शुक्रवार, 27 दिसंबर 2019

सेरेंगसिया के शहीद

सेरेंगसिया घाटी शहीदों की याद दिलाती है। यह अतीत का एक पन्ना है, जिस पर बहुत कम चर्चा होती है। यह उस आंदोलन की याद दिलाता है, जिसमें अंग्रेजों को हो आदिवासियों ने अपनी बहादुरी से पस्त कर दिया था।  
घटना सन् 1820-21 की है। अंग्रेजों के खिलाफ कोल्हान में चले विद्रोहों पर काबू पाने में ब्रिटिश अफसरों को सफलता मिल चुकी थी। कोल्हान क्षेत्र में हुए दर्जनों विद्रोहों पर काबू पाने के बाद कोल विद्रोह को शांत करना उनके लिए बड़ी उपलब्धि मानी गई। लेकिन, अंग्रेजों को इसकी कीमत भी चुकानी पड़ी। ईस्ट इंडिया कंपनी के जरिए सत्ता हासिल करनेवाली ब्रिटिश सरकार को ही आदिवासियों से समझौता करना पड़ा। तब के कमिश्नर थामस विल्किंसन से औपचारिक समझौते के बाद विल्किंसन रूल बना। इसके तहत स्थानीय स्वशासन व्यवस्था की स्वायत्तता को संवैधानिक मान्यता मिल गई, लेकिन, उनका दमन चक्र चलता रहा। जब इस दमन का दायरा बढ़कर बच्चों और महिलाओं तक आया तो स्वभावगत लड़ाके हो आदिवासी इसे कबूल नहीं कर पाए। इसक बाद 1831-32 में विद्रोह फूट पड़ा, जिसे इतिहास में कोल विद्रोह के नाम से दर्ज किया गया। इस विद्रोह में अंग्रेजों का काफी नुकसान हुआ। हालांकि अंग्रेजों ने पूरी ताकत से इस कोल विद्रोह भी दबा दिया। 
इसके बाद 18 जनवरी 1833 को सरायकेला में हिल असेंबली बुलाई गई। इसमें कुछ मुंडा मानकी सरदारों ने कंपनी शासन की अधीनता स्वीकार कर ली। फरवरी 1837 तक अंग्रेजों ने पुलिसिया कार्रवाई की बदौलत बाकी बचे गांवों में अपनी हनक कायम कर ली। इसके बाद दक्षिण-पश्चिम सीमांत एजेंसी की स्थापना हुई और थामस विल्किंसन को एजेंसी का एजेंट बना दिया गया। इसके बाद तो विद्रोह की ज्वाला धधक उठी। इस आग ने इस घाटी को अपनी चपेट में ले लिया। 
सेरेंगसिया घाटी की कहानी यहीं से शुरू होती है। राजबासा पीड़ (इलाका) के पोटो सरदार के नेतृत्व में 22 पीड़ों के लोगों ने विद्रोह का बिगुल बजा दिया। कंपनी की सेना कई मौकों पर मुंह छिपाकर भागी। इससे हो लड़ाकों का हौसला बढ़ा। वालंडिया में गुप्त सभा हुई। इसमें सेरेंगसिया और बागलिया घाटियों को अपने अधिकार में लेने का निर्णय लिया गया। ग्राम प्रधानों को तीर भेजकर विद्रोह में शामिल होने का निमंत्रण दिया गया। बगावत हो चुकी थी। अंग्रेजों को इसका भान भी नहीं था कि हो आदिवासी इतनी मुस्तैदी से विरोध करेंगे। इससे विचलित विल्किंसन ने 12 नवंबर 1837 को चाईबासा में अपने अफसरों के साथ बैठक की। विरोध को दबाने के लिए 17 नवंबर को कैप्टन आर्मस्ट्रांग के नेतृत्व में 400 सशस्त्र सैनिक 60 घुड़सवार सिपाहियों और दो तोपों के साथ बाढपीड़ रवाना गुए। इसकी खबर पोटो सरदार को लग गई। 19 नवंबर को पोटो सरदार की विद्रोही सेना ने आर्मस्ट्रांग की टुकड़ी पर हमला बोल दिया। भीषण लड़ाई हुई और कंपनी की सेना को हार का मुंह देखना पड़ा। इसके बाद अंग्रेजों ने पोटो सरदार के गांव पर हमला कर दिया। उनके पिता को कैद कर लिया गया. तड़ागहातु, रुईया, जयपुर आदि गावों पर भी हमला किया गया। महिलाओं तक को बंदी बना लिया गया। तड़ागहातु गांव में आग लगा दी गयी। बर्बर दमन किया गया। आठ  दिसंबर को पोटो सरदार गिरफ्तार कर लिए गए। उनके सहयोगियों की भी गिरफ्तारी हुई। एक जनवरी 1838 को जगन्नाथपुर में हजारों लोगों के बीच सेरेंगसिया घाटी के लड़ाके पोटो सरदार, नारो हो और बड़ाय हो को फांसी दे दी गई। एक दिन बाद 2 जनवरी को बोड़ो हो और पंडुआ हो को सेरेंगसिया गांव में सार्वजनिक तौर पर फांसी पर लटका दिया गया। 
