उठीं भक्ति की अगम तरंगे

संजय कृष्ण
माघी पूर्णिमा पर किले से झांकता चौदहवीं का चांद अपने गंतव्य की ओर बढ़ रहा है और इधर, सूर्य की लालिमा से संगम तट सिंदूरी हो रहा है। सात घोड़ों पर सवार भुवन भास्कर को प्रणाम करते हुए लााों हाथ ऊपर उठे हुए हैं...बासंती बयार में गूंज रहा है ऊं आदित्य नम: ऊं सूर्याय नम: ऊं ाास्कराय नम:...मंत्र के साथ हे सूरुजदेव, हे गंगा मैया का तार सप्तक स्वर...। कहीं गायत्री मंत्र की गूंज तो कहीं पं जगन्नाथ की गंगा लहरी के पुण्य श्लोक...। भक्ति के गाढ़े होते रस में मेरा सिर भी श्रद्धा से झुक जाता है। संगम की ओर निहारता हूं। पूरा तट श्रद्धालुओं से भरा हुआ। तील रखने की जगह नहीं। जिधर देखिए, उधर केवल सिर...। संगम पर भक्ति की अगम तरंगे उठ रही हैं।
गंगा के मटमैले जल में लोग उतरते हैं, आस-पास जल में तैर रहे पुष्पों, नारियल, दीपों को अपने दोनों हाथों से चारों ओर ठेलते हैं और इसके बाद डुबकी लगा लेते हैं। उन्हें इसकी कतई परवाह नहीं कि गंगा मैली है कि गंगा के किनारे कचरों का अंबार है...श्रद्धा की अविरल धारा उनके भीतर बह रही है। गूंज रही है सनातन परंपरा की आदिम लय। इस लय में में समाया है सृष्टि चक्र... 
 इस बीच लाउडस्पीकर की वाचालता और मुखर होने लगती है... बिछड़े लोगों की सूचनाएं प्रसारित हो रही हैं...कोई सीधे माइक पर पुकारता है, हम इहां हैं, चली आव....कोई ओडि़सा का रहने वाला अपने बिछड़े साथी को पुकार रहा है....। तट पर पुलिस वाले भी सुरक्षा में मुस्तैद हैं। घोड़े पर सवार पुलिस भी अपार जनसमूह के बीच से रास्ता बनाते हुए आती-जाती है। इस बेफ्रिकी के साथ कि उसके आने-जाने से स्नानार्थियों की लय में विघ्न पड़ता है।
  रेती पर भीड़ एकदम शांत। अनुशासित। इन्हें देखकर मार्क ट्वेन की पंक्तियां याद आने लगती हैं। मार्क 1895 के कुंभ में प्रयाग आए थे। उस समय यहां की अनुशासित भीड़ को देखकर आश्चर्य में पड़ गए थे। वैसे ही जैसे स्वीटजरलैंड से आए फोटोग्राफर एंड्रीप ब्लो इस महाकुंभ को देख हतप्रभ रह जाते हैं। पिछले तीन दिनों से वे कुंभ की तस्वीरें उतार रहे हैंं। भारत उन्हें इतना रास आया है कि वे चौथी बार यहां आए हैं। कुंभ की जानकारी मिली तो भागे-भागे आए। कुंभ में आई भीड़ को देख कहते हैं कि यहां इतने लोग धर्म पर विश्वास करते हैं। तंबुओं के इस शहर को देख कहते हैं कि 'मेरे लिए यह आश्चर्य है कि यहां एक शहर सिर्फ दो महीने के लिए बसता है।Ó
 अंजलि के जल में सूर्य की रश्मियां दिख रही हैं। दिख रहा है जन प्रवाह...पटना, बेगूसराय, पलामू, लातेहार, गोरखपुर, रींवा, सतना...हैदराबाद, ओड़ीसा, धार...न जाने कहां-कहां से, किस-किस कोने से यहां माघी पूर्णिमा पर गंगा मैया का आशीष लेने आए हैं। संगम की ओर बढ़ते लोगों के बीच एक लोकगीत उठने लगता है। उसकी भाषा समझ में नहीं आती है। धीरे-धीरे शब्दों को पकडऩे की कोशिश करता हूं, लेकिन नाकाम....ये यात्री धोती-कुर्ता पहने थे। माथे पर प्लास्टिक का छोटा सा बोरा...पहनावे से अनुमान लगाया कि ये अपने ही आस-पास के होंगे। पर लोकगीत ने रास्ता बदल दिया...पूछने पर बताया, सतना जिले से आए हैं। भाषा अलग, बोली अलग, पहनावा अलग....थोड़ा ठहरकर सोचता हूं...आखिर वह कौन सी कड़ी है, जो पूरे देश से यहां लोगों को खींच लाई है...तर्क मत करिए...हजार-हजार किमी की कठिन यात्राएं, खुले आकाश में रैन बिताने के पीछे क्या कोरी श्रद्धा है या कुछ और...। संगम पर पूरा भारत दिखाई देता है। चिरंतन भारत, अप्रतिम भारत, शाश्वत भारत...। यहां से ध्यान हटता है कि 'महाकुभ्ंाÓ से अमृत की बूंदें छलकने लगती हैं। तैरती आस्थाओं में विश्वास डूबकी लगाने लगता है। प्रश्न-प्रतिप्रश्न सब कुछ लहरों में तिरोहित होने लगता है। अमृत मुहूर्त में मैं तीन डुबकी लगा लेता हूं। आस्था, विश्वास, करुणा और श्रद्धा के अनगिनत दिए गंगा में तैरने लगते हैं। धीरे-धीरे भीड़ को चीरते हुए मैं अपने गंतव्य की ओर बढ़ता हूं, उधर, भक्तों का रेला खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा...लाखों कदम संगम की ओर बढ़ते जा रहे हैं...सूर्य धीरे-धीरे तीाा होता जा रहा है...।   

