राष्ट्रपति का व्यक्तित्व

श्रीयुत राधाकृष्ण
जिस समय महात्मा गांधी चम्पारन (बिहार) में निलहे गोरों के खिलाफ अहिंसा की लड़ाई लड़ रहे थे, उस समय बाबू राजेंद्र प्रसाद भी महात्माजी के साथ लड़ाई में शामिल थे। उनकी बड़ी शान की वकालत थी। जैसे उनके पास विद्या थी वैसी ही तेज बुद्धि भी। राजेंद्र बाबू ने अपने विद्यार्थी जीवन में सदा सर्व प्रथम होकर पास किया था। वकालत में तो अच्छे-अच्छे वकील-बैरिस्टरों का तेज उनके आगे निष्प्रभ हो गया। लेकिन, उनकी रुपये जोड़-जोड़कर लखपति और करोड़पति बनने की इच्छा न थी। उनके कान तो देश की आत्र्त पुकारों को सुन रहे थे। हृदय पीडि़तों के हाहाकार विदीर्ण हो रहा था, किंतु चारों ओर विवशता की जंजीर पड़ी थी। उन्हीं दिनों चम्पारन में राजेंद्रबाबू को राह मिली। वहां उन्होंने सत्य और अहिंसा का बल देखा। उन्हें विश्वास हो गया कि सदा सत्य की जीत होती है-अहिंसा के समान आदमी का दूसरा हथियार नहीं। वे महात्मा गांधी के साथ हो गए।
राधाकृष्‍ण
आज हिंदुस्तान की जनता राजेंद्र बाबू को इस तरह मानती है जिस तरह आदमी अपनी आंख को प्यार करता है। राजेंद्र बाबू को दो बार कांग्रेस ने राष्ट्रपति का पदा दिया है। वे तो कांग्रेस के लिये सतत परिश्रम कर ही रहे हैं, बड़ी गंभीरता के साथ देश की विषम परिस्थितियों को भी सुलझाते जा रहे हैं।
उन्हें फुरसत नहीं, शांति नहीं, काम की इतनी भीड़ कि निश्ंिचत होकर बैठने का समय बिल्कुल ही नहीं। आज यहां हैं तो कल वहां। ऊपर से उन्हें दमा का रोग है। जिस समय उनका दमा उभड़ता है, उस समय वे बुरी तरह बेकाबू हो जाते हैं। फिर भी देश को उनकी सेवा की सख्त जरूरत हे, इसीलिए उन्हें अपने स्वास्थ्य की परवा नहीं। वे सदा साहरा के साथ धीर-गंभीर भाव से कामों में उलझे रहते हैं। उनके पास इतने काम और झंझट हैं कि जिनका हिसाब नहीं-सैकड़ेंा राजनीतक गुत्थियां, पचासों पेंच, जिनमें से एक का ही सामना हो जाने पर बड़े-बड़े लोगों की बुद्धि गोता खा जाएगी।
राजेंद्र बाबू का बड़प्पन बड़े गौर से देखने की चीज है। अगर तुम उनके पास जाओ तो देखोगे, वे किसी गहरे काम में व्यस्त हैं या किसी बड़े व्यक्ति के साथ किसी आवश्यक कार्य के संबंध में परामर्श कर रहे हैं। अगर तुम्हारी ओर उनकी दृष्टि फिर गई तो वे तुम्हें अवश्य बुला लेंगे। कोई काम हो या न हो, तुमसे जरूर बातचीत करेंगे-तुम्हारी बात को बड़ी दिलचस्पी के साथ सुनेंगे और उसका जवाब देंगे। अगर वे तुम्हारी घरेलू भाषा जानते होंगे तो अवश्य तुमसे उसी भाषा में बात करेंगे। वे बंगालियों से बंगला में ही बातचीत करते हैं। उनसे बातचीत करते समय तुम्हें जरा भी ऐसा नहीं मालूम होगा कि तुम भारत क्या संसार के एक महापुरुष से बातें कर रहे हो, बिल्कुल तुम्हारी तरह, तुम्हारे मन के लायक बातें करेंगे। ऐसी कोई भी बात नहीं कहेंगे, जिसे तुम नहीं समझ सको। वे तुम्हारे साथ हंसेंगे, बोलेंगे और इस तरह हो जाएंगे कि तुम्हें पता भी नहीं चलेगा कि इनके सामने भी बड़े-बड़े काम हैं। बालकों को वे बहुत प्यार करते हैं। कोई बालक उनके पास जाकर यही अनुभव करेगा मानों अपने ऐसे पिता के आगे खड़ा है, जिसके हृदय में उसके प्रति ममता भरी है। ऐसा तो कभी मालूम ही नहीं होगा कि उसके आगे एक बड़ा आदमी है जिसका रोब और दबदबा सारे भारत में फैला हुआ है।
उनके पास धनी-मानी जाते हैं और आप-बीती सुना आते हैं। गरीब किसान जाते हैं और अपना तमाम दुख-दर्द हल्का कर आते हैं। क्या वकील, बैरिस्टर, क्या मजदूर और व्यापारी सब उनके पास पहुंचते हैं। उनका दरवाजा सबके लिये खुला हुआ है। न कार्ड भेजने की जरूरत, न दरवान की खुशामद, कहीं कोई रोक-टोक नहीं। आपसे कोई यह भी पूछने वाला नहीं कि कोई जरूरी काम है या यों ही समय बरबाद करना है? इस कारण कुछ लोग उनका समय बर्बाद करने से भी नहीं चूकते। अनेक ऐसे लोग भी उनके पास पहुंच जाते हैं, जिनकी बातों का न कोई सिर है न पैर। फिर भी वे बड़ी बेदर्दी के साथ राष्ट्रपति का समय बरबाद करते रहते हैं। नौकरी खोजने वाले भी उनके पास जा पहुंचते हैं। उन्हें यह भी नहीं मालूम कि ऐसे त्यागी के पास नौकरी कहां से? दूसरा आदमी हो तो ऐसे आदमियों को बुरी तरह झाड़ दे-ऐसा रगड़े कि फिर बिना वजह कभी आने का महाशय नाम भी न लें। लेकिन राजेंद्र बाबू ही ऐसे मुरब्बतवाले व्यक्ति हैं कि हर किसी की प्रेम से सुनते हैं और बड़े प्रेम के साथ जवाब देते हंै। सहन शक्ति उनकी इतनी है कि आप लाख उनका समय बरबाद कर रहे हों, लेकिन वे कभी नहीं कहेंगे कि मेरा जरूरी काम हर्ज हुआ जा रहा है, आप अपना रास्ता नापिये।
 राजेंद्रबाबू के चेहरे-मोहरे से भी कोई बड़प्पन की झलक नहीं मिलती। दुबले-पतले दमा के मरीज आदमी हैं। सांवला शरीर। मूंछे घनी और बड़ी-बड़ी हैं जो अब धीरे-धीरे सफेद होने चली हंै। उनके कान साधारण लोगों की अपेक्षा कुछ विशेष बड़े हैं। हाथ भी कुछ लंबा है। शरीर प्राय: अस्वस्थ रहता है, अत: वे बहुत दुबले-पतले हैं। अगर उनकी छाती की माप ली जाय तो मुश्किल से तीस इंच भी नहीं निकलेगी। पैर की पिंडलियों की भी यही हालत समझिये। बस नाममात्र की। उनका कंठस्वर यद्यपि बहुत कोमल नहीं है, दमे के लगातार दैारे के कारण कुछ रुखा हो गया है, फिर भी उस कंठस्वर में इतना स्नेह भरा रहता है कि जी चाहता है, वे कुछ कहते रहें और हम सुनते रहें। चाहे कैसा भी कठिन प्रसंग हो, उनमें  उत्तेजना मिलेगी और न क्रोध। सब कुछ वे शांत भाव से करते हुए पाये जाएंगे।
मजाक भी उनके एक से एक अनोखे होते हैं। एक बार की बात है। सन 30 से पटने में झंडा सत्याग्रह चल रहा था। नौजवान लोग राष्ट्रीय झंडा लेकर जुलूस निकालते थे और पुलिस उन पर डंडे बरसाती थी, घोड़े दौड़ा देती थी। इसी सिलसिले में एक अंगरेज सर्जेंट ने राजेंद्र बाबू के ऊपर बेंत चला दिया था। प्रोफेसर अब्दुलबारी साहब भी उसी अंगरेज सर्जेंट के द्वारा बेंत से पीटे गये थे। और मजा यह है कि बेंत  चलाता और कहता-यह एक बेंत मेरी ओर से है, दूसरा मेरे साथी की ओर से। इसी तरह सपासप जिस किसी का नाम ले लेकर उसने बारी साहब को पांच या सात बेंत लगाये। लेकिन आखिरी दो बेतों के लिये उसने किसी का नाम न लिया। इस पर स्वर्गीय हसन इमाम साहब ने एक सभा में इसका जिक्र करते हुए मजाक में कहा था-तो वे आखिरी दोनों बेंत किसकी ओर से लगाये गए? राजेंद्र बाबू ने परिहासपूर्वक उनकी ओर देखा और कहा-सल्तनत की ओर से। इस पर सारी सभा खिलखिलाकर हंस पड़ी।
राष्ट्रपति को तुम अगर लेक्चर देते हुए देखो, तो पाओगे कि वे जो कुछ कह रहे हैं, वह बड़े ही सीधे-सादे ढंग से। न कोई आडंबर है और न लच्छेदार वाक्य। दूसरे नेताओं की तरह न हाथ पैर पटकते हैं, न गर्जन-सर्जन करते हैं-सीधे चुपचाप खड़े हैं और जो कहना है, स्पष्ट शब्दों में कह रहे हैं। उनके लेक्चरों में इतनी सादगी और सरलता रहती है कि निपट बच्चों से लेकर ठेठ देहाती भी सब कुछ आसानी से समझ जाते हैं। दूसरी ओ, वही सरल और सीधा सदा व्याख्यान बड़े से बड़े राजनीतिज्ञों को चक्कर में डाल देता है। चाहे लाख कानून का विरोध कर रहे हों, लेकिन कानून का अगाध विद्वान भी उसमें से एक शब्द ऐसा नहीं निकाल सकता जिसे लेकर कानूनी कार्रवाई की जा सके। अर्थात एक ओर से स्पष्ट और सरल होते हुए भी दूसरी ओर इतना ठोस और गंभीर होता है कि लोग मुंह देखते ही रह जाते हैं और उनको जो कहना होता है वह साफ-साफ  कह डालते हैं।
शांति, गंभीरता और सहनशीलता उनमें गजब की है। एक बार आस्ट्रिया के ग्राज नामक शहर में उन्होंने युद्ध-विरोधी भाषण दिया था। उनके युक्तिसंगत तर्कों को सुनकर लड़ाई के पक्षपाती बड़े चिढ़ गये। उन्होंने राजेंद्र बाबू का अपमान किया-उन पर सड़े हुए अंडे फेंके। यही नहीं, उन्हें मारा भी। लेकिन राजेंद्र बाबू शांत, चुपचाप सब सहते रहे। विरोधियों को शांत रहने को भी नहीं कहा। उस समय उनको बड़ी चोट आई थी।
इस समय राजेंद्र बाबू की अवस्था चौवन वर्ष की है। उनका परिवार बहुत बड़ा है। शहरों की अपेक्षा उन्हें देहात की जिंदगी बहुत पसंद है। जब कभी मौका मिलता है, वे अपने गांव जीरादेई में चले जाते हैं। यहीं उनके परिवार के सभी लोग रहते हैं।
आजकल उनके पास इतने काम हैं कि दम लेने की फुरसत भी नहीं मिलती राष्ट्रपति का पद ही ऐसा है। तुम इन्हें अकेला या बिना काम के बैठे हुए कभी पा ही नहीं सकते। हां, दतवन करते हुए या नहाने के लिये तेल लगाते हुए, तुम उन्हें अकेला देख सकते हो। उस समय भी ऐसा मालूम होता है मानो उनका शरीर यहां है, लेकिन मन न जाने कहां है-किस दूर देश में भटक रहा है। भगवान जानें उस समय वे क्या सोचते रहते हैं।