इतनी भीषण लड़ाई के बावजूद इतिहास के पन्नों में इन हो लड़ाकों को सम्मान देने में थोड़ी कंजूसी की गई। किसी एक इलाके के पांच-पांच लोगों को एक साथ फांसी पर चढ़ा देना कोई सामान्य घटना नहीं थी. आज भी सेरेंगसिया के लोग इस शहादत की तारीखों पर मेला लगाते हैं। एक-एक महीने तक कार्यक्रम होता है। अपने स्तर से चंदा कर यह कार्यक्रम लोग करते हैं। 
हो किसी राजतन्त्र के अधीन कभी भी नहीं रहे। इनका जीवन स्वाधीन था। इनकी पहचान पराक्रमी योद्धाओं के रूप में थी। इनके धनुष से निकला तीर का निशाना कभी नहीं चूकता था। पोड़ाहाट के राजा तथा कई अन्य राजाओं ने इन क्षेत्र को अपने अधीन करने के लिए कई-कई बार प्रयास किये पर 'होÓ समुदाय के लोगों ने इन्हें खदेड़कर इनके छक्के छुड़ा दिए तथा इन राजाओं को हमेशा मुंह की खानी पड़ी। अंग्रेजों के साथ भी ऐसा ही हुआ। हो कभी शांत नहीं हुए। बीसवीं सदी में भी इनकी लड़ाई अपनी स्वतंत्रता के लिए जारी रही। 

देश का पहला जन आंदोलन 1855 का हूल

सिदो और कान्हू पालकियों पर (हैं),
चांद और भायरो घोड़ों पर (हैं),
ऐ चांद, देखो, ऐ भायरो, देखो,
घोड़े (अब) मलिन हो रहे हैं।।
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सिर गड़ धंस (ढह) गया,
शिखर गढ उजड़ गया,
शिखर के सिपाही (सैनिक)
तितर-बितर हो गए,
वैसे ही, हे बड़ी बहन (दीदी) हमलोग भी,
माता-पिता के नहीं रहने पर तितर
बितर हो गए।


यह गीत आज भी संताल में गूंजता है। उस ऐतिहासिक हूल की याद दिलाता है, जो भारत के पहले स्वतंत्रता संग्राम 1857 से पहले 1855 में फूट पड़ा था। हालांकि सही अर्थों में देश का पहला स्वतंत्रता संग्राम आदिवासी क्षेत्रों में ही फूटा था और 1855 का यह हूल इस अर्थ में पहला था, क्योंकि इसका क्षेत्र काफी व्यापक था। छोटानागपुर के रामगढ़ से लेकर संताल परगना तक। यह कोई एक दिन की घटना नहीं थी। महीनों की तैयारी थी। उस समय चार सौ किमी दूर तक सूचना देना और एक तिथि को एक जगह एकत्रित होना, बड़ी घटना था। इस हूल के पीछे ऐतिहासिक कारण थे और जिसके नायक थे चार भाई सिदो-कानू, चांद-भैरव। 
 कहा जाता है कि दामिन ई-कोह का निर्माण 1833 में अंग्रेजों ने किया। यही आज संताल परगना है। अंग्रेजों ने छोटानागपुर से संतालों को जंगल साफ  करने और कृषि योग्य भूमि बनाने और बाद में रेल की पटरियां बिछाने के लिए 1800 ई के आस-पास बसाना शुरू किया था। इसका मुख्य कारण संताल कठिन परिश्रमों और कठिन कार्य करने में निपुण थे। संतालों को इस क्षेत्र में बसाने का एक और प्रमुख कारण था, पहाडिय़ा जनजाति द्वारा लगातार विद्रोह। उसे भी कम करने की अपनी नीति के चलते अंग्रेजों ने संतालों को इस क्षेत्र में बसाना शुरू किया। चालीस-पचास सालों में अच्छी-खासी संख्या में संताल बस गए, लेकिन अंग्रेजों ने संतालों के साथ भी वही अत्याचार शुरू कर दिया। इसका नतीजा यह रहा कि सन् 1855 में बंगाल के मुर्शिदाबाद तथा बिहार के भागलपुर जिलों में स्थानीय जमींदार, महाजन और अंग्रेज कर्मचारियों के अन्याय अत्याचार के शिकार संताल जनता ने एकबद्ध होकर उनके विरुद्ध विद्रोह का बिगुल फूंक दिया था। इसे संताल विद्रोह या संताल हूल कहते हैं। संताली भाषा में हूल शब्द का शाब्दिक अर्थ है विद्रोह। यह अंग्रेजों के विरुद्ध पहला सशस्त्र जनसंग्राम था। सिदो-कान्हू, चांद-भैरो भाइयों और फूलो-झानो जुड़वा बहनों ने संताल हूल का नेतृत्व, शाम टुडू (परगना) के मार्गदर्शन में किया। 