सौ साल पहले रांची की आबादी थी पांच हजार

संजय कृष्ण : दोमिनिक बाड़ा ऐसी शख्सियत हैं, जो मुंह से कम और कलम से ज्यादा बोलते हैं। कलम भी लीक पर नहीं चलती, लीक से हटकर चलती है। लीक पर चलने वाले बहुत हैं। झारखंड के स्वयंभू जानकार भी बहुत हैं, लेकिन उनका काम कुछ अलहदा किस्म का है। सो, इन दिनों उनकी छोटी सी अंगरेजी पुस्तक  'ग्लिपंस आफ लाइफ एंड मिलेयू इन नाइंटींथ सेंचुरी झारखंडÓ चर्चा में है, जिसमें है सौ साल पहले का आंखों देखा हाल। यह ऐसी पुस्तक है, जिसे एक बैठकी में पढ़ा जा सकता है, पर ज्ञान का जो खजाना यह पुस्तक मुहैया कराती है, वह दुर्लभ और खासी महत्वपूर्ण है। 
मूल जर्मन से अनुदित इस पुस्तक में जर्मन लोगों की आंखों से देखा 19 वीं शताब्दी का चुटिया या कहें झारखंड कैद है। सौ साल के इतिहास से गुजरना अपने आप में काफी दिलचस्प है। हालांकि 1895 में मिशन इंस्पेक्टर काउश व मिशनरी एफ हान ने एक मोनोग्राफ लिखा था। उन्होंने जर्मन के गोथिक लिपि में लिखा था। इस पुस्तक पर किसी झारखंडी का ध्यान नहीं गया। जाता भी कैसे, जर्मन में लिखी पुस्तक को वही पढ़-समझ सकता है, जिसे जर्मन भाषा आती हो, जिसे जर्मन का ज्ञान हो, उसके लिए जरूरी नहीं कि उसे झारखंड में रुचि हो। आखिर, क्यों कोई अपनी मेहनत बेमतलब के कामों में जाया करेगा, पर आधी दुनिया घूम चुके, इंग्लैंड और कनाडा के विश्वविद्यालयों में शिक्षा ग्रहण कर चुके दोमिनिक झारखंडी भी हैं और आदिवासियों की संस्कृति में गहरी रुचि भी रखते हैं। उसी परिवेश और गांव-घर में उनकी पैदाइश हुई है।
सो, उनके हाथ में जब जर्मन में लिखी पुस्तक लगी तो उनके अध्यायों को देख उनकी आंखें चमक उठीं। अपने संगठन के कामों से अक्सर जर्मनी की यात्रा करने वाले बाड़ा ने जर्मन भी सीखी और गोथिक के बारे में काफी जानकारी भी एकत्र की।  फिर क्या था, लग गए उसे अनुवाद करने में। पहले उसे हिंदी में किया और बाद में अंगरेजी में। हिंदी में नाम है: उन्नीसवीं सदी का आंखों देखा चुटियानागपुर (1845 से 1895 तक)। अंगरेजी में इसका नाम 'ग्लिपंस आफ लाइफ एंड मिलेयू इन नाइंटींथ सेंचुरी झारखंडÓ। 
पुस्तक में उल्लेख है कि चुटिया नागपुर राजनीतिक दृष्टि से पांच जिलों, आठ सब डिवीजन और नौ कचहरियों में बंटा था। लोहरदगा को उस समय खास चुटियानगर कहा जाता था। इसके अलावा अन्य जिले थे हजारीबाग, पलामू, मानभूम, सिंहभूम। हालांकि अंगरेजी सरकार की देखरेख में वर्तमान झारखंड के सरायकेला खरसांवा के अलावा छत्तीसगढ़ के सरगुजा, गांगपुर, जशपुर, कोरया, बोनाई, उदयपुर, चांगभुकार भी शामिल था। 
रांची की उस समय आबादी लगभग 15 हजार थी, जबकि लोहरदगा, चतरा, झालदा आदि की आबादी महज चार हजार। चुटियानागपुर की पूरी आबादी 55,12,151 बताई गई है। इनमें से 8,83,359 लोग इसके सहायक राज्यों से आते हैं। ( 55 लाख की आबादी संशय पैदा करती है। संभव है जानकारी देने वालों ने उन्हें गलत जानकारी दे दी हो।) पुस्तक में सहायक राज्यों का उल्लेख नहीं है। अलबत्ता आदिवासी संख्या के बारे में जानकारी दी गई है, जिसमें चुटियानागपुर में वास्तविक आदिवासियों की संख्या 15,89,825 बताई गई है। उस समय उरांव 4,56,978, संताली 3,74,449, मुंडारी 3,12,291 हो अथवा लरका 1,49,660 बताई गई है। चुटियानागपुर में गोंड जनजाति का भी उल्लेख किया गया है, जिसकी आबादी 1,30,000 बताई गई और खडिय़ा 47,000, कोरवा 9,700। लेकिन यह आज का चुटियानागपुर नहीं लगता है। उस समय इसकी चौहद्दी में मध्यप्रदेश, उड़ीसा, पं बंगाल, उत्तरप्रदेश के कुछ हिस्से भी इसमें शामिल थे। इसे अंगरेजों ने प्रशासनिक ढंग से बांटा था। इसलिए पूरी आबादी इसमें शामिल कर ली गई है। हिंदू-मुस्लिम आबादी के बारे में बस इतना की कहा गया है ये सब जगह फैले हुए हैं। पुस्तक ईसाई दृष्टि से ही लिखी गई है। कितने लोग मिशन के प्रति उत्सुक हैं, कितनों ने बपतिस्मा लिया। लेखक लिखता है, समस्त चुटियानागपुर में 1893 के अंत तक गोस्सनर मिशन में 35,778 व्यक्तियों ने बपतिस्मा लिया और 3,696 ने धर्म जानने की उत्सुकता दिखाई। पुस्तक में आदिवासी संस्कृति, उनके पहनावे, हुंडरू जलप्रपात, नदी-नाले, खान-पान, खेत-खलिहान आदि का भी जिक्र किया गया है। तब नदियों को पार करने के लिए कोई पुल नहीं थी। घने दुर्गम जंगल थे। जंगलों में खूंखार जानवर थे। इन सबका हवाला है। सौ साल पहले के अपने समय का अक्स इसमें दिखाई पड़ता है। हालांकि पुस्तक में सौ साल पूर्व के पहनावे को देखा जा सकता है। हां, अंगरेजी पुस्तक में शिशिर लाल ने अपने रेखांकन से पुस्तक को सजाया है। दोमिनिक झारखंड की जमीन को लेकर अगली पुस्तक लिख रहे हैं। 

ग्लोबलाइजेशन की आंधी में बहे तो मिट जाएगी हमारी पहचान


संजय कृष्ण :
खिलता हुआ गेहुंआ रंग, लंबी काया पर चमकता कुर्ता और सफेद घुंघराले-बंकिम बाल, उंगलियों में कीमती रत्न, मनोहर व्यक्तित्व...ऐसी ही आभा के साथ महान संतूर वादक पं शिव कुमार शर्मा से रांची के रैडिशन ब्लू होटल में मुखातिब होने का मौका मिला। बातों का सिलसिला शुरू हुआ तो बात झारखंड के तार वाद्य टुहिला पर भी हुई, जिसे बजाने वाले मात्र एक दो लोग ही बचे हैं। बताया कि झारखंड का यह एक तार वाद्य अंतिम सांसे गिन रहा है। ऐसे लोक वाद्यों के बचाने का क्या प्रयास होना चाहिए? छूटते ही बोले, यह सिर्फ झारखंड की बात नहीं है। ऐसे तमाम लोक वाद्यों, लोकगीतों और लोक रागों, लोक साहित्य को बचाने की कवायद होनी चाहिए और इसमें सरकार को, मीडिया को और कारपोरेट हाउस को आगे आना चाहिए। बिना इसके इनका संरक्षण नहीं हो सकता। अभी स्पीक मैके यह काम पिछले 37 सालों से कर रहा है। हर साल वह छह हजार कार्यक्रम आयोजित करता है।
बात संतूर पर चली तो इसके पूरे इतिहास से परिचित कराया कि यह कितना प्राचीन है और देश-विदेशों में पुराने समय में अलग-अलग नामों से यह पुकारा जाता था। हालांकि यह भारत से ही पश्चिम गया। पं शर्मा ने यह भ्रम भी दूर किया कि यह एक कश्मीरी लोक वाद्य नहीं, बल्कि सूफियाना मौशिकी में बजाया जाने वाला वाद्य है। कश्मीर इसका जन्म स्थान है, लेकिन इसे लोग जम्मू में भी साठ साल पहले नहीं जानते थे। पर, ईश्वर ने मुझे निमित्त बनाया और इसे एक शास्त्रीय वाद्य के रूप में पहचान दिलाई।
 तबले और गायन से शुरुआत करने वाले पद्म विभूषण पं शिव कुमार ने कई फिल्मों में संगीत भी दिया पं हरि प्रसाद चौरसिया के साथ मिलकर। रूपहले पर्दे पर प्रेम का महाकाव्य रचने वाले स्व यश चोपड़ा ने 'सिलसिलाÓ में शिव-हरि की जोड़ी को पहला मौका दिया। इसके बाद चांदनी, 'लम्हेंÓ और 'डरÓ आदि फिल्में कीं। बाद में 'हम आपके हैं कौनÓ को भी अपने मधुर संगीत से संवारने वाले थे लेकिन समयाभाव के कारण वे इस फिल्म को नहीं कर सके।
पंडिती ने फिल्मी दुनिया का एक वाकया भी सुनाया। बताने लगे कि एक बार एक फिल्म की रिकार्डिंग हो रही थी। उसमें मैं भी मौजूद था। ख्वाजा अहमद अब्बास मेरे पास आए और एक कोने में ले जाकर कहने लगे, मैं एक फिल्म बना रहा हूं, 'सात हिंदुस्तानीÓ। उसमें आप काम करें। उस रोल में आप एकदम फिट हैं। पं शर्मा ने बड़ी शाइस्तगी से काम करने से इनकार कर दिया। खैर, वे अभिनेता बन जाते तो दुनिया संतूर के सात स्वर से अपरिचित नहीं रह जाती! वह भी मानते हैं कि भगवान तो मुझसे कुछ और ही कराना चाहता था।
सौ तारों वाले इस वाद्य को सात सुरों में पिरोना आसान काम तो नहीं था। जब इसे वे सात सुरों में पिरो रहे थे कई ने आलोचना भी की। इसके बाद इसमें कुछ फेरबदल कर इसे शास्त्रीय मंच तक ले गए। इसके पीछे उनकी लंबी साधना और पिता की इच्छा भी शामिल थी।
जब 1952 में इस वाद्य को कश्मीर रेडियो स्टेशन से बजाया तो थोड़ा आत्मविश्वास जगा। इसके बाद 1955 में गुरु भाई डा. कर्ण सिंह ने इन्हें तब  बांबे भिजवाया। शुरू में फिल्मों में भी बजाया। 1956 में कोलकाता में भी अपनी प्रस्तुति दी। इसके बाद पीछे मुड़कर नहीं देखा। 
आज की युवा पीढ़ी और संगीत को हमसफर बनाने वालों से यह जरूर कहते हैं कि शास्त्रीय वादन समर्पण, साधना और प्रतिबद्धता की मांग करता है। ऐसे कलाकारों में तारीफ को जज्ब करने की क्षमता भी होनी चाहिए। यह अपेक्षा रखना बेमानी है कि ऐसी विधाओं में हजारों कलाकार पैदा हो सकते हैं। यह ईश्वर की कृपा और पूर्व जन्म का संस्कार होता है। जैसे क्रिकेट में सब धौनी नहीं बन सकते।  जबकि यह गांव से लेकर शहर में खेला जा रहा है। फिर यह तो शास्त्रीय वादन का क्षेत्र है। स्कूलों में कलाकार पैदा नहीं हो सकते। यह ध्यान रखनी चाहिए। इसके लिए तो गुरु-शिष्य परंपरा की एकमात्र गुरुकुल है। 
हां, वे इस बात पर संतोष जताते हैं कि उनके पुत्र राहुल शर्मा उनकी परंपरा को आगे बढ़ा रहे और उसमें काफी प्रयोग भी कर रहे हैं। साथ ही जापान से आए ताका हीरो आराइ भी 2007 से उनके साथ हैं और संतूर की की बारीकी सीख रहे हैं। बातें और भी हैं। फ्यूजन से लेकर फिल्मी संगीत तक। इस पर भी अपनी बेबाक और ईमानदार राय रखी। बताया कि फ्यूजन वही है, जहां दो अलग-अलग विधाएं मिलें तो एक तीसरा खूबसूरत रंग पैदा हो। हिंदी सिनेमा में अनिल विश्वास, एसडी बर्मन, पंकज मल्लिक आदि ने इसका प्रयोग किया है। 
जाते-जाते मीडिया के लिए यह नसीहत भी दिए कि मीडिया को भी इस क्षेत्र में आगे आना चाहिए। संस्कार और रुचि निर्माण मीडिया ही कर सकता है। सो, यदि देश को लीडर बनना देखना चाहते हैं तो अपनी कलम का इस्तेमाल सकारात्मक काम के लिए करिए। उपभोक्तावादी और वैश्वीकरण की आंधी हमारे मूल्यों, संस्कृति और संस्कार को ध्वस्त कर रही है। इसे बचाने के लिए आगे आना चाहिए। देश की पहचान यहां के शास्त्रीय व लोक गीतों से हैं। ग्लोबलाइजेशन की आंधी में बह गए तो हमारी पहचान भी मिट जाएगी। 

