बुधवार, 17 जून 2015

1857ः औपनिवेशिक सत्ता के खिलाफ दुनिया का सबसे बड़ा आंदोलन रू हितेंद्र पटेल

डा. हितेंद्र पटेल शांति निकेतन के विश्व भारती में इतिहास के प्राध्यापक हैं। इतिहास की रूढिबद्ध अनुशासनों के साथ-साथ परंपरा और लोक को भी इतिहास में जगह देने और इनसे प्राप्त निष्कर्षों को देखने-परखने में विश्वास करते हैं। इतिहास केवल आफिशियल डाकूमेंट से ही निर्मित नहीं होता, लोक कंठों में भी उसका एक आयाम छिपा होता है। 1857 को देखें तो इतिहासकारों को इस महासंग्राम को समझने में डेढ़ सौ वर्ष लग गए, जबकि लोक में वह उसी समय अपना प्राप्य ग्रहण कर लिया था। यह बातचीत भी 1857 पर ही केंद्रित है। डा. पटेल इन दिनों इसी विषय पर अलग-अलग ढंग से सोच रहे हैं और लिख रहे हैं। 31 जुलाई के रांची प्रवास पर उनसे लिया गया यह साक्षात्कार 1857 के ही सवालों से जूझता है.....।
 
अभी-अभी 1857 की 150 वीं वर्षगांठ मनाई गई है। विभिन्न पत्रिकाओं ने अपने विशेषांक निकाले। आप इसे किस रूप में लेते हैं? इसकी उपलब्धि क्या रही?
इस तरह की पत्र पत्रिकाओं पर विचार करते हैं तो देखिएगा कि बहुत तरह की चीजें छपती हैं और कई नई-नई बातें सामने आती हैं। 1857 पर जो बातचीत हुई हैं या चर्चाएं हुई हैं उससे एक बात तय हो गई कि 1857 को राष्ट्रीय आंदोलन के रूप में स्वीकृति मिल गई। और इसके प्रसार में बहुत सारे लोगों का इस प्रश्न से जोडने में पत्र-पत्रिकाओं की बड़ी अहम भूमिका रही। अगर आप संख्या देखेंगे तो एक बड़ी जमात इतिहासकार और साहित्यकारों की, जो इनसे परिचित नहीं थे, पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से 1857 से जुड़ गईं और उन लोगों ने कुल मिलाकर के बहुत ऐसी सूचनाएं और बहुत ऐसी बातें इतिहासकारों के समक्ष रखीं कि अब पुराने तरीके से 1857 को नहीं देखा जा सकता है। इसलिए मुझे लगता है कि कुल मिलाकर पत्र पत्रिकाओं की एक बड़ी ही सकारात्मक भूमिका रही है।

 1857 को वीर सावरकर ने स्वाधीनता संग्राम की संज्ञा दी थी, लेकिन उनके इस आग्रह को एक विशेष विचारधारा के लोगों ने अपेक्षित महत्व नहीं दिया। आप सावरकर की इस स्थापना से किस हद सहमत हैं?

सामान्य तौर पर कहा जाता है कि वामपंथियों केवीर सावरकर के प्रति जो पूर्वग्रह थे, उस किताब के बारे में विचार करते समय भी सावरकर को ज्यादा याद रखा। उस हद तक यह सही है लेकिन वामपंथी शोधार्थियों की तरफ से 1857 पर जो सामग्री आई है, मैंने भी कई लेख लिखें है इसके ऊपर, उन सभी ने सावरकर की जो महत्वपूर्ण भूमिका है, इसे स्वतंत्रता संग्राम के रूप में चिह्निड्ढत करने या रेखांकित करने की, उसे सभी ने किया है। यह कहना बिल्कुल सही नहीं है कि जो लोग वामपंथी विचारधारा से सहानुभूति रखते हैं उन्होंने 1857 पर वीर सावरकर की पुस्तक का अवमूल्यन किया है। कुछ लोगों ने किया होगा, लेकिन ऐसे लोग सभी विचारधारा में मिल सकते हैं। लेकिन वीर सावरकर की 1857 पुस्तक को इतिहासकारों ने बड़ा महत्व दिया है।

वामपंथी विचारधारा के लोग इस महासंग्राम को राष्ट्रीय विद्रोह मानने से परहेज करते रहे, जबकि माक्र्स ने इसे सिपाही विद्रोह की बजाय राष्ट्रीय विद्रोह के रूप में देखा। आखिर, इस दृष्टि के पीछे क्या कारण रहे?

जब हम वामपंथी विचारधारा की बात करते हैं तो ध्यान रखें कि इस धारा में बहुत तरह से लोग हैं, बहुत सारी उपधाराएं भी हैं। इसलिए यह कहना सही नहीं है कि 1857 के बारे में वामपंथ की दृष्टि हमेशा नकारात्मक रही है। पीसी जोशी को स्मरण करें। पीसी जोशी ने 1857 के बारे में 1957 में जिस ढंग की सामग्री उपलब्ध कराई थी, जिस तरह से सोच को एक नई दिशा दी थी, वह सबके सामने है। अभी भी हम लोग जो विचार करते हैं, पीसी जोशी की बहुत सारी बातों को हम लोगों को गौर करना पड़ता है। खासकर, जो लोक गीतों के संग्रह की ओर उनका जोर था, लक्ष्मीबाई, झलकारी बाई  आदि के संदर्भ में जो लोकगीत हैं, उनका बड़ा महत्व है। मुझे नहीं लगता कि वामपंथी विचारधारा से जुड़े लोगों ने इसकी अनदेखी की हैै। हां, यह जरूर है कि अन्य इतिहासकारों की तरह वामपंथी विचारधारा के लोगों को भी यह लगता रहा है 1857 की जो पहचान थी, 1857 की पहुंच थी लोगों में, वह उतनी व्यापक नहीं थी, लेकिन अब जब नए स्रोत हम लोगों के सामने उपलब्ध हो रहे हैं, लोक स्मृति की बात आई है, लोक नायकों की जो स्मृतियां हमारे यहां है, यह स्पष्ट होने लगा है कि विद्रोह के प्रति लोगों में बहुत सकारात्मक भाव था। उत्तर में था और दक्षिण में था, असम में था। नए स्रोतों के आने के बाद नए तथ्य आ रहे हैं। पहले इस बारे में बहुत स्पष्ट ढंग से कहना मुमकिन नहीं था। अब यह कुहासा छंट रहा है।

आपने लिखा है कि 1857  का विपुल इतिहास उपलब्ध है। दक्षिणपंथ से लेकर वामपंथ ने खूब बहस की, लेकिन हासिल क्या हुआ? आप क्या मानते हैं इतनी माथा पच्ची के बाद हमारे इतिहासकार किसी सर्वमान्य निष्कर्ष तक पहुंच पाए हैं, यदि नहीं तो उसके पीछे कारण क्या रहे?

 विपुल इतिहास इसलिए भी विपुल दिख रहा है कि इस समय इतिहास में नए स्रोतों का स्वागत किया जा रहा है। ऐसे स्रोत, जो पारंपरिक इतिहास लेखन में सहायक नहीं माने जाते थे, अब उन स्रोतों को लेकर नए इतिहास का निर्माण किया जा रहा है। लोक स्मृति के संदर्भ में निश्चित रूप से आफिशियल डाकूमेंट पर्याप्त नहीं होते हैं, लोगों की स्मृति में लोक नायक या नायिकाओं के रूप में उनकी जो पहचान बनी है, लक्ष्मीबाई की पहचान कहिए, कुंवर सिंह की पहचान कहिए, तात्या टोपे, बहादुर शाह जफर आदि को लेकर लोक में छवियां रही हैं, उन छवियों के इतिहास को-एक इतिहास होता है, एक इतिहास की कल्पना होती है और जो इतिहास की कल्पना होती है, उसका भी एक इतिहास होता है- इस तरफ इतिहासकारों का ध्यान ज्यादा गया है, इसीलिए मुझे लगता है सकारात्मक रूप में 1857 अब अच्छी तरह समझा जाने लगा है।

1857 का आंदोलन नहीं हुआ होता तो देश को आजादी मिलती या नहीं?

 देश को आजादी मिलती या नहीं, इस बात से 1857 को जोड़ा जाना ठीक नहीं है। 1857 अपने आप में एक विशद अध्याय है। मुझे तो ये लगता है कि जैसे स्वतंत्रता संग्राम गांधी के नेतृत्व में जैसे लड़ा गया उसको लेकर जो एक दृष्टि बनी है एक अलग विषय के रूप में, उसी तरह 1857 को एक विषय के रूप में मानकर नहीं, एक बहुत बड़ा विषय मानना चाहिए। इसके अंतर्गत तमाम तरह के अध्ययन के विषय हो सकते हैं। 1857 को लेकर  सिर्फ 1857 पर केंद्रित पत्रिकाएं निकलनी चाहिए, 1857 केंद्रित ऐतिहासिक सामग्री का संचयन करना चाहिए, इसका अलग से संग्रहालय होना चाहिए। ताकि इतिहासकारों के बीच इसे ज्यादा स्वीकृति मिल सके। जैसे यूरोप में द्वितीय विश्व युद्धों को लेकर संग्रहालय और पुस्तकालय हैं। उसी तरह 1857 को लेकर अपने देश में होनी चाहिए, जिसमें उसके विविध आयामों को देखा जा सके। इसमें और विस्तार से जाने की लगातार संभावना है।

 आप 1857  को क्या मानते हैं, सिपाही विद्रोह, गदर, स्वाधीनता आंदोलन या कुछ और?

निश्चित रूप से 1857  सिपाही विद्रोह नहीं था। गदर कहने के दिन भी लद गए हैं। यह एक महान स्वाधीनता आंदोलन था और औपनिवेशिक सत्ता के खिलाफ हुई दुनिया का सबसे बड़ा आंदोलन था।

1857 की लड़ाई को हिंदू और मुसलमानों ने साथ मिलकर लड़े, लेकिन कालांतर में धीरे-धीरे यह एकता विखंडित होती गई, जिसकी परिणति बंटवारे के रूप में सामने आई? आखिर वह कौन सी ताकत रही, जिसने गंगा-जमुनी तहजीब को नष्ट किया?

यह बिल्कुल सही है। मुझे लगता है 1857 की विरासत के रूप में हिंदू मुसलमानों के आपसी सौहाद्र्र को याद रखने की जरूरत है। मुझे प्रतीत होता है कि 1857 की जो गंगा जमुनी तहजीब थी, जो क्रमशरू 19वीं शताब्दी से खंडित होती गई है और उसमें औपनिवेशिक सत्ता, सरकार की तो भूमिका है ही, जो हिंदू और मुसलमानों के बीच से नया वर्ग निकलकर आया मध्यवर्ग से, उसने इस दायित्व का पालन नहीं किया और धीरे-धीरे राष्ट्रवाद के उभरने के साथ-साथ संप्रदायवाद की विचारधारा शक्तिशाली होती गई और बाद में चलकर हिंदू और मुसलमानों के बीच खाई और गहरी होती गई। इसीलिए 1857 का स्मरण हमें याद दिलाता है कि 1857 के दौर तक कम से कम हिंदू और मुसलमानों के बीच बहुत ज्यादा सौहाद्र्र रहा था और इन्होंने मिलकर साथ लड़े थे बिना यह सोचे कि यह हिंदू है, यह मुसलमान है।

 इस आंदोलन के दो साल पहले आज के झारखंड में 1855 में ही हूल हो चुका था। इसमें करीब दस हजार आदिवासी और गैरआदिवासी मारे गए लेकिन इतिहास की मुख्यधारा में इस हूल को अपेक्षित जगह नहीं मिली? क्यो?