1852 में लॉर्ड कार्नवालिस द्वारा आरम्भ किए गए स्थाई बंदोबस्त के कारण जनता के ऊपर बढ़े हुए अत्याचार इस विद्रोह का एक प्रमुख कारण था।
इसका जिक्र उस समय के एक अंग्रेज अधिकारी राबर्ट कार्टियर्स की किताब हाड़मा विलेज में भी किया है। उसने अपनी इस किताब में दो महाजनों के नाम का भी उल्लेख किया है- केनाराम भगत और बेचाराम भगत। महेशलाल दारोगा के अत्याचार से विद्रोह की शुरुआत होती है। महाजन सूदखोर शुरू में ऋण देते थे और उसका तीन सौ गुना वसूलते थे। 
संताली लोकगीत में भी देख सकते हैं-
 सिदो, तुमने ख्ूान में क्यों नहा लिया है
कान्हू तुम हूल हूल क्यों चिल्लाते हो।
अपने लोगों की खातिर हमने खून में नहाया है।
हालांकि अंग्रेजों की क्रूर नीति के कारण 1854 में असंतोष फैलने लगा था। संतालों के मुखिया इन दिकुओं को उखाड़ फेंकने का उपाय सोचने लगे। संतालों पर अत्याचार बढ़ गया। खेत बंधक रख कर अपने कब्जे में कर लेते थे। गरीब संताल खेत नहीं छुड़ा पाते थे। शोषण अत्याचार का बदला लेने के लिए संताल मांझियों ने राय सलाह कर बड़े-बड़े महाजनों के घर डाका डाला और वे पकड़े गए। इसमें संतालों को सजा दिलाने में महेश लाल दारोगा का हाथ था। संताल बदला लेना चाहते थे।
इसी बीच बरहेट के भोगनाडीह में सिदो-कान्हू, चांद, भैरव, झानो-फूलों, भाई बहनों ने संघर्ष छेड़ दिया। 30 जून 1855 को एक सभा बुलाई और जिसमें दस हजार संताल जमा हुए। जाहेर एरा ने बताया है कि सिदो तुम सूबा (राजा) हो और कान्हू सब सूबा। यह धरती तुम लोगों का है। अब तुम लगान वसूल करो। तब भोगनाडीह में मिट्टी का जाहेर थान बना कर पूजा पाठ शुरू हो गया। दूसरे दिन पंचकटिया बाजार में स्थित देवी मंदिर में पूजा की। एके पंकज ने लिखा है, 'यह कोई आकस्मिक युद्ध नहीं था, बल्कि यह ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ एक सुनियोजित हूल था, जिसकी तैयारियां भोगनाडीह गांव के सिदो मुर्मू अपने भाइयों कान्हू, चांद व भैरव, इलाके के प्रमुख संताल बुजुर्गों, सरदारों और पहाडिय़ा, अहीर, लुहार आदि अन्य स्थानीय कारीगर एवं खेतीहर समुदायों के साथ एकताबद्ध होकर कर रहे थे। जब सारी सामरिक तैयारियां पूरी हो गई, सैन्य दल, छापामार टुकडिय़ां, सैन्य भर्ती-प्रशिक्षण दल, गुप्तचर दल, आर्थिक संसाधन जुटाव दल, रसद दल, प्रचार दल, मदद दल आदि गठित कर लिए गए, रणनीतिक योजना को अंजाम दे दिया गया, तब 30 जून को विशाल सभा बुला कर अंग्रेजों को देश छोडऩे का 'सम्मनÓ जारी कर दिया गया। इस सम्मन यानी 'ठाकुर का परवानाÓ को सिदो परगना के निर्देश पर किरता, भादू और सुन्नो मांझी ने लिखा था। गौर करने वाली बात है कि हूल संबंधी सम्मन और अन्य प्रचार सामग्रियां हिंदी, बांग्ला, संताली भाषा तथा कैथी और बांग्ला लिपि में लिखी गई थी। यही नहीं, ब्रिटिश मुद्रा को अमान्य करते हुए आर्थिक गतिविधियों के लिए विशेष तौर पर हूल के लड़ाकों ने नए सिक्के जारी किए थे। भागलपुर, बीरभूम के कमिश्नर और जिला मजिस्ट्रेटों और स्थानीय पुलिस थानों व अन्य प्रमुख अधिकारियों को जो सम्मन भेजे गए, उसमें स्पष्ट कहा गया था-1. राजस्व वसूलने का अधिकार सिर्फ संतालों को है। 