हॉकी की धरती पर क्रिकेट का जुनून

संजय कृष्ण
क्रिकेट की दीवानगी बुधवार की रात हरमू रोड में भी दिखी। पीली रौशनी में धौनी के घर का बाहरी हिस्सा नहाया हुआ था तो सड़क भी पीताभ हो चुका था। आकाश का चांद अलबत्ता दूधिया रोशनी फेंक रहा था। शायद, दूर क्षितिज में चांद को अपने क्रिकेट टीम के धुरंधरों को देखने की व्याकुलता हो...। खैर, हम थे, भीड़ थी, शोर था, जोश था, जुनून थी और था जज्बा। 
जमीं और आसमां के बीच के खालीपन को शोर भर रहा था। सड़क को बांटने वाले डिवाइडर से लेकर आस-पास की दीवारों तक में तील रखने की जगह नहीं थी। धौनी-धौनी का शोर मौसम में गर्मी पैदा कर रहा था। यह मत सोचिए कि यहां महेंद्र सिंह धौनी की एक झलक पाने के लिए सिर्फ  क्रिकेट के जुनूनी युवा ही थे, 45-50 की उम्र लांघ रहीं सिबयंती लकड़ा से लेकर छह साल की बिटिया आयशा तक...। सभी एक ही रंग में रंगे थे। वह रंग था क्रिकेट का। हॉकी की धरती पर क्रिकेट का जुनून चढ़कर बोल रहा था...।
हजारों की भीड़ यहां संध्या सात बजे से ही डट गई थी। बाधित हो रही आवाजाही के लिए ट्रैफिक पुलिस तो थी ही, लेकिन उसे यहां की ट्रैफिक संभालने में भी खासी मशक्कत करनी पड़ रही थी। फिर भी यहां भीड़ तो भीड़ थी। रह-रहकर कभी सीटियां बजा रही थी तो कभी हा हू की आवाज निकाल रही थी। शायद, अब धौनी सुन लें...। तभी भीड़ से किसी ने कहा, भगवान सुन सकता है, भैया धौनी नहीं।
भीड़ से निकल डिवाइडर आते हैं तो यहां महिलाओं का हुजूम था। सिबयंती लकड़ा हरमू की ही थीं। धौनी की एक झलक पाने के लिए न जाने कब से खड़ी थीं। उम्र यही कोई पचास के करीब। बताती हैं, एक झलक दिख जाए तो चली जाऊं। उन्हीं की बगल में खड़ी मार्गेट बाखला मेरी ओर इशारा कर कहती हैंं, इधर आइए, हम हैं क्रिकेट के दीवाने। उम्र यही कोई 45 साल। उनकी दीवानगी पर कोई भी युवा शरमा जाए। साढ़े सात बज रहे थे। पूछा कब से खड़ी हैं, बोली एक घंटा हो गया।
आयशा की उम्र छह साल थी। पिता के कंधे पर उचक-उचक कर एक झलक देखने की असफल कोशिश कर रही थी। पिता बोले, घर से जिद कर आई है। धौनी अपने घर तो साढ़े पांच बजे पहुंच गए। सीधे एयरपोर्ट से अपने घर अपनी गाड़ी चलाते हुए। इंडियन टीम के कुछ खिलाड़ी सात बजे उनके घर दावत उड़ाने पहुंचे। यह खबर जब फैली तो भीड़ बढ़ती ही गई। डेढ़ घंटे से खड़े-खड़े एक दर्शक से रहा नहीं गया। कहा, दीखिए जाएगा। डेढ़ घंटा हो गया, अब चला जाए। एक दूसरे व्यक्ति का सीना थोड़ा गर्व से चौड़ा हो गया। रांची के अतीत को याद करते हुए बोला, रांची क्या से क्या हो गया। पहले एक छोटा शहर था। पर आज इसकी पहचान अंतरराष्ट्रीय हो गई। वहीं पास खड़ा एक इंस्पेक्टर बोला, उससे क्या हो जाएगा। रांची की गरीबी तो नहीं दूर हो जाएगी...
शोर-शराबे के बीच घड़ी अपनी रफ्तार से चल रही थी। नौ बजे थे कि युवाओं का धैर्य जवाब देने लगा। सो, किसी ने बस की ओर अपनी टोपी उछाल दी तो किसी ने एक ढेला धौनी के घर की ओर ...। इतने में धौनी के पिता पान सिंह और जीजा दोनों गेट से बाहर निकले और पुलिस को हिदायत दे अपने घर में समा गए...। हालांकि युवाओं ने जैसे ही ढेला फेंका था, पुलिस तुरत हरकत में आ गई और हवा में लाठियां लहराने लगी...भीड़ का रेला अपने पीछे वालों को धकेलते सड़क की ओर भागा....। थोड़ा मामला शांत हुआ तो एक पुलिस वाला बोला, अब बताइए, हम लोग लाठी चला दें तो आप लोग कहिएगा की पुलिस ने लाठीचार्ज कर दिया...। खैर, जब 10.30 बजा तो भीड़ से आवाज आई, अरे बस का ड्राइवर बैठ गया। लगता है टीम अब निकलेगी।  दूसरे ने कहा, अरे उ कब से बैठा है। चलो घर चलें। पर, थोड़ी देर बाद, 10.45 पर गेट पर हलचल हुई। गेट खुला और धीरे-धीरे खिलाड़ी बस के अंदर समाते चले गए..युवराज को देख लड़कियां ..युवराज-युवराज चिल्लाने लगीं....पर खिलाडिय़ों ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। काले शीशे वाले बस की ओर टकटकी लगाई देख रही थीं, पर भीतर कुछ दिख नहीं रहा था...।
धौनी के घर से बस सीधे रेडिशन ब्लू की ओर चल पड़ी। ओवरब्रिज होते हुए। पीछे-पीछे पुलिस तो मोटरसाइकिल से युवाओं की टोली भी पीछा करते हुए... होटल में भी दीदार के लिए उमड़ पड़े लोग ...बस से निकलते ही होटल के अंदर प्रवेश करते ही ईशांत और युवराज झूमते हुए अंदर समा गए। भुवनेश्वर ने जरूर थोड़ी प्रतिक्रिया दी और हंसते हुए हाथ हिलाते होटल की लॉबी में चले गए...।
किसी आईने की तलाश में रांची

