   मुजीब अमेरिकी, चीनी या रूसी मतवाद का पिट्ठू होता तो उसे बिना मांगें अतुल सहायता मिल जाती पर तब यह भी खतरा होता कि एक नया वियतनाम पैदा हो जाता, जहां सत्य और असत्य का ऐसा गड़बड़झाला खड़ा कर दिया जाता कि पता ही नहीं चलता कि जनता और फौज की आवाज में फर्क क्या होता है। मुजीब इस दृष्टि से प्रकृति का निर्वाचित ऐसा प्रतिनिधि है जो मनुष्यता को ही अपना नारा और उद्देश्य बनाकर चला है किसी मतवाद और झंडे को नहीं। इसी कारण उसकी लड़ाई अमानवीयता के खिलाफ मानवता की लड़ाई बन गई है। इसी वजह से इस लड़ाई की जोखिम भी बढ़ गई है। मानवीयता को वरीयता देने के कारण मुजीब ने क्रांति में करुणा को जोड़ने की कोशिश की है। यानी लोहिया की शब्दावली में ‘क्रांति में करुणा का मेल सिविल नाफरमानी है।’ सिविल नाफरमानी के सब से बड़े उस्ताद लोहिया ने शायद यह नहीं सोचा कि दुर्दांत सत्ता सहित नाजीवाद की पुनरावृत्ति भी कर सकती हैै। लोहिया को शायद विश्वास था कि दुनिया आगे बढ़ रही है, इसलिए नाजीवाद का गड़ा मुर्दा क्यों कर खड़ा हो सकता है, पर हुआ और यह मानना पड़ेगा कि सिविल नाफरमानी के फलसफे में इस लड़ाई के बाद थोड़ी तरमीम करनी पड़ेगी। सिविल नारफरमानी कत्लेआम के सामने अहिंसक नहीं रहेगी, यह जोड़ना लाजिमी हो गया है। लोगों का पुराना शक फिर सिर उठा रहा है यानी गांधी का सत्याग्रह अपेक्षाकृत सभ्य अंग्रेजों के सामने और लोहिया की सिविल नारफरमानी देशी सत्ता के खिलाफ ही कारगर हो सकती है।
  वस्तुतः मुजीब का स्वाधीनता-संग्राम एक ऐसी घटना है जो कई तरह के मुद्दे उभारेगी। इस लड़ाई ने या क्रांति ने कई चीजों पर सोचने के लिए विवश किया है। यह पहली विरथी क्रांति है अर्थात् इस लड़ाई के सामने मजहब, मतवाद या क्रांति के परिचित स्कूलों अर्थात माओ, चेग्वारा अथवा लेनिन आदि की क्रांतियों के नक्शे बेकार हो गए हैं। क्रांति कोई सिक्का नहीं कि उसे किसी न किसी छापे के बिना ढाला ही नहीं जा सकता। क्रांति जनता की आत्मा का आक्रोश है, रुद्रभाव है, जो अपनी अभिव्यक्ति की शक्ल खुद तलाश कर लेता है। मुजीब का स्वाधीनता संग्राम क्रांतियों की नई-नई पोशाकांे या लबादों के बिना सहज स्वाभाविक गति से पांव-प्यादे सामने आया है, जो कि मनुष्यता के भविष्यत संघर्षों को एक नया मोड़ देने का कार्य करेगा। अन्याय से जूझने का यह नया प्रयोग और इतने शहीदों का खून बेकार नहीं जाएगा। इसमें सफलता-असफलता के प्रश्न का कोई खास मतलब नहीं। सभी जानते हैं कि असफल क्रांतियां देशद्रोह बन जाती हैं। सवाल क्रांति के उसूलों और उसको चलाने के तरीकों का है। सफल होने या असफल होने का उतना नहीं।
  इस तरह की क्रांतियां हमेशा आंतरिक और बौद्धिक चेतना से खाद और खुराक ग्रहण करती हैं। बुद्धि को गिरवी रखकर क्रांति का फल संभवतः आसानी से या कम दिक्कत से पाया जा सकता है। पर बिना गिरवी रखी बुद्धि को क्रांति के दौर में जिन खूनी घाटियों से गुजरना होता है, उसे भुक्तभोगी ही जान सकता है। इसका सच से कड़वा स्वाद बांगलादेश के बौद्धिकों को चखना पड़ा है। अपनी बुद्धि पर विश्वास करना स्वाभिमान भले लगे खतरनाक कम नहीं होता। मुजीब और उसके साथी इसे जानते थे। इसका परिणाम भी सामने है। बांगलादेश को सामूहिक बौद्धिक चेतना को बंदूकों से उड़ा देने का प्रयत्न शैतान की बेइंतहा अक्लमंदी का प्रमाण है, पर शैतान हमेशा ही यह गलती करता है, शायद यही उसकी विशेषता भी है कि वह असली स्वतंत्राता की तरह असली बौद्धिकता को भी क्षेत्राीय वस्तु मान लेता है। बांगलादेश के बौद्धिक, जो अब नहीं है, अपनी चेतना की विरासत, विश्व के उन तमाम बौद्धिकों के नाम छोड़ गए हैं, जो बुद्धि को गिरवी रखना मृत्यु से बदतर मानते हैं। बांगलादेश की यह विरथी क्रांति वस्तुतः विश्व के बौद्धिकों के लिए बहुत बड़ी चुनौती है।
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डॉ शिवप्रसाद सिंह हिंदी के जाने-माने लेखक। ललित निबंधकार, उपन्यासकार। यह लेख साप्ताहिक हिंदुस्तान, एक मई, 1971 के अंक में प्रकाशित हुआ था
           

अपने अपने जयपाल सिंह

प्रो गिरिधारी राम गौंझू

गोपाल दास मुंजाल और बलवीर दत्त दोनों जन्मना पंजाब (अब पाकिस्तान) के पंजाबी भारतीय लेखक, संपादक, पत्रकार, साहित्यकार और राँची निवासी हैं। दोनों जयपाल सिंह से गहरे रूप से जुड़े हुए हैं। गोपाल दास मुंजाल की 16 जनवरी 1955 अंक 3 ‘अबुआ झारखण्ड’ जयपाल सिंह विशेषांक पुस्तिका के रूप में प्रकाशित हुई। इसमें आवरण पृष्ठ पर लिखा है - ‘मुण्डा जाति का अनमोल रत्न’ - ‘लाखों लाख झारखण्डियों के मरङ गोमके श्री जयपाल सिंह जिन्होंने राजनीतिक महारथियों को विस्मय चकित सा कर रखा है।’
और बलबीर दत्त की पुस्तक आयी झारखण्ड निर्माण के 17 वर्षों की तपस्या के उपरान्त अप्रेल 2017 में - ‘जयपाल सिंह एक रोमांचक अनकही कहानी (जीवनी, संस्मरण एवं ऐतिहासिक दस्तावेज)’ इसके अनुक्रम के कुछ प्रकरण देखिए वे जयपाल सिंह को किस नजरिए से देखते रहे हैं -
“1. जयपाल सिंह एक रोमांचक अनकही कहानी,
2. एक जीनियस का दिशाहीन सफर
3. जयपाल सिंह का रहस्मय जीवन
4. इतिहास की निष्ठुर शक्ति
5. राँची के लोगों से जयपाल सिंह की शिकायत
6. अनमोल प्रतिभा का दुरूपयोग
7. निष्ठा और साहसपूर्ण प्रतिबद्धता की कमी
8. पुस्तक में बहुत ही कड़वीं सच्चाइयाँ
9. धर्म परिवर्त्तन का डर
10. फाइनल (अमस्टरडम ओलम्पिक हॉकी 1928) में नहीं खेले जयपाल
11. क्यों नहीं बन सके आई. सी. एस. अफसर?