बालक, अक्टूबर, 1939। 

जंगल से उठता धुआं

‘झारखंड की लड़ाई और फ्रांस की लड़ाई मंे कोई अंतर नहीं। वे फ्रांस के पाल लाफार्ग की किताब ‘संपत्ति का विकास’ से एक लंबा उद्धरण देते हैं-‘ अधिक निर्दयता के साथ जंगलों को हथिया लिया गया। कानूनी बातों को ताक पर रखके जमींदारों ने जंगलों और झाड़ियों पर अपना अधिकार रिजर्व और प्रोटेक्टेड बनाजमा लिया। उनने जंगलों को घेर दिया  , उनने औरों का शिकार खेलना रोक दिया और घर गिरस्ती केलिया लिए काठबांस वगैरह लेना खत्म कर दिया, जिससे ईंधन तथा घर, घेरा, औजारों की मरम्मत वगैरह के लिए कुछ भी जंगल से नहीं लिया जा सकता था। जो जंगल बराबर गांवों की सार्वजनिक संपत्ति थे, उन्हें इस तरह जमींदारांे द्वारा हथियाए जाने का नतीजा यह हुआ कि किसानों के भयंकर विद्रोह होने लगे।’ 
-स्वामी सहजानंद सरस्वती

‘झारखंड के किसान’ पुस्तक में 


‘वर्तमान समय में कोल समाज की जो स्थिति है, इससे लगता नहीं कि उन्हें महाजनांे की आवश्यकता होगी। अगर हिंदुस्तानी महाजन वहां प्रवेश नहीं करते तो शायद उनमें कर्ज लेने की रीति का प्रचलन नहीं होता। इनके कर्ज लेने का समय अभी भी नहीं आया है। कर्ज उन्नत समाज की देन है। कोल लोगांे की ऐसी उन्नति में अभी देर है। समाज में स्वाभाविक तौर पर जो स्थिति उत्पन्न नहीं हुई है, बनावटी तौर पर उसे लाने में या उन्नत देश की रीति को लागू करने पर नतीजा अच्छा नहीं होता। हमारे बंगाल के एकािधक क्षेत्रा में ऐसा दिख रहा है। एक समय में यहूदियों ने अविकसित इंग्लैंड में कर्ज देने के समय विकसित देशों का नियम लागू कराकर वहां काफी हानि पहुंचाई थी। अब हिंदुस्तानी महाजन लोग वही हानि कोल लोगों में पहुंच कर रहे हैं।’

-संजीब चट्टोपाध्याय
‘पलामू’ में

सन् 1947 में देश को आजादी मिली। लेकिन पलामू की आजादी आज भी संदिग्ध है। पलामू एक जिले का नाम नहीं है। वह प्रतीक है गुलामी का। बंधुआ मजदूरी का। आदमखोर मउआर के आतंक का। सामंतवाद की जघन्य प्रवृत्तियों का। भूख का, अकाल का, शोषण का। हिंसा का। प्रतिहिंसा का। कोयल किनारे दहकते पलाश का। आग का। डूबते सांझ का। बूढ़े की झुर्रियों का। पलामू यही नहीं है... इससे आगे भी है, जिसे किसी उपमा या प्रतीक में कैद नहीं किया जा सकता। इसके विस्तार में बियावान जंगलों में खिलने वाला सूर्ख पलाश हमें डराने लगता है। कोयल का मटमैला पानी लहू की तरह हमारी नसों में दौड़ने लगता है। पलामू की यह तस्वीर अचानक नहीं बनी। बहुत पहले से बनी है। चार-पांच सौ साल पीछे भी जा सकते हैं।
पलामू को अकाल का घर कहा जाता है। आजादी के पूर्व अंगरेजों के समय 1859, 1890 व 1918 में यहां बड़े अकाल पड़े, आजादी के बाद 1967 का अकाल भीषण था। 1967 के दौरान तीन वर्षों की अनावृष्टि के कारण त्राहिमाम मचा था। खेत होते हुए लोग भूखों मरने लगे थे। लोग पलायन को मजबूर हुए। खेती पर निर्भर जातियों की स्थिति तो और भी बदतर हो गई। छह साल बाद 1973 में फिर अकाल ने दस्तक दे दी। तब 50 से अधिक लोगांे को अपनी जान गवानी पड़ी थी। फिर तो अकाल पलामू के माथे पर चिपक गया। फिर अतिवृष्टि। सन् 1923, 1953, 1956, 1957 व 1971 की बाढ़ ने फसलों को तबाह कर दिया। खेतों मंे बालू भर गए। 1976 की भयानक बाढ़ में तो तीन हजार गांव बह गये।
इन प्राकृतिक आपदा-विपदा के बीच भी जमींदारों की मनमानियां मुकम्मल कायम रहीं। हराई प्रथा, बेगारी-रोपनी, सलामी, दीवान रस्म और मुसद्दी खर्चा आदि प्रथाएं इस क्षेत्रा में प्रचलित रहीं। हराई के अंतर्गत किसानों को अपना नुकसान सहकर हल बैल के साथ भू-स्वामियों की भूमि को साल में तीन बार जोतना पड़ता था। जमींदारी समाप्त हो जाने के बाद भी यह प्रथा चलती रही। बेगारी रोपनी के अंतर्गत जमींदार के खेत में रोपनी करनी पड़ती थी। इस तरह की सेवा उनको हर साल कम से कम आठ दिन देनी पड़ती थी। इन प्रथाओं के कारण किसान अपनी खुद की जमीन समय से नहीं जोत पाते थे। वर्षा के अभाव में उनके खेत परती ही रह जाते थे। सलामी प्रथा के अंतर्गत विजय दशमी को इस क्षेत्रा के राजाओं, जागीरदारों, जमींदारों के यहां दरबार लगता था जहां उस दिन प्रत्येक रैयत को एक या दो रुपये भू-स्वामी को सलामी के रूप में देना होता था। इसके साथ ही सलामी बबुआन, सलामी ठाकुरबाड़ी भी प्रचलित थी। दीवान रस्म भी दीवान को दिया जाता था। जहां दीवानी नहीं, ठेकेदारी प्रथा थी, वहां यह ठेकेदार लेता था। जब किसान अपना बकाया भू-स्वामी को चुकता कर देता तब भू-स्वामी उसको फरकती रसीद देता था। इसके बदले में किसान को एक आना देना पड़ता था। उस समय एक आने में साढ़े तीन सेर कच्चा चावल मिलता था। बाद के दिनों में यह प्रथा शोषण-लूट का साधन बन गई। फरकती रसीद, लगान व कर्ज दोनों के चुकता होने पर ही जारी होता। बाद में कर्ज महाजनों द्वारा भी दिया जाने लगा। वह दस रुपये किसान को कर्ज देता तो सौ रुपये का कागज बनवाता था। सूद-दर-सूद जोड़कर पांच सालों मंे यह रकम कई गुना हो जाती थी। किसी को तो अपनी जमीन महाजन को देकर कर्ज से मुक्त होना पड़ता था। यह प्रथा वहां अस्सी के दशक तक रही और इसके फलस्वरूप ही इस क्षेत्रा में अधिकांश को अपनी जमीन गंवानी पड़ी या फिर उन्हें अपनी ही जमीन में मजदूरी करने को मजबूर होना पड़ा था। शोषण यहीं तक नहीं था। किसानों या कर्जदारों से मुहर कर्जा भी वसूला जाता। साल के अंत में जब किसान जमींदार या ठेकेदार को लगान देता था, उस समय रसीद पर मुहर लगाने के लिए दो आने से चार आने तक रैयतांे को मुहर लगाई देनी पड़ती थी। यही पलामू है। इन्हीं स्थितियों-परिस्थितियों-प्राकृतिक आपदाओं के बीच बंधुआ मजदूरी की एक अमानवीय प्रथा ने आकार ग्रहण किया। 1920 में यहां 63 हजार सेवकिया थे। इसके बाद तो यह जिला धीरे-धीरे बंधुआ मजदूरों का खदान के रूप में जाना जाने लगा। ऐसी प्रथाओं के कारण बिहार सरकार नेे 1982 में इसे बंधुआ मजदूर बहुल जिला घोषित किया था।