संजय कृष्ण
मुंशी प्रेमचंद के सहयोगी रहे व्यंग्य कथा सम्राट राधाकृष्ण के शहर रांची में साहित्यिक तापमान- सूचक कांटा बेशक ऊपर-नीचे होता रहता है किन्तु यह कभी शून्य तक नहीं गिरता। ताजा सरगर्म कथा के अनुसार इंदु जी की दुकान से ही यह खबर फूटी कि रणेंद्र ने महुआ माजी के प्रतीक्षित नवीनतम उपन्यास मरंग गोडा नीलकंठ हुआ की निर्मम शल्य क्रिया कर दी है। समीक्षा छपने से पहले ही कलमघिस्सुओं ने चटखारे ले-लेकर उपन्यास का पोस्टमार्टम शुरू कर दिया। मई में ही चर्चा आम हो गयी थी कि समीक्षा नया ज्ञानोदय में आ रही है। समीक्षा पढने के लिए लोग आकुल- व्याकुल होने लगे। जैसे ही जून चढा, हर रोज लोग इंदु जी दुकान पर हाजिरी लगाते, पत्रिका आई क्या? इंदुजी भी रोज सुबह रेलवे स्टेशन जाते, पता करते और फिर उदास हो चले आते। पाठक- साहित्यकार दोनों बेसब्र हो रहे थे। खैर, आधा महीना गुजर जाने के बाद आखिरकार जून का अंक आया। रणेंद्र की समीक्षा सबने देखी-सबने पढी। वरिष्ठ लोगों की प्रतिक्रिया होती, बतिया त ठीके लिखे हैं। और आहत महुआ ने ज्ञानोदय को लंबी प्रतिक्रिया भेज दी। उदारता दिखाते हुए रवींद्र कालिया ने जुलाई के अंक में महुआ माजी की प्रतिक्रिया छाप दी। हिसाब- किताब बराबर..। लंबे समय से रांची में पसरा साहित्यिक सन्नाटा किसी बहाने टूटा था। खैर, माहौल में अभी भी नमी है। ताप है। रांची की पहाडी तप रही है।
अल्बर्ट एक्का चौक इस बात से बेखर नहीं। न इंदु जी की दुकान। आजकल गप्पबाजी का अड्डा यही है। यदि आप यहां नियमित आते हों तो रविभूषण, विद्याभूषण, वासुदेव, पंकज मित्र, महुआ माजी, रणेंद्र, श्रवणकुमार गोस्वामी, अरुण कुमार आदि से मुलाकात संभव है। झारखंड के दूसरे जिले से आने वाले साहित्यकार, कवि, लेखक, भी यहां टकरा ही जाते हैं। हां, एक्टिविस्टनुमा पत्रकार और पत्रकारनुमा एक्टिविस्ट नामक प्राणी भी यहां आसानी से पाए जाते हैं। यहां ज्ञान की विभिन्न सरणियों से गुजरते हुए आप धर्म की गंगा में भी डुबकी लगा सकते हैं। यह बात अलग है कि इस ज्ञानचर्चा में इंदुजी कभी समाधिस्थ नहीं हुए। समाधि जैसे ही लगती, तंद्रा में जाने लगते कि बगल में मामा चाय वाले को तीन में पांच करने का आर्डर दे देते जोकि तरल ऊर्जा का निकटस्थ स्नोत है। सुबह से शाम तक गुलजार रहने वाला अल्बर्ट एक्का चौक को लोग रांची का दिल कहते हैं। हमें न मानने का भी कोई कारण नहीं। इसी के पास है इंदुनाथ चौधरी की मार्डन बुक नामक किताब की दुकान, जिसे लोग उनके शार्ट नेम इंदुजी पुकारते हैं। यही रांची का साहित्यिक मर्मस्थल है। अब रांची तो कोई बनारस है नहीं कि यहां पप्पू चाय की दुकान मिलेगी, न पटना का काफी हाउस न इलाहाबाद...। रांची तो अपन रांची ठहरी। पीठ पर छौव्वा, माथ पर खांची.. यही है रांची की पहचान..। पर वैश्वीकरण ने इस पहचान को भी धूमिल कर दिया है।
जब रांची में बैठकी और गप्पबाजी के अड्डे की तलाश में भटकते हैं तो अपर बाजार के अपने पुराने मकान में व्यंग्य कथा सम्राट राधाकृष्ण के पुत्र सुधीर लाल मिल जाते हैं। कहते हैं कि 1890 में वनिता हितैषी का प्रकाशन बालकृष्ण सहाय के अमला टोली स्थित प्रेस से हुआ। अब इसे श्रद्धानंद रोड कहते हैं। प्रेस में ही साहित्यिक गोष्ठी और बैठकी होती थी। बालकृष्ण सहाय, ठाकुर गदाधर सिंह, बलदेव सहाय, त्रिवेणी प्रसाद.. आदि की महफिल जमती थी। तब रांची आज जैसी नहीं फैली थी। न कंक्रीट के जंगल ही उग पाए थे। वह एक कस्बाई नगरी थी। बित्ते भर की। दूसरी बैठकी यूनियन क्लब में होती थी। यहां बंग समुदाय के लोग ही शरीक होते थे। आठ साल बाद 1898 में सहाय ने आर्यावर्त साप्ताहिक का प्रकाशन शुरू किया। बित्ते भर शहर की पहचान बडी पुख्ता थी। 1924 में छोटानागपुर पत्रिका का प्रकाशन यहां के मारवाडी टोला से प्रारंभ हुआ तो ठाकुरबाडी (गांधीचौक के निकट) मामराज शर्मा के यहां बैठकी शुरू हो गई। मामराज इस पत्रिका के संपादक थे। पत्रिका के कार्यालय में हर रोज बैठक होती थी। मामराज, चिरंजीलाल शर्मा, अयोध्या प्रसाद, जगदीश प्रसाद, देवकीनंदन.. तबके लेखक थे। जगदीश प्रसाद छोटानागपुर पत्रिका के नियमित लेखक थे। गोष्ठी में जगदीश प्रसाद राधाकृष्ण को भी ले जाया करते थे। उनकी आंखें कमजोर थीं। इसलिए जगदीश प्रसाद राधाकृष्ण से बोलकर लिखाते थे। उनके भीतर साहित्य का बीजारोपण यहीं पडा जो बाद में एक सफल कहानीकार और व्यंग्यकार बने। 1926 में अपर बाजार में संतुलाल पुस्तकालय खुला तो अड्डेबाजी यहां जमने लगी। तब युवा लेखक के रूप में अपनी पहचान बना चुके राधाकृष्ण, सुबोध मिश्र, जगदीश नारायण आदि शामिल होते। 1929 में इन युवाओं ने वाटिका नामक हस्तलिखित पत्रिका निकाली।
अपर बाजार में जब सुबोध ग्रंथ माला खुली तो यहीं बैठकी होने लगी। इसके मालिक श्याम सुंदर शर्मा साहित्यिक मिजाज के थे। 1932 में विधा नामक पत्रिका शुरू की। उनके निधन के बाद उनके पुत्र प्रेम नारायण शर्मा भी साहित्यानुरागी थे। बैठकों का दौर जारी रहा। लेकिन सबसे ज्यादा पहचान मेन रोड स्थित फ्रेंड्स केबिन को मिली। यहां की चुस्की के साथ हिन्दी, उर्दू, बांग्ला के साहित्यकार बैठकी करते। राधाकृष्ण, रामकृष्ण उन्मन, मधुकर, प्रफुल्लचंद्र पटनायक, जयनारायण मंडल, रामखेलावन पांडेय, जुगनू शारदेय से लेकर कई राजनीतिज्ञ और पत्रकार भी यहां आया-जाया करते। सत्तर के दशक में राधाकृष्ण के निधन के बाद बैठकी बंद हो गयी। फ्रेण्ड्स केबिन आज भी हैं, लेकिन अब यहां दक्षिण भारतीय व्यंजन परोसे जाते हैं। रातू रोड में भी एक चाय की दुकान थी। मुकुंदी बाबू की। यहां पर भी राधाकृष्ण के अलावा शिवचंद्र शर्मा, भवभूति मिश्र, आदित्य मित्र संताली, नारायण जहानाबादी, डॉ. दिनेश्वर प्रसाद के अलावा रेडियो स्टेशन के कलाकार भी जुटते थे। कचहरी रोड स्थित अभिज्ञान प्रकाशन, स्वीट पैलेस भी अड्डा हुआ करता था।
राधाकृष्ण चाय, बीडी, पान के शौकीन थे। चाय के साथ तो वे घंटों गप्प करते रहते थे। प्रेमचंद के निधन के बाद कुछ महीनों तक बनारस जाकर हंस भी संभाला। रांची आए तो आदिवासी पत्रिका के संपादक हुए। अमृत राय रांची आते तो उन्हीं के यहां महीनों ठहरते। इनके अलावा विष्णु प्रभाकर, कमलेश्वर जैसे रचनाकार भी उनसे मिलने रांची आते रहते। सुधीर एक बात का जिक्र करते हैं। सत्तर के पहले का। रांची में बांग्ला के मशहूर लेखक ताराशंकर बंद्योपाध्याय साल में एक बार राधाकृष्ण से मिलने जरूर आते। लेकिन यह मुलाकात गोपनीय ही रहती। वरिष्ठ साहित्यकार विद्याभूषण कहते हैं कि रांची में वह कल्चर कभी विकसित नहीं हुआ, जो दिल्ली, बनारस, इलाहाबाद और पटना में रहा। लेकिन होटलों और लोगों के आवासों, क्लबों में बैठकें, गोष्ठियां होती रहती थीं। 1960 और 2010 के बीच करीब 31 से ऊपर ऐसी संस्थायें थीं, जहां रचनाशीलता पर बहस होती रही। इनमें प्रतिमान, अभिज्ञान, केंद्र, सुरभि, अभिव्यक्ति, प्रज्ञा, लेखन मंच, तीसरा रविवार, देशकाल, साहित्य लोक प्रमुख हैं। तीसरा रविवार 1986 से 88 तक चला। परिवर्तन बिहार क्लब के बगल में ही सजता था, जिसमें आजके महत्वपूर्ण कथाकार प्रियदर्शन और अश्विनी कुमार पंकज नियमित भाग लेते थे। लेखन मंच से वीरभारत तलवार भी जुडे हुए थे।
चर्चित लेखिका महुआ माजी कहती हैं कि रांची में ऐसी कोई जगह नहीं रही जहां बैठकी होती हो। इसके पीछे गुटबाजी को भी वे कारण बताती हैं जो अपने से ऊपर लोगों को देखना नहीं चाहते। परन्तु वे 1996 में बिहार क्लब में कादंबिनी क्लब का जिक्र करती हैं, जहां माहवार बैठकी होती थी, जिसमें माया प्रसाद, मुक्ति शाहदेव, रेहाना मोहम्मद, अशोक अंचल, आदित्य, प्रभाशंकर विद्यार्थी, बालेंदुशेखर तिवारी शामिल होते थे। हालांकि उषा सक्सेना और ऋता शुक्ला के घर पर भी कुछ लोग जुटते थे। अश्विनी यह सवाल भी उठाते हैं कि पिछले सौ सालों में और इधर झारखंड बनने के बाद भी शहर में कोई सार्वजनिक जगह नहीं है, जहां चाय की दो घूंट के साथ अड्डेबाजी की जा सके। यही मलाल आलोचक रविभूषण को भी है। कहानीकार पंकज मित्र कहते हैं कि बढती माल संस्कृति और बडी-बडी अत्रलिकाओं ने शहर को एक नया चेहरा तो दिया है,लेकिन इस अचानक आई समृद्धि के बीच संस्कृति का दम घुट रहा है। भारत- पाक की साहित्यिक विरासत को संजाने वाले हुसैन कच्छी को भी इस बात का दु:ख है कि शहर का कोई चेहरा नहीं है। मॉल और बडी-बडी बिल्डिगों से शहर नहीं पहचाना जाता, उसकी पहचान उसकी संस्कृति से होती है।
वर्कशॉप से विकसित होती है सिनेमा देखने की समझ : अतुल

