आठ साल की उम्र में ही कविता करने लगे थे गुरु भक्त सिंह 'भक्तÓ

गुरु भक्त सिंह 'भक्तÓ का जन्म पूर्वी उत्तरप्रदेश के गाजीपुर जिले के जमानियां में सात अगस्त, 1893 में हुआ था। उनका जन्म सरकारी अस्पताल में हुआ था। वहीं पर उनके पिता डॉ. कालिका प्रसाद सिंह पर डाक्टर थे। पिता बहुत दिनों तक फौज में डाक्टर रहे थे। इसके बाद वे सिविल डाक्टर हो गए। भक्तजी के जन्म के समय वे जमानियां के सरकारी अस्पताल में इंचार्ज थे। जमानियां में भक्तजी के पांच साल ही बीते। 1893 से लेकर 1898 तक। इसके बाद बलिया चले गए और यहीं पर इनकी आरंभिक शिक्षा शुरू हुई। प्राइमरी की शिक्षा के बाद गोरखपुर में अध्ययन किया। फिर इलाहाबाद में। 1911 से 1916 तक म्योर सेंटल कालेज में अध्ययन किया। इसी बीच 1911 में 18 साल की उम्र में वनश्री देवी से विवाह हो गया। पर, चार साल बाद ही आठ दिन का शिशु छोड़कर 1915 में वनश्री परलोक गमन कर गईं। 1918 में दूसरा विवाह शशिमुखी देवी से हुआ। 1919 में एलएलबी पास करने के बाद 'प्रेमपाशÓ नाटक की रचना की। यद्यपि वे छुटपन से ही रचना करने लगे थे। आठ साल की उम्र की उनकी एक रचना मिलती है-
नजर आ रहा है मकां आलीशां
कि जिसका नहीं हाल होता बयां
करूं किस जबां से बयां इसकी शां
फलक पर भी होगा न ऐसा मकां।