2. प्रत्येक भैंस-हल पर सालाना 2 रु., बैल-हल पर एक आना और गाय-हल पर आधा आना लगान लिया जाएगा। 3. सूद की दर एक रुपये पर सालाना एक पैसा होगा। 4. सूदखोरों, महाजनों और जमींदारों को तत्काल यह क्षेत्र खाली कर चले जाना होगा। 5. 'ठाकुर जिउÓ (संतालों के सर्वोच्च ईश्वर) के आदेश पर समूचे क्षेत्र पर संतालों का राज पुनस्र्थापित किया जाता है और सिदो परगना 'ठाकुर राजÓ के शासन प्रमुख नियुक्त किए गए हैं। 6. सभी ब्रिटिश अधिकारी और थानेदार को सूचित किया जाता है कि वे तत्काल आकर सिदो परगना के दरबार में हाजिरी लगाएं अन्यथा उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी।Ó
जाहिर है कि ब्रिटिश शासन इसे मानने को तैयार नहीं थी। लिहाजा जुलाई का पहला सप्ताह बीतते ही संताल और स्थानीय जनता ने युद्ध छेड़ दिया। बाजार, महाजनों-सामंतों के ठिकानों, थानों, ब्रिटिश प्रशानिक केंद्रों और थानों पर हमला बोल दिया गया। 
फोटो साभार
हूल की सूचना पाकर महेश लाल दत्ता नामक दारोगा दीघी थाना का दारोगा वहां पहुंचा। विद्रोहियों ने उस दारोगा की हत्या कर दी। यह हूल की पहली कारगर घटना थी। यह घटना सात जुलाई, 1855 की है। शीघ्र ही विद्रोहियों ने बरहेट बाजार को लूट लिया, क्योंकि यह महाजनों का गढ़ था। चारों तरफ आतंक मच गया। डाक एवं संचार व्यवस्था नष्ट हो गई। 12 जुलाई को सिदो-कानू और भैरव ने सलामपुर लूटने के बाद पाकुड़ के जमींदार को लूटा। पाकुड़ छोडऩे के बाद संतालों ने पाकुड़ की पूर्वी सीमा पर स्थित बल्लमपुर व अन्य गावों को लूटा। इसके बाद मुर्शिदाबाद जिले की सीमा पर बढ़े। वीरभूम में भी यह आग फैल चुकी थी। 13 जुलाई को पीरपैंती के निकट एक गांव में रेल कर्मचारी जख्मी हुए। 16 को पीरपैंती के निकट  हथियारबंद संतालों के एक दल के साथ मेजर बर्रोस की सैनिकों के साथ मुठभेड़ हुई। जिसमें कुछ अधिकारी समेत 25 सैनिक मारे गए। विद्रोह संताल दामिन-ए-कोह क उत्तर मुर्शिदाबाद की सीमा पर तथा गंगा के दक्षिण तट पर कहलगांव से राजमहल के बीच भी फैल गया था। 17 अगस्त को एक घोषणा की गई कि सभी विद्रोहियों को माफी दे दी जाएगी। पर विद्रोही नहीं माने। लगभग तीन हजार संतालों का जत्था भागलपुर जिले की रक्षादंगल नामक स्थान को लूटा। अक्टूबर में चारों भाइयों के नेतृत्व में दो सौ संतालों ने दुमका के दक्षिण स्थित अंबा हरना को लूटा। अंतत: दस नवंबर, 1855 को मार्शल लॉ की घोषणा कर दी गई। 30 नवम्बर 1855 को विश्वासघातियों ने सिदो को पकड़ कर भागलपुर की सेना को सौंप दिया। 20 फरवरी को कान्हू को जामताड़ा के पास ऊपर बंधा नामक स्थान पर कुजरों का घटवार सरदार ने कानू को पकड़ कर अंग्रेजों को सौपा और उसे 23 फरवरी 1856 में फांसी दी गई। चांद-भैरव सहित अन्य नेताओं की यही दशा हुई। 
हूल का क्षेत्र