अतुल तिवारी किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। तहजीब के शहर लखनऊ से जुड़े अतुल तिवारी एनएसडी से पासआउट हैं। दिल्ली से मुंबई का सफर तय किया और अपना एक मुकाम बनाया। कई सुपरहिट फिल्में लिखीं। कलम चालू है। शनिवार को सिनेमा की समझ को लेकर दैनिक जागरण के वरीय संवाददाता संजय कृष्ण से उनकी बातचीत के संक्षिप्त अंश:-
फिल्म फेस्टिवल और वर्कशॉप से दर्शकों को कितना फायदा होगा? सिनेमा के प्रति हमारी समझ को कितना बेहतर बना सकता है?
फिल्म एप्रेसिएशन का सिलसिला चलना चाहिए। यह महत्वपूर्ण है। फिल्म देखना आसान है, लेकिन समझना कठिन। आज डीवीडी का जमाना है। घर बैठे अब आप दुनिया की फिल्में देख सकते हैं। पहले यह बात नहीं थी। लेकिन क्या फिल्मों को लेकर हमारी समझ भी उतनी ही अग्रगामी हुई है? क्या हमारी समझ पहले की अपेक्षा प्रखर हुई है? यह बड़ा सवाल है। इस तरह के वर्कशॉप से ही यह समझ विकसित होती है। जैसे टी एप्रेसिएशन। मैंने इसका भी कोर्स किया है कि चाय कैसे पी जाए, कौन सी चाय किस प्रकार के आनंद निर्मित करती है? दार्जिलिंग चाय क्या है, ग्रीन टी किसे कहते हैं? यदि आप इनके बारे में समझ रखते हैं तो चाय का आनंद दुगुना उठा सकते हैं। यही बात फिल्म पर भी लागू होती है। यदि आपकी समझ बेहतर है, तो फिल्म को आप बेहतर ढंग से ग्राह्य कर सकते हैं।
क्या सीखने के लिए भी कोई तैयारी करनी चाहिए?
सीखने की तैयारी तो होनी ही चाहिए। प्रश्नाकुलता नहीं रहेगी तो वह कुछ नहीं कर सकता। जिज्ञासा बड़ी चीज है। यही आपको आगे बढ़ती है। आपके अंदर क्यूरोसिटी होनी चाहिए। क्योंकि फिल्म या कला बहुत कंपलेक्स चीज है। महान फिल्मकार सत्यजीत रे ने चालीस-पचास साल पहले कोलकाता में कला की बारीकियों को सीखने की एक विधिवत शुरुआत की थी। इसी तरह का काम पुणे के पीके नायर एवं उत्तरप्रदेश के सतीश बहादुर ने काम किया था। दोनों ने पुणे में फिल्म एप्रोसिएशन का काम किया था। उन्होंने फिल्म अर्काइव का काम भी किया। कोर्स भी चलाए। दोनों ने तो कर्नाटक के सुदूर गांव हेगुडू में इस काम को अंजाम दिया। मेरी शीचर ने भी जो विदेशी थीं, सत्यजीत रे पर किताब लिखी। तो, इस तरह के प्रयास से एक मानस विकसित होता है।
देश का दर्शक सिनेमा देखता है। सिनेमा का आधा पैसा सरकार टैक्स के रूप में वसूल लेती है? क्या इस टैक्स के पैसे का इस्तेमाल लोगों की समझ विकसित करने के लिए नहीं करना चाहिए और इसमें एफटीआईआई (फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीच्यूट आफ इंडिया) और नेशनल स्कूल आफ ड्रामा जैसे सरकारी संस्थानों की क्या भूमिका हो सकती है?
जिससे टैक्स लिया जा रहा हो, जरूरी नहीं वह पैसा उसी के लिए इस्तेमाल हो। यह ठीक भी नहीं है। फाइव स्टार होटल से सरकार अधिक टैक्स लेती है तो इसका मतलब यह नहीं कि वह इन्हीं के विकास के लिए खर्च करे? कार से टैक्स ले तो यह ठीक नहीं कार की इंजीनियरिंग के लिए उसका इस्तेमाल हो? टैक्स लेती है सरकार भले ही वह मिनिस्टर के घर जाए? खैर, एनएसडी यह काम बखूबी कर रही है। आउट रिच प्रोग्राम के तहत वह देश ही नहीं, पूर्वोत्तर में भी वह बेहतर ढंग से काम कर रही है। जहां तक संस्थाओं का सवाल है तो यह पेचीदा प्रश्न है। एनएसडी के छात्रों को सरकारी छात्रवृत्ति मिलती है। लेकिन वह फिर मुंबई का रुख कर लेते हैंं। सरकार यदि ऐसी कोई व्यवस्था करती है कि जिन्हें छात्रवृत्ति दी जाती है, वह तीन साल तक सरकार के लिए काम करेंगे तो यह सबके लिए होना चाहिए। आईआईटी, मेडिकल सबके लिए। मेरा निजी तौर पर मानना है कि मैं तीन साल एनएसडी में पढ़ा। सरकार चाहे तो तीन साल आज भी मेरा उपयोग कर सकती है बशर्ते मेरे काम के अनुरूप हो।
प्रश्न : सिनेमा में जाने वालों के सामने क्या चुनौतियां हैं?
दो बड़ी चुनौतियां हैं। यदि आप इस फिल्म लाइन में आना चाहते हो तो आपके पास कहने की एक अलग और अलहदा शैली होनी चाहिए। कहानी कहने की अलग शैली नहीं होगी तो आप टिक नहीं सकते। दूसरी बात, आप यदि तकनीकी क्षेत्र में जाना चाहते हैं तो वहां भी आपकी दक्षता की बार-बार परीक्षा ली जाएगी। तभी आप वहां सफल हो सकते हैं। वर्कशॉप इस तरह के काम को सरल बनाते है।
पत्र-पत्रिकाओं में भी सिनेमा काफी जगह घेरता है। इसके बाद भी देश में आम लोगों के बीच सिनेमा की समझ विकसित नहीं हो सकी है?
अतुल : ठीक कह रहे हैं। देश का जूता बाजार 26 हजार करोड़ का है और फिल्म उद्योग महज पांच हजार करोड़ का। लेकिन अखबारों में सबसे अधिक कॉलम सिनेमा घेरता है। फिल्मों पर काफी पत्रिकाएं भी निकल रही हैं, लेकिन समझ विकसित नहीं हो पा रहा है। इसके पीछे सबसे बड़ी बात यह है कि इनमें फिल्मों की विधा, उसके व्याकरण, व्यवस्था पर बात नहीं होती। वहां केवल गॉशिप या सूचनाएं होती हैं।