12. ब्रिटेन के प्रति वफादारी
13. मुख्य मंत्री (श्री कृष्ण सिंह-बिहार) से तीखी तकरार-नतीजा सिफर
14. बेकार की कसरत
15. गांधी जी की राँची यात्रा पर हड़ताल का विचित्र आह्वान
   (जयपाल सिंह का)
16. कहाँ गाँधी कहाँ जयपाल ?
17. दोनों नावों पर सवार
18. सुभाष बाबू मुझे जेल जाने से डर लगता है!
19. डॉ0 राजेन्द्र प्रसाद से जयपाल सिंह की लंबी रंजिश
20. बिहारी विरोधी रवैया
21. जयपाल सिंह का मुसलिम लीग का फंड
22. सहयोगियोें की किनाराकशी
23. राँची में जयपाल सिंह के विरूद्ध विशाल भंडा फोड़ रैली।
24. आदिवासियों के विदोहन का आरोप
25. किस्मत की रोटी
26. झारखण्ड या नागपुरी प्रदेश
27. चुनाव में हारते हारते बचे जयपाल सिंह
28. तन कांग्रेस में मन झारखण्ड पार्टी में
29. भूमि अधिग्रहण व विस्थापन - कहाँ थी झारखण्ड पार्टी
30. जयपाल बनाम कार्तिक
31. जिंदगी की दो महागलतियाँ
32. मदिरा प्रेम का अनर्थ
33. नायक पूजा एक अभिशाप
34. जवानी का बुढ़ापा बनाम बुढ़ापे की जवानी
35. नेहरू ने धोखा दिया कितना सच कितना झूठ?
36. जयपाल सिंह को चुनौती: कार्यकर्त्ताओं के नाम हरमन लकड़ा का    
   खुला-पत्र।
37. झारखण्ड आन्दोलन के साथ विश्वास घात आदि“
लहलहाते धान के खेतों से कोई घास काटता है कोई धान। इन प्रकरणों से लेखक पाठकों को क्या बताना चाहते हैं?
श्री गोपाल दास मुंजाल ने - मरङ गोमके जयपाल सिंह : एक महान व्यक्तित्व की भूमिका में किन-किन विशेषणों का प्रयोग किया है देखिए --
“- नेतृत्व की अदभुत क्षमता
- महान आदिवासी
- मुण्डा जाति का वीर पुत्र
- महान व्यक्तित्व का केवल रेखा चित्र
श्री मुंजाल ने इस छोटी पुस्तक के आरंभ में जयपाल सिंह के ओलम्पिक हॉकी खेल के वर्णन से किया है --
“सन् 1928 के अमस्टरडम में होने वाले नवें ओलम्पिक में श्री जयपाल सिंह ने हॉकी खेलने में अपने जिस अद्भुत कौशल का प्रदर्शन किया था उसे देख कर खिलाड़ियों का सारा संसार बिस्मित तथा मुग्ध हो उठा था। उस दिन विश्व के महान खिलाड़ियों ने 25 वर्षीय जयपाल को एक स्वर से सारे संसार का सर्वश्रेष्ठ हॉकी खेलने वाला स्वीकार किया। जयपाल भारतीय हॉकी टीम के कैप्टन थे। इनके नेतृत्व में ही उस वर्ष भारत ने हॉकी का विश्व चैम्पियनशिप प्राप्त किया था। उस दिन प्रथम बार सारी दुनिया ने जयपाल सिंह मुण्डा को अद्भुत क्षमता के दर्शन किये थे।“(पृ0 1)
- जिस जाति ने बिरसा भगवान जैसे देश भक्त, वीर तथा त्यागी नेता को जन्म दिया था, आप उसी मुण्डा जाति के अनमोल रत्न हैं। (पृ01)
- दृढ़ चरित्र
- नेतृत्व क्षमता
- पढ़ने-लिखने की विलक्षण प्रतिभा
- छात्र-गुरु जन विस्मय भरी प्रशंसा करते थे
- अपने क्लास में सदा प्रथम आता था
- फुटबॉल का कुशल खिलाड़ी
- स्कूली हॉकी टीम का कैप्टन
- सभी हिन्दू मुसलमान ईसाई छात्र अपना नेता मानते थे।
- समाज कल्याण
- जन्म सिद्ध नेता
- दृष्टिकोण विस्तृत
- संेट पॉल राँची के प्राचार्य का कथन - प्रत्येक दृष्टिकोण से उसके
  चरित्र की श्रेष्ठता एवं दृढ़ता का मैं आरंभ से ही प्रशंसक रहा हूँ।(पृ02)
- रेव. केनोन कौसग्रेभ जयपाल सिंह की प्रतिभा से इतने अधिक
  प्रभावित तथा मुग्ध हुए कि सन् 1919 में उन्हें उच्च शिक्षा दिलाने के लिए अपने साथ ही इंग्लैण्ड ले गए।(पृ0 2)
- इंग्लैण्ड के ब्रिटिश शिक्षक एच.ए. जेम्स ने  17-6-1924 के पत्र में लिखा - “जयपाल एक अन्य  श्रेष्ठ विद्याभ्यासी  तथा दृढ़ चरित्र का युवक है। मेरा यह विश्वास है कि यह युवक जीवन के जिस क्षेत्र में भी प्रवेश करेगा, उसी क्षेत्र में यह असाधारण   सफलता प्राप्त करेगा। जयपाल में एक दीप्ति है जो इसे हर कहीं प्रकाशमान रखेगी।“(पृ02)
- इनके कॉलेज के एक प्रो0 जे. एल. स्टोक्स ने अपने 18-6-1924 के पत्र में लिखा है वह  (जयपाल सिंह)  - जब भाषण देता है तो श्रोताओं को जैसे किसी मंत्रवल से मुगध सा कर लेता है। जयपाल के वक्तव्य, श्रोताओं में एक अविचल  तथा  अखण्ड  विश्वास की सृष्टि करने की क्षमता से भरे  होते  हैं।  इसके  बोलने  का   ढंग  श्रोताओं को इस पर भरोसा रखने के लिए सशक्त रूप से प्रेरित करता है।(पृ0 3)
- श्री ध्यानचंद, श्री मैनेजर तथा श्री शौकत अली आदि भारत के प्रसिद्ध खिलाड़ी इस टीम में सम्मिलित हुए थे, श्री एलेन गोलकीपर थे। एक महान खिलाड़ी तथा कैप्टन के रूप में हमारे मरङ गोमके श्री जयपाल सिंह ने ही इस (1928 अमस्टरडम ओलम्पिक में) टीम का नेतृत्व किया था। (पृ04)
- सन् 1932 में आपको  (जयपाल सिंह को)  लोसएजेंल्स में  होने वाले ओलियम्पिक में पुनः भारतीय टीम का कैप्टन बनकर जाने का  आमंत्रण दिया गया। किन्तु  कम्पनी के  कार्यों से अवकाश  नहीं मिल पाने के कारण आप उसमें सम्मिलित नहीं हो सके। (पृ04)