संताल हूल केवल संताल तक सीमित नहीं था। एक व्यापक आंदोलन ने कई जिलों को प्रभावित किया था। ब्रिटिश शासन क्षेत्र के विद्रोह दबाने के लिए बड़ी मशक्कत करनी पड़ी थी। कलकत्ता, बहरामपुर, सूरी, रानीगंज, देवघर, भागलपुर, पूर्णिया, मुंगेर, बाढ़ यहां तक कि पटना के अफसर, सेना को हूल पर नियंत्रण के लिए प्रयास करने पड़े। हजारीबाग के संताल संताल परगना के संताल को अपना सगा मानते थे, क्योंकि वे यहीं से ले जाए गए थे। हजारीबाग में भी संताल सक्रिय थे। वीरभूम में भी हूल का प्रभाव था। मुर्शिदाबाद के नवाब विद्रोह से परेशान था। जाहिर है कि हूल के नेताओं ने हूल को एक व्यापक क्षेत्र में फैलाने का काम किया था। इसलिए, इसके व्यापक क्षेत्र को देखते हुए इसे आसानी से देश का पहला स्वतंत्रता संग्राम मानना चाहिए। यह एक जन आंदोलन था। संताल परगना के डिप्टी कमिश्नर के रिकार्ड आफिस में जो संताल कैदियों से संबंधित दस्तावेज मिले हैं, उनमें 251 कैदियों की सूची मिली है। इनमें 191 संताल, 34 नाई, पांच डोम, 6 धांगड़, सात कोल, एक ग्वाला, 6 भुइयां, एक रजवार पाए गए हैं, जो विभिन्न गांवों के रहने वाले थे। यही नहीं, एक और महत्वपूर्ण बात है। भागलपुर के कमिश्नर ने 28 जुलाई, 1855 को बंगाल सरकार के सेके्रटरी को लिखा कि ग्वाले, तेली व अन्य जातियां संतालों का नेतृत्व कर रही हैं। इससे साबित होता है कि इस आंदोलन में हर जाति सक्रिय थी। तेली, कुम्हार, लोहार, मोमिन, चमार, डोम भी सक्रिय थे। डोम गुप्तचर एवं संवाद वाहक का काम बड़ी कुशलता से करते थे। और, लोहार क्रितू व सूना नामक डोम ने परवाना लिखने का काम किया था और गुप्तचर का काम भी। इसलिए, इस हूल में सभी जातियों का योगदान था और यह एक जनक्रांति थी। 
संजय कृष्ण

सोमवार, 23 दिसंबर 2019

जीवंत परंपरा को पुनर्जीवन की आस


चलना ही नृत्य, बोलना ही गीत। झारखंड की यह पहचान है। यही संस्कृति है। परंपरा है। गांव-गांव। एक जीवित परंपरा अखरा की, जिसे अब पुनर्जीवन की जरूरत है। झारखंड की 32 जनजातियों के अपने गीत हैं, अपने नृत्य है। नृत्य के कई भेद हैं। बंदी उरांव बोलते हैं कि उरांव नृत्य में साढ़े पांच हजार स्टेप हैं। इस तरह हर जनजातीय नृत्य में। यहां 12 महीने में 13 नृत्य हैं और हर नृत्य के अंदर भी कई-कई। यह लोक की थाती है। यहां चार कोस पर बानी ही नहीं बदलती, नृत्य और संगीत की परिभाषा भी बदल जाती है। यह धरती इतनी समृद्ध है। लेकिन आज जरूरत लोक संगीत व कला को बचाने की है। राज्य बने 19 साल से ऊपर हो गए, लेकिन यहां न संगीत अकादमी खुल सका, न भाषा अकादमी। गांव-गांव संगीत-गीत और साहित्य की पांडुलियां दीपकों का निवाला बन रही हैं। कलाकार पेट से जूझ रहे हैं। मनपूरन नायक कहते हैं अखरा तभी बचेगा, जब कलाकार बचेंगे। उनके सामने पेट की समस्या है। नागपुरी में एक कहावत है-पेट में भात ना, ड्योढ़ी पे नाच। पहले पेट की भूख मिटनी चाहिए। कलाकार ही नहीं रहेंगे, तो अखरा व कला कैसे बचेगी? झारखंड की पहचान, यहां के खनिज संपदा से नहीं, यहां की कला से है। यहां दसियों हजार पुरानी कला का दिग्दर्शन होता है, लेकिन सरकार की ओर से कोई पहल नहीं की जाती। सब बर्बाद हो रहा है। संताल के फैले जीवाश्म को भी नष्ट किया जा रहा है। यह सब अपने झारखंड में। बहुत दुखद स्थिति है। आखिर, किसी भी राजनीति दलों के घोषणा पत्र में कला-साहित्य-संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन को लेकर एक शब्द क्यों नहीं रहता, जबकि हमारे लिए यह महत्वपूर्ण है। डॉ रामदयाल मुंडा जी कहते थे-जे नाची से बाची। यह कैसे संभव होगा?