सन् 1880 में जब बंकिम चंद्र चट्टोपध्याय के बडे़ भाई संजीब चट्टोपाध्याय पलामू में रहते हुए पलामू के जीवन को शब्द दे रहे थे, उसके सौंदर्य को देख-समझ रहे थे, पहाड़-पठार पर बसे कोल आदिवासियों के नृत्य में झूम रहे थे, महुआ के उन्मत्त गंध को पोर-पोर महसूस कर रहे थे, तब भी जालिम जमींदार उनके सामने थे, जो हर स्तर पर कोल आदिवासियों का शोषण कर रहे थे। ये आदिवासी-कोल पांच रुपये का कर्जा जीवन भर नहीं चुका पाते। तब, उनके सामने या तो पलायन का बेबस विकल्प होता या बंधुआ मजूदरी या सेवकिया बन अंतहीन पीड़ा को गले लगाने का। इस कथाभूमि पलामू पर खड़े होकर मनमोहन पाठक ने ‘गगन घटा घहरानी’ रची।
।। 1।।
जब अपने देश में 1991 में, उदारीकरण लागू किया जा रहा था, विदेशी कंपनियों के लिए देश के दरवाजे खोले जा रहे थे, मंदिर-मस्जिद की राजनीति अपने उफान पर थी, आरक्षण के सवाल आग के गोले में तब्दील हो रहे थे, तब भी पलामू अपने उसी सामंती अंदाज में जी रहा था। कुछ गांव धधक रहे थे। कुछ सुलग रहे थे। कुछ आंच में झुलस रहे थे। उसी पलामू के एक छोर पर ब्लैक होल की तरह गहन अंधकार में भविष्य का सपना भी जैसे गढ़ी में दम तोड़ रहा था। इसी उथल-पुथल के दौर मे ‘गगन घटा घहरानी’ 1991 में पाठकों के सामने आया। उपन्यास 1991 में आया लेकिन कहानी उसके बहुत पहले तक जाती है।
यह उपन्यास पहले कतार प्रकाशन, धनबाद से पुस्तकाकार आया। फिर नवभारत टाइम्स मंे 90 दिनों तक हर रोज इसके अंश छपते रहे। इसके बाद प्रकाशन संस्थान ने 1991 के अंत में इसे प्रकाशित किया था। और, अब 2015 में प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली ने इसे फिर से छापा है। पाठकजी उपन्यास शुरू करने से पहले ‘उनके लिए’ लिखते हैं, ‘बिहार में सामंती अवशेषों के लक्षणांे से युक्त शक्तियां जहां-जहां घृणित रूप में सक्रिय हैं, त मेंपर है। इन शक्तियों की गिरउनमें पलामू का नाम शायद सबसे  आदिवासी ही नहीं, सदान भी हैं।’ आगे कैफियत देते हैं, ‘मेरे इस उपन्यास की प्रेरणाभूमि पलामू और उसके आस-पास के तमाम क्षेत्रा हैं, जहां एक लंबे समय से आजादी की लड़ाई चल रही है। इस लड़ाई का इतिहास मुगलकाल से आरंभ होकर ब्रिटिश गुलामी को पार करता हुआ भारत की 45 साल की स्वतंत्राता तक खिंचा आया है। इसके नेताओं में अनेक शहीद हुए हैं, अनेकानेक के पांव फिसले हैं और कुछ ने साफ दगा दी है।’

इस कैफियत को गौर से पढ़ने के बाद देखें तो पलामू के चरित्रा में मुगलकाल से लेकर आज तक कोई चारित्रिक और गुणात्मक परिवर्तन नहीं आया है। जब यह उपन्यास लिखा गया तब भी नहीं, उसके 25 साल बाद, आज भी है और, जब बिहार से अलग होकर 2000 में झारखंड नामक नया राज्य बन गया और उसके हिस्से में पलामू आ गया तब भी नहीं। पलामू के पांव आज भी ठिठके हैं। लेनिन के शब्दों में एक कदम आगे, दो कदम पीछे...। पलामू ऐसा ही है कि छोटा सा कर्ज जीवन भर की गुलामी का सबब बन जाता... ‘‘नहीं-नहीं ऐसा न कह गुनी। क्या मैं अपनी मर्जी से जंगल छोड़ भागा। अपने ससुर का कर्जा ही तो चुका रहा हूं सेवकिया बनकर, क्या तू नहीं जानता? अब तक भी बोझा ज्यों-का त्यों लदा हुआ है। तेरे जैसा गांव-गांव जंगल-जंगल घूमने की आजादी कहां!...’’ यह जागो है, जो अपने बालसखा मित्रा गुनी से अपना दुखड़ा रोता है। उसके एक-एक शब्द में उसकी पीड़ा, उसके संत्रास, उसके दुख को महसूस कर सकते हैं। मैं उनकी बात नहीं कर रहा जो सामंत हैं, शोषक हैं। उनके लिए तो पलामू के गांव का मौसम गुलाबी ही गुलाबी है।

इस पूरे उपन्यास में पात्रों की आवाजाही के बावजूद दो पात्रा आपको याद रहते हैं। एक जागो, जो सेवकिया है। उसके पीछे उसका कारण है। इस बहाने पूरे पलामू के सच को देखने-दिखाने की कोशिश की गई है और दूसरा सोनाराम, जिसके पास क्रांति के प्रतिरोध का वैकल्पिक मार्ग है। शोषण से मुक्ति का अचूक हथियार है। आरा-बिहार के नक्सलपंथी लोगों के संगत के बावजूद वह उनके मार्ग का अनुसरण नहीं करता। वह उसी मार्ग का अनुसरण करता है, जिस मार्ग पर उसके पुरखे चले थे। इसलिए, जब जंगल से धुआं उठता है तो उसके पीछे माक्र्सवादी दृष्टि के बजाय आदिवासी चेतना को देखना चाहिए, क्योंकि क्रांति का इसका अपना इतिहास रहा है, जो स्मृतियों में आज भी ताजा है। इसे इस तरह भी देख सकते हैं कि भगत सिंह देश के दूसरे छोर पर अपने विचारों की धार को तेज करने के लिए माक्र्सवादी साहित्य पढ़ रहे और देश के दूसरे छोर पर स्थित उलिहातू के इलाके में बिरसा मुंडा पुरखैती ज्ञान से आंदोलन को तेज धार दे रहे थे। दोनों युवा थे और दोनों के समय में कुछ साल का ही अंतर है।

जागो को सेवकिया या बंधुआ मजूदर इसलिए बनना पड़ा कि उसने अपने ससुर के क्रियाकर्म के लिए राय बहादुर से दो मन अनाज और 60 रुपये कर्ज लिया था। ...‘‘मालिक से दू मन गोंदली और 60 रुपया में लइन रहूं। इकर बाद में जे हो गइल कि नीं, सकलो ददलो। दू मन का तीन साल में बारह मन लौटाया। तबो से कटिए नइखे, बाकिए है। और मांग करते, ग्यारह मन तुम और देओ।...ग्यारह मन अनाज तुम नहीं दिया, सो चलो सेवकिया।’ सो चल गइली।’’ दर असल, यह सिर्फ जागो की नियति नहीं है। उसके जैसे तमाम आदिवासियों की, जो एक बार कर्ज ले लेने के बाद उनका पूरा जीवन उसे चुकाने में ही खत्म हो जाता है।
।। 2।।
स्वामी सहजानंद सरस्वती 1939 में पलामू में काफी यात्राएं की थीं। गांव-गांव घूमकर किसानों की स्थिति जानी थी। हजारीबाग जेल में रहते हुए पलामू सहित झारखंड के गांवों में घूमते हुए जो किसानों का हाल देखा था उसे ‘झारखंड के किसान’ सविस्तार लिखा। पुस्तक के एक अध्याय में पलामू की स्थिति का वर्णन है। वह ‘कमिया के कष्ट और सूदखोरी की लूट’ में लिखते हैं कि ‘पलामू जिले में इन्हें सेवकिया कहते हैं। सेवकिया शब्द सेवक से बना है और पलामू में सेवक का अर्थ है आमतौर से गुलाम। कमिया भी काम से बना है; काम के मानी हैं वही सेवा या सेवकाई। बिहार में यह काफी प्रचलित है।’ स्वामी जी ने सूदखोरों का भी जिक्र किया है, ‘ये सूदखोर होते हैं यों तो गांवों और शहरों के बनिए। मगर शोषक गृहस्थ और टुटपूंजिए जमींदार भी यही पेशा करते हैं। इनके अलावे काबुली, गोसाई, मुसलमान, पंजाबी, कान्यकुब्ज, भूमिहार, मारवाड़ी और अग्रवाल बनिए भी यह काम झारखंड के विभिन्न जिलों के यही कारबार करते हैं।’