 ऐसा नहीं है कि 1857 के पहले जो आदिवासियों का विद्रोह हुआ था, उसको महत्व कम मिला। किताबें लिखी गई हैं और डाकूमेंट्स भी रखे गए हैं, लेकिन जैसे ही राष्ट्रीय आंदोलन की बात होती है, स्पष्ट विचारधारा और राष्ट्र की पूरी संकल्पना की बात होती है। आदिवासियों के बीच में राष्ट्र की संकल्पना जो है, उस रूप में उपस्थित नहीं थी या हम लोग इतिहासकार के रूप में नहीं रेखांकित कर पाए थे, इसलिए वे चीजें 1857  जुड़ी नहीं हैं या उतने महत्व की मालूम नहीं होती थीं, लेकिन जैसे-जैसे इतिहास का विस्तार होता जा रहा है, इतिहास को एक नए तरह से पढने का सिलसिला चल पड़ा है सारी दुनिया में, केवल भारत में ही नहीं। इतिहास के जो कई पहलू हैं, कई आयाम जो खुल रहे हैं अब ऐसे संपर्कों की तलाश की जा रही है जहां ऊपर से देखने पर कोई संपर्क दिखाई नहीं देता लेकिन भीतरी तौर पर औपनिवेशवाद के खिलाफ अलग-अलग लड़ते हुए दोनों के संपर्क आप ढूंढ भी सकते हैं और दोनों एक स्तर पर जुड़े हुए हैं।

 पहले एक विदेशी कंपनी आती है, और देश को गुलाम बना लेती है। आज हजारों विदेशी कंपनियां देश में काम कर रही हैं। क्या आपको नहीं लगता है कि हम फिर से गुलामी की ओर बढ़ रहे हैं? सेज का जगह-जगह विरोध हो रहा है, पर देश की सत्ता समझौते पर समझौते कर रही है? आने वाले समय में इसके क्या परिणाम या दुष्परिणाम होंगे?

 ये खतरा तो है, निश्चित रूप से यह खतरा वैश्वीकरण के साथ बढ़ा है। जिस तरह से संकेत मिल रहे हैं, उससे तो यही प्रतीत हो रहा है कि हम सावधान नहीं रहे तो हम फिर से गुलाम बन जाएंगे। और ये गुलामी उससे भी भयानक गुुलामी होगी, क्योंकि इस गुलामी की स्वीकृति हम खुद अपनी ओर से दे रहे हैं। हमारे देश के लोग ही उत्साहित होकर ऐसे चीजों से जुड़ते चले जा रहे हैं जो उनको गुलाम बना सकता है। लेकिन कुछ उत्साहबर्द्धक स्थिति भी बन रही है। प्रतिरोध भी तीव्र हो रहा है। और पूंजीवाद का संकट सिर्फ भारत में ही नहीं, वैश्विक संकट के रूप में भी उभर रहा है। इस उभरते पंूजीवाद के संकट के बीच और तमाम तरह के प्रतिरोधों के मुखर होने के बीच हम थोड़ी संभावनाएं भी तलाश सकते हैं। गुलाम होने का खतरा जरूर है, लेकिन गुलाम होना हमारी परिणति या गुलाम होने के लिए हम अभिशप्त नहीं हैं।

 डैलरिंपल ने द लास्ट मुगल लिखने में 20 हजार पांडुलिपियों का उपयोग किया। हमारे देश में बहुत सी पांडुलिपियों का अध्ययन ही नहीं किया गया है। बिना समग्र अध्ययन के क्या हम किसी सर्वमान्य निष्कर्ष तक पहुंच सकते हैं?

 डैलरिपंल की किताब जब बाजार में पहुंची थी तो कहा गया था कि हजारों हजार ऐसे स्रोतों को देखा है, जिसे भारतीय इतिहासकारों ने उपेक्षा की है। यह आधा सच और आधा झूठ है। सच यह है कि निश्चित रूप से उन्होंने उन स्रोतों को देखा है जिस ओर हमारा ध्यान कम गया था या गया न हो, गई भी थी तो वो चीजें स्मृति में नहीं हैं। आप रिजवी का नाम ले सकते हैं। रिजवी साहब ने डैलरिंपल के पहले बहुत सारी सामग्री का उपयोग किया था। बहुत सारी सामग्री धीरे-धीरे नष्ट हो गईं या इधर-उधर हो गईं। और इतिहासकारों के बीच वह ज्यादा प्रचलन में नहीं रह पाईं। यहां तक कि रिजवी साहब की किताब भी एक डेढ़ साल पहले तक बहुत सारे इतिहासकारों ने नहीं देख पाए थे। जरूरत इस बात की थी कि उन सारे तथ्यों को एकत्रित किया जाता, जिनके लिए सरकारी सहायता की जरूरत थी। इतिहासकारों की ओर से भी चेष्टाओं की जरूरत थी। उसमें कमी थी। लेकिन यह कहना बिल्कुल गलत है कि डैलरिंपल ही पहले वह इतिहासकार हैं, जिन्होंने विभिन्न तरह के स्रोतों का उपयोग किया। मैं कह सकता हूं कि उत्तरप्रदेश सरकार ने कई इतिहासकारों की मदद से कई ऐसे प्रयास किए हैं, जिनमें 1857 का इतिहास ज्यादा प्रामाणिक ढंग से और आइडोलाजिकली सही तरीके से पेश किया गया है। उत्तरप्रदेश सरकार की ओर संभवतरू कमलापति त्रिपाठी की मदद से वे किताबें आई थीं। उनमें बहुत सारे स्रोतों का उपयोग किया गया था। कहा जाता है कि बहुत सारे आर्काइव गायब हो गए। इन सामग्रियों की खोज की जरूरत है। इतिहासकार के हाथ बंधे होते हैं। कोई चीज तभी लिख सकता है, जब उसके पास प्रामाणिक स्रोत हों, इसलिए स्रोतों को उपलब्ध बनाए रखने के लिए सरकारी मदद की ज्यादा जरूरत होती है। और मुझे लगता है कि सरकार ने जिस तरह से 1857 को लेकर लगातार पिछले एक डेढ़ सालों में इतिहासकारों की मदद की है, वह सिलसिला चलती रहेगी तो 1857 पर इतिहासकारों को मदद मिलती रहेगी, तब धीरे-धीरे पता चल पाएगा और बहुत सारी चीजेें कहां छिपी हैं। मुझे यह लगता है कि विपुल सामग्री के आने के बाद 1857 की ज्यादा प्रमाणिक, समग्र छवि लोगों के सामने आएगी और उन सबको ध्यान में रखने के बाद 1857 का सही मूल्यांकन हो पाएगा।

बुधवार, 10 जून 2015

इतिहास से टकराता एक उपन्यास बनाम कई बहुश्रुत चरित्रों की छवियां बदलती एक कथा

‘भारतीय किसान प्रायरू लाभ और प्रतिफल के लिए नहीं, वरन जीवन निर्वाह के लिए खटता था। भूमि की अतिसंकुलता और जीवन निर्वाह के वैकल्पिक साधनों एवं दुर्दशा से बचने के उपायों की कमी-इन सबके कारण कहीं भी, किसी भी शर्त पर फसल उगाने को किसान लाचार था। खाद्य सामग्री के लिए उसे जमीन की जरूरत है और जमीन के लिए उसे महाजन की मिन्नत चिरौरी करनी पड़ती है। यद्यपि जितनी उसकी चल-अचल संपत्ति है उससे अधिक उस पर महाजन का ऋण है, जहां उसकी जमीन महाजन के हाथ में चली गई है, वहां किसी भी कायदे कानून से उसकी जरूरतें पूरी नहीं हो सकतीं, काश्तकारी का कोई भी कानून उसकी रक्षा नहीं कर सकता।’                                                                                                                                   -रायल कमीशन की रिपोर्ट, (1926)
 
किसान की हालत जिस तरह दिन-पर-दिन गिरती जा रही है, उससे किसान क्रांति की आशंका होती है।  -राधाकमल मुखर्जी  (हिंदुस्तान की भूमि समस्या-1933)
 
‘अच्छा यह बताओ पदारथ, जो बिसार नहीं पाएंगे वो बोएंगे कहां से, और बोएंगे नहीं तो पहले का बकाया कैसे वापस करेंगे?’
‘जरा धीरे बोलो साधू। ...सब ससुरे जोत-बो लेंगे और लगान भर देंगे तो बेदखल कैसे होंगे? बेदखल नहीं होंगे तो हमारे-तुम्हारे यहां मजूरी कौन करेगा? फिर बेदखल होंगे तो आखिर खेतवा कहां जाएगा। राय साहब किसी को तो देंगे, खुद तो यहां काश्त करने आएंगे नहीं।’   
             
                                                                                               -(बेदखल-कमलाकांत त्रिपाठी, पेज 13-14)

भारतीय किसान की यही है त्रासदी। कबीर की बानी से लेकर प्रेमचंद के ‘गोदान’, श्याम बिहारी ‘श्यामल’ की ‘धपेल’ शिवमूर्ति के ‘आखिरी छलांग’ और कमलाकांत त्रिपाठी के ‘बेदखल’ तक किसानों के पोर-पोर दर्द को महसूस किया जा सकता हैं। रेणु की परती परिकथा को भी भूला नहीं जा सकता है। फेहरिश्त और लंबी हो सकती है, पर यहां उसे बढ़ाना उद्देश्य नहीं हैै। जब हम इन रचनाओं पर नजर डालते हैं तो यही लगता है कि पंद्रहवीं शताब्दी (समय और पीछे भी धकेला जा सकता है) से लेकर अब तक किसानों की स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ। किसान तब भी बेहाल थे, जब सिंचाई के साधन नहीं थे। प्रकृति पर उनकी निर्भरता थी। किसान अब भी परेशान हैं, जब आधुनिक मशीनों ने गाय-बैलों को खूंटे तक ही सीमित कर दिया है। पहले वह आत्महत्या नहीं करता था। रो-धोकर उसकी ‘जिनगी’ की गाड़ी पार लग जाती थी। पहले महाजन थे, साहुकार थे, जमींदार थे, जिनसे वह कर्ज लेता था, खेती करता था। इसके अलावा तरह-तरह के लगान थे-
‘एक बात नहीं सुने होंगे। दवाई और भंडारा में जितना खर्च हुआ, सब रिआया से वसूल होगा। लगान की अगली किस्त के साथ फोड़ावन भी लगेगा।’ झिंगुरी सिंह ने बड़े शांत स्वर में कहा और सुंघनी की डिबिया निकालने लगे।