ओ दामोदर, तुम बहती हो क्यों

संजय कृष्ण : झारखंड का एक जिला है चतरा। घोर उग्रवाद प्रभावित। सांझ ढलते ही जिले में सन्नाटा पसर जाता है। गांव-गिराव की बात छोड़ दें। इस जिले का एक प्रखंड है टंडवा। इस पंचायत में 16 गांव हैं। कुछ गांव, उनके खेत, जंगल विकास की भेंट चढ़ रहे हैं। ये गांव हैं बसरिया, कुसुमटोला, पुरनाडीह, झूलनडीह। पूछिए क्यों? तो जवाब है सीसीएल। सीसीएल यानी सेंट्रल कोल फिल्ड््स लिमिटेड। सीसीएल ने यहां अपना प्रोजेक्ट लगाया है। नाम है पुरनाडीह प्रोजेक्ट। पुरनाडीह ओपन कास्ट माइनिंग पिछले तीन सालों से चल रही है। तीन साल के दौरान कोलरा जंगल में खनन समाप्त हो चुका है। अभी टागर जंगल और बगलाता जंगल में खनन कार्य चल रहा है। कास्ट माइनिंग के चलते जल, जंगल और जमीन तीनों प्रभावित हो रहे हैं। सैकड़ों एकड़ में फैले जंगलों की हरियाली को माइनिंग की धूल ने निगल लिया है। जंगल मे पाए जाने वाले टेना, मेठी आदि कंद मूल समाप्त हो गए हैं। इन जंगलों से प्राप्त होने वाली जड़ी-बूटी, लकड़ी और पत्ते भी अब समाप्त हो गए हैं, निकट के जंगल भी समाप्त हो रहे हैं। इससे उनकी आजीविका पर ही संकट के बादल नहीं छाए हैं, ग्रामीणों को अपने पशुओं के आहार आदि के लिए दूर के जंगलों में जाना पड़ता है।

माइनिंग से पशुओं को घास एवं पत्ते भी नहीं मिल नहीं मिल रहे हैं। कृषि उजड़ रहा है। किसान धीरे-धीरे मजदूर में तब्दील हो रहे हैं। इस खनन से लगभग ढाई हजार लोगों और छह गांवों पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है। वहां के ग्रामीण भूमि रक्षा के लिए आंदोलन लगातार चला रहे हैं, पर उनकी समस्याओं पर सरकार ध्यान नहीं दे रही है।