थोड़ा और पीछे जाएं तो इसी तरह की पीड़ा का एहसास संजीब चट्टोपाध्याय को सन् 1880 में हुआ था। अपनी यात्रावृत्तांत कृति ‘पलामू’ मंे संजीब लिखते हैं, ‘‘कोल सबसे अधिक उत्सव शादियांे में मनाते हैं। उसमें खर्चा भी बहुत होता है। कभी आठ रुपये, कभी दस तो कभी पंद्रह रुपये तक खर्च हो जाते हैं। बंगालियों के लिए यह बहुत अधिक नहीं है पर जंगल के वासियों के लिए अधिक है। इतने रुपयों का इंतजाम वे कहां से करेंगे? उनके पास एक पैसे का भी संचय नहीं, उपार्जन भी नदारद, इसलिए उन्हें कर्ज लेना पड़ता है। दो चार गांवों मंे एक महाजन बसते हैं। वही कर्ज देते हैं। ये महाजन हैं अथवा महापिशाच, इसमें मुझे घोर संदेह है। जिसने एक दिन पांच रुपये का कर्ज लिया, उस दिन से वह कोई भी फसल अपने घर नहीं ले जा सकता। जो भी वह अर्जन करेगा, उसे उसी दिन महाजन के पास पहंुचाना हैै। उसकी खेती में दो मन कपास या चार मन जौ उपजा है, महाजन के घर पहले लाना होगा। वे उसे घर रखेंगे, वनज करेंगे, न जाने और क्या-क्या करेंगे। अंत्यपरीक्षण के बाद कहेंगे इस कपास से तुम्हारा मूल से एक रुपये की अदायगी ा चार रुपये रह गए। किसान ‘जो हुकुम’ कहकर चला जाता है। परहुई। शे उसका परिवार का पालन-ाण कैसे होपो? फसल जो भी हुई थी, महाजन ने सारा ले लिया, किसान को तो हिसाब आता नहीं। उसे तो एक से दस तक की गिनती भी नहीं आती। वह सब पर भरोसा करता है। महाजन नाइंसाफी करंेगे, ऐसा वह सोच भी नहीं सकता। फलस्वरूप नट महाजन के जाल में फंस जाता है। पर परिवार को अन्न कहां से खिलाए। मजबूरन महाजन का दरवाजा फिर खटखटाता है और वह सदा के लिए उसका दास बन जाता है। जो वह अर्जन करेगा, वह सब महाजन का। महाजन थोड़ी बहुत खुराक के रूप में उसे दे देता। इस जनम के लिए उसका यही रहा बंदोबस्त।’’
स्वामी सहजानंद सरस्वती, संजीब चट्टोपाध्याय और मनमोहन पाठक के बीच समय का लंबा फासला है, लेकिन इतने लंबे फासले के बाद भी एक बात काॅमन है, वह है आदिवासियों का अंतहीन शोषण-गुलामी, जो अनवरत जारी है। अलबत्ता महाजन और जमींदार एक ही सिक्के के दो पहलू बन गए। एक ऐसे राय बहादुर इस इलाके में हुए, जिनके हिंसक किस्से और आदमखोर प्रवृत्ति पलामू की दहलीज लांघकर पटना की सड़कों तक सुनाई देने लगे। जो पलामू के भूगोल और चरित्रा से वाकिफ हैं उन्हें इस राय बहादुर को पहचानना मुश्किल नहीं। तब का यह आदमखोर भले ही आज डालनटनगंज के अपने विशाल पुराने खपरैल के मकान या मनातू की ढहती गढ़ी में शिव की शरण में जाकर महामृत्युंजय का जाप कर रहा हो, उस समय तक उसका आंतक और उसके चीते की दहाड़ रात के गहरे सन्नाटे में दूर-दूर तक सुनाई देती थी। इस उपन्यास का खल चरित्रा यही है। जंगल में इसी का कानून चलता हैं। पुलिस भी इसकी सेवादार। रेंजर, डीएफओ, ठेकेदार और नेताओं की चैकड़ी भी। जो जंगल में रहते हैं, जिनकी जंगल आजीविका है, वे बेदखल किए जा रहे हैं। उन्हें अपने निजी काम के लिए भी लकड़ी काटने की मनाही है। जिसने ऐसा किया, उसे जेल। वनाधिकार कानून के बावजूद आज भी पलामू ही नहीं, पूरे झारखंड में सैकड़ों आदिवासी बेवजह जेल में सजा काट रहे हैं और जो जंगल को खाली कर रहे हैं, वह आनंद में हैं। यह अपने आजाद लोकतंत्रा में हो रहा है। ऐसे में विद्रोह स्वाभाविक है। आदिवासी जीवन में शोषण का चक्र बहुत दिनों तक कायम नहीं रह सकता है। विद्रोह या कहें प्रतिरोध पलामू में भी होता है और आदिवासी एक दिन गढ़ी की दीवार की चूल हिला देते हैं और उस चीते को उनकी गढ़ी से भी आजाद करा देते हैं, जो आतंक का पर्याय बना हुआ था। बहुत माकूल समय। करम पर्व। सब एकत्रित होते हैं। पारंपरिक हथियारांे के साथ नृत्य करते हुए। गांव दर गांव। सभी एक साथ एकत्रित होते हुए गढ़ी की ओर बढ़ते हुए...राय बहादुर को लगता, हर साल की भांति इस साल भी पर्व मनाते हुए गढ़ी से होते हुए निकल जाएंगे...पर इस बार तो कुछ और ही बदा था। युद्ध और त्योहार का अंतर मिट गया था। राय बहादुर नहीं समझ रहे थे। देवी-देवता, भूत-प्रेत सब जाग उठे थे और देखते ही देखते मांदर की गूंज दूर-दूर तक सुनाई देने लगी थी। इस बार इस गूंज में एक भय था, नृत्य में काल की ध्वनि थी। यह अपने तरह का विद्रोह था। अपने ढंग का प्रतिरोध।

दरअसल, गढ़ी से एक बार अपने घर जागो चला आता है। घर आते समय रास्ते में उसका बालसखा मित्रा ओझा पैरुगुनी मिल जाता है और बहुत दिनों के बाद हुई मुलाकात में पैरुगुनी अपनी परंपरा के अनुसार हड़िया के साथ आदर-सत्कार करता है। जागो अधिक पी लेता है। इसके बाद घर जाते समय वह किसी नुकीले पत्थर से टकराकर घायल हो जाता है। बीमार होने के कारण वह घर पर एक महीने रुक जाता है। राय बहादुर की चिंता यह थी कि उनका चीता भूखा है। वह जागो के हाथ ही खाना खाता था। इससे परेशान राय बहादुर के दामाद जागो के गांव जाकर उसे जबरदस्ती जीप में बैठाकर गढ़ी ले आकर सीधे चीते के अहाते में डाल देते हैं। यह अत्याचार देख उस गांव की सहनशक्ति जवाब दे गई। समय का इंतजार करते हुए करम का पर्व सही समय लगा। राय बहादुर और उनके दामाद ने सोचा, महीने भर से भूखा चीता उसे मार डालेगा, लेकिन चीता कुछ नहीं करता। चुपचाप जागो को देखता रहता है- ‘‘हरामखोर है साला! खिलावें हम और नाम जपे जागो का। जिस रोज से गया है जागो, उसी दिन से इसका गरजना जारी है। मन करता है बंदूक उठावें और तड़ातड़ गोली दाग दें।’’ अपने आप बड़बड़ाते हैं जगधारी राय।कृ...वे सोचते हैं, चीता तो पहचान बन गई है उनकी। उसको कैसे मार दें। डालटगंज से पटना तक सब उन्हें चीते वाले राय साहब के नाम से जानते हैं। राय साहब, राय बहादुर की पदवी उन्हंे सरकार से नहीं मिली हैै। खेत-जमीन तो बहुतों को है। हो सकता है, उनसे ज्यादा भी हो। पर चीता किसी के पास नहीं।’ वस्तुतः राय बहादुर के लिए चीता और जागो दोनों ही एक साथ परेशानी के कारण बन गए थे। राय बहादुर को इससे मुक्ति का यही उपाय सूझा, लेकिन वह आदिवासियों की रणनीति को भांप नहीं पाए-... लोग दीवार गिराने लगे। धम्म-धम्म एक साथ जोर लगा-लगाकर। पुरानी दीवार थी, एक जगह अंदर को झुककर गिर गई तो चीता फलांगता हुआ निकल भागा। ढोल-नगाड़े फिर बजने लगे। आवाज के कारण चीता ने मुड़कर देखा तक नहीं। उछलता-कूदता सर पर पांव रखे आंख को सीध में दक्खिन-पूरब का रुख पकड़े दौड़ता ही गया। राय बहादुर को लगता, इस घटना के पीछे कोई और है? पुलिस और उसके कारिंदे उसका पता तो लगा लेते हैं, लेकिन खोज नहीं पाते।

राय बहादुर इसे कैसे बर्दाश्त कर सकते थे? इसके बाद दमन का चक्र चला। आदिवासी दारोगा ही अपने भाई-बंधु का दुश्मन बन गया। जैसे आज एक ओर आदिवासी नक्सली खड़े हैं और दूसरी को पुलिस की वर्दी पहने आदिवासी। एक दूसरे के दुश्मन। सरकार ने अच्छी तरकीब निकाली। आदिवासी को आदिवासी के सामने खड़ा कर दिया। यही काम राय बहादुर भी करता है। मनमोहन पाठक ने अपनी इस रचना में वर्गीय चरित्रा को ही दिखाया है कि कच्छप भले इंसपेक्टर है, लेकिन वह हुकुम बजाता है राय बहादुर का। इंस्पेक्टर ही क्यों, हर बड़ा अधिकारी भी राय बहादुर की दरबार में हाजिरी लगाने का मौका नहीं गंवाता, लेकिन इनके बीच डीएफओ मिस्टर गुप्ता भी हैं, जो बेहद ईमानदार हैं और वह आदिवासियों की मदद करते हैं।
न्यूनतम मजदूरी का सवाल, उसके लिए लड़ाई। आरा-बिहार से आए रामधनी ने उनके बीच चेतना भरते हैं। गीत गाते हैं, गुलमियां अब नाहीं बजइबो...; मजदूरों का हड़ताल, फिर ठेकेदार द्वारा बाहर से उरांव, खेखार, कोल मजदूर ले आना़...। इसी में सोनाराम भी आ जाता है। तपेसर और रामधनी बाहर से आए आदिवासी मजदूरों को देखते हैं। सभी अपने में मस्त। कहीं कोई प्रतिक्रिया नहीं। इन्हीं के बीच अलग-थलग बैठा सोनाराम दिखा तो उसे सारी बात समझाई। सोनाराम का काम था अपरिचित अपनी जाति को समझाना। पर ठेकेदार ने इस रात मंे इन मजदूरों को ऐसी जहरीली शराब पिलाई की तीन ने दम तोड़ दिया। सोनाराम ने अपरिचित इन लोगों की खूब मदद की, सेवा की। कुछ को बचाया।

रामधनी गांव के मजूदरों को समझाते हैं कि बिहार में भी खेतिहर मजदूरों का संगठन बन गया हैं। गोली बंदूक का जवाब गोली बंदूक से मिलता है। लड़ाई सिर्फ न्यूनतम मजदूरी की नहीं, जमीन के मालिकाने हक को लेकर भी हो रही है...। मालिकाना हक आदिवासी नहीं समझते। उसकी खुलासा करते हैं, अरे भाई यह आगे की लड़ाई है। खेत जो जोते-बोए उसका। जिसकी मेहनत उसकी फसल। कैसे इधर झारखंड में मंुडा, उरांव लोग जंगल पर अपना हक मांग रहे हैं, बस वैसे ही समझो। प्रतिरोध की आग सुलगने लगी था...।

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‘‘लुपंगा में कौन ऐसा है, जिसके खेत राय बहादुर के जिम्मे न हों। लुपुंगा क्या सोनाहातू के पूरब दस कोस के सारे गांव के लोगों के लिए एकही महाजन हैं-जगधारी राय!’’ इस जगधारी राय यानी राय बहादुर का ऐसा प्रताप था कि ‘ जंगल में काटी गई लकड़ियों की संख्या एक। चेकपोस्ट पर की उनकी संख्या दूसरी। डीपो में ढुलाई की गई लकड़ियों की संख्या तीसरी। डीपो में बिक्री होकर निकली हुई लकड़ियों की संख्या और स्टाॅक भी कभी नहीं मिलता।’ जंगल भी इनका, लकड़ी भी इनकी। फूल-पलाश-महुआ सब कुछ इनका। सत्ता भी इनकी, सरकार भी यही। फिर, किसी के बच निकलने का रास्ता ही कहां था! चैतू और दामड़ू के पास भी नहीं था। ये ऐसे दो भाई हैं जिनका चरित्रा अजीब है। जो करेंगे साथ-साथ। अपनी-अपनी शादी के लिए बचा-खुचा सारा खेत बाप के मरते ही जिम्मा कर आए राय बहादुर को और अब जहां-तहां काम के लिए भटकते फिरते हैं।...लोगों ने कितना समझाया, खेते मत रखो रेहन। एक साल पानी न पड़ा तो क्या हर साल सूखा ही पड़ेगा। पर जरा धीरज नहीं। न साल भर के लिए शादी टाल सके न खेत का आसरा। सादे कागज पर जाकर अंगूठा कटा आए दोनों, साथ ही साथ। जो करंेगे साथ ही करेंगे। जहां जाएंगे साथ ही जाएंगे। एक को अगर काम भी मिला तो वह तब तक नहीं करेगा जब तक दूसरे को भी काम न मिल जाए। भले ही मजदूरी कम मिले।...कितना कहा रेहन रखनी भी है जमीन तो किसी के हाथ रख आओ। राय बहादुर के हाथ चढ़ा खेत, आज तक कोई लौटा नहीं पाया। सोनाहातू या मोरंगा के ही किसी बनिए-बकाल को दे आता। पर इस गांव के लोग और कोई रास्ता ही नहीं पहचानते हैं।’’