‘ई फोड़ावन क्या बला है बाबू साहेब?’ फर्श पर्र इंट का टुकड़ा रखकर बैठे भगवान दीन ने पूछा।
‘अरे, जैसे हथियावन, घोड़ावन, मोटरावन, लटियावन वगैरह दिए थे न, वैसे अब फोड़ावन भी देना।’ (पेज 16)
अब वह बैंकों से कर्ज लेता है। हालांकि सूदखोरों की प्रजाति अब भी नष्ट नहीं हुई है। इसलिए वह सूदखोर और बंैक दोनों पर निर्भर हैं किसानी के लिए। यह अलग बात है कि जब फसल पक कर तैयार होती है तो दाम नहीं मिलते या उसके दाम गिर जाते हैं। कर्ज में डूबे किसान के पास कोई विकल्प नहीं बचता सिवाय आत्महत्या के। आत्महत्या के बाद वह आंकड़ों का हिस्सा हो जाता है। अखबारों में थोड़ी जगह पा जाता है। इसके बाद सब कुछ शांत-स्थिर...। सरकार थोड़ी राहत की घोषणा करती है, पर यह राहत भी दलालों और साहुकारों के पेट में समा जाता है। यह हाल है अपने गणतंत्र का। गणतंत्र देश के ‘गण’ इसी मनोदशा में जी रहे हैं। कोई पूछने वाला नहीं है कि कृषि प्रधान देश में किसान क्यों मर रहे हैं, क्यों आत्महत्या कर रहे हैं?
किसानों की यह स्थिति क्यों हुई, कैसे हुई? क्यों किसान आत्महत्या को मजबूर हैं? क्यों उसके सिर पर बेदखली की तलवार हमेशा लटकती रहती है? क्यों विकास के नाम पर उसे ही बार-बार विस्थापित होना पड़ता है? विकास के नाम पर क्या आज तक किसी उद्योगपति या व्यवसायी के विस्थापित होने का मामला प्रकाश में आया है? आखिर, दुख, दर्द, पीड़ा किसानों के हिस्से ही क्यों आती है? आधुनिकीकरण और उद्योग के नाम पर किसानों-ग्रामीणों को ही क्यों बेदखल होना पड़ता है? इसका जवाब कौन देगा? जाहिर है, विस्थापन और बेदखली के अलावा किसानों के पास कोई चारा नहीं होता तब वह आंदोलन की राह पकड़ता है। उत्तरप्रदेश, झारखंड, आंध्रप्रदेश, उड़ीसा, पं बंगाल में किसानों के भीतर चेतना और अपने अधिकारों को लेकर जो विस्फोट हुआ है, वह इसी का परिणाम है। स्पष्टड्ढतरू इस संघर्ष-आंदोलन के पीछे सैकड़ों सालों की वह अनकही पीड़ा है जो एक साथ फूंट पड़ी है। सरकार में बैठे अंधे नेताओं और नौकरशाहों को यह भले न दिखाई दे, पर इसकी पृष्ठड्ढभूमि गहरी है।