ओपन कास्ट माइनिंग से यहां के जंगल और यहां की पहाडिय़ों में बहने वाले दो झरने 'मादी चुआंÓ और 'छापर झरनाÓ अब सूख गए हैं। दामोदर नदी दम तोड़ रही है। यह नदी टंडवा प्रखंड से गुजरती है। पूर्व में यह नदी वहां की आबादी के लिए जीवन रेखा के समान थी दैनिक जीवन में इसका पानी पीने और सिंचाई में इस्तेमाल करते थे। नदी में मछलियां पकड़ते थे। लेकिन सीसीएल के कोयला खनन के कारण इस नदी में पानी अब सालों भर नहीं बहता। साल के 3-4 महीने इसका पानी सूख जाता है। चिंता इस बात की है कि यहां कोई उसे बचाने वाला नहीं। गंगा को बचाने के लिए तो गंगा एक्शन प्लान बना है। यहां भी दामोदर बचाओ आंदोलन चल रहा है। लेकिन गंगा के लिए अनशन करने वाले स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद हैं। लेकिन दामोदर के लिए...? भूपेन हजारिका की तरह कहने को मन होता है, ओ दामोदर, बहती हो क्यों? यहां ब्लास्टिंग से बच्चे काफी भयभीत रहते हैं। स्कूलों और घरों में दरारें पड़ चुकी हैं। माइनिंग के लिए धरती की ऊपरी परत को हटाकर कड़े चट्टान को धंसाने के लिए गहन ब्लास्टिंग की जाती है। ग्रामीण असरफी उरांव कहते हैं कि ब्लास्टिंग के कारण घर की दीवारों पर बड़ी-बड़ी दरारें आ गई हैं। छत भी टूट गया है। इस मकान को बनाने में 87 हजार रुपये लगे थे और 57 हजार की लागत से एक आटा चक्की लगाई थी, लेकिन सब बेकार हो गया। पर, सीसीएल के तकनीकी निदेशक टीके नाग कहते हैं कि 'ब्लास्टिंग का कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा है। डायरेक्टर जनरल एंड माइंस सेफ्टी की टीम की स्वीकृति के बाद भी प्रोजेक्ट से उत्पादन शुरू हुआ है। प्रोजेक्ट से आठ सौ मीटर की दूरी पर गांव बसे हैं।Ó इसका सबसे पहले खुलासा यूएन का विश्वव्यापी संगठन 'फूड फस्र्ट इनफारमेशन एंड एक्शनÓ ने किया था। उसने पूरनाडीह प्रोजेक्ट को दौरा किया था। जो स्थिति देखी, उसे लेकर उसने प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति एवं झारखंड के राज्यपाल को जुलाई, 2009 को पत्र लिखा। प्रधानमंत्री कार्यालय ने झारखंड के गृह विभाग के उपसचिव विपिन बिहारी चौधरी, को 21 जुलाई, 2011 को पत्र लिखा। चौधरी ने चतरा के एसडीओ को पत्र भेजा। एसडीओ ने कार्यपालक अभियंता, पूरनाडीह के परियोजना अधिकारी अनूप श्रीवास्तव को लेकर स्थल निरीक्षण किया। पाया कि पत्र में वर्णित आरोप हद तक सही हैं। कुसुम टोला के ग्रामीण पुरनाडीह कोलियरी द्वारा किए जा रहे विस्फोट से प्रभावित हैं। विस्फोट से स्कूल भवन क्षतिग्रस्त हो रहे हैं, भूमिगत जलस्तर नीचे जा रहा है, जनजीवन एवं कृषि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। बस्ती के समीप उत्खनित कोयला का स्वत: आक्सीकरण हो जाने के कारण कोयला भंडार निरंतर धुआं देकर जल रहा है और पर्यावरण को लगातार प्रदूषित कर रहा है। जिसके कारण टोला के ग्रामीणों को सांस की समस्या व जानमाल की सुरक्षा संदिग्ध बन गई है। 10 अक्टूबर, 2010 को एसडीओ ने ओदश दिया कि विस्फोट तत्काल प्रभाव से अगले आदेश तक रोक दें। यदि उन्हें कोई आपत्ति है तो 15 अक्टूबर, 2010 को अधोहस्ताक्षरी कार्यालय/न्यायालय कक्ष में प्रात: साढ़े दस बजे उपस्थित होकर अपना रक्ष रखें। सीसीएल अपना पक्ष 18 पेजों एवं 108 पेजों की संदर्भित सामग्री भी लगा दी। बताया कि, उनके मकान पुराने हैं, इसलिए क्षतिग्रस्त हों रहे हैं। विस्फोट से नहीं। पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं हो रहा, क्योंकि मानक के अनुसार काम हो रहा है। जवाब से एसडीओ संतुष्ट नहीं दिखे और 16 नवंबर, 2011 को उनकी दलीलों को अस्वीकार कर दिया और अपने आदेश को आत्यंतिक घोषित किया। कहा, आदेश की अवहेलना पर दंप्रसं की धारा 143 के अंतर्गत सीसीएल के विरुद्ध पुन: कार्रवाई करने की अधोहस्ताक्षरी की विवशता होगी। जो आदेश दिया वह यह कि-किसी भी सूरत में गहन एवं साधारण ब्लास्टिंग बस्ती के नजदीक कदापि न की जाए। उन्होंने एक और तथ्य का उल्लेख किया कि 19 सालों में जिनकी जमीन ली गई है, उन्हें न मुआवजा दिया गया न नौकरी, जिसके कारण उनकी आर्थिक स्थिति बदतर होती जा रही है। 2500 की आबादी उत्खनन से घिर गई है। पारंपरिक कृषि कार्य ध्वस्त हो गया है। जमैक की एक फैक्ट फाइडिंग टीम 29 फरवरी को वहां गई तो, परियोजना पर एसडीओ के आदेश का कोई असर नहीं था। झारखंड का यह विकास कहां ले जाएगा?

बाजारवाद का मिला है लाभ


संजय कृष्ण : प्रो श्यौराज सिंह बेचैन दलित चिंतन का एक महत्वपूर्ण नाम है। दिल्ली विवि में प्रोफेसर हैं। 'मेरा बचपन मेरे कंधों परÓ आत्मकथा से चर्चित बेचैन रांची में दलित सम्मेलन में भाग लेने आए हुए थे। जागरण संवाददाता से कई मुद्दों पर उनसे बातचीत की। प्रमुख अंश।
-हिंदी में दलित साहित्य किस मुकाम तक पहुंचा है?
दलित साहित्य ने अपनी पहचान बना ली है। भूमंडलीकरण और बाजारवाद का लाभ भी दलित साहित्य और चेतना को मिला। पूरी दुनिया में दलित लेखन की परंपरा विकसित हुई है। रिसर्च सेंटर बने हैं। अनुवादों का दायरा बढ़ा है। अंग्रेजी, मराठी, मलयालम, उर्दू आदि में दलित साहित्य के अनुवाद हो रहे हैं।
-दलित आत्मकथाएं काफी आ रही हैं। इनका स्वागत भी हो रहा है? इसे किस रूप में देखते हैं।
कहानी-उपन्यास आदि में दलित समाज उपस्थित रहा है। चरित्र भी रहे हैं। लेकिन उसमें कल्पना की छौंक होती है। पठनीयता के लिहाज से यह जरूरी भी है। पर आत्मकथा में कल्पना की गुजांइश नहीं होती। जो सच है, जो भोगा है, उसे ही अभिव्यक्त करना है। सो, वहां यथार्थ है। दूसरे, दलित लेखकों को जन्म से लेकर बचपन और युवा होने तक तिरस्कार, अपमान और घृणा के साथ जीना पड़ता है। किस परिवेश में कैसे वह बड़ा होता है, यह वही जान सकता है, जो दलित है। इसलिए दलित आत्मकथाएं बड़े चाव से पढ़ी जा रही हैं।
-दलित चिंतक प्रेमचंद को भी कठघरे में खड़ा करते हैं। उसके पीछे क्या उद्देश्य है?
प्रेमचंद की कहानियां या उपन्यास में घिसू, माधव या बुधिया जैसे पात्र दयनीय स्थिति में दिखाए गए हैं। वे याचक की भूमिका में हैं। बेशक, उनकी सहानुभूति थी लेकिन सवाल है कि जब प्रेमचंद लिख रहे थे, उसी समय स्वामी अछूतानंद भी लिख रहे थे, पत्रिका निकाल रहे थे, लेकिन उनकी उनसे कोई बातचीत नहीं। जब दलितों के प्रति उनकी सहानुभूति थी, वे अछूतानंद से कैसे दूर रहे?
-डा. धर्मवीर अंबेडकर की चिंतन को खारिज करते हैं, जबकि दलित साहित्य और चेतना के वे स्तंभ हैं?
धर्मवीर अंबेडकर को पूना पैक्ट तक मानते हैं। उसके बाद उनसे दूर हो जाते हैं। वस्तुत : धर्म के बिंदु पर उनसे अलगाव है। बुद्ध, मक्खली गोशाल और महावीर तीनों मित्र थे। गोशाल कुम्हार थे, लेकिन गोशाल बाद में हाशिए पर चले गए और इनका धर्म मार्ग चल निकला। बुद्ध राज परिवार से थे, सो लोगों ने उन्हें हाथों हाथ लिया। जबकि सारे मौलिक विचार गोशाल के थे। पहली बार मानवता की बात गोशाल करते हैं। दूसरे, अंबेडकर पुनर्जन्म को मानते हैं, जबकि बुद्ध भी नहीं इसे मानते थे। अंबेडकर में बुद्ध गहरे जड़ जमाए हैं। बुद्ध भी बराबरी की बात करते हैं, लेकिन संघ में। और संघ में भी नाई गया तो वहीं काम कर रहा है, धोबी गया तो वही काम कर रहा है। फिर समानता कहां है? बराबरी कहां थीं।
-दलित चेतना के विकास में अखबारों की भूमिका को किस नजर से देखते हैं?
दलित चेतना के विकास में अखबारों ने महती भूमिका निभाई है। शिक्षा, राजनीतिक चेतना के विकास में इनका योगदान महत्वपूर्ण है?
-हिंदी पत्रिकाओं का योगदान कहां तक मानते हैं?
हिंदी में तीन सौ लघु पत्रिकाएं निकलती हैं। कानपुर से भीम, सारिका ने भी दलित अंक निकाले, हंस का भी दलित पर विशेषांक आया, जिसका संपादन खुद मैंने किया था। विमलकीर्ति का अंगुत्तर, जबलपुर का तीसरा पक्षधर आदि पत्रिकाओं ने योगदान दिया। अब कई पत्रिकाएं दलित पर विशेषांक निकाल रही हैं। यह शुभ संकेत है।