लापुंगा-सोनाहातू ही क्यों? लाते का हाल भी जुदा कहां था-‘‘लाते की हालत कुछ बेशिए खराब है। किसी का भी खेत अपना नहीं रहा। कोई राय बहादुर के घर तो कोई सोनाहातू के बनिया के घर। वे लोग भी कम चालाक नहीं हैं। एक का खेत दूसरा जोता-बोता है। खेत के मालिक को अपने खेत में बटाई भी नहीं करने देते ताकि अपने खेत का मोह खतम हो जाए।’’ आदिवासी-किसान हजार चिल्लाए। मगर उनकी सुने कौन? सरकार बहरी, उसकी कचहरियां बहरी, हाकिम बहरे, पुलिस बहरी, नेता बहरे, साधु-महात्मा बहरे, देवी-देवता बहरे और भगवान भी बहरा।

पर सोनाराम क्या करे? सोनाराम सोने की तरह चमक बिखेरने वाला धीरोदत्त नायक। सिद्धो-कान्हो, चांद-भैरव, नीलांबर-पीतांबर और बिरसा की विरासत को आगे बढ़ाता हुआ... वह राय बहादुर की चालाकियों और उसके पाखंड को समझ रहा था। वह जानता है ‘पाप और पुण्य। इन दो शब्दों में से एक इनके शब्दकोश मे ंनहीं। टूना पहान ही क्यों, उरांव ही क्यों, तमाम आदिवासी जातियों के शब्द कोशों में जो एक शब्द नहीं है वह है पुण्य। पुण्य तो उनके जीवन के सहज प्रवाह में घुला-मिला है-साफ, उज्ज्वल। किसी का कुछ भलाकर उसका प्रदर्शन करते नहीं फिरते थे, उसका अहसान नहीं जताते, ये भगवान की भक्ति का त्रिपुंड दिखाते नहीं फिरते थे।’’

जब टूना पहान उसे समझाता है, कर्ज नहीं उतारना पाप है सोनाराम। तो सोनाराम उसे उसी तर्क से समझाता, रूगन आदमी को मारना-पीटना क्या है? एक का सौ वसूलना क्या है? टूना फिर समझाता है, वे अपने कानून से बंधे हैं। अपने धर्म से बंधे हैं। उनका धर्म उन्हें सजा देगा।’ लेकिन क्या ऐसा ही है? लेकिन उनका धर्म तो हमें सजा दे रहा है, दादा! उनका धर्म, उनका समाज तो हमारे समाजों को, गांवों को लीलता जा रहा है। दादा! हमारा धर्म, हमारे देवता क्या इतने कमजोर हैं कि वे अपने लोगों को बचा नहीं सकते? उनके फैलाए प्रपंच से गांव के गांव उजड़ते चले जा रहे हैं। जब हमारे लोग, हमारी जाति, हमारा समाज ही नहीं रहेगा तो हमारा धर्म किसके लिए होगा?

सोनाराम बड़ी सहजता से एक विकट सवाल खड़ा कर देता है जाने या अनजाने। धर्म किसके लिए? कृष्ण गीता में कहते हैं, जो धर्म की रक्षा करेगा, धर्म उसकी रक्षा करेगा। सोनाराम पूछ रहा, जब हम ही नहीं रहंेगे, जाति ही नहीं रहेगी तो धर्म का क्या करेंगे? धर्म तो तभी है, जब हम हैं।
सोनाराम युवा है, लेकिन उसकी सोच दूसरे आदिवासी युवकों से एकदम अलग है। वह अपने समाज की कुरीतियों से लड़ता है। हड़िया-शराब हाथ न लगाने की बात करता है। उसके आधुनिक विचार को बूढ़ा पहान भी ध्यान और धैर्य से सुनता है, जब वह कहता है-कौन सेवकिया बनना चाहता है? कौन किसी के बेगारी करना चाहता है? सेवकिया बनना कोई नहीं चाहता। जागो दादा को तो हमारे ही समाज, हमारे ही धरम के नियम से मरे हुए ससुर के किरिया-करम के लिए कर्जा लेना पड़ा था, समाज को दारू-हड़िया पिलाने के लिए। सबने खाया होगा, सबने पिया होगा। इसलिए दंड भोगना है तो पूरा समाज भोगे। अकेले-अकेले कोई क्यों भोगेगा?
समाज को उसपर विश्वास था। पैरू के लिए यह देवड़ा था यानी देवता। 25 साल की उम्र में बिरसा ने यही लड़ाई छेड़ी थी और अपने समाज को झकझोर दिया था। अब यह उरांव आदिवासी अपने समाज में एक नई क्रांति का आगाज कर रहा था। प्रतिरोध का एक वैकल्पिक मार्ग दे रहा था।

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एक बात हमें ध्यान रखनी चाहिए कि बिहार में खेत-मजदूरों का जो आंदोलन था, उसकी प्रकृति दूसरी थी। यहां आदिवासी अपनी ही जमीन से बेदखल कर दिए गए थे, कुछ रुपये के कर्ज के कारण। इसलिए, वह अपनी जमीन की वापसी चाहते थे। सोनाराम जैसे नायकों ने उनमें जोश भरा तो वे अपनी जमीन पर, जो उनके हाथ से निकल गई थी, राय बहादुर की हो गई थी, उसमें लगी खड़ी फसल काट लेते हैं। यह राय बहादुर के लिए दूसरा बड़ा झटका था। इससे तिलमिलाए राय बहादुर और उसके गुर्गे और पुलिस गांव वालों पर इतना अत्याचार करते हैं कि फिर गांव छोड़ने के अलावा उनके सामने कोई विकल्प नहीं बचा था। अपने पुरखे का घर-गांव छोड़ अपनी जिंदगी बचाने के लिए जंगल के भीतर दाखिल होकर फिर से आसियाना बनाते हैं...क्योंकि अब गांव अपवित्रा हो गया था। हवा अशुद्ध हो गई थी। यह वन और वन के देवता हमारी रक्षा नहीं कर सके तो इससे मोह का बात का? नाता कैसा? रोग-सोग, अकाल-महामारी इस गांव की धरती में बंधकर सब सह लिया। जंगल-झाड़ काट-साफ कर, पत्थर-चट्टान उखाड़-पखाड़ कर, जोत-कोड़कर बनाया गया सारा खेत उन्हें सौंप दिया। अपने बेटे-पोतों के पत्थर जैसे शरीर उनकी बेगारी में पिघला दिए और आज, आज...’’पैरूगुनी की हर क्षण भारी होती जाती आवाज भहराकर गिर पड़ी। ....नई धरती आबाद करो, देवड़ा का आह्वान करो। यही कहा था पैरूगुनी ने। काफी तर्क-वितर्क हुआ। अंततः पैरूगुनी से सभी सहमत हो गए और उसके पीछे खजुरी के साथ-साथ लापुंगा भी हो लिया। बहंगी, खटिया, टोकरी, खंचिया, बर्तन-भाड़े जिससे जितना बन पड़ा, साथ ले चला। अनाज के दाने नहीं छुटे। गांव से मोह नहीं टूटा। माल-मवेशी, बकरी-मुर्गी-मुर्गा साथ डहरा लिए। इसी बियावान जंगल में आसियाना बनाकर वे खड़ी फसल दखल कर लेते हैं और राय बहादुर के आदमी खोजते रहते हैं। पुलिस खोजती रहती है। इस खोज में दो पुलिसवालों को अपनी जान गंवानी पड़ी।

हालांकि पलामू की परिस्थितियां ऐसी बन रही थीं कि आज नहीं तो कल प्रतिरोध तो होना ही था और गरीब-आदिवासी-दलित जातियों को एक दिन खड़ा तो होना ही था। पलामू के इतिहास से जो वाकिफ हैं, उन्हें पता होगा कि 1984 में जन मुक्ति परिषद नामक संगठन मजदूरी भुगतान, गैरमजरुआ जमीन का बंटवारा तथा शोषण को समाप्त करने के लिए खड़ा किया गया था। इसने कुछ ही वर्षों में अपना प्रभाव जमा लिया और गरीबों, पिछड़ों, दलितों का एक तबका इससे जुड़ गया। इसी के विरोध और क्षेत्रा में पैठ बना चुके नक्सलियों से लोहा लेने के लिए ही 1989 में पलामू के मलवरिया गांव के राजपूतों ने ‘सनलाइट सेना’ का गठन किया था और इन्होंने पहला नरसंहार 4 जून, 1991 में अपने ही गांव में किया। इस नरसंहार से संयुक्त बिहार ही नहीं, पूरा देश हिल गया था। इस नरसंहार में कुल दस लोग मारे गये थे, इनमें बूढ़े और बच्चे भी शामिल थे। दर्जनों लोग घायल हुए तो कुछ जीवन भर के लिए अपंग हो गये। कुल 22 लोगों के घर जलकर राख हो गये थे। उन जले घरों के साक्ष्य वहां आज भी मौजूद हैं। इन घटनाओं को याद रखते हुए ही इस उपन्यास को पढ़ा जा सकता है।
हम जानते हैं, जंगल छोटा होता जा रहा है और इतिहास बड़ा से बड़ा। पर रोज रोज इतिहास में नए नए अध्याय जोड़ती यह दुनिया पठार पर उगे इस जंगल को, जंगल में बसे छोटे-छोटे गांवों को क्या दे रही है? इन्हें परत दर परत उघाड़कर कानून और अधिकार के बर्छी भाले भांेक-भोंक कर सभ्यता की जीभ को कौन सा स्वाद चखा रही है...। आप सोचते रहिए। इस सोच से आगे बढ़ते हैं तो यह खबर भी मिलती है कि डालटेनगंज से लगभग 30 किमी दूर सोनाहातू प्रखंड का आंतक एक आदमखोर चीता मारा गया।...इलाके के प्रतिष्ठित व्यक्ति राय बहादुर जगधारी राय की सिफारिश पर फाॅरेस्ट कंजरवेटर श्री वर्मा एवं जिले के एसपी श्री आर आर प्रसाद ने बड़ी सूझ-बूझ से उसे मोरंगा वन में घेर कर मार डाला। लेकिन यह पूरा सच नहीं था। इस तरह की खबर पटना के दैनिक में छपी थी। पूरा सच छापने का जोखिम एक स्थानीय अखबार ने उठाया। पालतू चीते का पूरा सच उजागर करते हुए जिले के आला अफसरों द्वारा आदमखोर से लोगों की राहत दिलाने की झूठी कथा की आड़ में शिकार के रोमांचक खेल का पर्दाफाश किया था। उसने साहस के साथ लिखा कि असली आदमखोर तो राय बहादुर हैं जो खुलेआम घूम रहे हैं और आदिवासी उनके आतंक से गांव छोड़-छोड़कर भाग रहे हैं।‘...इस खबर का नतीजा यह रहा कि डालटेनगंज से एसपी, डीसी, फारेस्ट कंजरवेटर तथा सोनाहातू के डीएफओ मि गुप्ता का तत्काल तबादला कर दिया और उन्हें 24 घंटे के अंदर नई जगह ज्वाइन करने का आदेश मिला। स्थिति को देखते हुए मंत्रिमंडल ने डालटेनगंज में ऐसे किसी डीसी को भेजने का फैसला लिया जो आदिवासियों का मन जीत सके और उनके असंतोश्ष को कुछ कम कर उन्हंे उग्रवाद के रास्ते पर जाने से रोक सके।’ यह काम आज की सरकार भी कर रही है।