भक्तजी का हिंदी के अलावा उर्दू, फारसी, अंग्रेजी पर भी जबरदस्त अधिकार था। उर्दू में कविताएं लिखीं। अंग्रेजी में भी कविताएं लिखीं। 'नूरजहांÓ का अंग्रेजी में छंदोबद्ध अनुवाद भी खुद ही किया। इन भाषाओं पर अधिकार के बावजूद हिंदी से उन्हें बेहद लगाव था और मुख्य रचनाएं हिंदी में ही लिखीं। 'भक्तÓ जी ने अपने कॅरियर की शुरुआत वकालत से की। बलिया में 1919 से 1922 तक वहां वकालत किया। इसके बाद गांधीजी के आह्वान पर छोड़ दी। बाद में 19 नवंबर, 1922 से 1925 तक बंगाल नार्थ वेस्टर्न रेलवे में टैफ्रिक इंस्पेक्टर के पद पर अपनी सेवाएं दीं। बलिया रहते उनका दूसरा नाटक 'तसनीमÓ आया। इस दौरान कविता भी लिखते रहे। 1925 में पहला काव्य संग्रह 'सरस सुमनÓ का प्रकाशन हुआ। 'भक्तÓ जी ने फिर अपनी नौकरी बदली। वे गाजीपुर में जिला बोर्ड में सेक्रेटरी हो गए। यहां भी वे दो साल यानी 1925 से 1927 तक रहे। इसके बाद इलाहाबाद के मांडा रियासत में मैनेजर हो गए। एक साल तक ही यहां रह पाए कि फिर रायबरेली के जिला बोर्ड में सेक्रेटरी हो गए। यहां से फिर 1932 में बाराबंकी के रामनगर इस्टेट में मैनेजर हो गए। इसके बाद एटा जिले के आवागढ़ रियासत में भी मैनेजर रहे। यहां उन्हें तीन सौ रुपये मासिक वेतन मिलता था। सबसे लंबी नौकरी आजमगढ़ में की और यही उनकी अंतिम नौकरी भी थी। यहां वे 1935 से लेकर 1956, अवकाश प्राप्ति तक म्यूनिसिपल बोर्ड के सेक्रेटरी रहे। यहीं पर अपना आवास बनवाया अलवल मुहल्ले में 'भक्त भवनÓ। कोट, पैंट, टाई के पर रंगदार और धारीदार राजस्थानी मुरेठा इनकी वेशभूषा थी।
अपनी कविताओं और विषय के बारे खुद भक्त ने अपनी कैफियत दी है, 'मेरी कविता का विषय रहा है मानव और मन तथा विविध परिस्थितियों में उनकी क्रिया-प्रतिक्रिया। साधारण और उपेक्षित की ओर भी मेरा विशेष ध्यान गया चाहे वह जड़ हो या चेतन। विशिष्ट की ओर ही अभी तक साहित्य का स्रोत बहता था और देवी देवता, राजारानी नायक-नायिका बनकर मंच पर आते रहे थे। भारतीय जन-जीवन का शुद्ध रूप हम शत प्रतिशत ग्रामीण जनों में पाते हैं। ये बेचारे विशेषत: उपेक्षित हैं। बुद्धिजीवी नागरिक तथा पाश्चात्य कृत्रिम चमक-दमक की चकाचौंध के पुजारी पतंगे चाहे इन्हें असभ्य और प्रस्तरमूर्ति ही समझते रहे हों, परंतु वस्तुत: यही भारतीय जन जीवन के प्रतीक हैं। ये आधुनिक दयहीन दिखावटी सभ्यता के कल पुरजे नहीं हैं। वे ही तो धर्म शून्य,  हमारे सनातन धर्मा मर्यादा तथा सांस्कृतिक संस्कारों के रक्षक देवता हैं। दय मौज मारता है। इन दीनों की दुर्बल काया में एक उदार स्नेहासिक्त  मैं उनको अपनाया, उनको गले लगाया, इनकी प्रतिमाओं की, कविता द्वारा प्राण-प्रतिष्ठा कर उनकी पूजा की। उन पर स्नेह के फूल चढ़ाए। ऐसे पात्रा मेरे सभी संग्रहों में आए हैं।Ó
भक्तजी का काव्य जगत में प्रवेश निराला और पंत के साथ ही होता है। किंतु उनकी प्रथम कविता पुस्तक पंत के 'पल्लवÓ के बाद प्रकाशित हुई। उनका दृष्टिकोण न आध्यात्मिक था न रहस्यवादी। वे शुद्ध मानवतादी थे। प्रकृति के पुजारी थे और जिन्हें हमारी सभ्यता ने हाशिए पर ठेल दिया था, उसके वे गायक थे। प्रचार और प्रदर्शन से दूर रहने वाले इस महाकवि का आज कोई नामलेवा भी नहीं है न कहीं चर्चा ही होती है। ऐसा क्यों है? यह तो आज के आलोचक ही बताएंगे? पर उनके योगदान को कैसे भुलाया जा सकता है। उन्होंने प्रबंध काव्य तब लिखी जब हिंदी में इसकी जरूरत महसूस की जा रही थी। इस कमी को पूरा करने के लिए वे प्रबंध काव्य लिखने की ओर प्रवृत्त हुए। इस ऐतिहासिकता को समझेंगे तभी हमें भक्तजी का अवदान समझ में आएगा। उस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को उन्हीें के शब्दों में पढि़ए। उद्धरण लंबा है, लेकिन वर्तमान पाठकों के लिए जरूरी है। '...प्रबंध काव्य लिखने का कोई अपना विचार नहीं था। परंतु होनी होकर रहती है। प्रयाग के छात्रा जीवन में अपने बहनोई ठाकुर भगवान सिंह रइस कटरा के निजी मकान में रहते थे, जो म्योर सेंट निकट दो सौ गज की दूरी पर है। यहीं मेरे पड़ोसी थे पं देवीदत्त शुक्ल, संपादक 'सरस्वतीÓ। उस महापुरुष पर अपार कृपा मेरे ऊपर रहती और वे स्नेहवश मेरे निवास स्थान पर अक्सर आया जाया करते थे। वे आग्रह करके मेरी अप्रकाशित कविताएं बार-बार सुनते और अनुरोध करते कि मैं कोई महाकाव्य लिखूं। वे खड़ी बोली हिंदी में अच्छे प्रबंध काव्य की कमी अनुभव करते और मुझे दर्शाते कि इस अंग की पूर्ति आप कर सकते हैं, क्योंकि आपकी कविताओं में प्रबंध का मूल तत्व बीज रूप में विद्यमान है। मैं उनका प्रस्ताव टालता रहा। यहां तक कि 1919 में एलएलबी पास कर मैं प्रयाग से विदा भी हो गया और बलिया आकर अपने पिता डॉ कालिका प्रसाद सिंह के यहां अपने पैतृक भवन में रहकर वकालत करने लगा। 1918 में प्रथम जर्मन युद्ध समाप्त होने पर भारत की सहायता और बलिदान के उपलक्ष्य में, स्वाधीनता का द्वार खोलने के बजाय, जब ब्रिटिश सरकार, काले कानूनों द्वारा गुलामी की जंजीर और कसने लगी तब महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन छेड़ दिया और सरकारी शासन के संचालन तंत्र को असहयोग द्वारा ठप कर देने का संकल्प लिया। छात्रों से स्कूल और कालेज छोड़कर, वकीलों से वकालत छोड़कर तथा अन्य कर्मचारियों से कार्यवाही से अपना हाथ हटाकर, स्वतंत्रात के संग्राम में कूद पडऩे को ललकारा। अत: गांधी की आंधी में बहकर वकालत छोड़ दी। यों मुझे देश व साहित्य सेवा के लिए पूर्ण अवकाश और देवदत्त-स्वर्ण-संयोग मिला।
जवानी का आलम था। तबीयत में उमंग थी। संसार की चिंता से दूर, प्रकृति-परी की मोहमाया में चूर था, आंखों में सरूर था। अत: उस मधुर बेला में मुझे अपने हितैषी पं देवीदत्त शुक्ल की बात याद आई और तब प्रबंध रत्न निकालने के लिए, संदेह और संकल्प, मेरा हृदय सागर मंथन करने लगा। 
नित्य ही मेरी मित्र मंडली, संध्या समय भृगु क्षेत्र के सुरम्य सुरसरि तट पर वायु सेवन और विनोद हित जाती और तरंगों में हिलोरे लेते हुए पावनपुलिन के रंगमंच पर झाऊ-झुरमुट के मंडप की छाया में, विविध विषयों पर तर्क-वितर्क करती। अवसर पा एक दिन प्रबंध काव्य लिखने के अपने विचार के बारे में मित्रों से परामर्श किया। सबने जोरों से इसका अनुमोदन किया। फिर सवाल आया विषय का। अनेक विषय सुझाए गए, जिनके पक्ष-विपक्ष में काफी वाद-विवाद उठा। सब अलौकिक और आदर्श नायक पेश करते थे। मैं अपने से मानव का चरित्रा लेना चाहता था, देवता का नहीं। अंत में जब मैंने अपनी पसंद सुंदरी नूरजहां पर प्रबंध काव्य लिखने की सुनाई तक काफी हो-हल्ला मचा। पर अनंत पांडेय की मंडली के विरोध करने पर भी मेरा प्रस्ताव बहुमत से स्वीकृत हो गया। तब मैंने इस पर लिखने की ठानी। इसी बीच मेरा संपर्क पं अयोध्या सिंह हरिऔध से हो गया था। वे मौलाना शिबली नोमानी आजमगढ़ी के इस व्यंग्य से बहुत मर्माहत थे कि हिंदी की लेखन शैली में उर्दू की तरह निखार नहीं है। भाषा में लोच व प्रसाद गुण नहीं है। हृदय को छूने वाले मुहावरे नहीं है और नहीं है बोलचाल में मंजे हुए हृदय को छूने वाले प्रयोग की जादूबयानी। 'प्रियप्रवासÓ के लेखक को यह बात तीर सी लगी। बात तो ठीक थी। हम दोनों को यह कमी खटकी और फिर हमने पांडित्यपूर्ण तत्सम बोझिल भाषा को खराद पर चढ़ाकर सुडौल करने की ठानी। इस दिशा में इस कमी की पूर्ति के लिए कवि सम्राट ने चौठो चौपदे, चुभते चौपदे आदि अनेक पुस्तकें लिख डालीं, जो हिंदी साहित्य की अमूल्य निधि हैं।
मैंने भी इस हेतु मैल-मिश्रित खनिज शब्दावली को तपा-तपाकर शुद्ध कंचन व कुंदन बनाकर लाने का संकल्प किया। मित्रों को अपने पक्ष में निर्णय सुनने के दूसरे दिन ही रात की मादक बेला में धारा प्रवाह लिखकर एक सर्ग पूरा कर संध्या समय उसी गंगा तट पर सबको सुना दिया। सब आश्चर्यचकित रह गए। सबने रचना की भूरि-भूरि प्रशंसा की। यों प्रोत्साहित हो मैं धीरे-धीरे एक-एक सर्ग लिखने लगा। लिखने के लिए तबीयत मौजूं होने के लिए अक्सर महीनों का अंतर पड़ जाता था। कुछ अंश बलिया में लिखा, कुछ प्रयाग में, कुछ आगरा में, फतेहपुर सीकरी, मथुरा, दिल्ली आदि में। यों तीन वर्ष का समय लेकर काव्य पूरा कर लिया। इसी बीच महान आलोचक पं पद्म सिंह शर्मा प्रयाग पधारे। मैंने उन्हें 'नूरजहांÓ सुनाई। वे इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने तुरंत इसकी प्रशंसा में एक पत्र पं बनारसी चतुर्वेदी संपादक 'विशाल भारतÓ कलकत्ता को लिखा कि इस पुस्तक को सज-धजकर छपवाने का प्रबंध कीजिए और अपनी पत्रिका में इसका कुछ अंश छापकर हिंदी संसार को इसकी अनोखी छवि से अवगत करा दीजिए। इसमें दरिया की रवानी है, जीवन की जवानी है, मोतियां का पानी है, बिछोह और मिलन की कहानी है। इसकी फड़कती भाषा सरल सुबोध मुहावरेदार है। कनक की मादकता लिए इसके शब्द-शब्द बोलते हैं। इसके वाक्य फेनिल छलकते प्याले हैं हाला और अंगूरी के।Ó
सन् 1935 में नूरजहां बड़ी सजधज के साथ लॉ जर्नल प्रेस, इलाहाबाद से निकली। हिंदी संसार ने हाथों हाथ उठा लिया। उसे पढ़ते ही आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेद्वी ने 'विशाल भारतÓ में एक लंबा लेख लिख डाला। उसके अंतिम शब्द बड़े मार्मिक हैं- 'इन वर्णनों को पढ़ते समय पाठक हृदय अपने इर्द-गिर्द बिखरे सौंदर्य सागर को, जिनकी वह अब तक उपेक्षा करता रहा है, पाकर अचरज में आ जाता है। कुछ कवि के वाक्चातुर्य से, कुछ अपनी सौंदर्य विस्मयकारिणी बुद्धि से, कुछ प्रकृति के अनंत सौंदर्य का साक्षात्कार करके, जी में आता है चिल्लाकर कह दें-यह कवि तो अपने ढंग का अकेला है-यूनिक।
'नूरजहांÓ की तारीफ  भगवतशरण उपाध्याय ने भी की। नूरजहां की प्रति मिलने पर उपाध्याय जी ने अपने उद्गार व्यक्त किए। लिखा कि आधुनिक हिंदी महाकाव्य के जीवन में यह एक नया वितान रचेगा। दुनिया के सर्वश्रेष्ठ महाकाव्यों की श्रेणी में शुमार होगी। अभिव्यक्ति के लिहाज से कालीदास के प्रवाह की तरह है और इसमें कीट्स की तरह संगीत और फेंटेसी है। बाद में उपाध्याय जी ने नूरजहां पर एक व्याख्यात्मक आलोचना भी लिखी। लेकिन उस समय विशाल भारत के सहायक संपादक ब्रजमोहन वर्मा को नूरजहां में कुछ कमी दिखी। शायद वे एक अंश पढ़कर अपना मंतव्य भक्तजी के पास भेज दिया। उन्होंने एक पत्र भक्तजी के नाम भेजा और लिखा, 'आपका ''नूरजहांÓÓ का प्रथम सर्ग-जो अंश आपने भेजा था-पढ़ा। इस अंश में आपने नूरजहां के पिता के मुख से ईरान की सुंदरता का वर्णन कराया है। कवि न होने के कारण कविता में अपनी टांग अड़ाना मेरे लिए सरासर मूर्खता है। लेकिन एक साधारण पाठक की हैसियत से मरे विचार में यदि आप इस अंश में ईरान के 'गुलÓ, 'बुलबुलÓ, 'चमनÓ, 'सरोÓ, 'नर्गिसÓ, 'गुल्लालाÓ आदि बातों को सम्मिलित कर दें तो ईरान का दृश्य बहुत वास्तविकतापूर्ण हो जाए।Ó हालांकि भक्तजी ने इसका पूरा ख्याल रखा और वहां के सौंदर्य का वर्णन नूरजहां में किया है। इन शब्दों का प्रयोग भी किया है। वर्माजी को वह अंश नहीं मिल सका था, जिसके कारण उन्होंने अपना सुझाव भेज दिया था। उस समय के चर्चित साहित्यकार रूपनारायण चतुर्वेदी ने नूरजहां पढऩे के बाद अपने भाव को व्यक्त करने से नहीं रोक सके। भाषा की तारीफ करते हुए लिखा है, 'क्या भाषा है, क्या मुहावरे हैं, कैसी ललकती, किलकती, छलकती वाणी है और क्या वर्णन शैली है।Ó
इस तरह 'नूरजहांÓ का जन्म हुआ और हिंदी के महान लेखकों ने उस समय इसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की, लेख लिखे, आलोचना लिखी। 'नूरजहांÓ की कुछ पंक्तियों को देखना गैरवाजिब न होगा-
फिर बोल उठी कोयल कू! कू!
फिर बोल उठी कोयल कू! कू!
दिन थे हम दोनों होड़ लगा पंचम के स्वर में गाते थे।
दे मींड़ सरित की लहरों पर तारों से तार मिलाते थे।।
हम भी रसाल की डालों पर चढ़ आमों में छिप जाते थे।
हम तेरे आम चुराए बिन ही चोर बनाए जाते थे।।
'नूरजहांÓ में राष्ट्रीयता का उद्गार भी है-
जहां हमारा जन्म हुआ, वहीं हमारा स्वर्ग स्थान।
इस भू की मिट्टी पानी से यह काया है बनी हुई
दु:ख सुख के कितने आंसू से पावन रज है सनी हुई।।