विलुप्त हो रहे वाद्य यंत्र
झारखंड की हर भाषा में गीत है। उसी तरह हर जनजातीय समुदाय के वाद्य भी हैं। कुछ वाद्य साझा हैं, लेकिन आज कुछ वाद्य तो विलुप्त हो गए, कुछ विलुप्ति के कगार पर हैं। ऐसा इसलिए कि हम इनके संरक्षण के प्रति उदासीन हैं। बंदी उरांव कहते हैं कि आज केंदरा, खोचोर, टेचका, टुहिला, मोहनबंसी, तिरियो, मुरली, भेर, बरसिंध, सरगी, पैजन, सोयको आदि वाद्य चलन से बाहर हो गए। आखिर, इनका संरक्षण कैसे होगा? इसके लिए समाज और सरकार दोनों को अपनी जवाबदेही लेनी होगी। भाषा का मरना, संस्कृति का मरना है। अब अपनी भाषा और संस्कृति से दूर हो रहे हैं, इसलिए हमारे जीवन में रस घोलने वाले वाद्य भी विलुप्ति के कगार पर खड़े हैं।

कला-संस्कृति विभाग की ओर से हर शनिवार को सनिपरब का आयोजन किया जाता था। इसके पीछे उद्देश्य यही था कि यहां के लोक कलाकारों को सप्ताह में एक न्यूनतम मानदेय दिया जाए ताकि वे अपनी कला को संरक्षित कर सकें और अगली पीढ़ी तक पहुंचा सके, लेकिन यह भी एक डेढ़ साल के बाद साल भर से बंद हो गया। इससे सरकार की अपने राज्य की कला के प्रति गंभीरता समझ सकते हैं। जब ऐसे आयोजन की यहां जरूरत है ताकि कलाकारों के पेट को भात नसीब हो सके। भूखे पेट कला का संरक्षण संभव नहीं है। कला-मर्मज्ञ डॉ गिरिधारी राम गौंझू कहते हैं, अपनी संस्कृति को बचाने के लिए कला के उपादानों को बचाना जरूरी है। नृत्य, संगीत, वाद्य का संरक्षण जरूरी है। यह काम सरकारी स्तर पर ही संभव है। दूसरे, यहां के लोक कलाकारों को बाहर भी भेजने की जरूरत है। दूसरे देशों में जब यहां के कलाकार जाते हैं तो खूब प्रभावित करते हैं। इसे बढ़ाने की जरूरत है। यहां की लोक कला काफी समृद्ध है। छऊ की अंतरराष्ट्रीय पहचान बन गई है, दूसरे कला विधाओं को भी इस पहचान तक लेना चाहिए। कलाकार मरते जा रहे हैं, उनके साथ विधा भी मरती जा रही है। यह बहुत दुखद है। बंगाल सरकार अपने कलाकारों को पेंशन दे रही है। पूर्वोत्तर अपने लोक कलाकारों को आर्थिक सहायता दे रहा है। पर, यहां नहीं है। इसकी पहल होनी चाहिए।

'तीर्थÓ की उपेक्षा का मलाल पर, लोकतंत्र में आस्था बरकरार


बिसुआ टाना भगत जतरा टाना भगत के वंशज हैं। वे चिंगरी गांव के नया टोला में रहते हैं। गुमला जिले के बिशुनपुर प्रखंड का ऐतिहासिक गांव है। गांव कहना ठीक नहीं, यह वास्तव में तीर्थ है। मुख्य सड़क से गांव के अंदर जो पीसीसी सड़क जाती है,  सौ कदम अंदर चलने पर दाहिने ही पहला घर उनका है। घर में खेत है या खेत में घर कहना मुश्किल है। गांव के मकान मिट्टी हैं और छप्पर खपरैल के। अभी बिसुआ को पीएम आवास की कुछ राशि मिली है तो अपना नया मकान बना रहे हैं। मलाल उन्हें इस बात का है कि उन्हें भी वही राशि मिली, जो दूसरों को इस मद में मिलती है।
पर, ज्यादा दुख उन्हें इस बात का है कि राज्य सरकार ने जो पांच एकड़ जमीन दी है, उस पर किसी और का कब्जा है। आज तक उन्हें वह जमीन नसीब नहीं हो सकी। जब जमीन को अपने अधिकार में लेना चाहा तो किसी और ने दावा कर दिया और अब मामला कोर्ट में पहुंच गया। दो बार गुमला कोर्ट गया, लेकिन सुनावाई से आगे बात नहीं बढ़ पाती तो अब जाना ही बंद कर दिया।
सुबह-सुबह की बेला में, जब सूर्य की किरणें धरती को चूम रही थीं, बिसुआ के माथे की नसों में उभार दिखने लगा था। बोलने लगे, यहां गांव में उनका स्मारक भी ढंग का नहीं बना। शहीद आवास के नाम पर भी केवल खानापूर्ति की गई है। उनके बेटे श्रीचंद कहते हैं कि हमारी आस्था लोकतंत्र में हैं। हम सिर्फ मतदान ही कर सकते हैं। लेकिन जो जीतकर जाता है, मतदाता को भूल जाता है। श्रीचंद कहते हैं हमारे बच्चों को शिक्षा की भी कोई सुविधा नहीं। फीस नहीं जमा करने पर स्कूल वाले बच्चों को भगा देते हैं। सरकार कम से कम हमारे बच्चों को शिक्षा तो दे ही सकती है। परिवार की अपेक्षा है कि यहां जतरा टाना भगत के नाम पर भव्य एक स्मारक बने। यह टाना भगतों का तीर्थ है।  