1991 में आए इस उपन्यास में क्रांति की एक महीन धारा के बीच सोनाराम और जागो के बीच प्रेम का एक सोता भी दिखाई देता है। सोनाराम और जागो की बेटी हीरामनी का सात्विक प्रेम। उछाह मारता और बादलों की तरह भटकता-घूमता मन भी है। लोहार तपेसर की कुम्हारिन का प्रेम। तपेसर अपनी प्रेमिका को लेकर भाग जाते हैं। राउरकेला में नौकरी करते हैं। अवकाश ग्रहण करने के बाद ही गांव लौटते हैं। प्रेम की इन परतों के बीच जीवन की आपा-धापी, उसकी जटिलताएं, उसका संघर्ष है। यहां जंगल है। जंगल के गीत हैं। उसका दुख है। उसकी पीड़ा है। शांत और गुमसुम अंतर्मुख खड़े साल हैं। प्रकृति के विवरण बोझिल नहीं करते। काव्य की तरह आनंद देते हैं। एक दृश्य देखें-आसमान का सूरज पहाड़ों के पीछे से निकले इससे पहले अंधकार का काला सूरज सोनाहातू की गढ़ी से निकलकर छोड़ने लगता है, अंधकार केगोले-पूरे सोनाहातू पर। जंगल, पहाड़, खेत, मैदान, गांव, घर-पूरे इलाके पर एक बड़ा घना जाल ओढ़ा देता है।...। आदिवासी-उरांवांे की बस्तियां है तो बभनटोली भी, जहां सिर्फ दो घर है। एक जमुना पंडित और उनकी विधवा चाची का। सोनाहातू की गढ़ी उनकी ज्योतिषी का प्रभाव कम नहीं। पर जब राय बहादुर विशाल यज्ञ कराते हैं तब बनारस के पंडित बुलाते हैं। इसके बाद तो जमुना पंडित का मन खट्टा हो जाता है। इस तरह गांव की पूरी बस्ती है, मुहल्ला है। लेखक सबके घर में झांककर देखता है, उसके सुख-दुख साझा करता है। गांव के गांव वह देखता है। हाट-बाजार घूमता और घुमाता है। पूरे लय में गीत सुनाता है, जिसकी टेर दूर-दूर तक सुनाई देती है। उपन्यास में बहुत कुछ सुनने-सुनाने की कोशिश की गई है। बहुत कुछ अनसुना ही रह जाता है। हां, उसकी पदचाप जरूर सुनाई देती है, जो आगे चलकर नक्सल आंदोलन के रूप में पलामू को अपने आगोश में ले लेता है।
मनमोहन पाठक यथार्थ की जमीन पर खड़े होकर इसकी रचना करते हैं। हालांकि उरांव आदिवासी की कथा कहते समय जिन गांवों के नाम आते हैं, वे मुंडा संस्कृति से मेल खाते हैं। ये सांस्कृतिक भूलें हैं। उपन्यास में कालखंड का पता नहीं चलता। हालांकि एक लय है। इस लय में बहुत उतार-चढ़ाव नहीं हैं। अथ से इति तक इसे महसूस कर सकते हैं। पर घटनाओं की लयकारी दूसरी है। पलामू वह इलाका है, जो आज भी सुलग रहा है और जिसके जंगल से धुआं आज भी उठ रहा है। सामंती शक्तियों ने नए नकाब ओढ़ लिए हैं।
लमही में प्रकाशित। साभार। 


संविधान सभा में झारखंड की तीन विभूतियां थीं सदस्य

इस पेज पर जयपाल सिंह व बोनीफेस के हस्‍ताक्षर
26 नवंबर को हम संविधान दिवस मनाते हैं। इसकी शुरुआत एक साल पहले से हुई। यानी 2015 से। यह वर्ष संविधान निर्माता डॉ भीमराव अंबेडकर के जन्म का 125 वां साल था। इसी उपलक्ष्य में इसकी शुरुआत हुई। लेकिन 26 नवंबर का महत्व और भी है। 26 नवंबर, 1949 को भारतीय संविधान सभा द्वारा इस संविधान को अपनाया गया और 26 जनवरी 1950 को इसे एक लोकतांत्रिक सरकार प्रणाली के साथ लागू किया गया था। 26 नवंबर का दिन संविधान के महत्व का प्रसार करने लिए चुना गया था। इसलिए इस तिथि का विशेष महत्व है।
 पर, इस संविधान के निर्माण में झारखंड का भी योगदान है। संविधान सभा के सदस्यों में तीन झारखंड से थे। इनके नाम हैं, जयपाल सिंह मुंडा, बोनीफेस लकड़ा व देवेंद्र नाथ सामंत। मूूल संविधान की प्रति के अंत में इनके भी हस्ताक्षर हैं। तब जयपाल सिंह, अपने नाम के साथ मुंडा नहीं लिखते थे, इसलिए संविधान की प्रति में जयपाल सिंह के नाम से ही इनके हस्ताक्षर हैं। उस समय बिहार से इनके अलावा अमिय कुमार घोष, अनुग्रह नारायण सिन्हा, बनारसी प्रसाद झुनझुनवाला, भागवत प्रसाद, ब्रजेश्वर प्रसाद, चंडिका राम, लालकृष्ण टी. शाह, डुबकी नारायण सिन्हा, गुप्तनाथ सिंह, यदुबंश सहाय, जगत नारायण लाल, जगजीवन राम, दरभंगा के कामेश्वर सिंह, कमलेश्वरी प्रसाद यादव, महेश प्रसाद सिन्हा, कृष्ण वल्लभ सहाय, रघुनंदन प्रसाद, राजेन्द्र प्रसाद, रामेश्वर प्रसाद सिन्हा, रामनारायण सिंह, सच्चिदानन्द सिन्हा, शारंगधर सिन्हा, सत्यनारायण सिन्हा, विनोदानन्द झा, पी. लालकृष्ण सेन, श्रीकृष्ण सिंह, श्री नारायण महता, श्यामनन्दन सहाय, हुसैन इमाम, सैयद जफर इमाम, लतिफुर रहमान, मोहम्मद ताहिर, तजमुल हुसैन, चौधरी आबिद हुसैन, हरगोविन्द मिश्र भी इसके सदस्य थे। यानी कुल 36 सदस्य तत्कालीन बिहार से उस समय संविधान सभा के सदस्य थे।

राज्य पुस्तकालय में है संविधान की प्रिंटेड कॉपी

शहीद चौक स्थित राज्य पुस्तकालय में संविधान की मूल प्रति की पिं्रटेंड कॉपी देख सकते हैं। सभी के हस्ताक्षरयुक्त इस संविधान की प्रति काफी खूबसूरत है। हर पेज पर डिजाइन है। अलग-अलग। ऊपर चित्रों से सजा है। सबसे पहले भारत का प्रतीक चिह्न। इसके बाद हर अध्याय की शुरुआत के ऊपर भारतीय संस्कृति-दर्शन से जुड़ी तस्वीरें हैं। प्राचीन से लेकर अर्वाचीन तक। बुद्ध, गांधी, सुभाष भी हैं। नटराज, हड़प्पा का सांड़ भी। मुगल शासक भी है। हर धर्म को इसमें समान आदर और प्रतिनिधित्व दिया गया है। रंगीन और श्याम-श्वेत चित्र से यह संविधान सजा हैं। संविधान के अंत में नौ पृष्ठों पर सभा के सदस्यों के हस्ताक्षर हैं। इन हस्ताक्षरों में झारखंड की विभूतियों को भी पहचान सकते हैं। 12 इंच बाई 16 इंच के साइज में यह प्रति है। 

कौन थे यह सदस्य

जयपाल सिंह मुंडा किसी परिचय के मोहताज नहीं है। हॉकी के अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी। इसके बाद राजनीति में आए तो राज्य अलग को लेकर आंदोलन चलाया। झारखंड पार्टी के गठन में सक्रिय भूमिका। बाद में कांग्रेस में जा मिले। उस समय वे आदिवासी महासभा से जुड़े थे। बोनीफेस भी आदिवासी महासभा से ही थे और ये भी रांची के आस-पास के थे। देवेंद्रनाथ सामंत चाइबासा से थे और कांग्रेस से जुड़े हुए थे।