 तमाम औद्योगिक फलसफे के बावजदू यह मानना ही पड़ता है कि किसान ही यहां की अर्थव्यवस्था के मजबूत रीढ़ हैं। (इस मंदी के दौर में अब अर्थशास्त्री कृषि पर ध्यान केंद्रित करने की सलाह ेदे रहे हैं)इन्हें तोडने का प्रयास औपनिवेशिक काल में ही शुरू हो गया था। इसके बाद भी यह सिलसिला रुका नहीं। आजादी के बाद नौकरशाहों का जो मध्यवर्ग उभरा, वह भले ही भारत में पैदा हुआ था, लेकिन बोल-चाल और सोच में अंग्रेज ही था। यही लोग निति-नियंता थे। कानून बनाने से लेकर उसको पालन कराने में इनकी भूमिका थी। उनकी इस नीति में किसान हाशिए पर थे। उनका संबंध था भी तो इतना ही कि कैसे उससे लगान वसूला जा सके। इसके लिए वह किसी भी हद तक जा सकते थे। जाते भी थे, क्योंकि उनका बनाया हुआ कानून उनके पास था। इस मानसिकता के लोग आजाद भारत में भी हावी हैं। यही लोग एयरकंडिशन कमरों में बैठकर किसानों की चिंता में दुबले होते हैं। यही लोग उनके उबरने की नीतियां बनाते हैं। इन नीतियों से किसान भले न उबरे, पर अधिकारी जरूर अपनी ‘गरीबी’ से उबर जाते हैं।
    किसानों के दुख-दर्द की कहानी उसी परपीडक दौर से शुरू होती है। जो गांव कभी आत्मनिर्भर थे, उन्हें दूसरों पर निर्भर बना दिया गया। ऐसा अंगरेजों ने बहुत सोच-समझकर किया। ए आर देसाई ने ‘भारतीय राष्ट्रवाद की सामाजिक पृष्ठभूमि’ में लिखा हैै-
‘आदिम हल और बैल से खेती और साधारण औजार की मदद से दस्तकारी की भित्ति पर टिका आत्मनिर्भर गांव, यही अंगरेजों के आने के पहले की भारतीय अर्थव्यवस्था का मूल सत्य है। ये स्वपर्याप्त गांव सदियों से भारतीय जीवन की मूल आर्थिक इकाई थे। इनमें न्यूनाधिक परिशोधन हुए थे, लेकिन राजनीतिक हलचल, धार्मिक उथल-पुथल और विनाशकारी युद्धों के बावजूद अंगरेजों के आगमन के पहले तक गांवों की चिरंतन प्रकृति लगभग अक्षुण्ण रही। विदेशी आक्रमण हुए, राजवंश बदले, आपसी लड़ाइयों के बाद विभिन्न राज्यों के भूभागों का नया बंटवारा हुआ, नए राज्य बने और बिगड़े, लेकिन आर्थिक इकाई के रूप में गांवों की हैसियत ज्यों की त्यों रही।’
 गांवोंकी इस हैसियत से छेड़छाड़ अंगरेजों ने शुरू की। यह जानी हुई बात है कि पुराने समय में भूमि पर किसी का अधिकार नहीं था। वह ग्राम समुदाय की होती थी। इसे कभी राजा की संपत्ति नहीं माना गया। हां, जमीन की पैदावार के अंशमात्र पर ही उसका अधिकार था। उसी तरह जैसे जंगलों पर आदिवासियों का अधिकार था, लेकिन गोरे साहबों ने जंगल को अपने अधीन कर लिया और आदिवासी जंगलों के अपने परंपरागत अधिकार से कानूनी रूप से बेदखल कर दिए गए। झारखंड सहित आदिवासी क्षेत्रों में जो भी हूल हुए, वह जमीन और जंगल को लेकर ही हुए। यह लड़ाई आजादी के बाद भी खत्म नहीं हुई है, आज भी चल रही है, आगे बढ़ रही है। वन अधिकार कानून भी बना तो उसमें इतनें पेंच हैं कि आदिवासी उसी में उलझकर रह गए हैं। इसे लागू कराने को लेकर अलग से संघर्ष झारखंड के गांवों में चल रहा है। जाहिर, सत्ता में जो बैठे हैं, कानून बन जाने के बाद भी कई तरह की अड़चने पैदा करते हैं। उनका वर्गीय चरित्र ऐसे मामलों में रह-रह कर उजागर होता है। बहुत दूर जाने की जरूरत नहीं है। आजादी के तत्काल बाद जमींदारी प्रथा को खत्म करने वाला कानून बना, पर कानून क्या इस प्रथा को खत्म कर पाया? मैदानी इलाकों में किसान अपनी जमीन बचाने के लिए लड़ रहा है तो पहाड़ी क्षेत्रों में आदिवासी जंगल पर अपने परंपरागत अधिकार के लिए...। लड़ाई हर जगह है।
 झिंगुरी सिंह भी लड़ रहे हैं। अपने लोगों को समझा रहे हैं। एकजुटता का पाठ पढ़ा रहे हैं। शोषण-दमन की परतदार प्रवृत्तियों को उघाड़ रहे हैं, अपने देशी जबान में- ‘मोरे भइया किसानो, तोहरी कमाई पर तालुकेदारन की धोती आकाश में झुराय रही है और तोहार दुख तकलीफ सुनै वाला कोई नहीं।...पहली बारिश के बाद किसान उछाह के साथ हल-बैल लिए खेत की ओर दौड़ता है। मगर खेत उसका नहीं। तालुकेदार जब चाहे उसे बेदखल कर दे। जिस ड्ढिमट्टी को पालते-पोसते बाप-दादे मिड्ढट्टी में मिल गए वह मिट्टड्ढी उसकी नहीं। दूर अपने आलीशान कोट में बैठा तालुकेदार उसका मालिक है और अंगरेज बहादुर उसका रखवाला। दोनों ने मिलकर रिआया को तबाह करने की कैसी रचना रची है। यही तालुकेदार जब सत्तावन के गदर में अंगरेजों के खिलाफ खड़े हुए तो रिआया ने आगे बढकर उनका साथ दिया। उनके साथ लड़-मरी। बाद में दोनों मिलकर एक हो गए और रिआया को मक्खी की तरह निकाल फेंका। उसका कोई हक नहीं, कोई अख्तियार नहीं। बस वह तालुकेदार का मुंह जोहे। उसके यहां हारी-बेगारी करे, नजराना दे और खुद दाने-दाने को मोहताज रहे। मोरे भैया किसानो, आप कब तक चुपचाप सहते रहोगे?...’ (पेज 8-9)
 किसानों की ऐसी स्थिति मुगल काल के साथ शुरू हुई, जो आज तक विभिन्न स्वरूपों में चल रही है। जबकि अतीत में किसान ऐसे विपर्यय में नहीं जीते थे। पुरा काल में भूमि पर गांव की जनता के परंपरागत अधिकार थे। उसके इस अधिकार को किसी ने चुनौती नहीं दी थी। न राजा न उसका कोई कारिंदा। कृषि का एकमात्र लक्ष्य था गांव के लोगों की जरूरतों को पूरा करना। गांव की अधिरचना इस तरह होती थी कि सभी जातियों के लिए कोई न कोई व्यवस्था रहती थी। हर जाति के लिए काम। हर के  लिए रोटी की व्यवस्था। गांव एक तरह से पूरी तरह आत्मनिर्भर थे, लेकिन गतिहीन नहीं। आगे चलकर, जब अंगरेज यहां मजबूत होते गए, उन्होंने कृषि व्यवस्था पर प्रहार करना शुरू किया। कहते हैं कि भारतीय समाज के इस रीढ़ पर सबसे पहले कार्नवालिस ने प्रहार किया। सन् 1793 में इसने बंगाल, बिहार और उड़ीसा में जमीन के स्थाई बंदोबस्त के जरिए भारत में जमींदारों का सृजन किया। इनमें से अधिकतर वे थे, जिसे अंगरेजों के पूर्व राजनीतिक अधिकारियों ने तहसीलदारों को कमीशन के आधार पर भूमिकर की वसूली के लिए नियुक्त किया था वही आगे चलकर स्थाई बंदोबस्त में जमींदार हो गए। इस वर्ग को पैदा करने के पीछे अंगरेजों का एक मकसद तो यह था कि उन्हें सामाजिक और राजनीतिक समर्थन मिले, ताकि उनके शासन को वैधता मिल सके। यह भी वह अच्छी तरह जानते थे कि उनकी रक्षा तभी हो सकती थी जब उन्हें इन नवजात जमींदारों का समर्थन हासिल हो। इतिहास बताता है कि इन जमींदारों ने अंगरेजों का हर कदम पर साथ दिया। आजादी का पूरा आंदोलन ही जमींदारों के इस चरित्र को उजागर कर देता है। ये अंगरेजों का तब तक साथ देते रहे, जब तक इनके स्वार्थ पर उनने चोट नहीं की। ‘तब रिआया ने आगे बढकर उनका साथ दिया। उनके साथ लड़-मरी।’ लेकिन उसके बाद क्या हुआ? फिर वे अपने पुराने तेवर में आ गए। देश में बार-बार किसानों के आंदोलन जमींदारों और दमनकारी कानूनों के कारण ही खड़े होते रहे।
‘बेदखल’ की कहानी भी एक आंदोलन की कहानी है। इस कहानी के केंद्र में हैं अवध के किसान। वे अपनी ही जमीन से बेदखल कर दिए जाते हैं। इस अन्याय का प्रतिकार करने के लिए ही किसान सभा का गठन किया जाता है। गठन एक  बाबा करते हैं। बाबा रामचंद्र। बाबाके इस चरित्र को देखकर सहज ही सहजानंद सरस्वती की याद हो आती है। यह बाबा महाराष्ट्र के हैं। पारिवारिक कलह के कारण अपने युवा काल में घर से निकल भागते हैं तो घर की राह ही भूल जाते हैं। वह सोचते हैं, कहां ग्वालियर राज्य का वह छोटा सा गांव जीरनपुर, कहां रत्नागिरि, कहां बंबई कहां मद्रास और कहां फीजी। और यह अब अवध का देहाती इलाका। घर छूटा, जाति-बिरादरी छूटी, अपनी मिट्टड्ढी, अपना देश छूटा। यहां, इस अनजान देश में दर-दर भटक रहे हैं। एकदम अकेले और निरूसंग। लोग मिलते हैं, छूटते हैं। फिर मिलते हैं और छूट जाते हैं। और यह क्रम चलता रहता है...पैर कहीं थिर नहीं होते। जिस गांव में बाबा डेरा डालते हैं, वह कसईपुर नामक गांव है। कसईपुर प्रतापगढ़, सुल्तानपुर और जौनपुर तीनों जिलों की सरहद पर बसा है। बाबा का अतीत बार-बार परेशान करता है। बीती यादें और बातें उन्हें सोने नहीं देतीं। वह मुक्ति के लिए छटपटाने लगते हैं। वे गांव-गांव कथा कहते हैं लेकिन कथा कहते हुए लगता है इससे कुछ बनने वाला नहीं हैै। यह पाप-पुण्य, आत्मा-परमात्मा, इहलोक-परलोक की बातें तो तमाम साधू-संत, रामायणी कथावाचक हमेशा से करते आए हैं। इससे कहीं कुछ बदला है? लोगों की जिंदगी वैसे ही घिसटती चली आ रही है। वह सोचते हैं....यहां के किसान गरीब हैं, कमजोर हैं, सताए हुए हैं। तालुकेदारों के मुलाजिम बात-बात पर उनसे अकड़ते हैं, आंखें दिखाते हैं। जब चाहे बेगार के लिए हांक ले जाते हैं। लगान वसूल लेते हैं, रसीद नहीं देते। बेदखली का भूत हमेशा सिर पर सवार रहता हैै।....क्या कुछ हो नहीं सकता?....बाबा जितना सोचते हैं, मन उलझता जाता हैै।
यह उलझन दूर हुई। एक रास्ता सूझा। जैसे प्रकृति ने पहले से ही तैयार कर रखा हो। यह रास्ता गोमती किनारे बसे गांव महडौरा से होकर गुजरता था। वहां एक मंदिर निर्माण की बात चल रही थी। लेकिन उसके निर्माण में कई अड़चने थी। बाबा वहां पहुंचते हैं। रास्ता सुझाते हैं। कहते हैं, एक पंचायत बनाइए। उसके कार्यकर्ता चुनिए। वे बैठकर तय करें कि कैसा मंदिर बनेगा और कितना खर्च आएगा।....समस्या का हल निकल आता हैै। यह पंचायत दरअसल किसान आंदोलन का बीज था। इस पंचायत ने एक और काम किया। मंदिर निर्माण पूरा होने के बाद दीवानी और फौजदारी के मामले भी इसी पंचायत में सुलझने लगे। लोगों का थाना-कचेहरी जाना बंद हो गया। तालुकेदार के गुमाश्ते भी अब उस गांव में घुसने से डरने लगे। देखा-देखी आस-पास के गांवों में भी पंचायतें बनने लगीं। यह एक प्रयोग था, एक पृष्ठभूमि थी, एक नींव थी, जिस पर किसान आंदोलन की ईमारत बननी थी।