भक्तजी की अन्य रचनाएं भी पाठकों के बीच काफी लोकप्रिय रहीं। सरस सुमन, कुसुम कुंज, वंशीध्वनि और वनश्री। कहीं न कहीं इनमें प्रकृति का कोमल राग है। भक्तजी प्रकृति प्रेमी थे लेकिन उनका प्रेम पंत से भिन्न किस्म का था। वे भी वर्डस्वर्थ की तरह प्रकृति पर रीझते हैं। प्रकृति उनके जीवन में समाई है। वे उससे भिन्न नहीं हैं। उन्होंने खुद लिखा है, 'प्रकृति मेरे जीवन से इतनी अभिन्न है जितना मीन के लिए पानी। मेरा अस्तित्व उससे विलग सोचा ही नहीं जा सकता। वह मेरे काव्य की प्रेरणा अथवा पृष्ठभूमि नहीं है, वह तो मेरी सहचरी है। वह जीवन अभिनय में अभिनेत्राी है और मैं अभिनेता। वह मेरी रचनाओं के अंग-अंग से बोलती है और मैं उसकी मधुर ध्वनि सुन थिरक-थिरक कर गा उठता हूं।Ó आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेद्वी ने भी उनके इस पक्ष की ओर ध्यान दिलाया है, 'कहते हैं कि निरपेक्ष पुरुष को लुभाने के लिए प्रकृति ने संसार का यह जाल फैला रखा, पर नूरजहां का कवि वह पुरुष है जो स्वयं प्रकृति के जाल में फंसने को सदा उत्सुक रहता है। उसे एक-एक पौधा, एक-एक वृक्ष, उनके पत्र, पुष्प, शाखा, उपशाखा, एक-एक लता, एक-एक पक्षी, एक-एक मृग, पद-पद पर भावाविष्ट से बना देते हैं। वह जान-बूझकर उनके मोहजाल में जा फंसता है। अपनी कथा आरंभ करते ही वह प्रकृति के उस मोहजाल की ओर अग्रसर हो जाता है।Ó आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने 'अर्थ भूमि के संकोचÓ, 'बंधी लकीर के वादोंÓ, एवं 'प्रेम गान की परिपाटीÓ से आगे बढ़कर 'प्रकृति प्रांगण के सचराचर प्राणियों के रागपूर्ण परिचयÓ, 'विविध विषयों पर आत्मीयता व्यंजक दृष्टिपातÓ एवं 'सुख-दुख में उनके साहचर्य की भावनाÓ को विकास देनेे वाले तत्कालीन कवियों में भक्तजी को गौरव के साथ स्मरण किया गया है।
हरिवंश राय बच्चन ने अगस्त 1963 में भक्तजी को उनके जन्मदिन की बधाई देते हुए पत्रा में लिखा कि 'आपके जन्मदिन पर चरण छूता हूं और चाहता हूं कि हमको आशीर्वाद देने के लिए आप बहुत दिन हमारे बीच बने रहें।...मैं जानना चाहता हूं कि आपकी संपूर्ण रचनावाली कहां से मिलती है। उसे मैं अपने पुस्तकालय में रखना चाहता हूं। मेरी कामना है कि जो पुस्तकालय मैं अपने बच्चों के लिए छोड़ूं, उसमें आपकी रचनाएं अवश्य हों।Ó
भक्त जी का महत्व इतना ही नहीं था। शांति निकेतन में हिंदी भवन निर्माण में भी भक्त जी ने अहम भूमिका निभाई। वहां कई भाषाओं के भवन थे। पर हिंदी भवन नहीं था। अवसर निकालकर भक्तजी ने गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर से इस संबंध में विनम्र निवेदन किया। गुरुदेव ने सहज मुद्रा में कहा-भवन बनाना आप लोगों का काम है। मैं जगह की व्यवस्था कर दूंगां। भक्तजी, पं बनारसी दास चतुर्वेदी तथा पं हजारीप्रसाद द्विवेद्वी, जो उन दिनों वहां अध्यापन कार्य कर रहे थे, भवन निर्माण के लिए आ
उनके योगदान को देखते हुए उस समय शांति निकेतन में भक्तजी के सम्मान में एक गोष्ठी का आयोजन किया गया था। यह आयोजन वहां की छात्राओं की ओर से किया था, जिनमें इंदिरा नेहरू भी शामिल थी। इसकी अध्यक्षता स्वयं गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने की थी। इस गोष्ठी में 'नूरजहांÓ में वर्णित बंगाल की छटा का पाठ किया गया। गुरुदेव ने मंत्रमुग्ध होकर सुना, सराहा और गदगद होकर आशीर्वाद भी दिया। भक्तजी के उद्गार थे, मैंने अपने को कृत-कृत्य समझा और संसार का सबसे बड़ा पुरस्कार पा लिया।Ó भक्त हमारे बीच नहीं हैं। आजमगढ़ के अपने आवास पर 17 मई, 1983 को अंतिम सांसे लीं।


रुढ़ हुए। भक्तजी और चतुर्वेदी जी ने कलकत्ता जाकर धन संग्रह का कार्य प्रारंभ किया और लगभग 30 हजार रुपये जुटाकर गुरुदेव के पास भेज दिया। हिंदी भवन के शिलान्यास की तिथि नियत हुई। गुरुदेव ने अपने हाथों नींव का पत्थर रखा। इस तरह हिंदी भवन बनकर तैयार हुआ।

सेंसर की सड़ी कैंची ,,,,,यथार्थ लेकिन सेंसर?