सूर्य की तरह उगे धरती आबा बिरसा

15 नवंबर, 1875 को गुरुवार को धरती आबा ने जन्म लिया था। इसलिए नाम पड़ा बिरसा। बचपन से ही बिरसा के रंग-ढंग अलग होने लगे थे। सोच के स्तर पर भी और काम के स्तर पर। इसलिए, जब बिरसा महज बीस साल के थे तब 1895 में द क्वार्टली पेपर्स, एसपीजी मिशन के अक्टूबर अंक में बिरसा पर एक लेख प्रकाशित हुआ, 'ए लोकल प्रोफेटÓ। बिरसा पर यह संभवत: पहला लेख था। यानी, बीस की उम्र में बिरसा ने अपने काम से एक पुख्ता पहचान बना ली थी। उनके जीवन में प्रकाशित यह पहला लेख था। संस्कृतिकर्मी व लेखक अश्विनी कुमार पंकज ने कुछ और चीजें खोजी हैं। गोस्स
नर मिशन से बिहार-झारखंड की संभवत: पहली ङ्क्षहदी पत्रिका घर बंधु, 15 जून, 1900 के अंक में बिरसा उलगुलान पर हिंदी में लेख प्रकाशित हुआ। 'द मॉडर्न रिव्यूÓ, कोलकाता के जून 1911 के अंक में बिरसा मुंडा के जीवन, धर्म और आंदोलन पर हीरालाल हालदार का 'द क्यूरियस हिस्ट्री ऑफ ए मुंडा फेनेटिकÓ नामक लेख अंग्रेजी में छपा। 'द मॉडर्न रिव्यूÓ, कोलकाता के अप्रैल 1913 के अंक में हैम्बर्ग, जर्मनी में ओरिएंटल लैंग्वेज के प्रोफेसर होमेरसन कॉक्स का 'जीसस क्राइस्ट एंड बिरसाÓ नामक लेख अंग्रेजी में छपा। फा. हौफमैन ने 'बिरसा भगवानÓ, इनसाइक्लोपीडिया मुंडारिका लिखा, जो 1930 में प्रकाशित हुआ। जब 1940 में रामगढ़ में कांग्रेस का महाधिवेशन हुआ तो उसकी स्मारिका में 1940 में जीसी.सोंधी का अंग्रेजी में लिखा लेख 'बिरसा भगवानÓ प्रकाशित हुआ था। इसी साल बिरसा पर जयपाल सिंह मुंडा का लेख 'बिरसा की जय या क्षयÓ, बिहार हेरेल्ड, पटना अंग्रेजी दैनिक में निकला। इन लेखों से पता चलता है कि बिरसा का आंदोलन उस समय कितना प्रभावी रहा था। उनके आंदोलन की धमक खूंटी की पहाडिय़ों से दूर-दूर तक पहुंच गई थी। जब, नौ जून, 1900 में शहादत दी तो उसके बाद भी आंदोलन की आंच कम नहीं हुई।
इसलिए, लोगों ने बिरसा को सूर्य कहा- ओ बिरसा, तुम चलकद में सूर्य की नाई उगे। तुम बढ़े और पूरे नागपुर को आलोकित कर दिया। बिरसा ने एक लड़ाई लड़ी, जंगल की, जमीन की, जल की। अपने लिए नहीं, अपने लोगों के लिए। एक शब्द पर उनके साथ पूरा मुंडा इलाका साथ खड़ा हो जाता। उनके साथ सैकड़ों ने शहादत पाई। कुछ के नाम याद रहे, कुछ गुमनाम हैं, जिन्हें खोजा जाना चाहिए। बिरसा में ऐसी कुछ बात तो थी, जिसे अंग्रेज कांपते थे। महज तीर-धनुष। यही हथियार थे बिरसा के। इसी से बिरसा ने इतिहास बनाया। और, पहाडिय़ां आंदोलन और संताल हूल की उस कड़ी को बिरसा ने एक अंजाम तक पहुंचाया। उनकी शहादत के बाद छोटानागपुर टीनेंसी एक्ट अंग्रेजों को बनाना पड़ा। बिरसा ने राजनीतिक क्रांति को ही आगे नहीं बढ़ाया बल्कि एक धार्मिक-सामाजिक आंदोलन भी चलाया, जिसकी चर्चा बहुत कम होती है-वह है बिरसाइत धर्म। उसके कुछ अनुयायी खूंटी व बंदगांव के आस-पास आज भी हैं। इसके साथ उन्होंने हडिय़ा-शराब से दूर रहने को कहा-बिरसा का आदेश है कि हंडिय़ा और शराब न पियो, इससे हमारी जमीन हमसे छीन जाती है। अधिक मद्यपान और नींद ठीक नहीं। दुश्मन इस कारण हम पर हंसते हैं। जल, जंगल, जमीन की लड़ाई आज भी जारी है और हडिय़ा-दारू का प्रचलन भी। बिरसा के इस संदेश को सुनने-गुनने की जरूरत है।

एके पंकज ने शोधपूर्ण काम किया है। उन्‍होंने एक सूची दी है। जो नीचे है'
-जूलियस तिग्गा, महात्मा बिरसा/वर्ष ज्ञात नहीं लेकिन 1950 के आसपास
-प्रियनाथ जेम्स पूर्ति, शहीद बिरसा मुंडा, किशोर प्रेस लि., जुगसलाई, टाटानगर, 1951/हिंदी में संभवत: पहली किताब
-भरमी मुंडा का विवरण - पांडुलिपि, सुरेश सिंह को यह जयपुर में 22 मई 1962 को प्राप्त हुई थी
- मुंडारी पत्रिका 'जगरसड़ाÓ, फरवरी-मार्च 1960, जीईएल चर्च प्रेस, रांची में बिरसा पर लेख
-लाइफ एंड टाइम्स ऑफ बिरसा भगवान, सुरेन्द्र प्रसाद सिन्हा, टीआरआई, रांची, 1964
-कुमार सुरेश सिंह की 'द डस्ट स्टोर्म एंड द हेंगिंग मिस्टÓ (बाद में 'बिरसा एंड हिज मूवमेंटÓ नाम से) 1966 में कोलकाता से प्रकाशित हुई
- 1940 के रामगढ़ कांग्रेस में बिरसा द्वार बनाया
- बिरसा मुंडा स्टेच्यू कमिटी, राउरकेला का गठन 1982 में
- संसद के केंद्रीय हॉल में 16 अक्टूबर 1989 को बिरसा के चित्र का अनावरण तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष बलराम जाखड़ ने किया। इसे बिरसा मुंडा स्टेच्यू कमिटी राउरकेला ने डोनेट किया था।
- बिरसा पर डाक टिकट 15 नवंबर 1989 में जारी हुआ
- 28 अगस्त 1998 को संसद परिसर में 14 फीट की बिरसा प्रतिमा (मूर्तिकार बीसी मोहंती, डोनेटेड बाइ सेल, इंडिया) का अनावरण तब के राष्ट्रपति केआर नारायणन ने किया। 

हजारीबाग जेल में 21 दिन में लिखी थी 'वोल्गा से गंगाÓ

देश के महान घुमक्कड़ राहुल सांकृत्यायन ने वोल्गा से गंगा की रचना हजारीबाग जेल में की थी। इस महान कृति का यह 75 वां साल शुरू हो रहा है। 1942 में इसकी रचना हुई थी। 23 जून, 1942 को इसे किताब घर ने प्रकाशित किया था। खास बात यह है कि इसे महज 21 दिनों में लिखा गया था। इसका जिक्र उनकी धर्मपच्ी कमला सांकृत्यायन ने राहुल की कृति 'प्रभाÓ के नाट्य रूपांतरण की भूमिका में किया है। राहुल ने इस कृति के दूसरे संस्करण में यह जानकारी दी है कि प्रकाशित होने के सात-आठ महीने में ही इसका प्रथम संस्करण समाप्त हो गया था। इस कृति की मांग आज भी है और हर साल इसके संस्करण छपते हैं।
उत्तरप्रदेश के आजमगढ़ के एक गांव में अप्रैल 189
3 में पैदा हुए राहुल सांकृत्यायन ने विधिवत शिक्षा हासिल नहीं की थी और घुमक्कड़ी जीवन ही उनके लिए महाविद्यालय और विश्वविद्यालय थे। अपनी विभिन्न यात्राओं के क्रम में वह तिब्बत भी गए थे। वहां दुर्लभ बौद्ध साहित्य को एकत्र करने की दिशा में काफी काम किया। वहां से तिब्बत से बौद्ध धर्म की हस्तलिखित पोथियां खच्चरों पर लाद कर लाए और बाद में उनका यहां प्रकाशन भी करवाया। देखा जाए तो राहुल सांकृत्यायन की रचनाओं का दायरा विशाल है। उन्होंने अपनी आत्मकथा के अलावा कई उपन्यास, कहानी संग्रह, जीवनी, यात्रा वृत्तांत लिखे हैं। इसके साथ ही उन्होंने धर्म एवं दर्शन पर कई किताबें लिखीं। 'वोल्गा से गंगाÓ उनकी महान रचना है और सर्वाधिक बिक्री वाली भी। जिस शैली में यह पुस्तक लिखी गई है हिंदी में कम ही पुस्तकें इस शैली में हैं। प्रागैतिहासिक काल यानी पांच हजार से भी अधिक पुरानी सभ्यता से आधुनिक काल तक मानव की प्रगति का जिक्र करते हुए इस कृति की जो शैली है वह काफी रोचक एवं सरस है।
राहुल की इस विशेषता को देखते हुए आलेसांद्रा कोंसोलारो ने लिखा है राहुल (1893-1963) की पहचान एक बहुसर्जक महापंडित और बहुभाषी लेखक के रूप में है। विभिन्न विषयों पर लिखी गई उनकी कृतियां कम से कम पांच भाषाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। उन्होंने जीवन में जो कुछ भी हासिल किया अपने बल पर किया था। न उन्होंने कोई औपचारिक शिक्षा पाई थी, न उनका कोई स्थायी घर था और न ही कोई नौकरी। वह भगवान बुद्ध के इस दर्शन से प्रेरित थे कि ज्ञान एक नाव है जिस पर सवारी तो की जा सकती है, पर इसे सिर पर एक बोझ के रूप में नहीं रखा जा सकता है। दुनियाभर में अपने भ्रमण के लिए लोकप्रिय इस घुमक्कड़ ने कई यात्रा वृतांत्त लिखे, जिनका अध्ययन इतिहास, मानव भूगोल और दर्शनशास्त्र व संबंधित अन्य विषयों में किया जाता है। घुमंतुओं के लिए विशेष रूप से लिखी गई उनकी एक रचना घुमक्कड़ शास्त्र में दावा किया गया है, 'यायावरी ही मानव जीवन का पहला और अंतिम लक्ष्य है।Ó जब सभ्यताओं के बीच संघर्ष हो रहा है तो वोल्गा से गंगा का पुनर्पाठ एक बार फिर जरूरी हो जाता है।