 आंदोलन के पीछे 1868 में लागू हुआ अवध का लगान कानून था। 1857 के  बाद अंगरेजों ने नए-नए कानून बनाए। तरह-तरह से जनता को तंग करने के हथकंडे अपनाए जाने लगे। जब विरोध के स्वर मुखर होने लगे तो धूर्त अंगरेजों ने कानून में कुछ तब्दिलियां भी कीं। इस कानून में भी 1886 में थोड़ा परिर्वतन किया गया और किसानों को सात साला हक मिला। लेकिन, जैसा कि अंगरेजों का चरित्र था, यह महज दिखावा ही साबित हुआ। 
 1857 के बाद अंगरेज अब फूंक-फूंक कर कदम रख रहे थे। इस लड़ाई के बाद राजाओं, जमींदारों, ग्रामीणों और शहरी अभिजात वर्ग के साथ नए सिरे से अपने संबंधों को मजबूत कर रहे थे। लेकिन यही वह दौर है जब अखिल भारतीय स्तर पर किसानों के विद्रोह शुरू हुए। इस विद्रोह के पीछे लगान, नई भू राजस्व नीति और तरह-तरह के फरमान थे। अंगरेजों की इस दमनकारी नीति से दक्षिण, पश्चिम और उत्तर भारत के गांव सुलग उठे। गांव से उठे धुएं ने शहरों को भी अपने आगोश में ले लिया। वहीं, 1870 और 1890 के के दशक में बार-बार पडने वाला अकाल भी इस आग में घी का काम किया। केवल झारखंड की बात करें तो यहां 1765 से शुरू हुआ जमीन और जंगल का आंदोलन 1900 तक और उसके बाद भी चलता रहा। 1767 में ढाल विद्रोह, इसके बाद 1769 से 1805 तक चुआड़ विद्रोह हुआ। यह लगान नहीं देने के कारण पंचेत राज्य को नीलाम कर दिए जाने के कारण शुरू हुआ। इनके विद्रोह के कारण कंपनी सरकार को इसे वापस लेना पड़ा। बांग्ला शब्दकोश में चुआड़ का शब्द है-दुर्वत्त और नीच जाति। यह शब्द गाली के रूप में आदिवासी किसानों और योद्धाओं के लिए प्रयुक्त होता रहा है। इसके बाद पलामू में 1770-71 चेरो विद्रोह, 1770-71 भोगता विद्रोह, 1771-73 घटवाल विद्रोह, 1773 से 1785 तिलका माझी आंदोलन, 1772 से 1780 तक पहाडिया विद्रोह, 1782 से 1807 तक तमाड़ विद्रोह, 1793 से 1832 तक मुंडा विद्रोह, 1820 से 1821 सिंहभूम का हो विद्रोह, 1831 से 1832 तक कोल विद्रोह, 1832 से 1833 तक भूमिज विद्रोह, 1855 से 1857 संथाल विद्रोह होते रहे और औपनिवेशिक सत्ता को लगातार चुनौती देते रहे। देश के पहले स्वाधीनता संग्राम से दो वर्ष पूर्व 1855 में संथाल हूल ने अंगरेजी सत्ता को जबरदस्त चुनौती दी। 1870 के दशक का खेरवाड़ आंदोलन उठा। पहले तो यह सामाजिक सुधारों तक  ही सीमित था, लेकिन जल्द ही राजस्व बंदोबस्ती की गतिवधियों के विरुद्ध एक अभियान में तब्दील हो गया। इसके बाद बिरसा का आंदोलन चला। इसी तरह गोदावारी एजेंसियां की पहाडियां (1879-80) भी शक्तिशाली विद्रोह की साक्षी रहीं। महाराष्ट्र में वासुदेव बलवंत फडके सक्रिय थे। मलाबार में हिंदू और मुस्लिम दोनों सक्रिय थे। मोपला विद्रोह के पीछे किसानों का असंतोष ही था, जिसके मूल में कृषि व्यवस्था थी।  दकन में दंगे तक हुए। बंगाल के पबना में दंगे तो नहीं हुए लेकिन अंगरेजों को किसानों के व्यापक प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। दक्षिण तमिलनाडु में भी जातिगत विद्रोहों के साथ किसानों ने भी विद्रोह का आवाजें बुलंद कीं। बीसवीं शताब्दी के आरंभिक दशकों में चंपारन, खेड़ा और अहमदाबाद के आंदोलन हुए। पंजाब में गदर पार्टी के नेतृत्व में किसानों के हितों को ले आंदोलन शुरू हुआ और ‘पगड़ी संभाल ओ जट्टड्ढ’ के नारे गली-गली सुनाई देने लगे, राजस्थान भी पीछे नहीं था। वहां शेखावती किसानों ने झंडा बुलंद किया। मारवाड़ क्षेत्र के किसान अपने हक के लिए उठ खड़े हुए। इन सभी आंदोलनों की विशेषता यह थी कि ये सभी ‘नीचे से आने वाले दबाव’ के प्रतिफल थे। इस दौर में जो भी किसानों के नेता बनकर उभरे, उसमें से अधिकांश ‘नीचे के दबाव के कारण’ ही उभरे। सरदार हरलाल सिंह, राजेंद्र प्रसाद, अनुग्रह नारायण सिन्हा, पटेल आदि के उभार में किसान ही थे। यहां तक कि नेहरू भी प्रतापगढ़ में जिस किसान सभा को संबोधित कर किसान नेता बने, वह वहां किसानों के कारण ही संभव हुआ। यह अलग बात है कि नेहरू और उनकी कांग्रेस ने किसानों के साथ विश्वासघात किया। उपन्यासकार ने इस बात को बड़ी शिद्दत से उठाया है।          
    उल्लेखनीय है कि 1920 के दशक में किसानों के जो आंदोलन उठ खड़े हुए उनमें साधु-संतों की अग्रणी भूमिका रही। रूरे के बाबा रामचंद्र हों, उत्तरी बिहार में स्वामी विद्यानंद हों या राजस्थान में स्वामी कुमारानंद या महाराष्ट्र में आनंदस्वामी। 1939 के आस-पास स्वामी सहजानंद सरस्वती ने किसानों को लेकर जो आंदोलन चलाया, उसकी अखिल भारतीय स्तर उसकी पहचान बनी। उसके साथ सुभाषचंद्र बोस जैसे नेता भी जुड़ गए थे। इन संतों ने धर्म-कर्म को हाशिए पर छोड़ किसानों के साथ खड़ा होने में अपनी आध्यात्मिक ऊंचाई को देखा। इस कारण किसानों का आंदोलन अखिल भारतीय विद्रोह की शक्ल ले पाया। 
  कमलाकांत त्रिपाठी ने उपन्यास के नायक बाबा रामचंद्र की जो मूर्ति गढ़ी है, वह काल्पनिक नहीं, ऐतिहासिक है।बाबा रामचंद्र के बारे में इतिहासकार सुमित सरकार ने लिखा है, ‘बाबा रामचंद्र नाम के एक संन्यासी जो फिजी में अनुबंधित श्रमिक रह चुकने के बाद उस जिले में आए थे। बाबा रामचंद्र के आंदोलन की विशेषता यह थी कि इसमें किसानों की एकजुटता की अभ्यर्थना के साथ ही रामायण का और जातिगत नारों का प्रयोग किया जाता। प्रतापगढ़ के रूर गांव को पहली किसान सभा का स्थल चुना गया, स्पष्टतरू इस कारण से कि रामचरित मानस में इसका उल्लेख मिलता है। हाल ही में प्राप्त बाबा रामचंद्र के निजी कागजात में एक ‘कुर्मी क्षत्रिय सभा’ का उल्लेख मिलता है, जिसकी उन्होंने बाद में स्थापना की। इस सभा की मांगें और तरीके पर्याप्त सामान्य थे-महसूलों एवं बेगार की समाप्ति, बेदखल की गई भूमि पर काश्त करने से इनकार, दमनकारी जमींदारों का सामाजिक बहिष्कार (नाई-धोबी बंद)जिसे पंचायतों के माध्यम से लागू किया जाता था। किंतु इस किसान आंदोलन की वास्तविक शक्ति तो सितंबर 1920 में ज्ञात हुई जब किसानों ने एक शांतिपूर्ण किंतु विशाल प्रदर्शन करके बाबा रामचंद्र को जेल से रिहा करा लिया जिन्हें झूठे मामले में फंसाकर गिरफ्तार कर लिया था। इस बीच आंदोलनकारियों ने गौरीशंकर मिश्र, जवाहरलाल नेहरू से संपर्क स्थापित कर लिया था। जून 1920 में बाबा रामचंद्र सैकड़ों किसानों को लेकर इलाहाबाद गए थे और यहीं से आरंभ हुआ था जवाहरलाल नेहरू का ‘किसानों के बीच भ्रमण’ जिसका आगे चलकर उन्होंने अपनी आत्मकथा में अत्यंत सजीव चित्रण किया।’ किसान आंदोलन पर जब गांधीवादी कांग्रेस का प्रभुत्व आंरभ हुआ तो किसान आंदोलन प्रभावित हुए बिना नहीं रह सका। प्रायरू किसानों के इस आंदोलन को कांग्रेस के नेता समर्थन नहीं देते। उपन्यासकार ने आरंभ में ही इस पर संदेह व्यक्त किया है-
‘ऐसा नहीं है गया, बात समझा करो।’ जवाब झिंगुरी सिंह ने दिया, ‘दोनों काम जरूरी है। जब जिसकी तरक आ पड़े।...तुम कह रहे थे गांधी बाबा को लिखो। वह भी किया जाएगा। लेकिन मेरी समझ में उससे कुछ होने वाला नहीं है। उनके सामने हजारों काम हैं। है कोई राजकुमार सुकुल जैसा जो उन्हें घेरकर यहां लाए?...चंपारन की बात और थी। वहां अंग्रेजों की जमींदारी थी। मुझे तो नहीं लगता, देशी तालुकेदारों के खिलाफ कांग्रेस उस तरह खुलकर सामने आएगी।’ सुमित सरकार की माने तो ‘किसानों की मांग उठाने में कांग्रेस स्पष्ट रूप से बार-बार असफल रही थी जिससे उनका मोहभंग हुआ और 1920 के मध्य दशक में उन्होंने नई विचारधाराओं की खोज आरंभ कर दी थी। 1922 में स्वामी विद्यानंद ने जमींदारी समाप्त करने की मांग उठाई और बाबा रामचंद्र ने नवंबर 1925 में लेनिन को ‘किसानों का प्यारा नेता’ बतलाते हुए कहा कि ‘रूस के अतिरिक्त किसान अब भी सर्वत्र दास हैं’।...किसान चाहे स्वराजी हो या अपरिवर्तनवादी, उनके जमींदारों अथवा मंझोले जोतधारियों के साथ दृढ़ संबंध होते थेे, और इस कारण वे किसानों की मांगों के प्रति प्रायरू उदासीन रहते थे।’
हेरोल्ड ए गोल्ड ने ‘बाबा एंड नान-कोआपरेशन   रू कांग्रेस-को-आप्शन आफ अग्रेरियन अनरेस्ट इन नार्थ इंडिया इन द 1920 एंड 1930’ में लिखा है, ‘असहयोग आंदोलन ने अपने प्रारंभिक काल में कृषक आंदोलन को उत्प्रेरित किया ऐसा इसलिए नहीं हुआ कि गांधी से प्रभावित कांग्रेस उनके साथ वैचारिक सहमति के स्तर पर थी बल्कि किसानों की नजर में गांधी ही खुद कांग्रेस थे। आम जनता की नजर में गांधी खुद ही एक संदेश थे। वह एक विशिष्टड्ढ राजनीतिक संत के रूप में स्वीकृत थे, जिनके दर्शन से लोग आध्यात्मिक शक्ति महसूस करते थे।’ उसी लेख में ज्ञानेंद्र पांडे यह उद्धरण भी देखें- ‘1921-22 तक अवध का किसान आंदोलन एक निश्चित मुकाम अपनी पारंपरिक सीमाओं के बावजूद प्राप्त कर सका था। हालांकि यह स्थानीय स्तर पर बना रहा और पूरे देश दुनिया से अलग-थलग रहा। इससे उबरने के  लिए एक साम्राज्यविरोधी शक्ति की जरूरत थी। कांग्रेस इस भूमिका के अनुकूल थी लेकिन इसके बढ़ते शहरी और ग्रामीण बुर्जुआ आधार के कारण पार्टी ने पहले ही किसान आंदोलन की ओर पीठ कर लिया था।’ यहां यह भी ध्यान रखें कि गांधी की छवि अजीब थी। एक तरफ वह किसानों के दिलों में बसे हुए थे। वहीं इनसे संबंधित अफवाहों को किसान जमींदार विरोधी मोड़ दे रहे थे। किंतु साथ ही स्वयं वे अपनी उपलब्धियों का श्रेय भी गांधीजी को दे रहे थे। कारण कि प्रतापगढ़ में बेदखली पर जो राके लगी थी वह बाबा रामचंद्र जैसे स्थानीय नेताओं के नेतृत्व में किसानों के संघर्ष का ही परिणाम था।’ (सुमित सरकार, आधुनिक भारत, पेज 202)