गोल्डकोस्ट कोलोनी के गवर्नर श्री रोन्टोन थोमस को लिखे 4-12-1933 के एक पत्र में रेव. ए. जी. फ्रेजर एम.ए., सी.बी.ई. ने लिखा है - “यह युवक, जयपाल सिंह शिक्षा देने की अदम्य भावना तथा योग्यता से ओत-प्रोत है। यह एक श्रेष्ठ खिलाड़ी, श्रेष्ठ व्यवस्थापक, सुसंस्कृत तथा अनेक भाषाओं का विद्वान है। शिक्षक के कार्य की इसकी दक्षता असाधारण है। अपनी शिक्षा संस्था में व्यापारिक शिक्षा देने के लिए जयपाल सिंह से और अधिक योग्य शिक्षक मिलने की आशा मुझे तनिक भी नहीं है। इसकी विद्वता बहु-प्रशंसित तथा व्यक्तित्व आकर्षक है।(पृ05)
एलेक पेटरसन ने रेव. ए. जी. फ्रेजर को बधाई देते हुए लिखा - आप बड़े ही भाग्यवान हैं जो आपको अपने कॉलेज के लिए श्री जयपाल सिंह जैसे योग्य तथा विद्वान व्यक्ति प्राप्त हुए हैं। (पृ0 5)
- जयपाल सिंह के प्राचार्य रेव. केनोन कौसग्रेभ ने लिखा है - मैं भारत के अपने दस वर्षों के आवास  में जयपाल से  अधिक दृढ़ चरित्र तथा प्रभावशाली व्यक्तित्व के व्यक्ति से नहीं मिला हूँ।(पृ05)
- कलकत्ता हाई कोर्ट के जज श्री टोरिक अमीर  अली ने 27-8-1936 के एक पत्र में लिखा है - ‘जयपाल  सिंह के   व्यक्तित्व में एक ऐसा शक्तिशाली चुम्बक है कि जो  व्यक्ति  एक   बार उनसे मिल लेता है फिर वह उनसे भागने की अपनी सारी शक्ति खो बैठता है।’ (पृ0 6)
- बिहार के तत्कालीन गवर्नर ने 22-3-1937 के पत्र में लिखा - ‘मुझे यह जानकर हार्दिक प्रसन्नता हुई कि आप राजकुमार कॉलेज, रायपुर में सिनियर असिस्टेंट मास्टर के पद पर नियुक्त हो कर भारत पधार रहे हैं।’ (पृ0 6)
- राजकुमार कॉलेज रायपुर के प्रिन्सिपल ने एक पत्र में लिखा है - “मैं अपने कॉलेज के शिक्षक पद के लिए जैसे व्यक्तित्व की कामना करता था उसे मैंने आप के (जयपाल सिंह के) रूप में पा लिया है। आप का अध्ययन तथा चरित्र असाधारण है।  अध्यापन के  आपके अनुभव भी अद्वितीय हैं। छात्रों पर  पड़ने वाली  आप  के व्यक्तित्व के प्रभाव की मात्रा को देख कर तो विस्मय सा होता है।(पृ0 6)
- चारों ओर एक नयी आशा की लहर नाच रही। इस विचार से कि वीर बिरसा मुण्डा के 40 वर्षों की लम्बी अवधि के बाद आज उन्हें पुनः एक दृढ़, वीर, तेजस्वी तथा विद्वान मुण्डा (जयपाल सिंह के) का ही नेतृत्व प्राप्त होगा। जनता उत्साह तथा उल्लास से भर आयी। (पृ0 8)
- जनता  ने  जयपाल  के  दर्शन  किये - गोल  चेहरे पर अन्याय के सम्मुख  कभी  नहीं  झुकने  वाली विशिष्ट मुण्डा - रेखाएँ,  सहज ही अपनी ओर खींचने वाली आकर्षक  मुद्रा,   जनता के मन में एक क्षण को भी यह नहीं आया  कि विलायती शिक्षा तथा वेश-भूषा के कारण जयपाल मुण्डा उनसे कुछ  भिन्न हो  गया है। जयपाल आदिवासियों का था और आदिवासी जयपाल के थे। (पृ0 9)
- ऐसे विलक्षण जयपाल सिंह को उसके समस्त पृथक-पृथक गुणों की विस्तृत नाप-जोख के साथ रखने के लिए मैं शीघ्र ही पृथक से एक मोटा ग्रंथ लिखूँगा। (पृ0 11)
- हम अपने उन समस्त आदिवासी भाइयों के प्रति जो देशी राज्यों, ब्रिटिश-भारत तथा संसार के अन्य  भागों  में  बस  रहे  हैं अपनी सहानुभूति प्रकट करते हैं। हम उन्हें विश्वास दिलाते हैं कि स्वतंत्रता प्राप्त करने के संघर्ष में हम सब एक हैं तथा एक ही रहेंगे। (पृ0 12)
आदिवासीस्थान के विरोध में जयपाल सिंह ने कहा था - “मुझे भय है कि अपने आप को इस तरह पृथक रखने की कोई भी चेष्टा अन्ततः हम आदिवासियों के लिए घातक सिद्ध होगा। हमें भारत के सम्पूर्ण राष्ट्रीय जीवन में (उसके एक अंग की तरह) अपने लिए एक पृथक प्रान्त चाहिए। जिसका प्रशासन हमारे हाथ में हों तथा हम अपनी संस्कृति के अनुरूप ही जिस प्रशासन के द्वारा अपनी आर्थिक, सामाजिक तथा राजनैतिक स्थिति को अपने ढंग से उन्नत कर सकें।“ (पृ0 12)
- इग्नेस बेक का कहना  है -  मेरा  विश्वास  है  कि आदिवासियों में जयपाल के अतिरिक्त अन्य कोई भी  व्यक्ति  सच्चाई  तथा निर्भीकता का प्रदर्शन  इतने उच्च स्तर पर नहीं  कर  सकता   था।“ (पृ0 13 - मुख्यमंत्री बिहार श्री कृष्ण सिंह  के  बंगले  में   जयपाल के उद्गार के संबंध में)।
मरङ गोमके जयपाल सिंह के विरोधियों के उदृगार को भी श्री गोपाल दास मुंजाल ने इस प्रकार रखा है -- “सारे बिहार में राजनैतिक विरोध  जितना  जयपाल सिंह का हुआ है, उतना अन्य किसी  भी दूसरे  नेता का  नहीं  हुआ  है।  -  विरोधी राजनैतिक संस्थाओं के समाचार  पत्र  इन्हें अपने मन पसंद की, तरह तरह की उपाधियाँ  (गालियाँ)  देते  रहे हैं - 1. जयपाल प्रतिक्रियावादी हैं, 2. जयपाल बिहार  का  राजनैतिक  शत्रु  न  एक,  3.  जयपाल  बिहार  का राहू,