सेंसर बोर्ड को लेकर सातवें दशक में एक बहस चली थी। 71-73 के दौरान 14 से भी अधिक फिल्मों पर प्रतिबंध लगाया गया था। इसको लेकर तब धर्मयुग में एक बहस चली थी। आज भी सेंसर बोर्ड को लेकर जब-तब बहस होती रहती है। अभी मुल्क को लेकर भी बहस का दौर चल रहा है। धर्मयुग के इस बहस में डॉ राही मासूम रजा ने भाग लिया था। उनकी बेबाक टिप्पणी 4 नवंबर, 1973 के अंक में प्रकाशित हुई थी। साभार हम यहां दे रहे हैं।
 


डॉ राही मासूम रजा
 मेरे दिल में श्री गुजराल की बड़ी इज्जत है। वह देखने-सुनने में मिनिस्टर लगते ही नहीं। इसलिए जब वह हवाई तीर चलाने लगते हैं, तो बड़ी कोफ्त होती है और यह सोचकर दिल दुखता है कि एक और आदमी गया काम से।
इन दिनों वे फिल्मों से यथार्थ की मांग करने में जुटे हुए हैं। यथार्थ बड़ा खूबसूरत शब्द है। मैं भी इस शब्द के पुराने आशिकों में से हूं। मैंने भी इसकी जुदाई में जाग कर रातें काटी हैं और इसकी तलाश में चलकर दिन गुजारे हैं, गालियां सुनी हैं और धमकियां वसूल की हैं। इसीलिए मुझे गुजराल साहब की इस मांग पर हंसी आती है। यथार्थ की उनकी परिभाषा क्या है? क्या मार-पीट कम कर देने से या सेक्स का पुट न देने से फिल्मों में यथार्थ आ जाएगा? मैं यह नहीं मानता कि गुजराल साहब को यथार्थ का अर्थ नहीं मालूम है। वे कहते हैं कि सामाजिक सच्चाइयां बयान की जायें। मैं पूछता हूं, क्या सामाजिक सच्चाइयां बयान करने देंगे? सच्चाई यह है कि हमारा पुराना समाज जगह-जगह से मसक गया है। सच्चाई यह है कि जरूरतें इतनी बढ़ गयी हैं कि उन तक पहुंचने के लिए मूल्यों को पांव तले रख कर पंजों के बल खड़ा हुआ जाये, जो भी जिंदगी की जरूरी चीजों तक मुश्किल ही से हाथ पहुंच पाता है। सच्चाई यह है कि पुलिस के वर्दीपोश जवान रंगे हाथों चोरी करते पकड़े जाते हैं। वजीरों (मंत्रियों) के खिलाफ इंक्वायरी होती है, उनकी बेईमानी साबित होती है और वह विजारतों (मंत्रिमंडल) से निकाले जाते हैं। सच्चाई यह ह कि दंगों में पुलिस लूटमार करती है और सच्चाई यह है कि देश में रिश्वत का कानून चल रहा है। सच्चाई यह है कि पत्रकार खबरें गढ़ते हैं। सच्चाई यह है कि टीचर स्कूलों और कॉलेजों और यूनिवर्सटियों में झूठा इतिहास पढ़ाते हैं--यथार्थ बड़ी कड़वी गोली है गुजराल साहब! क्या आप हमें यह दिखलाने देंगे कि मिनिस्टर घूस खा रहा है और पोलिटिकल पार्टियां दंगे करवा रही हैं? क्या आप यह दिखलाने देंगे कि न्याय बेगुनाहों को फांसी चढ़वा रहा है और गुनाहगार को बरी कर रहा है? क्या आप यह दिखलाने देंगे कि सेकुलर-इज्म पर लंबे-लंबे भाषण देने वाले लोग धर्म और जातपात के नाम पर वोट मांग रहे हैं?
बने हैं अहले-हवस, मुद्दई भी मुंसिफ भी
किसे वकील करें, किस से मुंसिफी मांगे! 
यथार्थ बड़ी टेढ़ी खीर है।
मैंने ये सवाल गुजराल साहब को शर्मिंदा करने के लिए नहीं पूछे हैं। इन सवालों का कथन की कला से गहरा संबंध है। सवाल यह है कि फिल्म-लेखक 'विलेनÓ किसे बनाए? सेंसर बोर्ड ने हर दरवाजा-यथार्थ का हर दरवाजा-बंद कर रखा है। ले दे कर एक 'स्मगलरÓ बचता है या फिर डाकू हाथ आता है। यह नकली विलेन किसी अच्छी कहानी का बोझ नहीं सहार सकते। यदि रावण कोई स्मगलर या डाकू रहा होता, तो रामायण जैसा महाकाव्य लिखा ही न गया होता।
कहानी का बोझ नायक के कंधों पर नहीं होता, विलेन के कंधों पर होता है। कहानी टकराव की कोख से जन्म लेती है। कोख ही टुच्ची और नकली होगी तो कहानी क्या बनेगी! 
और फिर यह भी है कि आपको जबान और खयालों का दारोगा किसने बनाया? यदि आप समझते हैं कि कोई फिल्म समाज को गुमराह करती है, तो उस फिल्म के बनानेवालों, उसमें काम करनेवालों और उसे लिखनेवालों पर खुली अदालत में मुकदमा चला कर उन्हें फांसी चढ़ी दीजिए। पर यह कच्चे धागे से लटकती हुई सेंसर की तलवार हटा कर यथार्थ की बात की कीजिए। आपका सेंसर बोर्ड 'जय बंगलादेशÓ जैसी फिल्मों को 'एÓ नहीं 'यूÓ सर्टिफिकेट देता है। सरकारें मनोरंजन टेक्स माफ करती हैं और फिर वह फिल्म 'बैनÓ कर दी जाती है। आपका सेंसर बोर्ड 'यह गुलिस्तं हमाराÓ जैसी फिल्म को 'यूÓ सर्टिफिकेट देता है। मेघालय सरकार मनोरंजन टेक्स माफ करती है और बाद में दिल्ली सरकार दो महीनों के लिए उसे 'बैनÓ कर देती है।  
इस सादगी पर कौन न मर जाये ऐ खुदा
लड़ते हैं और हाथ में तलवार भी नहीं।
लगभग हर फिल्म में कचहरी का एक सीन जरूर होता है। लगता है कि कचहरी नहीं मछली बाजार है। पर सेंसर बोर्डवालों के कान पर जूं नहीं रेंगती। लेकिन यदि नायिका यह कहती सुनी जाये कि वह पूर्वी अफ्रीका में रहती थी। मां-बाप मर गये। वह वहां अकेली रह गयी, तो बंबई चली आयी, अपने एक दूर के रिश्तेदार के पास, तो सेंसर बोर्ड का चिट्ठा आ जाता है कि ईस्ट अफ्रीका की बात निकाल दो।
परंतु यथार्थ के रास्ते में सेंसर बोर्ड और इन्फार्मेशन मिनिस्ट्री के सिवा भी कई दीवारें हैं और जो मैं यहां उनकी बात न छेड़ू, तो यह बड़ी बेईमानी की बात होगी और एकांगी होगी।
हिंदुस्तानी फिल्म की दुनिया में लेखक तीसरे या चौथे दर्जे का नागरिक है। उसकी कोई आवाज नहीं है। और यहां ऐसा-ऐसा काबिल प्रोडयूसर और स्टार पड़ा हुआ है कि शेक्सपीयर और टालस्टाय की कहानियों को 'ठीकÓ कर दे, राही मासूम रजा बिचारे तो किस खेत की मूली हैं। फिल्मी दुनिया का फार्मूला यह है कि लेखक के सिवा बाकी तमाम लोग लिखना जानते हैं। हर आदमी की जेब में एक आध कहानियां पड़ी होती हैं। और वह उन्हीं कहानियों को फिल्माना चाहता है। यह कहानियां कभी मौलिक नहीं होतीं। अंग्रेजी के किसी पेपरबैक उपन्यास य किसी फिल्म से उड़ायी होती है। लेखक से उनका भारतीयकरण करने को कहा जाता है। और जिंदा रहने के लिए उसे यह काम करना पड़ता है।
मैं जिंदगी में घटियापन के खिलाफ हूं और मैं यह मांग करता हूं कि लेखक की इज्जत की जाये। मैं अपने आपको खुले बाजार में बेच रहा हूं, पर मैं लेखक की इज्जत को (कम-से-कम आज तक) किसी कीमत पर बेचने को तैयार नहीं हूं। अनेक प्रोडयूसरों का यह खयाल है कि पैसे से हर चीज खरीदी जा सकती है। उनका यह खयाल गलत ह। कोई लेखक स्टारों और प्रोडयूसरों की इस दुनिया में इज्जत की सांस नहीं ले सकता। और इस घुटन में कलम की सांस रुकने लगती है। जो फिल्म फि भी चल जाये, तो कमाल स्टारों और डाइरेक्टरों का है।
 मेरे एक दोस्त हैं। वे एक फिल्म बना रहे हैं। चूंकि दोस्ती है, इसलिए यह फिल्म मैं ही लिख रहा हूं। इंस्टीच्यूट का एक लड़का उसे डाइरेक्ट कर रहा है। कहानी एक दूसरे साहब की है। अब डाइरेक्टर इस पर अड़ा हुआ है कि मैं वही डायलाग लिखूं, जो फिल्मी कथा लेखक ने अंग्रेजी में लिख दिये हैं। मैंने उसे बहुत समझाया कि भई मैं लेखक हूं, अनुवादक नहीं हूं।
गुजराल साहब, तस्वीर का एक रुख यह भी है, बेदी और इस्मत के आगे घास न डालनेवाली यह हिंदी फिल्मी दुनिया तीसरे दर्जे के अंग्रेजी से उड़ाऊ फिल्मी कथा लेखकों के पीछे भाग रही है, तो मैं क्या करूं? और इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि ये ही स्टंट फिल्में धड़ल्ले से चल भी रही हैं। इसलिए गुजराल साहब, हमें, आपको कहीं बैठकर यह भी सोचना चाहिए कि ऐसी ही फिल्में क्यों चलती हैं? हमें यह बात नहीं भूलनी चाहिए, फिल्म एक बड़ी तिजारत भी है। मेरे खयाल में इन फिल्मों के चलने का राज यह है कि इनमें घरेलू कहानियों की यह बुनियादी सच्चाई होती है कि जीत आखिर में सत्य की होती है, चाहे वह सत्य देव आनंद या विजय आनंद ही क्यों न हो।
 फिर भी यदि आप वाकई यह चाहते हैं कि यथार्थ के आधार पर बनें, तो पूना य मद्रास में तकरीर न कीजिए, क्योंकि पच्चीस बरस की तकरीरों का आज तक कोई नतीजा नहीं निकला है। फिल्म कौंसिल बनाने से भी कोई खास फायदा न होगा। क्योंकि खराबी की जड़ डिस्ट्रीब्यूशन में है।
एक फिल्म बन रही है। इसकी स्क्रीन प्ले भी मैंने लिखा है। कहानी कुछ ऐसी थी कि फ्लैशबैक ही में दिखलाई जा सकती थी। पूरी फिल्म बन गयी। रिलीज की तारीख पड़ गयी। तब एक बड़े वितरक ने कहा कि फ्लैशबैक निकाल कर कहानी को सीधा कर दिया जाए। अगर ऐसा नहीं किया गया, तो वह डिलिवरी नहीं लेगा। प्रोड्यूसर को मानने के सिवा कोई चारा नहीं था। उसने कहानी को सीधा कर दिया और मेरे खयाल में फिल्म बिल्कुल चौपट हो गयी। सवाल यह पैदा होता है कि कहानी के बारे में मेरी (लेखक की) बात चलनी चाहिए या वितरक की-य स्टार की? मेरी बात तो नहीं चलेगी, क्योंकि मेरी हैसियत क्या? 50,000 तक मजूरी पानेवाले की उन लोगों के मुकाबले में हैसियत क्या जो दस-बीस लाख पाते हैं। जो दस लाख पाता है, वह दस हजार पाने वाले से ज्यादा काबिल है। लेखक अपनी बात पर अड़ेगा, तो निकाल दिया जायेगा। वितरक की बात यूं चलेगी कि फिल्म में उसका पैसा लगा हुआ है क्योंकि वह काले पैसे को 'एडजस्टÓ करता है। क्योंकि एक फिल्म तीस-चालीस लाख में बनती है और फिल्म फाइनेंस की कुल पूंजी बारह लाख है। इसीलिए वितरक ने फिल्म इंडस्ट्री के गले से पकड़ रखा है। आप चाहते हैं कि अच्छी फिल्में बनें, तो वितरण के बूढ़े को फिल्मों के सिंदबाद के कंधे से उतारिए। वितरण उनके हाथों से लीजिए, डिस्ट्रीब्यूशन का इंतजाम कीजिए, उससे एक फायदा यह भी होगा कि काले पैसे का धंधा एकदम रुक जायेगा। यदि वितरक से काला पैसा मिलने का रास्ता बंद हो जायेगा, तो प्रोड्यूसर काला पैसा लगाना बंद कर देगा। और फिल्मों में काला पैसा निकल जायेगा, तो मजदूरियां लगभग बराबर हो जायेंगी और तकनीशियों की इज्जत होने लगेगी। कोई फिल्म केवल स्टारों के बूते नहीं चलती। और हर फिल्म इसलिए फ्लाप होती है कि कम पैसे पानेवाले तकनीशियन ज्यादा पैसे पानेवाले स्टारों से मार खा जाते हैं और अपने उसूलों के खिलाफ काम करने को मजबूर हो जाते हैं। स्टारों का बोलबाला इसलिए है कि वितरक उन्हीं की मांग करता है। यानी बात घूम-फिरकर फिर वितरक तक आ गयी। आपका क्या खयाल है?