अंबेडकर ने हाशिए की वैचारिकी निर्मित की

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संजय कृष्ण : काशी हिंदू विश्वविद्यालय, हिंदी विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. चौथीराम यादव ने मंगलवार को जागरण से विशेष बातचीत में कहा कि दलित साहित्य में भी अंतर्विरोध उभर रहे हैं। यह ठीक भी है। जैसे डा. धर्मवीर खुद को अंबेडकर से आगे बताते हैं। वे अंबेडकर को खारिज करते हैं। उन्हें अंबेडकर का बौद्ध होना अखरता है। वे दलित के लिए आजीवक धर्म की वकालत करते हैं। लेकिन दलित बुद्ध-अंबेडकर के प्रति वही भाव रखते हैं। धर्मवीर के लिए बौद्ध धर्म क्षत्रिय धर्म लगता है। बुद्धिज्म में वह स्पेस है, जहां दलितों के लिए एक जगह है। बुद्धिज्म के तीन सूत्र हैं। समता, स्वतंत्रता, बंधुत्व। यही तीन सूत्र फ्रेंच रेवोल्यूशन के भी हैं। जनता के हित में जो भी बात होगी, सामाजिक क्रांति की भी जब बात होगी तो यही तीन सूत्र होंगे। ये तीनों सूत्र परंपरा और इतिहास से अंबेडकर ने लिए।
बुद्ध को पहला गुरु माना अंबेडकर ने
अंबेडकर ने जो देखा-भोगा था, उसे दूर करने के लिए बुद्ध के पास गए। बुद्ध को पहला गुरु माना, क्योंकि बुद्ध तार्किक बात करते हैं। बौद्ध चिंतक अश्वघोष, नागार्जुन, दिग्नाग..जातिवाद पर तार्किक प्रहार करते हैं। ये तीनों ब्राह्मण थे, पर अपने समय के बेहद प्रगतिशील। इसके बाद दूसरे गुरु हुए कबीर। कबीर का समय बुद्ध से भी जटिल था, क्योंकि इस समय हिंदू कट्टरपंथी एवं मुस्लिम कट्टरपंथी दोनों समाज पर हावी थे। कबीर दोनों को बता रहे थे, अरे इन दोऊ राह न पाई...। कबीर ने भी जातिवाद पर प्रहार किया। तीसरे गुरु थे, ज्योतिबा फुले। आधुनिक काल में वही काम किया जो भक्ति काल में कबीर ने। ज्योतिबा ने एक काम और किया, वह है शिक्षा। दलितों को शिक्षा से जोड़ा। इसी काम को अंबेडकर ने आगे बढ़ाया।
माक्र्स से भी प्रभावित थे
अंबेडकर माक्र्स से भी प्रभावित थे। उन्होंने डांगे के साथ काम किया था। दोनों में इस बात को लेकर मतभेद था कि अंबेडकर मानते थे कि पूंजीवाद के जाति और वर्ग दोनों शत्रु हैं। डांगे मानते थे कि वर्ग खत्म हो जाएगा तो जाति स्वयं खत्म हो जाएगी। पर, अंबेडकर की सोच यह थी कि अमीर-गरीब यदि दो वर्ग हो जाएं तो अमीर दलित को अपमान सहना ही पड़ेगा, जबकि गरीब ब्राह्मण भी सम्मान पाएगा। सामाजिक लड़ाई के बिना वर्ग की लड़ाई का कोई माने नहीं है। अंबेडकर को बाइपास करके माक्र्सवादी अपने लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सकते।

मौन हो गई मुखर आवाज

संजय कृष्ण : संस्कृति पुरुष डा. रामदयाल मुंडा पिछले महीने की तीस तारीख को अलविदा कह गए। पिछले कई महीनों से वे कैंसर से ग्रस्त थे। अमेरिका में भी इलाज कराया गया, पर उन्हें बचाया नहीं जा सका। पद्मश्री डा. मुंडा के निधन पर मुख्यधारा का मीडिया बहुत मुखर नहीं हुआ। दिल्ली के किसी बड़े अखबार में भी कुछ बड़ी चीज देखने को नहीं मिली। संगीत नाटक अकादमी सम्मान से नवाजे गए डा. रामदयाल मुंडा जितना अच्छा बांसुरी बजाते थे, उतना ही अच्छा मांदर और नगाड़ा भी। मांदर की थाप जब उनके कानों में घुलने लगती, उनके पैर खुद ब खुद थिरकने लगते। नृत्य और गीत भी उनके जीवन का हिस्सा थे। जहां चलना ही नृत्य और बोलना ही गीत हो वहां मुंडा जी कैसे इनसे बचे रह सकते थे। दर्जनों छोटी-बड़ी बांसुरियां व दस-बारह किस्म के नगाड़े व मांदर उनके बैठके की शान थे।
आज भी उनका मुस्कराता चेहरा बार-बार आंखों में घूम जाता है। जब भी मिलते, मुस्कराते मिलते। आधी बांह का खादी का कुर्ता, गर्दन तक अनुशासित घुंघराले खिचड़ी बाल और आंखों पर चश्मा यही उनकी पहचान थी। सादगी में लिपटा उनका व्यक्तित्व था। अगर आप उनके व्यक्त्वि से पूर्व परिचित नहीं हैं तो भ्रम होना स्वाभाविक है जो आदमी इतना सरल दिखाई दिखाई दे रहा है, उसने अमेरिका में पढ़ा-पढ़ाया होगा, भाषा का बेजोड़ विद्वान होगा और उतना ही अपनी माटी से भी जुड़ा होगा...।
आधुनिकता और विद्वता के भारी-भरकम आभा मंडल में लोग अपनी संस्कृति भूल जाते हैं। मुंडाजी इस माने में अपवाद थे। राज्यसभा में चुने जाने व राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के सदस्य होने के बावजूद न बांसुरी में फूंक मारना छोड़ा न मांदर पर थाप देना। मुंडा जी भाषा के जितने बड़े विद्वान थे, उतना ही बड़ा वे कवि भी थे। मुंडारी-हिंदी में उनका एक संग्रह 2005 में आया था सेलेद यानी विविधा। जी तोनोल (मन बंधन), जी रानाड़ा (मन बिछुडऩा), एनेओन(जागरण)। राग जदुर में उनका एक गीत है...मैंने तुम्हें बचपन में देखा था/तुम सुकान पहाड़ की तरह ऊंची हो गई/ मैंने तुम्हें छुटपन में देखा था/ तुम बुंडू बांध की तरह गहरी हो गई...। राग काराम का एक गीत सुनिए...काश, यह संभव होता...काश, यह संभव होता! मैं प्रेत बन जाता, प्रिय, मैं प्रेत बन जाता! दिन-रात तुम्हारे पीछे पड़ता। ...तुम्हारी छाया का पीछा करता।...गीत के अंतिम बोल हैं...प्रिय, तुम्हारे साथ भागकर खो जाता, मैं हटिया कारखाने में मजदूरी करता। हटिया कारखाने में मजदूरी करता...। प्रेम से भीगी कविताओं में मुंडाजी हृदय खुलता है। गीत-संगीत के जरिए आदमी अपनी मूल प्रकृति को अभिव्यक्त करता है। यहां कोई बनावटीपन नहीं होता। समय का कोई बंधन नहीं। इन क्षणों में सत्य और शाश्वत में जीता है। मुख्यधारा का समाज नहीं जानता कि डा. रामदयाल मुंंडा न सिर्फ एक अंतरराष्ट्रीय स्तर के भाषाविद, समाजशास्त्री और आदिवासी बुद्धिजीवी थे, बल्कि वे एक अप्रतिम कलाकार भी थे। वे झारखंड नहीं, दस करोड़ आदिवासियों की आवाज थे। बोड़ो-संताल संघर्ष विराम में महती भूमिका निभाई। उनके चाहने वाले देश ही नहीं विदेश में भी हैं, लेकिन अपने देश का गैरआदिवासी समाज उन्हें आज भी नहीं समझ पा रहा है।