4. राजनैतिक खिलाड़ी  इत्यादि।  किन्तु जयपाल ने कभी इस ओर ध्यान  भी  नहीं दिया, वह अन्धड़ और तूफान की गति से अपने रास्ते चलते चला। उसका विचार  है कि जो लोग जान बूझ कर आदिवासियों  की  उन्नति के  मार्ग में रोड़े अटकाए हुए हैं वे ही प्रतिक्रियावादी हैं,  वे ही  मानवता  के राहू हैं वे बिहार का सत्यानाश करने पर तुले हुए हैं तथा भारत के सबसे बड़े शत्रु भी वे ही हैं।“
आदिवासियों को झारखण्ड में आदिवासियों की तरह रहने तथा जीने का पूर्ण अधिकार है। “वे बिहार के गुलाम बन कर नहीं रहेंगे।“ श्रीजयपाल सिंह का यही नारा है - वे यही चाहते हैं क्या दुनियाँ का कोई भी न्याय पसन्द व्यक्ति यह कह सकता है कि जयपाल की यह मांग, आदिवासी महासभा का यह सिद्धान्त, झारखण्ड पार्टी का यह नारा अनुचित है। क्या देश के स्वतंत्र नागरिक की तरह जीने के अधिकार की चाहना प्रतिक्रियावादिता है। क्या अन्याय के विरूद्ध आवाज उठाना देश की शत्रुता हैं यही वे प्रश्न हैं जो श्री जयपाल सिंह बार-बार अपने उन भाइयों के सम्मुख रखते हैं जो उन्हें प्रतिक्रियावादी, राहु तथा देश का शत्रु नम्बर एक कहते हैं।(पृ0 13)
- निकट रहने  वाले  साथियों  का  कहना है  -  समय आया है जब जयपाल लगातार तीन-तीन दिनों तक भूखे  रह  गए हैं।   चने फांक कर पानी पी लिया है।  किसी को कहा  तक नहीं और अपनी तूफानी गति से कार्य करते रहे हैं।  आज  झारखण्ड  क्षेत्र के प्रत्येक घर में जिस राजनीतिक चेतना का स्फुरण दिखलायी  दे   रहा है वह सब केवल जयपाल सिंह के महान व्यक्तित्व अथक   श्रम  तथा इनके राजनीति की अद्भुत सूझ-बूझ के द्वारा ही संभव हो पाया है। (पृ0 14)
- पंडित जवाहर लाल नेहरू  को  संबोधित  करते  19-12-1946   के संविधान सभा में जयपाल सिंह ने कहा था - “हम चाहते हैं कि हमारे साथ ठीक वैसा ही वर्त्ताव किया जाए जैसा कि अन्य   किसी भी दूसरे भारतीय  के  साथ  किया  जाता  है। ----   भारत  के गैर आदिवासियों के द्वारा  परिचालित  विद्रोहों तथा   अराजकता के  द्वारा निरंतर शोषित तथा विस्थापित किए  जाना   ही मेरे  लोगों का सम्पूर्ण इतिहास है। फिर भी  मैं  पंडित जवाहर लाल नेहरू  के  वचन  पर विश्वास करता हूँ ----- अब  हम   अपने  जीवन का एक नया अध्याय आरंभ करने जा रहे हैं -   स्वतंत्र भारत का एक नया अध्याय, जहाँ सब लोगों को समान सुअवसर है,  जहाँ कोई  भी  उपेक्षित नहीं रहने पाएगा। मेरे समाज में जाति भेद का कोई प्रश्न नहीं हैं। हम सब बराबर हैं। (पृ0 14-15) आइए हम सब देश की  स्वतंत्रता  के  लिए साथ ही जूझें, साथ-साथ बैठे तथा साथ ही साथ काम करें। तभी हम वास्तविक स्वतंत्रता को प्राप्त करेंगे। (पृ0 15)
- झारखण्ड पार्टी  की  स्थापना  ने  झारखण्ड  क्षेत्र के  जन  जन में राजनैतिक चेतना की भेरी फूँक दी। --- प्रत्येक व्यक्ति   ‘झारखण्ड एक पृथक प्रान्त’  के  नारे से  गुंजायमान हो  रहा है।   इस  सम्पूर्ण जागृत, चेतना तथा उल्लास के पीछे जो शक्ति है,   वह  शक्ति  इस महान मुण्डा जयपाल सिंह के जादू भरे व्यक्तित्व की  ही है। (पृ0 15)
- भारत के प्रधान मंत्री  पंडित जवाहर लाल नेहरू  आप  के (जयपाल सिंह के) गुणों पर मुग्ध हैं तथा आप  का  बहुत  सम्मान   करते  हैं। दिल्ली के राजनैतिक तथा  सरकारी क्षेत्रों में किसी   महत्वपूर्ण पद पर कार्य करने वाला शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति हो   जो  इन्हें (जयपाल सिंह को) नहीं जानता हो तथा इनसे प्रभावित नहीं हो। (पृ0 15)
भारत स्थित विदेशी राजदूतों में से प्रायः सब के सब इनके प्रशंसक तथा मित्र हैं। हमारे मरङ गोमके दिल्ली के राजकुमार हैं। (पृ0 16)
ये कुछ उद्गार है जयपाल सिंह विशेषांक अबुआ झारखण्ड पत्र के जो श्री गोपाल दास मुंजाल द्वारा लिखे तथा संकलित किए गए हैं। दूसरी ओर बलबीर दत्त की जयपाल सिंह पर 54 वर्षों के कठिन अन्वेषण के बाद (37$17 वर्ष) प्रकाशित हुआ है। दोनों एक पंजाब (पाकिस्तान) के संपादक, पत्रकार तथा साहित्यकार हैं। दोनों तराजू के पलड़े पर तौल कर देखे मरङ गोमके जयपाल सिंह क्या हैं।





बिरसा का गांव

सरवदा चर्च पर पहला तीर चलाया गया
खूंटी गांव कांप उठा।
डिप्टी कमिश्नर आए।
वह बिरसा का पीछा कर रहे थे।
बुद्धिमान लोग (बिरसा के अनुयायी) डोम्बारी पहाड़ पर चले गए।
उन लोगों ने  (ब्रिटिश सैनिकों का) मुंह बनाया
और चुनौती दी।
फौजों (ब्रिटिश) ने उन पर गोलियां चलाईं।
एक मुंडा बच्चा जमीन पर गिरी अपनी मृत मां का दूध पीने की 
कोशिश कर रहा था।
 (अंग्रेज) महिला (डिप्टी कमिश्नर की पत्नी) बहुत द्रवित हुई।
बच्चे का क्या हुआ?