उपन्यास के राजनीतिक आशयों के मद्देनजर देखें तो कांग्रेस और नेहरू की जो छवि उभरती है, वह किसानों के विरोध में जाती है। पवन कुमार वर्मा (भारत में मध्य वर्ग की अजीब दास्तान) ने नेहरू के हवाले से लिखा है, ‘मेरी राजनीति मेरे वर्ग यानी पूंजीपति वर्ग की राजनीति थी।’ जाहिर है, नेहरू का यह चरित्र बार-बार उजागर हुआ है। आजादी के बाद नेहरू की छवि को गढने का काम कई लोगों ने किया। उदयन शर्मा, रामचंद्र गुहा, एम जे अकबर, सुनील खिलनानी जैसे लोगों के साथ इतिहासकारों का एक वर्ग में इस काम को बड़े प्रोफेशनल ढंग से अंजाम दिया। फिर भी, नेहरू के अंदर कुछ साफगोई थी। व्यावहारिक स्तर पर जो भी रहा हो, पर सैद्धांतिक स्तर पर वे अपने समकालीन साथियों से किसानों और मजदूरों के मामले में आगे थे। जैसा कि पवन कुमार वर्मा कहते हैं-
‘अगर गांधी ने अपने राजनीतिक मुहारवरे का इस्तेमाल करके जनता की भागीदारी सुनिश्चित की, तो नेहरू सैद्धांतिक स्तर पर अपने साथियों से किसानों और मजदूरों के काम-काज में महत्व देने पर जोर देने के मामले में बहुत आगे थे। अपने राजनीतिक जीवन के काफी शुरुआती दौर में ही वे गरीब कृषक वर्ग की खस्ता हालत से परिचित हो गए थे। उस वक्त भी वे यह एहसास कर सकते थे कि शहरवासी खेतिहर हालात से कितने नावाकिफ हैं, अखबारों में देहाती क्षेत्रों के विकास के बारे में एक भी पंक्ति नहीं छपती है और अगर छपती भी है तो जमींदारों के हितों की बात कहती हुई सुनाई देती है।’ विडंबना यह है कि जिस व्यक्ति ने इन्हें किसानों के दुख-दर्द से परिचित कराया, उसके साथ ही नेहरू विश्वासघात करते हैं। वह व्यक्ति और कोई नहीं, बाबा रामचंद्र थे। वह इस बात से आतंकित थे कि बाबा का प्रभाव बढ़ता जा रहा है। उपन्यासकार ने लिखा है, बाबा रामचंद्र का प्रतापगढ़, रायबरेली, बाराबंकी जिलों में प्रभाव बढ़ता जा रहा था। सभाओं की धूम मच गई थी। उनके बढ़ते प्रभाव से आतंकित तालुकेदारों और सरकारी हाकिमों में खलबली मच गई। जगह-जगह बाबा के भाषण किसानों में ओज भर देते। बाबा के भाषणों की खबर पढकर हाकिमों के होश गुम हो जाते। सीआईडी की रपट के अनुसार बाबा पर सीधे राजद्रोह का मुकदमा बनता हैै। लेकिन उन्हें पकडने की हिम्मत किसी में नहीं। प्रतापगढ़ में जब वे गिरफ्तार हुए तो किसानों को इतना हुजूम इक ऋा हुआ कि अंततरू प्रशासन को छोडना पड़ा। उनकी ऊंचाहार में होने वाली सभा को लेकर प्रशासन की नींद हराम है। उन्हे ऊंचाहार की सभा में न जाने देने की योजना बनने लगी। इस योजना में कांग्रेस और सरकार दोनों शामिल थे। उन्हें बिना बताए पहले लखनऊ ले जाया गया और उन्हें नजरबंद कर दिया गया। इसके बाद उन्हें खिलाफत दफ्तर ले जाया गया। वहां बाबा के चीख पुकार मचाने के बाद मौलाना बारी आए। उनके हाथ में एक तार था। उसे दिखाकर बोले-शौकत अली और महात्मा गांधी ने संदेश भिजवाया है कि बाबा रामचंद्र को वहां से कहीं न जाने दिया जाए। सुनकर बाबा सन्न रह गए।
लेखक लिखता हैै, ‘इलाहाबाद में बैठे कांग्रेसी नेता, जैसे भी हो, किसानों को असहयोग के रास्ते पर खींचना चाहते थे। पर असहयोग आंदोलन के तालुकेदारों के खिलाफ विद्रोह के लिए कोई जगह नहीं थी।...लेकिन बाबा रामचंद्र और उनके साथियों की मुख्य लड़ाई तो तालुकेदारों से ही थी। इसलिए वे कांग्रेसियों की आंख में गडने लगे थे।’ इसके बाद अंधेरे में ट्रेन से बाबा को बुरके में इलाहाबाद लाया गया और आनंद भवन में कैद कर दिया गया। दिन में मोतीलाल नेहरू और गौरी शंकर मिश्रा से मुलाकात हुई। मोतीलाल ने हाल चाल पूछा और फिर जोर देकर कहा कि ‘किसानों को असहयोग आंदोलन में कांग्रेस का साथ देना चाहिए।’ बाबा आनंद भवन की गतिविधियों को देख रहे थे। दोनों नेहरूओं की दिनचर्या को भी भांप रहे थे। बाबा बाहर जाने की बात करते तो उन्हें गिरफ्तारी का भय दिखाकर चुप करा दिया जाता। कुछ दिनों बाद अंततरू बाबा झिंगुरी सिंह, सहदेव सिंह व उनके साथियों के सहयोग से रात के अंधेरे में आनंद भवन की कैद से मुक्त हो गए। मुक्ति के बाद एक-एक कर रायबरेली और दूसरी जगहों की घटनाओं से वाकिफ  हुए। लूट-पाट से लेकर आंदोलन के दौरान किसानों पर चली गोली की घटनाएं बाबा ने तफ्सील से सुनी। बाबा की छवि गांधी की तरह बन गई थी। किसान उन्हें त्राता समझता। गांधी दूर-देहात गांवों में भी बेहद लोकप्रिय थे। जैसा कि ज्ञानेंद्र पांडेय ने ऊपर लिखा भी है। पर, दुख यह था कि गांधी ने किसानों की समस्याओं से अपने को दूर ही रखा। जो वर्ग इन्हें अपना मुक्तिदाता समझ रहा था, वह वर्ग गांधी की चिंतन की परिधि से बाहर था। उपन्यासकार ने लिखा है,
‘असहयोग के काम के सिलसिले में गांधीजी इलाहाबद आए थे। उन्तीस नवंबर को उनका प्रतापगढ़ दौरा हुआ। साथ में मोतीलाल नेहरू, अबुल कलाम आजाद और शौकत अली भी थे। कचेहरी से लगे खेल के मैदान में उनकी सभा हुई। गांधीजी ने भाषण दिया। लेकिन उसें किसानों और तालुकेदारों के झगड़े का कोई जिक्र नहीं था। उन्होंने बाबा रामचंद्र का नाम तक नहीं लिया। किसान नेताओं से मिलने, उनकी समस्याओं को समझने की उन्होंने कोई जहमत नहीं उठाई। हां, राजा प्रतापगढ़ के महल में तालुकेदारों के साथ उनकी गुफ्तगू जरूर हुई। बाद में इलाहाबाद में किसानों के नाम जो संदेश जारी किया उससे जाहिर था कि तालुकेदारों की शिकायतों को उन्होंने कितनी तरजीह दी थी।’
गांधी का एक रूप यह भी था। जबकि वहां के डिप्टी कमीश्नर ‘वीएन मेहता ने गांव-गांव घूमकर किसानों की शिकायतें सुनी। कुल सत्रह सौ किसानों के बयान दर्ज किए। ढेरो दस्तावेज एकत्रित किए। बाबा ने पूरा सहयोग दिया।’ नतीजा सिफर रहा। क्योंकि किसानों के हितैषी इस अधिकारी का वहां से स्थानांतरण कर दिया गया। गांधी चुप हैं, नेहरू चुप हैं। सारी बस्ती जलाकर खाक कर देने वाले तालुकेदारों के प्रति गांधीजी मेहरबान हैं। लेकिन किसान, जो केवल पेट भर खाना, तन ढकने को कपड़ा और वाजिब मालगुजारी अदा करने की सुविधा मांगते हैं, गलत थे। इस परिप्रेक्ष्य में रजनीपाम दत्त के विचारों को भी देखा जा सकता है। ‘आज का भारत’ के द्वितीय संस्करण की भूमिका में वे लिखते हैं- ‘गांधी ने अहिंसा के नाम पर हमेशा जमींदारों और जमीन-जायदाद वालों के हितों की हिफाजत की। उनका सामाजिक नजरिया घोर रूढि़वादी था। उन्होंने जिस भी जनसंघर्ष की शुरुआत की, उसे ठीक उसी समय रोक दिया जब वह जमीन जायदाद वालों और साम्राज्यवाद के हितों के खिलाफ क्रांतिकारी तेवर अपनाने लगा था।’                              (पेज-4)
बेशक रजनीपाम दत्त से पूरी तरह सहमत नहीं हुआ जा सकता, लेकिन उनकी बातों की इस सचाई को यह उपन्यास ताकीद तो करता ही है।
उपन्यासकार ने इतिहास से पात्रों को उठाकर जिस कथा की सृष्टिड्ढ की है, वह अपने किस्सागोई में सफल है। अवध के किसान आंदोलन को केंद्र में रखकर लिखा गया यह उपन्यास अपनी प्रामाणिकता के कारण दस्तावेज बन जाता है। वहीं वह आजादी के चर्चित ‘नायकों’ की बहुप्रचारित-स्थापित छवियों की वास्तविकता से परिचित भी कराता है। उनकी भूमिका और प्रतिबद्धता किसके साथ जुड़ी थी, उनकी प्राथमिकता में पहले कौन थे, कौन सा वर्ग था आदि-आदि के बारे में बहुत ही स्पष्ट ढंग से उपन्यास में बात की गई है। यहां धर्म की निस्सारता भी है तो जाति-पांति की घातक प्रवृत्तियों से छुटकारा पाने की छटपटाहट भी। इसी कारण बाबा रामचंद्र, जो महाराष्ट्रीयन ब्राह्मण हैं, कुर्मी बिरादरी में घर जोड़ते हैं और वहीं अंततरू रह जाते हैं। अब इलाके वाले बाबा की खिडकी से ही बाहर की दुनिया देखते हैं। कारण, बाबा अक्सर कभी इलाहाबाद, कभी प्रतापगढ़ तो कभी लखनऊ की यात्रा करते और आने के बाद  राजनीतिक हलचलों से गांव वालों को अवगत कराते।
 कमलाकांत त्रिपाठी ने बहुत ही मनोयोग और शोध करके इस उपन्यास का सृजन किया है। यदि उपन्यास की अपनी भाषा नहीं होती तो यह कृति उतनी प्रामाणिक सिद्ध नहीं होती, जितनी है। कृति में भाषा अपनी संवेदना और देशज अंदाज के साथ मौजूद है। ऐसे-ऐसे शब्द यहां मौजूद हैं, जो अब शायद ही सुनने को मिलते हैं-देश-पवस्त और नाते-रिश्तेदारियों में नेवहड़ छौंकता, गप्पे मारता घूमता था, (पेज6), ऐसे ही मेल्हते रहे तो खेत तक पहुंचते दिन लटक जाएगा देबीदीन (पेज 10), किसान खरमिटाव करके उठ खड़ हुए (पेज 18), पर कुर्मियों के बारे में धारणा थी कि वे बाहर से फटेहाल दिखते थे पर अंदर से पोढ़े थे (पेज 19)। 
उपन्यास का सार्थक शीर्षक भी ध्यान खींचता है। आज बेदखली की चर्चा दूसरे रूपों में होने लगी है। औद्यागिक क्रांति ने एक नया शब्द दिया है ‘विस्थापन’। अब किसानों को सरकार बेदखल कर रही उनकी जमीनों से ही नहीं, उनके अपने घरों से भी। पहले उनकी जमीन ही जाती थी, अब तो वे बेघर भी होते जा रहे हैं। यह दोहरी पीड़ा आज के उत्तर आधुनिक युग में लोग झेल रहे हैं। झारखंड का काठीकुंठ हो या बंगाल का सिंगूर या नंदीग्राम, उत्तरप्रदेश का दादरी हो या उड़ीसा का कलिंगा। हम फिर से इतिहास को दुहारने के लिए खड़े हैं। नई औपनिवेशिक सत्ता अपने खूनी पंजे पसार रही है, जहां सिवाय आत्महत्या के कोई दूसरा विकल्प नहीं है। किसानों की आत्महत्या को पढने की जरूरत है। आज किसान फंस रहा है तो कल दूसरे लोग भी इस पंजे में फंस सकते हैं....।