युवक मनोज भगत भी यही कहते हैं। चिंगरी गांव के ही हैं। गांव के मुहाने पर ही जतरा की एक एक आदमकद प्रतिमा लगी है। चारों तरफ दीवार खड़ी कर दी गई है। मनोज दिल्ली में काम करते हैं और मतदान करने के लिए अपने गांव आए हैं। कहते हैं कि यहां हर गुरुवार को टाना भगत आते हैं, पूजा-पाठ और भजन करते हैं। अब कुछ ही बचे हैं, जिनका विश्वास जतरा टाना भगत के धर्म में हैं। चुनाव को लेकर उनमें कोई शंका नहीं। वे बताते हैं कि यहां कमल की हवा है। पर, एक दूसरे युवा बाबूलाल उरांव तीर की बात करते हैं। वे तीर की कई उपलब्धियां गिनाते हैं। कहते हैं कि दर्जन भर विद्या का मंदिर बना। आज शिक्षा बहुत जरूरी है। बाबूलाल के दो बड़े भाई बेहतर इलाज के अभाव में समय से पहले चल बसे। सो, पुलिस में लगी उनकी नौकरी को उनके पिता ने छुड़वा दिया और खेती-बारी में लगा दिया। वे खेती करते हैं। कहते हैं कि यहां खेती प्रकृति पर निर्भर है। लेकिन यहां सिंचाई की व्यवस्था हो जाए तो यह इलाका पंजाब को पीछे छोड़ सकता है। दोनों युवा एक ही गांव के हैं, आदिवासी हैं, लेकिन दोनों के विचार भिन्न हैं। दोनों साफगोई से बात करते हैं।

सोमवार, 16 दिसंबर 2019

बांग्लादेश की आजादी, रांची और 'आदिवासीÓ

रांची से 'आदिवासीÓ साप्ताहिक पत्रिका निकलती थी। इसके संपादक थे प्रसिद्ध साहित्यकार राधाकृष्ण। बांग्लादेश युद्ध पर एक विशेष अंक निकला था। हालांकि उस समय धर्मयुग व साप्ताहिक हिंदुस्तान ने भी कई-कई अंक में युद्ध पर सामग्री दी, लेकिन रांची जैसी छोटी जगह से निकलने वाली पत्रिका 'आदिवासीÓ भी इस पठार पर सुदूर पहाड़ी गांवों में फैले अपने पाठकों तक भी यह सूचना देना मुनासिब समझती थी। हालांकि इस युद्ध में रांची और आस-पास के करीब दो दर्जन लोग शहीद हुए थे। अल्बर्ट एक्का उन शहीदों में शुमार हैं, जिन्होंने अपना बलिदान देकर बांग्लादेश को पूर्वी पाकिस्तान से आजाद कराया। अल्बर्ट को मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। बांग्लादेश की आजादी में अल्बर्ट अकेले नहीं थे, रांची और आस-पास के करीब 26 जवानों ने अपनी जान की आहुति दी थी। समर कुमार ने 'आदिवासीÓ के 'गणतंत्र विशेषांक में एक सूची दी है, जिसमें कुल 23 लोगों के नाम हैं। जो मुआवजा दिया गया, उनमें 26 शहीद के नाम थे। यानी, बाद में तीन के नाम और जुड़ गए।
बांग्लादेश की आजादी में भारत की बड़ी भूमिका रही। भारतीय सैनिकों की जांबाजी का ही यह नतीजा था कि पाकिस्तान की तानाशाह सैनिकों को समर्पण करना पड़ा। दो सप्ताह के घमासान युद्ध के बाद 1971 में 16 दिसंबर की कड़कड़ाती ठंड में पाकिस्तान के सपने जमींदोज हो गए। सात जनवरी, 1972 को रांची के रोटरी हॉल में ले. जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा ने पूरी कहानी बयां की। इसे 'आदिवासीÓ ने संपादित कर छापा-'भारतीय सेना का लौह शिकंजा कसने के साथ हमारे दिलेर एवं दक्ष हवाबाजों ने ढाका में ठीक निशाने पर पाकिस्तान गवर्नर डॉ. मल्लिक के सरकारी निवास-स्थान पर बम बरसाए। हमने ढाका एवं इस्लामाबाद में हुई बातचीत भी सुन लिया। जब तीसरी बार हमारे चतुर हवाबाजों ने बम की वर्षा की तो गवर्नर के होश फाख्ता हो गए तो उसकी सरकार ने इस्तीफा दे दिया और होटल इंटर कांटिनेेंटल में उसने शरण मांगी।Ó आगे बताया, 'हमारी पहली टुकड़ी ने ढाका छावनी के करीब पहुंचकर गोलाबारी शुरू की। उस समय उनके पास चार तापें थीं, लेकिन पाकिस्तानियों का हौसला पस्त हो चुका था।