यह कोई खुशी की बात न थी।
रांची से जब मुरहू प्रखंड होते हुए सुदूर उस सरवदा गांव में पहुंचे, जहां 1881 से विशाल चर्च खड़ा हुआ था, तो अचानक 117 साल पहले रचित यह गीत कानों में गूंजने लगा। बिरसा की बहादुरी में रचित यह गीत अपने समय का इतिहास भी दर्ज करता है। जब यह चर्च बना, तब खूंटी जिला नहीं बना था। वह रांची का अनुमंडल भर था। आज जरूर ताज्ज्बुब करेंगे, जब यह चर्च बना। उस समय इतनी आबादी भी नहीं रही होगी और जाने का रास्ता तो अब बना है। उस समय, मिशनरियों के विश्वास और धैर्य को याद कीजिए। यहीं पर जर्मन के विद्वान फादर हाफमैन रहते थे, जहां दो बार बिरसा के अनुयायियों ने हमला किया था। चर्च के पीछे ही वह ऐतिहासिक पहाड़ी सिंबुआ है, जहां बिरसा की बैठकें भी होती थीं। यहां रह रहे फादर जेवियर केरकेट्टा कहते हैं कि इसे बनाने के लिए कलकत्ते से बैलगाड़ी से लादकर सामान यहां आया था। करीब सौ फीट से ऊंची इसकी मीनार होगी, जो दूर से ही दिखाई देती है। सरवदा का चर्च आज भी खड़ा है और उसके परिसर में कई पत्थगड़ी में वहां का इतिहास भी दर्ज है। यहीं पर उसी समय का एक स्कूल भी है, जहां के बच्चे नंगे पैर हॉकी स्टीक लेकर दो मैदानों में एक छोर से दूसरे छोर तक दौड़ते हुए एक दूसरे को हराने के लिए पसीना बहाते हैं। फादर बाद में जर्मनी चले गए, लेकिन जाने से पहले उनका तीन महत्वपूर्ण योगदान को याद करना चाहिए। पहला, बिरसा की शहादत के बाद अंग्रेजों ने जो कानून बनाया, छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम-1908। इसमें फादर का ही मुख्य काम है। दूसरा, उन्होंने छोटानागपुर काथलिक मिशन कॉपरेटिव क्रेडिट सोसाइटी की स्थापना 1909 में की और 1928 में मुंडारी विश्वकोश तैयार किया। सरवदा चर्च के एक कमरे में उनकी किताबें धूल फांकती मिल जाएंगी और उनकी तस्वीर भी, जिसे दीमक अपना निवाला बनाने का आतुर दिखे।
खैर, यहां बच्चों का उत्साह चरम पर था। उनका खेल देखने लायक था, लेकिन हमारे राज्य के खेल विभाग को इन गांवों में देखने को फुर्सत नहीं है। खेल विभाग का पैसा कहां खर्च होता है, वह विभाग ही जानता है। यह वह इलाका है, जहां अपराधियों का बोलबाला है। नक्सली हैं, माओवादी हैं। युवाओं के पास कोई काम नहीं है।
यह नजारा सरवदा से लेकर उलिहातू और डोंबारी गांव तक दिखा। सरवदा से जब बिरसा मुंडा की जन्मस्थली उलिहातू पहुंचे तो यहां भी युवा ताश के पत्ते फेंट रहे थे। जन्म स्थली पर ताला लटका हुआ था और बाहर बिना ड्राइवर एक एंबुलेंस खड़ी थी। सरकार का पूरा विकास यहीं दिखता है। बिरसा के वंशजों का घर पक्का का बन गया है और खूंटी से उलिहातू तक की सड़क तेजी से फोरलेन बन रही है। बाकी गांव, अपनी किस्मत पर जी रहा है। बकरियां सुस्त पड़ी थीं। एक महिला धान ओसा रही थी। एक बच्ची एक बच्चे को चुप करा रही थी। गांव में बना बिरसा मुंडा परिसर चमक रहा था। यहां बिरसा की प्रतिमा को सोने की चमक दे दी गई थी। सूरज की किरण पड़ते ही प्रतिमा की आभा देखते बनती थी। सरकार ने यहीं विकास किया है।
लेकिन उलिहातू से जब डोंबारी बुरू जाएं तो फिर विकास दूर-दूर तक नजर नहीं आता। यहां डॉ रामदयाल मुंडा व जगदीश त्रिगुणायत के प्रयास से डोंबारी बुरू पर 100 फीट का एक स्मारक बनाया गया है। यहां पहाड़ तक एक पतली सड़क जाती है। यह उसी समय की बनी है। इसके बाद सरकार ने ध्यान नहीं दिया। यहीं पर सौ बेड का अस्पताल भी बनना था, लेकिन आज तक नहीं बना। मुख्य सड़क से डोंबारी बुरू की दूरी करीब दस किमी है, लेकिन इस दस किमी में विकास कैसा हुआ, कहां हुआ, यह दिख जाता है। जैसे, यह इलाका अभी भी सौ साल पहले की अवस्था में जी रहा है। गांव से लौटते हुए फिर एक गीत याद आने लगा-

डोंबारी पहाड़ी पर बिरसा के अनुयायी इक_े हुए
नीचे घाटी में गोरे सिपाही बड़ी तादाद में जमा थे।
बिरसा के अनुयायी उनकी खिल्ली उड़ा रहे थे, उन्हें चुनौती दे रहे थे, 
गोरे सिपाहियों ने हड़बड़ी में गोली चलाई...। 

खैर, लोग उनके शहादत दिवस नौ जून और 15 नवंबर, उनके जन्म दिवस पर यहां मेला लगाते हैं। नौ जनवरी को भी यहां भारी संख्या में लोग जुटते हैं, क्योंकि अंग्रेजों ने नौ जनवरी 1900 को हजारों मुंडाओं का बेरहमी से नरसंहार कर दिया था। इसमें महिलाएं और बच्चे काफी संख्या में कत्ल किए गए थे। इस पहाड़ी पर बिरसा मुंडा अपने प्रमुख 12 शिष्यों सहित हजारों मुंडाओं को जल-जंगल-जमीन बचाने को लेकर संबोधित कर रहे थे। आस-पास के दर्जनों गांवों से लोग एकत्रित होकर भगवान बिरसा को सुनने गए थे। बात अभी शुरू ही हुई थी कि अंगरेजों ने डोम्बारी बुरु को घेर लिया। हथियार डालने के लिए अंगरेज मुंडाओं को ललकारने लगे। लेकिन मुंडाओं ने हथियार डालने की बजाय शहीद होने का रास्ता चुना। यहां डोंबारी बुरु की तलहटी में एक मंच बना है। इसके साथ पत्थलगड़ी भी की गई है। पत्थलगड़ी नौ जनवरी 2014 को किया गया है। इस पर नौ जनवरी 1900 को शहीद हुए लोगों के नाम की सूची है-