गुरुवार, 4 जून 2015

ेतू मुखिवा को मारकर दामुल पर काहे नहीं चढ़ा रे

हिंदी सिनेमा में कलात्मक फिल्मों को समानांतर सिनेमा, कला फिल्में या क्लासिक फिल्मों के खाते में डाल दी जाती हैं। प्रकाश झा की जब दामुल आई तो इसे भी क्लासिक फिल्मों के खाते में डाल दिया गया। भारत में मुख्यधारा की जो फिल्में बनती हैं और जिसे बहुसंख्यक दर्शक देखना पसंद करते हैं, वह ऐसी फिल्में होती हैं, जहां हल्के-फुल्के विषय होते हैं, मधुर संगीत होता है, नाच-गाने होते हैं। यही मुख्यधारा का सिनेमा है और इसी के बूते हमारा हिंदी फिल्मों का उद्योग चल रहा है। इससे इतर जो निर्देशक थोड़ा गंभीर विषय का चुनाव करते हैं और ऐसी फिल्में, जो विशिष्ट दर्शकों की अपेक्षा करती हैं, इन्हें सार्थक या कला फिल्मों की कतार में खड़ा कर दिया जाता है। जब 1984 में प्रकाश झा की दामुल आई तो हिंदी सिनेमा की एकरसता में टूटन हुई। इसे कला समीक्षकों ने समानांतर सिनेमा के रूप में दर्ज किया। प्रकाश झा की ऐसी मंशा हो, चाहे न हो, लेकिन समीक्षकों ने इसे इसी रूप में लिया और दर्शकों के बीच भी यह फिल्म पसंद की गई। यशस्वी कथाकार शैवाल की कहानी दामुल की कथा पर बनी यह फिल्म अपने कहानीपन, अभिनय क्षमता, अद्भुत पृष्ठभूमि के रचाव से जो कलात्मकता का दर्शन कराती है, उससे दर्शक प्रभावित हुए बिना नहीं रहता। कहीं नामवर सिंह ने लिखा है कि साधारण लिखना बहुत कठिन होता है। उसी तरह रोजमर्रें की जिंदगी के फलसफे को पर्दे पर उतारना अपेक्षाकृत जबरदस्त हुनर की मांग करता है। हुनर ही नहीं, उस समझ की भी मांग करता है, जो फिल्म की कथा चाहती है। बिहार के इस प्रतिभावान निर्देशक ने कुछ ऐसा ही शास्त्रीय रचाव पैदा किया। शैवाल ने कहानी की पृष्ठभूमि में जहानाबाद को लिया है। (हालांकि फिल्म में मोतिहारी है) यह जहानाबाद बिहार की राजधानी से पचपन किमी दूर है। यह वही जहानाबाद है, जहां नक्सली प्रयोग से लेकर जेलब्रेक की घटनाओं ने देश के लोगों का ध्यान खींचा। इसी जिले के एक गांव की यह कथा है। गांवों में जैसा कि अमूमन होता है, दलित और पिछड़ों का भाग्य उन पर निर्भर करता है, जिसे माक्र्सवादी भाषा में सामंत कहते हैं और देशज भाषा में जमींदार। इस गांव का जमींदार परंपरा के विपरीत ठाकुर (राजपूत) नहीं, ब्राह्म्ण होता है और यही खलनायक है। बेकारी कराते-कराते छोटे जोतदारों की जमीने कैसे इस जमींदार की हो जाती है, यह उन किसानों को नहीं पता।
  मध्यकाल में जब जमींदारों का उदय हुआ तो खेतों के ये रखवाले हो गए। कुछ ऐसे लोगों के पास परंपरागत जमीन थी। कुछ लोगों ने जंगल साफ करके खेती लायक जमीन बनाई। यह उतनी ही जमीन होती, जितनी उसकी उपज से परिवार का निर्वहन हो सके। बाद में जब मुगल बादशाहों ने जमींदारों को पैदा किया तो किसानी पर ध्यान न
 अजीब लगता है कि एक ओर हम कहते हैं कि भारत कृषि प्रधान देश है और दूसरी ओर रोज किसानों की आत्महत्या की खबर पढ़ते हैं। अभी शिवमूर्ति का नया उपन्यास आखिरी छलांग इसी समस्या को गंभीरता से उठाता है। कथा साहित्य में इस समस्या पर कई लोगों ने अपनी कलम चलाई है। प्रेमचंद के गोदान से लेकर रेणु की परती परिकथा और मिथिलेश्वर के माटी कहे कुम्हार से तक की औपन्यासिक यात्रा में किसान, गांव, खेत-खलिहान देखे जा सकते हैं। जमींदारी के कारण कैसे उग्रवाद ने पांव जमाया, मिथिलेश्वर ने अपने इस उपन्यास में दर्ज किया है। फिल्मों में भी यह विषय अछूता नहीं रहा। मदर इंडिया से लेकर  विमल राय की दो बीघा जमीन में आखिर एक किसान का ही दर्द छलकता है। विमल राय ने जमींदारों के उत्पीडन को बड़ी बारीकी से उभारा है। जमींदारों की क्रूरता हिंदी फिल्मों का मसाला रहा है। किसान के लिए धरती माता है। इसलिए वह अपने खेत से उसी तरह जुड़ता है, जिस तरह एक बेटा अपनी मां से। लेकिन जब कोई उसके इस खेत को अपनी मिल्कियत बना लेता है तो वह बर्दाश्त नहीं कर पाता। कम से कम भारत में जितने आंदोलन हुए हैं, उनके पीछे कहीं न कहीं जमीन के सवाल ही जुड़े रहे हैं। झारखंड के आदिवासी अपनी जमीन को लेकर 1831-32 से ही लड़ते आ रहे हैं। तब अंग्रेजों से लड़ते थे। आज अपने लोगों से लड़ रहे हंै। यह भी ध्यान रखें के सत्तर के दशक में नक्सलवाद के पैदा होने के पीछेे जमीन ही मुख्य कारण रहा। जमीन के टुकड़ों ने ही नक्सलवाद को पैदा किया है। जमीन का मामला अपने देश में कितना क्रिटिकल है यह इस बात से जाहिर होता है कि विनोबा भावे को भूदान यज्ञ जैसे दीर्घजीवी कार्यक्रम चलाने पड़े। इस यज्ञ में जमींदारों ने अपनी जमीनों की आहुति तो दी, लेकिन उनकी दबंगई कम नहीं हुई और जमीन उनके हाथ में ही पड़ी रही। जिनके नाम जमीन दी गई उन्हें कभी जमीन पर कब्जा दिलाया ही नहीं गया। कारण स्पष्ट था। सत्ता, सरकार, प्रशासन में दलितों-भूमिहीनों की कोई आवाज सुनने वाला नहीं था न उनका कोई प्रतिनिधित्व। लिहाजा उनकी आवाज नक्कारखाने में तूती की आवाज बनकर दम तोड़ गई। इन स्थितियों ने ही वर्ग संघर्ष का रास्ता तैयार किया। बिहार में इसका सबसे पहला शिकार मुजफ्फरपुर का मुसहरी गांव बना। इसके बाद तो भोजपुर का इलाका वर्ग संघर्ष की आग में धधक उठा। फिर दूसरे इलाकों में इसने पांव पसारे। इसी में से एक जिला जहानाबाद भी था। इस जिले में कई बड़े नरसंहार हुए, जिसने पूरे देश का ध्यान खींचा। इन सबके बीच असल मसला जमीन का ही था। आज भी यह क्षेत्र रह-रह कर धधक उठता है।
  आजादी के बाद भूमि सुधार कानून बनाने वाला बिहार पहला राज्य था। लेकिन इकसठ सालों बाद भी यह कानून प्रभावी नहीं हो सका। क्योंकि नौकरशाही में इसी वर्ग का हस्तक्षेप थाध् है। न्याय भी उनके लिए दुर्लभ था। पुलिस-थाना-कचहरी इस वर्ग के लिए नहीं थी। यही कारण है कि बिहार में सबसे अधिक किसानों के आंदोलन खड़े हुए। स्वामी सहजानंद सरस्वती, राहुल सांकृत्यायन, कार्यानंद शर्मा जैसे लोगों ने किसान आंदोलन चलाए। भूमिहीन एवं गरीब किसानों को अपनी शक्ति बनाया। बावजूद इसके यह समस्या खत्म नहीं हुई। आज एक ओर नक्सली खड़े हैं तो दूसरी रणवीर सेना खड़ी है। आखिर यह कौन पूछेगा कि जब 1952 में जमींदारी खत्म कर दी गई तो उसका अस्तित्व क्यों और कैसे बचा हुआ है?
   सत्तर और अस्सी के दशक में जब जमीन की कीमतों के भाव बढने लगे तो गांव भी इससे अछूता नहीं रह सके। गांव में जमीनों को लेकर संघर्ष की नई इबारतें लिखी जाने लगीं। इन संघर्षों को दबाने के लिए सरकारी और गैरसरकारी प्रयास भी खूब हुए, लेकिन ये सारे प्रयास व्यर्थ साबित हुए। प्रधान हरिशंकर प्रसाद ने लिखा है कि भूस्वामियों और पुलिस के गठजोड़ ने निर्ममता से हमला बोला और यह सुनिश्चित किया कि इन हमलों की खबर बुर्जुआ अखबारों तक नहीं पहुंचे। लेकिन कुछ घटनाएं इतनी जघन्य थीं कि वे दबाई नहीं जा सकीं। इन घटनाओं ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। खास तौर पर विधानसभा के भूतपूर्व स्पीकर द्वारा 1971 में रूपसपुर-चंदवा में कराए गए जनसंहार और गहलौर तथा चैरी की घटनाओं ने।...श्री प्रसाद ने माना कि यह टकराव गहन होते शोषण और साथ ही उसके तेज होते प्रतिरोध की अभिव्यक्ति थी। (खेतिहर समाजरू प्रधान हरिशंकर प्रसाद, पेज 115)                                                   
  इस तरह बिहार के भूमिहीन किसान या छोटे किसान सामंतों की चंगुल से निकलने के लिए छटपटाने लगे। इसी दौर में नक्सलवादियों का प्रभाव विस्तार पाता है। प्रकाश झा ने इस समस्या का जिस बारीकी से पर्दे पर उकेरा है, वह समस्या को समग्रता में देखने की उनकी परिपक्व दृष्टि का उम्दा उदाहरण साबित होता है।
  श्याम बेनेगल अपने एक साक्षात्कार में बताते हैं कि हिंदी में 1970 के आस पास नए सिनेमा का दौर शुरू हुआ था और उस सिनेमा ने कई मायनों में एक आर्टिकुलेट मध्यम वर्ग, जो बहुसंख्यक नहीं बल्कि अल्पसंख्यक था, की रुचि को दर्शाया, उसकी जो सामाजिक चिंताएं थीं, वो फिल्मों में प्रतिबिंबित होने लगीं। अब उस मध्यम वर्ग की चिंताएं, उसके सरोकार ही बदल गए हैं। इसीलिए इस किस्म की फिल्मों को कोई देखने नहीं आता है। हालांकि वह यह भी जोड़ते हैं कि अब भी सामाजिक सरोकारों की फिल्में बनती हैं, लेकिन वो सामाजिक सरोकार ही बदल गए हैं। दूसरी बात यह है कि पहले ग्रामीण भारत में हम लोग बहुसंख्यक थे यानी ज्यादा ग्रामीण क्षेत्रों में कमाते खाते थे पर अब वह संतुलन भी बदल रहा है। तो स्वाभाविक है कि फिल्म उस बदलते संतुलन को दर्शाएगी।
श्याम बेनेगल अपने इसी साक्षात्कार में मानते हैं कि फिल्म का उद्देश्य सामाजिक बदलाव नहीं है, लेकिन वह आईना जरूरत बताते हैं। जैसा ऊपर उन्होंने कहा है। यह कहने में संकोच नहीं कि फिल्म भले समाज को बदलने का दंभ न भरे, लेकिन वह समाज का आईना बनती है और वह एक सीमा तक समाज को प्रभावित भी करती है। इधर की तमाम आतंक पर बनी फिल्मों में उस सच को पकडने की कोशिश की गई है। ए वेडनेस्डे, शूट आन साइट, मुुंबई मेरी जान...।