Ó... '15 दिसंबर को प्रात:काल पाकिस्तानी जनरल नियाजी ने संदेश भेजा कि वह युद्ध विराम चाहते हैं, हमने जवाब दिया कि युद्ध विराम नहीं। कल सवेरे 9 बजे तक आत्मसमर्पण करें।Ó हुआ भी यही। पाकिस्तान के पास अब कोई विकल्प नहीं था। रांची के जवानों की कहानियां यहीं तक नहीं है। पाकिस्तान फौज के दुर्जेय समझे जाने वाले गढ़ जैसोर को रांची स्थित 9 वीं पैदल डिवीजन ने मुक्त कराया था। बांग्लादेश आजाद हो गया तो अपने देश में भी जश्न का माहौल था। यह जश्न पत्र-पत्रिकाओं में झलका। नए साल का स्वागत आजादी के तराने के साथ शुरू हुआ। आदिवासी के उसी अंक में रोज टेटे ने खडिय़ा में अपनी भावनाएं व्यक्त कीं, जिसे हिंदी अनुवाद के साथ प्रकाशित किया गया। रोज ने लिखा, जय मिली देश को, हार गया दुश्मन। जन्मा नया देश, नया सूर्य उदित हुआ, नए वर्ष में। रामकृष्ण प्रसाद 'उन्मनÓ ने उत्साहित होकर विजय गीत लिखा, 'लोकतंत्र की विजय हो गई, हार गई है तानाशाही, हम आगे बढ़ते जाते हैं, हर पग पर है विजय हमारी।Ó
 देश में भी एक उत्साह था। सैनिकों ने देश का मस्तक ऊंचा किया था। सैनिकों के प्रति देश नतमस्तक था। रांची में शहीद परिवारों को सहयोग देने के लिए होड़ लग गई थी। 26 शहीद परिवारों को पांच-पांच हजार की मुआवजा राशि तो दी ही गई। जमीन, नौकरी आदि का आश्वासन भी सरकार की ओर से दिया गया। 21 जनवरी को रांची के बारी पार्क में एक समारोह का आयोजन किया गया। इसमें सात लाख, पांच हजार रुपयों का वितरण किया गया। तत्कालीन बिहार के राज्यपाल देवकांत बरुआ ने शहीद परिवार वालों को ये रुपये दिए। परमवीर चक्र विजेता अल्बर्ट एक्का के परिवार को राज्यपाल ने अपनी ओर से 25 हजार रुपये देने की घोषणा की। उनके गांव में पांच एकड़ भूमि भी दी गई, जिसका पर्चा 21 जनवरी को ही राज्यपाल ने अल्बर्ट एक्का के पिता को दिया। उस समय श्रीमति डेविस ने श्रीमति एक्का के लिए डेड़ सौ रुपये मासिक की नौकरी की व्यवस्था की। कहा कि जब वे चाहेंगी, उन्हें यह सुविधा मुहैय्या करा दी जाएगी। यही नहीं, अल्बर्ट एक्का की स्मृति में वेलफेयर सिनेमा के पास स्थित सरकारी भवन का नाम भी अल्बर्ट एक्का के नाम पर किए जाने की सहमति बनी। हालांकि यह आज तक नहीं हो सका। तत्कालीन डीसी ईश्वर चंद्र कुमार ने भी शहीद परिवार वालों के लिए कई योजनाओं की घोषणा की। कुमार ने बताया कि  '12 शहीदों के परिवार वालों को नौकरी देने की बात तय हो गई है। तीन लोगों ने शिक्षक बनने की चाहना की है। जिला परिषद की ओर से उन्हें शिक्षक का पद दिया जाएगा। 4 व्यक्तियों ने एचइसी में नौकरी करने की इच्छा व्यक्त की है। उन्हें टाउन प्रशासकीय विभाग में नौकरी दिलाने के लिए एचइसी के अधिकारियों से मैंने बात कर ली है। 3 व्यक्तियों को पुलिस की नौकरी में बहाल कर दिया जाएगा। घर बनाने के लिए जो खर्च पड़ेगा उसके लिए मैंने रांची नगर पालिका के अध्यक्ष शिव नारायण जायसवाल से बातें कर ली है। वे खर्च अपने पास से देने को प्रस्तुत हैं।Ó
 शहीद परिवारों की सहायता के लिए कई संगठन भी आए और आर्थिक सहायता दी। कुमार ने इसकी भी जानकारी दी, '5.51 लाख रुपये नागरिकों एवं ग्रामीणों द्वारा, 51हजार विजय मेले से आई राशि, 11 हजार विधवा कल्याण हेतु श्रीमती अरोड़ा को प्रेषित, 11 हजार श्री बागची द्वारा, 27,800 रोमन कैथोलिक द्वारा, 3,500 एक अन्य चर्च द्वारा, 2,500 छात्राओं द्वारा एकत्रा श्रीमती मेरी लकड़ा के मार्फत से प्राप्त, 12,200 बीआइटी मेसरा, पांच हजार विकास विद्यालय, 7,500 एसपी रांची द्वारा आइजी को प्रेषित, 20,000 एजी द्वारा सेंट्रल आफिस को प्रेषित।Ó कहना मुश्किल है कि इनमें से सरकारी घोषणाएं कितनी पूरी हो पाईं।
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