हाथीराम मुंडा, गांव गुटुहातु, मुरहू
हाड़ी मुंडी,  गांव गुटुहातु, मुरहू
सिंगराय मुंडा, बरटोली, मुरहू
बंकन मुंडा की पत्नी जिउरी, मुरहू
मझिया मुंडा की पत्नी, मुरहू
डुन्डुन्ग मुंडा की पत्नी, मुरहू।
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गांधी चबूतरा

  गांधी के आने की खबर आग की तरह फैल गई थी।
  देश में आजादी का आंदोलन चल रहा था। गांव-शहर-कस्बे इस आंदोलन को अंजाम तक पहुंचाने में पूरी तरह मुब्तिला थे। दिल्ली से बहुत दूर गाजीपुर जिले का जमानियां स्टेशन भी अंग्रेजों की गुलामी के जुए को उतार फेंक देना चाहता था। आंदोलन दर आंदोलन जारी था। पड़ोस में धानापुरकांड हो चुका था। आजादी के सिपाहियों ने थाने पर यूनियन जैक उतारकर तिरंगा लहरा दिया था। गरम और नरम दल दोनों अपने-अपने ढंग से देश को आजाद कराने में सक्रिय थे। गान्ही बाबा का अलग प्रभाव था। उनकी छवि ज्यादा प्रभावित कर रही था। तन पर महज एक कपड़ा। उन्हें लोग महात्मा ठीक ही कह रहे थे। लोग सोचते, असल महात्मा यही हैं। वे नहीं, जो मठों-मंदिरों मंे बैठकर रामनाम गाते हुए आडंबरपूर्ण जीवन जीते हुए अपनी तोंद बढ़ा रहे हैं। हवा में करो या मरो की अनुगूंज साफ सुनाई देने लगी थी। आंख मचियाते हुए एक सुबह जब सूरज अपनी आंखें खोल रहा था तभी जमानियां स्टेशन में उड़ती खबर कहीं से आई कि महात्मा गांधी टेन से पटना की ओर जा रहे हैं। किस टेन से, यह ठीक-ठीक पता नहीं था। लेकिन खबर पक्की थी। गान्ही बाबा के दर्शन का इससे अच्छा मौका नहीं मिलेगा- प्यारे लाल ने सोचा। लेकिन दिक्कत यह थी कि गाड़ी रुके कैसे?
   खबर के बाद कुछ उत्साही युवाओं ने टेन को प्लेटफार्म पर रोकने की सोची ताकि महात्मा गांधी का दर्शन लाभ मिल सके। स्टेशन छोटा था, लोग छोटे थे, लेकिन सपने बड़े थे। सोचने का सिलसिला शुरू हुआ तो आखिर में गाड़ी को रोकने की तरकीब मिल ही गई। इसके बाद तो सैकड़ों लोग स्टेशन पर दर्शन करने के लिए जमा हो गए। गाड़ी के आने की सूचना घंटी द्वारा मिल चुकी थी। थोड़ी देर बाद गाड़ी की खबर होते हुए सिग्नल भी हरा हो गया। अब इसे लाल करना था ताकि गाड़ी रुक सके। कुछ उत्साही प्लेटफार्म से दूर, दक्षिणी छोर पर सिग्नल पोल के नीचे खड़े हो गए और किसी तरह तरकीब निकालकर हरा सिग्नल को लाल कर दिया। उत्साह और बढ़ गया। सिटी बजाती हुई दूर से टेन दिखाई देने लगी। सिग्नल लाल देखकर आखिरकार टेन आहिस्ते-आहिस्ते प्लेटफार्म को छूती हुई रुक गई। गान्ही बाबा की जय, महात्मा गांधी की जय से स्टेशन का प्लेटफार्म गूंजने लगा। सैकड़ों की संख्या में लोग महात्मा का दर्शन करने आए थे। उत्साह की कोई सीमा नहीं थी, लेकिन इस उत्साह में स्टेशन मास्टर के हाथ-पांव फूलने लगे। जिस गाड़ी का यहां ठहराव ही नहीं था, और जिसमें महात्मा गांधी सफर कर रहे हों, वह बिना ठहराव के प्लेटफार्म पर बिना किसी पूर्व सूचना के रुक गई थी। इधर, जयकारा और नारा और तेज होने लगा। तब किसी तरह गान्ही बाबा अपनी लाठी लिए चिरपरिचित अंदाज के साथ बोगी से बाहर आए और ‘दर्शन’ देकर फिर बोगी में समाने लगे, तभी नाटे कद के महावीर जायसवाल ने समय की नजाकत भांपते हुए गांधीजी से एक फरियाद कर दी।
 -महाराज इहां की पुलिस बहुते तंग करती है। जेहल भेजने की धमकी देती है।
गांधीजी अचानक इस फरियाद की अपेक्षा नहीं किए थे। उन्हांेने भी तुरंत सादे कागज की फरमाइश कर दी-
कागज दो-गांधी जी ने कहा।
महावीर ने तत्काल एक कागज का टुकड़ा और कलम भी मौके की नजाकत को देखते हुए थमा दिया। जैसे पहलेे से इसका अंदेशा हो...।
 गांधीजी ने लिखकर उस को वापस कर दिया।
 चीट पर बस इतना ही लिखा था, इन्हें तंग न किया जाए। नीचे संक्षित हस्ताक्षर था-‘गांधी’।
  ये महावीर जायसवाल थे, जिनका पेशा अखबार बांटना था। उस समय ‘आज’ की एकमात्रा अखबार था, जो बनारस में छपता था और 70 किमी दूर जमानियां टेन से पहुंचता था। महावीर यही काम करते थे। 1947 का समय आया और देश आजाद हुआ। आजादी के बाद महावीर जायसवाल ने जुगत भिड़ाकर सरकारी कोटे की दुकान ले ली। पर अखबार बेचने का काम भी साथ-साथ चलता रहा। कोटे के दुकान से कभी-कभी घटतौली भी जाने-अनजाने हो जाया करती थी। गरीब-गुरबा शिकायत करती तो पुलिस आती और फिर महावीर गांधीजी का वही चीट दिखा देते, फिर पुलिस कुछ नहीं बोलती और चुपचाप चली जाती। उसे लगता कि इस आदमी की पहुंच बहुत दूर तक है। गांधीजी दुनिया में नहीं थे, उनकी चीट महावीर के लिए किसी सनद से कम नहीं थी। तो महावीर का आजादी में कुल योगदान यही था, उन्होंने जमानियां वालों को गान्ही बाबा का दर्शन करा दिया था।