मेरी पहली रचना


प्रेमचंद
उस समय मेरी उम्र कोई 13 साल की रही होगी। हिन्दी बिलकुल न जानता था। उर्दू के उपन्यास पढऩे का उन्माद था। मौलाना शरार, पं रतननाथ सरशार, मिर्जा रूसवा, मौलवी मुहम्मद अली हरदेई-निवासी उस वक्त के सर्वप्रिय उपन्यासकार थे। इनकी रचनाएं जहां मिल जाती थीं, स्कूल की याद भूल जाती थी और पुस्तक समाप्त करके ही दम लेता था। उस जमाने में रेनाल्ड के उपन्यासों की धूम थी। उर्दू में उनके अनुवाद धड़ाधड़ निकल रहे थे और हाथों हाथ बिकते थे। मैं भी उनका आशिक था। स्व. हजरत रियाज ने, जो उर्दू के प्रसिद्ध कवि हैं और जिनका हाल में देहान्त हुआ है, रेनाल्ड की एक रचना का अनुवाद 'हरम सराÓ के नाम से किया था। उसी जमाने में लखनऊ के साप्ताहिक 'अवधपंचÓ के संपादक स्व. मौलाना सज्जाद हुसेन ने, जो हास्यरस के अमर कलाकार हैं, रेनाल्ड के दूसरे उपन्यास का अनुवाद धोखा या तिलस्मी फानूस के नाम से किया था। ये सारी पुस्तकें मैंने उसी जमाने में पढ़ी और पं रतननाथ सरशार से तो मेरी तृप्ति ही न होती थी। उनकी सारी रचनाएं मैंने पढ़ डाली। उन दिनों मेरे पिता जी गोरखपुर में रहते थे और मैं भी गोरखपुर ही के मिशन स्कूल में आठवें में पढ़ता था, तो तीसरा दरजा कहलाता था। रेती पर एक बुकसेलर बुद्धि लाल नाम का रहता था। मैं उसकी दुकान पर जा बैठता था और उसके स्टाक से उपन्यास ले लेकर पढ़ता था, मगर दूकान पर सारे दिन तो बैठ न सकता था। इसलिये मैं उसकी दूकान से अंग्रेजी पुस्तकों की कुजिंयां और नोट्स लेकर अपने स्कूल के लड़कों के हाथ बेचा करता था और इसके मुआवजे में दूकान से उपन्यास घर लाकर पढ़ता था। दो-तीन वर्षों में मैंने सैकड़ों ही उपन्यास पढ़ डाले होंगे। जब उपन्यासों का स्टाक खतम हो गया, तो मैंने नवल किशोर प्रेस से निकले हुए पुराणों के उर्दू अनुवाद भी पढ़े, और तिलस्मी होशरूबा के कई भाग भी पढ़े। इस वृहद् तिलस्मी ग्रंथ के 17 भाग उस समय निकल चुके थे और एक-एक भाग बड़े सुपर रायल के आकार के दो-दो हजार पृष्ठों से कम न होगा। और इन 17 भागों के उपरान्त उसी पुस्तक के अलग-अलग प्रसंगों पर पच्चीसों भाग छप चुके थे। इन में से भी मैंने कई पढ़े। जिसने इतने बड़े ग्रंथ की रचना की, उनकी कल्पना-शक्ति कितनी प्रबल होगी, इसका केवल अनुमान किया जा सकता है। कहते हैं, ये कथाएं मौलाना फैजी ने अकबर के विनोदार्थ फारसी में लिखी थीं। इसमें कितना सत्य है, कह नहीं सकता, लेकिन इतनी वृहद कथा शायद ही संसार की किसी भाषा में हो। पूरी एन्साइक्लोपीडिया समझ लीजिए। एक आदमी तो अपने 60 वर्ष के जीवन में उनकी नकल भी करना चाहे तो नहीं कर सकता, रचना तो दूसरी बात है।
 
उसी जमाने में मेरे एक नाते के मामू कभी कभी हमारे यहां आया करते थे। अधेड़ हो गये थे, लेकिन अभी तक बिन ब्याहे थे। पास में थोड़ी जमीन थी, मकान था, लेकिन घरनी के बिना सब कुछ सूना था। इसीलिए घर पर जी न लगता था। नातेदारियों में घूमा करते थे और सब से यही आशा रखते थे कि कोई उनका ब्याह करा दे। इसके लिये सौ दो सौ खर्च करने को भी तैयार थे। क्यों उनका ब्याह न हुआ, यह आश्चर्य था। अच्छे खासे हृष्ट-पुष्ट आदमी थे, बड़ी-बड़ी मूंछे, औसत कद, सांवला रंग। गांजा पीते थे, इससे आंखें लाल रहती थीं। अपने ढंग के धर्मनिष्ठ थे। शिव जी को रोजाना जल चढ़ाते थे और मांस-मछली नहीं खाते थे।

 
आखिर एक बार उन्होंने वही किया, जो बिन ब्याहे लोग अकसर किया करते हैं। एक चमारिन के नयन बाणों से घायल हो गये। वह उन के यहां गोबर पाथने, बैलों को सानी पानी और इसी तरह के फुटकल कामों के लिये नौकर थी। जवान भी थी, छबीली थी और अपने वर्ग की अन्य रमणियों की भांति प्रसन्नमुख और विनोदिनी थी। 'एक समय सखि सूअर सुन्दरÓ वाली बात थी। मामू साहब का तृषित हृदय मीठे जल की धारा देखते ही फिसल पड़ा। बातों-बातों में उससे छेड़छाड़ करने लगे। वह इनके मन का भाव ताड़ गई। ऐसी अल्हड़ न थी। और नखरे करने लगी, केशों में तेल भी पडऩे लगा, चाहे सरसों का ही क्यों न हो, आंखों में काजल भी चमका, ओठों पर मिस्सी भी आई और काम में ढिलाई भी शुरू हुई। कभी दोपहर को आई और  झलक दिखा कर चली गई, कभी सांझ को आई और एक तीर चलाकर चली गई। बैलों को सानी-पानी मामू साहब खुद दे देते, गोबर दूसरे उठा ले जाते, युवती से बिगड़ते क्यों कर्र वहां तो अब प्रेम का उदय हो गया था। होली में प्रथानुसार एक साड़ी दी, मगर अब की गाजी की साड़ी न थी, खूब सुन्दर सी सवा दो रुपये की चुंदरी थी। होली की त्योहारी भी मामूली से चौगुनी दी। और यह सिलसिला यहां तक बढ़ा कि वह चमारिन ही घर की मालकिन हो गई। एक दिन संध्या-समय चमारों ने आपस में पंचायत की। बड़े आदमी हैं तो हुआ करें, क्या किसी की इज्जत लेंगे? एक इन लाला के बाप थे कि भी किसी मेहरिया की ओर आंख उठा कर न देखा, (हालांकि यह सरासर गलत था) और एक यह है कि नीच जात की बहू-बेटियों पर भी डोरे डालते हैंसमझाने बुझाने का मौका न था। समझाने से लाला मानेंगे तो नहीं, उलटे और कोई मामला खड़ा कर देंगे। इनके कलम घुमाने की तो देर है। इसलिये निश्चय हुआ कि लाला साहब को ऐसा सबक देना चाहिये कि हमेशा के लिए याद हो जाय। इज्जत का बदला खून से ही चुकता है, लेकिन मरम्मत से ही उसकी कुछ पुरौती हो सकती है।

दूसरे दिन शाम को जब चम्पा मामू साहब के घर आई, तो उन्होंने अन्दर का द्वार बन्द कर दिया। महीनों से असमंजस और हिचक और धार्मिक संघर्ष के बाद आज मामू साहब ने अपने प्रेम को व्यावहारिक रूप देने का निश्चय किया था। चाहे कुछ हो जाय, कुल-मरजाद रहे या जाय, बाप दादा का नाम डूबे या उतराये! 
उधर चमारों का जत्था ताक में था ही। इधर किवाड़ बन्द हुए, उधर उन्होंने द्वार खटखटाना शुरू किया। पहले तो मामू साहब ने समझा, कोई आसामी मिलने आया होगा, किवाड़ बन्द पाक लौट जायगा, लेकिन जब आदमियों का शोरगुल सुना तो घबड़ाये। जाकर किवाड़ों के दराज से झांका। कोई बीस पच्चीस चमार लाठियां लिये द्वार रोके खड़े किवाड़ी तो तोडऩे की चेष्टा कर रहे थे। अब करें तो क्या करें। भागने का कहीं रास्ता नहीं, चम्पा को कहीं छिपा नहीं सकते। समझ गये कि शामत आ गई। आशिकी इतनी जल्दी गुल खिलायगी यह क्या जानते थे, नहीं इस चमारिन पर दिल को आने ही क्यों देते। उधर चम्पा उन्हीं को कोस रही थी-तुम्हारा क्या बिगड़ेगा, मेरी तो इज्जत लुट गई। घर वाले मूंड़ ही काट कर छोड़ेंगे। कहती थी, अभी किवाड़ बन्द न करो, हाथ-पांव जोड़ती थी, मगर तुम्हारे सिर पर तो भूत सवार था। लगी मुंह में कालिख कि नहीं?

मामू साहब बेचारे इस कूचे में कभी न आये थे। कोई पक्का खिलाड़ी होता तो सौ उपाय निकाल लेता, लेकिन मामू साहब की तो जैसे सिट्टी-पिट्टी भूल गई। बरौठे में थर थर कांपते 'हनुमान चालीसाÓ का पाठ करते हुए खड़े थे। कुछ न सूझता था।
 
और उधर द्वार पर कोलाहल बढ़ता जा रहा था, यहां तक कि सारा गांव जमा हो गया। ब्राह्मण, ठाकुर, कायस्थ सभी तमाशा देखने और हाथ की खुजली मिटाने के लिये आ पहुंचे। इससे ज्यादा मनोरंजक और स्फूर्तिवद्र्धक तमाशा और क्या होगा कि एक मर्द और एक औरत के साथ घर में बन्द पाया जाय! फिर चाहे कितना ही प्रतिष्ठित और विनम्र क्यों न हो, जनता उसे किसी तरह क्षमा नहीं कर सकती। बढ़ई बुलाया गया, किवाड़ फाड़े गये और मामू साहब भूसे की कोठरी में छिपे हुए मिले। चम्पा आंगन में खड़ी रो रही थी। द्वार खुलते ही भागी। कोई उससे नहीं बोला। मामू साहब भाग कर कहां जाते? वह जानते थे, उनके लिये भागने का रास्ता नहीं है। मार खाने के लिये तैयार बैठे थे। मार पडऩे लगी और बेभाव की पडऩे लगी। जिसके हाथ जो कुछ लगा-जूता, छड़ी, छाता, लात, घूंसा सभी अस्त्र चले। यहां तक कि मामू साहब बेहोश हो गये और लोगों ने उन्हें मुर्दा समझकर छोड़ दिया। अब इतनी दुर्गति के बाद वह बच भी गये, तो गांव में नहीं रह सकते और उनकी जमीन पट्टीदारों के हाथ आएगी।
इस दुर्घटन की खबर उड़ते-उड़ते हमारे यहां भी पहुंची। मैंने भी उसका खूब आनन्द उठाया। पिटते समय उनकी रूपरेखा कैसी रही होगी, इसकी कल्पना करके मुझे खूब हंसी आई।
 