रांची में रिफ्यूजियों ने शुरू की थी रावण दहन की परंपरा

रांची में रावण दहन की कोई प्राचीन परंपरा नहीं मिलती। इतिहास की किताबें भी मदद नहीं करतीं। पुराने लोग भी नहीं बताते। रांची में एचइसी की स्थापना 1953-54 के बाद रामलीला की परंपरा जरूर शुरू हुई। एचइसी के घाटे में जाने के बाद भी यह परंपरा धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही है। किसी तरह यह अब रस्म अदायगी पर रह गई है, लेकिन रावण दहन रामलीला से पहले एक दिनी उत्सव आजादी के एक साल शुरू हो गई। 1948 में बहुत छोटे स्तर पर इसकी शुरुआत की गई थी और इसका श्रेय भी उन लोगों को जाता है, जो बाहर से आकर यहां बसे। बाहर से का मतलब जो बंटवारे के बाद पाकिस्तान से यहां आए। कहा जाता है कि बंटवारे के समय पश्चिमी पाकिस्तान के कबायली इलाके (नार्थ वेस्ट फ्रंटियर) के बन्नू शहर से रिफ्यूजी बनकर रांची आए करीब एक दर्जन परिवारों ने मिलकर रांची में रावण दहन कर दशहरा मनाने की नींव डाली। पर इसके पीछे क्या कारण हो सकते हैं? शायद, लुट-पीटकर आए पंजाबियों ने अपने दुख-दर्द को भुलाने के लिए दशहरा उत्सव को चुना। बंटवारे के दंश को वही महसूस कर सकता है, जो भोगा हो। कई ऐसे परिवारों से मिलने के बाद उनके दुख को समझने का मौका मिला। यह दुख छोटा नहीं था। एक बारगी, एक रेखा ने जीवन के सारे सपने को चूर कर दिया था। रातों रात लाखों लोगों का अपना वतन बदल गया था। यह कोई मामूली शॉक नहीं था। दुख बड़ा था। अब भुलाना ही इसका उपाय। रावण के जलाने से बड़ा प्रतीक उन्हें दूसरा नहीं मिला। जिन्होंने देश को बांटा, वे रावण की तरह उनके सामने खड़े थे। ऐसे ही दुख-कातर के समय दशहरे की नींव डाली।  

  • दिवंगत लाला एस राम भाटिया, स्वर्गीय मोहन लाल, कृष्णलाल नागपाल व स्वर्गीय अमीरचंद सतीजा, जो बन्नू समाज के मुखिया थे, इनके नेतृत्व में डिग्री कॉलेज(बाद में रांची कॉलेज मेन रोड डाकघर के सामने) के प्रांगण में 12 फीट के रावण के पुतले का निर्माण किया गया और फिर उसका दहन किया गया। रांची में दशहरा दुर्गापूजा के रूप में मनाया जाता था। पहली बार स्थानीय लोगों ने रावण दहन को देखा। रावण दहन के दिन तीन-चार सौ लोग नाचगान कर तथा कबायली ढोल-नगाड़ों के बीच रावण का पुतला दहन किया गया। पहले रावण का मुखौटा गधे का बनता था, जिसे बाद में बंद कर दिया गया। 1950 से 55 तक बारी पार्क में रावण दहन होता रहा। धीरे-धीरे भीड़ बढ़ती चली गई तो पुतलों की ऊंचाई भी 20 से 30 फीट होती गई। खर्च की राशि स्वर्गीय लाला मनोहरलाल नागपाल, स्वर्गीय टहल राम मिनोचा व अमीरचंद सतीजा ने मिलकर उठाए। बन्नू समाज इस काम के लिए चंदा नहीं लेता था। इधर, पुराने लोगों के निधन और खर्च बढऩे के बाद स्वर्गीय मनोहर लाल ने रावण दहन की जिम्मेदारी की कमान पंजाबी ङ्क्षहदू बिरादरी के लाला धीमान साहब, लाला राम स्वरुप शर्मा, लाला मंगत राम, लाला कश्मीरी लाल, लाला राधाकृष्ण को सौंप दी। बाद में रावण दहन राजभïवन के सामने होने लगा। जैसे-जैसे आबादी बढ़ी, भीड़ बढ़ी गई तो रावण दहन का आयोजन मोरहाबादी मैदान में होने लगा, जो अब तक जारी है। 1960 के आसपास रावण दहन मेकान, एचइसी तथा अरगोड़ा में भी होने लगा। पंजाबी ङ्क्षहदू बिरादरी अब भव्य तरीके से मोरहाबादी मैदान में रावण दहन का आयोजन करती है। सूबे का सीएम ही रावण का दहन करता है। हां, एक बार जब शिबू सोरेन सूबे के मुखिया थे, तब उन्होंने दहन करने से इनकार कर दिया, क्योंकि रावण उनके लिए पूज्य है।   

गांधीजी मोटरकार से घूमे थे झारखंड


मोहनदास करमचंद गांधी की महात्मा बनने की शुरुआत झारखंड से ही होती है। 1917 में पहली बार चंपारण आंदोलन के सिलसिले में रांची आए तो महात्मा शब्द नहीं जुड़ा था, लेकिन इस आंदोलन ने महात्मा बनने की शुरुआत कर दी थी। कहा जाता है कि चार जून 1917 से 1940 तक यानी, रामगढ़ कांग्रेस तक बीच-बीच में वे झारखंड आते रहे। लेकिन
फाइल फोटो
झारखंड का सुनियोजित राजनीतिक दौरा उन्होंने 1925 में 13 से 18 सितंबर तक किया था। इस दौरान वे पुरुलिया, चाईबासा, चक्रधरपुर, खूंटी, रांची, मांडर, हजारीबाग में रहे और इन स्थानों पर आयोजित अनेक बैठकों को संबोधित किया। अपनी झारखंड यात्रा में अनेक लोगों से भी मिले और कई महत्वपूर्ण संस्थानों को भी देखा था। झारखंड से लौटने के बाद 'यंग इंडियाÓ के 8 अक्टूबर 1925 के अंक में  'छोटानागपुर मेंÓ शीर्षक से उन्होंने दो संक्षिप्त संस्मरण लिखे।
सितंबर की यात्रा का जिक्र करते हुए गांधीजी लिखते हैं, छोटानागपुर की अपनी पूरी यात्रा मैंने मोटरकार से की। सभी रास्ते बहुत ही बढिय़ा थे और प्राकृतिक सौंदर्य अत्यंत दिव्य तथा मनोहारी था। चाईबासा से हम चक्रधरपुर गए फिर बीच में खूंटी और एक-दो अन्य स्थानों पर रुकते हुए रांची पहुंचे। हमारे रांची पहुंचने के वक्त ठीक सात बजे शाम को महिलाओं ने एक बैठक का आयोजन रखा था। बैठक में आयोजकों ने मुझसे देशबंधु मेमोरियल फंड के लिए अपील करने की कोई बात नहीं की थी, ऐसा मेरा ख्याल है। फिर भी मैं शायद ही कभी किसी सार्वजनिक सभा या बैठक में इस अपील को रखने से चुका हूं और मैंने नि:संदेह इस बैठक में भी यह अपील की। बैठक में शामिल लोगों में बंगाली बहुसंख्यक थे। आगे कहते हैं, 'इसके बाद मुझे रांची से नजदीक के एक छोटे से गांव ले जाया गया। जहां बाबु गिरिशचंद्र घोष, जो एक उत्साही खद्दर कार्यकर्ता हैं, के नेतृत्व में एक कोऑपरेटिव सोसायटी के जरिए हथकरघा को बचाने का प्रयास किया जा रहा है।Ó रांची आने के बाद कहते हैं,  रांची में देशबंधु मेमोरियल फंड के लिए शौकिया दलों द्वारा दो नाटकों का मंचन किया गया था। एक का मंचन बंगालियों ने किया जबकि दूसरा नाटक बिहारियों ने किया था। चूंकि दोनों ही शौकिया दल थे फिर भी उनके आमंत्रण को स्वीकार करने में मुझे कोई कठिनाई नहीं थी। यह जुदा बात है कि बंगाली नाटक को देखते हुए मैं बहुत निराश हुआ। मैं शौकिया और व्यवसायिक नाटक के बीच के अंतर को साफ तौर पर देख रहा था। नाट्य प्रदर्शन में पेशेवर कलात्मकता का पूरा अभाव था। वस्त्र सज्जा पूरी तरह से विदेशी कपड़ों को लेकर तैयार की गयी थी। मेकअप अच्छा नहीं रहने से भी नाटक हल्का लग रहा था। यह अत्यंत उत्तम होता कि कम से कम पात्रों के वस्त्र निर्माण में वे खद्दर का उपयोग करते। इसलिए जब मुझसे बिहारी नाटक देखने के लिए लोग आग्रह करने आए तब मैंने उनसे कहा कि मैं तभी उनका नाटक देखने आऊंगा जब वे अपने नाटक में खद्दर का प्रयोग करेंगे, और ऐसा उन्हें अपने हर परफॉरमेंस में करना होगा, सिर्फ इस प्रदर्शन में नहीं। मुझे बेहद आश्चर्य तब हुआ जब उन लोगों ने मेरी यह शर्त बहुत आसानी से मान ली। मेरी बात मानने के लिए उनके पास अत्यंत कम समय था पर उन्होंने ऐसा कर दिखाया। नाटक शुरू होने से पहले उनके प्रबंधक ने घोषणा की कि मुझसे किए गए वायदे के अनुसार उन्होंने वस्त्र-विन्यास में परिवर्तन कर लिया है और इसके लिए वह ईश्वर को धन्यवाद देते हैं कि वे अपना वायदा पूरा कर पा रहे हैं। बिहारी कलाकारों ने अपने नाटक की झूठी चमक खो कर क्या पाया था? मेरे विचार से 'गौरवÓ। खद्दर के इस्तेमाल से उन्होंने प्रतिष्ठा पायी थी और नि:संदेह स्वदेशी खद्दर का प्रयोग मैं सभी नाटक कंपनियों के लिए आवश्यक मानता हूं।
गांधीजी आगे लिखते हैं, 'छोटानागपुर प्रवास के दौरान और भी कई दिलचस्प बातें हुई जिनमें खद्दर पर एन.के. रॉय और उद्योग विभाग के एस.के. राव के साथ हुई चर्चा तो शामिल है ही ब्रह्मचर्य आश्रम (अब योगदा सत्संग आश्रम) का विजिट भी स्मरणीय है जिसकी स्थापना कासिमबाजार के महराजा की देन है। मोटरगाड़ी से ही हम रांची से हजारीबाग गए जहां पहले से तयशुदा कार्यक्रमों के अलावा मुझे संत कोलम्बा मिशनरीज कॉलेज, जो बहुत पुराना शिक्षण संस्थान है, के छात्रों को भी संबोधित करने का आमंत्रण मिला। गांधीजी ने वहां भी संबोधित किया और फिर पलामू आदि की भी यात्रा की। अंतिम बार गांधीजी ने रामगढ़ कांग्रेस में आए थे और करीब दस दिनों तक यहां रहे थे।