दामुल भी आईना है बिहार का। यह बिहार के सामाजार्थिक स्थितियों का खुलासा करती है। वर्गीय चरित्र को परत दर परत उघाड़ती है। राजनीतिक भ्रष्टाचार से जूझते और जातिवाद का दंश झेलते उन दलितों की असहायता को बिना किसी तर्क और लाग-लपेट के परोसती है, जिसे देखकर हिंदू समाज की उस जड़ता को समझ सकते हैं, जहां आदमी जनावर होने के लिए अभिशप्त है। प्रकाश झा इनसे बचने की कोशिश नहीं करते। समाज में जो घटित हो रहा था, उसे ही वे पर्दे पर पूरे कौशल के साथ उतार देते हैं। यह वही समय था जब केरल के अडूर गोपालकृष्णन मुखामुखम (1984) बनाकर आजादी के बाद कम्युनिस्ट पार्टी के अंतरविरोध, बिखराव और अस्मिता के संकट को दर्शा रहे थे। यही वह समय है जब प्रकाश झा दामुल के जरिए बिहार के खदबदाते समाज की बेचैनी को अपनी कल्पनाशीलता के साथ समझने की कोशिश कर रहे थे। प्रकाश झा की एक खूबी यह है कि वह किसी भी समस्या को समग्रता में देखते हैं। इसी क्रम में देखें तो वे अपने अभिनेताओं का चयन भी बहुत सोच समझकर करते हैं। मनोहर सिंह, अन्नू कपूर, दीप्ति नवल, सीमा मजूमदार, रंजन कामथ, प्यारे मोहन सहाय जैसे मजे हुए कलाकार फिल्म को प्रभावी बनाते हैं। कलाकारों ने जो अभिनय किया है, वह फिल्म को जीवंत बना देता है। उनकी दूसरी खूबी यह है कि वे अपने ऊपर तकनीक को हावी होने नहीं देते। तकनीक को अपने अनुकूल इस्तेमाल करते हैं। उनकी इस विशेषता को भी ओझल नहीं किया जा सकता कि वे फिल्म में बिहार के समाज, संस्कृति, परंपरा सभी कुछ का इस्तेमाल कर बिहार को पर्दे पर जीवंत करने की कोशिश करते हैं। उनकी दृष्टि मुंबइया निर्देशन पद्धति से अलग और अलहदा कही जा सकती है। शायद इसके पीछे उनका बिहारी होना भी हो सकता है। यह भी ध्यान रखना चाहिए कि वे फिल्म निर्माण के क्रम में किसी परंपरा या परिपाटी की लीक पर कभी नहीं चले। कथानक की संवेदना के भीतर से निर्देशन का कौशल फूंटता है। वह कभी कथानक पर निर्देशन के व्यक्तित्व को थोपते नहीं। उनके कथानक में एक केंद्रीय समस्या होती और उससे जुड़े सारे संबंद्ध सूत्रों को वे निर्देशन के क्रम में माला की मोती की भांति पिरो देते हैं। दामुल है तो बंधुआ मजदूर की कहानी, लेकिन कोई बंधुआ मजदूर कैसे बनता है, उसे किन-किन नारकीय परिस्थितियों से गुजरना पड़ता है, न चाहते हुए भी उसे वह काम करना पड़ता है, जो वह नहीं चाहता, वैसे समाजों का वर्गीय चरित्र क्या है, पुलिस-सिपाही-कानून किसके इशारे पर नाचते हैं, ठेकेदारी और राजनीति के क्या अंतर्संबंध हैं, ओवसियर बाबू कैसे ठेका पास करते हैं, मजूदरों का शोषण कैसे होता है...ऐसे तमाम बिंदु हैं, जिसे प्रकाश झा अपनी अंतर्दृष्टि से देखते हैं, उकेरते हैं। ब्राह्मण और राजपूत के आपसी वर्चस्व में हरिजन और दलित कैसे पिसते हैं, यह प्रकाश झा की आंख देखती है। सोचना पड़ता है कि जिस प्रदेश में जगजीवन राम और कर्पूरी ठाकुर जैसे हरिजन-दलित राजनेता राजनीति के सर्वोच्च शिखर पर विराजते हैं, उस प्रदेश में उस समय तक कोई राजनीतिक जागरूकता पैदा क्यों नहीं हो सकी।                
सन 1990 के बाद मंडल आंदोलन के बाद ्रपिछड़ों के साथ दलितों में भी राजनीतिक चेतना विकसित हुई। पास का पड़ोस यानी उत्तर प्रदेश इस मामले में आगे रहा। कांशीराम ने उप्र में दलितों के भीतर राजनीतिक चेतना का प्रचार जरूर किया और वे अपने मताधिकार को लेकर बेहद जागरूक हुए। उनकी आर्थिक स्थिति में भले कोई क्रांतिकारी बदलाव के लक्षण न दिखते हों, राजनीतिक रूप में उनमें विलक्षण जागरूकता पैदा हुई है। कभी तिलक, तराजू और तलवार को जूते मारने वाली उनकी पार्टी अब तिलक के साथ सत्ता का सुख भोग रही है। सत्ता का अपना गणित होता है। वह अपने ढंग से आदमी को ढाल लेती है। मायावती भी अब ढल गई हैं। उनका दलित एजेंडा पीछे छूट गया है। पर, दामुल में दलितों के भीतर इतनी जागरूकता नहीं आई थी कि वे अपने शोषण का प्रतिकार कर सकते। बच्चा सिंह की खुन्नस यह है कि परधानी में माधो पाड़े ही जीतते आ रहे हैं। उन्हें हराने के लिए वे एक चाल चलते हैं और हरिजन टोले के गोकुल को चुनाव में खड़ा कर देते हैं। बच्चा सिंह हरिजन टोले में जाकर माधो पाड़े का कच्चा चिऋा खोलते हैं। कहते हैं छुआछूत, भेदभाव इ बाभन लोग का बनाया हुआ है। बच्चा सिंह अपनी चाल में सफल तो हो जाते हैं, लेकिन गोकुल चुनाव नहीं जीत पाता, क्योंकि बच्चा सिंह को छोडकर सभी राजपूत टोले के लोग अपने मत का प्रयोग करने नहीं जाते। बच्चा सिंह का तर्क भी कि, खड़ा किए हम, जिताएंगे हम तो राज कौन करेगा, चमार? कोई असर नहीं करता। उधर, बोगस वोट के जरिए माधो पाड़े चुनाव जीत जाते हैं। बाहर के गुंडों को बुलाकर हरिजनों को उन्हीं के एक अहाते में बंधक बना देने वाले माधो पाड़े अपनी चाल में सफल हो जाते हैं। पर, लंबे समय से चुनाव जितने की  तैयारी कर रहे बच्चा सिंह अपने ही लोगों से हार जाते हैं। मेले में उनका हरिजनों के साथ उठना-बैठना, उनकी बस्तियों में आना-जाना, उनके साथ अपनापन पैदा करना सब कुछ बेकार चला जाता है। गांव की परतदार राजनीति में जातियां कैसे मोहरा बनती हैं, यह छिपा नहीं रहता। कहना न होगा कि जाति की राजनीति से छोटी पंचायत से लेकर बड़ी पंचायत तक आज भी मुक्त नहीं हो सकी है।
  गोकुल की वह आशंका भी सच साबित होती है कि इस चुनाव में बहुत खून खराबा होगा। उनका तो कुछ नहीं बिगड़ता। लेकिन हरिजन टोला मातमी माहौल में बदल जाता है। इस फिल्म में इतना सब कुछ होने के बावजूद भी हरिजन टोले में जमींदारों के प्रति कोई आक्रोश पैदा नहीं होता। माधो पाड़े ऐसा कोई कुकर्म नहीं, जो नहीं करते। महत्माइन (जो जवानी में ही विधवा बन जाती हैं) की जर-जमीन ही नहीं उसकी देह को भी नोचता है। जब माधो पाड़े के भाई राधो पाड़े के लोग हरिजन बस्ती में इस बात के लिए आग लगा देते हैं कि मजदूर पंजाब जा रहे थे कमाने के लिए। आग लगने और दर्जनों की हत्या करने के बाद माधो पाड़े बच्चा सिंह से मिलते हैं और गिला-शिकवा दूर कर साथ देने की बात करते हैं। बच्चा सिंह माधो पाड़े से मिल जाते हैं। इसके बाद तो फिर पुलिस, नेता, कानून हरिजनों के दर्द को कैसे समझते? लेकिन जब यही महत्माइन माधो पाड़े के खिलाफ उठ खड़ा होती हैं तो माधो पाड़े रात में उनकी हत्या करा देता है और संजीवना को उसकी हत्या में फंसा देता है। यह संजीवना उनका बंधुआ है। उनके लिए, अपने बाप का कर्ज चुकाने की एवज में गाय-बैल चोरी करने के लिए विवश होता है। सादे कागज पर अंगूठा लगवाया जाता है। उसके सामने कोई विकल्प नहीं बचता। उसकी भलमनसाहत कि बाप का कर्ज हम नहीं चुकाएंगे तो कौन चुकाएगा? पता नहीं बाप ने कर्ज लिया भी था या नहीं। लेकिन माधो पाड़े का बही-खाता तो यही बोलता है।
   कानून तो उनके लिए है जो ताकतवर हैं।  संजीवना तो बंधुआ था। जिस जाल में माधो संजीवना को फंसा देते हैं वह उसके लिए दामुल साबित होता है। उसे महत्माइन की हत्या में फांसी हो जाती है। माधो एक तीर से दो शिकार करते हैं। गरीब आदमी कैसे अपना केस लड़ सकता है। लड़ भी जाए तो कैसे वह जीत सकता है। सभी तो उसी जात और जमात के लोग हैं। 
  प्रकाश झा ने कानून की नब्ज को पकडने की कोशिश की है। न्यायपालिका पर अब भी लोगों का भरोसा है, लेकिन इसी न्यायपालिका पर गरीबों की आस क्यों नहीं जगती। इस पर हमारी न्यायपालिका बहुत संजीदा नहीं है। बड़े लोग कानून की मार से बच निकलते हैं। अपवाद ही होता है कि कोई रसूख वाला सजा का हकदार हो जाए। सवाल है, क्या कानून सचमुच अंधा होता है? आखिर, उसकी आंख की पट्टी कब खुलेगी? 
  प्रकाश झा दामुल से लेकर अपहरण की यात्रा को बिहार की राजनीतिक यात्रा के बतौर देखते हैं। वह कहते हैं कि मेेरी फिल्में समाज के वर्तमान बदलते परिदृश्य और उभरते समीकरण को रेखांकित करती हैं। दामुल से लेकर मृत्युदंड, गंगाजल से लेकर अपरहण तक बिहार के तीन दशकों की राजनीतिक यात्रा को दर्शाती हैं। प्रकाश झा इन फिल्मों को किसी खास श्रेणी में रखने की अपेक्षा नहीं करते। उनकी फिल्मों को किसी खांचें में नहीं रखा जा सकता है। क्योंकि उनकी कोई भी फिल्म भले की किसी खास विषय पर केंद्रित हो, लेकिन वह अपनी पूरी समग्रता में रूपायित होती है। यह प्रकाश झा की विशेषता है। दामुल के बारे में उनके शब्द हैं, दामुल फिल्म इसलिए बन पाई कि मैं मूलतरू गांव का हूं और गांव की सामाजिक व्यवस्था और उसके पीछे की राजनीति को समझ सकता हूं। गांव की यह समझ ही गांव को उसकी समग्रता में पर्दे पर उतार पाने में प्रकाश झा सक्षम होते हैं। गांव में हाट-बाजार के दृश्य, संजीवना का पहनावा, हरिजन टोले की बस्ती और उनके लोगों का रहन-सहन, खेत-खलिहान, बोली-बानी इतना सजीव को उठता है तो यह उनकी गंवई मन मिजाज के कारण। लोकेशन, संवाद अदायगी, ग्रामीण समाज की जो झलक फिल्म में देखने को मिलती हैं, कहीं से बनावटीपन का अहसास नहीं होता। संपादन कला में निष्णात प्रकाश झा की यह फिल्म बहुस्तरीयता को व्याख्यायित करती है और कथानक चमत्कारिक ढंग से आगे बढ़ता है। गीत के नाम पर महज दो गाने और वह भी पारंपरिक। एक लौंडा नाच दूसरा कीर्तन। और ये गीत भी कथानक को आगे बढ़ाते हैं। संवाद भी आंचलिकता की महक से गमक उठते हैं-
-हमरा इज्जत डौन करना चाहता है।
-यहां बाभन लोग सबका खून चूस लेगा।
-तो का इन सालों से मीठा-मीठा बात करते।
-महत्माइन बहुत उड़ रही हैं मालिक।
-हमरा बात सुनेगा तो जिनगी भर कौनो तकलीफ नहीं होगी। बाप की जिम्मेदारी संभाल ले।
   गौर करने की बात यह है कि जो हरिजन बस्ती जमींदारों के शोषण-उत्पीडन के खिलाफ उठ खड़ा नहीं होता, उस समाज की एक औरत प्रतिकार करती है। जब माधो पाड़े ठंड की रात में अपने गुर्गों के साथ अलाव ताप रहे थे, रजुली (संजीवना की पत्नी)गंड़ासा लेकर आती है और सीधे माधो पाड़े के गले पर प्रहार कर देती है। माधो कुर्सी से गिर कर छटपटाने लगता है और अंततरू दम तोड़ देता है। रजुली को लोग पकड़ लेते हैं, रजुली तीव्र आक्रोश में फूट पड़ती है...तू मुखिवा को मारकर दामुल पर काहे नहीं चढ़ा रे...।
 प्रकाश झा अपनी इस फिल्म में, जिसने कई अवार्र्ड जीते, ऐसा प्रयोग नहीं करते, जिससे लगे कि यह फिल्म में अनावश्यक और अप्रासंगिक है। वे सिनेमा की औपचारिक युक्तियों के साथ गांव के वृत्तांत को जिस ढंग से खोलते हैं, उसे सिनेमाई अभिव्यक्ति में एक मिसाल कही जा सकती हैै। संपादन, कैमरे का कोण, सूर्य के उदय और अस्त होते बिंबों के जरिए अपनी बात कहने की कला फिल्म को पूर्णता और सार्थकता प्रदान करते हैं। वे सीमाओं को तोड़ते भी हंैं, गढ़ते भी हैं। ऐसा इसलिए संभव हो पाया कि वे सीखने में विश्वास करते हैं। घूमना और समझना और उस समझ को पर्दे पर उतारना यही उनका शगल है। दामुल देखकर ऐसा महसूस किया जा सकता है।