एक महीने तक तो वह हल्दी और गुड़ पीते रहे। ज्योंही चलने-फिरने लायक हुए, हमारे यहां आये। यहां अपने गांव वालों पर डाके से इस्तगासा दायर करना चाहते थे।
अगर उन्होंने कुछ दीनता दिखाई होती, तो शायद मुझे उनसे हमदर्दी हो जाती, लेकिन उनका वही दमखम था। मुझे खेलते या उपन्यास पढ़ते देख कर बिगडऩा और रोब जमाना, और पिताजी से शिकायत करने की धमकी देना, यह अब मैं क्यों सहने लगा था? अब तो मेरे पास उन्हें नीचा दिखाने के लिये काफी मसाला था।
आखिर एक दिन मैने यह सारी दुर्घटना एक नाटक के रूप में लिख डाली और अपने मित्रों को सुनाई। सब-के-सब खूब हंसे। मेरा साहस बढ़ा। मैंने उसे साफ-साफ लिख कर वह कापी मामू साहब के सिरहाने रख दी, और स्कूल चला गया। दिल में कुछ डरता भी था, कुछ खुश भी था, और कुछ घबड़ाया हुआ भी था। सबसे बड़ा कुतूहल यह था कि ड्रामा पढ़कर मामू साहब क्या कहते हैं। स्कूल में जी न लगता था। दिल उधर ही टंगा हुआ था। छुट्टी होते ही घर चला, मगर द्वार के समीप आकर पांव रुक गये। भय हुआ, कहीं मामू साहब मुझे मार न बैठें, लेकिन इतना जानता था कि वह एकाध थप्पड़ से ज्यादा मुझे मार न सकेंगे, क्योंकि मैं मार खाने वाले लड़कों में न था।
मगर यह मामला क्या है। मामू साहब चारपाई पर नहीं हैं, जहां वह नित्य लेटे हुए मिलते थे। क्या घर में चले गये? आकर कमरा देखा। वहां भी सन्नाटा। मामू साहब के जूते, कपड़े, गठरी सब लापता। अन्दर जाकर पूछा। मालूम हुआ मामू साहब किसी जरूरी काम से घर चले गये। भोजन तक नहीं किया।
मैंने बाहर आकर सारा कमरा छान मारा, मगर मेरा ड्रामा-मेरी वह पहली रचना-कहीं न मिली। मालूम नहीं मामू साहब ने उसे चिराग अली के सुपुर्द कर दिया या अपने साथ स्वर्ग ले गये?
  -----
प्रेमचंद की यह रचना साहित्यकारों की आत्मकथा नामक पुस्तक से ली गई है, जिसका संपादन देवव्रत जी ने किया था। देवव्रतजी उस समय नवशक्ति के संपादक थे। यह पुस्तक पटना से ही नवशक्ति प्रेस से 1939 में छपी थी।
-----------------



हम न मरब मरिहैं संसारा

डॉ शुकदेव सिंह
डॉ शुकदेव सिंह

हिंदी जाति या भारत अपनी निजंधर कथाओं में महापुरुषों के जीवन प्रत्यय कुछ शुभंकर तिथियों का नियोजन करते हैं-पूर्णिमा, एकाक्षी, मंगल योग अथवा किसी भी महापुरुष को अयोनिज अर्थात स्त्री के मुख्य शरीर के अलावे कहीं अन्यत्र से पैदा होने की बात। गणेश, कृष्णानंद, चतुरानन, दशानन इत्यादि इसी प्रसंग से जुड़े हैं। इसी तरह से बुद्ध, कबीर और अन्य महापुरुष किसी विशेष तिथि को, किसी शाप या पुण्य या स्वप्न फल के रूप में ही इनके उत्पन्न होने की बात कही जाती है। इसी कल्पना कल्प या जाति वृत्ति से कबीर का जन्म-मरण भी जोड़ दिया गया है। वे न आकाश से उतरे, न कमल पत्र पर प्रकट हुए न विधवा ब्राह्मणी की संतान थे। उनके समकालीन सेननाई ने उनके जीवन काल में ही रैदास से यह स्पष्ट रूप से कहलाया-उनकी मां तुर्क थीं और पिता जुलाहा, कोरी अर्थात चमार थे। तुर्क लड़की से किसी छोटी जाति के वर का विवाह समाज के द्वारा स्वीकृत नहीं है। इसीलिए कबीर का जन्म विवाद में पड़ा और पंथ तथा कुपंथ के लोगों को उनकी जन्मकथा को गढऩे का अवसर मिल गया। तुर्क लड़की से तातार तक विवाह करने से घबराते थे। जुलाहा कोरी की क्या बिसात? प्रेमचंद की कहानी 'दिल की रानीÓ में तुर्क और तातार प्रेम के भय-संशय देखा जा सकता है और समझा जा सकता है कि क्यों कबीर का जन्म इस तरह की गढंत से जुड़ा। कबीर मुसलमान थे, सूफी थे, संत थे और साहसी कवि थे।

वे अशिक्षित नहीं, विद्वान, तपस्वी और आध्यात्मिक थे

कबीर की शिक्षा को लेकर प्राय: यह कहा जाता है कि वे अनपढ़ थे। मसि कागद छुयो नहीं कलम गह्यो नहीं हाथ, चारिउ जुग को महातम मुख ही जनाहि बात। इस साखी के आधार पर बात चल गई तो चल गई कि कबीर अनपढ़ थे। कबीर काशी के नागरिक थे। वेदांत, तर्कशास्त्र, वैराग्य, विद्या, जोगी, चिंतन, अघोरशास्त्र, तंत्र, ज्योतिष, तसव्वुफ और मलामत साधनाओं के वे बहुत बड़े पंडित थे। उन्होंने सांसारिक विषयों को-चारिउ जुग को महातम-मौखिक रूप से कहा, और अध्यात्म से संबंधित कविताओं को मलामत साधनाओं की गूढ़ प्रक्रिया के भीतर इलहाम और अनहद की भूमिका में जाकर लिखा। यह तनु जारिउ मसि करौ-लिखौ राम को नाऊं, लेखनि करौं करंक की, लिखि लिखि राम पढ़ांउं। स्पष्ट है कि यह पत्राचार विनय पत्रिका का पूर्वज है। कबीर के अनेक निर्वाण पद चिंतन के साथ लेखन से संबंद्ध हैं। सृष्टि विज्ञान संबंध उनकी अनेक रमैनी, रचनाएं, साखियां और सबद शिक्षित लेखन का परिणाम हैं। ''मुसलमानीÓÓ नाम से संग्रहित उनके पद अत्यंत गूढ़ लेखन के फल हैं। वे अशिक्षित नहीं, विद्वान, तपस्वी और आध्यात्मिक थे।




कबीर के पाठ

कबीर के पाठ को लेकर बड़ी बहसें हुई हैं और अनर्गल बातें कही गई हैं। पाठ संपादन में हस्तलेखों और शब्दों के औचित्य को लेकर माथापच्ची की गई है, पाठों के बीच संकीर्ण संबंध के 'पोस्टग्रेट शैलीÓ अपनाई गई है, यह सब गलत है। उनकी रचनाएं कबीर पंथ-जिसका काफी दूर तक जोगियाकरण, भगवाकरण या हिंदूकरण हो चुका है-उस पंथ में उनकी रचनाएं की गई हैं-ऐसी रचनाओं का संग्रह बीजक है। इसके भगताही पाठ मुंगरेबनी पाठ, दानापुर पाठ और कई-कई पाठ प्रचलित हैं। पहली दूसरी रमैनी को दो एक करके शब्दों का क्रम बदलकर साखियों के 3 5 3 में घट-बढ़कर के कहरा, चौतिसा जैसे आठ काव्य रूपों को सबद के भीतर डालकर बीजक का या ग्रंथ बनता है। इस तरह से बीजक के पाठकों पर विचार हो सकता है। उनकी संकीर्ण संबंध की खोज की जा सकती है। लेकिन, दादूपंथी पाठ, सिखपंथी गुरुग्रंथ पाठ या अन्य 83 संप्रदायों में कबीर के पाठ की तुलना नहीं हो सकती। पंथों के दबाव के कारण पंक्तियां नीचे-ऊपर होती हैं, घटती हैं, बढ़ती हैं, जुड़ती हैं। जीववाद और ब्रह्मवाद के हिसाब से उलट-पलट होती है-यह पूरी प्रक्रिया सामुदायिक है, इसलिए एक पद के विभिन्न रूपों को देखते समय शब्द, भाषा, पंक्ति, अनुलेखन अक्षर का घुमाव, मंगलाचरण, पुष्पिका का विचार गौण रूप से होना चाहिए, मुख्य रूप से नहीं। सामुदायिक पाठों को समझने के लिए विज्ञान योग या कबीर विद्या संबंधी गोष्ठी, सागर, तिलक, बोध, पंचग्रंथी, सरोदय, प्राण संकली इत्यादि का गहन अध्ययन आवश्यक है। अन्यथा समुदाय के भीतर साधे हुए पाठ से खेलना खेलवाड़ ही है। जैसाकि पारसनाथ तिवारी, ज्वाला कैबर्ट जैसे अनेक पाठ विचारकों ने किया है-उन्हें कबीर के पाठ के बारे में कुछ नहीं मालमू। इसी तरह नामवर सिंह और रामस्वरूप चतुर्वेदी जैसे शिशु, बबुआ कबीर विद्या के विद्यार्थियों पर भी दया करनी चाहिए। ये छपी हुई किताबें पढ़कर बोलने वाले 'हिंदीवालाÓ हैं। हस्तलेखों, संप्रदायों और एक अक्षर के बदलने, तोडऩे-मरोडऩे, तत्सम से तद्भव करने की जटिलता के विषय में ये 'बबुआÓ कुछ नहीं जानते। कबीर के लिखित पाठ कबीर पंथ, दादू पंथ, सिख पंथ और परिवर्तन व्यास से बावरी पंथ, दरिया पंथ, प्रणामी, सतनामी, अप्पा पंथ, वामनदास पंथ-जैसे अनेक पंथों में अनेक ढंग से अलग होते हैं। इसी तरह कबीर के पहले मठ भगताही मठ, खेमसा, दरभंगा के कारण खेमसरी पाठ, मैथिली भाषा में, मालवीय देवास पाठ मध्यप्रदेश में, राजस्थानी पाठ हस्तलेखों के साथ खान विरासी, निर्गुण गायकों में और तथाकथित अध्ययनपतियों से संबंधित पुरबिया पाठ, धोबी, मुसहर, चमार, कहार, जोगी, मंगता, कावरिया-अनेक निर्गुनियां कलाजीवी पूर्वाश्रम में साधु और बाद गृहस्थों में पाए जाते हैं। इन पाठों में कबीर के मूलवचन में राग, रंग के कारण भी अनेक अंतर आते हैं। गायक निर्गुनियां (तानसेन और वक्षुनायक की परंपरा) में भैरो ठाठ, विहागराग, अनेक रागिनियां और रागपुत्रों के भीतर सुर और तान संप्रेषण और रुझान के कारण भी पाठ अंतर होते हैं। देवास के कुमार गंधर्व और महाराष्ट्र के ओंकारनाथ ठाकुर इन्हीं लोक रंगों को शास्त्रीय रूप देने वाले थे। कबीर के पाठ को मठ से लेकर भिक्षाजीवी तथा शास्त्रीय संगी और रंडी गायकों की परंपरा में अलग-अलग ढंग से देखना होगा। मानना होगा कि-सोना, सज्जन साधु जन, टूट जुटेहि सतबार-कबीर की कविता सोना है-जो सौ बार टूटती है और जुटती है। वह दुर्जन कंग कुमार का, धागा दरार नहीं है-कि माता प्रसाद गुप्त, पारसनाथ तिवारी, नामवर सिंह या रामस्वरूप चतुर्वेदी जैसे बवने खिलवाड़ करें।