 इस तरह उस ऐतिहासिक घटना की याद में उस छोटे से बाजार में एक चबूतरा गांधीजी के नाम पर बन गया। चबूतरा एक तिराहे पर सड़क के किनारे बना, जिसे लोग चौक नाम देते थे। पर, रास्ता तीन ओर ही जाता था, और इन तीन के अलावा एक गली की ओर भी रास्ता खुलता है। शायद, गली को भी इसमें जोड़ दिया गया। इसलिए, लोग उसे चौक ही पुकारते हैं।
  लंबा अरसा गुजर गया। इस बीच कितने बसंत आए, चले गए। कई शरद की ऋतुएं आईं और चुपचाप चली गईं। पर 1998 का साल कुछ और था। शरद की शाम थी। दुर्गापूजा को लेकर बाजार में चहल-पहल बढ़ गई थी। स्टेशन के पास मां दुर्गा का पंडाल सजा था। सप्तमी की तिथि थी। मां का पट खुल चुका था। एक ओर महिलाओं की लाइन लगी थी और एक ओर पुरुाों की। डॉ ईश्वरचंद्र जायसवाल, जो डॉक्टरी कम, समाजसेवा ज्यादा करते थे, अग्रिम पंक्ति में खड़े मां का ध्यान कर रहे थे। हाथ जोड़े। आंख बंद। मन ही मन संस्कृत के श्लोक ओठों से बुंदबुंदा रहे थे कि  भक्तों का प्रसाद चढ़ाने वाले पंडाल के एक स्वयंसेवक सतीश ने उनके कंधे को हिलाते हुए आहिस्ते से उनके कान में बोला...ऐ डॉक्टर, डॉक्टर...;
  डॉक्टर ने अचकचाकर अचानक आंख खोली। बोला-तोहके पुलिस खोजत बा। यह सुनते ही डॉक्टर को जोर का धक्का बहुत जोर से लगा। सांस तेज हो गई और दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।...डॉक्टर सोच रहे थे, प्रसाद देने के लिए झकझोर रहा है। पर पुलिस का नाम सुनते ही डॉक्टर के होश उड़ गए। नवरात्रा-दशहरा का समय और इधर पुलिस...। डॉक्टर के शरीर का रक्तसंचार अचानक जैसे रुक गया। चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगी। थोड़ी देर पहले से उत्सव का जो रौनक उनके चेहरे पर था, गायब हो गई। चेहरा जैसे पीला पड़ता जा रहा था....। आस-पास जलती हजारों झालरों की लाइटें अचानक बुझती प्रतीत हुईं। चारों ओर अंधेरा पसरने लगा। भक्तों की भीड़ का शोर भी निर्जन वन की तरह सांय-सांय करने लगा। डॉक्टर अपने बेजान पैरों से किसी तरह चुपचाप पंडाल से निकले और मुख्य मार्ग छोड़कर स्टेशन के रास्ते छिपते-छिपाते घर में समा गए। फिर घर का दरवाजा बाहर से भी बंद कर दिया। पत्नी ने बाहर से ताला लगा दिया। कोई आकर पूछता, डॉक्टर हैं, घर के भीतर से आवाज आती, नहीं...। मरीज देखने गए हैं। डॉक्टर की आंखों से नींद गायब थी। सांसें रह-रहकर धोखा दे रही थीं। सिर बहुत भारी हो रहा था। सोच रहे थे, किस मुसीबत मंे पड़ गए हैं। जो भीे काम हाथ में लेते हैं, कोई न कोई विघ्न आ ही जाता है....।      
 सन् 1997 में जब देश में आजादी की पचासवीं वर्ागांठ मनाई जा रही थी जो जमानियां में इसका भव्य आयोजन उसी चौक पर हुआ, जहां एक ओर बिना गांधी के पिरामिड आकार का पांच फीट का चबूतरा खड़ा था। बुजुर्ग लोग कहते, यह चबूतरा उसी घटना की याद में बनाया गया, लेकिन चबूतरा के बाद ऐसा कभी संयोग ही नहीं आया कि उस पर कोई गांधी की प्रतिमा स्थापित हो सके। इसी साल प्रज्ज्वलित सेवा संस्थान ने एक पत्रिका निकालने की सोची और इसी साल यह संकल्प भी लिया गया कि यहां अब गांधी लंबे समय तक वनवास नहीं भोगेंगे। अब वनवास खत्म हो गया और यहां गांधीजी की प्रतिमा स्थापित होकर रहेगी। इस तरह योजनाएं बनने लगीं। इटिंग-मीटिंग के चले लंबे दौर के बाद निर्णय हुआ कि इस नगर पालिका को भी शामिल कर लिया और पालिका के अध्यक्ष से गांधीजी की प्रतिमा ली जाए, बाकी खर्च संस्थान व्यवस्था करेगा। नगर पालिका से बातचीत हो गई। वह तैयार हो गया और इस तरह उसने गांधीजी की आवक्ष प्रतिमा बनवाकर पानी टंकी के कार्यालय में रखवा दिया। इधर, संस्थान ने चबूतरे पर संगमरमर लगवा दिया और एक संस्थान का शिलापटृ भी। नगर पालिका के शिलापटृट के लिए सबसे उ$पर जगह छोड़ दिया गया था। अब सारी तैयारियां अंतिम दौर में पहुंच गई थीं कि नगर पालिका के अध्यक्ष को किसी ने समझा दिया कि चबूतरे पर संस्थान का कोई शिलापट्ट नहीं लगेगा। नगर पालिका का लगेगा। अध्यक्ष भी बहकावे में आ गए। बहुत समझाने पर भी अध्यक्ष नहीं मानंे। पानी टंकी के कार्यालय में, जो निगम का एक तरह से उस समय अस्थायी कार्यालय हुआ करता था, उसमें संस्थान और नगर पालिका के प्रतिनिधि के अलावा मंदिर समिति के लोग साथ बैठे, लेकिन कोई हल नहीं निकला। मंदिर समिति के अंदर ही चबूतरा आता था। इसलिए वह भी एक पक्ष था। नगर पालिका के प्रतिनिधि ने संस्थान की ओर व्यंग्य मारा--नगर पालिका एक बड़ी संस्था है। टेबल पर रखे चाय का कुल्हड़ की ओर इशारा करते हुए जोड़ा, और आप इस कुल्हड़ की तरह?? यह बात मिर्ची की तरह लग गई। मामला बहुत गर्म हो गया...। नगर पालिका के प्रतिनिधि को जवाब दे दिया, आप अपनी मूर्ति अपने पास रखें। आपकी मूर्ति नहीं लगेगी। यह बात मिर्ची की तरह लगी और अध्यक्ष तक बात मिर्च-मसाला के साथ पहुंची। अहंकार को ठेस लगा और चबूतरा नपवाने की धमकी दे डाली। बात कोतवाली तक गई। वहां भी कोई समझौता नहीं हो सका और अंततः पालिका ने जमीन नपवाने की ठानी। लोगांे ने इसका भारी विरोध किया। मंदिर समिति ने जोरदार आवाज उठाई, चबूतरा मंदिर की जमीन मंे है। नगर पालिका का कोई अधिकार नहीं है! पर पालिका के अध्यक्ष की पहंुच बहुत दूर तक थी। लखनउ$ एक तरह उनका दूसरा घर था। पुलिस-थाना भी उनका। पानी टंकी में गांधी की प्रतिमा बोरे में कैद थी। एक विचार आया कि रात में उस प्रतिमा को उठाकर यहां स्थापित कर दिया। स्थापित होने के बाद कोई कुछ नहीं कर सकता? लेकिन इसे स्थगित कर दिया गया। अब इस तनातनी में गांधीकी प्रतिमा के लिए पैसा चाहिए। जो पैसा था, सब संगमरमर और मजदूरी में खत्म हो गया। लेकिन बात अब आन-बान-शान और जमानियां की थी। एक ही आसरा था, उम्मीद वहीं थीं। मिल पर पहुंचे और अनिल भैया से कहा गया कुछ मदद कीजिए। पहले तो खूब गाली दी। यह उनका अधिकार था। जब भी जरूरत होती, सामाजिक कार्यों में वे मदद करते। इस बार भी यहीं आसरा था। हम लोग पहले गाली खाए और फिर वे अंदर गए और कुछ पैसा लाकर दिए। अभी कुछ और की जरूरत थी। वहीं पर भाई जान यानी अजहर खान मिल गए। सब बात सुनाई गई तो उन्हांेने तुरंत मदद की। कुछ और लोग भी आए और फिर शाम तक मूर्ति के लिए पैसा जुट गया। अब बनारस के लिए गाड़ी की जरूरत थी। एक मित्रा की वैन मिल गई और इस तरह बनारस से गांधीजी की प्रतिमा तत्काल खरीदकर लाई गई। बनारस से नौ बजे रात को चले और 11 बजे तक जमानियां के बाहरी अलंग पर गाड़ी को रोक दिए। चांदनी छिटक रही थी और खेत दुधिया रोशनी से नहाए हुए थे। रात को हवा भी बहुत सुंदर बह रही थी। प्रकृति का यह नजारा देख सारी थकान मिट गई थी। आधी रात के बाद वैन आगे बढ़ी और फिर गांधी चौक पहंुची। यहां पांच-छह साथी पहले से तैयार थे। प्रतिमा को चिपकाने वाला मसाला भी तैयार था। चुपचाप चौक पर संगमरमर की भारी प्रतिमा को बोरे से आजाद किया गया और फिर किसी तरह उसे चबूतरे पर स्थापित की गई। स्थापित करने में पसीने छूट रहे थे। एक तो भय। कोई देख न ले। कोई पुलिस वाला गश्ती करते हुए यहां न पहुंच जाए। अन्यथा सब खेल गुड़-गोबर। इसे पूरी तरह गोपनीय रखा गया था। कुछ लोगों को ही यह बात पता थी। जल्दी-जल्दी प्रतिमा को चबूतरे पर स्थापित करने के बाद जिसे बोरे से उन्हें आजाद किया गया था, उसी बोरे से फिर गांधीजी को ढंक दिया गया। पूरी तसल्ली के बाद उस रात सभी अपने-अपने घर गए और लंबे समय के बाद चैन की नींद सोए।
   सुबह जब सूरज ने आंखें खोली तो लोगों की आंखें चौंधिया गई। अचानक चबूतरे पर उन्हें कुछ भारी-भरकम चीज दिखी। समझने में देर नहीं लगी कि यह गांधीजी की प्रतिमा है। फिर तो सामने चाय की दुकान पर काना-फूंसी होने लगी। तरह-तरह की चर्चा। गांधीजी स्थापित हो चुके थे और यह बात जमानियां से 14 किमी दूर नगर पालिका अध्यक्ष के कान में पहंुचने में देर नहीं लगी। काटो तो खून नहीं। लौंडों ने नगर पालिका को चुनौती दे दी थीं। यह हंसी का खेल नहीं था। लेकिन गांधीजी तो गांधीजी ठहरे। टस से मस नहीं हुए। उनकी प्रतिमा को वहां से हटाना मतलब राटद्रोह...। बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले...। अब जब नगर पालिक थक-हार गई तो मंदिर समिति को न जाने कहां से सद्बुद्धि आ गई और उसने दांवा ठोंक दिया। मंदिर के पुजारी आकर शिलापट्ट ही उखाड़ने लगे। उन्हें पता नहीं था कि जहां गांधी बाबा स्थापित हो गए, वहां की एक ईंट भी उखाड़ना कानून की नजर में अपराध था। पुजारी बाबा छेनी-हथौड़ा लेकर उखाड़ने जा ही रहे थे कि सामने पान की दुकान में पान खा रहे थानेदार ने उन्हंे ऐसा डपटा कि तेजी से वहां भागे। इसके बाद तो यहां पुलिस वालों का पहरा भी लग गया। पुलिस वालों तक बात पहुंची। उन्हें नगर पालिका ने बरगलाया और वह संस्थान के लोगांे को खोजने लगा। अब क्या था? दशहर के पर्व और पुलिस की खोजबीन....पुलिस हम सबको तलाश रही थी। उसी पान की दुकान पर भाजपा के नेता और व्यवसायी दारोगा सेठ ने थानेदार से कहा कि एक भी लड़के को गिरफ्तार किया तो परिणाम बुरा होगा। पर्व-त्योहार चल रहा है। यह बात पता चला किसी तो पुलिस चौकी नहीं बचेगी। अब पुलिस वाले भी इस पचड़े में नहीं पड़ना मुनासिब समझा। त्योहार के समय कुछ उ$ंच-नीच हो गया तो मामला दूसरा रंग भी ले सकता है। लेकिन यह खबर तो फैल ही गई थी कि लोगांे को पुलिस खोज रही है। डॉक्टर तक यह बात पहुंची तो वे तेजी से घर की ओर लपके...।
  दिन बीते, रात आई। इस तरह दिसंबर का महीना आ गया। दिसंबर की एक सांझ, भव्य समारोह में बोरे से महात्मा गांधीजी आजाद कर दिए गए। गांधीजी आज भी चौक पर अपनी निगाह गड़ाए हैं।

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