कबीर के गुरु रामानंद नहीं

कबीर के गुरु रामानंद नहीं थे। लेकिन कबीर के जाने के बाद ही गुरुमत परंपरा के धर्ममत के समानांतर इतना व्यापक प्रचार हुआ कि कबीर की तीसरी पीढ़ी में अनंत दास वैष्णव ने जब संवत 1645 में परिचइयां लिखीं, तो यह 60-70 वर्ष पहले से स्थापित था कि रामानंद के शिष्य मंडल में थे। वामादास, प्रियादास, राघवदास जैसे जीवनी लेखकों ने विश्वासपूर्वक उसका अनुमोदन किया और हिंदू रुझान के कबीर पंथियों ने इसे प्रमाणपूर्वक मान लिया। लेकिन गरीब दास के पथ में और धर्मदास की बनिया सूरी शाखा में इसे मान्यता नहीं मिली। कबीर वस्तुत: स्वयं जगतगुरु परंपरा के विरोध में सद्गुरु परंपरा के उन्नायक थे। शंकराचार्य ने कहा है-ब्रह्म सत्यं, जगत मिथ्या-लेकिन शंकराचार्य की गद्दियों पर जगतगुरु यानी मिथ्यागुरु बैठे हैं। इसके विरोध में कबीर ने सतगुरु-संतों भक्ति सतोगुर आनी-की नींव डाली और सतगुरु, सतनाम, सद्धाम, सतलोक, सत्यनारायण और सतश्री अकाल-तथा सतनामी समुदाय और जगतगुरु अर्थात मिथ्या पाखंड परंपरा के विरोध में सच्चाई की संस्कृति का विकास है। फिर जगतगुरु, सतगुरु और शिवगुरु जैसी गुरु गोठियां तंत्र, मंत्र, दीक्षा, साधना, रति, और भोग से संबंध हो गई। कबीर सतगुरु परंपरा के उन्नायक हैं। और तुलसी शिव परंपरा के अनुयायी-श्रीगुरु चरन सरोज राज, निजमन मुकुर सुधार-में शिव तत्व को देखा जा सकता है। कबीर के कारण ही गुरु वाणी, गुरुपद पर आसीन है। गुरुग्रंथ के बाद कोई गुरु नहीं, सिखपंथ में, बीजक के बाद कोई सद्गुरु नहीं कबीर पंथ में। 'राम जहाजÓ के बाद कोई गुरु नहीं बावरी पंथ में। कलजन स्वरूप के बाद कोई गुरु नहीं प्रणामी पंथ में। पांजी पंथ प्रकाश के बाद कोई गुरु नहीं, वचन वंश में। इस तरह कबीर के कारण महान गुरुओं की वाणी ही गुरुपदों पर आसीन हो गई। गुरु समाप्त हुए और उनकी जगह पर गद्दी, आसन, चंवर, पीठ पर बैठने वाले महंत और आचार्य आने लगे। गुरु परंपरा के निधन के कारण ही महंथों और संपत्ति बटोरों का विकास हुआ।

 सदेह मुक्त हुए कबीर

कबीर मरे नहीं, सदेह मुक्त हुए, उनकी शव की जगह फूल मिले। रौजा भी बना और समाधि भी बनीं। रीवां के वीर सिंह बघेल और गाजीपुर के बिजली खां ने रौजा और समाधि को एक कबीर में नहीं, दो जगह बांटकर स्थापित किया। यह श्रद्धा की लीला है-रामलीला और कृष्णलीला की तरह। कबीर और रैदास दोनों सदेह मुक्त हुए अर्थात उन्हें खास से गायब  किया गया। वास्तव में जैसे सबकी मृत्यु होती है, वैसे ही इन संतों की भी मृत्यु हुई थी। और, कबीर को खास तरह से बांटा गया था। लेकिन 50 वर्षों के निरंतर अनुसंधान के बाद मेरा मत है-मगहर के कबीर का रौजा या मजार पहले बना था और वहीं उनके पुत्र कमाल का भी मजार बना। हिंदू रुझान के कबीर पंथियों ने भी समानांतर समाधि बनाई। कबीर से जुड़ा हुआ पहला मठ पिथौराबाद-खेमसर, तीसरी जगन्नाथपुरी चौथा मगहर में बना। इनके समय के बारे में 10-15 वर्ष का आगा-पीछा हो सकताहै। समय के विवाद में मैं नहीं पडऩा चाहता। कबीर चौरा मठ 1801 ईस्वी में स्थापित हुआ। यद्यपि मैंने ही अपनी पुस्तक कबीर के स्मरण तीर्थ में-कबीर चौरा मठ को मगहर मठ से जोड़कर सूरत गोपाल को निर्माता लिखा है, लेकिन सूरत गोपाल की समाधि तो पूरी में है। मेरे गुरु पं हजारी प्रसाद द्विवेदी कहा करते थे कि कबीर चौरा 16 वें गुरु के जमाने में स्थापित हुआ तो मुझे विस्मय होता था लेकिन बे्रस्टकाट ने यह सबूत दिया है कि रामनगर के काशीनरेश बलवंत सिंह और उनकी पत्नी के निर्देश पर बाद में सन् 1801 में कबीर चौरा वाली भूमि-मगहर के मठवासियों या नीरू टोला के वैरागियों को उपलब्ध कराई गई। कबीर मगहर में ही मरे-मगह मरे न मरे नहीं पावै-सो कबीर को मगहर में मरण नहीं मिला, वे जीवित हैं और आदमी-आदमी के फर्क की हद जब तक बनी रहेगी, तब तक मगह मरे न मरन नहीं पावै।

करीब 20 साल पहले डाॅ शुकदेव सिंह से बातचीत की थी। कबीर के बारे में उन्‍होंने कई नई जानकारियां साझा की थीं। वे कबीर के अध्‍येता नहीं, कबीर काे वे जीते थे। उनका अध्‍ययन विशाल था। यह बातचीत उनके घर कबीर विवेक पर ही हुई थी।